વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત
Subject: अंतर्मुख दशा
अंतर्मुख दशा के चरण में हम है तो बाहर ही, लेकिन हमारा मुख, हमारी विचारधारा स्वरूपानुसंधान की ओर बढ़ रही है। जब हम बहिर्मुख थे, तब बाहर ही बाहर हमारा रस था। बाहर का वह रस थोड़ा टूट गया, भीतर की आनंदमयी यात्रा का कुछ-कुछ अनुभव हुआ; हम अंतर्मुख हुए।
वेश परमात्मा के प्रति अहोभाव। आपको मालूम है कि साधु-साध्वी महात्माओं के पास एक पैसा भी नहीं है, एक मकान भी नहीं है और फिर भी उनके चहेरों पर गज़ब की प्रसन्नता है! उनको पूछो कि महाराज सा! एसी शाता कहाँ से आई? तो वह कहेंगे: “देव गुरु पसाय। प्रभु ओर गुरु की कृपा से”। उनकी यह मस्ती अगर आपको पसंद आ जाए, तो अंतर्मुख दशा की ओर आपकी यात्रा शुरू हो जाए।
प्रभु की आज्ञा अनुसार, सद्गुरु की आज्ञा अनुसार कोई भी अनुष्ठान करनेवाले साधक को हम अनुष्ठान परमात्मा कहेंगे। आपका अहंकार थोड़ा भी गलित हुआ हो, तो किसी भी अनुष्ठान परमात्मा के प्रति आपको अहोभाव आएगा ही।
મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ – પાલીતાણા વાચના – ૪
देवाधिदेव परमतारक शत्रुंजय तीर्थाधिपति श्री ऋषभदेव प्रभु के चरणों में वंदना। सद्गुरुदेव पूज्यपाद अरविंदसूरि दादा के चरणों में वंदना।
आंतरयात्रा में जाना हे, बाहर तो बहुत घूमे, बहुत भटके, बाहर क्या मिल सकता हे? जब कुछ हे ही नहीं तो! भीतर जाना हे; आंतरयात्रा में।
तीन चरण हे आंतरयात्रा के, अंतर्मुख, दशा, अंतःप्रवेश दशा, ओर अंतर्लीन दशा। पहला चरण अंतर्मुख दशा, हे तो हम बाहर ही, लेकिन हमारा मुख, हमारी विचारधारा स्वरूपानुसंधान की ओर बढ़ रही हे। जब हम बहिर्मुख थे, बाहर ही बाहर हमारा रस था, बाहर का रस थोड़ा टूट गया, भीतर की आनंदमयी यात्रा का कुछ-कुछ अनुभव हुआ, हम अंतर्मुख हुए। बहिर्मुखता में जैसा मैंने कल बताया था, अहंकार का प्राबल्य होता हे, अंतर्मुख दशा में अहोभाव का प्राबल्य होता हे।
तो भक्त का एक मार्ग हे, अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने का, ओर उस मार्ग का नाम हे- अहोभाव। साधक का मार्ग थोड़ा अलग हे। उसकी चर्चा हम पीछे करेंगे। भक्त का जो मार्ग हे, वो मार्ग अहोभाव का हे। रूप परमात्मा के प्रति अहोभाव, परमात्मा का दर्शन हुआ, भीगे भीगे हम हो गए। शब्द परमात्मा के प्रति अहोभाव, ओर वेश परमात्मा के प्रति अहोभाव। ये श्वेत वस्त्रों का समंदर! कैसा तो अच्छा लगता हे! आंखे हमारी नम जो जाती हे, प्रभु के वेश परमात्मा को देखकर। मेरी बात का करू तो, कोई भी वेश परमात्मा को में देखता हु, हृदय में आनंद छा जाता हे, लेकिन जब में कोई बालमुनी को देखता हूँ, या नन्ही-मुन्ही आठ साल को कोई साध्वीजी भगवती को देखता हूँ, तब तो मेरे आँखों के आँसू रुकते नहीं हे। होता हे- क्या प्रभु शासन का प्रभाव हे! इतनी छोटी वय में ये बच्चे प्रभु शासन को समर्पित हो गए! ओर कैसे होंगे, उनके मात-पिता, जिन्होंने अपने संतान को प्रभु शासन को समर्पित कर दिया! अहोभाव अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने का, भक्त का मार्ग हे। हम पहले में यह मार्ग की चर्चा इसलिए कर रहा हूँ, की आपके पास अहोभाव हे ही। पालिताना में आप आये हे, जहाँ आप जायेंगे, वेश परमात्मा का दर्शन होगा। रूप परमात्मा का दर्शन तो मंदिर में होगा, शब्द परमात्मा का दर्शन – श्रवण उपाश्रय में होगा, लेकिन वेश परमात्मा का दर्शन तो गली-गली में होगा। तो वेश परमात्मा का दर्शन मेरे भगवान के ये साधु! मेरे भगवान के ते साध्वी! जुड़ाव प्रभु के साथ हे, मेरे प्रभु के साधु! मेरे प्रभु के साध्विया! आपके पास जो अहोभाव हे, शायद Beyond the words है।
मेरे जीवन की एक घटना कहूँ, ग्यारह बर्ष की उमरमें मैंने दीक्षा ली, में बारह बर्ष का थे, दीक्षा को एक ही बर्ष हुआ था। एक दिन हम विहारयात्रा में था, यु तो मुझे वहोरने के लिए गुरुदेव भेजते नहीं थे। उस दिन गुरुदेव ने कहा, यशोविजय तुझे वहोरने के लिए जाना हे। हमारे वहाँ guru is the supreme boss. सद्गुरु ने जब आज्ञा दी हे, तब सोचने की कोई बात हमारे पास होती ही नहीं। सद्गुरु की आज्ञा हमारे लिए जीवनमंत्र होती हे। आणाए धम्मो। गुरुदेवने कहाँ, तुझे वहोरने के लिए जाना हे, मैंने कहाँ गुरुदेव तहत्ति। में वहोरने के लिए उठा, पहले ही घर में मे गया, अपरिचित गाँव था, अपरिचित घर थे, लेकिन जैनो का महोल्ला था, सब घर जैनो के थे, तो पहले घर में मे प्रविष्ट हुआ। धर्मलाभ मैंने कहा। रसोई घर में से माता की आवाज आई। साहेबजी पधारो, पधारो। मैंने देखा लोअर मिडल क्लास का घर था, रसोई घर में जाकर देखा, दूध तो था ही नहीं, चाय बनी हुई थी। मैंने सोचा शायद एक लीटर या पोने लीटर दूध आया होगा, उसमे में से चाय बनी हुई हे, और घर के सारे सदस्यों को पीने का बाकी हे, तो मैंने कहाँ उस माँ से, मुझे सिर्फ आधा कप चाय चाहिये, ज्यादा नहीं। कैसी भावधारा! इन माताओ के पास हे! बड़े बड़भागी हे हम, की जन्म से हमें ये अहोभाव की धारा मिल गई! उस माँ ने कहाँ, गुरुदेव! पात्र तो नीचे मूकों, पात्र नीचे नहीं मुकेगे, में कैसे वहोराऊँ? मैंने विवश होकर पात्र नीचे छोड़ दिया, पात्र माँ के हाथ में आ गया। फिर में ना ना ना करता रहा, मेरा पुरा पात्र चाय से भरा गया। उस माँ ने सोचा नहीं, की अभी ये चाय वहोरादूँगी मे, फिर घर के सदस्यों के लिए चाय कैसे बनेगी? दूध के पैसे हे की नहीं हे?! एसी हालत में भी एसा भाव! पुरा पात्र मेरा चाय से भर गया! ओर उस समय मेरी आंखे भी आँसु से भर आई, ओर मेरे आँख के आँसू प्रभु से कह रहे थे, प्रभु में तेरी आज्ञा पथ पर कैसे दौड़ता हूँ, ये में जानता हूँ। लेकिन सिर्फ तेरी चद्दर पर लोगों का यह अहोभाव! प्रभु तूने बहुत कुछ हमें दिया हे! ये सफेद चद्दर को आप देखते हो, आपका मस्तिस्क झुक जाता हे, मेरा भी झुक जाता हे। हम आचार्य हे, हम उन्ही साधुओ को, साध्वीओ को वंदन नहीं करते, लेकिन अनुवंदन जरूर करते हे। उन्होंने वंदन समर्पित किया, हम सामने से वंदन करेंगे, पत्र में भी हम लिखेंगे, अनुवंदन हे हमारा। आपको धर्मलाभ देंगे, उनको अनुवंदन देंगे। आपने वंदन किया हे, हम भी वंदन करते हे, नमो लोए सव्वसाहूणं। तो यह अहोभाव कितना स्वभाविक हे आपके पास, बोलो तो? ये जन्म से मिला हुआ है!
हम छोटे थे ना, शायद 1 या 2 मास के होंगे हम, ओर माँ हमको लेकर गुरुदेव के पास गई हुई थी। ओर गुरुदेव से विनती की थी की, आप नवकार मंत्र उसे सुनाओ। ये हमारा जिनशासन हे। अभि-अभि एक माता 2 साल के बच्चे को लेकर मेरे पास आई थी। ओर माँ ने जो कहा, मेरी आंखे नम हो गई। माँ ने कहा गुरुदेव! दो साल का यह बच्चा हे, जन्म से अभी तक उसने रात को पानी भी नहीं पिया हे, तब होता हे, जन्मांतरिय साधना को लेकर ये बच्चा आ गया हे। ओर एसे कोई भी आया, जहाँ जन्मांतरिय साधना पर थकी develop हो सके।
By the way में आपको से कहूँगा, आपकी वहाँ भी जो संतान आती हे, पूर्व के पुण्य को लेकर आती हे, शायद पूर्व जन्म में कुमारपाल राजा की तरह उसने प्रभु से प्रार्थना की होगी, प्रभु! अगले जन्म मे मुझे तेरा शासन मिलना चाहिये। चक्रवर्ती के घर में पेदा हो, या देवलोक में पेदा हो, एसी मेरी कोई इच्छा नहीं हे। मेरी एक ही इच्छा प्रभु जहाँ पर भी पेदा हो, तेरा शासन मुझे मिल जाये। ओर एसी भावना को लेकर, एसी प्रार्थना करके ये संसार आपके वहाँ आएंगे, अब आप क्या करोगे? आपका कर्तव्य यही हे, की ये जो बच्चा पुण्य लेकर आया हे, उस पुण्य को आप develop करो। उसको सिर्फ बोर्नवीटा नहीं पिलाना हे, उसको चौविहार कराना हे। चौविहार न कर सके तो, तिविहार कराना हे, क्योंकि आपके पास वो बच्चा आया हे, आपके वहाँ वो बच्ची आई हे।
तो वेश परमात्मा के प्रति अहोभाव, आपके पास भी हे। ओर अंतिम चरण हे, अनुष्ठान परमात्मा के प्रति अहोभाव। उपाश्रय में आप गए हे, एक साधक सामयिक कर रहा हे। आपका सर झुक जाएगा, और आपको मालूम होगा, ये साधक दिन के पाँच-छ सामयिक करते हे, आपकी आंखे बरस जायेंगी! आप प्रभु से कहेंगे की प्रभु! एक साधक पर आपकी इतनी कृपा बरसी, की ये रोज पाँच, छ, सामायिक कर सकता हे; में एक भी नहीं कर सकता हु, प्रभु! मुझे शक्ति दो। तो अनुष्ठान करनेवाले कोई भी साधक को हम अनुष्ठान परमात्मा कहेंगे। ओर अनुष्ठान परमात्मा के प्रति भी हमारा अहोभाव होना चाहिये।
एक घटना में आपसे कहूँ, इसी पालिताना में गुरुदेव अरविंदसूरि दादा के सनिध्य में हम लोग चातुर्मास थे। आचार्य रत्नसुंदरसूरिजी भी हमारे साथ थे। उस चातुर्मास में बहुत ही साधक साधना करने के लिए आये थे। हिमतभाई बेड़ावाले भी साधना करने के लिए आये थे, चातुर्मास में हिमतभाई की ओली चल रही थी, वर्धमान तप की। शायद 88 ओली पूर्ण हुई ओर 89 ओली का प्रारंभ उन्हे करना था, बिना पारणा किये, उन्हे लगा की शरीर अच्छी तरह से चल रहा हे, साधना में कर रहा हूँ। तो फिर घी – दूध की शरीर को क्या आवश्यकता हे? आयंबिल के भोजन से अप्रमाद भी रहता हे। साधना अच्छी होती हे। तो पारणे की आवश्यकता क्या हे? तो बिना पारणा किये 88 के ऊपर 89 ओली का फिटार करना था। जिस दिन नई ओली का प्रारंभ करना था, उस दिन प्रभु की विशेष रूप से पूजा की। प्रभु से प्रार्थना की, प्रभु तेरी कृपा से मेरी ये साधना साकार हो। एक बात याद रखना, आप जो भी साधना कर रहे हे, प्रभु की कृपा से कर रहे हे, सद्गुरु के आशीष से कर रहे हे; आपका कर्तव्य, आपका निजी कर्तव्य नहीं के बराबर हे। आपका कर्तव्य हे ही नहीं! प्रभु की कृपा बरस रही हे, सद्गुरु की कृपा बरस रही हे; आपको चलना हे, दौड़ना हे। तो में साधना कर रहा हूँ; एसा भाव, एसा अहंकार कभी भी साधक को नहीं आता। में आज भी प्रभु से प्रार्थना यह करता हूँ, की प्रभु! तूने कैसे कृपा की, के तेरा संयम मुझे मिल गया! मेरी कोई सज्जता नहीं थी। जब दीक्षा हुई मेरी कोई सज्जता नहीं थी।
एसा हुआ की 8 साल की वय में टाइफोइड हो गया था। छोटा सा गाँव था हमारा, वहाँ मेडिकल सुविधाए नहीं थी। पास के टाउन में मुझे भेजा गया हॉस्पिटल में, seven week हो गए लेकिन ताव कम नहीं हो रहा था। शरीर मेरा दुर्बल हो गया। उस समय मेरी माँ की आंखे भर आई, ओर माँ ने प्रभु से प्रार्थना की, प्रभु! ये मेरा बच्चा अब रहेगा, नहीं रहेगा, मुझे मालूम नहीं हे। लेकिन यदि वो स्वस्थ हो जाएगा तो तेरे चरणों पर उसे समर्पित कर दूँगी। ओर माँ की ये प्रार्थना, में स्वस्थ हो गया। फिर माँ ने कहाँ, मैंने प्रभु से प्रार्थना की हे, की तु स्वस्थ हो जाएगा, तुझे दीक्षा लेने की। मैंने कहा हा, माँ में तैयार हूँ। बिलकुल तैयार हूँ, तेरी इच्छा का पालन करना मेरा कर्तव्य हे। तो कोई इच्छा मेरी होगी, एसा आज भी मुझे नहीं लगता हे। लेकिन प्रभु की कृपा, सद्गुरु के आशीर्वाद, ओर माँ की ये भावना, में इस पथ पर आ गया। तो तुरंत मेरी आँख भीगी होती हे, की प्रभु कैसी तेरी कृपा!
हम जब सुबह उठते हे तो क्या करते हे मालूम? रजोहरण को मस्तक पर लगाते हे, ओर उस समय हमारी आँख नम हो जाती हे। ओर हमारी आँख के आँसू प्रभु से कहते हे, प्रभु! मेरी कोई सज्जता नहीं, मेरी कोई पात्रता नहीं, मेरी कोई लायकात नहीं, ओर तूने तेरा परम वरदान मुझे दे दिया! प्रभु तेरे इस ऋण से में मुक्त कैसे हो पाऊँगा? में बार-बार कहता हूँ, हमारी ओर आपकी साधना सिर्फ ऋणमुक्ति का एक आयाम हे। प्रभुने इतना दे दिया हे, इतना दे दिया हे, के प्रभु के ऋण से हम मुक्त कैसे हो सकें?! अब जो भी साधना करेंगे, ऋणमुक्ति का एक उपाय होगी, ऋण मुक्ति का एक आयाम होगा।
तो हिमतभाई बेड़ावाले तो बड़े प्रभुनिष्ठ थे, ओर गुरुदेव कैसे मिले थे उनको! पंन्यास प्रवर गुरुदेव भद्रंकर विजय महाराज साहेब! हमारे युग में प्रभु भक्ति की बाहार लानेवाले ये सद्गुरुदेव थे! प्रभु की कृपा की बात हमारी परंपरा में भी हे। आनंद की घड़ी आई, स्तवन देखो, एक ही बात हे, प्रभु तूने सबकुछ किया, मैंने कुछ भी नहीं किया हे। ‘तीन वेद का छेद कराकर, क्षपकश्रेणी मंडवाई’ मैंने कुछ भी नहीं किया हे प्रभु! तूने सबकुछ किया हे! लेकिन ये धारा शास्त्रो में थी, स्तवनो में थी, 100-150 बर्ष से वो धारा हमारे व्यवहार से लुप्त हो गई। उस धारा को पुनर जीवंत किया, पंन्यास गुरुदेव भद्रंकरविजय महाराज ने। उसके बाद उनके अनुयायी आये, कलापूर्ण दादा, ओर हम ये तीनों गुरुदेवों के बहुत बहुत बहुत ऋणी हे, की हमारे इस युग में परमात्म भक्ति का, परमात्म कृपा का एक नया आंदोलन उन्होंने चलाया।
हिमतभाई बेड़ावाले प्रभु के पास गए, प्रभु से प्रार्थना की, प्रभु! में ओली शुरू कर रहा हूँ, ओली करानी, नहीं करानी तेरे हाथ में हे। में तो सिर्फ प्रारंभ करूंगा, आगे क्या करना तेरे हाथ में हे, मेरे हाथमें कुछ भी नहीं हे। गुरुदेवो से आशीर्वाद लिया, गुरुदेव मुझे आशीर्वाद दो, मेरी आराधना बहुत ही मंगल रूप से हो। ओली निर्विध्न रूप से हो इतनी ही बात नहीं थी, इस ओली में नई उपलब्धि मुझे होनी चाहिये। एक ओलीजी की आराधना मतलब एक नई उपलब्धि। भीतर के जगत में जाना हे, नई-नई उपलब्धियां एक-एक पथ पर होती चलेगी।
पालिताना में हम आंतरयात्रा की शुरुआत कर देंगे, ओर मुझे लगता हे की ये आंतरयात्रा आपकी जो शुरू हुई हे, चालु ही रहेगी। चालु ही रहेगी। बंध नहीं होगी कभी। सिर्फ आपका संकल्प, मैंने कल ही बताया था, प्रभु की कृपा बरस रही हे, सद्गुरु के आशीर्वाद बरस रहे हे; आपको उसे सिर्फ संकल्प करना हे। संकल्प तो हे ना? की संकल्प भी दे दूँ में? संकल्प तो हे ना? कल दोपहर मैंने कहा था, प्रभु को पाना हे।
मीरा ने आँखों में आँसू लाकर कहा था प्रभु से, प्रभु! में कैसे तुझे पाऊँ? मेरा जन्म इसलिए ही हे, की में तेरी प्राप्ति कर लु; लेकिन में कैसे तुझे पाऊँ? एक-एक साधना में आगे बढ़ते हे, एक-एक नई उपलब्धि आपको होती हे। सिर्फ आपके पास अभी तो शब्दों का मौन हे ना, अभी विचारों का मौन नहीं हुआ, की शब्द का मौन महिने डेढ़ महिने तक चलता तो विचारों का मौन भी स्टार्ट हो सकता लेकिन हमारे पास तो कम समय हे। नौमी तारीख को तो आपका सब चालु हो जाएगा,कारोबार, लेकिन ये पाँच-छ दिन के लिए भी शब्दों का जो मौन हुआ, उससे भी आपको जो उपलब्धि हुई, आप देखेंगे आप हेरान हो जायेंगे। आप समय-समय पर में जाते हे। आपने कुछ बोला, सामनेवाले व्यक्ति इम्प्रेस हो गया, आपके मन में अहंकार पेदा होगा। बोलो मेरी अभिव्यक्ति कैसी हे? वो विद्वान व्यक्ति हे, वो भी एकदम इम्प्रेस हो गया, अभिभूत हो गया, आप बोल-बोलकर क्या करोगे? ओर क्या किया आपने? शब्दों का उपयोग करके आपने क्या किया?
एलियन की एक कविता हे, ‘much is your building and not the house of god! Much is your writing but not the word of god!’ तेरे पास घर तो बहुत हे, मंदिर कितने तूने बनवाए? तेरे पास शब्दों का जो भंडार हे, लेकिन प्रभु के शब्द कितने? प्रभु के शब्द कितने? जो शब्द से प्रभु मिल सके, एसा शब्द कितने? एलियन जैसा यूरोप में जन्मा हुआ कवि पूछता हे? Much is your writing but not the word of god.
कबीरजी ने यही बात कही हे, कबीरजी ने कहा, ‘शब्द-शब्द बीच अंतरा, सार शब्द ग्रही ले’ एक शब्द ओर दूसरा शब्द बहोत अंतर होता हे, सार शब्द को पकड़ो, असार को छोड़ दो। साधकने पूछा गुरुदेव! सार शब्द की व्याख्या क्या होती हे? हमे क्या मालूम? कौनसा सार शब्द, कौन सा असार शब्द? तब कबीरजी ने कहा, “जो शब्दे साहिब मिले” “जो शब्दे साहिब मिले” प्रभु जिस शब्द से मिल सकते हे, वो सार शब्द। आपके पास एसे कितने शब्द हे? आपके वहाँ हम आते हे ना, धर्मलाभ देकरकर के, आपके वहाँ रेड लगाने के लिए आते हे, की आपके आपत्ति जनक सामग्री आपके पास हे? आपके घर में किताबे हे, कौन सी किताबे हे? उपदेशमाला आपके पास हे ना? ललितविस्तरा ग्रन्थ आपके पास हे? क्या हे आपके पास? आपके घर में चित्र हे, किनके चित्र हे? मुनि के चित्र हे? गजसुकुमाल मुनि के चित्र हे? क्या हे? एक श्रावक का घर कैसा होता हे?
तो कबीरजी कहते हे, सार शब्द ग्रही ले। जिन शब्दों से प्रभु से मिलन होता हे, वो शब्द को पकड़ो। एक पुस्तक हाथ में लिया, बुक सेल्फ से हाथमे आया। एक पन्ना पढ़ लिया, फिर पूछो अपनी जात से, की ये जो में पढ़ रहा हूँ उससे प्रभु का मिलन हो सकता हे? लगता हे की नहीं, की ये मनोरंजन की बाते हे यहाँ! मनोभंजन की बाते तो हे नहीं, पुस्तक बुक सेल्फ पर रखा देते है आप। आपके एक-एक क्षण कीमती हे। शायद आपको मूल्यवान नहीं लगता हे, प्रभु को मूल्यवान लगता हे।
आचारांगजी में प्रभुने एक बहुत सूत्र सुंदर दिया हे, ‘खणं जाणाहि पंडिए’ में उसका मुक्त अनुवाद करता हूँ। की बेटा! तु मुझे तेरा एक क्षण देगा? हम तो अभिभूत हो जायेंगे! अरे! प्रभु! पुरा जीवन तो तूने दिया हे, पूरे जीवन पर स्वामित्व तो तेरा हे, अब तु मांग मांग कर एक क्षण मांग रहा हे! प्रभु! दे, दिया क्षण! देंगे ना? की मना करेंगे? लेकिन आचारांगजी में प्रभु गुरु के तरह आए हुए हे। गुरु कैसे होते हे, आपको मालूम हे? आप आंगली देदोगे तो आपका हाथ पकड़ेंगे, हाथ देदोगे तो पूरे के पूरे गए आप। तो हमने कहा, प्रभु एक क्षण तो देदेंगे हम। तो प्रभुने कहा अच्छा, तु बहोत सरस बच्चा हे, मैंने मांगा ओर तूने दे दिया, लेकिन जो क्षण तु मुझे देंगा, वो राग-द्वेष से छला हुआ होगा तो नहीं चलेगा, अहंकार से लिपटा हुआ होगा नहीं चलेगा; मुझे तो शुद्ध क्षण चाहिये।
आज प्रैक्टिकल साधना में यह लेना हे। जब भी आपको समय मिले 5 मिनट 10 मिनट बैठे हुए हे, एक मिनट शुद्ध- एक मिनट में न राग का प्रतिबिंब हो, न द्वेष का प्रतिबिंब हो, न अहंकार का प्रतिबिंब हो, न ईर्ष्या का प्रतिबिंब हो। शायद 58 सेकंड हो गए अच्छे, 59 का सेकंड चल रहा हे, कोई व्यक्ति आया, उस पर तिरस्कार हे, ये साला कहा से आ गया? बस! आपका मिनट गया गया। एसे ट्राय तो करो, प्रयत्न हमें करना हे, सिद्धि प्रभु को देंनी है। प्रयत्न तो करो। ओर में बार-बार कहता हूँ, एक शुद्ध क्षण मिले तो प्रभु को दे देना। ओर दूसरा भी मिल जाये तो हमे दे देना, ओर फिर बाद में जितने भी शुद्ध क्षण हे वो आपके। बोलो मजा आ गया ना? आपके एक-एक क्षण की किंमत प्रभु को हे। एक क्षण में हम कहाँ से कहा जा सकते हे?! प्रसन्नचंद्र मुनि कहाँ से कहाँ गए? कहाँ सातवी नरक? ओर कहाँ केवलज्ञान? लेकिन इतनी मंझिल कितने मिनटों में, कितने सेकंडों मे हुई, आपको पता हे? तो आपका एक-एक क्षण मूल्यवान हे।
हिमतभाई ने प्रभु से प्रार्थना की, गुरुदेव से प्रार्थना की, फिर क्या किया? पन्ना रूपा धर्मशाला में हम थे, ओर जितने भी साधक प्रतिक्रमण के लिए आते थे, उन सबको अपने वहाँ भोजन के लिए निमंत्रित किया। दोपहर सब भोजन के लिए आ गए। 100-150 साधक। हिमतभाई खुद परोसने लगे, एसी काया हिमतभाई की दुर्बल, 88 आयंबिल हो गए हे, ऊपर उपवास भी हो गया हे, पर आज का आयंबिल बाकी हे, ओर वो हिमतभाई साधर्मिकों को परोस रहे हे। भोजन पुरा हुआ, संघ पूजन भी हो गया, फिर हिमतभाई खड़े हुए ओर उन्होंने कहा की आप सबसे में आशीष माँगता हूँ, आप सब एसे आशीष दो की मेरी आज से शुरू होती हुई ये ओली मंगलमय रूप से परिपूर्ण हो। सब साधकों की आँख में आँसू, एक साधक ने कहा, हिमतभाई आपकी साधना की प्रशंसा आचार्य भगवंत सुधर्मापीठ पर बैठकर कर रहे हे। आप हमको आशीर्वाद दो, हम कैसे आपको आशीर्वाद दे?! उस समय हिमतभाई के शब्द थे, आप सब अनुष्ठान परमात्मा हे! क्या शब्द हे! आप सब अनुष्ठान परमात्मा हे! प्रभुने जो अनुष्ठान फरमाए हे, सामायिक प्रतिक्रमण, पूजा ये सब अनुष्ठान आप करते हे। आप सब अनुष्ठान परमात्मा हे, आपके आशीष के बिना मेरी साधना शुरू नहीं हो सकती। आप सब मुझे प्रेम से आशीर्वाद दे। अहोभाव कितना घना हुआ होगा, तब ये घटना घटित हुई होगी! हिमतभाई बेड़ावाले आचार्य भगवंत सुधर्मापीठ पर बैठकर उनकी साधना की प्रशंसा करते हे। कई साधु भगवंतों को होता, ओर वो बोलते भी, अरे! हिमतभाई तुम हमे बंदन न करो, तुम्हारी साधना हमसे भी अधिक हे! एसे हिमतभाई! लेकिन कितने नम्र हे!
जब पन्नारूपा में आये थे, मेरे पास वाचना के लिए आते दोपहर को, पहले गुरुदेव के पास जाते वंदन करने, फिर मेरे पास आकर वंदन कर जाते, फिर सभी साधुओ को वंदन करते। उस समय मेरा शिष्य कोई कहता, हिमतभाई आपका वंदन हमको भारी पड़ जाएगा। हिमतभाई क्या कहते? अरे! गुरुदेव! एसा नहीं बोलना आप पंचमहाव्रत धारी हो! मेरे पास कहाँ पंच महाव्रत हे? मेरे मन में पंच महाव्रत पाने की बहुत लालसा हे लेकिन अभि तक में प्राप्त नहीं कर सका हूँ, आप पंचमहाव्रत धारी हो, आपके पंचमहाव्रत को में नमन करता हूँ। ओर फिर सबको बंदन करने के बाद मेरे पास वापस आते हे, फिर वंदन करके वाचना का आदेश लेकर वाचना लेते। ये अहोभाव! ये नम्रता! ये समर्पण!
अब अंतर्मुख दशा बिलकुल सरल हो गई ना आपके लिए तो? आप सब भक्त हे, आप सबके लिए अंतर्मुख दशा सरल हो गई! ओर में तो कहूँगा अंतर्मुख दीक्षा की ये जो बात हे, वो अंतर्मुख साधना की दीक्षा खुद प्रभुने ही की हुई हे। हमने कुछ प्रयत्न नहीं किया हे, प्रभुने ही ऐसे साधना प्रणाली दे दी, जहाँ अहोभाव ही अहोभाव हे। मैंने बहोत से समाजों की सभ्यता का अध्ययन किया, लेकिन हमारे जैनो के पास जो श्रद्धा हे, शायद दुर्लभ हे। आपके पास ये श्रद्धा, आपका समर्पण, आपकी ये भक्ति बेमिसाल हे, लाजवाब हे। लेकिन ये आपको जन्म से ही मिल गई, परंपरा से मिल गई; आपका कुछ सहयोग नहीं था उसमें, तो प्रभुने दिया हुआ हे सब। तो अंतर्मुख साधना की दीक्षा प्रभुने खुदने की हे। अब हम अंतर्मुख न बने तो हमारा बड़ा अपराध होगा!
में बार-बार साधु भगवंतों से, साध्वीजी भगवतीओ से भी कहता हूँ की प्रभुने एसी अच्छी साधना दी, में तो बार-बार कहता हूँ, विश्व की ये 700 साधना पद्धतिओ का मैंने अध्ययन किया, लेकिन प्रभु की साधना में जो निश्चय ओर व्यवहार का बेलेसिंग हे, एसा बेलेसिंग संसार की कोई भी साधना में मैंने तो नहीं देखा। तो एसी सुंदर साधना हमे मिल गई। ये साधना का हम तलस्पर्शी अध्ययन नहीं करेंगे, उसका आचरण नहीं करेंगे, उसका प्रेझन्टेशन नहीं करेंगे तो हम कैसे अपराधी हो गए?!
बॉम्बे में गोवालिया टेंक में मैंने ये ध्यान साधना प्रस्तुत की थी। जो अब रोज कर रहे हे, चार चरणों की साधना। एक सप्ताह तक साधना कराई मैंने, की इतने साधक मेरे पास आये, मुंबई में रहनेवाले साधक थे, ओर जिन्होंने संसार की उपलब्ध सभी साधनाओ का अध्ययन कर लिया था; विपस्यना में भी जाकर आये थे, समर्पण योग में जाकर आये थे, दूसरी साधना में जाकर आये थे, महेशयोगी में भी जाकर आये थे। इन्ही लोगों ने आँखों में आँसू के साथ कहा महाराज सा हमारे वहाँ इतनी सुंदर साधना हे ध्यान की, हमें तो पता ही नहीं था। बस आज हम प्रतिज्ञा लेते हे, की हम प्रभु की दी हुई साधना को ही करेंगे, दूसरी कोई साधना पद्धति में नहीं जायेंगे। में दूसरी साधना पद्धतिओ का विरोधी नहीं हूँ। कोई भी साधना पद्धति इस जगह पर तो आपको पहुँचाती होगी, लेकिन मेरे प्रभुने दी हुई ये साधना हे, हमारे पास एक गर्व होना चाहिये, एक गौरव होना चाहिये; मेरे प्रभुने इतनी सुंदर साधना दी हे। तो में अन्य साधकों के पास, अन्य गुरुओ के पास कैसे जाऊँ? मेरे पंचमहाव्रतधारी गुरु के पास बैठकर ही में प्रभु की साधना का अध्ययन करूंगा। तो आपके पास भी ये जिम्मेदारी हे। साध्वीजी भगवतीओ को भी यही काम करना हे।
मैंने देखा हे, तेरापंथ की दो साध्वीयां कहाँ भी जाती हे, विपश्यना का प्रेक्षा का कोर्स करा देती हे, महाप्रज्ञाजी ने प्रेक्षा ध्यान नाम दिया था; तो प्रेक्षा ध्यान का कोर्स दो साध्वीयां कही भी जाती हे तो भी करा लेती हे। आप इस ध्यान साधना पद्धति को आत्मसात् कर लो। ओर आत्मसात् करने के बाद उसका प्रेझन्टेशन आपको करना हे। सोचो तो? 5000 से अधिक साधु-साध्वीजीयां हमारे पास हे। यु तो ज्यादा हे, 10-12 हजार हे, लेकिन मोटे तोर पे भी हम गिने, तो भी 5000 साधु-साध्वीओ का संघ क्या कर सकता हे नही? क्या नहीं कर सकता हे? ओर में तो गर्व से कहता हूँ, एसा dedicated समूह शायद विश्व में कही भी नहीं मिलेगा। एसा dedicated! आप सिर्फ रोटी-दाल देते हे, ओर हम हमारे 24 घंटे आपको दे देते हे! एसा dedicated समाज कहाँ मिलेगा?
एक बात आप से कहूँ, वैज्ञानिक अभिगम हे। की मिनिमम सात साल में, मेक्सीमम बारह साल में हमारी शरीर की धातुयाँ परिभूतित होती हे। सब धातुयाँ परिवर्तित हो जाती हे। तो मेरे पास अभि जो लहू, मांस, चरबी, आदि हे वो मेरे मात-पिताने दिए थे वो नहीं, संघ के अन्न से पुष्ट हुए लहू, मांस, चरबी मेरे पास हे। ओर इसलिए मेरे शरीर पर भी संघ का अधिकार स्वीकार करता हूँ। मेरे प्रभु का अधिकार तो हे ही, मेरे गुरु का अधिकार तो हे ही शरीर पर, श्री संघ का भी अधिकार हे मेरे शरीर पर। ओर एसे दो आदमी आएंगे, दो साधक आएंगे, महाराज साहेब हमें समजाओ, में बिना हिचकिचाहट उसको आधा घंटा, एक घंटा दे दूँगा। क्यूंकी मेरा ये धर्म हे, मेरा ये फर्ज हे।
कलापूर्णसूरि दादाने मुझे ये बात अंतिम सेशन में कही थी। हम जब (कोई गांवका नाम, फलवड़ी) पधार रहे थे, तो राजस्थान में झालोर डिस्टिक में, कलापुरा में अंतिम वंदन मेरा हुआ। शाम को में गुरुदेव के चरणों में बैठा था। ओर मैंने गुरुदेव से पूछा गुरुदेव! इतने लोग आपके वंदन के लिए आते हे, ओर आये, श्रद्धा से लोग आते ही रहते हे; लेकिन सबकी इच्छा होती हे, आप कुछ हितशिक्षा दो, ओर आप हितशिक्षा दे ही जाते हो! आप थकते नहीं ? तब गुरुदेवने कहाँ था, यशोविजय! मुझे जो ज्ञान मिला हे, कंडीशनली मिला हे। मेरे गुरु ने ओर मेरे प्रभुने कंडीशनली ये दान दिया हे, की में दूसरों को ये ज्ञान दे दूँ। यदि में दूसरों को ये ज्ञान नहीं दूँगा तो मेरे प्रभु का, मेरे गुरु का में अपराधी हूँ। एक dedicated व्यक्तित्व संसार में कही भी मिलेगा आपको? तो ये श्वेत चद्दर को देखकर क्या होता हे आपको? एसे dedicated साध्वियाँ, सिर्फ रोटी-दाल लेना हे शरीर को चलाने के लिए, दूसरा कुछ भी नहीं चाहिये! ओर 24 घंटों प्रभु शासन की सेवा करनी हे।
तो प्रभु की साधना में भीतर भीतर भीतर जाना हे। तैयार हे ना? तैयार हे ना? तो अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने का भक्त का यह मार्ग हुआ अहोभाव। सिर्फ अहोभाव! जो आपको परंपरा से मिला हुआ हे, उससे आप अंतर्मुख दशा में पहुँच जाते हो! साध्वीजीओ को आप देखेंगे, ये साधु महात्माओ को आप देखेंगे, उनके चहेरे पर जो प्रसन्नता हे उनको देखेंगे ओर आपको मालूम हे, उनके पास एक पैसा भी नहीं हे, एक मकान भी नहीं हे उनके पास; लेकिन प्रसन्नता गजब की हे। आप हेरान हो जायेंगे, आप पूछेंगे महाराज सा एसी शाता कहाँ से आई? ओर गुरुदेव कहेंगे, देव गुरु पसाय। प्रभु ओर गुरु की कृपा से में आनंद में हूँ। तो ये मस्ती को देखकर आपको क्या होगा? ये मस्ती मिल जाये वो तो आगे की बात हे; लेकिन ये मस्ती पसंद तो आई। ओर मस्ती पसंद आएगी, अंतर्मुख दशा आ गई! बोलो भैया हमारी मस्ती पसंद आ गई? आई? आपने कितने संतों का दर्शन किया? बोलो तो? खमासमण दे दिए, विधि पुरी कर ली, संतों के दर्शन कहाँ किए आपने? संतों के फेस पर जो आनंद हे, उस आनंद को आपने देखा हे? कभी पूछा हे महाराज सा, इतना आनंद आपके पास कैसे आया हे? मुझे भी एसा आनंद प्राप्त करना हे। मेरे पास करोड़ों रूपिए हे, मेरा बँगला भी बडा हे, दो-तीन-चार कर भी हे, लेकिन मेरे पास इतना संतोष नहीं हे, इतना आनंद नहीं हे। आपको एसा आनंद कहाँ से मिला हमें बताइए तो? पूछा कभी आपने? तो आज फिर से पुछ लु, हमारा आनंद पसंद आ गया? भले रहते वहाँ लेकिन द्रष्टि कहाँ हे?- साधुता की ओर, तो अंतर्मुख दशा आ गई। अंतर्मुख दशा का अर्थ यह हो गया की स्वरूपानुसंधान की ओर द्रष्टि लग गई। रहते हे विषय-कषाय अहंकार की धूल में, लेकिन नजर कहाँ टिकी हुई हे? स्वरुपानुसंधान की ओर, स्वगुणानुसंधान की ओर। तो अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने का भक्त ये मार्ग हुआ। साधक जो मार्ग हे, उसकी चर्चा दोपहर हम करेंगे।
