Maun Dhyan Sadhana Shibir 10 – Vachana – 3

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વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત

Subject: अहोभाव

आंतरयात्रा का पहला चरण है – अंतर्मुख दशा। भक्त का अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने का मार्ग है – अहोभाव। जहाँ अहंकार का प्राबल्य है, वह बहिर्मुख दशा। अंतर्मुख दशामें अहंभाव तिरोहित हो जाता है, अहंकार डूब जाता है; वहाँ सिर्फ अहोभाव है। प्रभु का दर्शन हुआ, सद्गुरु के मुख से शब्द परमात्मा का श्रवण हुआ, आंखे भीगी भीगी हो गई।

प्रभु की निश्चय आज्ञा है राग, द्वेष, अहंकार को शिथिल करना। इसमें भी सबसे बडा अवरोध अहंकार का है। अगर शरीर के ऊपर राग होता हो, तो तपश्चर्या करके उस राग को हम हटा सकते हैं। और राग जब शिथिल हुआ, तो द्वेष भी शिथिल हो जाएगा। लेकिन अहंकार का क्या? अहंकार को हटाना हो, तो उसके लिए चाहिए अहोभाव।

आपके पास अभी conscious mind के level पर अहोभाव है; परन्तु Unconscious mind के स्तर पर, आपके अस्तित्व के स्तर पर अहंकार ही अहंकार है। आपने गुरु को, प्रभु को Conscious mind के स्तर पर रखा है और unconscious में, अस्तित्व के स्तर पर अहंकार ही है। तो जब लड़ाई होगी, तो कौन जीतेगा? अस्तित्व का स्तर ही जीतेगा। अब तुमको यह करना है, कि अहोभाव को भी अस्तित्व के स्तर पर उतारना है।

મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ પાલીતાણા વાચના – ૩

देवाधिदेव शत्रुंजय तीर्थाधिपति श्री ऋषभदेव प्रभु के चरणों में वंदन। सद्गुरुदेव पूज्यपाद अरविंदसूरि दादा के चरणों में वंदन। 

आंतरयात्रा का पहला चरण हे- अंतर्मुख दशा। भक्त का अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने का मार्ग हे – अहोभाव। ये तो बहुत ही अच्छी बात हो गई! अहोभाव की तो हमारी परंपरा हे! श्रद्धा, भक्ति, ओर समर्पण की हमारी परंपरा हे। दो शब्द हुए- बहिर्मुख दशा, अंतर्मुख दशा। जहाँ अहंकार का प्राबल्य हे, वो बहिर्मुख दशा। में नही आता यहाँ, में न होता तो यह न होता; ये बहिर्मुख दशा। अंतर्मुख दशा में अहंभाव तिरोहित हो जाता हे। अहंभाव डूब जाता हे, अहंकार डूब जाता हे, क्यू? हमारे नयन भीगे भीगे हो गए हे। हमारी आंखे भीगी भीगी हे, रूप परमात्मा को हम देखते हे, शब्द परमात्मा को हम देखते हे, सुनते हे, हमारी आंखे भीगी भीगी हो जाती हे। तो अहोभाव हमारी परंपरा हे। में अहोभाव की धारा का बहुत ही बडा पक्षपाती हूँ, समर्थक हूँ। निश्चयकी धारा की बाते यहाँ पर आएगी, लेकिन मुझे लगता हे, की स्टार्टिंग पॉइंट तो अहोभाव ही हो सकता हे। 95% पर्सन्ट साधक अहोभाव से ही निश्चय साधना को प्राप्त कर सकते हे। 5% पर्सन्ट साधक, जो गत जनममें साधना करके आये हे, उनकी बात छोड़ो, 95% साधकों के लिए अहोभाव ही आंतरयात्रा का स्टार्टिंग पॉइंट हे। परमात्मा को देखते हे, निहारते हे, आंखे भीगी भीगी हो जाती हे, ओर परमात्मा के शब्द सुनते हे, तब? भक्तिमती मीरा ने कहा, शबद सुणंता मेरी छतिया कंपी’ जब प्रभु के शब्दों को में सुनती हूँ, मेरा ह्रदय कांप उठता हे! हृदय थिरकने लगता हे! हृदय नाचने लगता हे! 

आचारांगजी का एक छोटा सा सूत्र हे, तीन शब्दों का, ‘आणाए मामगं धम्मं’ पहलीबार जब मैंने ये सूत्र पढ़ा, मेरा पुरा अस्तित्व थिरकने लगा था, नाचने लगा था। ओहो ! मेरे परमात्मा ये कह रहे हे! ओर Personally for me! ‘आणाए मामगं धम्मं’ आज्ञा में मेरा धर्म हे। एसे तो ‘आणाए धम्मो’ सूत्र तो सुना हुआ था, प्रभु की आज्ञा में धर्म हे, लेकिन ये तो प्रभु के खुद के शब्द! ‘आणाए मामगं धम्मं’ आज्ञा में मेरा धर्म हे। सुधर्मास्वामी भगवान एसा नहीं लिख सकते, की आज्ञा में मेरा धर्म हे। वे कहते हे, ‘आज्ञा में प्रभु का धर्म हे।’ लेकिन ये सूत्र इनवर्टेड कोमा में उतर आया हे। प्रभु के शब्द सीधे के सीधे यहाँ उतर आये हे। “आज्ञा में मेरा धर्म हे।” आपने सुना ना ये सूत्र? ‘आणाए मामगं धम्मं’ क्या हुआ बोलो तो? मेरा तो अस्तित्व पुरा थिरकने लगा था, नाचने लगा था, क्या हुआ आपको? बोलो तो? ‘आणाए मामगं धम्मं’ प्रभु कहते हे, खुद प्रभु महावीर कहते हे की आज्ञा में मेरा धर्म हे। बस! मेरे लिए अब आज्ञा ही एकमात्र जीवन मंत्र ! दूसरा कुछ भी न चाहिये, सिर्फ चाहिये प्रभु की आज्ञा ! ओर प्रभु की निश्चय आज्ञा क्या हे? राग, द्वेष अहंकार को शिथिल करना, यही प्रभु की निश्चय आज्ञा हे। एक बात समझने जैसी हे, हमारी साधना में तीन अवरोधक तत्व हे, राग, द्वेष, ओर अहंकार। फिर भी बडा अवरोध अहंकार का हे। राग होता हे शरीर पर, लेकिन हम तपश्चर्या करते हे, शरीर का राग भी हट जाता हे। ओर राग जब शिथिल हुआ, तो द्वेष भी शिथिल हो गया। लेकिन अहंकार का क्या करे? अहंकार साधना में बडा ही अवरोधक हे, अहंकार को उठाना हे, अहंकार को हटाना हे। तो इसलिए अहोभाव। में बहोत बार कहता हूँ, हमारा परम पावन शाश्वत मंत्र, नमस्कार महामंत्र, नमो ! नमो ! नमो ! 

हमारे युग के साधना महर्षि पंन्यास प्रवर गुरुदेव भद्रंकरविजय म.सा. कहते थे की नमस्कार महामंत्र में ‘नमो’ ही महत्व की चीज हे। अरिहंताणं बाद में हे, सिद्धाणं बाद में हे, आयरियाणं बाद में हे, नमो ! तुम्हारा झुकना घटित हो जाना चाहिये। झुक जाओ! अहंकार तिरोहित हो गया; साधना स्टार्ट हो गई। अहोभाव क्या करता हे? अहंकार को तिरोहित कर देता हे! प्रभु के प्यारे प्यारे शब्द ओर अहंकार का अद्रश्य हो जाना! 

मीरा के जीवन की एक घटना में कहूँ, सांज की वेला, मीरा गुरु के आश्रम गई हुई हे, द्वार बंध हे, मीरा ने द्वार खटखटाए, द्वार खुल गए, मीरा अंदर गई। गुरु के चरणों पर वंदन किया। तब गुरु ने पूछा की मीरा, तुम कौन हो? तो मीरा ने कहा, में मीरा – प्रभु के चरणों की दासी। में मीरा – प्रभु के चरणों की दासी। गुरु हसने लगे, गुरुने कहाँ की दोनों एकसाथ कैसे हो सकता हे? ये ड्यूअल एक्शन कैसे हो सकती हे? मीरा को समझ में नहीं आया। गुरु क्या कह रहे हे? तो मीरा ने गुरु को पूछा, आप क्या कह रहे हे? तो गुरु ने कहा, अभी अभी तुमने कहाँ, में मीरा – प्रभु के चरणों की दासी। अब में तुझे पूछना चाहता हूँ, की प्रभु के चरणों की दासी, इस शब्द का अर्थ क्या होता हे? तुम परम चेतना के समुंद में बूँद होकर घुल गई, मिक्सअप हुई। प्रभु के चरणों की दासी शब्द का अर्थ ये होता हे, की परम के समुंद में तुम्हारे जीवन की बूँद घुल गई। अब बूँद ही घुल गई, समुंद मे, तो identity कैसे हो सकती हे? तुम्हारा नाम कैसे हो सकता हे? तु मीरा के रूप कैसे रह सकती हो? गुरुने कहाँ था, you are the nameless experience. इस identity को खत्म करनी होगी! मीरा भी रहे, प्रभु भी रहे, दोनों साथ- साथ में हो सकते है? बोलो तो? 

आपको यह काम करना हे ना। आप भी रहे केन्द्र में; जीवन के अस्तित्व के ओर प्रभु भी रहे? यह काम करना हे ना आपको? ये हो नहीं सकता! या तो प्रभु रहे, या आप रहो। now choice is yours.  आपको पसंद करना हे, की जीवन के केन्द्र में कौन रहे? प्रभु रहे या आप रहे? ओर एक बात कहूँ में आप से, अनगिनत जन्मों में हम हमारे केंद्र में रहे, हमारे केंद्र में हमारा अहंकार ही था। क्या मिला? सिवा नरक ओर निगोद। ओर प्रभु केंद्र में आ जायेंगे; मोक्ष ये रहा। now choice is yours. क्या चॉइस हे आपकी? 

तो गुरुने कहाँ या तो तुम प्रभु की चरणों की दासी हो सकती हे, या तो तुम मीरा हो सकती हो। तुम्हारे पास identity हे, तो तुम परमचेतना के समंदर बूँद होकर घुल नहीं सकती हो। उसी समय मीरा ने निश्चित कर लिया, की मीरा केंद्र से हट रही हे, ओर प्रभु केंद्र में आ रहे हे। इस समय तक मीरा ने जो भी भजन लिखे थे, मीरा अंत में लिखती ‘मीरा के प्रभु गिरिधर गोपाल’ मीरा भी रहती, प्रभु भी रहते। लेकिन इस घटना के पश्चात जो भी भजन लिखे गए, अंत में मीरा लिखती हे, में तो रावरी दासी। मीरा गई हे, प्रभु प्रगट हुए हे। 

बहिर्मुख दशा में अहंकार ही अहंकार हे। अंतर्मुख दशा में अहोभाव हे। प्रभु का दर्शन हुआ अहोभाव, भीगी भीगी आंखे। सद्गुरु के मुख से शब्द परमात्मा का श्रवण हुआ, आंखे भीगी भीगी हो गई। सद्गुरु के प्यारे प्यारे शब्द !प्रभु दूर नहीं, मोक्ष दूर नहीं, ये रहा ! 

मीरा की ही एक प्रस्तुति हे, बहुत ही मनलोभावनी प्रस्तुति हे, मीरा कहती हे, ‘ऊंचा ऊंचा महल पिया का, मासु चढ़ा न जाय, पिया दूर पंथ मारो झीणो, सुरत झकोरा खाय’ क्या कहती हे मीरा? प्रभु को पाना हे, में कैसे पाऊँ? में कैसे प्रभु को पाऊँ? ‘ऊंचा ऊंचा महल पिया का, मासु चढ़ा न जाय।’ तीन अवरोधक तत्वों की चर्चा मीरा करती हे, पिया दूर, पंथ मारो झीणो, सुरत झकोरा खाय – प्रभु दूर हे, सात राजलोक दूर! ओर प्रभु को पाने का मार्ग अत्यंत कठिन हे। कितना कठिन? 

आनंदघनजी भगवंत चौदह स्तवन के प्रारंभ में कहते हे, ‘धार तलवारनी सोहिली, दोहिली, चौदमा जिन तणी चरण सेवा’ तलवारकी धार पर तुम चलो; सरल हे, लेकिन प्रभु को पाना, प्रभु की साधना को पाना कठिन हे। कैसे करेंगे? क्यों कठिन हे? तलवारकी धार पर चलोगे, लहू की धार फूटेगी, चरण क्षत-विक्षत हो जायेंगे, लेकिन जब प्रभु को पाना हे, प्रभु की साधना को पाना हे तो, पुरा अहंकार को मिटा देना पड़ेगा। स्वयं को विसर्जित करना पड़ेगा। तभी प्रभु मिलते हे। तलवारकी धार पर चलोगे; चरण क्षत-विक्षत होंगे।  प्रभु को पाना हे, प्रभुके साधना पथ पर चलना हे, अहंकार को विसर्जित करना होगा। पिया दूर, पंथ मारो झीणो, सुरत झकोरा खाय – ओर स्मृति का जो दीप हे, वो सतत जल नहीं रहा हे, अंधेरा हे ओर दीप नहीं जल रहा हे, तो क्या करेंगे? प्रभु का सुमिरन वो दीप हे। 

तो मीरा कहती हे, प्रभु दूर हे – पहला अवरोध। प्रभु को पाना बहुत ही कठिन हे, दूसरा अवरोध। ओर मेरे पास इतनी सुमिरन की संपत्ति भी नहीं हे, ये तीसरा अवरोध। में क्या करू? प्रभु से पूछा, प्रभु में क्या करू? तुझे पाना हे, वो नक्की हे, निश्चित हे, लेकिन कैसे पाऊँ? जब हमारे भीतर दर्द होता हे, वेदना जब मुखरित हो जाती हे, प्रभु स्वयं प्रगट होते हे। प्रभु को पाने की वेदना कितनी हुई हे? विरह व्यथा। 

आदीश्वर दादा का दर्शन करना हे सुबह, पुरी रात आप सोये न हो, पुरी रात आँख से आँसू बरस रहे हे, कब प्रभु मिलेंगे? कब प्रभु मिलेंगे? में बार बार कहता हूँ, की मिलन का आनंद कब मिलता हे, प्रभु से आप मिलन करते हे, प्रभु का दर्शन करते ही, लेकिन मिलन का आनंद कब मिलता हे? जब विरह व्यथा एकसिट्रीमली आपके पास हे, तभी आप मिलन का आनंद ले सकते हे। 

ओर एक बड़ी अच्छी बात कहु बीच में।  हम तो विरह व्यथा शब्द का यूस करते हे, विरह पीड़ा, लेकिन नारद ऋषिने भक्तिसूत्र में एक बडा ही अच्छा शब्द दिया हे- विरहासक्ति। विरह का आकर्षण। विरह का खिंचाव। पहेली दफे विरहासक्ति शब्द पढ़ा, आश्चर्यचकित हुआ! विरह की पीड़ा हो सकती हे, परमात्मा नहीं मिलेंगे। इतने जन्म व्यर्थ हो गए मेरे, इतने जन्म मीनिंग लेस हो गए, अभी तक प्रभु नहीं मिले हे, कब प्रभु मिलेंगे? कब मिलेंगे? विरह व्यथा तो हो सकती हे, लेकिन विरहासक्ति? विरह का भी आकर्षण? कैसे हो सकता हे ये? बाद में मालूम हुआ, की विरह भी किसका हे? प्रभु का हे ! ओर संसार में आपकी मनपसंद कोई भी वस्तु आपको मिल जाये, मनपसंद व्यक्ति मिल जाये, ओर जो सुख की अनुभूति आपको होती हे, उससे सो गुनी, हजार गुनी सुख की अनुभूति प्रभु के विरह में होती हे। मिलन में नहीं, विरह में! क्योंकि विरह की क्षणों में भी आप प्रभु से सम्बद्ध हो जाते हे, प्रभु से एसोसीटर हो जाते हे। कब मिले प्रभु से बोलो तो ? ये जन्म सिर्फ प्रभु को पाने के लिए हे। 

एक युवानने एक संत से पूछा था, गुरुदेव! प्रभु को पाना हे, में कैसे पाऊँ? ओर संत ने कहा था, की बडा सा अच्छा सूत्र दिया, ‘तुम मिटो तो मिलना होय’ प्रभु को पाना हे ना? Now and here! प्रभु मिल जायेंगे! आपको चाहिये? आपको चाहिये? Now and here! क्या कहते हे संत? “तुम मिटो तो मिलन होय।” तुम मीट गए; प्रभु मिल गए! तुम्हारा मिटना; उसका मिलना। सुलसाजी मीट गई; प्रभु को पा गई। चंदनाजी मीट गई; प्रभु पा गई। श्रेयकजी मीट गए; प्रभु को पा गए। आपको मिटना नहीं हे, ओर प्रभु से मिलना हे! कैसे हो सकता हे? आपके अहंकार को जब तक आप विसर्जित न करेंगे, प्रभु कैसे आपको मिलेंगे? ओर इसीलिए ये अहोभाव की परंपरा हे। अहोभाव की परंपरा अहंकार को शिथिल कर देती हे। मैंने कुछ भी नहीं किया! अहंकार कहेगा, मैंने सबकुछ किया! में न होता तो क्या होता! अहोभाव कहता हे, मैंने कुछ भी नहीं किया! जो भी कार्य हुआ, प्रभु की कृपा से हुआ हे। 

में जब भी सुधर्मा पीठ को छोड़ता हूँ, तो मेरी आंखे आँसू से भर जाती हे। ओर मेरी आँखों के आँसू प्रभु से कहते हे की प्रभु! तूने इतनी कृपा की मुझ पर, तेरे पास तो अनगिनत साउंड सिस्टम हे, फिर भी यशोविजय की साउन्ड सिस्टम को तूने पसंद किया, में तेरा ऋणी हूँ! हमारे वहाँ इसी परंपरा में निमित्त शब्द आता हे। प्रभुने हमें निमित्त बनाया, हम कुछ भी नहीं कर सकते हे। प्रभुने हमे निमित्त बनाया! 

में बार-बार कहता हूँ, की भक्त की डिक्शनरी में, भक्त की वॉकाबुलेरी में, निमित्त शब्द का अस्तित्व ही नहीं हे। या तो मानो की निमित्त शब्द ही हे पूरा। प्रभुने निमित्त मुझे बनाया, प्रभुने निमित्त बनाया, प्रभुने निमित्त बनाया।  ओर आप साधक हे, तो आपकी डिक्शनरी में निमित्त शब्द का अस्तित्व नहीं हे। तो प्रभु को पाना हे? मीट जाना होगा। हे तैयारी? डूबने की तैयारी हे? मिटने की तैयारी हे, बोलो तो? पालिताना तो आ गए, शत्रुंजय गिरिराज की छाया में भी आ गए, आंतरयात्रा के लिए सज्ज भी हो गए, अब में पूछता हूँ, डूबने की तैयारी हे ना ? मिटने की तैयारी हे ना? 

तो मीरा ने प्रभु से पूछा, प्रभु तुझे पाना हे, ओर यही मेरा अवतारकृत्य हे। तुझे न पाऊँ मेरा जीवन का कोई अर्थ नहीं रहता। लेकिन में कैसे तुझे पाऊँ? ओर फिर क्या हुआ मीरा के जीवन में? मीरा लिखती हे, ‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, सद्गुरु दियो बताय, जुगन जुगन से बिछड़ी मीरा को लिनी घर में आय’ तब प्रभुने सद्गुरु को नकशा दिया। की यही तेरे सद्गुरु हे, उसके पास जा तु;  मुझसे तु मिल जाएगी। ओर इसलिए ही में बार बार कहता हूँ, वाया गुरु ही परमात्मा को हम प्राप्त कर सकते हे। Not without guru. गुरु ही प्रभु को देखने की हमें ताकत देते हे। आँखों से दर्शन सिर्फ प्रभु का नहीं होता है; हृदय से होता हे। ओर हृदय से कब होता हे? आनंदघनजी भगवंत ने लिखा, ’प्रवचन अंजन जो सद्गुरु करे, देखे परम निधान; हृदय नयन निहाले जग धणी, महिमा मेरू समान’ जिस क्षण गुरु शक्तिपात करते हे, उसी क्षण आप प्रभु को देख सकते हे! On that very moment! 

तो सद्गुरु शक्तिपात करते हे, आप प्रभु को पा सकते हे, लेकिन इस पंक्तिमें एक शब्द आया हे, “प्रवचन अंजन ‘जो’ सद्गुरु करे,” यदि सद्गुरु करे ‘तो’ एसा हो सकता हे! में बार-बार पूछता हूँ मेरे प्रवचनों में, की सद्गुरु! एक करुणामय अस्तित्व ! क्या कंडीशनली खुल सकता हे? यदि में शक्तिपात करू तो….. अरे! यदि क्या? सद्गुरु तो कहदे आ जाओ! में शक्तिपात कर दूँ! प्रभु को देख लो! लेकिन जब तक अहोभाव हमारे यहाँ घनीभूत नहीं हुआ हे तब सद्गुरु के हाथ भी बंधे हुए हे। सद्गुरु शक्तिपात नहीं कर सकते, कितने सद्गुरु मिल गए आपको अतित में, हरिभद्राचार्य भी मिले होंगे, या हेमचंद्राचार्य भी मिले होंगे, एसे अनेक गुरु आपको मिले होंगे, लेकिन क्या हुआ? मेरा भी संसार चालु हे, आपका भी संसार चालु हे। क्यू चालु रहा? सद्गुरु मिले लेकिन सद्गुरु के चरणों मे अपना समर्पण नहीं हुआ। जो अहोभाव होना चाहिये था, वो अहोभाव नहीं आया। सद्गुरु के चरणों में समर्पण हो गया, फिर आपको कुछ भी करना नहीं हे। you have not to do anything absolutely. 

तो इसीलिए जयवियराय सूत्र में एक शब्द आया, सहगुरुजोगो। सद्गुरुयोग। जय वियराय में हम प्रभु के पास सद्गुरु को नहीं मांगते हे। समझ लेना बरोबर। हम प्रभु से सद्गुरु को नहीं मांगते हे, ‘सद्गुरुयोग’ को मांगते हे।  क्या फरक पड़ा? अतित की यात्रा में सद्गुरु तो बहुत मिले लेकिन हमारा समर्पण नहीं था। सद्गुरु कुछ काम हम पर न कर सके। इस जन्म में प्रभु सद्गुरु तो तु दे ही, लेकिन सद्गुरु के चरणों मे, में पुरा का पुरा समर्पित हो जाऊँ, एसा वरदान भी आप दे! प्रभु के पास मांगा हे, अब प्रभु तैयार नहीं, या आप तैयार नहीं? बोलो तो? मेरा एक लोगो हे, He is ever ready, Aadeshwar dada is ever ready, we are also ready. But are you ready? प्रभु सद्गुरु योग देने के लिए तैयार हे, एसे ही तो जयवीयराय सूत्र में लिखा नहीं गया हे। प्रभु देते हे तब तो लिखा गया हे। 

तो प्रभु सद्गुरुयोग को देने के लिए तैयार हे, आप झेलने के लिए तैयार हो? प्रभु बस एक ही बार, सद्गुरु के चरणों में झुक जाऊँ, मेरा अहंकार विलीन हो जाये, में पुरा का पुरा सद्गुरु के चरणों में समर्पित हो जाऊँ। ओर एक बात में आपसे कहूँ, सद्गुरु योग आपके पास आ गया, फिर साधना देने का काम सद्गुरु का हीं हे। साधना कैसी घूँटनी वो बात गुरु आपको दिखाएंगे। साधना के लिए जो appropriate atmosphere चाहिये, योग्य वातावरण, वो भी गुरु आपको देंगे। ओर साधना में अवरोध आएंगे, गुरु हटा लेंगे। आपको कुछ करना नहीं हे फिर, इसीलिए तो हमारी साधना को में back seat journey कहता हूँ। back seat journey. आपके साथ कार में बैठ गया हे पीछे, सोफ़र चला रहा हे, आपके साथ फोन पर बतियाता रहता हे, फ़ाइल देखता रहता हे, ओर कार पहुँच जाती हे। एसी back seat journey आपको मिलि हे! प्रभुने साधना पद्धति दी हे, सद्गुरु सोफ़र के रूप में तैयार हे, आपको सिर्फ बैठ जाना हे! You have not to do anything absolutely एक सद्गुरु योग हो गया; सब कुछ मिल गया! ये सद्गुरुयोग को पाने के लिए, ये अंतर्मुख दशा की बात में कह रहा हूँ। की अंतर्मुख दशा में अहोभाव चाहिये। अहोभाव घना होना चाहिये, सघन होना चाहिये। ओर अहोभाव जब सघन हो गया, अहंकार कहा टीक पाएगा?! ये तो समर्पण ही हे। एक अहोभाव आपको मिल गया, सद्गुरु के चरणों में आप समर्पित हो गए, फिर आपको कुछ नहीं करना हे, मोक्ष ये रहा! फिर मोक्ष देने की जिम्मेदारी गुरु की हे। गुरु कह देंगे, जा! तेरा मोक्ष हो गया! 

एक दिन तुलसीदासजी को एक भक्त ने पूछा, की प्रभु को पाना हे कैसे पाऊँ? तुलसीदासजी ने मार्ग बताया। एसा तुम करो, प्रभु तुम से मिल जायेंगे। लेकिन वो भक्त सशंक रहा, अच्छा इतना ही में कर लू! प्रभु मिल जायेंगे? सचमुच मिल जायेंगे? ओर तब तुलसीदास गरजे थे, “इतने से हरी ना मिले, तुलसीदास जवाँ हे। ” तु इतना काम करेगा ओर प्रभु नहीं मिलेंगे, बीच में मे हूँ, तुलसीदास हूँ। में प्रभु से भी कह दूँगा, क्यू नहीं इससे मिलते हो तुम? तुम्हारे लिए तो सुनहरा अवसर हे; सद्गुरु सब कुछ करने के लिए तैयार हे; सिर्फ तुम्हारा समर्पण चाहिये। 

लोग मुझे पूछते हे बार बार, की आप तो बात करते हे समर्पण की, समर्पित जो जाव। समर्पित हो जाव। समर्पित हो जाव। लेकिन हम कैसे समर्पित हॉए? तब में हँसता हूँ, में पूछता हूँ, क्या समर्पित करने का हे वो तो बोलो? तुम्हारे पास हे क्या? संपत्ति तो पुण्य से मिली हे, ओर पुण्य के मालिक भगवान हे, तुम्हारी संपत्ति नहीं हे। तुम, तुम्हारा शरीर पर ओर मन पर स्वामित्व धराते हो। एसा शरीर मिला हे तुम्हें, लक्ष ओर लिरिल से साफ करो, साफ करो, साफ करो, ओर पसीने से तरबतर हो जाये। गंदा हो जाये। गंदकीवाला शरीर, ओर राग-द्वेष से सड़ा हुआ मन, आपके पास हे क्या, वो तो बोलो? आप कहते हो कैसे समर्पित जो जाउँ? अरे समर्पण कोई हार्ड चीज हे? टफ चीज हे कोई? समर्पण तो इतना सरल हे! बोलो, शरीर ओर मन दो आपके पास हे? गंदा शरीर ओर गंदा मन, इन दोनों को आप सद्गुरु को दे देते हो, तो सद्गुरु की गेरंटी हे, आपको मोक्ष दे, दे। बोलो इन्ही दोनों पर आप स्वामित्व रखेंगे की में शरीर, मेरा मन; तो नरक ओर निगोद सामने हे। क्या करेंगे बोलो? इस शरीर पर ओर इस मन पर आस्था जमा-जमा कर के, नरक ओर निगोद कितनी बार हमने झेली हे! अब एक अवसर आया हे, की सद्गुरु को, प्रभु को, हम हमारा शरीर ओर मन समर्पित करे। 

प्रभु की साधना समर्पण से शुरू होती हे, ओर समर्पण ही आखिर बिन्दु हे, साधना का। हरीभद्राचार्य ने कहा हे, धर्मं प्रति मूलभूत वंदना। धर्म का द्वार समर्पण हे। प्रभु के प्रति समर्पित हो जाव! प्रभु की आज्ञा के प्रति समर्पित जाव! ओर आज्ञा के प्रति समर्पित नहीं हुए तुम? तो साधना कैसी? नहीं मान लेना की शरीर से तुमने कार्य कर लिया, शरीर से साधना कर ली, तो तुम साधक हो गए। नहीं, तुम्हारे मन से ,तुम्हारे अस्तित्व से साधना करनी होगी। तो अस्तित्व के स्तर से साधना करनी हे, समर्पण के बिना कैसे होगी? मेरे प्रभुने कहा हे, ‘आणाए मामगं धम्मं’ मेरे प्रभुने कहा हे। बस फिर दूसरी बात आति ही नहीं। मेरे प्रभुने कहा हे, आखिर एक शब्द आ गया, आखिर ये मंत्र आ गया, मेरे प्रभुने कहा हे! ओर मुझे उस मुताबिक ही करना हे! तो समर्पण प्रारंभ बिन्दु, ओर समर्पण प्रभु कि साधना का चरम बिन्दु भी हे। आखिर बिन्दु। प्रभु का वचन हे, तु स्व में ही रहे, पर में न जा। स्वानुभूति हो गई, तो ये समर्पण का आखिर बिन्दु हुआ। प्रभु की आज्ञा को हमने आत्मसात् कर ली। प्रभुने कहा तुझे स्व में ही रहना हे; पर में नहीं जाना हे। ओर हमे स्वानुभूति हो गई, हम स्व में प्रतिष्ठित हो गए, तो प्रभु का जो समर्पण था, उसका आखिर बिन्दु हमारे पास आ गया। अब बोलो क्या करना हे? जीवन को दाव पर लगाना हे? की एसे एसे ही रहना हे? 

हिन्दू सभ्यता में एक idiom आता हे, रूढ़िप्रयोग, “खाते-पीते वैकुंठ मिले तो हमको कह देना, सिर साटे मिलता हो तो दूसरों को कह देना।” खाते-पीते वैकुंठ मिले तो हमको देना – हम वैकुंठ को पा लेंगे; लेकिन सिर साटे मिलता हे, दूसरों कह देना, हमको नहीं कहना। आपकी बात क्या हे बोलो? महाराज साहेब समर्पण तो नहीं करेंगे, हमारा अहंकार एसा ही एसा ही रहेगा। ओर आप साधना बताओ, तो कितना भी हाईटवाला सद्गुरु हो, कैसे आपको साधना दे सकता हे? यदि आपके पास समर्पण नहीं हे तो! अब आपको लगता हे अभी? की समर्पण कोई एसी बात नहीं हे, की तुम न कर सको। बहुत ही सरल हे। पर समर्पण में भी तुम्हें क्या करना हे? प्रभु तुम्हें करवाएंगे। प्रभु तुमसे करवाएंगे, तुम्हें क्या करना हे? प्रभु पर छोड़ दो। की प्रभु! सद्गुरु तो आपने दे दिए, सद्गुरु योग मेरे पास नहीं हे। सद्गुरु के प्रति समर्पण मेरे पास नहीं हे। अब सद्गुरु के प्रति मेरा समर्पण हो एसा भाव भी मुझे दे दीजिए! प्रभु तैयार हे! प्रभु सद्गुरुयोग देने के लिए तैयार हे। आज अभी तैयार हे! On this very moment! Are you ready? बोलो? Are you ready? सद्गुरुयोग चाहिये? जो भी सद्गुरु। आपके श्रद्धा के भाजन हो, पात्र हो, उसके चरणों में आपको झुक जाना हे। सद्गुरु एक्सरखे होते हे। 

मे बार-बार कहता हूँ, there is the same fragrance and same taste in all the respected gurus. दरेक उच्च कक्षा के गुरु के भीतर एके सरिखा स्वाद, ओर एके सरीखी सुगंध मिलती हे। क्यू? क्यू? कैसे? सद्गुरु ने अपना ह्रदय vacant कर दिया। खाली कर दिया, ओर उस vacancy में; परम तत्व उतर गया। तो किसी भी सद्गुरु के पास आप जायेंगे, उनके उपनिषद में आप बेठेंगे, आपको परम तत्व की सुंगंध मिलेगी । परम तत्व का आस्वाद मिलेगा। सब शक्य हे, आपको इतना ही करना हे, समर्पित हो जाना हे! में सद्गुरु योग की व्याख्या देता हूँ, बार-बार, 1+1 = 1 ये सद्गुरुयोग हे। 1+1 = 1 शिष्य ओर गुरु, फिर क्या होगा? शिष्य डूब जाएगा, गुरु रह जायेंगे। शिष्य का अहंकार खत्म हो जाएगा। गुरु के प्रति वो समर्पित हो जाएगा, तो वहाँ क्या हे? दो नहीं हे! एक ही चीज हे! तो ये समर्पण! शिष्य का समर्पण। अहंकार से तुम गुरु से अलग होते हो। समर्पण से तुम गुरु में मिल जाते हो। तुम्हारा ओर गुरु का संयोग एक अविनाशी स्तर पर संयुक्त हो जाता हे। बोलो क्या करना हे? आज में आप से चाहता हूँ, क्या करना हे? समर्पण करना हे? की आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं, सब जिम्मेदारी गुरु की, सद्गुरु तो आपको गेरंटी कार्ड देंगे की तु मुझे समर्पित हो गया आज, में आज लिखकर देता हूँ, की पाँच वर्ष के बाद तेरी साधना कैसी होगी? अपने लेटर हेड पर, अपने सिग्नेचर के साथ, गुरु गेरंटी कार्ड देने के लिए तैयार हे! में भी वैसा गेरंटी कार्ड देता हूँ, ओर उस शिष्य को कहता हूँ, की तेरे पास ये कागज को रखना। ओर पाँच साल के बाद यदि तेरी साधना इस मुकाम पर नहीं पहुँची, तो मुझे आकर कहना, गुरुदेव! आपका कागज, आपका ये लेटर ले लो, मेरी साधना वहाँ तक नहीं पहुँची। लेकिन में गेरंटी से कहता हूँ, यदि तु टोटल सरेंडर हो गया हे तो, इस मुकाम पर तु पहुँच ही जाएगा। गुरु पहुँचाने के लिए तैयार हे! बोलो कितने सद्गुरु मिले? अतित की यात्रा में? कितने मिले? लेकिन मेरा भी संसार चालु रहा, आपका भी संसार चालु रहा। अब क्या करना हे बोलो? 

आंतरयात्रा का प्रथम चरण अहोभाव, बहुत ही सुंदर हे, तुम्हारा अहंकार तिरोहित हो गया, जहाँ तक बहिर्मुख दशा हे, अहंकार ही अहंकार हे। ओर जहाँ अंतर्मुख दशा आ गई, अहंकार अद्रश्य हो गया। ओर अहंकार ही न रहे, तो समर्पणका गुरु दत्ता है। अहंकारी न रहा तो? समर्पण ये रहा फिर! तो पहला जो पड़ाव हे आंतरयात्रा का, हमें पास करना ही होगा। आगे यात्रा तो बहुत हे। दूसरा पड़ाव अंत:प्रवेश दशा, तीसरा पड़ाव अंतर्लीन दशा। लेकिन पहला ये जो पड़ाव हे, वो पक्का कर लेना हे। क्या हमारे पास अहोभाव हे? में एक बात आपसे कहूँ, conscious mind के लेवल पर आपके पास अहोभाव हे, तो फिर अहंकार कहाँ बचा? Unconscious mind के स्तर पर, आपके अस्तित्व के स्तर पर अहंकार ही अहंकार हे। आपके गुरु को कहाँ बिठायें? प्रभु को कहाँ बिठायें? Conscious mind के स्तर पर unconscious में क्या हे? अस्तित्व के स्तर पर क्या हे? तुम्हारा अहंकार हे। 

में एक घटना का झिकर बार-बार करता हूँ, अहमदाबाद में भक्ति संगीत का एक कार्यक्रम था, सुबह 5 से 8 तक का, इतना सुंदर भक्ति संगीत लोग बह गए। लोग भीगे भीगे हो गए सब। 8 बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ, फिर घोषणा हुई की नवकारशी का लाभ देकर सबको जाना हे। एक सज्जन नवकारशी करने के लिए पास के खंड में गए, खुरशी पर बिराजे, चाय आई, ठंडी, कोई स्वाद ही नहीं इसमें; एक चुस्की ली, मन बिगड़ गया। मन तो बिगड़ गया, एक क्षण के लिए, एसी चाय? एसी चाय? एसी चाय का करें? एक क्षण के लिए मन बिगड़ गया; लेकिन वो सज्जन जागृत साधक थे। उन्होंने सोचा, की ये कैसे हो गया? तीन घंटों तक तो में भक्ति संगीत में बहा हूँ। मेरी चेतना परमात्मा मय हो गई हे। ओर एक चाय की चुस्की?! ओर मेरा यह पुरा जो तीन घंटों का जो आस्वाद हे उसको खत्म कर दे! ये कैसे हो सकता हे? वो भक्त मेरे पास आया, उसने मुझे पूछा की गुरुदेव ये कैसे हुआ? तीन घंटों तक में भीगा भीगा हुआ था, वो निश्चित बात हे, कोई चीटिंग की बात नहीं है, कोई दूसरों को दिखाने की बात नहीं हे। में खुद भीगा भीगा हो गया था। अब इतना भीगापन मेरे पास था, ओर एक चाय ठीक नहीं आई, मेरा मिजाज बिगड़ गया, में मुडलेस हो गया। गुरुदेव ये कैसे हुआ? मैंने बतलाया की ये जो भक्तिमय वातावरण था, वो तुम्हारा conscious mind तक ही पहुंचा था, तुम्हारे unconscious mind में संज्ञाओ का ही साम्राज्य हे। 

तो आहारसंज्ञा तुम्हारे अस्तित्व में हे। जैसे अहंकार की संज्ञा अस्तित्व में हे; एसे आहार की संज्ञा भी अस्तित्व के स्तर पर हे। तो भक्ति का असर कहाँ तक था? Conscious mind तक, ओर आहार संज्ञा का असर कहाँ तक था? अस्तित्व के स्तर पर। अब लड़ाई होगी तो क्या होगा? कौन जीतेगा? अस्तित्व का स्तर ही जीतेगा। दूसरा कौन जीतेगा? तो मैंने कहाँ, अब तुमको ये करना हे, की भक्ति को अस्तित्व के स्तर पर उतरना हे। जब तक भक्ति अस्तित्व के स्तर पर नहीं उतरेगी, संज्ञाओका ही साम्राज्य होगा। ओर इसीलिए में दो मन की चर्चा बार-बार करता हूँ- संज्ञावासित मन, ओर आज्ञावासित मन। हमारे ओर आपके बीच अंतर क्या हे? बोलो? एक साधु-साध्वी हे, ओर आप हो सामने, अंतर क्या हे हमारे बीच? हमारे बीच अंतर यही हे, एक भी साधु हो, एक भी साध्वीजी हो, उसका ह्रदय उसका मन आज्ञावासित हे। में एसे गोचरी कर सकता हूँ? में एसे भिक्षा ले सकता हूँ? में एसा सोच सकता हूँ? में एसे चल सकता हूँ? मेरे प्रभु की आज्ञा हे, तो साधु ओर साध्वी का मन आज्ञावासित होता हे, आपका मन कैसा हे? संज्ञावासित। इस संज्ञावासित मन को आज्ञावासित बनाना हे ओर इसीलिए पहला चरण आया अहोभाव। अहोभाव से यात्रा शुरू करनी हे। अहोभाव से अंतर्मुख दशा प्राप्त होगी। ओर अंतर्मुख दशा जब प्राप्त होगी तो फिर अगले चरण तो बिलकुल सरल होंगे। ये तो हमारी बात हुई थियरी की, अब प्रेक्टिकल भी करना हे। आंतरयात्रा का आस्वाद आपको चखाना ही हे। आपको आस्वाद लेना हे की नहीं लेना मुझे नहीं पता! लेकिन मेरी तो पुरी इच्छा हे…… आपकी इच्छा बच जाने की हे, ओर मेरी इच्छा पुरेपुरी आपको डुबो देने की हे। अब देखिए किसकी विजय होती हे। आपकी इच्छा क्या होती हे? कितनी शिबीर में जाकर आये, बचकर बचकर आये। तुम्हारा अहंकार एसा ही एसा रहा। मेरी इच्छा हे पुरा – पुरा प्रभु में तुमको डूबा दूँ। अब देंखे क्या होता हे? प्रेक्टिकल।

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