Maun Dhyan Sadhana Shibir 10 – Vachana – 11

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વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત

Subject: मंत्रदीक्षा

आंतरयात्रा में जाने के लिए तीन यात्राएं हमारी परंपरा में बताई गई है, जिनको हम दीक्षा कहते हैं: मंत्रदीक्षा, साधनादीक्षा और जीवनव्यापीनीदीक्षा।

मंत्रदीक्षा में जब सद्गुरु आपको मंत्र देते है, तब एक अनहोनी घटना घटित होती है। मंत्र-शास्त्रोंमें लिखा गया है कि सद्गुरु जब आपको मंत्र देते है तब कान से मंत्र के शब्द ऊपर सहस्रार चक्र तक जाते हैं और उसको खोल देते हैं।

साधनादीक्षादाता गुरु आपकी जन्मांतरीय धारा को जानकर, इस जन्ममें भी आपको उस ही धारामें प्रवाहित करने के लिए साधना का appropriate composition आपको देते हैं। और जब हम प्रभु की कृपा से अनुगृहित होते है, तब सद्गुरु हमें जीवनव्यापीनीदीक्षा के रूप में प्रभु की प्रसादीरूप रजोहरण प्रदान करते हैं।

મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ પાલીતાણા વાચના – ૧

हमारी परंपरा में तीन दीक्षाए है। आंतरयात्रा में जाने के लिये, तीन यात्राए हमारी परंपरामे दिखाई दिये है, जिनको हम दीक्षा कहते है: मंत्र दीक्षा, साधना दीक्षा, जीवनव्यापीनी दीक्षा। सद्गुरु जब आपको मंत्र देते है तब, एक अन्होनी घटना घटित होती है। मंत्र शास्त्रोमें लिखा है, की सद्गुरु जब आपको मंत्र देते है तब, कान से मंत्र के शब्द ऊपर जाते है सहस्रार तक। आपकी बॉडी को तो आप समझते है ना? आंतरयात्रा में तो आप आत्मतत्व को भी समझने लगे। आपके शरीर को तो आप समझते हो ना? आपके शरीर के दो महत्वपूर्ण अंग है, एक तो है spinal cord, जिसे हम योगिक भाषा में मेरूदंड कहते है। मेरू कभी झुकता नहीं है। आपका मेरू? इसीलिए ध्यानाभ्यास में मुझे बार-बार कहना पड़ता है स्थिरासन, स्थिर रहो। एसे ही बैठना, मेरूपर्वत कभी झुकता नहीं। यह मेरूदंड कभी झुकता नहीं। क्यू? ये सात चक्र की जो बात आती है ना, मूलाधार से सहस्रार तक जाने का है; वो जो यात्रा है, पीछे से होती है। मेरूदंड यदि स्थिर नहीं है तो, उस यात्रा में रुकावट आती है। आप के शरीर का एक तो महत्वपूर्ण अंग तो यह spinal cord, दूसरा है सहस्रार। ठीक हमारे चोटी के भाग के नीचे, सहस्रार। हजार पंखुड़ीवाला कमल; जो जन्मों-जन्मों से बंध है, मुरझा हुआ है, एसे ही पड़ा हुआ है। जब सद्गुरु से लिया हुआ मंत्र ऊपर जायेगा, सहस्रार खुल जाएगा। 

सहस्रार तीन रूप से खुलता है, एक तो यह मंत्र दीक्षा से, दूसरा जब कुंडली नी शक्ति मूलाधार से उठती है, ओर आज्ञाचक्र को पार करके भी जब सहस्रार को जाती है, तब सहस्रार खुल जाता है। ओर तीसरी बात है, सद्गुरु का शक्तिपात। सद्गुरु वासक्षेप देते है आपको, बिलकुल ब्रह्मरंद्र पर, ये जो चोटी का भाग है ना, portion, उसे हम ब्रह्मरंद्र कहते है। ब्रह्म यानि के परमात्मा, रंद्र अर्थात् द्वार। परमात्मा का अपना निजी द्वार; वो है ब्रह्मरंद्र। 

एक हिन्दू फिलोसॉफरने कहा था की प्रभुने मनुष्य को तो बना दिया, हिन्दू परंपरा एसा मानते है, तो प्रभुने मनुष्य को तो बना दिया, फिर प्रभुने सोचा, की मेरा बनाया हुआ ये मनुष्य, मेरे लिये, मेरे प्रवेश के लिये कोई द्वार रखेगा की नहीं रखेगा? तो प्रभुने स्पेशियल door अपने लिये रख दिया, वो है ब्रह्मरंद्र। तो सद्गुरु आशीर्वाद देंगे। वासक्षेप जो गिरेगा, ठीक ब्रह्मरंद्र पर। यहाँ वासक्षेप नहीं लेने का, यहाँ भी नहीं, ठीक ब्रह्मरंद्र पर। जिसे की ब्रह्मरंद्र खुल जाये, ओर सहस्रार भी खुल जाये। 

आपने देखा होगा? दीक्षा की प्रक्रिया में क्या होता है, पहले करेमि भंते सूत्र, बाद में बोलो? लुंचन काब आता है? पहले आता है। पहले लुंचन- लोच, बाद में करेमि भंते रूप शब्द शक्तिपात। गुरु लुंचन करेंगे अपने हाथों से, तो शिष्य के केश ही नहीं, शिष्य के क्लेश, शिष्य के राग-द्वेष, खत्म हो जायेंगे। ओर ये जो ब्रह्मरंद्र सज्ज हुआ, फिर गुरु शक्तिपात करेंगे करेमि भंते सूत्र का। करेमि भंते सामाईअं, सव्वं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि, तो ये जो करेमि भंते सूत्र है, सिर्फ कान से नहीं लिया जाता, लेकिन अस्तित्व के स्तर पर लिया जाता है; क्योंकि शक्तिपात है। ओर में तो बार-बार कहता हूँ, की यदि गुरु का यह शक्तिपात आपने झेल लिया तो, करेमि भंते सूत्र के पच्चक्खाण के बाद आप विभाव नहीं जाते, एसा नहीं; आप विभाव में जा नहीं सकते। कैसे जाओगे? गुरु शक्तिपात है, गुरु का कवच है, आप कैसे जाओगे बाहर? आप बाहर जा ही नहीं सकते। तो आप के शरीर के ये दो महत्वपूर्ण portions है, spinal cord को ठीक ठीक सीधा ही रखना। एसा ही बैठना स्थिर, एसे नहीं। 

तो मंत्र दीक्षा, साधना दीक्षा ओर जीवन व्यापीनी दीक्षा। 

तो मंत्र दीक्षा में क्या हुआ? शब्द पहुंचे सहस्रार में, सहस्रार खुल गया। आज्ञाचक्र खुल जाना सरल बात कही गई है, लेकिन आज्ञाचक्र के सहस्रार तक का फासला बहुत ही कठिन है। लेकिन गुरु की कृपा से सहस्रार भी खुल जाता है। तो ये मंत्र दीक्षा है। ओर फिर शक्तिपात दीक्षा भी हो जायेगी। तो दोनों दीक्षाए आज आपको मिलनेवाली है। पहले मंत्र दीक्षा, बाद में शक्तिपात। 

दूसरी दीक्षा है साधना दीक्षा। आप जो साधना करते है ना, आपकी इच्छा से नहीं कर सकते, आपकी जन्मांतरिय धारा क्या है? आप कहाँ पहुंचेंगे इस जन्म में, आपको क्या पता है? आप कैसे अपनी साधना की धारा को choose कर सकते हो?! नहीं कर सकते। सद्गुरु face reading के master होते है। सिर्फ आपका चहेरा देख लिया, सद्गुरु निश्चित कर सकते है, की आपका अभीका, साधना का stand point क्या है। ओर फिर वो भी गुरु निश्चित कर सकते है, इस जन्म में उठाकर, आपको कहाँ तक रखा जा सकता है। तो पूरी साधना गुरु के हाथ में है। तो साधना दीक्षा का मतलब यह होता है, की एक अपने गुरु है जो साधना गुरु है। तो सब दीक्षा के गुरु अलग हो सकते है। आपने उपधान तप किया है, ओर नमस्कार महामंत्र किसी गुरुदेवने दिया है, तो वे गुरुदेव आपके मंत्र दीक्षा दाता गुरुदेव हुये। अब आपकी श्रद्धा जहाँ भी ढलती हो, एसे गीतार्थ गुरु के पास जाकर साधना दीक्षा ले, साधना दीक्षा का मतलब ये है, की आपको चार घंटे रोज मिलते है या दो घंटे मिलते है। आप गुरुदेव से कह सकते है, की गुरुदेव सिर्फ दो घंटे रोज में निकाल सकता हूँ, या चार घंटा में निकाल सकता हूँ। मुझे क्या करना चाहिये? बिलकुल कोरी स्लेट होकर ही यहाँ आओ, कोई भी विचार लेकर नहीं आओ, मुझे एसा करना है, मुझे एसा करना है, कुछ भी नहीं, सद्गुरु ही साधना देंगे आपको, आपको कोन सी धारा में भेजना है, वो सद्गुरु ही निश्चित कर सकते है। 

एक साधना दीक्षा दाता गुरु होने चाहिये, फिर एकबार दीक्षा ले ली, साधना दीक्षा, फिर हर छ महीने पर उन गुरु के पास आप जा सके बहुत ही अच्छा, न जा सके तो भी आप पुछ सकते हे, गुरुदेव! आपकी दी हुई साधना से इतना हुआ है, राग या द्वेष इतना कम हुआ है, लेकिन अहंकार कम नहीं होता है, गुरुदेव मुझे क्या करना चाहिये? तो गुरुदेव बताएंगे की तुझे क्या करना है… 

सब के फॅमिली डॉकटर है ना, तो फेमिली डॉक्टर को आपके शरीर का पता है, एसे सद्गुरु मिल गए आपको, जिसको आपके पूरे के पूरे अस्तित्व को पहचान लिया। ओर फिर कहेंगे की, ये साधना तुम्हारे लिये अच्छी है, ओर इसी साधना में तुम्हें जाना है। तो साधना अपनी इच्छा से कभी भी नहीं करने की। आप दवाई अपनी इच्छा से नहीं लेते है, मेडिकल स्टोर आपका भी होता है खुद का, लेकिन दवाई अपनी इच्छा से आप नहीं ले सकते है, डॉक्टर जो प्रिस्क्राइब करता है, वो ही आप ले सकते है। यही बात साधना में है। बोलो तो, विनय की साधना अच्छी नहीं है? तो वैयावच्च की साधना अच्छी नहीं है? तो प्रभु भक्ति की साधना? वो तो बहुत अच्छी है। तो क्या आप निश्चित कर लोगे की ये साधना मुझे करनी है। नहीं, सद्गुरु निश्चित करेंगे। 

आपकी एक जन्मांतरिय धारा भी हो सकती है। में बहोत बार कहता हूँ,मेरे पास एक साधक आया, हो सकता है पुराने चार जन्मों से, सद्गुरुओने इसे वैयावच्च की धारा में छोड़ दिया था, वैयावच्च की धारा ही उसको दी हुई है, अब पाँचवे जनम में मेरे पास आया वो, में उसकी जन्मांतरिय धारा का आकलन न कर सका, अनुमान न कर सकु ओर में स्वाध्याय की धारा दे दूँ, तो गुरु के रूप में मे फेल आदमी हूँ। मुझे किसी भी रूप में, any how उसकी जन्मांतरिय धारा को जानना होगा। ओर जन्मांतरिय धारा को जानकर, उसी धारा में उसे मुझे प्रवाहित करना है। तो ये सब काम साधना दीक्षा दाता गुरु करते है। 

कैसी सुंदर हमारी परंपरा है देखो तो! हमारे वहाँ तो इतना सुंदर फिक्शिंग है, आपको भी मालूम नहीं होगा, एक मेरे मुनि को, मेरे शिष्य को, मेने भक्ति की धारा दे दी। अब भक्ति की धारा देने के बाद, में उसे कह दूँगा की मेरी चार वाचनाए चल रही है, लेकिन ललित विस्तरा की वाचना में ही तुझे आने का, दूसरी वाचनाओ को छोड़ देने का। ग्रंथ भी ललित विस्तरा, पंचसूत्र ये- ये पढ़ने का है, दूसरे ग्रंथ हाथ में भी नहीं लेने के। क्यू? क्योंकि मैंने भक्ति की धारा दी है। तो भक्ति की धारा में ही आगे जाना चाहिये। में चार वाचनाए देता हूँ, एक साधना ग्रंथ पर होती है, एक आचार ग्रंथ पर होती है। लेकिन उसके लिये तो भक्ति की धारा ही चाहिये। तो में कहूँगा, मेरी एक ही वाचना में आने का है, ओर इतने ही ग्रंथ तुझे पढ़ने है। एसे सुंदर व्यवस्था हमारे पास है। पुरा एक वर्क शॉप चलता था। आप आये, फिर छ महिने आये, आप में बदलाहट होनी ही चाहिये। तो यदि आप में बदलाहट नहीं है, ओर आपने साधना पुरी-पुरी की है, तो सद्गुरु भी विचार में पड़ेंगे की कुछ बदलना होगा। छ महिने तक यदि मन लगाकर आपने साधना की है, फिर भी परिवर्तन नहीं आया है, तो सद्गुरु विचार करके आपको धारा का परिवर्तन कराएगा, या कुछ भी कराएगा। लेकिन सद्गुरु की एक इच्छा होती है, आपको परिणाम दे ही दे। हम तैयार, परिणाम देने के लिये, आप अपनी साधना से कैसे संतुष्ट है? मुझे तो आश्चर्य होता है? 

प्रभु की दी हुई साधना ये सब अमृत अनुष्ठान है। ये सामायिक, ये प्रभुभक्ति, ये प्रतिक्रमण सब अमृत अनुष्ठान है। उसको कम कभी भी नहीं मानना। तो ये सब अमृत अनुष्ठान वर्षों से आप कर-कर रहे हो, आप में कुछ भी परिवर्तन नहीं आया है। फिर भी आप मानते हो की हा, में तो दस साल से कर रहा हूँ। अरे कर तो रहे हो, परिणाम क्या मिला? 

एक पेशंट डॉक्टर के पास जाएगा, अशक्ति है, थोड़ा चलने में सांस चढ़ जाती है, डॉक्टर दवाई देंगा। विटामिंस की, मिनरल्स की, ये सब टेबलेट निगल लेनी है, सब टेबलेट निगल लेंगे तुम्हारा रोग खतम हो जाएगा। 60-70-75 टेबलेट निगली, कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। वो पेशंट कहा जाएगा? डॉक्टर के पास, साहेब 75 टेबलेट तो निगल गई कुछ भी फर्क नहीं पड़ा! आप हमारे पास कभी आये? साहेबजी साल में 360 सामायिक होते है, दस साल से में कर रहा हूँ, 3600 सामायिक हो गए, लेकिन समभाव मेरे पास नहीं है। तो क्या गलती है आप मुझे बताओ? सामायिक अमृत अनुष्ठान है समझ लेना, वहां कोई भी गलती नहीं है; गलती आप में है। आपको ये मालूम भी नहीं, तो ये सामायिक करना है तो क्या करना है? सिर्फ कटासने पर बैठ जाना, चरवले मुहपत्ति को हाथ में रख लेना, ये सामायिक है आप एसा समझते हो? पहले घड़ी थी ना, तो लोग उसको टटोलते थे, कितना बाकी रहा? कितना बाकी रहा? कितना बाकी रहा? जल्दी पुरा हुआ तो सामायिक पुरा हो गया! सामायिक में मुझे समभाव प्राप्त करना है। 

सामायिक का अमृत अनुष्ठान समभाव को प्राप्त करने के लिए है! तो अब आप ये सोचोगे, की क्यू समभाव नहीं मिला? कर स्थितिम् स्पर्शात्। आप के मन में जब तक विचार है, तो विचार विकल्पों की ओर, विभावों की ओर जायेंगे। आपका विचार संज्ञावासित मन है आप का, तो आपका विचार कहाँ जाएगा? विभावों के प्रति। राग के प्रति, द्वेष के प्रति, अहंकार के प्रति। शुभ विचार तो बहुत ही कम आते है, अशुभ विचार से ही हम घेरे हुये आदमी है। तो आपके मन में विभाव है, तो समभाव कैसे आयेगा, बोलो तो…? एक साथ दोनों साथ-साथ रह सकते है? राग-द्वेष, अहंकार भी रहे, ओर समभाव भी रहे, एसा हो सकता है कभी? तो राग-द्वेष अहंकार को निकालना है मन में से, चलो उस विभाव को नहीं निकाल सकते हो? विचारों का द्वार बंध कर दो। विभाव का अंगार, विकल्पों से ही उत्तेजित होता है। विकल्पों का द्वार बंध कर दो। विचारों का द्वार बंध कर दो। सामयिक में  बैठ जाओ, कैसे बैठ जाओ? जाप करे तो भी एक भी विचार नहीं। एक माला गिन लो। नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं; एक भी विचार नहीं! ओर आप एसा करो, एक माला ही गिननी है आपको, एक भी विचार बीच में आ गया, माला छोड़ दो; दूसरी माला।  98 नवकार मंत्र हो गए, 99 मंत्र चल रहा है, विचार आ गया, ईस माला को रद कर दो। एक माला गिननी है, लेकिन सच्ची सच्ची, पक्की पक्की। अभी तक क्या किया आपने? दवाई पुरी ली नही है ओर आप कहते हो डॉक्टर से, साहेब ये दवा अच्छी नही है। अरे दवा तो अच्छी है। 

में बहोत बार कहता हूँ, दवाई डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब की, तो वो दवाई आप लेंगे, लेकिन दवाई लेने की रीत वो भी डॉक्टर की बताई होगी की आप की होगी? डॉक्टर ने टेबलेट का नाम लिख दिया है, 1-1-1 आप समझ गए, 1-1-1 तो तीन समय एक-एक टेबलेट ले लेनी है। ओर खाने के बाद लेने की है। आपको प्रवास में कही जाना है, अगले दिन ही, अरे प्रवास मे खाने का ठिकाना नही पड़ेगा, ये एक सप्ताह की दवा है, 21 टेबलेट मुझे निगलनी है, आज ही निगल जाऊ?! होगा? 

मुल्लाजी एक रीसेप्शन में गये थे, बडा ही शानदार भोज लगा था। चांदी की थालीयां थी, सोने की चम्मच थी। भोजन पुरा हुआ, मुल्लाजी ने सोने का चम्मच नेपकिन से लुछा ओर अपनी कोट की जेब में सरका दिया। बाजुवाला तो देखकर शोक हों गया, सोने का चम्मच सीधा जेब में! उसने खाना खा लिया हो तो ठीक है, चम्मच भी ले लिया! लेकिन मुल्लाजी का मुँह मायूस था, बाजूवाले ने पूछा, मुल्लाजी ये क्या किया? तो मुल्लाजीने कहाँ चम्मच ले लिया। ऐसेभी चम्मच ले सकते है आप? मुल्लाजी ने कहा, हा, में भी सज्जन आदमी ही हूँ। में समझता हूँ एसा नही लेना चाहिये, लेकिन डॉक्टर क्या करना? अरे यहाँ डॉक्टर कहाँ आये? उसने कहाँ शरदी हो गई है, डॉकटर के पास गया था। डॉक्टरने इंग्लिश में कुछ लिखा है, वो तो मुझे मालूम नही पड़ता, लेकिन लिखा है भोजन के बाद एक चम्मच लेना! दवाई रही वहाँ केमिस्ट के वहाँ! चम्मच ले लीया! आपका सामायिक कही एसा तो नही है ना…? समभाव की दवाई है ही नही; कटासने पर बैठे ओर सामायिक हो गया! 

तो मंत्र दीक्षा, साधना दीक्षा, ये दोनों दीक्षाए के बाद जीवन व्यापीनी दीक्षा आती है। जब हम प्रभु की कृपा से अनुग्रहित होते है, सद्गुरु की कृपा से अनुग्रहित होते है, तो सद्गुरु हम पर बरसते है, तब प्रभु की प्रसादी रूप ये रजोहरण हमें मिलता है। ये रजोहरण लेना ये जीवन व्यापीनी दीक्षा। एक मंत्र दीक्षा, एक साधना दीक्षा, ओर तीसरी जीवन व्यापीनी दीक्षा। तो आज आपको मंत्र दीक्षा मिलनेवाली है। ओर साधना दीक्षा के लिये मैंने कहा वैसे, जहाँ भी आपकी श्रद्धा हो, उन गुरु के पास आप की साधना को ठीक करा लेना। पुछ लेना, गुरुदेव! मेरे पास 3 घंटे है, साडे तीन घंटे है उस में मैं क्या करू? आप बतलाइए? आप जैसा कहेंगे वैसा ही में करूंगा। लेकिन मुझे रिजल्ट मिलना चाहिये। ओर कोई भी सद्गुरु होंगे, रिजल्ट आपको देंगे ही। आप उनकी आज्ञा के मुताबिक अनुष्ठान करोंगे तो रिजल्ट मिलेगा ही। क्योंकि अमृत अनुष्ठान ही एसा है। अमृत अनुष्ठान को सुचारु ढंग से करेंगे तो रिजल्ट मिलनेवाला है ही। तो आज मंत्र दीक्षा देने की है, अब मंत्र दीक्षा का कार्यक्रम शूरू होगा।

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