चातुर्मासिक नगर प्रवेश
पुण्य नगरी पुणे में आज चातुर्मासिक नगर प्रवेश… पुणे पुण्य नगरी है। अहोभाव नगरी है।
एक व्यक्ति ने अभी मुझे पूछा था कि, “दो घंटे, ढाई घंटे आप बैठे हैं इस समारोह में, आपने किया क्या?” तब मैंने कहा कि आप सबकी आंखों में प्रभु शासन के प्रति जो अहोभाव है, उस अहोभाव को मैं निहार रहा था। रहीम बहोत ही प्यारा कवि हुआ। रहीम ने लिखा है:
“प्रीतम छबि नैनन बसी, और छबि कहाँ समाय?”
जब आंखों में, हृदय में प्रभु बस जाते हैं, प्रभु का शासन बस जाता है, तब आनंद ही आनंद होता है। ये जो अहोभाव है आपका, उस अहोभाव को स्थाई रूप देने के लिए हमारी परंपरा ने चार शब्द दिए हैं — रूप परमात्मा, शब्द परमात्मा, वेष परमात्मा और अनुष्ठान परमात्मा। मंदिर में हम जाते हैं, रूप परमात्मा के सानिध्य में हम होते हैं।
कैसे हैं हमारे परमात्मा? कोटि देव मिलकर न कर सके एक अंगुष्ठ रूप प्रतिछन्द ऐसो अद्भुत रूप तिहारो! करोड़ों देव अपने रूप को इकट्ठा कर दें, फिर भी वो रूप प्रभु के चरण के अंगुष्ठ जितना नहीं होता।
आज का प्रवचन तो आपका रहा, लेकिन बहुत शानदार रहा। सुबह 6 बजे से आप तैयार हो गए थे स्वागत के लिए, फिर वहां आ गए हैं, 12 बज गए। आपका प्रवचन आज का बहुत ही शानदार है! और कल से हमारा प्रवचन शुरू होगा। आज आपके लिए। बस, आपका आनंद हमने देखा। मैं तो बार-बार मेरे पत्रों में लिखता हूँ कि चातुर्मास के लिए पुणे पहली बार आए हैं, लेकिन क्या पुणेवासियों का अद्भुत भाव है आपका! बस मुझे दूसरा कुछ चाहिए भी नहीं।
मैं बार-बार कहता हूँ, प्रभु की साधना का कंपोज़िशन (Composition) क्या है? 99% ग्रेस (Grace), 1% एफर्ट (Effort)। 99% कृपा प्रभु की, सद्गुरु की; 1% आपका प्रयत्न! और यह है अहोभाव, यह है समर्पण, ये भक्ति। आप पहले दिन सब पास हो गए।
1% एफर्ट (Effort) आपका, प्रभु तैयार हैं, 99% प्रभुके, और 100% रिजल्ट (Result) आपका। कल से प्रवचन शुरू होंगे। बस प्रभु को सुनना है। मैं बार-बार कहता हूँ, I have not to speak a single word, He has to speak. वोही बोलेगा।
“मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्” और जब प्रभु बोलते हैं, तब आनंद ही आनंद होता है। आज पहला दिन बहुत आनंद आ गया है। आपकी भक्ति को, आपकी श्रद्धा को एन्जॉय (Enjoy) किया, और पूरे चातुर्मास में यही एन्जॉयमेंट (Enjoyment) करना है।
