વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત
Subject: अंतर्लीन दशा
अंतःप्रवेश दशामें अपनें गुणों का आंशिक स्पर्श होता है, लेकिन जब अंतर्लीन दशा आती है तब तो आप भीतर ही भीतर रहते हो; फिर बाहर आने का कोई कारण ही नहीं। जाग्रत्यात्मनि ते नित्यं, बहिर्भावेषु शेरते। ऐसा साधक फिर आत्मभाव में ही सदा डूबा रहता है; बहिर्भावमें बिलकुल सुषुप्त है।
समरस भाव भला चित्त जाके। ऐसी अंतर्लीन दशा में समभाव प्रगाढ़ मात्रा में होता है। अंतःप्रवेश दशा में समभाव को ज़रा सा छूते थे और फिर से राग-द्वेष में आ जाते थे; फिर से समभाव को छूते थे, फिर से बाहर आ जाते थे। लेकिन अंतर्लीन दशा में तो तुम समभाव में ही रहते हो।
अविनाशी के घरकी बातां, जानेंगे नर सोई। अविनाशी जो आत्मा है, उस आत्मद्रव्य की बातें वह ही आदमी जान सकता है, जो अंतर्लीन हो। पंकज नाम धराय पंक सुं, रहत कमल जिम न्यारा; चिदानंद एसा जन उत्तम, सो साहिब को प्यारा!
મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ – પાલીતાણા વાચના – ૧૦
आंतरयात्रा के तीन चरण। पहला चरण अंतर्मुख दश, दूसरा चरण अंतःप्रवेश दशा, अंतर्लीन दशा। अंतःप्रवेश दशा में अपने गुणो का आंशिक स्पर्श होता हे, लेकिन जब अंतर्लीन दशा आती हे तब तो भीतर ही भीतर रहते हे; फिर बाहर आने का कोई काम ही नहीं। तुम भीतर डूब गए, इस अंतर्लीन दशा का वर्णन पंचविंशतिका में महामहोपाध्याय यशोविजय महाराज ने दिया हे, वहा उन्होंने कहा हे, ‘जाग्रत्यात्मनी ते नित्यं, बहिर्भाविषु शेरते। उदासते परद्रव्ये, लीयन्ते स्वगुणामृते ॥’ अंतर्लीन साधक कैसा होता हे? आपको बनना हे ना? आज तो अंतिम दिन हे। कल आप जायेंगे, कोई पूछेगा पालिताना जाकर आये, क्या लेकर आये? तो क्या कहोगे? आंतरयात्रा लेकर आये!
इतने साल तक बहिर्यात्रा में थे, हमारे पास ऑप्शन ही नहीं था, एक नया ऑप्शन मिला। में बहोत बार कहता हूँ, की हमारी अतित की यात्रा में शायद हमारे पास ऑप्शन नहीं था। बाहर ही बाहर हम घूम रहे थे। इस पर से उस पर में, उस पर से इस पर मे। पर की ही यात्रा हमारी चल रही थी। क्यू? We had no option एक स्व की आनंदमयी दुनिया होती हे, इसकी कल्पना भी नहीं की हमारे पास, ये प्रभु की बहती कृपा, हमारे पर हुई की हमें मालूम हुआ, की स्व की आनंदमयी एक दुनिया भी हो सकती हे। तो आंतरयात्रा में जाने का प्रयास करना हे, घर पर जाकर भी इस ध्यानाभ्यास को रोज ही करना हे, ओर शांत चित्त से बैठकर भीतर जाने का प्रयास करना हे।
तो अंतर्लीन दशा में जो साधक आ गया, उसकी दशा कैसी होती हे? आपको शायद ईर्ष्या होगी, की वाह! एसा भी हो सकता हे! आपको ईर्ष्या नहीं आती हे ना हमारी, वही तो बड़ी बात तकलीफ हे। अहोभाव नो डाउट आपके पास हे, आपकी आँखों में प्रभु के श्वेत वस्त्र पर का अहोभाव में देख रहा हूँ, अहोभाव आपके पास हे, अब ईर्ष्या की भूमिका चाहिये, मुझे कब ये मिलेगा?
तो अंतर्लीन दशा में जो साधक आ गया, कैसी हे उसकी चर्या? ‘जाग्रत्यात्मनी ते नित्यं’ एसे साधक आत्मभाव में ही सदा डूबे रहते हे। परभाव में जाने का काम ही नहीं, शरीर की भी याद नहीं आती हे! तो पर की याद कैसे आएगी? दो दिन हुए हे, तीन दिन हुए हे, खाया नहीं हे, याद नहीं आती, मैंने खाया नहीं हे; ये अंतर्लीन दशा हे। मुझे भी ईर्ष्या आती हे, अंतर्लीन दशा वाले साधकों की मुझे भी ईर्ष्या आती हे। के कब -कब मुझे ये दशा मिल जाएगी? मे भीतर ही भीतर डूबा रहूँगा। तो आत्मभाव में सतत जागृति।
अब स्पष्टीकरण कर दिया, बहिर्भाविषु शेरते – बहिर्भाव में बिलकुल वे सुषुप्त हे, यु भी आपको तो मालूम हे, एक मुनि की व्याख्या क्या हे? ज्ञानसार प्रकरण को आप खोलेंगे? अब उपाध्याय यशोविजयजी से आप पूछेंगे, की हम मुनि हे की नहीं? क्या उत्तर मिलेगा ख्याल हे? महोपाध्यायजी कहेंगे ‘पुद्गलेष्व प्रवृत्तिस्तु योगानां मौनमुत्तमम्’ बहिर्भाव में तु नहीं हे, तु बहिर्भाव में नहीं हे तो ही तु मुनि हे। ‘पुद्गलेष्व प्रवृत्तिस्तु योगानां मौनमुत्तमम्’ बहिर्भाव में जाना ही नहीं हे, क्या हे बहिर्भाव में? कुछ हे भी तो नहीं, इसलिए एक बात फिर से में दोहराऊँगा, की बहिर्भाव में कुछ नहीं हे, एसा अनुभव आपको हो गया। खाना खा लिया, कुछ पी लिया, किसी के कुछ बाते कर ली, क्या होता हे इससे? या तो तुम रतिभाव में जाते हो, या तो अरतिभाव में जाते हो। आनंद कहा हे?
एक बात समझ लो, आनंद असहयोगजन्य घटना हे, रतिभाव, सुख, हर्ष ये सब संयोगजन्य घटना हे, असंयोगजन्य घटना पर तुम्हारा आधिपत्य हे। फ्रेंड मिला, अच्छा लगा, रतिभाव आया, लेकिन फ्रेंड कब आयेगा? तुम्हारे हाथ में नहीं हे। चाय ओर वो भी ऐसे टेस्ट की, पी तो मजा आयेगा; तुम बंध गये, एक चाय के कप में तुम बंध गए। क्या एसा जीवन अच्छा लगता हे तुम्हें? एसा परतंत्र जीवन! तो संयोगजन्य रति का अर्थ यही हे, एक पदार्थ तुम्हारी कल्पना से अनुकूल हो, ओर मिल जाये, तब रतिभाव होगा। अब तो तुम्हारी कल्पना, कल्पना भी बदल जाएगी। आज सुख की कल्पना जिस पदार्थ में हे, कल एसी ही कल्पना उसी पदार्थ में होगी या नहीं होगी, आप भी नहीं जानते।
एक गाना पहली बार आया, बहुत ही सुंदर संगीत हे, एक दफा आपने सुना, बहुत अच्छा लगा, तब आपके ऊपर फर्ज डाल दिया जाये, की तीन घंटे, चार घंटे, पाँच घंटे तक यही गीत सुनना हे, दूसरा कुछ भी नहीं करनेका। ओर आप चाहो या न चाहो ये रेकॉर्डिंग इतना जोर से बजे, की आपको यह सुनना ही पड़े। पाँच घंटे बाद के आप क्या कहेंगे, क्या लगाकर रखा हे यहा? एक ही एक गाना! पाँच घंटे पहले तु कहता था, बहोत सुंदर गाना हे। पाँच घंटों में क्या हो गया? गाना बदल गया की तुम बदल गए? बदल कोन गया? तो तुम्हारी कल्पना से जो अच्छे पदार्थ हे, उनका संयोग होता हे, तो रतिभाव होता हे, लेकिन आनंद असंयोगजन्य घटना हे। आनंद हमारी भीतर ही निपज हे।
एक योगी आनंद दशा में डूबे हुए हे, कौन सी चीज उन्हे चाहिये? कोन सी व्यक्ति का मिलन उन्हे चाहिये? कुछ भी नहीं चाहिये! वे कहते हे में स्वयं परिपूर्ण हूँ! आपको भी इतना भाव आज मिल जाये, में स्वयं परिपूर्ण हूँ, दूसरों की आवश्यकता मेरे शरीर को जरूर हे, मुझे नहीं। में तो स्वयं संपूर्ण अपने को मानता हूँ। लेकिन में मानता हूँ की मेरे शरीर को रोटी-दाल की आवश्यकता होती हे; लेकिन मुझे नहीं। रोटी ओर दाल की आवश्यकता, चाय ओर नाश्ते की आवश्यकता होती हे, लेकिन वो शरीर को होती हे। आप division पाड़ सकेंगे? खाना किसके लिये जरूरी हे? शरीर के लिये, तुम तो अनहार दशा में बैठे हुए हो। तुम्हारे पास अनाहार दशा हे। एक निर्मल आत्मा आहार संज्ञा से पर हे, अनाहार दशा में स्थित हे। तो मुझे कोई भी चीज की आवश्यकता नहीं हे। मुझे एक भी व्यक्ति की आवश्यकता नहीं हे। मेरे आनंद को प्रकट करने के लिये। में स्वयं संपूर्ण हूँ। दूसरों की आवश्यकता मुझे हुई, मे भी परतंत्र हो गया ना… के फलाभाई मिले, फलाभाई मिले, तो मुझे सुख मिले। तो वो सुख तो फलाभाई पे हो गया। मेरे पर कहाँ रहा? नहीं में स्वयं परिपूर्ण हूँ। में स्वयं आनंदघन हूँ।
आपको लगता हे? आनंदघन हे आप, ओर पल-पल विषाद में जाते हो, ये घटना क्यों एसे हो गई? ये घटना क्यों वैसे हो गई। अरे तु आनंदघन हे! घटना घटना हे, तु, तु हे। घटना से तु संबंध क्यू जोड़ता हे तेरा? बस यही भूल हमने की; घटना के साथ हम संबंध जोड़ देते हे। साधक घटना निरपेक्ष होना चाहिये। घटना से अप्रभावित होना चाहिये। ये अंतर्लीन दशा के साधक की जो बाते शास्त्रों में कही हे, उसमे एक बात यह भी हे, घटना निरपेक्ष होना।
चिदानंदजी महाराज बड़े ही अंतर्लीन साधक हे, पर अंतर्लीन साधक ही अंतर्लीन साधक की दशा का वर्णन कर सकता हे। जब तक तुम अंदर बैठे ही नहीं, अंदर की बाते तुम कैसे करोगे? लेकिन एसा होता हे, एक नेता अमेरिका की बात कर रहा था, अमेरिका में एसा हे, एसा हे, एसा हे… उसका प्रवचन दे दिया, फिर किसी मित्र ने उस नेता को पूछा के तुम तो अमेरिका कभी गए ही नहीं, अमेरिका की बाते करते थे सब, अमेरिका में एसा हे, अमेरिका में एसा हे। तो उसने कहा, सुनने वाले भी कहाँ गए थे?! अभी योग का बडा बाझार हुआ हे, अमेरिका ओर यूरोप में तो योग का बडा बाझार हे। करोड़ों डॉलरों का! वार्षिक करोड़ों डॉलर का, एक बिसनेस हो गया। हमने खुद ने प्राप्ति की नहीं, दूसरों को प्राप्ति कराने के लिये तैयार हो गए।
रमण महर्षि कहते की, कुभ के मेले में एक आदमी गया था, अभी प्रयागराज में कुम्भ मेला चल रहा हे, एसा ही कुंभ मेला पहले भी था, तो कुंभ मेला में वो आदमी गया। उसे मालूम नहीं था कुंभ मेला कैसे होता हे बडा? सोचा की मेरे गाँव बहोत ही संत आये हुए हे, संतों की सेवा भी मेने की हे। तो किसी भी संत के पंडाल में हमारा बिस्तरा हम रख देंगे। उस समय दूसरी कोई व्यवस्था नहीं होती थि। अब तो बहु ही व्यवस्था होती हे। यात्रिकों के लिये भी। तो गया, लेकिन कोई भी परिचित संत मिला नहीं, कही भी बिस्तर को रखने की जगह नहीं मिलि। फिर क्या किया? रास्ते में बैठ गया, ओर रास्ते के किनारे पर बिस्तर जमा दिया। तब उसने देखा? उसका ही गाँव का रमण यु-यु घूम रहा था, बिस्तर लेकर, ओर इस महोदय ने पूछा क्यों भैया ठिकाना नहीं हुआ? तो कहा की नहीं हुआ हे। एस महोदय ने क्या कहा? शाम तक देखो, न हो तो मेरे पास आ जाना। पहला तेरा तो ठिकाना लगा….. पहले तेरा तो ठिकाना लगा!
तो चिदानंदजी महाराज अंतर्लीन दशा के साधक थे। ओर में अंतर्लीन दशा में क्या होता हे, इसका वर्णन हमारी भाषा में देते हे। एक सुंदर पद हे उनका, “अवधू निरपक्ष विरला कोइ” अप्पन को संबोधित हे, अवधू!- तु अवधूत हे। जिनके कर्म खर पड़े हे। जिनके कर्म कम हो गए हे। तु अवधू हे। निरपक्ष विरला होई। घटना से निरपेक्ष व्यक्तित्व बहुत ही विरल होता हे। “देखा जग सहू जोइ” ओर फिर अंतर्लीन दशा में आये हुए साधक की दशा को देते हे शब्दों में ‘समरस भाव भला चित्त जाके, थाप उथाप न होई, अविनाशी के घर की बाता, जानेंगे नरसोई।’
क्या होता हे अंतर्लीन दशा में? समभाव प्रगाढ़ मात्रा में होता हे, अंतःप्रवेश दशा में समभाव को स्पर्श करते हो तुम, छूते थे, ओर फिर राग-द्वेष में आ जाते थे, फीर छूते थे, फिर बाहर आ जाते थे। लेकिन अंतर्लीन दशा में तो तुम समभाव में ही हो। तो कहते हे, ‘समरस भाव भला चित्त जाके, थाप उथाप न होई’ – समरस भाव – समत्व जिसके चित्त में पेदा हो गया, उसके लिये कोई भी घटना अच्छी नहीं होती, कोई भी घटना बुरी नहीं होती। घटना, घटना हि होती हे, प्लेइन! आप स्टिकर लगाते हे ना, वैसा स्टिकर अंतर्लीन दशा में आये हुए साधक नहीं लगाते। आप सब स्टिकर वाले हे। अब यहाँ स्टिकर छोड़कर जाना हे पालिताना में, की लेकर जाना हे घर पर? एक-एक बात पर स्टिकर?! एक चाय का कप आया, अच्छा नहीं हे, स्टिकर लगा दिया। एक आदमीने अच्छे ढंग से बात की, तुम्हारी प्रशंसा की, तो स्टिकर लगा दिया की अच्छा आदमी हे। किसी ने तुम्हारी निंदा की, तो स्टिकर लगा दिया की बुरा आदमी हे। ये स्टिकरों से तुम परेशान नहीं हो? मुझे पूछना हे? ये बार-बार स्टिकर लगाना तुम परेशान नहीं हो?
तो ‘समरस भाव भला चित्त जाके, थाप उथाप न होई’ कुछ स्थापित नहीं करना हे, कोई उत्थापित नहीं करना हे, जो हे सो देखना हे, हमारी साधना ईतनी ही हे, पर्यायो को देखना हे; पर्यायो के भीतर नहीं जाना हे। अभी तक जाओगे, कहोगे ये पर्याय अच्छा हे, ये पर्याय बुरा हे। पर्याय पर्याय ही हे, ओर पर्याय क्रम से बंधा हुआ हे, ओर क्रमबद्ध पर्याय खुलते ही जायेंगे, खुलते ही जायेंगे, आप इच्छों या न इच्छों क्रमबद्ध पर्याय क्रम में बंधे हुए हे; तो खुलता हे। ओर खुलते ही ये पर्याय देख लो, उस में दूसरा करने का क्या होता हे? तुम कितना भी करो, कितना भी प्रयास करो, एक भी पर्याय को बदल नहीं सकते। जो पर्याय होनेवाले हे, वो होनेवाले ही हे। आज शाम को 4 बजे घटना घटनेवाली हे, आपके जीवन में आपको पता नहीं हे, लेकिन अनंत केवलज्ञानीऑने ये घटना आपके जीवन में घटी हुई देखी हे। ओर चार बजे घटना घटेगी, रतिभाव की घटना भी हो सके, अरतिभाव की घटना हो, लेकिन जब ये घटना घटेगी, आपको ये मालूम होगा की अनंत केवलज्ञानीऑने ये पर्याय मेरे जीवन में इस समय में खुलता हुआ देखा था, ओर खुल गया? ओर इस में मुझे करने का क्या होता हे? कुछ करने का होता ही नहीं हे! देखने का ही हे! अतित की घटना हो गई, हो गई तो हो गई। अब क्या करोगे? आप तो 5 दिन तक, दस दिन तक विचार करोंगे, एसा इसने क्यू किया? अरे क्यू किया? क्यू किया से तु कर्मबंध कर रहा हे। घटना में क्या फरक पड़ेगा? घटना तो घट गई सो घट गई।
तो अंतर्लीन दशा में जब आप आओगे तो क्या होगा? ‘समरस भाव भला चित्त जाके, थाप उथाप न होइ,’ ओर चिदानंदजी महाराज तब कहते हे – अविनाशीके घरकी बातां, जानेंगे नरसोई। ‘ अविनाशी जो आत्मा हे, वो आत्म द्रव्य की बाते, वो ही आदमी जान सकता हे। जो पर्यायो में फंसा हुआ हे वो आत्मद्रव्य ओ कैसे जान पाएगा?! पर्यायो को देखना हे, आत्मद्रव्य में जाना हे, इतनी साधना आप की। पर्यायो को देखना हे, आत्मद्रव्य में जाना हे।
फिर आगे कहते हे, निंदा स्तुति श्रवण सुणीने, हर्ष शोक नवि आणे, ते जग में जोगीश्वर पूरा, नित्य चढ़ते गुणठाणे।’ समवृति आ गई हे, आप भी मांगते तो हो प्रभु के पास ‘कमठे धरणेन्द्रे च, स्वोचितं कर्म कुर्वति, प्रभुस्तुल्य मनो:वृत्ति:’ कभी वेदना की टीस भीतर आई? के प्रभु तु इतना समचित्त हे, में तेरा भक्त हूँ, मे तेरा बालक हूँ, मुझे भी मुझ समचितता का दान तो तु कर दे! प्रभु से मांगा कभी? अरे प्रभु से कुछ नहीं मांगा, संतों से कुछ मांगा? एक-एक संत के अनेक गुण होते हे, आपने एक गुण को भी कभी मांगा हे?
हम नमुत्थणं में बोलते हे, लोगनाहाणं प्रभु लोक के नाथ हे। नाथ का मतलब ये हे, की प्रभु नए गुण अप्पन को देते हे, ओर जो गुण पहले मिले हुए थे, निस्तेज हो गए हे, उसको प्रज्वलित भी प्रभु कर देते हे। तो रोज प्रभु के पास से एक गुण नया मिलना चाहिये। ओर तभी प्रभु का नाथत्व समन होता हे। नाथ वही हे, जो योग ओर क्षेम करे। योग का अर्थ हे, अप्राप्त साधना की, अप्राप्त गुणो की प्राप्ति। ओर क्षेम का अर्थ हे, जो साधना मिलि हुई थी, जो की खुली हुई होती हे, निस्तेज हो गई थीं, उसको फिर प्रज्वलित कर देना, उत्तेजित कर लेना। तो प्रभु गुण देने के लिये तैयार हे, आप तैयार?
बड़े निःस्पृही आदमी लगते हो! बड़े निःस्पृही हो ना? संसार में नहीं! यहाँ? एक कलापूर्णसूरि दादा का दर्शन किया, कैसी ये धारा हे! प्रभु का साक्षात्कार उन्होंने किया! अरे उन्होंने तो कर लिया, तु कभी उनके चरणों में जाकर बैठा था? की गुरुदेव आपने प्रभु का साक्षात्कार कर लिया, मुझे भी कराओ ना? कभी कहा था? चेन्नईवालों को में पूछता हु, कलापूर्णसूरि दादा आ गए, आपने दर्शन भी कर लिया, दादा चल गए, कभी आप दादा के पास बैठे थे? की दादा आपने प्रभु का साक्षात्कार कर लिया हे, हमें भी कुछ प्रभु से मिलन करा दो। दादा तैयार थे, तुम तैयार थे? दादा ने कर लिया तो कर लिया। आप निःस्पृह थे। लेकिन निःस्पृहता आपकी कहाँ नहीं होती? संसार में! पडोंशी ने तो ये फ्लेट छोड़कर बहोत बडा बँगला ले लिया, जुहू स्कीम में! 25 करोड़ का! क्या करोगे फिर?? क्या होगा? हुआ ये, साल छोटा सा बिजनेस करता था, इसमे से इतना कैसे कमा लिया? 25 करोड़ का बंगला? हा, 25 करोड़ का बंगला, जुहू स्कीम मे! क्या होगा? उसको मिला तो मिला हमें क्या हे! वहाँ निःस्पृह नहीं हे।
तो संतों के पास जाकर बेठो। ओर पूछो की साहेबजी आप को कैसे ये सबकुछ मिला? आपने क्या साधना की हे? मुझे भी थोड़ा दिखलाओना? श्रेणिक राजा जब सम्यग्द्रष्टि नहीं था, तब भी अनाथी मुनि के चरणों में बैठा था। श्रेणिकराजा ने देखा, ये मुनिराज का शरीर कह रहा हे, की वे राजघराने से आ रहे हे। तो राजघराने से आया हुआ आदमी ये भिक्षुक क्यू बन गया? संत क्यू बन गया? बैठा चरणों में, क्यू आप संत बन गए? ओर जब अनाथी मुनीने अपना वृंतांत दिखलाया, श्रेणिकराजा सम्यग्द्रष्टि हो गए। ओहो यह बात हे! संसार में कोई भी शरण देनेवाला है ही नहीं; सिर्फ प्रभु ही सरल देनेवाले हे! चलो में भी प्रभु संत की शरण में बैठ जाऊ!
आगे क्या कहते हे, ” निंदा स्तुति श्रवण सुणीने, हर्ष शोक नवि आणे, ते जग में जोगीश्वर पूरा, नित्य चढ़ते गुणठाणे” किसीने निंदा कर दी, किसीने स्तुति कर दी; क्या फरक पड़ता हे! फरक क्या पड़ता हे? निंदा के भी शब्द हे, प्रशंसा के भी शब्द हे। तो शब्द यो पौदगलिक घटना हे, तुम मेरे साधक हो, आंतर जगत में प्रतिष्ठित हो, तो पुदगलों से क्या लेना ओर क्या देना?
मीरां ने कहा था, “कोई नींदे, कोई बंदे में अपनी चाल चलूँगी।” नींदा करना हो तो निंदा करो; बड़ी खुशी से करो। प्रशंसा करनी हो प्रशंसा कर लो, में तो अपनी चाल पर ही चलूँगा। मुझे किसीसे कोई संबंध नहीं हे, संबंध सिर्फ प्रभु से हे। तो इसलिए मैंने पहले एक सूत्र दिया था। ‘पर का संपूर्ण असंग; यही परम के संग में बदल जाता हे।’ पर के संग में आप बैठे हुए हो, पर का संग अच्छा लगता हे, परम का संग आपको कैसे मिलगा? निंदा की तो की, क्या फरक पड़ता हे?
ओर इस कड़ी में आगे बढू तो कबीरजी ने तो कहा हे, “निंदक नियरे राखिए, अंदर कुटिया बिछाय” कबीरजी कहते हे, के निंदक को अपने पास रखो, तुम्हारा महल हे, तो ठीक हे महल भले रहा, लेकिन एक झुपडी बनाकर भी एक निंदक को रखो तुम्हारे पास। क्यू की तुम्हारे जो दोष, तुमको मालूम नहीं पड़ते हे, वो देख लेता हे, ओर आपको कहता हे। में बार-बार पूछता हूँ, की दर्पण आपको पसंद आता है भाई? रिसेप्शन में जाना हे, दर्पण में मुंह देख लिया, साबुन कानों में हे, रेज़र से बाल कटे हे, लेकिन थोड़े बाल रह गए हे। आप दर्पण में देखोंगे, फिर क्या करोगे बोलो? दर्पण को पटकोगे ना? मेरे दोष दिखानेका कौन सा अधिकार हे? कहेंगे की नहीं? मेरे कानों में साबून हे तो हे, मुझे क्या हे? तूने क्यू दिखलाया? दर्पण अच्छा लगता हे? अच्छा हुआ की देख लिया, वरना एसे ही रिसेप्शन में जाता तो क्या होता? फिर तुम ठीकठाक होकर जाते हो। तो दर्पण अच्छा लगता हे? लगता हे? ओर दर्पण जैसे आदमी कैसे लगते हे? वो बोलो। दर्पण जैसे आदमी कैसे लगते हे?
एक आदमी चला जा रहा था, रिसेप्शन में जाने का था, लेकिन हॉल घर से नजदीक ही था, तो सोचा चलकर जाऊ, वो चलकर जा रहा था। कोई गाड़ी बीचमें से पसार हुई। पानी भरा हुआ था, गाड़ी निकली, गंदा पानी था, उसके छींटे उस सज्जन के शर्ट के पीछे लग गए, बहोत ही लग गए, लेकिन सज्जन को पता नहीं हे। शर्ट के आगे के भाग में कुछ नहीं हे, पीछे के भाग में है। अब कोई आठ साल का बच्चा वहाँ से निकलेगा, ओर वो देख लेगा, ओर उससे कहेगा, अंकल आप जाते कहाँ पर हो? अच्छे ढंग से सजे हुए हे, कोई अच्छी जगह पर जा रहे हो आप, लेकिन आपको मालूम नहीं हे, आपके शर्ट का पीछे का भाग तो देखो। गंदे पानी से कीचड़ से सना हुआ हे ये, आपको मालूम ही नहीं हे? तब वो सज्जन क्या करेगा? बोलो तो? आठ साल के बच्चों को दाटेगा? तेरा क्या काम हे यहाँ? मेरा शर्ट बिगड़ा तो बिगड़ा हे, में संभाल लूँगा। पर वो थेंक्स देंगा, इधर इधर लग गया है, ओहो इतना कीचड़ लग गया हे, मुझे पता ही नहीं था! थैंक्स तुमने मेरे शर्ट के पीछे के भाग के दाग़ देख लिये, आपको में धन्यवाद देता हूँ। फिर घर पर जाएगा, कपड़ा बदल लेगा, फिर रिक्षे में हॉल पर चला जाएगा। ठीक हे? कपड़े पर दाग पड़े हे, आपको अखरता हे, आपके अस्तित्व के स्तर पर जो दाग पड़े हे, वो अखरते हे की नहीं अखरते हे? कपड़ा ही स्वच्छ होने चाहिये, ये जीवन की चद्दर, जैसी की वैसी वो चलेगा?
कबीरजी ने कहा था ‘सो चादर सुरनर मुनि ओढ़ी, ओढ़ी के मेली कीनी चदरिया, दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यु की त्यू धर दी चदरिया’ ‘सो चादर सुरनर मुनि ओढ़ी, देवताओने जीवन की एक चद्दर ओढ़ी। मनुष्यों ने ओढ़ी। ओर संतों ने भी कभी कभी ओढ़ी। लेकिन क्या किया? ओढ़ी के मेली कीनी चदरिया – लेकिन अपने बारे में कबीरजी क्या कहते हे? ‘दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यु की त्यू धरी दिनी चदरिया’ आ जीवन की संध्या पर प्रभु! में तूने जैसी चद्दर दी थी, वैसी साफ-सुफ चद्दर लौटा रहा हूँ। एक शब्द बडा ही मूल्यवान हे, ‘दास कबीर जतन से ओढ़ी’ – आपकी ये जागृति! शायद जीवन की चादर पर दाग लग भी गया हे, आप धो दो। आप चाय पीने के लिये बैठे, सहेज चाय ढल गई शर्ट पर, आपको मालूम हे चाय का ये दाग पानी से तुरंत निकल जाता हे, पर पानी से तुरंत नहीं निकालो तो फिर बहोत मुश्केली से जाता हे, आप चाय पीते पीते वॉश बेसीन के पास चले गए, ओर शर्ट को धो डालेंगे। यह जो जागृति हे, दाग लगा; धोओ। दाग लगा; धोओ। दाग लगा; धोओ। एसी जागृति जीवन में आ जाये तो? निंदा सुनो या स्तुति सुनो, क्या फरक पड़ता हे?
भगवद्दगीता ने साधक के गुणो को बताते हुए कहा, ‘तुल्यनिंदास्तुतिर्मौनी’ “तुल्य निंदा स्तुति:” निंदा ओर स्तुति दोनों समान हे, कोई फरक नहीं हे। ओर प्रारंभिक साधक के लिए फरक पड़ता हे। फरक क्या पड़ता हे? उसके लिए निंदा अच्छी हे, प्रशंसा बुरी हे। प्रारंभिक साधक के लिए, आपके लिए क्या अच्छा? आप प्रारंभिक साधक हे तो? निंदा आपके लिए अच्छी हे, प्रशंसा आपके लिए बुरी हे। कोई कहेगा, वाह तुम तो छ सामायिक कर रहे हो, बहुत सुंदर, अनुमोदना करता हूँ। वो तो अनुमोदना करेगा, आप अहंकार करेंगे। लेकिन जब गुरुदेव के पास जायेंगे तो गुरुदेव कहेंगे, क्या करता हे? साहेबजी छ सामायिक। छ सामायिक? समभाव कितना हे बोल? तेरे पास समभाव दिखता तो दिखता नहीं हे, अभि-अभि मैंने देखा एक आदमीने कुछ कहा, तु क्रोधित हो गया था! तो समभाव तेरे पास हे नहीं, तु कहता हे में छ सामायिक कर रहा हूँ, एसा सामायिक हे क्या? आपको क्या बात पसंद आएगी बोलो? गुरुदेव डाट रहे हे, गुरुदेव की यह डाट जो हे, वो पसंद आएगी? की कोई आपकी प्रशंसा कर रहा हे, वो आप को पसंद आएगा? रास्ते में चलता हुआ आदमी प्रशंसा कर देता हे; उसका मूल्य क्या होता हे? अधिकारी – विद्वान ही प्रशंसा करे तो उसका मूल्य होता हे।
आपकी साधना सद्गुरु द्वारा सर्टीफाइड होनी चाहिये। सद्गुरु कह दे, तेरी साधना अच्छी हे, ओर तेरी साधना से में प्रसन्न हूँ। तब आपको लगना चाहिये, हा मेरी साधना थोड़ी थोड़ी ठीक हे। सामान्य आदमी कह दे, तो उससे क्या? मेडिकल लाइन का एबीसीडी भी जिसको नहीं आता हे, वो आदमी डॉकटर को कह दे, आप बड़े अच्छे डॉकटर हो, निष्णांत हो, अरे तुझे क्या मालूम की निष्णांत क्या? तुझे कैसे मालूम हुआ? तु इस विषय में गया ही नहीं हे। आपकी को जो प्रशंसा करता हे, जिस विषय में, उस विषय का वो निष्णांत हे? तब ही प्रशंसा कोई अर्थ होता हे। तो प्रशंसा का अर्थ क्या हे? बाकी तो लोग स्वार्थी होते हे, तुम्हारी प्रशंसा कर ले, तुमसे कुछ ले ले! में तुमसे कुछ लूँगा, तुम मुझे कुछ दे दो। ये बात ही हे यहा पे, स्वार्थ की घटना हे।
तो निंदा, स्तुति, श्रवण करीने हर्ष, शोक, मल, ना रहे, वो जग में जोगीश्वर पूरा, नित्य चढ़ते गुणठाणे – फिर आगे के आगे ही जाना हे बस, पीछे लौटना ही नहीं हे। आँख बुँदकर चलो बस, आगे ही जाना हे। ओर अंत में कहते हे, ‘पंकज नाम धराय पंकशु, रहत कमल जिम न्यारा, चिदानंद एसा जन उत्तम, सो साहिब को प्यारा’ ‘पंकज नाम धराय पंकशु, रहत कमल जिम न्यारा। कमल हम किसे कहते हे? संस्कृत में उसका पर्यायवाची नाम हे, पंकज। पंक का अर्थ हे कीचड़, तो ये कमल का फूल पेदा होता हे कीचड़ में, लेकिन कीचड़ को छोड़कर ऊपर आ जाता हे, तभी तो वो पवित्र गिना जाता हे। तो पंकज नाम धराय, नाम तो उसका पंकज हे, कीचड़ में पेदा हुआ, लेकिन ‘पंकशु रहत कमल जिम न्यारा’, वो कीचड़ से दूर ही रहता हे। अप्पन को भी एसा करना हे, कर्म में हम पले हे, राग द्वेष में हम पड़े हुए हे, लेकिन अब इस कीचड़ को छोड़ देना हे। अब न चाहिये राग, न चाहिये द्वेष, न चाहिये अहंकार। ओर तब प्रभु का सर्टीफिकेट उसे मिलता हे, प्रभु का! “चिदानंद एसा जन उत्तम, सो साहिब को प्यारा” – बोलो? आप को किसका सर्टीफिकेट चाहिये? प्रभु का, सद्गुरु का, की लोगों का? बोलो? लोगों का ही सर्टीफिकेट चाहिये ना? कराओगे तो उपधान, कराओगे तो संघ, छ’रि पालित, लेकिन आशा क्या रहती हे? लोग क्या कहते हे? अरे लोक के लिए तूने ये संघ निकलवाया हे?! लोगों के लिए तूने उपधान करवाया हे? की प्रभु की साधना तुझ में आत्मसात् हुई इसलिए करवाया हे? क्यू करवाया हे? पूछो तो सही! इतना सुंदर अनुष्ठान तुमने करवाया, फिर बेच दिया तूने! बेच दिया, मे कहता हु! प्रशंसा में तुम डूब गए, अनुष्ठान को तुमने बेच दिया! तुम्हारे आँख में आँसू आने चाहिये, ये तो सब प्रभु की कृपा हे, संपत्ति भी प्रभु की कृपा से मिली। ओर संपत्ति का ये व्यय भी प्रभु की कृपा से हुआ हे। में तो कही भी हूँ ही नहीं पिक्चर में, में पिक्चर में कही भी नहीं हूँ। प्रभु ही हे। हम प्रवचन लेकर उठेंगे, क्या होगा? बस प्रभुने हमारी साउन्ड सिस्टम का यूस किया! ओर हम प्रभु के ऋणी हे, की प्रभु ने हमारी साउन्ड सिस्टम का यूस किया। बात पुरी हो गई। मैंने कुछ बोला ही नहीं था। तो फिर मैंने अच्छा बोला, या बुरा बोला, ये बाते मेरे मन में कहाँ से आएगी! I have not to speaker single word. मुझे कुछ बोलना ही नहीं हे, मुझे तो सुनना हे, प्रभु बरस रहे हे; में भी सुनता हूँ, में वक्ता नहीं हूँ।
अंतर्लीन दशा में आये हुए साधक कैसे होते हे, ये बात चिदानंदजी महाराज ने बतलाया। तो अंतर्लीन दशा को आदर्श के रूप में सामने रखो, ओर अंतर्मुख तो, हो ही जाओ। अंतर्मुख तो हो ही जाना हे, इसीलिए अंतर्मुखता के स्टेप्स को हमने पाँच -छ लेक्चर तक develop किया। की आपके लिए ये काम का हे- अंतर्मुख दशा। एकबार अंर्तमुख दशा आ गई, फिर अंतःप्रवेश दशा, अंतर्लीन दशा, सरल ही हे। लोगों से तुम्हारा छुटकारा चाहिये, अभी द्रष्टी पुरी लोगों की ओर, ओर ये एक बहिर्मुख द्रष्टी हे। लोग क्या कहते हे? ये घर तो अच्छा हे लेकिन लोग क्या कहते हे? लोग वास्तुपूजा पढ़ाते हे, घर नया लिया तो क्या करेंगे? वास्तुपूजा पढ़ाएंगे। भगवान को लाएंगे, ज्ञातिजनों को आमंत्रित करेंगे, लेकिन आशय क्या होगा? सब देख जाये, मेरा घर कैसा हे! तुम्हारा जोर प्रभु घर में पधारे इस पर हे? या लोगों तुम्हारे घर की प्रशंसा करे इस पर? तुम सब बौद्धिक आदमी हो, देखो भीतर से, बहिर्मुखता से कुछ नहीं मिलता हे। लोग कभी आपको सर्टीफिकेट देंगे? ठीक हे आप ऊपर चढ़ गए, तो आपको कहेंगे, लेकिन मनमे तो यही होगा की ये बेटा कब नीचे उतरेगा? में बहोत बार कहता हूँ, सोसायटी में पैसे से आगे बढ़ा हुआ एक आदमी हे, उसकी लड़की या लड़का रात को भाग गया; फिर देखो! पुरी रात मोबाइल, पूरे समाज के लोगों को चलते रहेंगे। की सुना-सुना वो आदमी हे ना उसकी लड़की, उसका लड़का भाग गया। लोगों को रस कहाँ? तुम्हारी संपत्ति में रस नहीं हे। तुम नीचे कब पड़े उसमें रस हे। तो सोसायटी कभी सर्टीफिकेट देनेवाले नहीं हे, सोसायटी का सर्टीफिकेट नहीं चाहिये। ये नक्की कर लो, बहिर्मुखता हट जाएगी, तुम अंतर्मुख बन जाओगे। फिर अंतःप्रवेश होगा, ओर फिर अंतर्लीन भी हो जायेंगे।
