વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત
Subject: अंतर्मुखदशा – परसंगत्याग
जब तक स्वयं परिपूर्णता का बोध आपके पास नहि आएगा, आप परसंगत्याग नहि कर पाएंगे क्योंकि आपको लगेगा कि यह चीज़ मुझे मिलने से में परिपूर्ण होऊँगा या तो यह व्यक्ति मुझे अच्छा कहेगा, तो में परिपूर्ण बनूँगा। जब तक दूसरों की सहायता से परिपूर्ण बनने की आपकी इच्छा है, तब तक परसंगत्याग आप नहीं कर सकते हैं।
ना हम तनकी धरणी। आप शरीर नहीं हो। आप तो ज्योतिर्मय आत्मा हो। Body less experience हो। ना हम वेश, वेशधर नाही। वस्त्र तो पौदगलिक घटना है, आपका उससे क्या सम्बन्ध? शरीर पुद्गल और उसको ढंकने के लिए वस्त्ररूपी पुद्गल। ना हम कर्ता-करणी। न तो वैभाविक जगत का कर्तृत्व तुम्हारे पास है, न तो साधना जगत का कर्तृत्व तुम्हारे पास है! हम कर्ता तो नहीं है, कार्य भी नहीं है।
हम क्या है? आनंदघन चेतनमय मूरत। हम आनंदघन है, चैतन्यमय मूर्ति है हम। पीड़ा क्यों होती है? घटनाओं से कभी भी पीड़ा नहीं आती। घटना के विकल्पों से ही पीड़ा आती है। जब घटना घट ही गई है, तुम कितना भी सोचोगे, घटना बदल जाएगी क्या? नहीं! तो फिर अब क्या करने का है? स्वीकार कर लो और आनंदमें रहो!
મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ – પાલીતાણા વાચના – ૬
आंतरयात्रा, कैसी मधुरी यात्रा हे! संतों के मुख पर आप देखोगे, वह जो आनंद हे, वो आंतरयात्रा हे। भीतरी आनंद छलक रहा हे, आंतरयात्रा का प्रथम चरण अंतर्मुख दशा। साधक का मार्ग हे, अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने का परसंग त्याग।
इकहार्ट बडा फिलोसॉफर हुआ, एक दिन गाँव के बाहर पैड के नीचे बैठा हुआ वो कुछ चिंतन कर रहा हे, समझो की अपने साथ बैठा हे। ओर वहाँ गाँव का एक आदमी आ गया, उसने सोचा अरे ये साहेब तो अकेले बैठे हे, चलो में कंपनी दे दूँ। वो आदमी आया, ओर शिष्टाचार एसी बला हे, की इसे मुक्ति पाना संभव ही नहीं। इच्छा न होने पर भी इकहार्ट को बातचीत पे लगना पड़ा, एक घंटे तक फिसुल की बाते हुई, एक घंटा बाद वो उठा, ओर उसने कहाँ आप अकेले बैठे थे ना, तो मैंने सोचा कंपनी दे दूँ आपको! इकहार्टने उसे तो नहीं कहा कुछ, लेकिन मन में कहा, मेरी कंपनी मेरे साथ लगी हुई थी, तूने तुड़वा दी।
सामाजिक स्तर पर एक नियम हे, two is the company, and three is the crowd. लेकिन साधना के स्तर पर ये नियम अलग हे, साधना के स्तर पर नियम यह हे, one is the company, two is the crowd. हमारे वहाँ संथारापोरसी के सूत्रों में यही बात कही गई हे, one is the company. “एगो मे सासओ अप्पा, नाण-दँसणसंजुओ, सेसा में बाहिरा भावा, सव्वे संजोग लक्खणा।“ में एक हूँ, लेकिन ये कोई दीनता की बात नहीं हे, में अकेला हूँ क्या करू? बात यह हे, की तुम जब अनुभव करते हो की तुम परिपूर्ण हो, तब दूसरों के पास जाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। तो सोचो? दूसरों का संग आपको क्यू चाहिये? क्यू चाहिये बोलो…? आप स्वयं महसूस करते हे, की में अपूर्ण हूँ। ओ आदमी कहेगा की, भला आदमी कहेगा तुम बहोत अच्छे हो, तो मुझे लगेगा की में बहोत अच्छा हूँ। तुम स्वयं परिपूर्ण हो; एसा अनुभव तुम्हारे पास नहीं हे। जिस दिन ये अनुभव आ जाएगा, में स्वयं परिपूर्ण हूँ, अन्य की आवश्यकता ही नहीं हे। हम बैठे हुए होते हे, मजा में। इतना मजा आता हे, beyond the words! परिपूर्णता का अनुभव हो गया! तो परसंग त्याग कैसे होगा? जब तक स्वयं परिपूर्णता का बोध आपके पास नहीं आएगा, आप परसंग त्याग नहीं कर सकेंगे, क्योंकि आपको लगेगा की ये चीज मुझे मिलने से में परिपूर्ण होऊँगा। ये व्यक्ति मुझे अच्छा कहेगा, तो में परिपूर्ण बनूँगा। जब तक दूसरों की सहायता से परिपूर्ण बनने की आपकी इच्छा हे, तब तक परसंग त्याग आप नहीं कर सकते हे। जिस दिन आपको लगेगा, तुम स्वयं परिपूर्ण हों। “अनलहक” “अहं ब्रह्मास्मि” अहं ब्रह्मास्मि, हिन्दू संतोंने पुकारा था। अहं ब्रह्मास्मि; में स्वयं परिपूर्ण हूँ। ओर मनसूर ने कहा था, अनलहक। यही बात थी, शब्द अलग थे। आप स्वयं परिपूर्ण हो। ओर आप जब स्वयं परिपूर्ण होंगे तब सबको आप स्वयं परिपूर्ण के रूप में देखेंगे।
ज्ञानसार के प्रारंभ में महोपाध्याय यशोविजयजी ने लिखा हे, सच्चिदानंद पूर्णेण, पूर्णं जगदवेक्ष्यते । जब तुम परिपूर्ण होंगे, परिपूर्णता का बोध तुम्हारे पास आ गया, सारी सृष्टी परिपूर्ण हे, एसा तुम्हें लगेगा; ओर जब तक तुम अपूर्ण हो, सारी सृष्टी तुम्हारे लिए अपूर्ण हे। ये एसा आदमी हे, ये तो क्रोधी आदमी हे, ये अहंकारी आदमी हे, ये अपरिपूर्णता दूसरों में आपको कैसे महसूस होती हे? आप अपरिपूर्ण हे, इसलिए आप दूसरों में दोष का दर्शन कर सकते हो। जब तक आपकी परिपूर्णता प्राप्त नहीं हुई तब तक यही हालत रहेंगे, ओर जिस दिन आप परिपूर्ण हो जायेंगे, सृष्टी पूरी परिपूर्ण हे।
उपनिषद के ऋषि कहते हे, ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
बहुत ही सुंदर उपनिषद का ये मंत्र हे। ॐ से शुरूआत होती हे, ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं, ये भी परिपूर्ण हे, वो भी परिपूर्ण हे। कही भी अपूर्णता लगती ही नहीं हे ना! अपूर्णता हे ही नहीं! में तो आप सबको सिद्धात्मा के रूप में ही देखता हूँ।
ओर आपकी बात में पुछु अब? नमो सिद्धाणं बोलते हे ना, बोलते है ना? नमुत्थुणं में उसका development आया,’ जे अ अइया सिद्धा, जे अ भविस्संति णा गए काले, संपई अ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि।’ अतितकाल में जो सिद्ध हो गए, उनके प्रति मेरा नमस्कार। वर्तमानकाल में महाविदेह से जो महात्मा सिद्धिपद को प्राप्त कर रहे हे, उनके प्रति मेरा नमस्कार। ओर भविष्य में भी जो सिद्धात्माए होंगे, सबको मेरा नमस्कार। आपसे पुछु में?नमुत्थुणं में तो गणधर भगवंत ने यह कह दिया, आप क्या सोच रहे हो? भूतकाल के अतित के सिद्ध भगवंतों को नमस्कार करना, आपको कोई दिग्गत नहीं हे ना? वर्तमानकाल में महाविदेह से, कोई महात्मा सिद्धि पद को प्राप्त कर रहे हे, आपका नमस्कार हे ना? लेकिन भविष्यमें जो भी सिद्धात्मा होंगे, उन सबको आपका नमस्कार हे? बोलो तो? ये सब कौन हे? भविष्य के सिद्धात्मा, ये जो भविष्य के सिद्धात्मा हे, उन सबको आपका नमस्कार हे?
भीलड़ियाजी में उपधान तप था, संख्या धारणा से ज्यादा हो गई, अब भाइयों को हमारे उपाश्रय में रहने का था, बहनों को माताओ को धर्मशाला के कमरों में रहने का था, कमरा छोटा था, ओर संख्या बढ़ गई, आराधकों की, एक-एक कमरे में दस-दस साधकों को, माताओ को मेनेजमेंट ने रख दिया, अब छोटा सा कमरा, दस साधक रात को सोये कैसे? शियाला के दिन, रात खुले में सोया नहीं जाता, तो भीतर दस आदमी सोये कैसे? तो सब महिलाए मेनेजमेंट के पास गई के क्या आप मेनेजमेंट कर रहे हो, एक कमरे में दस साधक? कैसे रहे हम? ओर कैसे साधना करे? हम कैसे सो जाये रात को? मेनेजमेंट वालों ने हाथ जोड़कर कहा, माताजी हमारे पास इतने ही कमरे हे, कमरे तो रात को रात पढ़ने जाते हे, लेकिन आप कहे तो टेन्टकी व्यवस्था कर दे। जिनको भी टेंट में रहना हे, वो नाम लिखा दे। सब व्यवस्था हो जाएगी। टेंट में जाने के लिए कोई तैयार नहीं था। फिर मेरे पास यह बहने आई, मेरे मन में तो प्रभुने पहले से ही एक पोझेटीव एटीट्यूड दिया हुआ हे, कोई भी साधक को में देखता हूँ, प्रेम से उसके साथ बतियाता हूँ, एक साधक को देखकर मेरा रोया रोया पुलकित हो जाता हे। बहने मेरे पास आई ओर कहा महाराज सा आप जरा देखो तो कमरा कितना छोटा हे ओर दस साधकों को रखा हे उसमे, हम कैसे सो पाएंगे? मैंने भी सोचा की मेनेजमेंटवालों के पास दूसरा रास्ता हे ही नहीं, लेकिन ये सब साधिकाए हे, घर छोड़कर यहाँ आई हुई हे। तो उनको भी अपसेट करना ठीक नहीं हे, तो मैंने कहा देखो, आज ही आपने प्रवचन में सुना था, सब आत्माए सिद्धात्मा हे, अब सिद्धात्मा को नमन करने का होता हे, आपको तो मेनेजमेंटवालों ने इतना अच्छा लाभ दिया की सिद्धात्मा स्पर्श हो जाएगा! एक कमरे में दस साधिकाए हे तो क्या हुआ? आप एक को नौ-नौ सिद्धात्मा का संपर्क हो जाएगा, स्पर्श हो जाएगा। बहने खुश हो गई!
आप संमत हे ना? अतित में सिद्ध हो गए उनको नमस्कार, वर्तमान में सिद्धिपद को पाते हे उनको नमस्कार। ओर भविष्यकाल में सिद्धिपद पाएंगे उसके साथ यूँ….
एक दिन एसा हुआ, एक हॉल में बहने थी। एक लड़की वहाँ से निकली, ओर एक बहन को उसका पग लग गया, बहन चिल्लाई, ध्यान रखती हे की नहीं? मुझे पग लगा दिया! उस बहन के साथ जो दूसरी बहन थी उसने कहा, बहन तुझे मालूम नहीं, वो कौन थी? उसका तो दीक्षा का मुहूर्त निकल गया हे, 15 दिन के बाद उसकी दीक्षा होनेवाली हे। उस बच्ची ने तो मिच्छामि दुक्कडम् कर दिया, अब वो बहन की आँख में आँसू थे, अरे वो दीक्षा लेनेवाली हे! ओर 15 दिन के बाद सब छोड़ देंगी, ओहो इसका चरण मुझे लगा तो अच्छा ही हुआ हे, भविष्य में जो दीक्षा लेनेवाली हे, उससे कुछ हो गया तो भी आनंद हे, ओर भविष्यमें सिद्ध होनेवाले हे, उससे कुछ हो जाये तो…? अब बोलो, कहाँ हे हम?
उपनिषद में ऋषिने कहाँ; ‘ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं। आगे क्या कहते हे- पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते। पूर्ण से पूर्ण बढ़ जाता हे। ओर फिर एक नया गणित समजाया, ‘पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते’ पूर्ण में से पूर्ण को ले लो, रहेगा पूर्ण ही। पूर्ण में से पूर्ण को खींच लो, बचेगा क्या पूर्ण बचेगा। आपको में समजाऊ, आपका 100 रूपिए का नोट हे, 100 रूपिए हे, सिक्के हे समझ लो, एक-एक भिखारी को आप देते जायेंगे, 100 भिखारी आ गए, 100 सिक्के खत्म हो गए, आपके पास कुछ नहीं रहा। एक ज्ञानी हे, हजारों आदमीओ को ज्ञान देता हे, क्या होगा उसका ज्ञान खत्म हो जाएगा? ये हमारा धन ओर तुम्हारा धन कितना फर्क बोलो? तुम्हारा धन खत्म हो जाएगा, ओर हमारा धन बढ़ेगा, जैसे-जैसे हम ज्ञान देंगे, पुण्य बढ़ेगा, निर्जरा बढ़ेगी ओर हमारा ज्ञान भी बढ़ेगा। तो आप सब परिपूर्ण हो। आप अपूर्ण हे ही नहीं। आप सब सिद्धात्मा हे। ओर ये भाव आपके पास या गया तो परसंग त्याग कोई बड़ी बात नहीं हे।
कल हम एक पद को देख रहे थे, आनंदघनजी भगवंत के, बहोत ही अच्छा पद था, ‘ना हम शब्दा, ना हम मनसा, ना हम तनकी धरणी, ना हम वेश, वेशधर नाही, ना हम कर्ता करणी, ना हम दर्शन, ना हम फर्सन, रसन, गंध, कछु नाही, आनंदघन चेतनमय मूरत, बार-बार बनी जाय’
ना हम शब्दा, शब्द पौदगलिक घटना हे, आप ज्योतिर्मय घटना हो। शब्द से आपका कोई संबंध नहीं हे। लेकिन परमात्मा के प्यारे प्यारे जो शब्द हे, मीठे मीठे शब्द, जिनकी अनुप्रेक्षा से आप अनुभूति की ओर जा सकते हो, वे शब्द अच्छे हे, हे तो पुद्गल ही, वे भी, लेकिन आत्मतत्व की ओर जाने के लिए वे सहायक हुए। लेकिन एसे शब्द जो नहीं हे, वे शब्द निकंबे हे, उनका कोई अर्थ ही नहीं, ना हम शब्दा।
ना हम मनसा, विचार भी हम नहीं हे, ये बात बड़ी ही सुंदर हे, ना हम मनसा, विचार हम नहीं हे। लोग मुझे बार-बार पूछने के लिए आते हे, की ध्यान में क्या सोचने का? अरे ध्यान में सोचने का होता ही नहीं हे। शब्द के स्तर पर जाव, कार्य के स्तर पर जाव, विचार के स्तर पर जाव, सब doing हे। ओर ध्यान being की घटना हे। संसार doing की घटना हे, ध्यान being की घटना हे। अब में आप से पुछु? Doing से – कर्तृत्व से आप थके हो? कर्तृत्व एसी चीज हे की हम थक ही जायेंगे। हमारे पास कार्य हो लेकीन कर्तृत्व न हो, हम नहीं थकेंगे। एकबार मुझसे एक आदमीने पूछा था की आप वर्षों से वाचना दे रहे हे, वो ही के वो साधक आपके सामने होते हे, ओर आप देखते भी हे की कुछ बदलाहट भी नहीं हुई हे, आपको थकान होती हे की नहीं होती हे? मैंने कहा, नहीं, में नहीं थकता, उसने पूछा कैसे? थकान तो लगेगी ही, मैंने कहा नहीं, कार्य से थकान नहीं लगती हे, कर्तृत्वभाव से थकान लगती हे। में ever fresh हूँ, में ever green हूँ। क्यों? प्रभुने कहाँ यशोविजय! तुझे बोलना हे, में बोल देता हूँ। कर्तृत्व मेरे पास नहीं हे, कार्य हे; बोल देता हूँ, मैंने बोला एसा कोई भाव नहीं होता हे। में यहाँ से उठूँगा सुधर्मा पीठ से तब प्रभु से कहूँगा प्रभु! तेरा में ऋणी हूँ। के तूने मेरी sound system को पसंद किया। तेरे पास तो अनगिनत sound systems हे; फिर भी तूने मेरी sound systems को पसंद किया, तेरा आभार, तेरा ऋणी हूँ। doing छोड़ दो, being में जाना हे। ओर में गेरंटी से कहता हूँ, एकबार being का अनुभव हो गया, ध्यान का अनुभव हो गया, doing में आप जा नहीं सकेंगे। ठीक हे कार्य होगा, activities होगी, लेकिन doing नहीं होगा, कर्तृत्व नहीं होगा। तो विचार के स्तर पर भी नहीं जाना हे, ना हम मनसा।
ओर आगे कहाँ ना हम तनकी धरणी। मे शरीर भी नहीं हूँ। आप तो ज्योतिर्मय आत्मा हे। आप शरीर हे?! आप तो body less experience हे, शरीर तो किराए का घर हे। हम रहे हुए हे, कभी उसको खाली कर देंगे। ‘जिंदगी एक किराये का घर हे, एक दिन तो बदलना पड़ेगा, मौत जब तुमसे आवाज देंगी, तब गृह से निकलना पड़ेगा’ किराये का घर हे, शरीर तुम नहीं, शरीर में तुम बसे हुए हो।
समाधिशतक बहुत अच्छी बात कहता हे, ‘वास नगर वन के विशे, माने दुविध अबूद्ध, आतम दर्शीकु वसती, केवल आतम शुद्ध’ में नगर मे रहता हूँ, या छोटे से गाँव में रहता हूँ, या तो जंगल में रहता हूँ, वो तो हर लोग कहते हे, तु कौन से शहर में रहता हे? तेरा शरीर शहर में रहता हे, तु कहाँ रहता हे? हम कहाँ रहते हे? बहुत ही सुंदर पद हे, आतम दर्शीकु वसती, केवल आतम शुद्ध – शुद्ध आत्मा ही तुम्हारा घर हे। ओर इसमें ही तुम्हें रहना हे। ओर इसी संदर्भ में संत रविदास का एक वचन याद आता हे, संत रविदासजी को पूछा गया, कि ‘गुरु की परिभाषा क्या होतीहे?’ आप सब तो गुरुवाले हे ना? हमारी परंपरा में दो शब्द आते हे, सगरा ओर नगरा। जिनके शिर पर गुरु नहीं वो नगरा, ओर जिनके पास सद्गुरु हे, जो सद्गुरु के मार्गदर्शन में साधना कर रहा हे, वो सगरा। लेकिन गुरु की व्याख्या क्या होती हे? गुरु क्या काम करते हे?
तो संत रविदासजी को पूछा गया, की गुरु की परिभाषा क्या? बहुत ही सुंदर परिभाषा उन्होंने दी, ‘घर में घर दिखलाई दे, वो सद्गुरु हमार’ इस शरीर के घर में रहे हुए आत्मघर को जो बता सकता हे, इसका जो अनुभव करा सकता हे, वो ही गुरु। हमें दूसरा कुछ काम नहीं करना हे, स्वानुभूति करनी हे। गुरु के पास आप आओगे ना, नहीं पूछेंगे गुरु, कैसा हे शरीर? तबियत कैसी हे? नहीं पूछेंगे, गुरु का यह विषय ही नहीं हे। गुरु पूछेंगे, तेरी साधना कैसी चल रही हे? स्वानुभूति की ओर तु जा रहा हे या परानुभूति की ओर… हमें साधना को ही result से संयुक्त करना हे। साधना कर ली, एसा आत्मसंतोष हमारे पास नहीं चाहिये। गुरु पूछेंगे, इतने साल सामयिक किए, समभाव कितना हे तेरे पास बोल?
एक बात बीच में पुछु? गुरु कैसे पसंद आएंगे आपको? गुरु कैसे पसंद आएंगे? मीठा मीठा बोलनेवाले? की तुम्हारे अहं को चिरनेवाले? बोलो? कौन से गुरु चाहिये तुम्हें? डॉक्टर के पास जायेंगे, आप कैसे डॉक्टर को पसंद करेंगे? Handsome है, बोलने में जरा मीठा हे, इस डॉक्टर को पसंद करेंगे? या निष्णान्त डॉक्टर को पसंद करेंगे? ओर गुरु को कैसे पसंद करेंगे? डॉक्टर को पसंद करने में बात हे, की मेरे शरीर को मुझे स्वस्थ करना हे। ओर जो डॉक्टर मेरे शरीर को स्वस्थ बना दे, वो ही डॉक्टर। ओर यहाँ गुरु के पास आ गए तो क्या चाहिये? आप तो सब गुरु को शाता पूछनेवाले हो, गुरु अशाता में डूबे हे?! ठीक हे, ओर आप सब शाता पूछने के लिए आते हो, वंदन के लिए भी आते हो।
रत्नसुंदरसूरि ने एक दफए कहाँ था, की हमारे उपाश्रय में विजिटर बहुत होते हे, पेसन्ट बहोत कम होते हे। हॉस्पिटल में एसा कभी होता हे?! राजनेता बीमार होकर गया हे, तो विजिटर प्रशंसक बहुत होंगे, पेसन्ट बहुत कम होंगे? तो रत्नसुंदर कहते हे की हमारे उपाश्रय में विजिटर ज्यादा होते हे, जो हमारी खबर पूछने के लिए आते होंगे, पेसन्ट बहुत कम हे, किसको पूछते की क्यू भैया! अरे हा महाराज सा दस तिथि अप्पन तो आयंबिल करते हे, ओर हररोज तो बियासणा होता ही हे, पाँच-छ सामायिक रोज करते हे, दो प्रतिक्रमण करते हे, अष्टप्रकारी पूजा करते हे, मतलब की में पेसन्ट नहीं हूँ। कैसे तुमने निश्चित किया की तुम पेसन्ट नहीं हो? बोलो तो..? तुम कैसे निश्चित कर सकते हो? डॉक्टर ही निश्चित कर सकता हे, सूजन आ गया तो शरीर जो हे थोड़ा रुष्ट-पुष्ट होने लगा। तो तुम कहोगे की हाँ, मेरा शरीर तो जरा बलवान हो गया। डॉक्टर कहेंगे बलवान नहीं हुआ हे, सूजन आई हे सूजन। उसको निकालनी पड़ेगी। आप पेसन्ट हे की आपको मालूम होगा की गुरु को मालूम होगा?
गुरुसे कभी पूछा की गुरुदेव! में आंतरयात्रा में कितना आगे बढ़ा? नहीं पूछा ना कभी? तो गुरु के पास आने के समय ये बात आपके मनमे फिक्स होनी चाहिये की गुरु के पास आप क्यू जाते हो? गुरु के पास क्यू जाते हो? मेरे पास क्रोध का रोग हे, राग का रोग हे, अहंकार का रोग हे, ईर्ष्या का रोग हे, इन सभी रोगों को मिटाने के लिए में सद्गुरु के पास जाता हूँ। ये बात हे आपके पास? सद्गुरु को वंदन कर लिया, विधि पुरी हो गई, चलो घर पर, क्या हुआ? डॉक्टर के पास एसा करते हो? डॉक्टर के पास गए, क्यों डॉकटर कैसे हो? मजामें हो ना? चलो चलता हूँ में! हुआ कभी एसा? यहाँ क्यू होता हे? आप अपनी जात को पेसन्ट की रूप में स्वीकार नहीं कर सकते। आप अपरिपूर्ण हे, यही बात आपको सूचित करने का, पेसन्ट हे, आप जब स्वस्थ हो जायेंगे, आप परिपूर्ण ही हे। में भी परिपूर्ण हूँ, तुम भी परिपूर्ण हो सब, सब सिद्धात्मा हे, सब परिपूर्ण हे। सिद्धत्व का पर्याय नहीं खुला यह बात अलग हे, लेकिन हम सिद्ध हे ही, जब सिद्धत्व मिलेगा, केवलज्ञान मिलेगा, तो बाहर से आएगा? केवलज्ञान बाहर से आता हे? सिद्धत्व का पर्याय बाहर से आता हे? नहीं हमारे पीछे ही हे, हमारे पास ही हे, लेकिन वो खुला नहीं हे हमारे पास। इसीलिए हम प्रभु के पास जायेंगे ओर कहेंगे प्रभु! सत्ता रूप से मुझमें ओर तुझमें कोई अंतर नहीं हे। जो तेरे पास हे वो सब मेरे पास हे, लेकिन तेरे गुण प्रगट हुए हे, मेरे गुण ढंके हुए हे।
तो ना हम तनकी धरणी। शरीर हम नहीं हे। बुखार आ गया आपको? अब तक को क्या कहते थे की मुझे बुखार आ गया, अब क्या कहेंगे इस वाचना के पश्चात्? मेरे शरीर को बुखार आया हे, में स्वस्थ हूँ। क्या कहेंगे? बुखार किसको आया? शरीर को आया की तुम्हें आया? किसको आया?
नेमिसुरी म.स. के संप्रदाय में धर्मधुरंधरसूरि बड़े आचार्य भगवंत थे, अहमदाबाद में बिराजमान थे, गले का केन्सर हुआ था, में साहेबजी की सुख शाता पूछने के लिए गया था, सुबह के साडे आठ बजे थे, साहेबजी ने पेईन किलर दूध के साथ ले लिया था, स्वस्थ थे, मैंने पूछा साहेबजी सुखशाता में? वे मुस्कुराने लगे, हो बड़े शाता में हूँ, बड़े मजे में हूँ। मैंने पूछा की ये केन्सर की तकलीफ, आपको केन्सर हो गया, मैंने अभी सुना, उन्होंने मुझे फटकारा, उन्होंने मुझे कहाँ की यशोविजय! ये तु बोल रहा हे! मुझे केन्सर हुआ हे? की मेरे शरीर को केन्सर हुआ हे? शरीर तो नाशवंत हे ही, इससे हमारा क्या संबंध?
तो इसी संदर्भ में आनंदघनजी ने गाया की ‘अब हम अमर भये न मरेंगे’ ओर इस पद में एक सुंदर पंक्ति आती हे, ‘नासी जासी हम थिरवासी’ जो नाशवंत हे वो चला जाएगा। हम स्थिर हे वो रह जायेंगे। मृत्यु में होता क्या हे? शरीर ओर आत्मा का संबंध विच्छेद होता हे, वो तो संबंध था ही कहाँ? हम मान लेते हे की संबंध हो गया, लेकिन संबंध था ही कहाँ? संबंध विच्छेद हुआ तो मृत्यु हो गया।
इसीलिए भगवदगीता ने मृत्यु के लिए बहुत सरस उपमा दी हे, ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय’ जुने वस्त्रों को छोड़ देना, नये वस्त्रों को पहन लेना। बस मृत्यु हे क्या? वस्त्र जूना पुराना हो गया छोड़ दो; नया पहन लो। ये शरीर अब थक गया हे, साधना के लिए काम नहीं आ रहा हे, चलो दूसरे शरीर में जाओ। ना तनकी धरणी। आप शरीर नहीं हे, एक नवकारवाली गिनोगे? में शरीर नहीं हूँ, में शरीर नहीं हूँ। आपका जो नाम हे वो नाम लेना की में राकेश नहीं हूँ, में राकेश नहीं हूँ। गिनोगे एक नवकारवाली ? भीतर के स्तर पर ये बात उतरनी चाहिये की में शरीर नहीं हूँ, में नाम नहीं हूँ।
फिर आगे कहते हे, की ना ना हम वेश, वेशधर नाही, वेश तो में हूँ ही नहीं, वेश तो पौदगलिक घटना हे, ड्रेस, ड्रेसीस, वो तो कपड़ा हे, कपड़ा तो पौदगलिक घटना हे, मेरी उनसे कोई संबंध नहीं हे। ना हम वेश, वेशधर नाही, उन कपड़े को पहनने वाला भी में नहीं हूँ; मेरा शरीर हे। शर्ट पहन लिया आपने, में भी भूल गया हो, आपने पहन लिया ऐसा में बोल गया। आपने कहाँ पहना हे? आपने अपने शरीर को पहनाया हे, की में मैंने शर्ट पहना यह भाव हे। शर्ट कौन पहनता हे? शरीर या आत्मा?
में एक लिटमस टेस्ट साधकों के लिए देता हूँ, पूजा करके तुम घर पर आये, वॉर्डरोब में तुम्हारे जो कपड़े रखे थे, तुमने पहन लिए, फिर नास्ते के लिए टेबल पे बेठे, नास्ता पुरा हो गया, अब एक मिनट आँख बंध कर ले, ओर मन से पूछे की आज कौन सा शर्ट मैंने पहना हे? शर्ट ओर पायजामा आप पहनते हे, पायजामा तो सफेद ही होता हे, शर्ट के कलर अलग-अलग होते हे। आज कॉफी कलर का शर्ट हे, मरून कलर का हे, एस कलर का हे? कौन से कलर का शर्ट मैंने पहना हे? आँख बंध करके आप सोचो, यदि उत्तर सच्चा मिल गया, तो आप साधक के रूप में बिलकुल गलत हो। ओर उत्तर में गड़बड़ाहट हो गई, याद नही आता हे, कौन सा शर्ट पहना हे? ये भी हो सकता हे, ये भी हो सकता हे, तब आप साधक के रूप में सत्य हो। आपको क्यू मालूम हो? की मैंने यह पहना हे, शरीर ने पहन लिया।
तो शास्त्रकार भगवंत तुमको पर से मुक्ति दिलाने के लिए तैयार हुए हे, ना हम वेश, वेशधर नाही। अब बोलो आप साधक-साधिकाए के रूप में यहाँ आये हे, ओर शिबीर का नियम हे, सबको श्वेत वस्त्र ही पहनना हे, आप श्वेत वस्त्र लेकर ही आये हे, अब कोई विकल्प ही नहीं उठेगा, स्नान के बाद, पूजा के बाद, कोई विकल्प ही नहीं उठेगा की यह शर्ट पहनु की या शर्ट पहनु? एक ही तो शर्ट हे! व्हाइट! तो बोलो कितने विकल्पों से मुक्ति मिल गई! ओर बहनों को, माताओ को तो बहोत विकल्पों से छुट्टी मिल गई। वरना कपड़े पहनने में जितना समय होता हे, इससे ज्यादा कौन सा वस्त्र पहनना, उसमें ज्यादा समय जाता हे। ये सब विकल्पों से मुक्ति मिल गई।
तो ना हम वेश, वेशधर नाही, ना हम कर्ता-करणी। में कर्ता नहीं हूँ, बहुत ही सुंदर बात। न तो वैभाविक जगत का कर्तृत्व तुम्हारे पास हे, न तो साधना जगत का कर्तृत्व तुम्हारे पास हे। कर्तृत्व से मुक्ति आनंदघनजी भगवंत दिलाने के लिए तैयार हे, तुम्हें मुक्ति प्राप्त करनी, या नहीं प्राप्त करनी वो तुम जानो। ना हम कर्ता। वैभाविक जगत के कर्ता तु हो ही नहीं। तुम्हारा संज्ञावासित मन हे, वो संज्ञाओ में जा-जाकर राग-द्वेष करता हे। अब तुम्हारी गलती क्या हे, तुम मन के साथ साँठ-गाँठ लगा लेते हो। तुम्हारा उपयोग दूषित मन के साथ एकमेक हो जाता हे। लेकिन यदि आसक्ति होती भी हे, ओर तुम देखनेवाले के रूप में होते भी हो तो कर्मबंध बिलकुल अल्प हो जाएगा।
आप सुबह चाय पीने के लिए बैठे थे, चाय अच्छी थी, टेस्टी, पसंद आ गई, चुस्कीया पे चुस्कीया लेने लगे, आसक्ति मनमे पेदा हुई, ठीक हे, आसक्ति पेदा हुई, अब क्या बात करनी हे? आसक्तिवाला मन तो हे ही, आपको आसक्ति को देखनेवाले के रूप में आना हे। ये चाय अच्छी हे यह कौन कह रहा हे? मेरा मन कह रहा हे। संज्ञावासित मन। ओर में बड़ी सुंदर बात बहोत बार करता हूँ, की चाय टेस्टी की ओर अनटेस्टी वो नक्की कौन कर रहा हे? निश्चित मन कर रहा हे। तुम तो वो निश्चित करने वाले होते ही नहीं। सोसायटी ने निश्चित कर लिया, भारत में जन्मे हो, कडक मीठी चाय अच्छी लगती हे, ओर बचपन से एसी चाय पीकर आये हो, तुम कहोगे एसी चाय अच्छी हे। ओर शायद जापानवाला होगा तो कहेगा की सोल्ट डालो इसमें, चाय में सोल्ट डालो, नमक डालो, ओर तभी चाय का मजा आता हे, तो चाय ही अच्छी हे या नहीं, ये निश्चित करनेवाला कौन हे? तुम्हारा मन नहीं हे, तुम नहीं हो, सोसायटी हे। तो इसलिए में कहता हूँ, की आपके ऊपर एक मास हिप्नोटीजम चल रहा हे, मास हिप्नोटीजम! आप सोचते नहीं हे की क्या अच्छा क्या बुरा?
खाने के लिए गए, भोजन के लिए, तुवेर की दाल थी, राजस्थानी को कैसी पसंद आएगी? गुड के बिना की, ओर गुजराती होगा तो गुड़वाली दाल चाहिये। लेकिन ये गुड़वाली दाल अच्छी, ये गुड के बिना की अच्छी ये निश्चित कौन करता हे? सोसायटी निश्चित करती हे या तुम निश्चित करते हो। हमारे मन से ये ग्रंथि निकल गई की हम राजस्थान में घूमने के लिए गए, राजस्थान का भोजन आराम से ले सकते हे। एम. पी गए तो एम.पी का भोजन आराम से ले सकते हे, भूख लगी हे तो भोजन चला ही जाएगा। तो मास हिप्नोटीझम आपके ऊपर चल रहा हे। 2 bhk का 3 bhk का फ्लेट हे आपके पास, एक लड़का हे – बच्चा, एक बच्चे के लिए कमरा, एक आपके लिए कमरा, एक कमरा ओर बडा, हॉल भी बन गया हे, आवश्यकता नहीं हे, यानि बड़े घर की, लेकिन यह 4 bhk का, 5 bhk का बंगला किसके लिए चाहिये? सोसायटी के लिए। बोलो तो? किसके लिए चाहिये? तुम्हारे लिए तो पर्याप्त था यह, तुम्हारे लिए तो 3 bhk का नहीं, 2 bhk पर्याप्त था, क्यों? एक बच्चा था, एक बच्चे का बेडरूम, एक तुम्हारा बेडरूम, हो गया पूरा बात। लेकिन 5 BHk का…. बड़ा बंगला! किसके लिए, सोसायटी के लिए, सोसायटी को देखने के लिए, की सोसायटी को उसमें रहने के लिए! आप कैसे जी रहे हो? आप इतने परतंत्र हो गए हो! की आपको कैसे मकान में रहना वो भी सोसायटी निश्चित करे, आपको वस्त्र कैसे पहनने हे वो भी सोसायटी निश्चित करे! अंदर जो बनियान पहनेंगे ने वो तो खुरधुरा होगा तो भी चलेगा, पोलिस्टर का शर्ट ऊपर चाहिये, क्यों? लोगों की आँखों को कोमल कोमल लगना चाहिये। वस्त्र भी कैसे पहनने हे? सोसायटी का पसंद आया हुआ, आपका कोई निजी जीवन हे? में पूछता हूँ? सोसायटी के वैसे जिना हे? आपका निजी जीवन होना चाहिये। हमारा निजी जीवन हे। प्रभुने कहाँ हे, की बस वस्त्र पहनो, लेकिन संयम के मर्यादा के लिए, विभूषा के लिए नहीं।
दशवैकालिक सूत्र में कहा, ‘तं पि संजम – लज्जट्ठा, धारंति परिहरंति य’ संयम की मर्यादा हे वस्त्र पहनो, लेकिन व्हाइट वस्त्र, वो भी अल्प मूल्य का। एक बात में आप से कहूँ, हजार वर्ष पुरानी गुरुदेव की कोई मूर्ति देखो आप, 500 वर्ष पहले का गुरु का कोई चित्र देखो आप, यही यूनिफ़ॉर्म हे जो हम सब ने यूस किया हे। हजार वर्ष से नहीं, 2500 वर्ष से यही यूनिफ़ॉर्म चला आया हे। पहले भी एसा यूनिफ़ॉर्म था, लेकिन पहले रंगीन वस्त्रों की छूट थी। प्रभु महावीर के शासन में रंगीन वस्त्रों की छूट नहीं हे, तो 2500-2600 वर्ष से एक ही यूनिफ़ॉर्म हमारे यहाँ चला आया हे। ओर आपके वहाँ क्या हालात हे? एक वर्ष में कितने ups and downs होते हे? लेकिन अच्छा हे, ये कौन निश्चित करता हे? ये फेशन अच्छी हे, ये कपड़े अच्छे हे, सोसायटी निश्चित करती हे।
तो ना हम वेश, वेशधर नाही, इस सबसे मुक्ति पाई हे ना, ना हम वेश, वेशधर नाही। ना हम कर्ता करणी। ये बात थोड़ी गहरी हे, ना हम कर्ता, ना हम करणी। हम कर्ता तो नहीं हे, कार्य भी नहीं हे। हम क्या हे? आनंदघन चेतन मय मूरत। हम आनंदघन हे, चैतन्यमय मूर्ति हे हम। आप कौन हे? आनंदघनजी 300 वर्ष पहले हो गए, आप सब कौन हे? आनंदघनजी की छोटी एडीशन हो ना, आप ही आनंदघन ही हो। मैंने पहले भी कहा था, पीड़ा क्यू आती हे? घटनाओ से कभी भी पीड़ा नहीं आती। घटना के विकल्पों से पीड़ा आती हे। तो पीड़ा के लिए तुम जिम्मेदार हो; नहीं के घटना घटानेवाले। समझ लो पुरा, घटना जिसने घटित की, वो जिम्मेदार नहीं हे तुम्हारी पीड़ा के लिए, तुम्हारी पीड़ा के लिए जिम्मेदार तुम ही हो। तुमने विकल्प किया, एसा क्यू इसने किया, अरे भाई घटना घट गई तो घट गई, अब स्वीकार कर लो। अब घटना घट ही गई हे, तुम कितना भी सोचोगे, घटना बदल जाएगी क्या? घटना तो घट ही गई हे, ओर फिर क्या करने का हे? स्वीकार कर लो। लेकिन आप विकल्पों के झरिए पीड़ित हो जाते हो, इसने एसा क्यू किया?! अरे भाई इसने एसा कुछ नहीं किया, अरे तुमने किया हे, तुम्हारे कर्म ने किया हे। दूसरों को जिम्मेदार मानते क्यू हो? तुम्हारे सुख ओर दुख का कारण तुम ही हो। आनंद प्रभु की कृपा से बरसेगा, लेकिन सुख दुख के कर्ता तुम ही हो। पीड़ा तुमसे आती हे; न की दूसरों से। हम भी तुम्हारे संसार में रहते हे, हम उपाश्रय में रहते हे, तुम घर में रहते हो। हम चार दीवाल में ही रहते हे ना? ओर हम भी तुम्हारे वहाँ भिक्षा के लिए आते हे ना, तुम्हारा संग भी हमें होता हे ना? लेकिन हम ever fresh, ever green हे। घटनाए एसे तो नहीं होती हमारे लिए, लेकिन शरीर मे रोग तो आता ही हे साधु को भी, ये रोग की घटना तो घटित होती ही हे। लेकिन रोग होने पर भी, हमारा आनंद, हमारी प्रसन्नता वैसी की वैसी ही होती हे। केन्सर हे तो हे, टीबी हे तो हे, क्या हुआ? क्या फर्क पड़ा? एक दिन जाना तो हे ही, एक दिन जाना हे, जायेंगे मज़ा से। जायेगे लेकिन मजा से जायेंगे। हमारी अंतिम विदाय बहुत भव्य होनी चाहिये। क्योंकि विदाय ही नहीं हे, ये तो घर बदलने की बात हे। ओर शहर में तो लोग कितने घर बदलते हे? सुरतवाले हे, तो लोग अठवालाइन्स से वेसु जा रहे हे, मुंबईवालों को पूछो, उनकी महेच्छा होती हे की वालकेश्वर की टेकरी पर जाकर मरना हे, अरे यही पे मर जा.. तो वर्षों से यह इच्छा करकर बैठता हे। क्या करना हे? वालकेश्वर पर एक घर ले लेना हे ओर फिर वहाँ मर जाना हे, अरे मर ही जाना हे तो यहाँ मर जाना ना? सिर्फ घर ही बदलना हे, मृत्यु तो हे कहाँ? तो परसंग त्याग, लेकिन इस पद में, ना हम कर्ता करणी, इस पद को थोड़ा development देना हे वो दोपहर की वाचना में दे देंगे, थोड़ा प्रेक्टिकल करना हे।
