Maun Dhyan Sadhana Shibir 10 – Vachana – 8

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વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત

Subject: सूत्रानुप्रेक्षा, अर्थानुप्रेक्षा, अनुभूति

आंतरयात्रा ही एसी यात्रा है, जिसमे जीवन का आनंद है। बहिर्यात्रा में घटनाएँ कभी आपको रतिमें ले जाती है, तो कभी अरतिमें। आंतरयात्रा हमें घटनाओं से अप्रभावित बनाती है। आंतरयात्रा में हम प्रविष्ट हो गये, फिर घटना सिर्फ घटना है; तुम बस तुम हो। घटनाओं से तुम्हारा संबंध नही बनता और तुम अपने निजी आनंदमें रह सकते हो।

आंतरयात्रा के मोटे तौर पर तीन चरण हैं: अंतर्मुख दशा, अंत:प्रवेश दशा ओर अंतर्लीन दशा। अंतर्मुख दशा में जाने के लिए दो मार्ग हैं: भक्त का मार्ग और साधक का मार्ग। भक्त के मार्ग में चार चरण हैं: रूप परमात्मा के प्रति अहोभाव, शब्द परमात्मा के प्रति अहोभाव, वेश परमात्मा के प्रति अहोभाव ओर अनुष्ठान परमात्मा के प्रति अहोभाव।

मंदिर में आप जाते हैं; रूप परमात्मा के सान्निध्य में आप हैं। अत्यंत अहोभावपूर्वक, आँखों में आँसू के साथ, रोमांच से प्रभु का दर्शन हो। दूसरे चरण में शब्द परमात्मा के प्रति अहोभाव। आपका conscious mind दूर हो जाए और अस्तित्व के स्तर पर आप प्रभु के शब्दों को सुनें। प्रभु के वेश के प्रति भी आप संमोहित हो और प्रभु के अनुष्ठानो के प्रति भी संमोहन हो। यह है अंतर्मुख बनने के लिए भक्त का मार्ग।

મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ પાલીતાણા વાચના –

आंतरयात्रा के प्रवचन में हम आगे बढ़ रहे हे या, आंतरयात्रा में ही हे? यदि मेरे साथ-साथ चलना हे, तो सिर्फ शब्दों में डुबना नहीं हे, अनुभूति तक जाना हे। अंतर्मुख दशा यदि प्राप्त हो गई तो ही अंतः प्रवेश हो सकेगा, अंतः प्रवेश का अर्थ हे, अपने गुणानुभूति का स्पर्श, या अपनी स्वरूपानुभूति का स्पर्श। क्षमा हमारा गुण हे, वीतरागदशा हमारा गुण हे। कोई भी गुण का स्पर्श; अंतः प्रवेश। निर्मल,अलिप्त ओर अखंड हमारा स्वरूप हे। उस स्वरूप का आंशिक अनुभवन, आंशिक स्पर्श अंतः प्रवेश होगा। बड़भागी हे हम की प्रभु ने एसी साधना दी हे, व्यवहार-निश्चयात्मक की तुम जहाँ खड़े हो, वहाँ से चलकर स्वानुभूति को प्राप्त कर सकते हो। व्यवहार से निश्चय तक जाने की हमारी साधना हे। दूसरे शब्दों में कहे तो शुभ से शुद्ध की ओर जाने की हमारी यात्रा हे। शुभ कारण हे, शुद्ध कार्य हे। जैसे की स्वाध्याय हमने लिया, परमात्मा के प्यारे प्यारे शब्द पढ़ लिए, या सुन लिए, स्वाध्याय हुआ। ये स्वाध्याय शुभ की घटना हे। इन शब्दों पर आपने चिंतन किया, thinking किया, अनुप्रेक्षा की, तो वो भी शुभ ही हे। लेकिन उन शब्दों में जो अनुभूति की बात थी, वो अनुभूति आपको स्पर्श हो गई, तो आप शुद्ध की दुनिया में चले गए।

 तो हमारे वहाँ एक क्रम हे- स्वाध्याय से स्वानुभूति का सुत्रानुप्रेक्षा, अर्थानुप्रेक्षा ओर स्वानुभूति। तीन ही चरण हे। सुत्रानुप्रेक्षा, प्रभुने दिया हुआ कोई भी प्यारा प्यारा सूत्र ले, ले, ओर उसका अध्ययन करे, पहला चरण सुत्रानुप्रेक्षा। में आपको बताऊँ, श्रीपाल रास में महोपाध्याय यशोविजय महाराज को पूछा गया की 45 आगम ग्रंथों में फैली हुई प्रभु की आज्ञा का सार क्या हे? साधक ने पूछा, गुरुदेव! में कब 45 आगमों को सुनूँगा, गुरुदेव के मुख से? कितने साल लग जायेंगे? लेकिन मेरी इच्छा हे, की 45 आगमों में प्रभु की जो आज्ञा फैली हुई हे, उसका सार मुझे मिल जाये। उपाध्याय यशोविजय महाराज ने श्रीपाल रास में वो सार दिया, गुजराती भाषा में हे, ‘आतम भावे स्थिर होजो, परभावे मत राचो रे’ 45 आगमों में प्रभु की जो आज्ञा फैली हुई हे, उसका सार इतना ही हे। ‘आतम भावे स्थिर होजो, परभावे मत राचो रे’ आत्म भाव में स्थिर होना हे, परभाव में नही जाना हे। अब हम ये क्रम से चलेंगे। 

पहला चरण सुत्रानुप्रेक्षा। 

तो हम इस साधना सूत्र पर थोड़ा विचार करेंगे। क्या कहाँ महोपाध्यायजीने? आत्मभाव में स्थिर होना हे, ओर परभाव में नहीं जाना हे। परभाव से हट जाना हे। शब्दार्थ हो गया, ये सुत्रानुप्रेक्षा। 

दूसरा चरण हे, अर्थानुप्रेक्षा। अब एसा चिंतन करना हे, की जो चिंतन अनुभूति कगार पर हमको लाकर खड़ा कर दे। अब ये चिंतन कैसे होगा? में आपको दिखाऊँ। “स्वभाव में जाना हे, परभाव में नहीं जाना हे।” तो दो सूत्र में कार्य-कारणभाव कैसे हुआ? परभाव में नहीं जाना हे, ये कारण हुआ; स्वभाव में जाना हे, वो कार्य हुआ। तो परभाव से हट जायेंगे हम, स्वभाव में पहुँच जायेंगे। एक मार्ग तो ये हुआ। दूसरा मार्ग ये हे, की मोहनीय का क्षयोपशम आपका तीव्र हे, ओर स्वभाव के आनंद की आंशिक अनुभूति आपको हो गई, तो परभाव छूट जाएगा। या तो स्व से परभाव को त्याग करो, या परभाव का त्याग करके स्व में जाओ। 

दूसरी बात, शब्द कौन से हे? परभाव में मत जाना हे, पर में मत जाना एसा नहीं कहते, एसे महापुरुष जब शब्द देते हे ना, तब एक-एक शब्द के भीतर उतरने का होता हे। पर में नहीं जाना एसा नहीं कहाँ हे। परपदार्थों का उपयोग नहीं करना एसा नहीं कहाँ हे। लेकिन परपदार्थों का उपयोग तुम करो तब, परभाव में नहीं जाना। परभाव का मतलब हुआ, राग, द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार। शरीर हमारे पास हे, अनिवार्य परपदार्थों की हमें भी आवश्यकता होगी। तो परपदार्थों को यूस करने की, प्रभु की कोई मना नहीं हे। एक साधक को अनिवार्य लगे, की अब खाना ही पड़ेगा, ओर भोजन से में एसी शक्ति में प्राप्त करूंगा की में साधना में आगे चलूँ तो वो भोजन भी कर सकता हे। रोटी ओर दाल का उपयोग कर सकता हे, लेकिन रोटी ओर दाल अच्छी हे, एसा राग नहीं कर सकता। बोलो? कितनी सरल साधना दी हे, बोलो तो? मैंने कल भी तो किया था- आप चार बार चाय पीओ, प्रभु की कोई मना नहीं हे, मेरी भी मना नहीं हे हो, सुधीरभाई की मना हे, मेरी मना नहीं हे। आप चार बार चाय पीओ, ठीक हे, चाय पी ली, बात पुरी हो गई। लेकिन चाय पीते समय ये चाय टेस्टी हे या अनटेस्टी हे, ये विचार आपने किया तो प्रभु के आप अपराधी हो गए। प्रभु की आज्ञा हे, “परभाव में नहीं जाना हे।” आप परभाव में गए। 

प्रेमसूरी दादा एकबार विहार में थे। दादा के साथ 50-60 साधु भगवंतों कायम रहते। दादा उनकी  शिक्षा देते, बहोत बडा वर्क शॉप प्रेमसुरीदादाने चलाया था, श्रमण भगवंतों के लिए। एक गाँव में प्रेमसूरि दादा पधारे, लोग तो भाविक होते ही हे। आपके पास जो अहोभाव हे ना, बहुत बड़ी मूल्यवान घटना हे। अहोभाव को कभी कम नहीं समझना, अहोभाव से ही आप शुद्ध को प्राप्त करलेंगे। लोग भक्तिवाले थे। गोचरी आ गई, दोपहर की, लगभग साधु भगवंतों को एकासणा था। एकासणे के लिए सब बैठे हे, ओर व्यवस्था एसी होती हे, सब साधु भगवंत बिराजमान हुए हे, उनको गोचरी दी भी गई हे, लेकिन जब तक गुरु की आज्ञा न मिले तब तक वे भोजन शुरू नहीं कर सकते। गुरु को पूछते हे की गुरुदेव! में भिक्षा शुरू करू? में भोजन शुरू करू? गुरुदेव आज्ञा दे, तभी गोचरी शुरू हो सकती हे। तो सब को भिक्षा दे दी गई हे। 

प्रेमसूरि दादा पधारे, उनके ह्रदय में करुणा का भाव आया, उनको हुआ की ये मेरे साधु ये प्रभु के शासन के साधु एकासना रोज करते हे, विहार करते हे, स्वाध्याय करते हे, लेकिन यह रोटी आज जो आई हुई हे, उसमें उनको आसक्ति तो नहीं हो जाएगी ना? क्या गुरु की करुणा होती हे बोलो! रोटी ओर दाल ही हे, या थोड़ी सब्जी हे। लेकिन खाने में आसक्ति नहीं हो जाएगी? तो प्रेमसूरि दादाने कहाँ, गोचरी बाद में शुरू करनी हे, पहले में एक प्रश्न आपको पूछता हूँ? कर्मग्रंथ का एक गहन प्रश्न गुरुदेव ने पूछा, तो प्रश्न बहोत गहन था। एसे कोई उत्तर मिलनेवाला नहीं था। तो गुरुदेवने कहाँ ये प्रश्न हे, अब भोजन शुरू करो, अब ये प्रश्न का उत्तर मेरे पास कौन जल्दी लेकर आता हे, वो में देखता हूँ। अब क्या होगा बोलो तो…? मैंने कहा था ना की division पड़ जाएगा; division पड़ गया। शरीर भोजन ले रहा हे ओर मन कर्मग्रंथ के प्रश्न में हे। आपको कभी एसा हुआ? division पाड़ दो ना! 

एक सरदारजी महेसाणा के स्टेशन पे खड़े थे। अहमदाबाद जाने का था। टिकट भी ले लिया था। बैठे थे, एक गाड़ी आई, दिल्ली जानेवाली, किसी से पूछा की कहाँ जा रही हे? वो भी उतावली में होगा, कहाँ की अहमदाबाद जा रही हे, सरदारजी तो बैठ गए, दिल्लीवाली गाड़ी में, नीचे की एक बर्थ थी, उसमें बिस्तर-विस्तर जमा दिया; अपना काम हो गया, फिर अगल-बगल में देखा, ऊपर की बर्थ पर भी एक सरदारजी हे। बहोत बडा मजा आ गया। तो नीचेवालों ने पूछा की अरे ओजी कहाँ जा रहे हो? ऊपरवाला तो दिल्ली जा रहा था। गाड़ी भी दिल्ली जा रही हे। तो ऊपरवाले ने कहा में तो दिल्ली जा रहा हूँ। तो नीचेवाले ने कहाँ, देखो तो, विज्ञान कितनी तरक्की कर गया हे! ये नीचेवाली बर्थ तो अहमदाबाद जाती हे, और ऊपरवाली…… ! 

विज्ञान ने इतनी तरक्की नहीं की हे, लेकिन आप कर सकते हो। शरीर भोजन लेता हे, मन किसी शुभभाव में डूबा हुआ हे। एक स्तवन की पंक्ति ले लो। भोजन शुरू हुआ, स्तवन भी शुरू हो गया। शरीर भोजन करेगा, मन कहाँ रहेगा? स्तवन में।  

में बहोत बार कहता हूँ, एक बच्चा टीवी का शोखीन हे, क्रिकेट का भी बडा शोखीन हे, टीवी पर मेच देख रहा हे। 12 बज गए हे, ओर उसका प्रिय खेलाडी 96 पर पहुँच गया हे, अब एक फोर लगा दे, सेंचुरी उसकी हो जाये। सेंचुरी तो उसकी होगी, आनंद इस बच्चेको होगा। तुम एसी अनुमोदना करते हो ना? संसार में करते हो या यहाँ करते हो साधना की? संसार में अनुमोदना कैसे होगी? पडोंशी जो हे, वो करोड़ रूपिए कमा गया, आपकी अनुमोदना हे ना? वहाँ ईर्ष्या हे! पर आपका स्कूल मेट, बेंच मेट दीक्षा लेकर गया हे, वहाँ सिर्फ अनुमोदना, ईर्ष्या नहीं हे! फरक पड़ा? क्यू? ईर्ष्या कब होती हे? एक वस्तु चाहिये, मिलती नहीं हे, ओर जब मिलती नहीं हे, तब जलन होती हे, उस जलन का नाम ईर्ष्या हे। पैसे चाहिये, ओर नहीं मिलते हे तो जिसको मिल गया हे, इसके पर जलन होगी। दीक्षा चाहिये? दीक्षा नहीं चाहिये, दीक्षा किसीको मिल गई, अनुमोदना कर ली, ईर्ष्या नहीं हुई। फरक पड़ गया ना? तो बच्चा टीवी देख रहा हे। मम्मा ने कहा, में कहाँ तक रसोई घर को संभालूँ, तुम भोजन कर लो, वो बच्चा उठेगा? मम्मा ने देख लिया, बच्चा उठनेवाला नहीं हे। रोटी, दाल, सब्जी परोसकर थाली में रख दिया, बच्चा ने खा भी लिया, हाथ धो भी दिया, फिर उस बच्चे को पूछो, आज सब्जी कौन सी थी? क्या कहेगा बच्चा? मम्मा को पूछो, मुझे ख्याल नहीं हे। मुझे तो आप पूछो की कौन से क्रिकेटर का कितना स्कोर था, में वो कह दूँ। आपकी हालत एसी नहीं हो सकती? आज क्या भोजन कर के आये? नास्ते में क्या था? वेईटर को पूछो भाई मुझे ख्याल नहीं हे। नहीं होता एसा?! टीवी के सामने बैठा हुआ बच्चा, क्रिकेट का शोखीन बच्चा, वो भी दाल, शाक ओर रोटी को भूल सकता हे; क्या खाया वो उसको याद नहीं हे। औरआपको याद होता हे, उसका मतलब क्या हुआ? हमें तो आंतरयात्रा में जाना हे, ओर आंतरयात्रा में जाना हे तो बहिर्यात्रा टोटली छोड़ देना पड़ेगा। बहिर्यात्रा ओर आंतरयात्रा दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते। 

तो हम सुत्रानुप्रेक्षा, अर्थानुप्रेक्षा ओर अनुभूति के क्रम पर चल रहे हे। अब अर्थानुप्रेक्षा कर रहे हे की, परभाव से हट जाव एसा कहाँ हे। पर से हट जाओ, एसा नहीं लिखा हे। पर के प्रति तनिक राग भी न हो, तनिक द्वेष भी न हो। पदार्थ पदार्थ हे, आप क्यू स्टिकर लगाते हो, ये अच्छा! ये बुरा! कितने स्टिकर हे आप के पास? बोलो तो… कितने स्टिकर्स हे आपके पास? ओर आदमी भी अच्छा लगेगा या बुरा लगेगा? अब में पुछु आप से? कौन सा आदमी अच्छा? आपकी अच्छेपन की या बुरे पन की व्याख्या क्या हे? आपकी व्याख्या क्या है में कह दू? जो व्यक्ति मेरे अहंकार को सपोर्ट करे, वो अच्छा आदमी! ओर जो मेरे अहंकार को खत्म कर दे, वो बुरा आदमी। यही बात हे ना? में बहोत बार हँसता हूँ, की क्या तुम दुनिया के केन्द्रबिंदु हो? की तुम्हारे अनुसार मनुष्य जाती को विभक्त किया जाये? ये अच्छे, ये बुरा! 

मे बहोत बार एक बात कहता हूँ, आप अभी सुन लो-” सभी प्राणी, मनुष्य ही नही, सभी प्राणी अच्छे ही हे, बुरा यदि कोई हे तो में एक हूँ” एसी मान्यता अनुभूति के स्तर पर जब तक न हो, तब तक प्रभु का शासन नहीं मिला।  फिर से, “सभी प्राणी अच्छे ही हे, बुरा संसार में कोई भी हे, तो केवल मैं ही हूँ।” “केवल यशोविजय ही बुरा हे। बाकी सब के सब अच्छे हे।” ओर एसी मान्यता मेरे पास न हो, तो मैं भी प्रभु शासन में प्रविष्ट नहीं हुआ हूँ। प्रभुशासन में प्रवेश ने के लिए ये पहली ओर अंतिम शर्त हे। ओर मेरी द्रष्टि से ये प्रायश्चित हे। प्रायश्चित इसलिए की अनंत जन्मों में आपने क्या किया? मैंने भी क्या किया? मैं महान हूँ, I am the greatest; ओर दूसरे सब निकंमे हे। यही बात अनगिनत जन्मों में हमने की। जहाँ जहाँ हमारा मन रहा, जहाँ जहाँ, वो संज्ञावासित मन था, संज्ञावासित मन की एक ही चाल थी; में ही अच्छा हूँ बाकी सब बुरे। अब इसका शीर्षासन करना होगा, तभी प्रायश्चित होगा। मैं ही बुरा हूँ, बाकी सब अच्छे हे। प्रभुशासन में प्रवेशने के लिए ये कंडीशन हे। आप इस कंडीशन का पालन जब तक न करे, प्रभु के शासन में आपका प्रवेश नहीं हो सकता हे। 

दशवैकालिक सूत्र में भगवान सुधर्मास्वामी ने कहाँ की ‘तु सब प्राणीओ का मित्र हो जा।’ शिष्य ने पूछा गुरुदेव! में बन जाऊँ, लेकिन इसके लिए टेकनीक कया हे? विधि क्या हे? तो गुरु ने बहुत ही सुंदर टेकनीक बताई ‘सम्मं भूयाइं पासओ’ तु सम्यग् रूप से सभी प्राणीओ को देख। अभी तक हमने क्या किया हे?  सम्यग् रूप से किसी ओर को नहीं देखा हे। अपनी जात को भी नहीं देखा हे! अपने में दोष थे, वो भी गुण होकर हमारे सामने आये हे। दूसरों में गुण थे, वो भी दोष होकर हमारे सामने आये। न तो हमने दूसरों को देखा, न तो हमारी जात को देखा। तो सुधर्मास्वामी भगवान कहते हे, ‘सम्मं भूयाइं पासओ’ तु सम्यग् रूप से सभी प्राणीओ को देख। आपको देखना हे बोलो? अभी तक आपने असम्यग् रूप से ही सभी को देखा हे, आज सम्यग् रूप से देखना हे? इसके लिए विधि यही हे, की सभी आत्माए सिद्धात्माए हे। बुरा हो तो एक सिर्फ मैं ही हूँ। दूसरों के गुण आप देख लो अपने दोष देख लो; प्रायश्चित हो गया। अभी तक दूसरों के दोष देखे हे। अपने गुण देखे हे। अब प्रायश्चित्त, शीर्षासन दूसरों के गुण देख लो। अपने दोष देख लो। सभी आत्माए सिद्धात्मा हे। 

एसा होगा कभी? कोई अंकल आपसे कह रहे हे कुछ बिलकुल रफ भाषा में, आप सुन भी न सके एसी भाषा में, ओर आपको याद आ जाये की ‘नमो सिद्धाणं’ ये बोलने वाला तो सिद्ध भगवान हे! फिर आप उसके पैरों में पड़ जायेंगे! वो भी आश्चर्यचकित हो जाएगा, अरे क्या हुआ? उसकी आंखे लाल होनी चाहिये थी, मेरे पैरों में पड़ गया! भैया क्या हुआ? आप सिद्ध भगवान हे, में आपको नमस्कार करता हूँ! क्यू नहीं बनता हे एसा, बोलो तो? 

आपने सुना हे एसा, जितनी भी बार सुना होगा, लेकिन ये बात अनुभूति में क्यू नहीं आई? अनुभूति में वो ही बात जाएगी, जिस पर अनुप्रेक्षा आपने द्रढ रूप से की हो। अभी तक अनुप्रेक्षा प्रभु के शब्दों पर कितनी हुई बोलो तो? मे समझ लूँ ज्ञानसार आपको नहीं आता हे, प्रशमरति आपने नहीं पढ़ी हे, में समझ रहा हूँ, कोई बात नहीं। लेकिन कितने प्रवचन आपने सुने हे, प्रवचन आप सुनते हे ना, एक बात करते हे, एक पंक्ति उसमें से खुल गई, एक ही पंक्ति, दूसरी नहीं, एक ही पंक्ति, जैसे हम यहाँ चुन सकते हे, आत्मभाव में स्थिर होना हे, परभाव में नहीं जाना हे; बस इतनी ही पंक्ति चुननी हे। प्रवचन सुन लिया पुरा, एक घंटे का, लेकिन एक पंक्ति हमें note down करनी हे। फिर सारा दिन उस पर अनुप्रेक्षा करो। परभाव में नहीं जाना हे, परभाव में नहीं जाना हे। स्वभाव में जाना तो थोड़ा दूर भी हे लेकिन परभाव में नहीं जाना, वो तो सरल हे। में खा भी सकता हूँ, पी भी सकता हूँ, अच्छे वस्त्र पहन भी सकता हु, लेकिन उसमें राग मेरा न हो, द्वेष मेरा न हो, ये जागृति मेरे पास होनी चाहिये, ओर ये जागृति आ गई, परभाव में आप नहीं जायेंगे। लेकिन एसी अनुप्रेक्षा आपके पास नहीं हे! जो भी काम शुरू करो, पंक्ति चुन लो बस सिर्फ; ज्यादा नहीं। पुरा प्रवचन याद रखने की कोई आवश्यकता नहीं हे। मे तो बहोत बार मेरे प्रवचन में कहता हूँ, में बहोत फ्लेक्सीबल आदमी हूँ, यहाँ तो शिबीर हे, ओर हमारे सुधीरभाई बहोत स्ट्रीक हे। लेकिन में तो एसा आदमी हूँ, अंतिम दस मिनिट में कोई आ गया, अरे कोई नहीं, आ जाओ। दस मिनिट भी दे देंगे। एक वाक्य सुन लो, काम हो गया तुम्हारा! अर्थानुप्रेक्षा की ओर आपकी द्रष्टी नहीं हे। 

तो तीन चरण – सुत्रानुप्रेक्षा, अर्थानुप्रेक्षा ओर अनुभूति। लेकिन अनुप्रेक्षा में एक बात समझना, अनुप्रेक्षा एसी करनी हे जो अनुभूति की कगार पर हमें लाकर रख दे। जो अनुप्रेक्षा अनुभूति की ओर नहीं जाती, उस अनुप्रेक्षा का कोई अर्थ नहीं हे। एक वक्त मेरे सामने बौद्धिक वृंद था,  लेखक थे, वक्ता थे, चिंतक थे, संगोष्ठी चल रही थी। तो संगोष्ठी में उन्होंने पूछा, की हम साधना में कहा अटक रहे हे? मैंने देखा, बहोत बड़े लेखक थे, चिंतक भी थे, प्रवक्ता भी अच्छे थे, तो मैंने कहा, तुम अनुप्रेक्षा के स्तर पर अटक जाते हो। अनुप्रेक्षा कोई अंतिम स्टेशन नहीं हे। तुम लेखन करते हो, ओहो! एक प्रतिक्रमण शब्द पर हमने 200 पन्ने लिख दिए। लिख दिए तो क्या हुआ? स्वाध्याय किया तुमने। किया क्या? अनुभूति कहाँ हे तुम्हारे पास? तुमने बोल भी दिया, क्या हुआ उससे? तुम्हारे भीतर क्या हुआ? सिर्फ शब्दों के लिखने से, शब्दों के बोलने से या शब्दों पर अनुप्रेक्षा कोरी कोरी हो तो भी कुछ अर्थ नहीं। अनुप्रेक्षा एसी होनी चाहिये, की वो अनुप्रेक्षा अनुभूति तक हमें ले जाये। तो मैंने कहा, तुम सब अनुप्रेक्षा में अटके हुए हो। तुम अनुप्रेक्षा को अंतिम स्टेशन मानते हो। ओहो मैंने तो एक शब्द पर 200 पन्ने लिख दिए! में तो एक शब्द पर एक महिने से बोल रहा हूँ, continue! क्या हुआ? ये तो स्वाध्याय है, अनुप्रेक्षा स्वाध्याय में आता हे। क्यूंकी अनुप्रेक्षा में विचार हे; ओर विचार आप नहीं हे! शब्द तुम नहीं हो! विचार तुम नहीं हो,!अनुभूति ही तुम हो!स्वाध्याय का मतलब क्या? स्व का दर्शन करा देता हे; अनुभूति नहीं। अनुभूति तो ध्यान में ही होगी। कायोत्सर्ग में ही होगी। 

अब हम फिर से सूत्र को देखे, “परभाव में नहीं जाना हे, स्वभाव में जाना हे,” इतनी ही बात हे। बोलो इसको आप सूत्र के रूप में अपने साथ न रख सके? ओर इसमें भी आपको discount दे दूँ। discount दे दू में, वस्तु मुझे बेचनी हे, तो फिर! स्वभाव में जाना हे, वो भी भूल जाओ, परभाव में नहीं जाना हे इतना याद रखो। मुझे परभाव में नहीं जाना हे, खाना खाने के लिए बैठ गए, रोटी खा सकता हूँ, दाल खा सकता हूँ, सब्जी ले सकता हूँ, लेकिन में उसमे राग या द्वेष नहीं कर सकता। 

एक पंडितजी थे, एक दिन उन्होंने एक ग्रंथ लिखना शुरू किया, अब ग्रंथ लिखना शुरू कर दिया, तो पुरा मन ग्रंथ के शब्दो में लग गया; उसके बाद क्या विषय लेना, उसके बाद क्या होगा, उसके बाद क्या करना? उस समय पंडितजी की धर्मपत्नी ने कहा चलो भोजन तैयार हो गया हे, पंडितजी भोजन के लिए बैठ गए। रोटी ओर दाल दो चीज थे, पंडितजी रोटी-दाल खाकर उठ गए, फिर पंडिताईनी बैठी भोजन के लिए, ओर पंडिताईनी को मालूम हुआ की दाल में नमक बिलकुल ही नहीं था। नमक बिलकुल नहीं। पंडिताईनी सोच में पड़ गई, ये क्या? अब उसने सोचा, की अब यह परीक्षा आगे बढाउ। शाम का भोजन, वो ही रोटी ओर दाल, नमक के बिना ही। पंडितजी भोजन करने चले गए। एसा 30 दिन तक हुआ! सुबह ओर शाम दोनों समय रोटी ओर दाल खाने की, ओर दाल में नमक नहीं! 30 दिन हो गए। 

ओर पंडितजी का ग्रंथ पुरा हो गया, एकतीसवे दिन पंडितजी भोजन के लिए बैठे, वो ही दाल नमक के बिना की, ओर रोटी। रोटी का टुकड़ा किया, दाल में डबोया, ओर वो खाने लगे। अरे ये क्या बनाया हे? ये क्या बनाया हे? पत्नी हँसने लगी। आज ट्यूबलाइट हुई! 30 दिनों के बाद! तब पंडितजी ने बहोत अच्छी बात कही, उन्होंने कहा, की 30 दिन तक तो मेरा मन एक ग्रंथ में डूबा हुआ था, यह दाल में कैसे डुबोऊँ? आज मन दाल में डूबा हे, शरीर तो रोज दाल खा जाता था, लेकिन मन डूबता नहीं था; मन ग्रंथ में ही डूबता था। तो 30 दिन तक मेरे पास ग्रंथ था, में ग्रंथ में डूबता था। आज दाल में डूब गया, मेरा मन। तो अब  पता चल गया की नमक नहीं हे। 

आप भी एसा करोगे? हमारे पास कितनी स्तवनाए हे, एक स्तवना लेकर बैठना, चिंतन करना, भोजन के समय मन में स्तवना पर चिंतन करने में कोई दिक्कत नहीं हे। कोई मना नहीं हे। तो एक ही सूत्र अब आपके पास हे, “परभाव में जाना नहीं हे।” तो इसमें भी सूक्ष्मता क्या हे, वो आपको बताऊँ। अशुभ की बाबत हे, तो मालूम हो जाता हे की अशुभ हे; अशुभ में नहीं जाना हे। कभी एसा होता हे, प्रवृत्ति शुभ की, ओर अशुभ का मुखौटा; तब क्या? 

For a example, आपने आज की वाचना सुनी, आपको याद भी रह गई, कोई नहीं आया हुआ था, पूछा आपसे, आप घर पर गए, पूछा, वाचना में क्या आया था? आप शब्दशः शायद वाचना को कह भी दे। अब आपकी अभिव्यक्ति अच्छी हे, ओर अभिव्यक्ति अच्छी हे, तो सुननेवाला बहोत अभिभूत हो जाता हे। ओहो वाह आपकी प्रस्तुति बहोत अच्छी हे! आपने सिर्फ सुना था, लेकिन आप इतनी सुंदर प्रस्तुति कर सकते हे! उसने तो अहोभाव के लय में कहा, अनुमोदना के लय कहाँ, की क्या आपकी शक्ति हे! ओर आपको अहंकार आ गया। आप क्या करेंगे फिर? आपके लिए आपकी जागृति कहती हे, की उसी क्षण आपको बोलने का बंध करना चाहिये। सामनेवाला पुछ भी ले, साहेब क्यू बोलते बंध हो गए? आप कह देंगे, आपको लाभ हो रहा हे, मुझे हानि हो रही हे। में बोलता हूँ, आप कहेंगे, की बहोत अच्छा बोला, मुझे अहंकार आता हे; ओर मेरे भगवान की परमिशन नहीं हे की अहंकार हो, तब भी में बोलू। एसी जागृति आपके पास हे? अहंकार में नहीं जाना हे। 

इसीलिए मैंने कल कहाँ था, साधना का पुरा कर्तृत्व प्रभु पर छोड़ दो। तुम कौन हो साधना करनेवाले वो तो बताओ? हम विषय कषाय के आदि आदमी, अनंत जन्मों से विषय ओर कषाय में पले हुए, हम कैसे साधना करेंगे? प्रभु की कृपा नहीं हे, सद्गुरु के आशीर्वाद नहीं हे; हम कैसे साधना कर सकते हे? इसीलिए तो गुरु के शक्तिपात को में लिफ्ट कहता हूँ। मुंबई में 35 वे माले पे जाना हे, बस लिफ्ट में बैठे, बटन दबा दिया, 35 वे माले पे पहुँच गए। तो यह जो प्रभु की कृपा हे, सद्गुरु की कृपा यह लिफ्ट हे। हमारी साधना को uplifted करनेवाले सिर्फ प्रभु ओर गुरु ही हे; हम नहीं। हम पड़दे के पीछे ही हे। हमें तो सिर्फ अहोभाव से आँसू बहाने हे। सिर्फ आँसू बहाओ, दूसरा कुछ भी नहीं करना हे तुम्हें। मेरे प्रभु ने कितनी मेरे पे कृपा की! 

ओर तभी हेमचंद्राचार्य का वीतरागस्तोत्र का एक वाक्य याद आता हे, ‘त्वमकारणवत्सलः’ (‘त्वम् अहेत्कु वत्सल’) प्रभु मैंने तो कुछ भी नहीं किया! मैंने तुझको कुछ भी नहीं दिया, ओर फिर भी तेरी इतनी कृपा मुज पर! क्यों प्रभु तु इतनी कृपा मेरे पे बरसा रहा हे?! ओर प्रभु की कृपा को झिलते समय आँखों से आँसू बह जायेंगे, की प्रभु! प्रभु! प्रभु! तूने कितना किया? नरक ओर निगोद से इस मनुष्य जन्म में तु मुजे लेकर आया, मनुष्य जन्म में लाकर भी ये साधना की भूमि पर, ये भक्ति की भूमि पर तु मुझे लेकर आया, प्रभु कितना तो तेरा उपकार! अहंकार को मिटाना हे, तो साधना के कर्तृत्व को छोड़ देना पड़ेगा। 

संसार का जो कर्तृत्व हे ना, वो दिख जाता हे, वो दिख जाने पर छूट भी जाता हे। पैसे मिले, आपको ही  मिले, मजदूर मजदूरी करता हे, 200 रूपिए मिलता हे। आप एरकंडीशनर ऑफिस में बैठते हे ओर लाखों रूपिए कमाते हे। कौन कमाता हे? आपका परिश्रम तो हे नहीं कुछ, परिश्रम तो वो बहाता हे, मजदूर। बुद्धि भी आपके पास होगी, इससे ज्यादा आपके मेनेजर के पास ज्यादा होगी। कौन कमाता हे? पुण्य कमाता हे। पुण्य के स्वामी कौन हे? प्रभु हे। नौ तत्वों किन्होंने बतलाये? प्रभु ने तो बतलाये। पुण्य पर भी स्वामित्व प्रभु का हे। आपको पैसे मिले, प्रभु की कृपा से, तो वैभाविक जगत में भी प्रभु पर सब आधिपत्य छोड़ देना हे। ओर साधना के जगत में भी सभी क्रियाओ का आधिपत्य प्रभु पर छोड़ देना हे। प्रभु तूने सब किया! 

ओर इसलिए शक्रस्तव की एक पंक्ति मैंने कल कही थी, ‘गृहाणास्मत्कृतं जपम्’ प्रभु मैंने जप किया, मेरे शरीर ने किया, लेकिन मेरा कर्तृत्व न रह जाये, एसी कृपा कर! कर्तृत्व रह जाएगा तो, साधना तो इतनी हे, अहंकार इतना होगा, फिर होगा क्या? साधना कितनी? इतनी, अहंकार कितना? इतना! मैंने वर्षीतप किया! क्या वर्षीतप किया?! ऋषभदेव दादाने वर्षीतप किया था, पानी भी नहीं, गोचरी भी नहीं। ओर तेरह मास तक निर्जले उपवास। मैंने वर्षीतप किया। पारणे में क्या कहते हो? मेरा वर्षीतप का पारणा हे। शिरा के बिना नहीं चलेगा, रबड़ी के बिना नहीं चलेगा। मेनू होती। सुबह के पारणे में मेनू होती हे, शाम में मेनू होती हे। आहार संज्ञा टूटी आपकी? बोलो तो? 

एक बड़ी अच्छी घटना आपको सुनाऊँ, एक साधु भगवंत गुरुदेव के पास आये, फागुन महिना था, वर्षीतप की हवा चल रही थी। सब वर्षीतप ले रहे थे, तो साधु भगवंत ने गुरु से निवेदन किया गुरुदेव! क्या में भी वर्षीतप ले सकता हूँ? हमारे वहाँ गुरु से पूछे बिना, आप कोई भी साधना नहीं कर सकते। गुरु को पूछा, साहेबजी! क्या में वर्षीतप कर सकता हूँ? तो गुरु ने पूछा, की वर्षीतप की तेरी विभावना क्या हे? तो हम भी समझते हे की वर्षीतप में क्या होता हे? एक उपवास ओर एक बियासणा। लेकिन गुरु पूछते हे तेरी वर्षीतप विभावना क्या हे वो बोल? तेरी वर्षीतप की विभावना में दो उपवास के बीच एक बियासणा आता हे? या दो बियासणा के बीच एक उपवास आता हे? क्या आता हे? कैसे गुरु पकड़ते हे बात? दो उपवास के बीच बियासणा आता हे, या दो बियासणा के बीच उपवास आता हे? आज बियासणा करो ठाठ से, सुबह खाया, शाम भी डटकर खा जायेंगे, ओर फिर परसों खाना ही हे, बीच में ठीक हे, एक उपवास हो जाये, तो पेट भी अच्छा हो जाये। तो दो बियासणा के बीच एक उपवास हे या दो उपवास के बीच बियासणा हे? आज तो उपवास हे, कितना उपवास का मजा होता हे! ओर कल ठीक हे, सिर्फ शरीर को टिकाने के लिए में कुछ खा लूँगा, ओर परसों मजा आएगा, उपवास का! हुआ हे कभी एसा वर्षीतप? वर्षीतप तो करते हो लेकिन कैसा? 

उपवास, उपवास का मतलब क्या हे? बोलो तो? नजदीक रहना; प्रभु से नजदीक रहना वो उपवास। साधक की भाषा में कहे तो स्व से नजदीक रहना वो उपवास। बाहर की जंजट ताल गई, खाने की जंजट टल गई; प्रभु के पास, स्व के पास। तो एक फिलोसॉफर ने बहुत ही सुंदर उपवास की व्याख्या की थी, उन्होंने कहा, की जिस दिन खाने की याद भी न आये, वो उपवास! खाने की याद न आये! इतने तुम डूब गए हो भक्ति में, इतने स्वाध्याय में, याद भी नहीं, खाया की नहीं खाया? खाने की याद भी न आये, वो उपवास! ओर आज हमारे बीच एसे परम संत हे, जिनको तुम दिन में, पाँच दफे खाना दे दो, खा लेंगे, उनको ख्याल नहीं हे, की दो घंटे पहले मैंने खाया। शरीरबोध ही निकल गया उनका! ओर पाँच दिन तक खाना नहीं दोंगे, ख्याल भी नहीं हे, की मैंने नहीं खाया हे। देहाध्यास से ऊपर उठ गए हे। हमे भी देहाध्यास से ऊपर उठना हे। शरीर खाए हमें कोई दिक्कत नहीं हे। लेकिन तुम खाओ तो? ये बडा अपराध हे प्रभु का! अब कौन खाएगा? अब भोजन कौन करेगा? तुम करोगे या शरीर करेगा? आज तो समय नहीं हे अभी, दोपहर को बात करूंगा, भोजन का शास्त्र भी सीखने जैसा हे। ये तो बात ठीक ही हे की परभाव में नहीं जाना हे, लेकिन परभाव में जाव, न जाव तो भी भोजन का पुरा शास्त्र साधना के संदर्भ में सीखने जैसा हे। दोपहर को समय रहेगा तो बात करेंगे। अभी थोड़ा प्रेक्टिकल कर ले।

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