Maun Dhyan Sadhana Shibir 11 – Vachana – 16

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વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત

Subject: प्रभु निर्मल दरिसन कीजिए

जिस धरातल पर हम बैठे हुए है, उसी धरातल से स्वानुभूति की यात्रा का प्रारंभ करा रहे है। प्रभु का दर्शन रोज ही हम करते है; बस निर्मल दर्शन कर लो, तो स्वानुभूति का पथ शुरू हो गया। निर्मल दर्शन का वास्तविक अर्थ है कि प्रभु के गुणो का दर्शन हमें हो, प्रभु के स्वरूप का हमें दर्शन हो।

मंदिर में गए, निसिहि कहकर जाना। सब चिंताए, सब उलझन बाहर द्वार पर छोड़कर भीतर जाना ओर मन को बिलकुल स्वस्थ कर देना। फिर कोई भी घटना घटे, ध्यान कहीं इधर-उधर नहीं जाना चाहिए। २३ घंटे आप जो करते हैं वह करते रहे, लेकिन एक घंटा मन को स्वस्थ रखें।

प्रभु तैयार है। He is ever ready, but you are not ready. अब तुम्हें ready होना है। तैयार होने के लिए इतना ही करना है: जब मंदिर में जाये, कोई विचार न हो। १० मिनट, १५ मिनट सिर्फ प्रभु को निहारना है; सिर्फ निहारना। निर्विचार मन से ही प्रभु का निर्मल दर्शन होगा ओर निर्मल दर्शन होगा उसके बाद ही आपको स्वानुभूति मिलेगी।

મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર જીરાવલા વાચના – ૧६

स्वानुभूति को पाने के लिए बहोत मधुरा मार्ग पद्मविजय म.सा. ने दर्शाया। ‘प्रभु निर्मल दरिसन कीजिए’ बड़ी अच्छी बात तो यह है, की जिस धरातल पर हम बैठे हुए है, उसी धरातल से स्वानुभूति की यात्रा का ये प्रारंभ करा रहे है। प्रभु का दर्शन रोज ही हम करते है; बस निर्मल दर्शन कर लो, स्वानुभूति का पथ चालू हो गया। अब स्वानुभूति की बात तो अगले कोई सत्र मे होगी आप के साथ, सुबह मैंने कहा था, में पुनरुक्त करू, की स्वानुभूति आपको देनी ही है, लेकिन बीच के समय में आपको क्या करना है- home work तो देना चाहिए ना आपको, home work यही है ‘प्रभु निर्मल दरिसन कीजिए।’

अभी क्या होता है- आप जिनालय में जाते है, कैसा सुंदर, पवित्र हमारे जिनालयों का atmosphere होता है। इतनी सुंदर ऊर्जा से भरा हुआ atmosphere जिनालय का होता है, की यदि आप विचार मुक्त होकर जाये तो आपकी यात्रा शुरू हो ही जाये! कोई संदेह की बात नहीं! लेकिन आप सब उलझनों में फंसे हुए है। प्रभु के पास जाते है, चिंताए चालू है, उलझने चालू है, अब मन उलझनों से ग्रस्त है, मन उलझनों में व्यस्त है, दर्शन कौन करेगा? याद रखना आंखे कुछ भी नहीं कर सकती, interpretation मन को ही करना होता है, मन की शक्ति के बिना इन्द्रिया कुछ नहीं कर सकती; वो तो सिर्फ केमेरा के लेंस है। हमारी जो आँख है, उससे ज्यादा कुछ नहीं है, केमेरे के लेंस। लेकिन क्लिक करनेवाला कोई चाहिए ना… देखनेवाले हम है, देखने का साधन आँख है। अब देखनेवाला ही गेरहाजर है, तो दर्शन कौन करेगा? बोलो…? तो अब कैसे निर्मल दर्शन करना? निर्मल दर्शन का वास्तविक अर्थ यह है, की प्रभु के गुणो का दर्शन हमें हो, प्रभु के स्वरूप का हमें दर्शन हो। कितने कितने गुण प्रभु में है- वीतरागदशा! राग कभी भी फरकेगा नहीं। वित्त द्वेषभाव! द्वेष का अंकुर भी दग्ध हो गया। हमारी परिभाषा में, संत को भी दग्ध बीज कहा गया है।

पतंजलि ऋषि ने पातंजल योगशास्त्र में एक बडा सुंदर शब्द दिया है, संत सब दग्ध बीज होते है। दग्ध बीज का मतलब क्या? जिन्होंने राग, द्वेष, अहंकार का बीज समाप्त कर दिया! आप के पास क्या होता है, कभी सुंदर वातावरण में गए, मन स्थिर भी था, थोड़ी देर के लिए राग- द्वेष हट भी गया, लेकिन ये conscious mind से हट गया, बीज तो unconscious mind में है ही। अस्तित्व के स्तर पर है ही। इसीलिए आप दग्ध बीज नहीं है। जब आप दग्ध बीज हो जायेंगे, फिर यात्रा आसान ही आसान है। मेरा तो एक logo है, it is so easy. It is easy एसा में नहीं कहता हूँ, it is so easy. बहुत ही सरल है! प्रभु का मार्ग easiest  है। sweetest है। ओर shortest भी है। easiest – सरलतम मार्ग। तुम मार्ग में भी चलो, fresh fresh हो जाये। हमारे साधुओ को पूछो, इन साध्वीओ को पूछो, पंद्रह किलोमीटर चलकर आई है, शाता में है साहेब? अरे बहोत शाता में है। प्रभु के मार्ग में आनंद ही आनंद है। easiest सरलतम मार्ग है। sweetest! इससे मधुर दूसरा क्या हो सकता है?! प्रभु के मार्ग से मधुर दूसरा कुछ भी संसार में नहीं है! आपने यह ऑप्शन देखा नहीं है, इसलिए आप संसार के रस में डूबे हुए हो। क्या है संसार के रस में? कुछ भी नहीं है।

हमारे सिद्धर्षी ने उपमिति में कहा की प्रभु! अनादि की धारा के वश, में राग-द्वेष की धारा में बहता हूँ। लेकिन कुछ भी है ही नहीं! बोलो द्वेष किया, क्रोध किया, आधे घंटे तक, क्या मिला आपको बोलो? उसका क्या हुआ वो बात छोड़ो, तुम्हारा क्या हुआ? अशांति अशांति अशांति मन में। आज तो डॉक्टर भी कहते है शांत रहो!

एक भाई एक सवेरे पेईन गेस्ट के रूप में जाते थे। तो जिसके वहाँ पेईन गेस्ट रूप में उतरते थे, उसकी बगल में एक फ्लेट था, वहाँ पति-पत्नी थे, ओर सुबह से शाम तक उनका जुलूस चालू ही होता था। ग्लास यहाँ क्यूँ मुकाया? यहाँ क्यूँ नहीं मुकाया? इस पर आधे घंटे का लेक्चर! सुबह से शाम तक चलता रहाँ! एक दिन ये आदमी आया पेईन गेस्ट के रूप में, ओर पडोंश के फ्लेट में बिलकुल शांति है! तो उसने पूछा की अपने जजमान से, की क्या ये लोग घर बदलकर गए है? तो जजमान ने कहाँ नहीं। ये तो यहाँ ही है, लेकिन अब डॉक्टर की आज्ञा में है। भाई को सिवीयर हार्टएटेक आ गया था। डॉक्टर ने दवाई तो दी है, बायपास की आवश्यकता नहीं हुई, दवाई दी है, लेकिन कहाँ है सहेज भी उतावले आवाज में तुम बोले तो सीधा हॉस्पिटल को एडमिट होना पड़ेगा। ओर बहनजी को हाइपर प्रेशर हो गया, २००-२१०-२२०, वो ठीक था की तुरंत ही हॉस्पिटल पहुँच गए, बच गए। लेकिन डॉक्टर ने कह दिया है, आप बिलकुल शांत रहना लेकिन फिर हम जिम्मेवार नहीं है तुम्हारे स्वास्थ्य में, तो अब दोनों डॉक्टर की आज्ञा में है।

आप भी है ना… हमारा कहाँ कभी कभी नहीं भी मानोगे। डॉक्टर के वचन को तहत्ती कर ही लोगे ना। हम कहेंगे रात को नहीं खाना चाहिये, कभी कभी आयंबिल आदि करना चाहिए। म.सा. आपकी बात तो ठीक है लेकिन… अब डॉक्टर ने कहा, क्लोरोसटॉल बढ़ गया है, घी-दूध सब छोड़ दो; वरना मर जाओगे। क्लोरोसटॉल इतना बढ़ गया है, अब चरबी बिलकुल नहीं चाहिए। घी बंध, दूध बंध, सबकुछ बंध, तहत्ती। क्या करोगे? हमारी बात तहत्ती नहीं करोगे, अरे वहाँ तो करना ही पड़ेगा आपको, तो समझदार हो जाओ, हमारी बात को तहत्ती कर लो। तो प्रभु का मार्ग easiest है। sweetest है। ये sweetest मार्ग पे चलना है, प्रभु निर्मल दर्शन कीजिए।

तो कैसे करना में आपको बताऊँ, समझ लो की उलझने है, संसार का नाम ही उलझन है! तो आप सब उलझन से भरे ही होंगे। लेकिन एक काम आप कर सकते हो, जितनी भी उलझन है, जितनी भी समस्याए है, प्रभु के कोर्ट में भेज दो, कोई भी समस्या, कोई भी उलझन, कोई भी चिंता, इसको बोल बनाकर प्रभु की कोर्ट में भेज दो; फिर प्रभु जो उत्तर देंगे बिलकुल सही होगा, मजेदार होगा। एक बात में कहूँगा, आप यदि भक्त हो जायेंगे ना; उलझन आपको बिदा करके चल जायेंगी। भक्त हंमेश के लिए निर्भार होता है।

हमारे एक आचार्य भगवंत थे, वयोवृद्ध थे, डोली में बिराजमान होकर विहारयात्रा करते थे। तो एक गाँव के आगे से साहेबजी की डोली निकली, साहेबजी को आगे जाना है, रास्ते पर ही दो संस्कारी बच्चे खेल रहे थे। जैसे ही म.सा. देखा, बहोत संस्कारी बच्चे थे, साहेबजी के पास गये, उनका चरण स्पर्श किया, वंदन किया। डोली आगे बढ़ी। अभी दोनों भाई थे- बच्चे, एक ६ साल का, एक ८ साल का। तो ६ साल के बच्चे ने अपने भाई से पूछा, भैया, ये म.सा. तो डोली में बिराजमान थे, पर डोलीवाले म.सा. को ऊंचककर दोड़ रहे थे, चल भी नहीं रहे थे, दोड़ रहे थे। तो डोलीवाले  म.सा. को ऊंचककर दौड़ रहे थे तो डोलीवालों को भार नहीं लगता होगा? ६ साल के बच्चे को यह सवाल हो सकता है। लेकिन ८ साल के बच्चे ने जो उत्तर दिया है, हमे लगे की हमारी परंपरा में जो पल्पा है, उसके होंठ से ही यह उत्तर आ सकता है। बड़े भैया ने कहा, भैया डोली में म.सा. बिराजमान थे, ओर कोई भी म.सा. होते है ना, उनके ह्रदय में प्रभु बिराजमान होते है, ओर प्रभु जिनके ह्रदय में बिराजित होते है, वे निर्भार होते है! ८ साल के बच्चे ने आगे कहा, ये डोलीवाले तो ५० ओर ५५ के थे, हम ६ ओर ८ के है, फिर भी हम डोली ऊंचक ले ने तो हमें भार न लगे। म.सा. का भार होता ही नहीं। म.सा. निर्भार होते है।

उसी गण में आगे बोलू, भक्त निर्भार होते है। भक्त के पास कोई भार नहीं होता। जो भी है, प्रभु! तु संभाल। अरे जीवन को प्रभु को सोप दो, फिर देखो, क्या उलझन? क्या चिंता? हमने हमारा जीवन प्रभु को सोंप दिया, कभी कोई चिंता का अवकाश ही नहीं है। ever fresh, ever green रहते है। शरीर रुग्ण हुआ, ग्लान हुआ; हुआ; देख लेंगे। द्रष्टाभाव भी है। प्रभु की कृपा से द्रष्टाभाव भी है। हुआ तो हुआ। क्या हुआ? जो होना था वो हुआ। ये सब घटनाए क्रमबद्ध पर्याय से बंधी हुई है, जो भी पर्याय जब खुलनेवाली है, तब खुल जाएगी, तुम क्या करोगे? तुम कोई पर्याय को बंध कर सकते हो?

तीर्थंकर प्रभुने भी क्या कहा था? जब महावीर प्रभु को सौधर्मेन्द्र ने कहा, प्रभु! आपकी मृत्यु की क्षण को दो घड़ी तक बढ़ा दो, इस समय भस्मग्रह नाम का ग्रह आपकी जन्म राशि को संक्रांत कर रहा है। दो घड़ी का आयुष्य बढ़ा दो। प्रभुने कहाँ इन्द्र एसा नहीं होता है, जो क्षण में जो होना है, वो होकर ही रहता है। हमे उसे स्वीकार करना है। आप भक्त हो, प्रभु का यह वचन है, की जो भी पर्याय खुलती है, उन्हे खुलने दो; तुम देखते रहो। अब चिंता क्या होती है बोलो…? एक बरस ये प्रयोग करके देखो, फिर कोई कोई पूछे, तुम इतने ever fresh क्यूँ हो? कैसे हो? कोई चिंता नहीं है तुम्हारे पास? तब तुम कहोंगे की चिंता क्या होती है, मुझे मालूम नहीं है! हो सकता है ना एसा? नहीं हो सकता..? लेकिन प्रभु पर आपकी श्रद्धा कितनी? में कहूँगा की सिर्फ भारत में ही नहीं, पूरे यूनिवर्स में आज प्रार्थना की आवाज गूंज रही है। प्रार्थना की शक्ति का अनुभव पुरा यूनिवर्स आज कर रहाँ है। यूरोप में, अमेरिका में, आफ्रिका में, सब जगह पर ये प्रार्थना की गूंज बह रही है।

अभी अभी एक अच्छी पुस्तक बाहर आई है, opening doors within उसकी लेखिका है ऐइलन केड़ी। तो उस लेखिका ने preface में लिखा है, की ये पुस्तक मैंने नहीं लिखा है, प्रभुने लिखवाया है। ओर फिर वो preface में आगे बढ़ती है, की में एसे गाँव में गई थी, इजरायल के किबुत्सो में, प्रवास के लिए, जहां रात में घर में प्रकाशिक व्यवस्था नहीं, बिजली की कोई व्यवस्था ही नहीं, ओर एक रात वे सोई हुई थी, बस प्रभु का संदेश मस्तिस्क में उतरने लगा। में उस संदेश को लिपि बद्ध करने के लिए इतनी विवश हो गई, वहाँ तो अंधेरा था, घर में तो, प्रकाश कहाँ है मैंने देखा? पब्लिक टॉयलेट में प्रकाश था, मे वहाँ पहुँची कागज ओर पेन लेकर, ओर पब्लिक टॉइलेट के प्रकाश में जाकर, मैंने ये ईश्वरीय संदेश को लिखा है। सिर्फ में लिखनेवाला हूँ। मेरा कुछ भी नहीं है, कोटेन्टस् जो सभी है प्रभु की ही है।

हमारे वहाँ एसे बहोत ग्रंथ है, ह्रदयप्रदीप षडत्रिंशिका, योगसार बहोत अच्छे ग्रंथ है, अंत में लेखक का नाम है ही नहीं। क्यों नहीं है? यही बात है, हमने नहीं लिखा है। हम तो सिर्फ लिखने वाले थे, कलम चलानेवाले थे, प्रभुने सब दिया है, हमारी मालिकीयत कैसे हो सकती है उस पर? तो ये प्रार्थना पूरे विश्व में आज फैल चुकी है, मुझे तो लगता है, शायद भारत से ज्यादा प्रार्थना की शक्ति का अनुभव यूरोपवाले ओर अमेरिकावाले कर रहे है। हम प्रार्थना में शायद इतनी श्रद्धा नहीं रखते, यदि प्रार्थना में आपको श्रद्धा है, चिंता कॉनसी है? प्रभु पर सब छोड़ दो। तुम्हें कुछ करना ही नहीं है, ओर हम क्या कुछ करने वाले भी है? ओर हमारे करने से क्या होगा? कुछ भी नहीं होगा। एक भी घटना को तुम रोक सकते हो? है तुम्हारे पास ताकत? जो भी घटना होनेवाली है, वो होगी ही।

एसा है, ४५ डिग्री गर्मी थी, लेकिन जीसके घर में एरकंडीशनर था, उसने क्या किया, गर्मी को भगा दी। अब वो बूम लगाए की बहोत गर्मी है, बहोत गर्मी, उससे क्या होगा, क्या उसके बोलने से गर्मी कम हो गाएगी? क्या करना चाहिए? एरकंडीशनर को चालू कर देना चाहिए, बूम नहीं लगानी चाहिए, तो घटना हो गई, हो गई, हो गई, अरे! हो गई तो हो गई! एस कंडीशन चला दो! तो प्रभुने जो एरकंडीशनर दिया है, वो है सर्वस्वीकार का! सभी घटनाओ को स्वीकार करो एक भाव से, अच्छी घटना हुई बहोत राजी मत हो, फिर उसी घटना से नाराज होना पड़ेगा। बुरी घटना हुई नाराज मत हो, घटना घटना है, तुम तुम हो, घटना से दूरी कर लो। तो प्रभु का यह एरकंडीशनर आपके पास आ गया, फिर घटनाओ से, चिंताओ से, उलझनों से मुक्ति मिल ही गई। तो फिर प्रभु का दर्शन कैसा होगा? निर्मल दर्शन। कितना सीधा मार्ग है बोलो तो..? कितना सीधा मार्ग? है कुछ टफ इसमें? टफ है कुछ? बहोत ही सरल है। गर्मी है तो है, एरकंडीशनर चालू कर दो, ठंड है तो है हीटर चालू कर दो। आप के पास गर्मी ओर ठंडक कों हराने की ताकत आई, लेकिन घटनाओ को ध्वस्त करनेकी ताकत खलास हो गई। एक ताकत आई, एक ताकत गई। हमारे पूर्वजों के पास यह ताकत थी। घटना घटना है; हम हम है। एक शक्ति मिलती है ना, तो एक शक्ति जा ही जाती है।

मैं एक वैद्य के पास गया था। सर्दी की बीमारी थी, तो में समझता था की वैद्य पास बिलकुल खाए पीए बिना जाना चाहिए। जिससे वो नाड़ी अच्छे रूप से परख सके। में वहाँ गया। वैद्य खुर्शी पे बिराजित थे। में उनके पास टेबल पर बैठ गया। वैद्य ने कहा, महाराज यहाँ नहीं बेठने का, सामनेवाली जो खुर्शी है ना, भिंत के पास, वहाँ बेठने का। में नाड़ी वैद्य नहीं हूँ, में मुख वैद्य हूँ। नाड़ी वैद्य सब होते है, उसमें क्या बड़ी बात है? में मुख वैद्य हूँ। आपके फेस को देखकर, क्या बीमारी है, में बोल दूँगा। उस समय ३० साल की मेरी उम्र, सिर्फ मुझे देख रहा, ओर कहा आपको शरदी की किफायत है लेकिन उसके पीछे थोड़ी दवाई का रिएक्शन है। ८ बरस की उम्र में आपको टाइफॉइड हुआ था। मैंने कहा, हा। टाइफॉइड में आपको गरम गरम मेडिसिन बहोत दी गई है, उसका यह रिएक्शन है। दवाई में आपको कुछ नहीं करना है, ठंडे पानी से मस्तक को बरोबर धोना है। ठंडे ठंडे पानी से। ५-१० मिनट तक धोते रहो; आपकी शरदी गुम हो जाएगी। तो यह शक्ति पहले के वैद्यों के पास थी। आप डॉक्टर के पास जाएंगे तो, अब स्टेफोस्टोप भी काम नहीं रहा उनके पास, यूरिन टेस्ट लाईए, ब्लड टेस्ट लाइए, एम. आर. आई टेस्ट लाईए, सीटिस्केन टेस्ट लाईए, रिपोर्ट लाईए सब, फिर में देखूँगा जीतने जीतने साधन बढ़े, शक्ति कम हो  गई। एसे आपके वहाँ हुआ।

हम राधनपुर थे। एक मास्टरजी जैन प्रशिक्षक हमें पढ़ाते थे, कर्मग्रंथ। वे प्रज्ञाचक्षु थे। आँख से देख नहीं सकते थे। लेकिन वे जीवंत घड़ी थे। लाइव वॉच। जब आते थे, तब हम पूछते थे, पंडितजी कितना समय हुआ? ४.४५ ओर ३० सेकंड। हम कहते, हमारी घड़ी में तो ४.४० है, आप की घड़ी ठीक नहीं है, सुधार लो। ओर किसी के पास मोबाइल में दिखाते थे हम, पंडितजी जो समय कहते थे, उसी समय खरा होता था। तो शक्ति थी। एसी शक्तियाँ बहोत थी पुराने जमाने में, घड़ी आपके पास आ गई तो शक्ति गई। वैसे ही घटना से अप्रभावित होने की शक्ति आपके पास थी, लेकिन अब आपका मन दुर्बल हो गया है। प्रार्थना से दुर्बल मन को सबल बना दो। अब आप समझ रहे है ना, निर्मल दर्शन हो सकता है की नहीं…? क्यूँ नहीं होता था? चिंताओ के झरिए, उलझनों के झरिए। अब उलझन, चिंताए, विचार सबकुछ प्रभु के दरबार में छोड़ दिया, प्रभु को दे दिया, फिर आपके पास रहेगा कुछ? प्रभु को आप दे दोगे, फिर आपके पास कुछ रहेगा, नहीं रहेगा ना? आप चिंता मुक्त हो गए, उलझन मुक्त हो गए। फिर आप प्रभु का दर्शन कर सकेंगे। क्यूंकी आपका मन विचार मुक्त है, स्वस्थ है। पहले तो मन उलझनों में ग्रस्त था, विचारों में ग्रस्त था। अब विचारों से छुटकारा हो गया। अब प्रभु को निहारो।

तो एक बात आपको प्रैक्टिकल रूप में आज से ही करनी है। शाम को दर्शन करने के लिए जायेंगे, कल सुबह दर्शन करने के लिए जायेंगे, फिर पूजा के लिए जायेंगे, शाम चैत्यवंदन की विधि पूरी कर ली, फिर आप बैठते है, बैठकर क्या करना है? १० मिनट, १५ मिनट सिर्फ प्रभु को निहारना है, सिर्फ निहारना, सिर्फ देखो। क्या कुछ झलकता है? क्या कुछ दिखता है? ये जो प्रशमरस है, उसकी glimpse आपको मिलती है? कुछ कुछ होता है की नहीं, देखो तो सही, तो ये आपकी रोज की साधना, जब भी दर्शन करने के लिए गए, दर्शन की विधि पूर्ण कर लो. विधि पूरी करने की- स्तुति बोलो, चैत्यवंदन करो, सुबह वासक्षेप पूजा भी कर लो, लेकिन सब विधि हो गई, फिर १० मिनट बैठना है शांति से, प्रभु को देखना है. एसे एसे भक्त मुझे मिले है, जिन्होंने कहा है, साहेबजी भगवान के पास हम जाते है, चैत्यवंदन को हम भूल जाते है। प्रभु का इतना सुंदर रूप, इतना सुंदर रूप हम पागल हो जाते है! कुछ याद नहीं रहता! रूप की extreme point प्रभु है! कितना रूप प्रभु में है?

महोपाध्याय यशोविजयजी ने कहा, ‘कोटि देव मिलकर न कर सके, एक अंगुष्ठ रूप प्रति छंद, एसो अद्भुत रूप तिहारो, मानु वर्षत अमृत के बूँद’ करोड़ करोड़ देव एकट्ठे हो जाये, ओर अपने रूप को एकत्र कर ले, तो भी प्रभु के चरण के अंगुष्ठ जितना भी वो रूप नहीं हो सकता। तो एसी रूप की extreme point प्रभु है। तो बस प्रभु को हम देखे, परम स्वस्थ रहे, क्या बरोबर लगता है आपको…? आप पागल नहीं हो जाते प्रभु में, मुझे आश्चर्य होता है! मंदिर से आप जल्दी जल्दी भाग सकते है? मैंने जंबुविजय महाराज को देखा था शंखेश्वर में, बड़े भक्त थे, कोई भी आदमी अति आवश्यक काम ले कर आया था मंदिर में, बापजी कब मंदिर से उठे, ओर चिट्ठी दे दूँ। आधा घंटा, पोना घंटा, घंटा बस भक्ति चलती रही, चलती रही। समय का कोई पता ही नही! फिर सब भक्ति पूरी हुई। ओर फिर खमासमण देने लगे। २-५-१०-१५-२० फिर बाहर निकले। उस आदमीने सोचा, अब में चिट्ठी दे दूंगा, बाहर निकलते ही, आगे की चोंकी में गये, प्रभु दिखते थे, वहाँ से खमासमण शुरू कर दिए। अप्पन को लिटर्ली लगे, की प्रभु से आकर्षण से संमोहन से, वे मुक्त नहीं हो सकते! प्रभु को वो छोड़ अनही सकते! एसा संमोहन आपके पास? न तो प्रभु में पागल होते है, न प्रभु का गहरा संमोहन होता है। ये भक्ति कैसी मुझे समझाइए ना, मेरी भक्ति तो यह है। भक्ति – तुम गये, प्रभु रहे; उसका नाम भक्ति। तुम बिदा हो गये, प्रभु रहे; उसका नाम भक्ति। आपको एसा करना है। ठीक है, प्रारंभ एसा नहीं होगा, जैसा की मैंने कहा। लेकिन धीरे धीरे हो जाएगा। हो जाये तो मुझे कहना, में प्रसन्न होऊँगा।

अपनी बात ये थी, आप १० मिनट बैठो, क्या दिखता है देखो। कुछ झलक रहा है? पार्श्वनाथ भगवान को देखा, अभी तो पूर्ण वीतरागदशा है, पूर्ण क्षमाभाव, पूर्ण प्रशांत वाहिता है, लेकिन जब भी छद्मस्थकाल में, साधना काल में, तब भी उनकी आत्मदशा कितनी ऊंची थी! कमठ उपसर्ग करता था, धरणेन्द्र भक्ति करते थे, प्रभु के लिए कोई फर्क नहीं था दोनों में…!

हेमचंद्राचार्यने हमें जो प्रार्थना का स्टॉक दिया है ना, उसमें एक बात मनोवैज्ञानिक ढंग से लिखी हुई है। लेकिन आपसे छूट गई हे. “कमठे धरणेन्द्रे च, स्वोचितं कर्म कुर्वति; प्रभुस्तुल्य मनोवृत्ति:, पार्श्वनाथ श्रिये स्तु व:।।” आप इतना ही पकड़ते है की प्रभु समचित्त रहे। लेकिन हेमचंद्राचार्य ने एक मास्टर की दी है, के हम हमारे मन को, एसा संतुलित कैसे रख सके। रखना है ना? कोई गुस्सा करता ही रहे, करता ही रहे, करता ही रहे; आप हसते रहे, एसा करना है बोलो….? करना है? क्यूँ action से react क्यूँ हो जाते हो? Action के सामने non-action रखो। तो वहाँ लिखा, “प्रभुस्तुल्य मनोवृत्ति:” लेकिन तुल्य मनोवृत्ति: कैसे थी? “स्वोचितं कर्म कुर्वति” प्रभु की द्रष्टि में क्या है? ये भक्त है तो भक्ति करता है। ये आदमी अनजान है, उसको कोई खयाल नहीं है। तो ये काम कर रहा है। इसमें मेरे सोचने की बात कहाँ आई? “स्वोचितं कर्म कुर्वति” दोनों, अप्पन को जो उचित लगता है वो कर रहे है। धरणेन्द्र भक्त है तो भक्ति करेगा, दूसरा अभक्त है तो अभक्ति करेगा। उसमें मेरे सोचना का कहा आता है, सामनेवाला जो भी है, कह रहा है, उसमें से भी कुछ सार हो तो लेलों। सार ले लो; असार को फेंक दो। तो सर्वस्वीकार यदि आपके पास आ जाएगा, आप कितने प्रसन्न होंगे बात तो सोचो। निर्मल दर्शन की बात तो है ही। आप प्रसन्न कितने हो जायेंगे?

अभी क्या है आपको मालूम है? कोई भी सार्वजनिक स्थल होता है ना, ओर जो स्विच बॉक्स होता है, उसके ऊपर ताला लगा हुआ होता है, वो जरूरी है, वॉचमेन के पास चाबी होती है, सार्वजनिक स्थल है। एक संस्था ने लिया दो दिन के लिए, अब कितने सदस्य आये हुए है, कितने खुर्शीओ में बैठे हुए है, इतने ही पंखे वॉचमेन चलाएगा, दिन है, प्रकाश है, तो बत्तियाँ नहीं जलाएंगा। लेकिन ये ताला नहीं होगा तो क्या होगा? समारोह है, कोई बच्चा भी आ जाएगा, ओर बच्चे फिर स्विच बॉक्स के साथ छेड़छाड़ करेंगे। पंखे की स्विच को ऑन कर दिया, लाइट को ऑन कर दिया; बिल किसको भरना पड़ेगा? संस्था को। आप के स्विच बॉक्स की हालत क्या है, वो बोलो? क्या हालत है? कोई भी आप की स्विच को ऑन कर सकता है! बोलो, अरे तुम स्तवन बहोत अच्छा बोले, स्विच ऑन हो गई! अहंकार की! दूसरे आदमी ने कहा, क्या कुछ शरदी बरदी हो गई है? गला ठीक नहीं है? क्या बोलते थे तुम समझ में नहीं आता था! लाइट ऑफ! प्रकाश तुम्हारे घर में, स्विचिस तुम्हारी; नियंत्रण दूसरे का. ये चल सकता है कभी? तुम्हारे स्विच बॉक्स पर ताला लगा ले आज? चाबी में आपको ही दे दूँगा। ताला में लगा दूँगा, चाबी आपको दे दूँगा, जब भी खोलना है खोलो। ये सर्वस्वीकार का ताला है। किसने कहाँ बहोत अच्छा बोले थे आप, अरे स्तवन बोला था, क्या बोला था मैंने, में मेरे प्रभु को रिझाने को गया था।

मीरा ने कहाँ में रिझाऊ मेरे राम को, अरे में राम को रिझाने के लिए गई थी, दुनिया को रिझाने के लिए नहीं गई थी। दुनिया क्या कहती है, क्या फिक्र है! मेरे राम रिझते है की नहीं? यही बात हमारे उपाध्याय यशोविजयजी ने लिखी, ‘रिझववो एक साईं’ एक ही मेरा लाइफ मिशन है, प्रभु को रिझाना है। ओर स्तवन बोला था किनके लिए, प्रभु के लिए के लोगों के लिए? कोई कहता है, अच्छा बोला था, अरे! अच्छा बोला; अच्छा। नहीं बोला अच्छा; तो नहीं बोला। फर्क क्या पड़ता है? 

एक दफे में गाँव में गया था, में नया ही था, ओर चैत्यपरिपार्टी निकलने वाली थी। साहेबजी चैत्यपरिपार्टी है, आप पधारो, मैंने कहा चलो, में गया, करीबन ५०० लोग थे भक्त। चैत्यपरिपार्टी निकली। मंदिर में गये हम, चैत्यवंदन प्रारंभ हुआ। में उस गांव से अपरिचित था, मेरे पास एक आदमी बैठा था गाँववाला, उसने कहा म.सा. ये हमारे गाँव के भाई है ना, उनका कंठ बहुत अच्छा है। तो आप स्तवन का आदेश उनको देना। मैंने कहा ठीक है। मैंने उस भाई को आदेश दिया। इतना सुंदर कंठ! ओर इतनी प्राचीन स्तवना! मेरा ह्रदय हिल गया, वाह! बहुत सुंदर। दूसरे दिन मुझे वहाँ ही रहने का था, में सुबह मंदिर गया, वो आदमी वहाँ बैठा था, कलवाला, स्तवनवाला, मैंने सोचा आज तो मझा आ जाएगा, इसने चैत्यवंदन शुरू कर दिया है। इसका स्तवन सुन लूँ, फिर बाद में मेरा चैत्यवंदन शुरू करूंगा। में कोई भी तीर्थ स्थल में जाता हूँ तो एसा ही करता हूँ। शंखेश्वर में गया, बैठ जाऊंगा परमात्मा के पास, किसी की चैत्यवंदना चल रही है, स्तवन चल रहा है, में उस पे जॉइन्ट हो जाएगा। फिर वे शांत हो जाएंगे, मेरी चैत्यवंदना हो जाएगी। तो में शांत रूप से बैठा, की अब चलो स्तवना बोलेगा, मझा आ जाएगा। लेकिन उसने तो नमोर्हतसिद्धाचार्यउपाध्याय सर्व:साधुभ्य:, उवसग्गहरं पासं पास वंदामि, जय वियराय, अरिहंत चेईआणं, पुरा, बाहर निकल गया, में तो ठाठ से चैत्यवंदन कर के निकला।  फिर व्याख्यान के समय मुझे मिला, तो मैंने कहा उस भाई से, क्या भैया क्या बात हो गई आज, क्या जल्दी बात थी कुछ? मैंने सोचा था तुम्हारा स्तवन आज भी सुन लूँ। कल तो मुझे विहार करना है। आज सुन लूँ, तुम तो स्तवन बोले ही नहीं! महाराज साहेब आज कौन सुननेवाला था? कल तो ५०० आदमी थे! तो तुम उनको सुनाने के लिए बोला था! प्रभु को सुनाने के लिए नहीं? तुम्हारी स्तवना सिर्फ परमात्मा के लिए होती है। भक्तों का पुरा जीवन प्रार्थना होता है।

कबीरजी रामेश्वरम् गए हुए थे। रामेश्वरम् का मंदिर बहोत बडा है। परिक्रमा करनी बहोत लंबी है। कबीरजी मंदिर के बाहर ही थे, किसीने पूछा कबीरजी से, बापजी! आप यहाँ कितने दिन से ठहरे है? आप बड़े संत है, प्रभु के भक्त है, लेकिन इस मंदिर की परिक्रमा करते आपको कभी देखा नहीं। तो कबीरजी ने क्या कहाँ मालूम है, कबीरजी ने कहाँ ‘जहाँ जहाँ डॉलु सो परक्कमा।‘ में चलता हूँ ने वो तो परिक्रमा है ना, क्या है? हिन्दू परिभाषा में परिक्रमा शब्द आता है, हमारे वहाँ प्रदक्षिणा शब्द आता है। प्रदक्षिणा का मतलब क्या है? प्रभु को केंद्र में रखकर चलना। प्रदक्षिणा क्या है समझ लो, प्रभु को केंद्र में रखकर चलना; ये प्रदक्षिणा! अब संत कबीर थे, २४ घंटे प्रभु की भक्ति में लीन थे, तो उन्होंने कहाँ ‘जहाँ जहाँ डॉलु सो परक्कमा।‘ मे चलता हूँ की नहीं, तो मेरा चलना प्रभु की इर्द-गिर्द तो होता ही है। में कहाँ तुम्हारी धरती पे चलता हूँ? में तो प्रभु के इर्द-गिर्द ही चलता हूँ। फिर पूछा, आप कभी नैवेध्य भी नहीं चढ़ाते हो प्रभु को? तो कहाँ, जहाँ जहाँ खाऊँ सो निवेध्य। में खाता हूँ ना, फिर मुझ में ओर प्रभु में क्या फर्क है? सत्ता रूप से हम सरखे है। में खाता हूँ, ना तो निवेद्य हो गया पुरा। ये भक्तों की २४ घंटों की भक्ति होती है। हमारी भक्ति आधे घंटे की हो, लेकिन वो भी सच्ची तो हो!

मंदिर में गये, कोई व्यक्ति परिचित आ गई, क्या आपका ध्यान वहाँ जाएगा? प्रभु को छोड़कर उस आधे घंटे में आप किसी को भी देख पाएंगे? ओर आपने किसी को देख लिया तो समझना की आपकी भक्ति वास्तविक भक्ति नहीं। २४ घंटे में आधा घंटा प्रभु को निहारने का मौका मिला, एसे परमात्मा! इतना अद्भुत रूप उनका! ओर आपकी नजर दूसरी ओर जाये! क्या हो सकता है? प्रभु पर ही हमारी द्रष्टि टिकी रही होती है! लेकिन कभी कभी है ना परीक्षा हो जाती है। कभी पीछेवाले किसी ने परीक्षा कर ली थी अभी, बहनों को मालूम नहीं हुआ, लेकिन आवाझ आई, आप सबकी नजर वहाँ गई, की क्या हुआ? अरे भाई कहाँ आये हो? एसी घटनाए तो होगी ही। उन घटनाओ से आपको क्या लेना-देना? मंदिर में गए, प्रभु ही है; दूसरी कोई घटना नहीं है। प्रवचन सभा में आये, सद्गुरु ही है; दूसरे कोई नहीं।

आपकी एक परीक्षा लूँ? आपके आगे कोई, आपके पीछे कोई है, आपके बगल में कोई है, प्रवचन सभा समाप्त हुई, अभी तो आपका मौन है, लेकिन आप लिखकर तो सब कुछ देते हो, किसीने पूछा, आज प्रवचन सभा में आपने किन किन को देखा था? क्या आपका उत्तर एसा होगा? की गुरुदेव के अलावा किसी को भी मैंने नहीं देखा। बोलो…? कैसे दर्शन होंगे प्रभु के? निर्मल दर्शन करना है। शॉर्टकट बतला दिया आपको, की चिंताए आपको गहरे रहेती है, चिंताओ की वजह, उलझनों की वजह; आप प्रभु को नहीं देख पा नहीं सकते है। लेकिन बात इससे भी जटिल है थोड़ी। जटिल है। अभी आप कोई चिंता में नहीं थे। व्याख्यान में आप बैठे थे, कोई उलझने थी कोई? मन बिलकुल स्वस्थ था। कोई घटना घटी, लेकिन मुझे तो मालूम ही नहीं, की क्या हुआ था? जो हुआ सो हुआ था। कोई खुर्शी हिल गई होंगी या कोई गिर गया होगा, कुछ भी हुआ होगा, लेकिन इतनी छोटी सी घटना आपको हिला देती है, की क्या हुआ? यदि आपका मन ही स्थिर नहीं है, तो प्रतिबिंब प्रभु का कहाँ पर गिरेगा?

तालाब किनारे पे आप गये, हवा चल रही है, तालाब का पानी हिलोरा ले रहा है, ओर आप का चहेरा देखो आप, दिखेगा कुछ? हवा शांत हो जाएगी। जल शांत हो जाएगा, फिर आपके चहेरे को देखो आप।  तो तालाब की सरफेस भी स्थिर होती है, तब आपका प्रतिबिंब आप देख सकते हो। यदि मनका ये तालाब, उसकी सरफेस स्थिर नहीं है, तो प्रभु का प्रतिबिंब कैसे पड़ेगा? हमें तो जीरावला दादा को लेकर जाना है, तुम मुंबई जाओगे, हम विहारयात्रा में जायेंगे, दादा को कह देंगे की दादा! आपके पास इतने समय रहे, अब आपसे इतना प्रेम हो गया है, आपके बिना नहीं चलेगा, चलो हमारे साथ, दादा हमारे साथ आएंगे। आप के साथ भी आ सकते है, लेकिन आपका मन ही स्थिर नहीं है। किस समय में जाना है, कौन सी ट्रेन है? कल से चक्कर शुरू हो जाएगा, मोबाइल कब मिलेगा? शायद प्रभु की इंतजार इतनी गहरी नहीं होगी। तो ये आपकी भूमिका को स्वस्थ बनाना है। २३ घंटे आप जो करते है, वो करते रहे, लेकिन एक घंटा तो मन को स्वस्थ रखो। मंदिर में गए, निसिहि कहकर जाना, सब चिंताए, उलझन प्रभु के द्वार पे छोड़कर भीतर जाना, ओर मन को बिलकुल स्वस्थ कर देना, कोई भी घटना घटे, मेरा ध्यान कही इधर-उधर नहीं जाना चाहिए। सिर्फ प्रभु को निहारो। प्रभु को निहारो। दर्शन करते समय १० मिनट, पूजा के बाद २० मिनट प्रभु को देखो। ये तुम्हारी साधना खरी होंगी; तब निर्मल दर्शन होगा।  ओर निर्मल दर्शन होगा उसके बाद आपको स्वानुभूति मिलेगी। तो ये निर्मल दर्शन का होमवर्क आज आपको देता हूँ। उस होमवर्क को बरोबर घूँटना है, जितना होमवर्क अच्छा होगा, उतना ही निर्मल दर्शन मिलेगा।

प्रभु तैयार है, he is ever ready, but you are not ready. अब तुम्हें ready होना है। तो तैयार होने के लिए इतना ही करना है। जब मंदिर में जाये, कोई विचार नहीं, निर्विचार मन है। अब निर्विचार मन में ही प्रभु का प्रतिबिंब पड़ेगा! फिर तुम घर पर जाओगे, प्रभु की आज्ञा का पालन घर पर भी चालू होगा, अरे मेरे प्रभुने ये मना किया है। मेरे प्रभुने कहाँ है, ये तुम्हें नहीं करना है। तो प्रभु का प्रतिबिंब आपकी भीतर होगा। २४ घंटे प्रभु आपके पास होंगे। तो निर्मल दर्शन को दोहरावों, फिर मेरे पास personal भी आ सकते हो आप। शिबीर तो कब होगा आपका, मुझे भी मालूम नहीं है। ये सब आयोजक आयोजन करते है। में तो कुछ नहीं करता हूँ। मैंने उनसे पहले से कह दिया था, में तो सिर्फ प्रवचन दूँगा। मेनेजमेंट वाला में आदमी नहीं हूँ। गुरु का काम यही है, प्यास जगाना स्वानुभूति की; ओर स्वानुभूति करा देना। मेरे दो ही काम है, में मेनेजमेंट वाला आदमी हूँ ही नहीं। तो मैंने कह दिया था सुधीरभाई को, हमारे दीक्षितभाई को, उमेषभाई को… की में कुछ भी करनेवाला नहीं हूँ। तुम सबको ही करना है। में आकर प्रवचन दे दूँगा। तो कौनसी शिबीर में आपका नंबर लगेगा, मुझे मालूम नहीं है। लेकिन में मेरी ओर से आप को ऑफर करता हूँ, आपकी निर्मल दर्शन की प्रक्रिया बिलकुल परिपक्व हो जाये, आप personally भी मुझे बिनती कर सकते हो, म.सा. मुझे आना है, मे समय दूँगा ओर आपको स्वानुभूति करा दूँगा।

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