Maun Dhyan Sadhana Shibir 10 – Vachana – 7

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વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત

Subject: अंतःप्रवेश दशा

आंतरयात्रा का दूसरा चरण है अंतःप्रवेश दशा; जहाँ आप अपने स्वरूप को आंशिक स्तर पर छू लेते हैं। यह अंतः प्रवेश कैसे हो? उसके लिए हमारी साधना पद्धति को समज़ना पड़ेगा। प्रभुने जो साधना फरमाई है ना, वह निश्चय-व्यवहारात्मक है। व्यवहार से शुरू होती है ओर निश्चय में उसका पर्यवसन होता है। व्यवहार है मार्ग, निश्चय है मंजिल। राग, द्वेष, ओर अहंकार की शिथिलता – यह प्रभु की साधना का मार्ग है। और मंज़िल है स्वरूपानुसंधान; स्वानुभूति।

आपकी हर एक व्यवहार क्रिया के साथ परिणाम जुड़ना चाहिए। प्रभु के दर्शन के समय प्रभु के उपकारों को याद कर अहोभाव से ह्रदय भर जाए और आंखे नम हो जाए, ऐसा अहोभाव के स्तर पर जो दर्शन है, वह शुभ के स्तर का दर्शन है। हमें शुभ के स्तर में अटकना नहीं है। आज हमारी साधना में यह ही कमी है की हम शुभ के स्तर पर अटक जाते हैं।

हमें शुभ में अटकना नहीं है, शुद्ध में जाना है। शुद्ध में आप जाए, वह ही है अंतः प्रवेश। प्रभु की वीतराग दशा और प्रशमरस का दर्शन किया, फिर अनुप्रेक्षा हुई की भले ही वीतराग भाव मेरे पास प्रगट नहीं है अभी, लेकिन सत्तारूप से मेरे पास भी वीतराग भाव है। अनुप्रेक्षा करते करते थोड़ी सी उस दशा की अनुभूति हो जाए, तो यह हुआ अंतःप्रवेश!

મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ પાલીતાણા વાચના – ૭

आंतरयात्रा में जाना हे, आंतरयात्रा की बाते भी इतनी मीठी लगती हे, तो वो पथ तो कितना सुहावना होगा! आंतरयात्रा आनंद ही आनंद; केवल आनंद। 

पहला चरण अंतर्मुख दशा। साधक का मार्ग हे,अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने का, ‘परसंग त्याग’ ओर इसी कड़ी में हम आनंदघनजी भगवंत के एक पद पर स्वाध्याय कर रहे हे। ‘ना हम शब्दा, ना हम मनसा, ना हम तनकी धरणी, ना हम वेश, वेशधर नाही, ना हम कर्ता करणी’ हम कर्ता भी नहीं हे, ओर कार्य भी नहीं हे। न तो विभावों के प्रति हमारा कर्तृत्व हे, न तो साधनाओ के प्रति हमारा कर्तृत्व हे, यदि साधना जगत के कर्ता तुम हो जाओगे, अहंकार से भर जाओगे, मैंने यह साधना की! इसलिए शक्रस्तव के अंत में एक सुंदर पंक्ति आति हे, ‘गृहाणास्मत्कृतं जपम्’ प्रभु अभी अभी मैंने जाप किया, लेकिन उस जाप को भी आप स्वीकार कर लो, जाप का कर्तृत्व मेरे पास रह न जाये। हा जपयोग से जो पुण्य हुआ हो, जो निर्जरा हुई हो, वो मेरे पास रहे, कोई दिक्कत नहीं, लेकिन जपयोग का कर्तृत्व मुझे नहीं रखना। एक भी साधना का कर्तृत्व हमें नहीं रखना हे, कर्तृत्व रखोगे, अहंकार आ जाएगा। 

महोपाध्याय यशोविजयजी ने अरनाथ प्रभु की स्तवना में ये हमारी वेदना को मुखरित की हे, उनकी नहीं। शब्द उनके हे, लेकिन वेदना हमारी हे, ओर हमारी वेदनाको उन्होंने मुखरित की हे। उन्होंने लिखा हे प्रभु में संसार में था, तब भी मेरे पास अहंकार था, कर्तृत्व का, मैंने पैसा कमाया, मैंने यह किया, मैंने यह किया, लेकिन संसार को छोड़कर तेरे मार्ग पर प्रभु में आ गया, संयम पथ पर प्रभु में आ गया; फिर भी मेरा कर्तृत्व नहीं छूटता हे, मैंने यह साधना की! प्रभु मेरे इस कर्तृत्व को आप ले लो! नंदिषेण मुनिने अजितशांति स्तव के अंत में यही प्रार्थना की, ‘मम य दिसऊ संजमे नंदिं’, प्रभु तेरी कृपा से ही रत्नत्रयी मिली हे।  ओर तेरी कृपा से ही रत्नत्रयी का आनंद मुझे मिलेगा। 

कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य ने वीतराग स्तोत्र में लिखा, ‘भवत्प्रसादेनैवाहमियतीं प्रापितो भुवम्’ प्रभु आपकी कृपा से ही, में यहाँ तक आया हूँ, ओर यहाँ से मोक्ष तक जाऊंगा, वो भी आप की कृपा से। मुझे लोग बार-बार पूछते हे, की गुरुदेव यह बात तो ठीक हे की प्रभुने साधना दिखलाई, समवसरण में बैठकर प्रभु ने साधना मार्ग प्रकाशित किया, सद्गुरु के देवो के द्वारा हमें ये साधना मार्ग मिला, ठीक ही बात, हम स्वीकार करते हे; लेकिन साधना के करनेवाले तो हम हे ना, उपवास तो हमने किया ना, वर्षितप तो हमने किया ना, तो फिर साधना का पुरा का पुरा कर्तृत्व प्रभु पर क्यों निर्मित हो? आपका भी शायद यही प्रश्न होगा ना? करनेवाले तो हम हे ना? गुरुदेव ने पच्चक्खाण दे दिया, अट्ठम का, अट्ठम किसने किया? मैंने किया! गुरुदेव तो नवकारशी वापरकर आये थे।

तो में कहता हूँ, एक आदमी था, असाध्य दर्द उसे लग गया, इतने वैद्यो के पास वो गया, इतनी सारी दवाए की, लेकिन कुछ भी फर्क नहीं हुआ, दर्द प्रगाढ़ बनता गया, कम नहीं होता गया! थक गया वो, उस समय में एक वैद्य मिला, उस वैद्य ने कहा, मेरी दवाई छ महिने तक तु ले, अखंड रूप से, ओर में जो कहता हूँ, वैसा ही भोजन तु ले, में गेरंटी के साथ कहता हूँ, के तेरा दर्द बिलकुल मीट जाएगा। 

हम भी गेरंटीवाले ही हे हो! हम गेरंटी आपको दे सकते हे, की आप एसी क्रिया, इतने समय पर करोगे, आपका राग खत्म हो जाएगा! आपका द्वेष शिथिल हो जाएगा! आपका अहंकार शिथिल हो जाएगा! हम गेरंटी के साथ, वादे के साथ एसा कह सकते हे! लेकिन बात यह हे की सही सही तौर पर दवाई लेनी चाहिये ओर सही -सही भोजन उपयुक्त होना चाहिये। डायाबीटीस का आदमी हे, डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब की वो दवाई तो उसने ले लि, लेकिन वो कहता हे, साहेब सुबह तो जलेबी चाहिये मुझे, जलेबी के बिना कुछ नास्ते में मजा ही नहीं आता। दोपहर को 3-4 मिठाई चाहिये ज्यादा नहीं, शाम को एक मिठाई खाऊँगा, ज्यादा नहीं; डॉक्टर शिर पटकता हे, फिर मेरी दवाई से क्या होगा? हम वादा देने के लिए तैयार हे, जैसा हम कहे वैसी दवाई आप लो, अर्थात् वैसी साधना करो। ओर हम कहे, वैसा उपयुक्त एटमॉसफियर में आप रहो, तो हम गेरंटी कार्ड दे देंगे की इतने साल के बाद आपकी साधना यहाँ पहुँच जाएगी। 

उस वैद्य ने कहा छ महिने तक मेरी दवाई ले ओर भोजन भी इतना ही लेने का हे दूसरा कुछ भी नहीं। छ महिने में उसका दर्द समाप्त हो गया! बिलकुल खत्म! छ महिने के बाद एक सुबह नास्ता कर रहा था वो, उसका मित्र आया, मित्र तो उसकी काया को देखकर आश्चर्यचकित हो गया, अरे! तु इतना भला चंगा कैसे हो गया? तु तो दुर्बल था, कितना रोगीष्ठ था, तु इतना रुष्ट-पुष्ट कैसे हो गया? ओर वो क्या कहेगा? मैंने दवाई ली, इसलिए में स्वस्थ हो गया? मैंने एसा भोजन लिया, इसलिए में स्वस्थ हो गया? की वैद्यराज मिल गए, ओर में स्वस्थ हो गया। क्या कहेगा वो? दवाई तो बहोत की पहले, भोजन में भी रूखा-सूखा भोजन बहोत लिया, कुछ नहीं हुआ! इस बार जो हुआ हे, वो वैद्य की कृपा से हुआ हे! यही बात यहाँ हे। आपने अनगिनत जन्मों में साधना की हे, एसा नहीं मानना की पहले दफे आपको प्रभु का शासन मिल रहा हे। ओर पहली दफे आप साधना कर रहे हो। साधना अनगिनत बार आपने की हे। रिजल्ट नहीं मिला, में बार-बार कहता हूँ, मैंने भी संयम अनगिनत बार पहले लिया हुआ हे, लेकिन कुछ गलती हो गई, अभी में संसार में हूँ। आपने भी साधना की हे, लेकिन गलती हो गई आप संसार में हो। क्या गलती हो गई, वो हमें देखना हे। 

मैंने पहले भी इशारा किया था की सद्गुरुयोग जब तक न हो, तब तक साधना का प्रारंभ कैसे हो सकता हे? डॉक्टर ही न हो, ओर मेडिकल ग्रंथो में से आप आके दवाई निकल लेंगे? समझो की आपके पास मेडिकल स्टोर हे तो भी क्या हुआ? दर्द हुआ ओर दवाई ले ली? जाओगे हॉस्पिटल, दवाई वे लेनी हे, जो डॉक्टर ने प्रिस्क्राइब की हे। अभी तक आपने साधना की हे, लेकिन स्वरूचि से की गई हे। हमारे बड़े बड़े प्रतिष्ठित संघों में बुफ़े भोजन निषिद्ध होता हे, लिखा भी हुआ होता हे, की बुफ़े यहाँ निषिद्ध हे। बुफ़े का हिन्दी पर्याय क्या होगा? स्वरूचि भोजन, तो स्वरूचि भोजन, भोजन में से तो निकल गया, साधना घर हो गया। आपकी साधना स्वरूचि हो रही हे ना, आठम हे आज एकासना कर लो ना, नहीं, नहीं आज तो जरा सरदर्द हो रहा हे, बियासणा कर लूँ, गरम गरम चाय तो पी ले। आपकी जो साधना हे, वो स्वरूचि से हो रही हे या सद्गुरु की आज्ञा से हो रही हे? तो दवाई आप आपकी इच्छा से नहीं ले सकते हे, ओर साधना आप आपकी इच्छा से कर सकते हे? 

अरणीक मुनि पर गुरुने बाद में शक्तिपात किया हे, वेश्या के घर से आने के बाद, पहले नहीं किया क्यू? गुरु वे थे, अरणीक मुनि वे थे, गुरुने शक्तिपात क्यों नहीं किया? गुरु तैयार थे, अरणीक मुनि तैयार नहीं थे। क्या रह गया, अरणीक मुनि में बाकी? तप था, जप था, साधना थी, लेकिन सेल्फ कॉन्फिडेंस बच गया था, साधना में कर रहा हूँ! गुरु तो केवल साक्षी हे, आज अट्ठम की इच्छा होगी, गुरुदेव अट्ठम का पच्चक्खाण दे दो। गुरु क्या हे? टेप रेकॉर्डर! क्या? तुम बटन दबा दो, ओर पच्चक्खाण दे दे। तो अरणीक मुनि की गलती ये हो गई, वे समझते रहते थे की साधना में कर रहा हूँ, गुरु तो केवल साक्षी हे! बस गाड़ी उँधी पटरी पर चल गई। साधना जगत में कर्ता सद्गुरु हे, प्रभु हे, साक्षी तुम हो। तुम कर्ता बन गए; गुरु को साक्षी बना दिया। कैसे साधना की गाड़ी चलेगी अब? तो अनगिनत जन्मों में यह भूल हुई हे, इस जन्म में क्या करना हे? बोलो…? सद्गुरु समर्पण नहीं हे, साधना कैसी वो तो बताओ मुझे! श्रावक के लिए भी सद्गुरु चाहिये। ओर जो आपके सद्गुरु हे, उनके चरणों में पहुँच जाओ ओर कह दो गुरुदेव! में रोज  4 एक घंटा निकाल सकता हूँ, साधना के लिए, 4 घंटों में मुझे क्या करना चाहिये? आप बता दो, फिर गुरु आपका सीड्यूल बना देंगे। ये 4 घंटों में तुझे ये करना हे। आज से ये गलती दूर कर दो। साधना जगत के कर्ता तुम नहीं हो, कर्ता प्रभु ओर सद्गुरु हे; तुम केवल साक्षी हो। 

अरणीक मुनि कर्ता बन गए, गुरु शक्तिपात नहीं कर सके उन पर। वेश्या के घर से जब लौटे, तब अरणीक मुनि को हुआ यह, की में तो मेरी साधना पर अहंकार रखता था, में इतना बडा साधक हूँ! मेरी साधना तो चूर चूर हो गई क्षण में, ओर इस समय अपनी साधना पर का सेल्फ कॉन्फिडेंस टूट गया। ओर सेल्फ कॉन्फिडेंस  टूट गया, गुरु के पास आये, गुरुने देखा अरे वाह! कर्तृत्व उसका निकल गया हे, ओर शक्तिपात कर दो! शक्तिपात कर दिया! इसलिए तो में कहता हूँ, 99% Grace 1% effort तुम्हारा एक प्रतिशत ही प्रयत्न हे, झुक जाओ गुरु के चरणों में! अभी तक झुके नहीं हो, केन्द्र में, मैं ही हूँ। केन्द्र में दूसरा कुछ हे ही नहीं। केन्द्र में कौन हे? में की गुरु? केन्द्र में कौन हे? 

कबीरजी ने कहा हे, पहले हम थे गुरु नहीं, पहले क्या था? अतितकाल में क्या हुआ? पहले हम थे गुरु नाही, केन्द्र में मै था, तो गुरु कहाँ से आएगा, लेकिन अब क्या हुआ? गुरु की कृपा हुई, प्रभु की कृपा हुई, अब क्या हुआ? “अब गुरु हे, हम नाही।” अब गुरु ही गुरु केन्द्र में हे, प्रभु ही प्रभु केन्द्र हे; हम नाही। हम परिघ में कही चले गए हे। ओर फिर कहते हे, ‘प्रेम गली अति साकरी, तामे दो न समाय’ प्रेम की गली, भक्ति की गली, समर्पण की गली, अति संकरी गली हे, उसमें दो का प्रवेश शक्य ही नहीं हे! या तो तुम रह सकते हो, या तो सद्गुरु रह सकते हे! 

अब बोलो, choice is yours. तुम्हारे केन्द्र में किसको रखना हे? में तो रहा अनंत जन्मों से, क्या मिला? मैंने भी मेरे अहंकार को केन्द्र में रखा था, में भी समझता हूँ, मुझे क्या मिला? नरक ओर निगोद के सिवा मुझे कुछ भी नहीं मिला। केन्द्र में मैं रहेगा, नरक ओर निगोद सामने हे, जीवन के अस्तित्व के केन्द्र में प्रभु ओर सद्गुरु आ जायेंगे, मोक्ष ये रहा! मोक्ष कहाँ दूर हे! मोक्ष बिलकुल नजदीक हे, मोक्ष दूर हे ही नहीं! तुम दूरी बनाकर बैठे हो; मोक्ष दूरी बनाकर नहीं बैठा। मोक्ष तो तुम्हें ही में ही हे! मोक्ष कहाँ दूर हे? नमो सिद्धाणं में तुम आ जाओगे तो वो सिद्धि बाहर से आनेवाली हे? नहीं, तुम्हें ही हे, मोक्ष तुम्हें भरा पड़ा हे। लेकिन तुम मोक्ष से दूर हो। अहंकार से भरे हुए हो, तो अहंकार से भरा हुआ चित्त मोक्ष से दूर हे। अहंकार बिलकुल खत्म हो गया, मोक्ष ये रहा! ‘पहले हम थे गुरु नाही, अब गुरु हे, हम नाही, प्रेम गली अति साँकरी, तामे दो न समाय’ 

तो कर्तृत्व हमारे पास नहीं हे। अब जो कार्य – कर्तृत्व युक्त हे, वो भी हमारे पास नहीं हे, ना हम कर्ता – करणी। कार्य करने की छूट हे, लेकिन कर्तृत्व रखने की छूट नहीं हे। हमारी जिनशासन की परंपरा यही हे, कर्तृत्व मुक्त कार्य! एक करोड़ खर्च कर दिया आपने, संघ निकलवाया, आप संघमाला पहनेंगे, आपके आँख में आँसू होंगे। की प्रभु तूने कृपा की, ओर ये सत्कार्य हो गया। मैंने ये किया, ये अहंकार आपके पास नहीं होगा। प्रभु तेरी कृपा से ये हुआ, सद्गुरुदेव आपकी कृपा से ये हुआ। 

हिन्दी में एक कहावत हे, नेकी कर ओर कुए में डाल। नेकी करने की छूट हे। शुभ कार्य करो ओर फिर कुए में डाल दो, साधना को कभी भी प्रगट नहीं करना चाहिये। साधना गुप्त ही होनी चाहिये। तुम आयंबिल करते हो, एक द्रव्य से करते हो, अच्छी बात हे की करते हो, तो लेकिन यह बात प्रगट करने की नहीं होती हे! क्यू? लोग जान लेंगे, लोग तो प्रशंसा करेंगे, तुम्हारा क्या होगा, वो तो सोचो! तुम्हारा क्या होगा? हा हम इतने बड़े साधक हे! लोग कहेंगे तुम इतने बड़े साधक, ओहो, इतनी लंबी ओली, एक द्रव्य से तुम करते हो! सिर्फ रोटीयां ओर पानी, ओर रोटी में भी नमक नहीं! वाह क्या त्याग हे तुम्हारा! वो तो अनुमोदना से तीर जाएगा, तुम डूब जाओगे! अपनी साधना को कभी भी प्रगट नहीं करना हे। 

शास्त्र में बात आती हे, मुनिराज विहार करते थे, अपने वहाँ साधना पद्धति के दो प्रकार हे, ‘गीयत्थो य विहारो, बीओ गीयत्थणिस्सिओ भणिओ’ (‘एगो गियत्थ विहारो, बीओ गियत्थ निसिओ भणीओ’) एक तो गितार्थ की स्वयं की साधना यात्रा। गितार्थ गुरु अपनी साधना को स्वयं निश्चित कर सकते हे, ओर जो अगितार्थ हे, जो अज्ञानी हे, उसको गुरु की निश्रा में ही साधना करनी चाहिये। स्पष्ट कह दिया, की गितार्थ की स्वयं की साधना, ओर गितार्थ की निश्रा में हुई साधना दो के सिवा कोई साधना तीसरी जिनशासन में नहीं हे। आप तो गितार्थ हे नहीं ना? आप गितार्थ हे? आप गितार्थ की निश्रा में हे? बोलो? आपकी जो साधना हे वो गितार्थ की निश्रा की साधना हे? आपको भी में पुछु? बोलो… आप जो साधना करते हे, आपके गितार्थ गुरु को सूचित करते रहते हे? बताते जाते हे? साहेबजी मैंने इतना किया, में इतना कर रहा हूँ, आगे मुझे क्या करना हे? आप बतलाइए कृपा करके, आप कहते हो ये सब? 

तो वे मुनिराज गितार्थ थे, एकाकी विहार करते थे, उपवास किया, एक गाँव में गए, लोग बुलाने आये, महाराज सा पधारो, वहोरने के लिए, नहीं, बोले, आज उपवास हे। ये महाराज साहेब हे, त्यागी, तपस्वी हे, तिथि तो नहीं हे, लेकिन उपवास कर लिया, दूसरे दिन विहार चालु, दूसरे गाँव में; महाराज साहेब वहोरने के लिए पधारो, बोले आज मेरा उपवास हे, तीसरे दिन उपवास, चोथे दिन उपवास, विहार भी चालु, उपवास भी चालु। क्योंकि मुनिराज का गणित साफ-साफ था जब तक मेरी साधना बिना खाए चल सकती हे, तो में कैसे खाऊँ?  शरीर को भोजन में कब दूँगा? जब मुझे लगेगा की शरीर साधना के लिए अशक्त हो गया हे, तो थोड़ा भोजन दे दूँगा। पेट्रोल खुट गया तो पेट्रोल भर दो गाड़ी में, तुम लोग तो पेट में ठुसते जाते हो। 

एक डॉक्टर ने कहा था, ये जो लोग हे ना सब, वो 50% अपने लिए खाते हे, ओर 50% डॉकटर के लिए खाते हे। ज्यादा न खाए तो ग्लान कैसे होंगे? ओर ग्लान नहीं होंगे तो हमारे पास कैसे आएंगे? मासक्षमण हो गया, 30 वे दिन 30 वे गाँव में महाराज साहेब वहोरने के लिए पधारो, नहीं मेरा उपवास हे। अब किसीको पता तो नहीं होता, हर गाँव अलग-अलग हे, लेकिन एसा हुआ, 30 वा गाँव जो था, उसमें बडा श्रेष्ठी expired हो गया था; उसकी प्रार्थना सभा थी। तो प्रार्थना सभा में सब गाँव से लोग आये, ओर ये 30 के 30 जो गाँव थे, वो एक ही ज्ञाति के थे। तो सब ज्ञातिवाले एककठे हुए हे। ओर महाराज सा सुबह 10 बजे देरासर से उपाश्रय जा रहे थे। लोगों ने देखा, ओर फिर लोगों ने कहा, ओहो ये तो बड़े तपस्वी हे, हमारे वहाँ आये तब भी उपवास था, दूसरे गाँव वाले लोगों ने कहाँ हमारे वहाँ आये तो भी उपवास था। फिर गणित लगाया तो मालूम हुआ, की 30 दिन से तो उनकी विहार यात्रा हमारे गाँव में चल रही हे; ओर हमारे गाँव में एक दिन भी उन्होंने गोचरी नहीं की हे। तो मासक्षमण होगा क्या? जो हमारे गाँव नहीं हे, ओर जो लोग नहीं आये हे, उँन गांवों में क्या हुआ होगा, वो हमें पता नहीं हे, लेकिन हमारे 30 गाँव में तो मुनिराज ने गोचरी नहीं की हे तो मासक्षमण होगा क्या? एसा हो, महाराज साहेब सुन लेते है, शायद की महाराज साहेबको मासक्षमण होगा, ओर शायद कल पारणे का लाभ हमें मिल जाये; एसा महाराज साहेब सुन गए, एकतीसवे दिन सुबह विहार करके चले गए! अपनी साधना को गुप्त रखना हे; कभी प्रगट नहीं होनी देनी हे। लोग अनुमोदना करलेंगे तुम्हारा क्या होगा? तो कर्तृत्व मुक्त कार्य ये जैन शासन की परंपरा हे। 

आनंदघनजी भगवंत ने बहुत अच्छी बात कही, ‘आनंदघन चेतनमय मूरत’ में रूप नहीं, हूँ, रस नहीं हूँ, गंध नहीं हूँ, दर्शन नहीं हूँ, में कार्य नहीं हूँ, में कर्तृत्व नहीं हूँ, में हूँ सिर्फ आनंदघन चैतन्यमय मूरत। परसंग से मुक्ति हो गई। तो पहला चरण था अंतर्मुख दशा। 

अब आंतरयात्रा का दूसरा चरण हे, अंतःप्रवेश दशा। अभी तक तो मुह ही पलटा है आपने। स्वरूपानुसंधान की ओर द्रष्टि लगी हे, की हा ये भी कोई अलग चीज हे, अब तक तो मालूम ही नहीं था, की क्या स्वरूपानुसंधान होता हे? आत्मा क्या होती हे? मालूम ही नहीं था। अब हुआ की नहीं? ये कुछ कुछ बात तो हे। लेकिन दूसरे चरण में क्या होता हे? अंतः प्रवेश, आप अपने स्वरूप को आंशिक स्तर पर भी छू लेते हे। अब अंतः प्रवेश कैसे होगा? अंतः प्रवेश के लिए हमारी साधना को समझनी होगी। निश्चय – व्यवहारात्मक हमारी साधना हे। प्रभुने जो साधना फरमाई हे ना, वो निश्चय व्यवहारात्मक हे। व्यवहार से शुरू होती हे ओर निश्चय में उनका पर्यवसन होता हे। व्यवहार हे मार्ग, निश्चय हे मंजिल। अब समझो आप। मार्ग ही नहीं हे तो मंजिल कैसे मिलेगी? ओर मंजिल ही नहीं हे किसीके पास तो मार्ग का क्या अर्थ रहा?! मार्ग ओर मंजिल दोनों एकमेक से सापेक्ष हे। एक हे तो दूसरा हे, दूसरा हे तो एक हे। अब मार्ग क्या हे? मंजिल क्या हे? मार्ग की बात शास्त्रों ने की, रागद्दोसा लहु विलिज्जंति, तह तह पयट्ठिअव्वं (‘तह तह पयट्ठिअव्वं, राग दोषा विलिज्जंती’) राग, द्वेष, ओर अहंकार की शिथिलता ये प्रभु की साधना का मार्ग हे। मंजिल क्या हे? स्वरूपानुसंधान, स्वानुभूति। 

अब में आपसे पुछु, आप साधना करते चल रहे हे, आपको देखना हे अब, की में मेरे मंजिल की ओर कितना आगे बढ़ रहा हूँ?

में बहोत बार कहता हूँ, की दो तरह के साधक होते हे, एक तो मंजिल को सामने चलकर, रखकर चलनेवाले यात्रिक, ओर दूसरे हे मॉर्निंग वॉकर्स। डॉक्टर ने कहा 5 किलोमीटर चलना हे, ढाई किलोमीटर चले, ढाई किलोमीटर बेक टु होम। तो दो तरह के साधक हुए, एक तो यह हे की मंजिल को सामने रखकर चलते हे। ओर देखते रहते हे की में मार्ग में चल रहा हूँ की नहीं चल रहा हूँ, मेरे राग, द्वेष ओर अहंकार शिथिल हुए? शरीर पर भी राग था, व्यक्ति ऊपर भी राग था, पदार्थ ऊपर भी राग था, उसमें कुछ न्यूनता आई? जीवद्वेष जो मेरे पास था, उसमें कुछ न्यूनता हुई? ओर अहंकार जो मेरा प्रबल था, उसमे शिथिलता आई? वो देख-देखकर आगे बढ़ता हे। ओर एसा नहीं हुआ तो समझता हे, कुछ मार्ग में गरबड़ी हो गई, या मुझमें गरबड़ी हो गई। मार्ग में तो गरबड़ी होती ही नहीं यहाँ, लेकिन आप में जरूर गरबड़ी हे। लेकिन ये कौन सोचेगा? लक्ष्य की ओर जाना हे, लक्ष्य को प्राप्त करना हे, एसा माननेवाला साधक। लेकिन मुझे लगता हे 85% and 90% हम साधना करते हे लेकिन मॉर्निंग वॉकर्स के तरह। इतना कर लिया, अब हो गया। ढाई किलोमीटर चले, ढाई किलोमीटर बेक टु होम; पुरा हो गया काम आज का। एकासणा कर लिया, एक घंटा स्वाध्याय कर लिया, हो गया काम पुरा। अरे पुरा कहाँ हुआ? अभी शुरू भी नहीं हुआ हे! ये तो कहता हे पुरा हो गया! शुरू भी कहाँ हुआ हे? तो मार्ग को मंजिल से जोड़ना हे, मंजिल की ओर जो अप्पन को ले न जाये, उसे मार्ग कैसे कहते हे हम? तो प्रभुने जो मार्ग दिया हे, वो मंजिल की ओर ले जाने वाला हे, गरबड़ी हमारे में हे। की हमारे पास लक्ष्यानुसंधान नहीं हे। 

अब आपके पास लक्ष्यानुसंधान होना चाहिये की मेरा जो स्वरूप हे, वो स्वरूप को मुझे प्राप्त करना हे। सामयिक करनी हे लेकिन समत्व को मुझे प्राप्त करना हे। ओर समत्व की प्राप्ति न हो तो मेरा सामयिक द्रव्य क्रिया हो गया; भाव क्रिया नहीं हुई। प्रतिक्रमण कर लिया, अठारह पापस्थानको का प्रतिक्रमण कर लिया, मिथ्या दुष्कृत दे  दिया। उसमें पाँचवे परिग्रह का नंबर आता हे, परिग्रह बुरा लगता हे? आप बोलते क्या हो? परिग्रह किया हो, परिग्रह करवाया हो, उसकी अनुमोदना की हो उसका मिच्छामि दुक्कडम्। क्या मिच्छामि दुक्कडम्? पैसे एककठे करने हे, बुरा लगता हे? पाप लगता हे आपको? बच्चे के पास करवाते हे, पाप लगता हे? किसी ने कर दिया, आप प्रसन्न होते हे? पाप लगता हे? चलिए ये बात जाने दो, परपरिवाद ये भी पापस्थानक हे – निंदा नहीं करनी। बोलो आपको कभी लगा हे की निंदा करनी पाप हे? 

हमारे युग के श्रेष्ठ गुरुदेव पंन्यास भद्रन्करविजय महाराज  साहेब के पास लोग नमस्कार महामंत्र लेने के लिए आते थे। गुरुदेव ने नमस्कार महामंत्र आत्मसात् किया हे। जिसके पास सिद्धि होती हे, वो ही विनियोग कर सकता हे। विनियोग का अर्थ उसको देना, दूसरों को देना। लेकिन सिद्धि जिसके पास नहीं हे, वो विनियोग नहीं कर सकता। गुरुदेव के पास सिद्धि थी। नवकार महामंत्र उन्हे सिद्ध हो गया है। तो लोग दूर-दूर से उनके पास जाते थे, नमस्कार महामंत्र लेने के लिए, तो तब गुरुदेव एक नियम देते, की मेरे पास से नवकार मंत्र लेना हे तो, एक नियम आपको लेना पड़ेगा। अरे गुरुदेव फरमाइए! आपके पास हम बेंगलुरू से आये हे, चेन्नई से आये हे, सिर्फ नमस्कार महामंत्र लेने के लिए आये हे, इतनी जर्नी करके, हमारी तैयारी हे, आप जो भी नियम देंगे हम पालन करेंगे। ओर तब गुरुदेव कहते हे, की किसी भी साधु-साध्वी की निंदा कभी नहीं करनी! पंचमहाव्रतधारी की निंदा कभी नहीं करनी! वे लोग नियम ले लेते, गुरुदेव नमस्कार महामंत्र दे देते। 

एक दिन पट्टशिष्यने गुरुदेव से पूछा की गुरुदेव! आप दूसरा कोई नियम नहीं देते? दूसरी कोई सोगन्द नहीं देते, एक ही सोगन्द? साधु-साध्वी की निंदा नहीं करनी, क्यू? तो गुरूदेवने ने फरमाया की में उसे नमस्कार महामंत्र दूँगा, ओर नमस्कार महामंत्र में आएगा, ‘नमो लोए सव्वसाहूणं’ लोक में रहे हुए पंचमहाव्रतधारी सर्व साधु-साध्वीओ को मेरा नमन। एक ओर तो साधु-साध्वीओ की निंदा करेगा, ओर दूसरी ओर कहेगा, में सब साधु-साध्वीओ को नमन करता हूँ; उसका नमन कैसे पहुंचेगा? एक ओर तो निंदा करनी हे साधु -साध्वीओ की, दूसरी ओर नमो लोए सव्वसाहूणं बोलना हे, तो मेरा दिया हुआ नमस्कार महामंत्र ही उसके लिए फलीभूत नहीं होगा, लेकिन यह नियम ले लेगा तो नमस्कार महामंत्र उसके लिए फलीभूत होगा। 

में आपसे पूछता हूँ की आपने कोई भी क्रिया के साथ परिणाम को जोड़ा हे? दर्शन प्रभु का किया, आप क्या कहेंगे? प्रभु का दर्शन किया। में प्रभु का दर्शन करके आया। अब बोलो प्रभु का दर्शन का मतलब क्या होता हे? आज आंगी बनाई हुई थी उसका दर्शन? तो आंगी का दर्शन कहते हे। प्रभु की मूर्ति में जो संगे मरमर हे, मार्बल, व्हाइट, या ब्लेक या यलो, तो उस मूर्ति का दर्शन आपने किया? तो हम कहते हे, मूर्ति का दर्शन करके आये। हम क्या कहते हे? प्रभु का दर्शन हम करके आये। तो सोचो तो सही, प्रभु के दर्शन का मतलब क्या होता हे? प्रभु की जो वीतराग दशा हे उसका दर्शन किया? प्रभु के मुख पर जो प्रशम रस हे उसका दर्शन किया? 

भक्तामर स्तोत्र में मानतूँगाचार्य कहते हे, ‘यै: शांतराग रूचिभि परमाणु भिस्त्वं’ प्रभु आपके पास जो प्रशम रूप हे, प्रशम रस हे, संसार में कही भी एसा रूप, एसा रस मैंने नहीं देखा! ये जो प्रशम रस बह रहा हे, प्रभु के मुख कमल से, आपने देखा इसको? आप कैसे कह सकते हे, प्रभु का दर्शन करके हम आये? तो यह व्यवहार ओर निश्चय दोनों एकसाथ खड़े हे। व्यवहार साधना क्या हे? प्रभु के दर्शन समय अहोभाव से ह्रदय भर जाये, आंखे नम हो जाये, ओह मेरे भगवान! की मेरे भगवान ने कितना उपकार किया, नरक ओर निगोद से प्रभु मुझे लेकर यहाँ तक आये! ओहो प्रभु मेरे उपकारी हे! ये अहोभाव के स्तर पर जो दर्शन हे, वो शुभ के स्तर का दर्शन हे। लेकिन हमें शुभ के स्तर में अटकना नहीं हे; बस हमारी साधना में जो कमी हे ना, ये कमी यह हे, की हम शुभ के स्तर पर अटक जाते हे! 

योगीओने कहा हे, साधना मार्ग में रुकावट कहाँ आ गई? जब आदमी रास्ते में घर करके बैठ जाता हे! सीडियों में घर करके बैठ जाता हे, अरे भाई ये तो सीडियाँ हे, मंझील तो ऊपर हे; फर्स्ट फ्लोर ऊपर हे, ऊपर जाना हे। सीडियों में कुछ नहीं हे। लेकिन साधक की साधना में अवरोध ये हे, की वो रास्ते में घर करके बैठ जाता हे, ओहो मंझील आ गई! मंझील कैसे आएगी? नहीं आई मंझील अभि तो। 

तो शुभ में ठहरना नहीं हे, शुभ में अटकना नहीं हे, शुद्ध में जाना हे। शुद्ध में आप गए, वो ही हे अंतः प्रवेश। ये प्रभु की वीतराग दशा की अनुप्रेक्षा हुई, ओर में भी वीतराग हूँ, सत्ता रूप से, वीतराग भाव मेरे पास प्रगट नहीं हे अभी, लेकिन सत्ता रूप से मेरे पास भी वीतराग भाव हे। ओर वो वीतराग दशा कैसी होगी? वैराग्य की साधना से इसकी में थोड़ी सी अनुभूति कर लूँ, ओर थोड़ी सी अनुभूति हो जाये वीतराग दशा की; अंतःप्रवेश होगा! अंत:प्रवेश दशा का मतलब ये हे, आप आपकी भीतरी दुनिया में घुसे। प्रविष्ट हुए, ओर आपके भीतर जो गुणो का संसार हे, उसका बिलकुल सहज, लेकिन आस्वाद हे! आस्वाद हे! ओहो समत्व मेरा गुण हे! अभी तक तो क्या समझते थे, महाराज सा ठीक हे आपके लिए क्रोध नहीं करना, हमारे यहाँ तो क्रोध करना ही पड़ता हे, क्या करे? क्रोध तो करते हो करते हो, तुम्हारा बचाव भी करते हो। मह्रासा, क्या करे, क्रोध करना ही पड़ता हे। करना पड़ता हे? तुम्हारा स्वभाव क्या हे? क्षमा! 

अंतः प्रवेश दशा में अपने गुणो का स्पर्श करना हे, तो कितनी सुंदर साधना प्रभुने दी! व्यवहार-निश्चयात्मक। अब व्यवहार साधना में आये, देखो, राग शिथिल हुआ? द्वेष शिथिल हुआ? अहंकार शिथिल हुआ? अभी आगे बढ़ते जाओ, बढ़ते जाओ, स्वरूपानुसन्धान हो जाएगा। में कौन हूँ, मालूम हो जाएगा। अभी तो हमने लोगों ने ही कहाँ हे, तुम कौन हो? तुम कौन हो? तुम कौन हो, तुमने क्या माना हे? में तो यह शरीर हूँ।  क्या माना हे बोलो? आपका अनुभव क्या हे? शरीर तक ही आपकी अनुभूति सिमटकर रह गई हे। में फलाना फलाना, बात पुरी हो गई। ओर शायद आप बोलेंगे भी, में आनंदघन हूँ। में चैतन्यमय हूँ, लेकिन ये शब्दों की बात हे। शब्दों से कुछ नहीं होता हे। में निर्मल आत्मा हूँ। में निर्मल आत्मा हूँ। ये तोतापाठ से कुछ नहीं होता हे, there should be the experience. 

तो अंतर्मुख दशा में हमारा मुख परावर्तित हो गया, हमारी अपनी दुनिया की ओर, ओहो ये भी दुनिया हे? आनंद से भरी हुई! तो मुझे उसमें जाना हे। बोलो आपको अंतर्मुख दशा मिल गई? हमारी मस्ती का स्पर्श हो गया आपको? हमारे आनंद का स्पर्श हो गया? आपको लग भी गया की, हा! एसा आनंद मुझे प्राप्त करना हे। लगा? की आप जहाँ हो वहाँ शाता में हो? बोलो तो? हे क्या वो तो बोलो? महाराज सा, महाराज सा की जगह पर ठीक हे, में मेरी जगह पर ठीक हूँ। यही बात हे ना? 

बोलो कोई भी आदमी, कोई भी भाग्यशाली संयम ले रहा हे, आपकी अनुमोदना हे ना? आपकी अनुमोदना हे ना? Mba पास हुआ, ग्रेज्युएट बच्चा संयम ले रहा हे, आपकी अनुमोदना हे ना? लेकिन आपकी अनुमोदन कैसी? लुखी-सुखी! हा वो ले रहा हे तो अच्छा हे; लेकिन मुझे नहीं मिला, उसका अफसोस हे आपको?  आपका कोई पडोंशी हो, समझो की आपका स्कूल मेट, बेचमेट, पढ़ने में वो बिलकुल होशियार नहीं था, आप होशियार थे, वो होशियार नहीं था, ओर फिर उसको लाइन मिल गई अच्छी, करोड़ों खरबों रूपिया उसने कमा लिए, एक दिन उसके बंगले मे जाने का हुआ, बँगला अच्छा तो लगता हे, ठीक हे, आप संसारी हो, तो बंगले की अनुमोदना कैसे होती हे? बोलो तो? ओहो इसके पास बडा बँगला हे! मेरे पास नहीं हे! ये होता हे ना? यहा क्या होता हे? ओहो महाराज साहेब मत्थएण वंदामि, आपने दे दिया बहोत अच्छा कर दिया। तो ठीक हमारा एक घर कम हो गया संसार में। क्या बात हे बोलो? अंतःप्रवेश तब ही होगा, जब अंतर्मुख दशा मिलि हुई हो। भीतर झाको, भीतर देखो कैसा आनंद हे भीतर? बाहर तो कुछ नहीं हे। जो हे वो सब भीतर ही हे। 

राबिया के वहाँ एक साधक आया हुआ था, साधक शहर में रहनेवाला था, सूर्योदय का समय, राबिया की झुंपडी जंगल में थी, एसा सूर्योदय बाहर से निकलता हुआ सूर्य, आसपास में पैड, झरने, साधक तो स्तब्ध हो गया! राबिया झोपड़ी के भीतर थी, वो बाहर था, साधक ने बुम लगाई, अरे राबिया! आओ आओ देखो तो, कैसा सूर्योदय हो रहा हे? राबिया ने कहा मेरे भीतर सूरज उग गया हे, अब बाहर के सूरज को देखने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं हे!तो अंतर्मुख दशा मिल जाये, फिर अंतः प्रवेश दशा, ओर फिर अंतर्लीन दशा। अपनी ये सिर्फ शब्दों की यात्रा नहीं समझना, ये वर्क शॉप हे। आपको चलना हे मेरे साथ! तो वाचना के अलावा जो भी समय मिलता हे, ध्यान साधना करो, चिंतन भी करो, अनुप्रेक्षा करो, पूछो आप अपने से की अंतर्मुख दशा पसंद आई हे? या बहिर्मुख दशा में ही आनंद आता हे? बाहर रहना पड़े वो दूसरी बात हे, आप संसार में रहेंगे वो दूसरी बात हे। लेकिन पसंदगी कहाँ पर हे? बहिर्मुख दशा पसंद हे, या अंतर्मुख? तो ये आंतरयात्रा में जाने के लिए अब प्रेक्टिकल कुछ करे।

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