વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત
Subject: साधक और भक्त के लिए अंत:प्रवेश के मार्ग
साधक के लिए स्वानुभूति का मार्ग यह है कि आत्मभावमें स्थिर होना है और उसके लिए परभाव से मुक्त होना है। परभाव से मुक्त होने के लिए मुझे परभाव में जाना ही नहीं है – ऐसी एक जागृति आपके पास चाहिए। आप ऐसे निमित्तों के बीच बैठे हुए हैं कि हर क्षण आपके परभावमें जाने का द्वार खुल जाएगा, लेकिन आपके पास जागृति होगी, तो आप परभाव में नहीं जाओगे।
ऐसी जागृति के लिए मोहनीय का क्षयोपशम ज़रूरी है। पहले दर्शनमोहनीय का और फिर चारित्रमोहनीय का क्षयोपशम आएगा। मोहनीय के क्षयोपशम के लिए चाहिए प्रभु की आज्ञा के प्रति पूर्ण आदर और प्रभु की आज्ञा के पालकों के प्रति पूर्ण आदर। प्रभु की आज्ञा का पालन भले ही संपूर्णतया न हो पाए, लेकिन प्रभु की आज्ञा के प्रति आदर तो पूर्ण होना ही चाहिए।
भक्त के लिए स्वानुभूति के मार्गमें भी तीन चरण हैं: अहोभाव, राग-द्वेष-अहंकार की शिथिलता, स्वानुभूति। जिस मनमें 24 घंटों प्रभु के प्रति अहोभाव ही अहोभाव हो, उस मनमें किसी भी व्यक्ति या पदार्थ के लिए राग / द्वेष कैसे रह सकता है? और यह अहोभाव भी प्रभुने ही दिया है, इस लिए अहंकार भी कहाँ बचेगा? राग-द्वेष-अहंकार की यह शिथिलता और तीसरा चरण आ गया स्वानुभूति!
મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ – પાલીતાણા વાચના – ૯
आंतरयात्रा का दूसरा चरण अंतःप्रवेश दशा। भीतर जाना हे, आनंद सिर्फ हमारे भीतर हे, बाहर तो हे रति ओर अरति। हर्ष ओर शोक। आनंद हमारी निजी घटना हे। ओर इस निजी घटना को प्राप्त करने के लिए अंतःप्रवेश अनिवार्य रूप से आवश्यक हे।
सुबह हम देख रहे थे, की अंतःप्रवेश कैसे करना हे? अंतःप्रवेश का मतलब; अपने भीतर प्रवेश! अपने भीतर जो गुणो का साम्राज्य हे, जो स्वरूप का आनंद हे, उसमें प्रवेश कर देना।
तो इसके लिए एक रास्ता था, शब्दानुप्रेक्षा, अर्थानुप्रेक्षा, ओर स्वानुभूति। एक सूत्र हमारे सामने था, हम उसकी अर्थानुप्रेक्षा कर रहे थे, हम कर रहे थे अर्थानुप्रेक्षा, की में कर रहा था? हम साथ में थे? अनुप्रेक्षा हमारे साथ-साथ में चल रही थी? की मेरी ही चल रही थी? स्वभाव में ही जाना हे…. ओर इसीलिए, परभाव से मुक्त होना हे। परभाव में जाना ही नहीं। एक जागृति आपके पास चाहिये। आप एसे निमित्तों के बीच बैठे हुए हे, क्षण-क्षण पर आपके लिए परभाव में जाने का द्वार खुल जाएगा, लेकिन आपके पास जागृति होगी, आप परभाव में नहीं जाओगे। खाना खा लिया; कैसा था कैसा नहीं, वो हमें नहीं देखना; सोचना भी नहीं हे। पर का उपयोग कर लिया, उसके बारे में सोचना नहीं। आपके वहाँ भी यही नीति तो आ गई हे, यूस एन्ड थ्रो। यही बात हमारे वहाँ हे। उपयोग किया; बात को मन से निकाल दो। ये जो जागृति हे, वो जागृति कैसे आ गई? आपके मन ये बात तो जच गई, की परभाव में नहीं जाना हे, ठीक हे ना? मेरे बात से संमत हे ना आप सब? स्वभाव में जाना हे, परभाव में नहीं जाना हे। आप परभाव में क्यू जाते हो? कैसे जाया जा सकता हे, परभाव में? जागृति शिथिल हो जाती हे, और आप परभाव में जाते हे; ओर जागृति तीव्र हो जाएगी, तीक्ष्ण हो जाएगी, परभाव में जाने का द्वार बंध हो गया! अब जागृति को कैसे अक्षुन्य रखे? ये जो जागृति हे ना, वो मोहनीयकर्म के क्षयोपशम से आती हे, तो जागृति के लिए मोहनीय का क्षयोपशम जरूरी हे। पहले दर्शनमोहनीय का, फिर चारित्रमोहनीय का आएगा। अब मोहनीय का क्षयोपशम हम कैसे करे? बिलकुल सरल बाते प्रभुने बतलाई हे! अभी तक आपने क्यू नहीं की, मुझे आश्चर्य होता हे! आपको आश्चर्य होता हे? इतनी सरल बाते हे परभाव मे नहीं जाना हे, इसके लिए जागृति रखनी हे, जागृति के लिए मोहनीय का क्षयोपशम करना हे। अब आप कहेंगे, मोहनीय का क्षयोपशम कैसे होगा? वो भी बहुत सरल हे, मोहनीय का क्षयोपशम करना कोई जटिल बात नहीं हे; बहुत ही सरल बात हे। प्रभु की आज्ञा के प्रति पूर्ण आदर, प्रभु के आज्ञा के पालकों के प्रति पूर्ण आदर, ये मोहनीय कर्म के क्षयोपशम के लिए बहुत ही सुंदर माध्यम हे। ये बहुत ही सुंदर मार्ग हे, प्रभु की आज्ञा का पालन संपूर्णतया में भी नहीं कर सकता हूँ, आप भी नहीं कर सकते हे; लेकिन मेरे पास प्रभु की आज्ञा के प्रति पूर्ण आदर होना चाहिये; एक भी आज्ञा का पालन में नहीं कर सकता हूँ, उसके लिए मेरे आँखों से आँसू बहने चाहिये। ये कैसी निर्मलता हे मेरी, ये प्रभु की आज्ञा हे, ओर में इन्हे पाल सकता हूँ! तो शक्य आज्ञा का पालन, अशक्य आज्ञा के लिए आदर, ओर जो भी महात्मा, साधक प्रभु की आज्ञा को पूर्णतया पालन कर रहे हे, उनके प्रति हमारा पूर्ण आदर। एसा होने से क्या होगा? अहंकार तिरोहित हो जाएगा। में तो कुछ भी नहीं कर सकता हूँ! मेरे पास तो कोई साधना भी नहीं हे! देखो तो ये महात्मा कितनी साधना करते हे!
संसार में क्या होता हे मे आपको बताऊँ- दस सदस्यों का फेमिली हे, हर एक को पूछो के दूसरे जो नौ हे, उनके माइनस पॉइन्ट क्या हे? आप कहेंगे, ये क्रोधी हे, ये अहंकारी हे, क्योंकि आपने इस ओर ही चिंतन किया हे। ये, इसमें तो ये हे; इसमें तो ये हे, इसमें तो ये हे; तेरे में क्या हे, वो तो देख! आपके वहाँ ये बात हे की दस सदस्यों का फेमिली हे तो हर एक को अपने से अलावा जो नौ हे, उनके माइनस पॉइन्ट का क्या है। साधक वो हे, जिसके पास पाँच का वृंद हो, दस का वृंद हो, अप्पन से बिना जो चार हे, या नौ हे, उनमें से एक-एक में कितने प्लस पॉइन्ट हे, उसका उसे ख्याल होना चाहिये। हमारे पास साधु का वृंद होगा, साध्वीजीओ का वृंद होगा फिर क्या होगा, बोलो तो? पाँच वृंद हे, साध्वीजीओ का पांचों पाँच से आप पुछ ले, तो अन्य चार की प्रशंसा ही होगी। तो यहाँ जाना हे हमें, दूसरे साधकों की जो साधना हे, उस साधना के प्रति हम नतशिर हो जाये। मोहनीय का क्षयोपशम ये रहा। बोलो कोई जटिल बात हे इसमें? एसा नहीं कहा की प्रभु की सब आज्ञा का पालन तुम्हें करना ही होगा, तब तो आप कह दोंगे, महाराज सा! सब आज्ञा का पालन नहीं होता हे। अरे में भी नहीं करता हूँ। नहीं कर सकता हूँ। मेरी शरीर की भी निर्बलता हे, मेरे मन की भी निर्बलता हे। में प्रभु की सब आज्ञा का पालन नहीं कर सकता हूँ। लेकिन मेरे पास प्रभु की आज्ञा के प्रति पूर्ण आदर तो चाहिये ही, उसके बिना नहीं चल सकता। तो बोलो, इसमें कोई तर्क बाते हे, बिलकुल सरल हे ना? आज से शुरू? मोहनीय कर्म का क्षयोपशम, उसके आगे जागृति, जागृति से परभाव के द्वार बंध; ओर स्वानुभूति ओर यात्रा चालु! कितना सरल हे यह!
आज ही एक साधक मेरे पास आये थे, बहोत ही पुराने परिचित थे, मैंने उनसे कहाँ, की आप कही भी जाते है ना, तो आपको पूछा जाता हे, आप क्या स्वाध्याय कर रहे हो? क्या चल रहा हे स्वाध्याय मे? लेकिन में कभी नहीं पूछूँगा की स्वाध्याय में क्या चल रहा हे? में यही पूछूँगा की अनुभूति कहाँ तक पहुँची? स्वाध्याय तो कारण हे, अनुभूति कार्य हे। स्वाध्याय किया, अनुभूति कितनी पेदा हुई? अनुभूति कितनी प्राप्त हुई? तो चलो, भूतकाल गया सो गया; में उसकी चर्चा नहीं करूंगा। अब आप निश्चित हे? आज से ही हम स्वानुभूति के पथ पर चढ़ जायेंगे। मैंने जो बताया, कोई तप नहीं हे, प्रभुने कितनी तो करुणा बरसाई हे!
आपको प्रभु की करुणा का स्पर्श कभी होता हे? हम तो जब सुबह उठते हे, तो इस रजोहरण को शिर पर लगाते हे, तो हमारी आंखे नम हो जाती हे। ओर हमारे आँख के आँसू प्रभु से कहते हे की प्रभु मेरी कोई सज्जता नहीं, मेरी कोई पात्रता नहीं, ओर तूने तेरा वरदान दे दिया! प्रभु कैसी तेरी कृपा! आपको प्रभु की करुणा का स्पर्श एसे होता हे? सो उठे 5 बजे साडे पाँच बजे, सामायिक करना हे, प्रतिक्रमण करना हे, चरवला ओर मुहपती हाथ में आ गया, आपकी आंखे कभी नम होती हे कभी? ये प्रभु का प्रसाद मुझे मिल गया! आपकी आंखे तो ज्यादा भीगी होनी चाहिये। प्रभुने एसा नहीं कहा, की जो संसार को छोड़ दे, उनको ही में मेरे धर्म संघ में स्थान दूँगा, जीसको संसार में रहना हे, भोगविलास के कीचड़ में रहना हे, उसको मेरे धर्म संघ में स्थान कैसा?! एसा प्रभुने नहीं कहा! आपको भी, श्रावक ओर श्राविका को भी, प्रभुने अपने धर्म संघ में स्थान दे दिया! तो आपकी आंखे अब नम हो जानी चाहिये। चरवला हाथ में आया, ओहो प्रभु का वरदान मुझे मिल गया! तो ये जो भीगापन जो हे ना, मोहनीय कर्म कहा ठीक पाएगा? बोलो तो? सिर्फ भीगापन चाहिये, सिर्फ अहोभाव चाहिये। आज तो लगता हे ना, की सरलतम बात हे यह? तो आज से चालु, की जब मिलोगे तब में क्या पूछूँगा? फिर से एबीसीडी शुरू तो नहीं करनी होगी ना, आपके लिए?
परभाव में नहीं जाना हे, उसके लिए जागृति रखनी हे, और जागृति के लिए मोहनीय का क्षयोपशम करना हे। तो एक मार्ग तो ये रहा स्वाध्याय से स्वानुभूति।
दूसरा मार्ग हे, भक्ति से स्वानुभूति। उसके भी तीन चरण हे, अहोभाव, राग-द्वेष अहंकार की शिथिलता, ओर स्वानुभूति। आप साधक नहीं हे। स्वाध्याय नहीं करते हे, कोई बाध नहीं, भक्ति से करो आदि, भक्ति से भी आप स्वानुभूति को प्राप्त कर सकते हो। तो भक्तियात्रा में तीन चरण हे, अहोभाव पहला चरण, राग-द्वेष अहंकार की शिथिलता ये दूसरा चरण, ओर स्वानुभूति तीसरा चरण। अहोभाव! प्रभु का दर्शन करेंगे क्या होगा? आँखों से आँसू बह जायेंगे। मुझे कई लोग पूछते हे, की गुरुदेव आप तो कहते प्रवचन में की प्रभु को जब भी देखते है हम, हमारी आँखों से आँसू बरस जाते हे, लेकिन हमारे लिए एसा क्यू नहीं होता हे? तब में कहता हूँ, की दर्शन की प्रक्रिया को भी आपने रूटिंग स्तर पर ले लिया हे। दर्शन की क्रिया, भक्ति की यह अपूर्व क्रिया, रूटिंग के स्तर पर जाएगी, भाव कहाँ से उठेगा? भूख नहीं हे, खाना खा लिया, क्या भाव आएगा?
तो अब दर्शन कैसे करने चाहिये? कोई भी क्रिया कैसे करनी चाहिये? हमारी भारतीय परंपरा में शिवसूत्र एक बडा योग ग्रंथ हे, पार्वतिजी ने प्रश्न पूछे हे, ओर महादेवजी ने उनके उत्तर दिए हे। एक प्रश्न में पार्वतिजी पूछती हे, के प्रभु योगमार्ग में जाना हे, भक्तिमार्गमें ओर साधनामार्ग में जाना हे, प्रवेश द्वार कौनसा हे? ओर उस समय महादेवजी एक छोटा सा लेकिन सुंदर – सुंदर रीत देते हे- ” विस्मयो योगभूमिकाः।” विस्मय – आश्चर्य; यही योग का, साधना का भक्ति का प्रवेश द्वार हे! प्रभु के पास आप गए, कभी आश्चर्य हुआ? ये प्रभु?! भक्तियोगाचार्य भगवंत भी जिनके दर्शन के लिए तरसते हे, वैसे प्रभु मेरे सामने हे, क्या सचमुच?! कभी आश्चर्य हुआ? उठे, मंदिर गए, घर पर आये… आश्चर्य! एसे प्रभु मुझे मिल गए हे! अभि तलहटी पर तो जाना हे, प्रवचन के बाद, लेकिन चलो जाकर आये, थोड़ा चलेंगे तो भूख भी अच्छी लगेगी! लेकिन ये भावना होगी, की तलहटी तो बहुतबार गए, इस बार गुरुदेव के साथ जाना हे; ओर एक एक पथ पर यही विचारणा, यही आश्चर्य, तीन भुवन में जिसकी कोई उपमा नहीं, तुलना नहीं, एसा तीर्थ हमें मिल गया हे! एसा गिरिराज हमें मिल गया हे! हम झालोरी भवन के ओर से तो उस गिरिराज के आंदोलनों को पकड़ते थे, लेकिन अब गुरुदेव के साथ गीरीराज के पास जाते हे, ओर फिर गिरिराज के कण-कण से जो आंदोलन बह रहे हे, उनको हम पकड़ेंगे! ये भाव… ‘विस्मयो योगभूमिकाः।’
मेरे जीवन की एक घटना में कहू, उस समय मेरी उम्र 20 बर्ष की होगी, आबू देलवाडा जाने का हुआ, मेरी जिंदगी में पहलीबार, में आबू देलवाडा जा रहा था। बहोत ही आनंद था। देलवाडा के उपाश्रय में सुबह आठ बजे पहुँच गए, विहार करके, और मुझे ये ख्याल था, की सुबह 12 बजे तक विजिटर एलाउड नहीं हे; हम भक्त गण ही प्रवेश कर सकते हे, शाम को भी 6 के बाद हम भक्ति कर सकते हे। तो मैंने मेरे शिष्यों को कहा, की मेरी नवकारशी तुम ला दो, में दर्शन करके आता हूँ, ओर फिर हम सब मंदिर में जायेंगे ओर 12 बजे तक डटकर भक्ति करेंगे। मुझे दवाई लेनी थी, दूध ओर चाय मुझे लेने का था, शिष्यों को एकसना था, तो में गया, ओर उनको भी था, की गुरुदेव पाँच-दस मिनट में आ जायेंगे। वे दूध चाय लेकर आ गए। मेरे हालत एसे हो गए, पहला मंदिर विमलवसही, वहाँ गया, ओर प्रदक्षिणा देने की तो होती हे, प्रदक्षिणा पथ में मे घूम रहा था, एक-एक देवकुलिका में इतने सुंदर अप्रतिम रूपवाले परमात्मा, मेरे पैर ठिठक गए, चले ही नहीं! उखाड़ उखाड़ करके दूसरे देवकुलीका पर जाऊ, वहाँ भी एसे अप्रतिम रूपवाले परमात्मा, मेरे पैर फिर ठिठक जाये! एक प्रदक्षिणा पथ पुरा करने में मुझे आधा घंटा लग गया! फिर मैंने चैत्यवंदना आदि क्रिया की, में उपाश्रय में गया, उन लोगो ने कहाँ खो गए थे तुम? मैंने कहा में तो नहीं खो गया था, लेकिन प्रभु मुझे मुक्त करे तब आऊ ना? ये विस्मय; ये क्या एसा रूप!
मानतूँगाचार्य भी प्रभु के इस रूप के ऊपर पागल हो गए थे। प्रभु एसा रूप दुनिया में कही भी नहीं हे! एसा शांतरस से छलकता हुआ रूप, संसार में कही भी एसा रूप नहीं हे! विस्मय के बाद, एसे दर्शन आप कर सकते हे। क्या विस्मय कोई बड़ी बात हे? आश्चर्य! एक सामायिक करनी हे, ये चरवला मेरे पास आ गया! में सामायिक की अमृत क्रिया करूंगा! ये मुहपत्ति मेरे पास आ गई! में कितना बड़भागी हूँ! आश्चर्य!
तो पहला चरण हे, अहोभाव। आश्चर्य से अहोभाव होता हे, बिना आश्चर्य अहोभाव नहीं पेदा होता। आश्चर्य हो गया, फिर तो इतना अहोभाव, इतना अहोभाव, आँखों से आँसू बहने लगेंगे, बहने ही लगेंगे। ओर उस समय जो प्रभु का दर्शन होगा, वो आत्यन्तिक दर्शन होगा। आँखों से आँसू बह रहे हे, इन आँखों से आप प्रभु के रूप को नहीं देख रहे हे; ओर तब भीतर की आँखों से प्रभु को देखेंगे। आखिर ये बाहर की आँखों से तो प्रभु कैसे दिखेंगे? हमारी बाहर की आंखे तो आउटर स्पेस को देखने के लिए हे। इनर स्पेश को देखने के लिए, प्रभु को देखने के लिए, दूसरी आंखे चाहिये, श्रद्धा की आँख! ओर वही श्रद्धा की आँख प्रभु खुद देते हे! चक्खुदयाणं! नमुत्थुणं मे अप्पन बोलते हे, श्रद्धा रूपी चक्षु प्रभु देते हे।
प्रभु कैसे देंगे? यह बहोत बड़ी अच्छी बात हे, वहाँ परमचेतना ओर गुरुचेतना को एकाकार कर दिया हे। हमारे वहाँ एक क्रम हे, गुरु व्यक्ति, गुरु चेतना, ओर परम चेतना। आप जिसे गुरु व्यक्ति की तरफ पहुँचाते हो, आपकी तरफ गुरु व्यक्ति हे; आप बॉडी से उनसे पहुँचाते हो, आप फेस से उनसे पहुँचाते हो, लेकिन गुरु की तरफ क्या हे? गुरु की तरफ सिर्फ परमात्मा ही हे। गुरु का हृदय वैकन्ट हो गया हे, विभाव शून्य हो गया हे, ओर उस विभाव शून्यता में परम चेतना का प्रवेश हो गया हे। तो आप जिसे गुरु व्यक्ति कहते हे, आपकी ओर गुरु व्यक्ति हे, उनकी ओर गुरु चेतना। ओर फिर गुरु चेतना ओर परम चेतना एकाकार हुई होयी घटना हे। क्योंकि परमचेतना ही गुरु में अवतरित हुई हे। ओर इसलिए मे कहता हूँ, कोई गुरु के पास आप बैठोगे, वो ही सुगंध आपको मिलेगी, एक ही सुगंध! क्योंकि सुगंध गुरु व्यक्ति की नहीं हे, गुरु चेतना की हे। ओर गुरु चेतना ओर परम चेतना एक हे।
तो चक्खुदयाणं। प्रभु श्रद्धा रूपी नेत्र देते हे, गुरु के द्वारा देते हे; गुरु तुम्हारी आँख को खोल देते हे, बिना गुरु, प्रभु का दर्शन कैसे होता? बिना गुरु, मूर्ति का दर्शन हो सकता हे। गुरु के बिना प्रभु का दर्शन नहीं होता। जैसे विस्मय भी चाहिये, दर्शन के लिए, एसे गुरु भी चाहिये। सद्गुरु शक्तिपात करेंगे, कल दोपहर को यहाँ शक्तिपात की घटना होगी। सद्गुरु शक्तिपात करेंगे, आपको महसूस होगा, की शक्तिपात क्या हे? आप फ़ील करेंगे, शक्तिपात का मतलब यही हे, की सद्गुरु ने वर्षों से जो साधना अर्जित की हे, वो साधना की सीधी ही सीधी आप में उंडेल देंगे। साधना के द्वारा अर्जित की गई शक्ति, उस शक्ति को सद्गुरु आपको दे देंगे; उसे शक्तिपात कहते हे। आपके पास सिर्फ receptivity होनी चाहिये। अहोभाव से भरे भरे आपके हृदय; बस आपका काम पुरा हो गया; हमारा काम शुरू हो गया। आपको इतना तो करना ही हे, अहोभाव से भरा-भरा ह्रदय हो आपका, बस शक्तिपात के लिए आप अधिकारी हे।
कल में बताऊँगा शक्तिपात कैसे कैसे होता हे? कैसे कैसे गुरुओने कैसा कैसा शक्तिपात शिष्यों के ऊपर किया हे। तो शक्तिपात की एक बड़ी परंपरा अपने वहाँ रही हे, तो बिना गुरु प्रभु का दर्शन नहीं हो सकता। ओर बिना विस्मय भी प्रभु का दर्शन नहीं हो सकता। आप विस्मय को ला दो, सद्गुरु हाजर हे यहाँ, आज शाम को कैसा दर्शन होगा बोलो? आज शाम का दर्शन कैसा होगा? धर्मरूचिविजय स्तवन गाएगा, लेकिन उसके स्तवन के एक शब्द आपके पल्ले नहीं पड़ेंगे क्यू? आप सब सिसकिया पर सिसकिया लेते रहेंगे। पुरा हॉल, पुरा ऑडिटोरियम, सिसकियो से भर जाएगा। शब्द डूब जायेंगे, में तो एसा प्रवचन भी करता हूँ, पुरा ऑडिटोरियम भक्ति की धारा में आकर रड़ता हे, सिसकिया लेता हे, ओर उन सिसकियों पर सवार, मेरे शब्द होते हे! ओर तब मुझे भी मजा आ जाता हे! ये तो रोज बोलने का होता हे, लेकिन एसे दिन जब आते हे, तब मुझे भी मजा आ जाता हे।
अहोभाव पहला चरण, अहोभाव की भी अपनी परंपरा हे, अहोभाव तो आपको सरलता से मिल गया। परसों गिरिराज की यात्रा करेंगे, कैसे यात्रा करेंगे? मौन में जाना हे, प्रभु के पास, ओर प्रभु से कहना हे, प्रभु तेरी साधना को करके में आया हूँ, ओर जो साधना मैंने की तेरी कृपा से की हे; तेरे चरणों में उस साधना का पुष्प मुझे समर्पित करना हे। परसों दादा के पास सिर्फ अपनी साधना को समर्पित करने के लिए जाना हे। इरीयासमिति पूर्वक आप चलते जाओगे आप, नीची आंखे रखकर, मौनपूर्वक, ओर प्रभु जो आनंद देगा ना; आपको लगेगा की वाह! प्रभु क्या बरस रहे हे!
हमारे युग के श्रेष्ठ साधक ऋषभदासजी ने एकबार कहा था, ऋषभदासजी चेन्नई में ही रहते थे, तो ऋषभदासजी ने कहा था, की एक खमासमण में प्रभु को देता हूँ, ओर प्रभु इतना आनंद मेरे पर बरसाते हे, की मुझे चिंता होती हे की मेरा यह हृदय, छोटा सा हृदय, इस आनंद की वर्षा को झेल पाएगा की नहीं झेल पाएगा? एक खमासमण! तुम एक खमासमण दोंगे, प्रभु इतना आनंद बरसाएंगे, आपकी कल्पना के भी बाहर होगा! आप यात्रा करोगे एसे, आपको लगेगा की क्या प्रभु बरस रहे हे! क्योंकि प्रभु तो बरस ही रहे थे। ओर बरस ही रहे हे। लेकिन आपके पास पात्रता नहीं हे। बिना पात्र, हम वर्षा को कैसे झीले? पात्र ही नहीं हे तो? आज पात्र आ गया हे साधना का, उस साधना के पात्र में आप प्रभु की कृपा की वर्षा को, आनंद की वर्षा को झेल पाएंगे। अहोभाव हमारे पास हे, बरोबर? तो पहला चरण अहोभाव।
दूसरा चरण हे राग-द्वेष आदि की शिथिलता, ओर देखो! कैसी सुंदर परंपरा अप्पन को मिलि! अहोभाव हमारी परंपरा से मिला हमे, हमारा कुछ भी योगदान इसमे नहीं होता हे। हमारा एक साल का बच्चा होगा ना, तो भी महाराज साहेब को देखकर झुक जाता हे! मंदिर में जाता हे तो झुक जाता हे! ये परंपरा जन्म से उसे मिलि हे, हमें भी जन्म से ही यह परंपरा मिलि हे। तो अहोभाव पर हमारा कोई कर्तृत्व नहीं हे, परंपरा ने हमने अहोभाव दिया हे, ओर परंपरा प्रभु से ही आई हे, तो अहोभाव पर भी प्रभु का ही कर्तृत्व हे। अब अहोभाव मिल गया, तो राग, द्वेष अहंकार शिथिल हो ही जायेंगे। तुम्हारे मन में 24 घंटों प्रभु के प्रति अहोभाव ही अहोभाव हे, ओहो प्रभुने मुझे इतना दिया। एक साधु बैठा होगा आसन पर, सोचता हे, ओहो! प्रभुने एसा सुंदर स्वाध्याय दिया! प्रभुने एसी अच्छी क्रियाए मुझे दी! प्रभुने एसा एसा मुझ पर किया! एक अहोभाव की धारा 24 घंटो चलेगी। तो जब अहोभाव की धारा चलेगी तब राग, द्वेष, अहंकार हो सकेंगे? तब प्रभु पर ही राग हे उस समय, उस समय दूसरे पदार्थों पर राग कैसे होगा? दूसरे व्यक्तिओ पर राग कैसे होगा? अपने शरीर पर भी राग कैसे होगा? राग नहीं हे, तो द्वेष भी नहीं हे, अहंकार भी नहीं हे।
एक स्तवनाकारने एक सुंदर बात कही हे, प्रभु के साथ संवाद किया, ओर प्रभु के साथ संवाद करते हुए कहते हे, की प्रभु! मेरे भ्रमण के लिए तो 14 राजलोक हे। तुझे तो सिद्धशीला के ऊपर जाकर बैठ जाने का है; फिर कहते हे, मेरे पास तीन गुण हे, में गुणधारी हूँ, आप निर्गुण हे। हम लोक कभी समझते नहीं, कभी तो स्तवन की पंक्ति को बदल देते हे, अरे प्रभु निर्गुण कैसे? ओर हम गुणवान कैसे? नहीं बात सही हे, सत्व, रजस, ओर तमस गुण की बात हे। तो प्रभु के पास एक भी गुण नहीं हे यह, रजो गुण यानि के राग। तमो गुण यानि के द्वेष, ओर सत्व गुण का क्या अर्थ हे? अच्छे कार्य करने से जो अहंकार पेदा होता हे, उसे सत्व गुण कहते हे। तो हमारे वहाँ भी कहाँ गया हे, की रजो गुण ओर तमो गुण को काटना सरल हे, लेकिन सत्व को काटना, निकालना थोड़ा दुर्गम हे। तो प्रभु गुणो से अतित हे, हम तीन गुणवाले हे। फिर आगे बढ़े स्तवनाकार, प्रभु तुझ से में बडा, में तुझ से बडा हूँ! अब एक तो बात हो गई 14 राजलोकवाली; यह बात दूसरी- की में गुणवान हूँ, तु निर्गुण हे।
और तीसरी जो बात कहते हे, अद्भुत! वो कहते हे, ‘तुज सरीखों मारे महाराजा’ प्रभु मेरे शिर पर तेरे जैसा स्वामी हे, मालिक हे, तेरे शिर पर कौन हे, बता दो? में तुझ से बडा हूँ! अंत में तो शरणागति स्वीकारनी हे, तो शरणागति स्वीकार लेते हे। लेकिन कैसी सुंदर बात कही! तो अहोभाव की इस धारा में अहंकार करना हे ना, तो अहंकार यही करना हे, की प्रभु जैसे मालिक मुझे मिल गए! आप क्या अहंकार करते हे? राग का ओर गुणो का अहंकार करते हे, ये मेरे पास हे, ये मेरे पास हे, तेरे पास कुछ नहीं हे। तेरे पास कुछ रहनेवाला भी नहीं हे। तु अकेला ही जाएगा यहाँ से, मेरे पास प्रभु हे! मेरे पास सद्गुरु हे! रख़ोने अहंकार, कौन मना करता हे! बड़े अहंकारी हो जाओ, चलो, में छूट देता हु, अहंकारी बन जाओ, लेकिन इस बात पर – प्रभु मुझे मिले हे, सद्गुरु मुझे मिले हे।
अहोभाव की धारा में राग, द्वेष ओर अहंकार खत्म होते हे, शिथिल होते हे, ओर तीसरा चरण आ गया स्वानुभूति! परभाव में जाने का द्वार बंध हो गया, स्व का द्वार खुला हो गया! तो दोनों प्रक्रिया आपको बताई, एक में जागृति महत्वपूर्ण हे, ओर जागृति के लिए मोहनीय का क्षयोपशम। स्वाध्यायवाली परंपरा, ओर भक्तिवाली परंपरा में अहोभाव ही मुख्य हे। आप अहोभाव को पकड़ लोगे, तो भक्तिधारा में जाकर स्वानुभूति को प्राप्त कर लेंगे, आप साधक की धारा में जायेंगे, जागृति को पकड़कर स्वानुभूति में जायेंगे। ओर इसलिए में बार-बार कहता हूँ, की एक भक्त की ओर साधक की व्याख्या क्या हो सकती हे? जिसके पास क्षण-क्षण प्रभु का सुमिरन हे, वो भक्त हे, ओर जिसके पास क्षण क्षण की जागृति हे वो साधक। हम साधक बने तो भी ठीक हे, भक्त बने तो भी ठीक हे। लेकिन स्वानुभूति को प्राप्त करनी ही हे। अभी तलहटी पर इसलिए ही जाना हे, अनंत सिद्धात्माओ से प्रार्थना करने के लिए के प्रभु! आप अकेले सिद्धशीला पर बैठ गए, मुझे क्यू भूल गए! कभी प्रभु से कहाँ तुमने? एक बच्चा माँ से कया कहेगा? माँ तु एर-कंडीशन रूम में हे, तेरा बच्चा धूप से जूलस रहा हे! कहाँ प्रभु से? प्रभु तु सिद्धशीला पर प्रतिष्ठित हो गया, ओर में संसार में जूलस रहा हूँ, पीड़ित हो रहा हूँ, ये कैसे बन सकता हे! आज प्रभु के साथ अनंत सिद्धात्माओ के साथ ये बात करने के लिए जाना हे, की आपने सिद्धशीला, ये गिरिराज पर आकर सिद्धशीला को प्राप्त कर ली। एसा वरदान दो आज की हम भी इस गिरिराज की ऊर्जा को प्राप्त कर सिद्धशीला को प्राप्त कर ले।
