Maun Dhyan Sadhana Shibir 10 – Vachana – 5

40 Min Read

વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત

Subject: अंतर्मुख दशा

अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने के लिए साधक का मार्ग है: पररस का त्याग। प्रभुने कहा कि शरीर रूपी बडा पुद्गल तुम्हें मिला है, तो उस बड़े पुद्गल के लिए छोटे छोटे पुद्गल तो चाहिए ही। इस लिए पर पदार्थों का उपयोग तुम ज़रूर कर सकते हो। लेकिन उन पर पदार्थों में तुम्हारा रस नहीं होना चाहिए; तुम्हारी आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

ना हम शब्दा। शब्द पौद्गलिक घटना है। तुम अपौद्गलिक, ज्योतिर्मय घटना हो। तुम्हारा पुद्गलों से, शब्दों से कोई लेना-देना नहीं है। हाँ, जो शब्द तुम्हें अनुभूति की ओर ले जाए, उन शब्दों का स्वाध्याय कर लो। अनुभूति की ओर तुम्हें न ले जाए, उस शब्द का तुम्हारे लिए कोई मूल्य नहीं।

ना हम मनसा। हम मन भी नहीं हे। हम विचार नहीं है; विचार हमारा स्वभाव नहीं है। उपयोग हमारा स्वरूप है; ज्ञान-दर्शन रूप उपयोग। विचार करना तो मनोयोग के कारण है। साधक के लिए प्राथमिक सज्जता यही है कि वह निर्विकल्प बनें।

મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ પાલીતાણા વાચના – ૫

आंतरयात्रा का पहला चरण अंतर्मुख दशा, भक्त का मार्ग हमने देख लिया, भक्त इस चरण को सिर्फ अहोभाव के बल पर प्राप्त कर लेता हे। तो भक्त का मार्ग अहोभाव का हुआ, साधक का मार्ग अलग हे। साधक का मार्ग हे पररस का त्याग। प्रभुने कहा हे, की तुम परपदार्थो का उपयोग कर सकते हो। शरीर ही बडा पुदगल मिल गया हे, तो उस बड़े पुदगल के लिए छोटे छोटे पुदगल तो चाहिये ही। तो परपदार्थों का उपयोग तुम कर सकते हो। लेकिन उन परपदार्थों में तुम्हारा रस नहीं होना चाहिये। तुम्हारी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। 

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति साधक के इस चरण के प्राप्ति की महोपाध्याय यशोविजय महाराज ने दी हे, एक पद में, ‘परसंग त्याग लाग निज रंगे, आनंद वेली अंकुरा, निज अनुभव रस लागे मीठा, जिम घेबर में छुरा’ परसंग त्याग लाग निज रंगे- एक ओर पररस का त्याग/ परसंग का त्याग; दूसरी ओर स्वानुभूति। भक्त के लय में हम कहेंगे, पररस का त्याग, परमरस की प्राप्ति। साधक के लय में हम कहेंगे, पररस का त्याग, स्वानुभूति की प्राप्ति। 

“परसंग त्याग लाग निज रंगे”- रंग का मतलब हे अस्तित्व की धारा। 

तो इस अस्तित्व की धारा को मीरा ने बहुत ही सुंदर रूप से पकड़ी हे, भक्तिमती मीरा ने प्रभु से प्रार्थना की, ‘लाल न रंगाउँ, हरी न रंगाउँ, तेरे ही रंग में रंग दे चुनरिया’ प्रभु कोई दूसरा रंग मुझे नहीं चाहिये, मुझे रंग चाहिये तेरा ही, एक बात आप से कह दूँ, साधक के लिए जो स्वानुभूति हे, वो ही दशा भक्त के लिए परमानुभूति हे। कोई फरक नहीं। फरक शब्दो का ही हे। भक्त परमात्मा की ओर जाता हे, परमात्मा का निर्मल रूप का दर्शन करता हे। परमात्मा के निर्मल रूप की अनुभूति करता हे। तो भक्त कहता हे, मेरे परम की अनुभूति, साधक आत्मतत्व की ओर जाता हे, अपने चैतन्य की ओर जाता हे; ओर कहता हे, की मैंने स्वानुभूति की। तो स्वानुभूति शब्द लो या परमानुभूति शब्द लो; अर्थ में कोई फरक नहीं हे, शब्द में ही फरक हे। 

तो मीरा कहती हे, ‘लाल न रंगाउँ, हरी न रंगाउँ” मुझे एसे कोई रंग नहीं चाहिये प्रभु, कैसा रंग चाहिये? “तेरे ही रंग में रंग दे चुनरिया।” प्रभु मुझे तेरे ही रंग में रंग दे। कोई संसार का रंग मुझे नहीं चाहिये, मुझे चाहिये परम का ही रंग। परम की ही अनुभूति। ओर आगे मीरा ने कहा हे, ‘एसा ही रंग दो, की रंग नाही छूटे’ ‘एसा ही रंग दो, की रंग नाही छूटे, धोबिया धुए चाहे सारी उमरिया’ प्रभु! अस्तित्व के स्तर पर एसा तेरा रंग लग जाये, की फिर वो रंग कभी भी जाये नहीं! वो रंग मेरे अस्तित्व के स्तर पर आ गया, ओर अस्तित्व के स्तर पर जो आ गया, वो शाश्वत के लय में आ गया, फिर उसका विरह कभी होता हि नहीं। ‘एसा ही रंग दो, की रंग नाही छूटे, धोबिया धुए चाहे सारी उमरिया’ तो रंग अस्तित्व के स्तर की अनुभूति हे। 

तो इसी रंग शब्द का प्रयोग आनंदघनजी भगवंत ने पंद्रहे स्तवन के प्रारंभ में किया, ‘धर्म जिनेश्वर गाउँ रंगशु’ धर्म जिनेश्वर की स्तुति करनी हे। उसका गान करना हे। लेकिन कैसे करना हे? रंग से। अस्तित्व के स्तर से। ओर आपको मालूम नहीं होगा, अस्तित्व के स्तर से जो गान प्रगट होता हे ना, उसका मूल्य हमारी परंपरा में बहोत ज्यादा हे। 

हमारे वहाँ परंपरा में कहा गया हे, की कैसा मूल्य कितना होता हे? ‘जपकोटिसमं ध्यानं, ध्यानकोटिसमो लय:। लयकोटिसमं गानं, गानात् परतरं न हि॥’ जपकोटिसमं ध्यानं – एक करोड़ जप जितना मूल्य ध्यान का हे। ध्यानकोटिसमो लय:– एक कोटि ध्यान जितना मूल्य लयका – समाधि का हे। ओर एक करोड़ समाधि जितना मूल्य गान का हे! ओर फिर कहाँ, गानात् परतरं न हि – गान से आगे कुछ नहीं हे! भीतर की दुनिया में गान से आगे कुछ भी नहीं! प्रश्न तो होगा? की समाधि तो आंतरिक अवस्था हे, समाधि में तो ध्याता ध्येय में विलीन हो जाता हे। समाधि का मतलब क्या होता हे? ध्यान में ध्याता अलग होता हे। ध्येय रूप परमात्मा अलग होते हे। लेकिन समाधि में तो ध्याता ध्येय में विलीन हो जाता हे, ध्याता का अस्तित्व ही नहीं रहता हे; उसे हम समाधि कहते हे। तो समाधि से भी ज्यादा मूल्य गान का कैसे? उत्तर दिया हे, की समाधि में एक व्यक्ति स्वानुभूति को प्राप्त करता हे, अस्तित्व के स्तर से जब गान प्रगट होता हे तब, सुननेवाले सब स्वानुभूति में पहुँच जाते हे! अस्तित्व के स्तर से गान होना चाहिये; कंठ के स्तर से नहीं, Conscious mind के लेवल से नहीं, अस्तित्व के स्तर से। 

तो महोपाध्यायजी कहते हे, ‘परसंग त्याग लाग निज रंगे’ पर को छोड़ दो, स्व को प्राप्त कर दो। कंकर को छोड़ो ओर हीरे को प्राप्त करो, बोलो? कोई कह दे की कंकर तेरे पास हे ना, कंकर छोड़ दे, हीरे तुझे मिल जायेंगे। नहीं, नहीं, मुझे कंकण तो नहीं छोड़ने हे। आप एसा कहेंगे! आप एसा कहेंगे? 

पर में क्या हे? परपदार्थों में क्या हे? ओर पर व्यक्तित्वो में आप जो राग या द्वेष करते हे, उसका मूल्य क्या हे? सिर्फ कचरा ही हे वह। पर के संग को, पर के रस को छोड़ दो; ओर स्व की अनुभूति प्राप्त कर लो। प्रभुने कितना उपकार किया हे हम पर! कितनी करुणा बरसाई हम पर! प्रभुने एसा नहीं कहा, तुझे मासक्षमण पर मासक्षमण करेगा, उसको ही में मेरे धर्म संघ में स्थान दूँगा, नहीं कहा, हमारे लिए भी नहीं कहा,आपके की भी नहीं कहा। सोल भत्ते की बात नहीं की, अट्ठाई की बात नहीं की, उपवास के पारणे उपवास एसी बात भी नहीं की, आयंबिल रोजाना करना पड़ेगा, वो भी नहीं कहा, एकासने करने पड़ेंगे वैसा भी नहीं कहा। प्रभुने इतना ही कहा, की शरीर तेरे पास हे, ओर शरीर के लिए, अनिवार्य रूप से जो भी आवश्यक हे, रोटी दाल तु ले सकता हे! तुम तीन बार खाओ, प्रभु को कोई दिक्कत नहीं। चार बार चाय पीओ। हमारे सुधीरभाई तो नहीं पिलाते! लेकिन में छूट देता हूँ। चार बार चाय पीओ, प्रभु की ओर से छूटी हे। बस प्रभु इतना ही कहेंगे, की चाय तेरा शरीर पी रहा हे, तु उसे देख रहा हे। दोपहर को भोजन किया था ना? रोटी-दाल किसने खाई थी? सुबह चाय किसने पी थी? तुमने के तुम्हारे शरीर ने? बोलो तो…? चाय कौन पीता हे? तुम पीते हो? आनंदघन तुम! असुरिणी तुम! तुम क्या चाय पीओगे?! चाय पिनेवाला शरीर हे, तुम कौन हो? तुम देखनेवाले हो। चाय पिनेवाला शरीर हे, में नही हूँ, में तो सिर्फ देखनेवाला हूँ। क्यू? की परभाव में मेरा कर्तृत्व होता ही नहीं। खाना, पीना, सोना, सब शरीर के लिए आवशयक हे। कर भी दो, हम भी खाते हे ना, आप खाते हे एसी बात नहीं हे, हम भी भोजन लेते हे, गोचरी की क्रिया नाम दे रहे हे, लेकिन हम भी खाते हे ना…? हमारा खाना ओर आपका खाना फरक क्या पड़ा? 

एक साधु भोजन लेगा, आप भोजन लेंगे, क्या फरक पड़ेगा? साधु के पात्र में जो भी आया, वो वापर लेगा, एसे भी साधु हमने देखे हे, जिन्हे पूछे जाये की आपने आज भिक्षा में क्या लिया था? गोचरी में क्या लिया था? तो वे कहते हे, मुझे कुछ मालूम नहीं, मेरे पात्रमें गुरुदेव ने जो रखा था, वो मेरे शरीर ने यूस कर लिया, मुझे मालूम नहीं हे, क्या पात्र में था। आपको भी एसा होना चाहिये। आप भोजन करके आये कमरे में, आपके स्वयात्रिक को अभी जाना हे,भोजन के लिए। अभी तो मौन हे, बोलेंगे तो नहीं, सायद पूछ भी ले, लिखकर की कया-क्या मेनू हे? आप लिखकर दोंगे ने? मुझे कुछ मालूम नहीं हे। शरीर ने खा लिया, शरीर से पूछो, मुझसे क्यू पुछ रहे हो? 

तो चाय पिनेवाला कौन? शरीर या तुम? तो प्रभु यही बात करते हे की पर के रस को छोड़ो। कुछ नहीं हे पर में। में एक बात बहुत बार कहता हूँ। की स्वानुभूति का अनुभव आपके पास नहीं हे। आपके गुणो का अनुभव आपके पास नहीं हे। समझ लीजिए। लेकिन विभाव का अनुभव आपके पास हे? समझ लिया की क्षमा का अनुभव आपके पास नहीं हे, में पूछता हूँ की, क्रोध का अनुभव आपके पास हे? नहीं। क्रोध का अनुभव भी कहाँ हे आपके पास? क्षमा का तो नहीं हे, क्रोध का भी नहीं हे। क्रोध का अनुभव हो जाये तो क्रोध छूट जाये। क्रोध रहता हे ये बात बताती हे, की क्रोध का अनुभव नहीं हुआ हे। क्रोध अच्छा लगता हे या बुरा? बोलो तो? क्रोध अच्छा लगता हे या बुरा? दूसरे का तो जो होगा सो होगा। तुम्हारा कया होगा, ये तो सोचो। आधा घंटा नॉन स्टॉप क्रोध में रहोगे तो क्या होगा? सिर दर्द होगा। ब्लड प्रेसर हाई हो जाएगा। क्या फायदा निकाला आपने? 

ओर एक बात में बार-बार कहता हूँ, की लाल आँखवाले का युग समाप्त हो गया हे, अब स्माइलिंग फेसवालों का ही युग हे। आपके बच्चे से भी आप लाल आँख से बात नहीं कर सकते। न आपकी धर्म पत्नी से बात करते अब, स्माइलिंग फेस से ही बात करना होगा। इस युग को भी समझो आप। अब क्रोध नहीं चल पाएगा। आपका नॉकर भी आपके क्रोध को सहन करने वाला नहीं हे आज। वो कह देता हे, एसी बेइज्जती से से रहने के लिए में तैयार नहीं हूँ। तुम्हारी सर्विस तुम्हारे पास, में जाता हूँ मेरे घर! उसको भी स्वमान प्रिय होता हे। तो क्रोध का युग पुरा हो गया हे। आप किस युग में हो? 

तो क्रोध का अनुभव नहीं हुआ हे ना, हुआ हे? नहीं हुआ। तो विभाव का भी अनुभव आपके पास नहीं हे; स्वभाव का अनुभव कैसे आएगा? विभाव का अनुभव होगा, विभाव की पीड़ाए बहुत हे; उसका ज्ञान हुआ, वो दर्द चुभेगा अस्तित्व के स्तर पर ,विभावों की पीड़ा का दर्द अस्तित्व के स्तर पर चुभेगा; तब ही स्वभाव की धारा में तुम जा सकते हो। जब तक विभाव बुरे नहीं लगते हे, आप स्वभाव की धारा में कैसे जायेंगे? बोलो, क्रोध में हे, राग में आप हे, मजा में हे ना? आप की शाता पुछु? निमित्त मिला नहीं; क्रोध किया नहीं। निमित्त मिला नहीं; आसक्ति आ गई। निमित्त मिला नहीं; अहंकार आ गया। पाँच मिनिट का प्रवचन किया हे, तो कोई कहेगा बहोत अच्छा प्रवचन किया, अहंकार आ जाएगा भीतर! ओहो! मैंने बहोत अच्छा प्रवचन दिया! निमित्त बस तुम हो, निमित्त के कारण क्रोध में जाते हो, निमित्त के कारण द्वेष में जाते हो, निमित्त के कारण ईर्ष्या में जाते हो, अहंकार ओर आसक्ति में जाते हो। लेकिन मजा में हो ना? मुझे यह पूछना हे? क्रोध में मजा या क्षमा में मजा? क्रोध नॉन-स्टॉप करो तो, कितने समय कर पाओगे? ओर क्षमा में रहना हो तो? सप्ताह तक रहो, वर्षों तक रहो, क्षमा में, आनंद ही आनंद हे। 

तो परसंग त्याग लाग निज रंगे – रंग शब्द का प्रयोग हुआ। अपना जो अस्तित्व हे, उस अस्तित्व को छूना हे। कैसे हे हम? हम हमसे बेखबर हे। हम कौन हे, हमें मालूम नही! क्या ये शरीर तुम हो? तुम कौन हो? 

गुर्जियेफ अपने पास आनेवाले साधकों को एक प्रयोग कराता था, एक घड़ी देता था, ओर सेकंड का जो कांटा था, उस पर ध्यान रखने को कहता, की तुम सेकंड टु सेकंड उसका पीछा करो। हो सकता था। पाँच मिनट तक एक साधक सेकंड टु सेकंड घड़ी में देखकर वो पीछा कर सकता था। फिर गुर्जियेफ दूसरा लेसन देता था; अब सेकंड कांटे को देखने वाले को देखो। सेकंड कांटा देख लिया; अब उसके देखनेवाले को देखो। ओर 99% साधक कहते थे, देखनेवाले को हम नहीं देख पाते हे। नायक को आपने कभी जाना? द्रष्टा का दर्शन कभी किया? पुरी दुनिया को जान ली। तुम्हारा स्वरूप क्या हे, तुम्हें मालूम नहीं?! नायक को ही नहीं जाना! द्रष्टा का ही दर्शन नहीं किया! तो फिर से हम ये बात पर आये, की चाय शरीर पीता हे, तुम सिर्फ देखनेवाले हो। 

अष्टावक्र ऋषि, अष्टावक्र गीता में कहते हे, ‘एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।’ बहुत सुंदर शब्द हे, ‘एको द्रष्टासि सर्वस्य, मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा’ तुम सिर्फ द्रष्टा हो,ओर द्रष्टा तुम होंगे; तो मुक्ति तुम्हारे नजदीक हे। मुक्त प्रायोसि सर्वदा। ओर यही बात महोपाध्याय यशोविजयजी ने अध्यात्म उपनिषद में कही, ‘द्रष्टुर्द्रुगात्मता मुक्तिर्द्रश्यैकात्म्यं भवभ्रम:’ द्रष्टा दर्शन की क्षणो में रहता हे, तो वो उसकी मुक्ति है; ओर द्रष्टा दृश्यो के साथ अपनी चेतना को एकाकार करता हे, तो वह संसार का पथ हे। आपने कया किया अभी तक बोलो तो? एक-एक द्रश्य को देखा; ओर द्रष्टा को द्रश्य के साथ एकाकार किया! यह अच्छा हे, यह बुरा हे। अरे! यूस कर लो। कोई मना नहीं हे, लेकिन राग-द्वेष क्यू करते हो? चाय की आवश्यकता हे; पी ली। बहुत टेस्टी थी, बहुत टेस्टी थी, बहुत टेस्टी थी, एसा करोगे तो क्या होगा? आसक्तिजन्य कर्म का बंध होगा। तो आप सिर्फ देखनेवाले हो। चाय पीनेवाले नहीं। बोलो पक्का हो गया आज? पक्का हो गया ना? अब शाम को भोजन करने के लिए जायेंगे ना, मन में यह बात होगी, की मेरा शरीर खा रहा हे, में देख रहा हूँ। देखनेवाले को अलग दिखा। 

स्वामी राम बड़े साधक थे, लोग उन्हे प्यार से राम से संबोधित करते। तो स्वामी राम क्या करते? राम शब्द का प्रयोग शरीर के लिये करते, ओर में शब्द का प्रयोग अपने चैतन्य के लिये करते। लोग शरीर को राम-नाम से संबोधते हे, तो राम ये हे! You are the nameless experience, you are the bodyless experience, you are the mindless experience. नाम तो समाज ने दिया हे, तुम्हारा नाम हे? तुम तो अनामी हो। nameless experience हो। तो स्वामी राम ने यह किया, में यानि के निर्मल चेतना; राम यानि की शरीर। एक दिन बाहर से आये, आश्रम में, हँस रहे थे, किसी ने पूछा क्यू हँस रहे हो? तो स्वामी राम ने कहा, आज एक आदमी राम को गालियाँ दे रहा था, ओर में देख रहा था। राम को गालियाँ दे रहा था, में देख रहा था। देखनेवाले को अलग दिखा। तुम सिर्फ द्रष्टा हो! यदि इतनी ही बात यदि हृदय में आ जाये, तो साधना की एक मास्टर की आपको प्राप्त होगी। आप साधना जगत में कही भी जा सकोगे। की मास्टर की हे, “में द्रष्टा हूँ।” वैभाविक जगत में कुछ भी कार्य मुझे करने का नहीं हे, न राग, न द्वेष, न कोई भी कर्तृत्व, में सिर्फ शरीर द्वारा जो क्रियाए हो रही हे, उसका द्रष्टा हूँ। “में द्रष्टा ही हूँ।” 

तो परसंग त्याग लाग निज रंगे – अस्तित्व को छुओ, अभि तक अस्तित्व को नहीं छुआ हे ना? क्या हमारी ये दरिद्रता हे! हम अप्पन को नहीं पहचानते हे! तुमने बोलो तो, तुम्हारे साथ कितना वार्तालाप किया हे? तुम्हारे साथ? सारे संसार के साथ बातचीत तुम करते हो, तुम्हारे साथ तुमने कभी बातचीत की? रात को बैठे कभी तुम?तुम्हारे साथ? ओर पूछा की भाई राकेश क्या किया तूने यह? तुम दोपहर में आवेग में कुछ कडवे शब्द बोल गए थे, क्या ठीक था वो? राकेश राकेश से पूछेगा, तुम अपने साथ बैठे हो कभी? दूसरों के साथ ही बैठे हो। पुरा जन्म दूसरों के साथ आपने बिता दिया हे, अब क्या करना हे, अपने साथ आना हे। 

परसंग त्याग लाग निज रंगे – ओर तब क्या होगा?  आनंद वेली अंकुरा – आनंद अंकुरित हो जाएगा, आनंद develop होता जाएगा। निज अनुभव रस लागे मीठा – अपना ये अनुभव कितनों तो मीठा हे? शब्दों में हम नहीं कह सकते, you can experience it, you can’t say it “निज अनुभव रस लागे मीठा” ओर एक appropriate उपमा देते हे – “जिम घेबर में छुरा।” घेबर पड़ा होता हे, घी से सक्कर से भरा हुआ होता हे। टुकड़े करने हे, घेबर के, तो छुरी लगानी होगी, वो छुरी घी से, सक्कर से ओतप्रोत हो जाएगी, लतपत हो जाएगी। तो जैसे घेबर में छुरा जाता हे, ओर अपने अस्तित्व को घी ओर सक्कर से बिलकुल ओतप्रोत कर लेता हे, वैसे ही हम यदि हम अपने अस्तित्व की ओर गए तो आनंद से अपना पुरा अस्तित्व भर जाता हे। अब बात यह रही – परसंग त्याग! कंकण को छोड़ने हे, हीरे प्राप्त करने हे, तैयार? नहीं तैयार! वो तो में हीरा कहता हूँ ना, आप कहाँ हीरा कहते हे? आपको कंकण ही हीरा लगता हे!

आनंदघनजी भगवंतने एक पद में बहोत अच्छी प्रस्तुति दी हे, कैसे परसंग त्याग हो सकता हे? बहोत सुंदर पद हे। ‘ना हम शब्दा, ना हम मनसा, ना हम तनकी धरणी, ना हम वेश, वेशधर नाही, ना हम कर्ता करणी, ना हम दर्शन, ना हम फर्सन, रसन, गंध, कछु नाही, आनंदघन चेतनमय मूरत, बार-बार बनी जाय’ कितना सुंदर पद हे! इस पद में आज थोड़ा उतरे। 

ना हम शब्दा – तुम शब्द नहीं हो। शब्द पौदगलिक घटना हे। तुम अपौदगलिक, ज्योतिर्मय घटना हो। तुम कौन हो? तुम ज्योतिर्मय घटना हो। सिर्फ कर्मों के बादल से तुम घेर गये हो। ये कर्मों के बादल छड़ जायेंगे, तो तुम्हारा रूप जो प्रगट होगा, वो कैसा होगा? ज्योतिर्मय स्वरूप! तो ना हम शब्दा, शब्द तो पौदगलिक घटना हे, में ज्योतिर्मय घटना हूँ। मेरा पुदगल से, शब्द से कोई लेना-देना नहीं हे। हा, जो शब्द प्रभु के प्यारे प्यारे शब्द हे, ओर जो शब्द मुझे अनुभूति की ओर ले जाते हे, उन शब्दों को में प्यार से देखूँगा। उन शब्दों का में स्वाध्याय करूंगा। लेकिन सिर्फ उन्ही शब्दों का, की जो शब्द मुझे अनुभूति की कगार पर ले जा सकते हे। शब्द अनुभूति की ओर आपको न ले जाये तो शब्द का कोई मूल्य नहीं। 

हमारे वहाँ द्रव्य श्रुत ओर भाव श्रुत की व्याख्या की गई हे। प्रभु के प्यारे प्यारे शब्द हे, आगमग्रंथ हे, नव पूर्व हे, चौदह पूर्व में से, नव पूर्व का ज्ञानी अभवी का आत्मा व्यर्थ! क्यों? प्रभु के शब्द प्राप्त कर लिए उसने, लेकिन अनुभूति उसके पास कुछ नहीं। आत्मतत्व को स्वीकारते ही नहीं; अनुभूति कैसे होगी? तो शब्द का मूल्य तभी हे, जब वो अनुभूति से सजा हुआ हो। 

एक गुरु ने एक शिष्य से एक बार कहाँ था, की मैंने सुना हे की तुम आत्मतत्व पर बहोत अच्छा बोलते हो, जरा मुझे तो सुनाकर बताओ। अब गुरु के पास बोलना! और बड़े ही ज्ञानी गुरु थे, लेकिन गुरु की आज्ञा हुई, चल बोल। डेढ़ घंटे तक वो शिष्य आत्मतत्व पर टु ध पॉइन्ट बोला, सिर्फ आत्मतत्व पर, ओर रेफ़रन्स पर रेफ़रन्स, उपनिषद के उदाहरण, वेदों के उदाहरण, डेढ़ घंटे तक बोला। ओर उसको लगा की जब मेरा प्रवचन पुरा होगा, गुरु मुझे बाहों में ले लेंगे, वाह, बहोत अच्छा बोलते हो तुम, लेकिन यह गुरु अलग थे। में बहोत बार कहता हूँ, गुरु को प्रसन्न करना बहोत ही बड़ी समस्या की बात हे। संसार में कोई भी आदमी हे, या तो पैसे से प्रसन्न कर लो उसे, राजी कर लो, पैसा नहीं चाहिये उसे, तो प्रशंसा दे दो। तुम बहोत अच्छे हो; खुश खुश हो जाएगा वो! गुरु को न तो पैसा चाहिये, न तुम्हारी प्रशंसा चाहिये। गुरु को सर्टिफ़िकेट, सिर्फ अपने गुरु का ओर प्रभु का चाहिये; तुम्हारा नहीं चाहिये। गुरु को कैसे राजी करोगे तुम? तुम्हारे जीवन परिवर्तन के अलावा, एक भी चीज ऐसी नहीं हे, जिसे के तुम गुरु को राजी कर सको। तुम्हारा जीवन परिवर्तित हो गया, गुरु कहेंगे वाह बहोत अच्छा किया। 

उपबृंहणा हमारा सम्यग्दर्शन का आचार हे। ओर उपबृंहणा का मतलब ये हे, की तुम कोई भी गुण में आगे बढ़े तो हम तुम्हारी उपबृंहणा करेंगे, वाह! तूने बहोत अच्छा किया! 

तो ये गुरु अपने, न तो पैसे से राजी होनेवाले हे, न तो प्रशंसा से राजी होनेवाले हे। तो ये भी गुरु एसे ही थे। जब उसका प्रवचन पुरा हुआ, शिष्य का, तो गुरु ने क्या कहा मालूम हे? गुरु ने कहा, you can’t fill your stomach with the picture of the cakes. भाखरी के चित्र से पेट नहीं भरा जाता! तुम्हारे पास भाखरी कहाँ हे?  ये तो भाखरी के चित्र थे! You can’t fill your stomach with the picture of the cakes. गुरु उसके मुंह को देख रहे थे। ओर हृदय का प्रतिबिंब मुख पर, आँख पर, बहुत ही सहजता से झलकता हे। मुख पर कुछ आनंद नहीं था, चैतन्य की प्राप्ति हुई हो, एसे कोई आसार नहीं थे। तो गुरु ने कहाँ तुम्हारे पास भाखरी नहीं हे, भाखरी के चित्र हे। ओर भाखरी के चित्र से कुछ नहीं होता हे। जाओ। गुरु लो रिझाना बहुत बड़ी बात हे। 

एक साधक दस साल तक साधना कर के गुरु के पास आया। हम साधना तो करते हे लेकिन क्या होता हे, की ओवर एस्टिमेशन हमारा हमारे साधना के प्रति होता हे। ओवर एस्टिमेशन। साधना जितनी हो, इससे भी ज्यादा बढ़ा- चढ़ाकर हम उसे मानते हे। ये शिष्य का भी एसा हुआ। दस साल तक साधना की जंगल में, मान लिया, उपलब्धि मुझे हो गई। गुरु के पास आया, कुछ बोलता नहीं हे, गुरु के पास कैसे बोलूँ? मुझे उपलब्धि हो गई हे। लेकिन गुरु उसके मुँह से भाप गए, की ये मानता हे, की मुझे उपलब्धि हो गई हे, उसके पास उपलब्धि के नाम पर कुछ भी नहीं हे। तो गुरुने कहाँ तु क्या मानता हे? तु मानता हे मुझे उपलब्धि हो गई? अरे तेरे पास अनुभूति का समंदर तो नहीं, छोटी नदी भी नहीं हे! एक नाव भी उसमें चल नहीं सकती हे! जा पीछे! फिर दस साल तक साधना की! फिर दस साल तक साधना घूँटकर आया! तो गुरुने कहाँ ठीक हे अब, नाव चल सकती हे, एक छोटी सी नदी में, लेकिन बड़े-बड़े स्टीमर उसमे चल नहीं सक पाएंगे। तुम्हारे पास समंदर कहाँ हे, अनुभूति का? जाव पीछे! दस साल गया! कुल तीस साल के बाद जब आया, तब गुरुने उसकी साधना को सर्टिफायड किया। आपने कितने साल तक साधना की हे? 

ना हम शब्दा, शब्द तुम नहीं हो! ओर शब्द का असर हो तो कब हो? जब प्रभु का शब्द हो तो, सद्गुरु का शब्द हो तो, या तो कल्याणमित्र का हो तो, या तो किसी आदमीने कह दिया, की ये दोष तुम्हारे में हे, वो ठीक नहीं हे; उसे भी स्वीकार कर लो। कोई भी आदमी ने कह दिया, ये दोष तुम्हारे में ठीक नहीं हे। तुमने स्तवन तो राग से गाये, ठीक से बोले, लेकिन ये नमूत्थुणं ओर ये जावंती इतनी स्पीड से बोले, ये नहीं अच्छा हे। आपको आपकी भूल मालूम होनी चाहिये, आप कह देंगे, सॉरी सर, अब से ठीक ठीक बोलूँगा। लेकिन एसे शब्द हे, जिसका तुमसे कोई संबंध नहीं। उस शब्द को छोड़ दो। किसी ने कहा नालायक, पागल, ठीक हे। उसने क्रोध में बोल दिया, उसको ही सौंप दो वो शब्द! तुम क्यों रखो? उस शब्द के साथ संबंध बनाने की जरूरत क्या हे? 

बुद्ध एक पैड के नीचे ध्यान के लिए बैठे थे, ओर एक अनाड़ी आदमी आया, ओय यहा क्यू बैठे हो? ये मेरे खेत में जाने का रास्ता हे, जंगल का मामला था, कही से भी खेत में जाया जा सकता था, लेकिन अनाड़ी आदमी किसको कहते हे?! बुद्ध ने सोचा, इसको अप्रीति हो रही हे, चल हम यहाँ से उठ जाये, दूसरे पैड के नीचे बैठेंगे, हमें क्या हे? 50 मीटर दूर दूसरे पैड के नीचे, बुद्ध ओर आनंद दोनों बैठ गए। वो आदमी फिर से वहा आया, भैया अब तेरा खेत भी नहीं, तेरा ओर खेत का रास्ता भी नहीं, अब क्या हे? तुम इतने बौद्धिक लगते हो, समझदार लगते हो। फिर भी ऐसी गलती तुमने क्यों की? मेरे खेत के रास्ते में क्यों बैठे थे? तो बैठे थे तो उठ गए, अब क्या हे? लेकिन अनाड़ी आदमी किसे कहते हे? आधे घंटे तक उसने नॉन-स्टॉप गालियाँ दी! तुम एसे हो, तुम वैसे हो, समाज पर भाररूप ओर समाज की भिक्षा लेते हो, क्या करते हो तुम, समाज की सेवा नहीं करते हो! एसा वैसा बोला! आधे घंटे तक बोला, बुद्ध हसते ही रहे! अब क्या होगा? बोलो तो? एक्शन के सामने रिएक्शन नहीं होगा तो गाड़ी चलेगी आगे? 

एक्शन के सामने रिएक्शन, ये तुम्हारी रीति हे ना, ये प्रभु शासन की रीत क्या हे मालूम हे? एक्शन के सामने नॉन-एक्शन। रिएक्शन नहीं। नॉन-एक्शन। कहता हे, सुन लो। क्या हे? में बार-बार पूछता हूँ, कोई तुम्हें गाल पर थप्पड़ दे देंगा तो सूझन आ जाएगी, लेकिन कडवे शब्द कोई कह देंगे तो कान में सूझन आ जाती हे? क्या होता हे? क्या फरक पड़ता हे? 

तो बुद्ध के पास एक्शन के सामने रिएक्शन नहीं था। नॉन-एक्शन था। हँसते ही रहे, वो बोलते स्टॉप हो गया, गया। फिर आनंद से बुद्ध ने पूछा, बुद्ध ने कहा कैसा रहा आनंद? आनंद कहता हे, अरे! प्रभु! आप कैसे स्वस्थ रह सकते हो? आधा घंटे तक वो गालियाँ बॅक रहा था, ओर आप प्रेम से सुन रहे थे! क्या हे मास्टर की, आप के पास? वो तो दीजिए। बुद्ध ने बहुत ही सरल अंदाज से आनंद को समझाया, की आनंद! तु भिक्षा के लिए गया हे, छ रोटिया तुझे लाने की हे, छ रोटी आ गई, शाक भी आ गया; अब तु आश्रम की ओर आ रहा हे। बीचमे एक उपासक मिल गया, मेरे घर पर आप पगली करो। अरे भाई आज का भिक्षा का प्रबंध हो गया हे। नहीं, नहीं, मेरे घर पर तो आना ही होगा। तो उसके घर पर गया, बुद्ध कहते हे; वो तो भक्त आदमी था, पंद्रह-बीस रोटीयां उसने हाथ मे ली, ल्यो महाराज साहेब! अब तु क्या करेगा? तु कहेगा भैया, दस रोटिया नहीं, पंद्रह नहीं, एक नहीं, आधी नहीं, पाव रोटी भी नहीं, आज की रोटिया हो गई हे; अब तेरे आग्रह से आया हूँ, थोड़ा सा गुड ले ले; बस तु गुड लेकर के वहाँ से लौट आया। अब में पूछता हूँ, की उस उपासक ने पंद्रह, बीस रोटियाँ, ऑफर की थी, तूने ली नहीं, अब कहाँ गई वो रोटियाँ? तेरे पात्र में के उसके बर्तन में? आनंद ने कहा सीधी बात हे, मैंने लिया ही नहीं, तो मेरे पात्र में कैसे रहे, उसके पात्र में रहा। तो बुद्ध ने कहा एसा ही हुआ था यहा। उसके पास जो था, वो उसने ऑफर किया। जिसके पास जो होता हे, वो ऑफर करता हे ना । उसके पास गालियाँ का भंडार था तो ऑफर कर दिया। मैंने कहा मुझे नहीं चाहिये, नो प्लीज़, अब कहाँ रही? आपको ये मंत्र आ गया? No please. लाऊडली नहीं बोलना हा! धीरे से मन में बोलना! मन में धीरे से बोलना; वो गालियाँ बक रहा हे, कडवे शब्द दे रहा हे, no please, मुझे नहीं चाहिये! जैसे हमारा एक सूत्र हे ना, हम वहोरने के लिए आते हे, ये हमारी माताए कितनी तो भावुक होती हे। महाराज साहेब ये लो, महाराज साहेब ये लो, महाराज साहेब ये लो; हमारे साधु क्या कहेंगे? मैया खप नहीं, मैया खप नहीं, मैया खप नहीं। तो आपका भी सूत्र यही होगा, no please! 

तो ना हम शब्दा। हम शब्द नहीं हे। शब्द पौदगलिक घटना हे। में ज्योतिर्मय अस्तित्व हूँ। पर के संग से छूटा पड़ना हे। तुम कौन हो? तुम ज्योतिर्मय तत्व हो। अपने को तो पहचानो! कौन हो तुम? रात 12 बजे कोई आएगा, तुम्हारे रूम में? कौन हे आप? चीमनलाल छगनलाल; चीमनलाल छगन लाल तेरे शरीर का नाम हे, तु कौन हे? कभी कहा आपने? में आनंदघन हूँ! क्या तुम आनंदघन नहीं हो? तेरसों बरस पहले आनंदघन हो गए एसा नहीं, आप सब आनंदघन हे। पिडाघन क्यू हो गए आप? घटनाओ के चक्कर में पड़ने से। तो घटना, घटना हे; तुम, तुम हो; घटना का संबंध छोड़ दो। तुम आनंदघन ही हो ना? 

हम आनंदघन कैसे हे बोलो? आज महेल जैसे उपाश्रय में रहेंगे, कल विहार करेंगे, छोटा स उपाश्रय आया, फ्लोर का भी ठिकाना नहीं हे। ऊपर भी ठिकाना नहीं हे, हम प्रेम से रहेंगे। प्रेम से। क्यू? क्या हे हमारे पास? घटनाओ से हम बिलकुल अलिप्त होते हे। ये उपाश्रय यहाँ, समझो की पालिताना से हम विहार करे, छोटा उपाश्रय आया, असुविधाओ से युक्त, उस समय यदि पालिताना का उपाश्रय हमें याद आएगा तो हम भी दुखी हो जायेंगे हो। वो कितना सुंदर उपाश्रय था, ये तो अच्छा नहीं हे; लेकिन साधु के पास पूर्व की स्मृति होती ही नहीं, घटना गई सो गई, इसके साथ कोई संबंध नहीं हे।

ना हम शब्दा। ना हम मनसा। हम मन भी नहीं हे। विचार हम नही हे, विचार हमारा स्वभाव नहीं हे। बड़ी सुंदर बात प्रभुने कही हे, प्रभुने कहाँ, उपयोग तेरा स्वरूप हे। ज्ञान, दर्शन, रूप उपयोग तेरा स्वरूप हे। तेरा स्वभाव हे, विचार करना वो मनोयोग के कारण हे। आपको तो अयोगी होना हे। हम चौदह गुणस्थानक पे जायेंगे तब क्या होंगे? अयोगी हो जायेंगे, न तो मनोयोग होगा,  न वचनयोग होगा, न काययोग होगा। तो मन से कुछ भी विचार का नहीं होता। ओर साधक के लिए प्राथमिक सज्जता यही हे, की वो निर्विकल्प हो। शास्त्रो में साधक के लिए पुरी सज्जता यही बताई गई की, वो निर्विकल्प होना चाहिये। 

महोपाध्याय यशोविजयजी सवासों गाथा के स्तवन में लिखा, ‘निर्विकल्प उपयोग मा, नहीं कर्मनो चारों’ जब तुम्हारा उपयोग निर्विकल्प हो गया, तो कर्म का प्रवेश कहाँ से? एक बात समझ लो, विकल्पों पर इतना हल्ला क्यों मचाते हे, शास्त्रकार भगवंत? विभाव और विकल्प में साँठ-गाँठ हे; राग, द्वेष सत्ता में पड़े हुए हे, तो कभी न कभी उद्दित तो होंगे ही; लेकिन राग, द्वेष का अंगार उत्पन्न हुआ, विकल्प आ जायेंगे, तो वे भड़क जायेंगे, ओर उस समय जागृति आ जाएगी, तो वे शांत हो जायेंगे। तो आप विभाव पर नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकते हो, तो विकल्प पर नियंत्रण स्थापित करना हे। 

समझो की आप आपके कमरे में बैठे हो, समभाव में बैठे हो, ओर संकल्प भी किया, की सामायिक में तो नहीं उठेंगे, मुझे समभाव में रहना हे। बैठे हो, एक आदमी रूम में एन्टर हुआ, आप इसको पहचानते नहीं हो, आपको जिज्ञासा होगी, ये कौन हे? क्यू आया होगा? जिज्ञासा हुई, तो जिज्ञासा हुई, विचार आया, लेकिन राग-द्वेष नहीं हुआ, राग-द्वेष नहीं हुआ; फिर दूसरा आदमी आया, ओर उस पर आपको तिरस्कार था, वो आदमी आया, आपके मन में तिरस्कार की एक ज्वाला पेदा हुई, ये?! ये क्यू आया यहाँ? मेरे घर पर क्यू आया? अब इस समय जागृति जो आ जाएगी की, अरे! मुझे समभाव में रहना हे; उसने जो किया सो किया, अरे उसने कहाँ किया हे? मेरे कर्मने किया हे, वो तो निमित्त हे सिर्फ, इस बात को छोड़ दो, ये तो सिद्ध भगवान हे भविष्य का, तो तिरस्कार छूट जाएगा। लेकिन विकल्प गहरे होंगे तो? सामने इस व्यक्ति, इसने कितना मेरा बिगाड़ा? कितना बिगाड़ा? मेरे लिए एसी एसी बाते फेलाई। ये तो बहुत ही मेरा दुश्मन हे! तो विकल्प आ गया तो क्या होगा? तिरस्कार का जो विभाव हे, वो बिलकुल उद्दीप्त हो जाएगा। तो विभाव ऊपर तुम नियंत्रण नहीं स्थापित कर सकते हो, तो विकल्प पर नियंत्रण स्थापित करना है। 

ओर इस कड़ी में मे कहूँ, के विचार अलग हे ओर विकल्प अलग हे। एक विचार आया, क्यू आया होगा? कौन हे यह? विचार हे, क्यूँ? इसमें राग-द्वेष घुले हुए नहीं हे, लेकिन दूसरा आदमी आया, तिरस्कार आ गया, तो ये जो तिरस्कारवाला विचार हे, वो विकल्प आया, तो राग, द्वेष, अहंकार, ईर्ष्या से युक्त विचार को हम विकल्प कहते हे, ओर एसे ही आये हुए जो विचार हे, उसको विचार कहते हे। साधना में विकल्प जो हे, वो अवरोध रूप हे। विचार को तो फिर दूर कर देंगे, बाद में, लेकिन पहले विकल्पों को हटाना हे। तो ना हम शब्दा, ना हम मनसा। तो तुम कौन हो? तुम शब्द भी नहीं, तुम विचार भी नहीं, तो तुम कौन हो? तुम ज्योतिर्मय तत्व हो। ओर उस ज्योतिर्मय तत्व की अनुभूति के लिए प्रैक्टिकल साधना शुरू।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *