Maun Dhyan Sadhana Shibir 10 – Vachana – 2

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વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત

Subject: अंतर्मुख दशा

आंतरयात्रा ही एसी यात्रा है, जिसमे जीवन का आनंद है। बहिर्यात्रा में घटनाएँ कभी आपको रतिमें ले जाती है, तो कभी अरतिमें। आंतरयात्रा हमें घटनाओं से अप्रभावित बनाती है। आंतरयात्रा में हम प्रविष्ट हो गये, फिर घटना सिर्फ घटना है; तुम बस तुम हो। घटनाओं से तुम्हारा संबंध नही बनता और तुम अपने निजी आनंदमें रह सकते हो।

आंतरयात्रा के मोटे तौर पर तीन चरण हैं: अंतर्मुख दशा, अंत:प्रवेश दशा ओर अंतर्लीन दशा। अंतर्मुख दशा में जाने के लिए दो मार्ग हैं: भक्त का मार्ग और साधक का मार्ग। भक्त के मार्ग में चार चरण हैं: रूप परमात्मा के प्रति अहोभाव, शब्द परमात्मा के प्रति अहोभाव, वेश परमात्मा के प्रति अहोभाव ओर अनुष्ठान परमात्मा के प्रति अहोभाव।

मंदिर में आप जाते हैं; रूप परमात्मा के सान्निध्य में आप हैं। अत्यंत अहोभावपूर्वक, आँखों में आँसू के साथ, रोमांच से प्रभु का दर्शन हो। दूसरे चरण में शब्द परमात्मा के प्रति अहोभाव। आपका conscious mind दूर हो जाए और अस्तित्व के स्तर पर आप प्रभु के शब्दों को सुनें। प्रभु के वेश के प्रति भी आप संमोहित हो और प्रभु के अनुष्ठानो के प्रति भी संमोहन हो। यह है अंतर्मुख बनने के लिए भक्त का मार्ग।

મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ પાલીતાણા વાચના –

देवाधिदेव परमतारक शत्रुंजय तीर्थाधिपति श्री ऋषभदेव प्रभु के चरणों में वंदन। सद्गुरुदेव पूज्यपाद अरविंदसूरि दादा के चरणों में वंदन। 

परमपावन शत्रुंजय गिरिराज की छाया में एक नई यात्रा करनी है, प्रभु की कृपा से, ओर यह है आंतरयात्रा। आंतरयात्रा घटना से अप्रभावित हमें बनाती है। जब आंतरयात्रा में प्रविष्ट हो गये हम; फिर घटना, घटना है, तुम, तुम हो। घटनाओ से तुम्हारा संबंध नही बनता! आपको ख्याल है, घटना घटना ही है, आप आप ही है, तो घटनाओ से आपका संबंध कैसे बनता है? विचारो के झरिए, कोई घटना कभी भी आपको पीड़ित नही कर सकती! घटना के प्रति आपके जो विचार है, वे विचार ही आपको पीड़ित करते है। आप बहिर्यात्रा में अभी है, ओर 9 तारीख तक आपको आंतरयात्रा में प्रविष्ट हो ही जाना है। 

अब मुझे आप कहे, बहिर्यात्रा का आपका अनुभव कैसा रहा? एक घटना घटित होती है, आप पीड़ित हो जाते है। दूसरी घटना घटित होती है, आप फिर पीड़ित हो जाते है! जीवन का क्या आंक रहा इसमे?! 

उपनिषद के ऋषि जीवन की व्याख्या देते है, आनंदो जीवनम्। आनंद ही जीवन है। सांस को लेना, सांस को फेंकना, ये तो कोमा में भी मनुष्य कर सकता है। जीवन की व्याख्या यह है, हमारा जीवन आनंद से परिपूर्ण हो। बहिर्यात्रा में रति होती है कभी, अरति होती है कभी. सुख की भ्रांति कब होती है? ओर दुख का तो अनुभव होता ही है। आंतरयात्रा ही एसी यात्रा है, जिसमे आनंद ही आनंद है। ओर इसका एक कारण आपकी घटना अप्रभावितता है। 

एक घटना मुझे याद आती है, श्रमण भगवंत गोचरी वहोरने के लिये गये थे, दोपहर को, वहोरकर आये, गुरुदेव के पास, गुरुदेवने देखा किसी अनाड़ी ने पत्थर मारा होगा, तो उस साधु के गाल से लहू टपक रहा था। लेकिन बात मजे की ये कहु, की लहू तो टपक रहा था, लेकिन स्मित भी बरस रहा था! घटना हो गई, घटना का स्वीकार हो गया। लहू भी टपक रहा है, ओर मुंह से स्मित भी बरस रहा है। गुरु ने देखा, गुरु ने ये नहीं पूछा की किसने तुझे मारा? आपके बच्चे की ये हालत आप देखो तो आप क्या करोगे? बच्चे से पूछेंगे किसने मारा? शायद में मानता हूँ आप सब जैन है, कर्म फिलोसोफी के थोड़े ज्ञाता है, आप एसा प्रश्न नहीं पूछेंगे। क्यू? क्योंकि मारनेवाला जो है वो तो निमित्त है; अपराधी असल में कौन है? हमारा कर्म। आपके लिये तो में ये उम्मीद करता हूँ, आंतरयात्रा में आने के बाद, की आधा घंटे तक कोई नॉन-स्टॉप कडवे वचन आपको कह दे; ओर आपकी मुख की रेखाए तनिक भी न बदले! आपकी आँख से आँसू निकल पड़ेंगे; ओर सोचते होंगे, की ये अंकल तो बड़े ही सज्जन है, इनके मुंह से ये गालिया निकली, मेरे कर्म से ही निकली। मेरा कर्म गुनेगार है, मेरा कर्म अपराधी है। तो मेरे कर्म के कारण इन सज्जन को इतना बोलना पड़ा, इतना कष्ट उठाना पड़ा। जब वे रुकेंगे, आप कहेंगे, अंकल आपने बहुत परिश्रम लिया, थोड़ा सा ज्यूस तो लो, आप ज्यूस ऑफर करेंगे। आधे घंटे तक कडवे वचन आपको कह रहे, ओर आपको लगेगा, इस अंकल ने कुछ भी नहीं कहा है, मेरे कर्म ने कहा है। 

तो गुरु नहीं पूछते है, तुझे किसने मारा? लेकिन गुरु संघ के नायक है। हमारा जो आनंद है, वो स्व में रहने का है। हम भी पर में जायेंगे ने तो हमारा आनंद किरकिरा हो जाएगा। लेकिन स्व में प्रतिष्ठित होने के कारण हम ever fresh, ever green रहते है। एक बात आप से पुछु, हमारी मस्ती कि ईर्ष्या आपको होती है? हमारे चेहरे पर जो आनंद है, जो मस्ती है, उसकी ईर्ष्या आपको होती है? यहाँ तो कितनी सारी साध्वीजी भगवतीयां बैठी है, देखो, ओर इन सब के मुख पर देखो क्या आनंद है! प्रभु मिल गए है! 

कबीरजी ने किसीने पूछा था, के प्रभु मिल गये आपको? कबीरजी ने कहाँ था, क्या कहाँ था? बहोत ही सुंदर अभिव्यक्ति कबीरजी की है, ‘कहे कबीर में पुरो पायो’ परमात्मा मिले ही नहीं, अधूरे अधूरे मिले ही नहीं, पूरे-पूरे मिल गये! इन सबके आँखों में देखो, इन सब के मुख पर देखो। क्या है? परमात्मा है। ओर में तो आप सब की आँखों में परमात्मा को देखता हूँ। 

रहीम की एक पंक्ति मुझे याद आती है, प्रीतम छबि नयनन बसी, पर-छबि कहां समाय? भरी सराय ‘रहीम’ लखि, पथिक आप फिर जाय॥

(‘प्रीतम छबी नयनन बसी, परछवि कहाँ समाय? भरीसराय रहीम लखी, पथिक आये फिर जाए’) प्रीतम छबी नयनन बसी – जब प्रीतम की छवि आँखों में बस गई, ह्रदय में बस गई, तो उस ह्रदय में, उस आँखों में, दूसरा क्या हो सकता है?! 

महाभारत की एक सुंदर कहानी है, उद्धवजी वृंदावन आये हुये है, रथ में बैठकर, रथ को देखकर गोपीओ को हुआ, श्री कृष्ण आये हुए है शायद; गोपिया आ गई, लेकिन रथ में तो श्री कृष्ण थे ही नहीं, उद्धवजी थे! उद्धवजी बाहर निकले, गोपीओ को देखा, सोचा की ये उदास हो जायेंगी; श्रीकृष्णजी नहीं आये है! तो उद्धवजी ने कहा उदास मत होना, इस बार श्रीकृष्ण नहीं आ सके है, अगली बार में उनको लेकर आऊँगा। उस समय गोपीओने कहाँ था, उद्धवजी! कोई चिंता की बात नहीं है। आप अभी अभी श्रीकृष्ण का दर्शन करके आये हुये हो, आप की आँखों में हम श्रीकृष्ण का दर्शन कर रहे है! 

कोई छट्ठ – चौविहारा करके सात यात्रा करके मेरे पास आता था, तब उनकी आँख में मुझे आदेश्वर दादा दिखाई देते थे। ओर आप सबकी आँखों में भी में प्रभु को देख रहा हूँ। 

तो गुरु संघ के नायक थे, तो गुरु ने सोचा, एसा कौन अनाड़ी होगा इस गाँव में, जिसने एक साधु को पत्थर मारा? आज तो ठीक है साधु था, कल कोई साध्वी होगी तो क्या होगा? सोचना चाहिये, श्रावक वर्ग को सूचना दी जानी चाहिये। इसलिए गुरुने पूछा, की बेटा! तु 3-4 गलियों में घूमा होगा गोचरी के लिये, तुझे ये मालूम है, कौन सी गली में आये हुए, कौन से घर से ये पत्थर निकला था? ओर उस समय श्रमण भगवंत कहते है, गुरुदेव! पाँच मिनट मुझे दीजिए में जरा याद कर लू! मे जरा याद कर लू! पत्थर लगने जैसी घटना को, (किसीसे भी पथ्थर लगा) अपने को बेखबर कर सके; वो मस्ती कैसी होगी बोलो तो?! लगा है तो लगा है पत्थर! घटना घटी है, तो घटी है। घटना से कोई संबंध नहीं बना। तुम्हारा संबंध घटना से बनता है क्यू? विचारों के झरिए। समझो की एक घटना घटी; घट गई तो घट गई। अब विचार करेंगे आप, क्यों घटी? उसने एसा क्यू किया? क्या होगा इससे? ओर दूसरी बात में पुछु? जो भी घटना घटित हुई, अनंत ज्ञानीओने अपने ज्ञान में देखी होगी वो घटना; अब अनंत ज्ञानीओने – अनंत केवलज्ञानीओने अपने ज्ञान में जो घटना देखी हुई थी, वो ही घटना यहाँ साकार हुई है; अब आप क्या करोंगे? केवलज्ञानीओ के ज्ञान को स्वीकारेंगे या घटना को फैस करेंगे? क्या करेंगे बोलो तो? लेकिन बहिर्यात्रा में एसा बन सकता है। तो अप्पन को आंतरयात्रा में जाना है। 

आंतरयात्रा के मोटे तौर पर तीन चरण है, अंतर्मुख दशा, अंत:प्रवेश दशा, ओर अंतर्लीन दशा। आपको चलना है ना मेरे साथ? 

उपनिषद के ऋषि बहोत सुंदर एक मंत्र अप्पन को देते है, ‘सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।’ ऋषि प्रभु से कहते है, की प्रभु! मेरी ओर मेरे शिष्य की आप रक्षा करो। में ओर मेरा शिष्य दोनों साथ में स्वाध्याय करेंगे, ओर में ओर मेरा शिष्य दोनों, साधना पथ पर साथ में चल पड़े। तो ये सह स्वाध्याय है अपना….. मुझे बोलना है, आपको सुनना है, यह बात मेरे मनमें भी नहीं गई। ये सह स्वाध्याय है, सह चिंतन है। आपको साथ में आना है। ओर आंतरयात्रा आपको करनी है। गुरु की एक बात कहूँ आप से, आप गुरु से भी इन माइने में बड़े बड़भागी है। गुरु को क्या होता है? शिखर पर जाते है, शिखर पर आरुह भी होंगे, लेकिन प्रभु कहेंगे, जाओ तलहटी पर, दूसरे साधक को लेकर आओ। तो गुरु नीचे उतरते है! आपको लेने के लिये! ओर अपनी अंगुली में आपका हाथ पकड़कर के ऊपर चढ़ा देते है। ऊपर गए; आप तो ऊपर बैठ जायेंगे, गुरु ऊपर नहीं बैठ पाएंगे, फिर प्रभु कहेंगे, जाओ नीचे उतरो, दूसरे को तलहटी से लेकर आओ। तो साथ साथ चलना है। जल्दी जल्दी पहुँच जायेंगे। 4-5 दिन काफि है; लेकिन आप प्रयत्न करोगे तो। 

में बहोत बार कहता हूँ, you can do this,  you can do this आंतरयात्रा कोई गहरी बात नहीं है! You can do this, But if you want. आपकी यदि संकल्प शक्ति नहीं है, तो आप नहीं चल पाओगे। एक संकल्प हो गया। की शत्रुंजय गिरिराज की छाया में आया हुआ हूँ। दादा आदेश्वर की कृपा से आंतरयात्रा में जाना ही है। जाना है? की जाना ही है? ठीक है! पहुँच गये तो पहुँच गये; नहीं तो कुछ नहीं! एसा नहीं, “की जाना ही है!” आपका संकल्प द्रढ होना चाहिये। 

में बहोत बार कहता हूँ, किसी भी साधना को सिद्धि के स्तर पर ले जानी है, तीन तत्वों, तीन घटक अनिवार्य रूप से आवश्यक है। पहला प्रभु की कृपा, दूसरा घटक सद्गुरु की शक्तिपात-सद्गुरु की आशीष, ओर तीसरा घटक आपका संकल्प। अब आप मुझ से कहे, प्रभु की कृपा आप पर बरस रही है की नहीं बरस रही है? एसा क्षण नहीं, की प्रभु की कृपा न बरस रही हो! प्रभु की कृपा सतत बरस रही है, मैंने कल भी कहाँ था। की प्रभु की कृपा तो बरस रही है, सतत बरस रही है; लेकिन हम उसको झेल नहीं पाते! क्यू नहीं झेल पाते? हमारे पास receptivity नहीं है। में बहोत बार कहता हूँ, की अनंत जन्मों में हमने प्रभु का ये बडा अपराध किया, की प्रभु की कृपा बरस रही थी, ओर हम हाथ को पीछे लगाकर बैठ गये। प्रभु की कृपा को हमने स्वीकारा नहीं, हमने झीला नहीं। इस जन्म में प्रभु की कृपा को पूर्ण रूप से स्वीकार करना है। में यहाँ हूँ, मेरी शक्ति से नहीं! ये सब भी दीक्षित हुए है, उनकी शक्ति से नहीं, प्रभु की कृपा से ही!

में बहोतबार साधु-साध्वीओ से भी पूछता हूँ, की दीक्षा तुमने ली है, की प्रभु ने दी है? कभी एसा मत सोचना, हमने दीक्षा ली! दीक्षा की अनुज्ञा नहीं मिलती थी, हमने छ विगई का त्याग किया; सगा-संबंधी मान गये, ओर हमें दीक्षा मिल गई। मैंने दीक्षा ली, कभी एसा मत सोचना। प्रभु ने ही दीक्षा दी। प्रभु ने आपको select किया है, क्या विधि है, आपको मालूम है? प्रभु आपको सिलेक्ट करते पहले, फिर गुरु चेतना को संदेश भेजते है, I have selected him, I have selected her. अर्थात गुरु आपको रजोहरण देते है। एसे में भी आपको रजोहरण नहीं दे सकता। जब प्रभु की आज्ञा मेरे पास नहीं आती है। तो में यहाँ हूँ, आप यहाँ है, प्रभु की कृपा से हि। कोई हमारी शक्ति नहीं है यहाँ। आपकी शक्ति है, तो कितनी शक्ति है? 99% grace, 1% effort. 99% तो प्रभु की ओर सद्गुरु की कृपा ही है। एक प्रतिशत आपका प्रयत्न होगा। ओर वो प्रयत्न receptivity का, वो प्रयत्न है, प्रभु को झिलने का। तो प्रभु की कृपा सतत बरस रही है। 

इसी शत्रुंजय तीर्थ पर नंदीषेण मुनि पधारे थे, अजितशांति स्तोत्र की रचना उन्होंने की, ओर उस में अंत में लिखा है, ‘मम य दिसऊ संजमे नंदिं’ प्रभु तेरी कृपा से मुझे रत्नत्रय मिले है, दीक्षा मेरी शक्ति से नहीं मिली है प्रभु, तेरी कृपा से मिली है। तो रत्नत्रय तेरी कृपा से मिली है, अब रत्नत्रयी की प्राप्ति का जो आनंद है, गहरा आनंद, गहरा आनंद, वो भी आपकी कृपा से मुझे मिले। रत्नत्रयी भी आप ही दे सकते हो। वो रत्नत्रयी पाने से जो आनंद हमारे चित्त में बरस रहा है, उस आनंद को भी आप ही दे सकते हो। हम कुछ नहीं कर सकते। हम जब तक अप्पन को असहाय नहीं मानेंगे; साधना जगत मे हमारा प्रवेश नहीं होगा। प्रभु तेरी कृपा से मुझे आना है। तो प्रभु की कृपा बरस रही है सतत, सद्गुरु का आशीर्वाद तो होता ही है।  

आप आते है ना वासक्षेप लेने के लिये, गुरु महाराज क्या आशीर्वाद देते है, आपको मालूम है? नही मालूम है ना? मालूम है? क्या आशीर्वाद देते है? में सोचता हूँ, की शायद आशीर्वाद का अर्थ मालूम हो जाये ने, तो दुबारा वासक्षेप लेने के लिए, आप आओ या न आओ। गुरु आशीर्वाद में क्या कहते है? ‘नित्थार पारगाहो’ में संसार से पार हो गया हूँ, प्रभु की कृपा से; तु भी संसार से पार होजा! 

तो प्रभु की कृपा सतत बरस रही है। सद्गुरु के आशीर्वाद भी बरस रहे है। अब चाहिये, सिर्फ आपका संकल्प, की मुझे आंतरयात्रा करनी ही है। आज तो आंतरयात्रा की उपलब्धि की एक ही बात कही, की आंतरयात्रा घटनाओ से आपको अप्रभावित कर देती है। दूसरे बहोत से कारण है, आंतरयात्रा के प्रवेश के लिये, वो बाद में कहे जायेंगे। पहला एक ही कारण; घटनाओ से आपको मुक्ति मिल जाती है! अभी तो आपके हाथ में आपका सुख भी नहीं! आनंदकी बात तो जाने दो; सुख भी आप के हाथ में नहीं! एक घटना एसे घटी, आप पीड़ित हो जायेंगे! एक घटना एसे घटी, आप अप्रसन्न हो जायेंगे! क्या बात है यह? क्या दूसरों के हाथ में आपने अपना सुख दे दिया है? के अपने हाथों में अपना सुख रखना है बोलो? यदि आपके हाथों में अपना सुख आपको रखना है, तो आंतरयात्रा करनी ही होगी। 

आप पूछते है हमको, शाता में है ना महाराज सा? इच्छकार में भी बोलते है, स्वामी शाता छे जी? कभी देखा, हम अशाता में है? हम नहीं, हमारे कोई भी शिष्य देखा आपने? ओर पूछेंगे साहेब शाता में? ओर वे कहेंगे, ‘परम शाता में।’ प्रभु की कृपा है, सद्गुरु की कृपा है, शाता ही शाता है यहाँ। इसलिए में तो कहता हूँ बार-बार, की आप शाता पूछने के लिये नहीं आते हो, आपकी शाता पुछवाने के लिये आते हो। म.सा. इतने प्रसन्न है, तो में क्यू प्रसन्न नहीं हूँ? म.सा. के पास तो कुछ भी नहीं है। आपने क्या देखा अभी तक, म.सा. के पास कुछ नहीं है। ठीक कहा है ना? कोई पदार्थ नहीं है, कोई संग नहीं है, अभी तक हमने त्याग के स्तर पर ही साधुत्व को देखा है! म.सा. के पास कुछ नहीं है; लेकिन म.सा. के पास पूरे के पूरे परमात्मा है! वो आपने देखा? दूसरों की आवश्यकता क्या है फिर?! जिनको परमात्मा मिल गए खुद! हम आनंद में है! मजा में है! क्यू? परमात्मा हमें मिले है! आपको चाहिये परमात्मा? आपको चाहिये परमात्मा? आंतरयात्रा इसी का नाम है; परमात्मा को पाने की यात्रा। तो तीन चरण मोटे मोटे स्तर पर आपको दिखाए गए। अंतर्मुख दशा, अंतःप्रवेश दशा, ओर अंतर्लीन दशा। आज पहले दिन अंतर्मुख दशा का सिर्फ अध्ययन नहीं करेंगे, उसमें जाने की कोशिश करेंगे। आपको कोशिश ही करनी है; सिर्फ प्रयत्न ही करना है, बाकी सब प्रभु संभाल लेंगे। 

भगवद्दगीता में श्रीकृष्ण ने कहा, एक डग मेरे ओर आजा; में मेरी बाहों में तुझे उचक लूँगा। एक डग आजा। एक पग भर। प्रभु तैयार है, आपको सिर्फ कोशिश करनी है। ये कोशिश कब होगी? जब आंतरयात्रा असर आएगी तब; आंतरयात्रा बिलकुल बिलकुल बिलकुल मन के गहरे स्तर में बैठ जाएगी तब। मुझे तो आश्चर्य होता है, आप आंतरयात्रा के आशिक कैसे नहीं हो सकते हो? हो सकते हो तो कोई बड़ी बात नहीं है। आप आंतरयात्रा के आशिक कैसे नहीं हो सकते हो?! जब आपने इतने संतों का दर्शन किया है, ओर उन सन्तो की मस्ती को आपने देखी है, ओर आपको मालूम है, की बहिर्यात्रा संतों के पास है ही नहीं। आंतरयात्रा है। ओर आंतरयात्रा से इतनी बड़ी उपलब्धि होती है। इतनी प्रसन्नता होती है, तो में भी आंतरयात्रा क्यू न करू? आपके मन में आंतरयात्रा का विचार अभी तक क्यू नहीं उभरा! मुझे सवाल होता है! लेकिन आज तो निश्चित है ना आप? गया सो गया भूतकाल। आज तो नक्की है ना, आंतरयात्रा करनी है, की या करनी ही है? 

पहला चरण अंतर्मुख दशा। अंतर्मुख दशा में जाने के लिये दो मार्ग हे, एक भक्त का मार्ग है, एक साधक का मार्ग है। पहले भक्त के मार्ग को देख ले, बाद में साधक के मार्ग को देखेंगे। भक्त का मार्ग क्या है? भक्त के मार्ग में चार चरण हे। रूप परमात्मा के प्रति अहोभाव, शब्द परमात्मा के प्रति अहोभाव, वेश परमात्मा के प्रति अहोभाव, ओर अनुष्ठान परमात्मा के प्रति अहोभाव। ये भक्त का अंतर्मुखता का रास्ता हे। 

पहला चरण: रूप परमात्मा के प्रति अहोभाव। मंदिर में आप जाते हे, रूप परमात्मा के सानिध्य में आप हे। आप कैसे निहारेंगे प्रभु को? आँख से आँसू की झरियाँ निकलेंगी। ये मेरे प्रभु! मेरे प्रभु नहीं होते तो में कहाँ होता?! 

महोपाध्याय यशोविजयजी ने कहाँ हे, ‘इतनी भूमि प्रभु तुम ही आण्यो’ प्रभु यहाँ तक में सिर्फ आपकी कृपा से ही आया हूँ। तो मेरे प्रभु ने मुझे उचक लिया। मेरे प्रभु ने इतना काम कर लिया, प्रभु को आप देखेंगे, आप की आँखों से आँसू की बोछार होगी। 

परम पवन कल्पसूत्र में एक बड़ी सुंदर घटना आती हे, सौधर्मेन्द्र अपने सिंहासन पर बैठे बैठे जंबुद्वीप को अपने अवधिज्ञान से देख रहे हे। भरतखंड का द्रश्य चालु हुआ, ब्राह्मणकुंड ग्राम नगर, देवानंदा माता, ओर उस के गर्भ में सोये हुए प्रभु महावीर को सौधर्मेन्द्र ने देखा। जैसे ही प्रभु को देखा, इन्द्र महाराजा खड़े हो गए सिंहासन से, परमात्मा की दिशा में सात – आठ डग चले, ओर शक्रस्तव करते हे। क्या कहते हे प्रभु से?अभयदयाणं, चकखुदयाणं, मग्गदयाणं। प्रभु कहाँ पर हे? माता के गर्भ में। ओर इन्द्र महाराजा कह रहे हे, प्रभु आप कैसे हो? अभयदयाणं, चकखुदयाणं; अभय के दाता आप हे! मेरे मन को स्थिर करने वाले आप हे! चकखुदयाणं – आप को देखने के लिये श्रद्धा के जो चक्षु चाहिये, वो चक्षु को देनेवाले आप ही हे! अब सोचे तो, गर्भ में प्रभु आये हे, 84 days हुए। 84 days हुए हे, तो अंगोपांग भी संपूर्ण तया स्फुट नहीं हुए हे, शरीर का आकार भी संपूर्ण तया स्पष्ट नहीं हुआ हे; ओर इस रूप में प्रभु को देखकर भी; सौधर्मेन्द्र इतने भावविभोर हो जाते हे! ओर इसलिए में बहोत बार कहता हूँ, प्रभु को देखने के लिये भक्त की आंखे चाहिये। आपने प्रभु का दर्शन कहाँ किया हे? भक्त की आंखे हे आपके पास? प्रभु का दर्शन सिर्फ भक्त की आँखों से ही हो सकता हे! तो रूप परमात्मा का दर्शन कोरी कोरी आँखों से प्रभु का दर्शन कभी नहीं हो सकता; भीगी भीगी आंखे चाहिये, मेरे प्रभु मुझे मिल गए! 

नारदऋषिने भक्तिसूत्र में एक बड़ी सुंदर बात की हे, शिष्यने पूछा हे, भक्तने पूछा हे, की गुरुदेव! प्रभु को कौन सी भाषा पसंद आती हे? मुझे स्तवना करनी हे, स्तुति करनी हे, लेकिन में आपको पूछता हूँ, प्रभु को कौन सी भाषा पसंद आती हे? आपको लगा होगा, गुजराती या हिन्दी या अंग्रेजी को पुछ रहा हे? नहीं। प्रभु को कौन सी भाषा पसंद आती हे? ओर तब नारदऋषि उत्तर में कहते हे, ‘कण्ठावरोधरोमांचाश्रुभि: परस्परं लपमाना: पावयन्ती कुलानि पृथ्वीं च ॥’ प्रभु को तीन भाषाए पसंद हे, आँखों से बहती आँसू की भाषा, गले से बहती सिसकियों की भाषा, ओर शरीर से प्रगट होते हुए रोमांचों की भाषा। प्रभु को ये तीन ही भाषा पसंद हे। सिर्फ होंठ की भाषा प्रभु को पसंद नहीं! में बहोत बार कहता हूँ, आप स्तवना शब्द से शुरू तो करेंगे, क्या स्तवना को पूर्ण भी शब्दों से ही करेंगे? सिसकियों से करेंगे? चंदा के पास कौनसी भाषा थी? सिसकियों की भाषा! 

एक अनहोनी घटना घटी, त्रिलोकेश्वर, अखिल ब्रह्मांडेश्वर, परमात्मा महावीर देव एक नाचीज दासी के आँगन में, चंदा के आनंद का ओरछोर नहीं रहा, प्रभु मेरे द्वार पर! लेकिन प्रभु का अभीगम पूर्ण नहीं हुआ; प्रभु लौट गए।  ओर उस समय चंदनाजी फुट-फुटकर रो पड़े हे! प्रभु आये; उस चंदनाजी ने क्या कहा? वीरविजय महाराज बारह व्रत की पूजा में चंदनाजी के शब्दों को लेकर आये हे। उन्होंने चंदनाजी के शब्दों को पूजा में कोट किया, ‘एक श्वासमांहि सो वार समरु तमने रे’ प्रभु! एक सांस पर, एक बार नहीं; एक सांस पर, सो-सो बार आपका सुमिरन कर रही हूँ। आप मेरे द्वार से कैसे लौट रहे है? भक्त की सुमिरन की ताकत, भक्त की आँसू की ताकत, प्रभु कहाँ दूर है? प्रभु दूर कहाँ हे? प्रभु ये रहे! एक भक्त ने कहा था, he is closer to me than my self, he is closer to me than myself. प्रभु बिलकुल नजदीक हे! बिलकुल नजदीक! प्रभु दूर हे ही नहीं! भक्त की तीन भाषाए; आँखों से बहती आँसूओ की धारा, गले से बहती सिसकिया, ओर शरीर से उठते रोमांच। 

इस संदर्भ में मे आपको पूछता हूँ, आपने कभी एसा दर्शन किया हे? जरूर यह पहला ही चरण हे, ओर अहोभाव का चरण हे। शुद्ध के चरण में आप जायेंगे, तब दूसरी तरह से दर्शन होगा। वो दर्शन की बात बाद में आएंगी। लेकिन एसा दर्शन भी आपने किया हे? की प्रभु का दर्शन हुआ; ओर आँखों से आँसू बह पड़े! प्रभु का दर्शन हुआ; रोमांच खिल उठे! प्रभु का दर्शन हुआ; ओर गले से सिसकिया चालु हो गई! कभी एसा दर्शन हुआ हे? 

तो अंतर्मुख दशा को प्राप्त करने के लिये, रूप परमात्मा के प्रति ये जो अहोभाव हे, वो सशक्त कारण हे। क्यू? जब आप प्रभु को निहारेंगे? प्रभु के प्रशमरस को भी आप देख लेंगे, आप की बहिर्यात्रा आपको बिलकुल नगड़ने लगेगी, निकंबी लगेगी। प्रभु क्या हे, प्रभु हे क्या? हमारा ही शुद्ध स्वरूप! हम सिद्धशीला पर जायेंगे प्रभु जैसे ही होंगे। ओर ये सिद्धत्व हमारे भीतर ही हे! सिद्धत्व का पर्याय हमारा खुला नहीं हे, प्रभु का सिद्धत्व  का पर्याय खुल गया; बाकी सत्ता रूप से हम ओर प्रभु एक जैसे हे। एसा दर्शन हुआ कभी? तो रूप परमात्मा के प्रति अहोभाव, पहला चरण। 

दूसरा चरण शब्द परमात्मा के प्रति अहोभाव। मैने कल पूछा था आप से, कौन सुन रहा है? सुनने वाला कौन है वो तो बताओ। कान सुन रहे हे? अहमदाबाद में पालड़ी एरिया हे, जहाँ 5-5 मिनट के वॉकिंग distance पर उपाश्रय हे। एक भक्त मुझे मिला था, की म.सा. पालड़ी में जगह जगह पर उपाश्रय हे। जब चातुर्मास शुरू हो जाता हे, तब एक दिन में दो-तीन प्रवचन को में अटेंड कर लेता हूँ। एक प्रवचन आदि में सुन लिया, एक अंत में सुन लिया। एक बीच में सुन लिया। ओर फिर जहाँ अच्छा लगे, वहाँ पूरा चातुर्मास प्रवचन सुनने के लिये जाना। मैंने कहा ठीक हे। प्रवचन सुनता वो तो अच्छी बात हे। लेकिन सुननेवाला कोन हे, वो तो बताओ? सुननेवाला कोन हे? तु कहता हे, जहाँ मुझे अच्छा लगता हे, वहाँ में चातुर्मास पुरा प्रवचन सुनने के लिये जाता हूँ। तो अच्छे की परिभाषा क्या हे? वो तो बोल? अच्छे प्रवचन की परिभाषा क्या हे? क्या परिभाषा होती हे? हमारे मन को आनंद आ जाये! अरे! हम तो मनोरंजन के आदमी नहीं हे; मनोभंजन के आदमी हे! आपके मन को खुश करने के लिये नहीं बैठे हे; आप के मन को तोड़ने के लिये यहाँ बैठे हे! आपका जो conscious mind हे, उसको दूर कर देना हे, जिसे की अस्तित्व के स्तर पर आप प्रभु के शब्द को सुन सके! अभि आप सुनते हे conscious mind से; कोई अर्थ नहीं हे इसका! conscious mind से जो सुना गया हे, थोड़ी देर में दूर हो जाएगा, डिलीट हो जाएगा। अस्तित्व के स्तर से प्रभु को सुनना हे। 

मेघकुमार एक ही बार प्रभु के समवसरण में गये थे। Very first time.! ओर clean bowled होकर घर पर आये! clean bowled! आपने कितने सुने? ठीक हे, प्रभुजी है, प्रभु खुद थे! तो यह तो न्यारी ही बात हे; लेकिन एक ही प्रवचन! ओर मेघकुमार clean bowled हो गये। माता से कहा, ‘माँ! प्रभु के बिना एक क्षण में नहीं रह पाऊँगा। इतना संमोहन प्रभु का हो गया हे, की अब प्रभु के बीना, एक क्षण यहाँ टिकना मेरे लिये मुश्किल बात हे!’ प्रभु का संमोहन! प्रभु के पास रोज जाते हो, संमोहन हे आपके पास प्रभु का? संमोहन.. मैंने जंबुविजय महाराज साहेब का संमोहन देखा था। शंखेश्वर पार्श्वनाथ के दरबार में हे, चैत्यवंदन कर लिया, खमासमण दे दिए, बाहर निकले, अब तो लगता हे वो उपाश्रय में जायेंगे। नहीं! अगली चोंकी में गये, वहाँ से प्रभु दिखते हे; वहाँ से खमसमण शुरू! बाहर निकले मंदिर से, जहाँ पहले धूल ही थी, अभी टाइल्स लगी हुई हे। पहले धूल ही थि। उस धूल में प्रभु दिखते हे; खमासमण शुरू! लगता की, प्रभु के संमोहन से वे छूट नहीं पा सकते! आपके पास प्रभु का संमोहन होना चाहिये। प्रभु के शब्दों का संमोहन होना चाहिये। प्रभु के वेश के प्रति संमोहन चाहिये, ओर प्रभु के अनुष्ठानो के प्रति संमोहन होना चाहिये। तो ये होगा तो भक्त का ये मार्ग हुआ, की भक्त अंतर्मुख दशा को प्राप्त कर सकता हे। सिर्फ अहोभाव, बहिर्मुखता से छुड़ाकर; अंतर्मुखता में हमें प्रवेश दे सकता हे! आंतरयात्रा का पहला चरण अंतर्मुख दशा। बहिर्मुख दशा छुटनी चाहिये ना… आज तो मुख बाहर ही हे ना, होते हे मंदिर में, लेकिन मन कहाँ होता है? अभि तो ठीक हे, शिबिर के लिये आये हो। बाकी घर पर जब होते हे, ओर कल्पसूत्र का प्रवचन चलता हे, छूटी का दिन नहीं हे। 11 बजे, 11.15 बजे, म.सा. कब तक प्रवचन देंगे? बैठे हे प्रवचन सभा में, मुंह हे घड़ी की ओर, ऑफिस की ओर, बहिर्मुखता। उस बहिर्मुखता से अंतर्मुखता में हमें जाना हे। तो ये आंतरयात्रा की वाते, हम रोज कहेंगे, थियरीकली ओर प्रेक्टिकली, मैंने कल कहाँ था। सिर्फ थियरीकली वाते नहीं कहनी हे, प्रेक्टिकल भी देना हे। तो अब थोड़ा प्रेक्टिकल कर ले, ये बाते अपनी चलती रहेंगी। थोड़ा प्रेक्टिकल करना हे।

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