વાચના દાતા : ભક્તિયોગાચાર્ય યશોવિજય સૂરિજી ભગવંત
Subject: आंतरयात्रा
बाहर बहुत घूमे, बहार बहुत भटके; क्या मिला? ओर मिल भी क्या सकता है?! बाहर कुछ है भी नहीं तो… बाहर है सिर्फ रति ओर अरति का द्वन्द्व, सुख ओर दुख का द्वन्द्व। आनंद तो हमारी भीतरी, निजी घटना है। आंतरयात्रा का आनंद है beyond the words, beyond the expectations.
प्रवचन तो आपने आज तक बहुत सुने theoritical; लेकिन practically कुछ भी नहीं हुआ है। हमें theoritical ओर practical – दोनों तरीके से काम करना है। आपको सिर्फ प्रवचन सुनने के नहीं है, meditation भी करने का है। आंतरयात्रा के लिये जो भी उचित मार्गदर्शन आपके लिये है, वो दिया जाएगा; लेकिन हमारा ज़ोर practical साधना पर ज़्यादा रहेगा।
आंतरयात्रा के लिए मौन भी अत्यंत आवश्यक है। अनिवार्य रूप से, संपूर्णतया मौनमें आप रहेंगे तभी यह साधना शिबीर का लाभ आपको मिल सकता है। बिना मौन के आंतरयात्रा सिर्फ शब्दों मे रह जायेगी; आपकी आंतरयात्रा नहीं हो पाएगी।
મૌન ધ્યાન સાધના શિબિર ૧૦ – પાલીતાણા વાચના – ૧
નમો અરિહંતાણં
નમો સિદ્ધાણં
નમો આયરિઆણં
નમો ઉવજ્ઝાયાણં
નમો લોએ સવ્વ સાહૂણં
એસો પંચ નમુક્કારો
સવ્વ પાવપ્પણાસણો
મંગલાણં ચ સવ્વેસિં
પઢમં હવઈ મંગલં
राग द्वेष विजेतारं ज्ञातारं विश्व वस्तुन:l
शक्र पूज्यं गिरामीशं तिर्थेषं स्मृति मानये॥
पन्नगे च सुरेन्द्र च, कौशिके पाद – संस्पृशि l
निर्विशेष मन्स्काय, श्री वीरस्वामिने नम: ॥
अज्ञान तिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जन शलाकया l
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम: ॥
सर्वा रिष्टप्रणाशाय, सर्वा भिष्टार्थ दायिने l
सर्व लब्धि निधानाय, श्री गौतम स्वामिने नम: ॥
राजन्यत्र पतिवरेव वृणुते कैवल्यलक्ष्मी: स्वयं
संघाखण्डलमूर्ध्नि वर्षति पयोSब्दालीव राजादनी l
यस्मिन्पंक इव प्रयाति वृजिनं मार्तण्ड कुण्डाम्भसा
तत्तीर्थं विमलाचलो विजयते, सौरास्त्र चूडामणि: ॥
आदिमं पृथ्वीनाथ – मादिमं निष्परिग्रहम् l
आदिमं तीर्थनाथं च, ऋषभस्वामिनं स्तुम: ॥
જ્ઞાનધ્યાનક્રિયાધિકાર્ય કુશલ:, પ્રધુમ્ન જેતા ગુરુ;
આંતરલોચનમેકમસ્તિ સુતરાં, પૃદભાષિતં યસ્ય વૈ.
ૐકારેણ સુસેવિતોSપિ સતતં, ૐકાર સેવા પરઃ
સોયં સૌમ્યમના: સદા વિજયતે, શ્રી સિદ્ધિસૂરીશ્વર:
સોયં સૌમ્યમના: સદા વિજયતે, શ્રી ભદ્રસૂરીશ્વર:
સોયં સૌમ્યમના: સદા વિજયતે, શ્રી ૐકારસૂરીશ્વર:
સોયં સૌમ્યમના: સદા વિજયતે, અરવિંદસૂરીશ્વર:
देवाधिदेव परमतारक शत्रुंजय तीर्थाधिपति श्री ऋषभदेव प्रभु के चरणों मे वंदन। सद्गुरुदेव पूज्यपाद अरविंदसूरि दादा के चरणों मे वंदन। आज से एक नई यात्रा का प्रारंभ, आंतरयात्रा का। बाहर बहुत घूमे, बहार बहुत भटके, क्या मिला? ओर क्या मिल भी सकता है…?! बहार कुछ है भी नहीं तो….. बाहर है रति ओर अरति का द्वन्द्व, सुख ओर दुख का द्वन्द्व; आनंद तो हमारी भीतरी निजी घटना है। इस आंतरयात्रा का आनंद जिन्होंने अनुभूत किया, वैसे महोपाध्याय मानविजय महाराज आंतरयात्रा के आनंद की बड़ी ही सुंदर प्रस्तुति देते है, गुजराती भाषा मे प्रस्तुति आई है, ‘કહીએ અણચાખ્યો પણ, અનુભવ રસનો ટાણો મિલિયો, પ્રભુની મહેરે તે રસ ચાખ્યો, અંતરંગ સુખ પામ્યો, માનવિજય વાચક ઈમ જંપે, હુઓ મુજ મન કામ્યો’ आंतरयात्रा का आनंद, beyond the words, beyond the expectations. कहते है मानविजय महोपाध्याय- अनंत जन्मों मे मैंने एसा रस कभी चखा नहीं है। एसा रस का आस्वाद, मुझे इस जन्म मे प्रभु की कृपा से मिल गया।
तैतरिय उपनिषद मे ऋषि कहते है, ‘रसो वै स:’ रस एक ही है, जो भीतर है; बाहर तो कुछ भी नहीं है। आंतरयात्रा में जाना है, साथ में आओगे ना? मजा आएगा ! जब हम आंतरयात्रा मे जाते है, गहराई से, तब हमारा भाव जगत पूरा का पूरा बदल जाता है; ओर भाव जगत जब पूरा का पूरा जब बदल जाता है; तब हमारी ऊर्जा भी purify हो जाती है। हमारी बॉडी से ऊर्जा – ओरा सतत निकल रही है, अभी हमारे भाव इतने पवित्र नहीं है, जिससे की ओरा purify बन सके, लेकिन जब हम आंतरयात्रा में जायेंगे, हमारा भाव जगत विशुद्ध हो जाएगा, तो हमारी ऊर्जा इतनी purify होगी, इतनी निर्मल होगी, की हमे भी आश्चर्य होगा !
एक घटना मुझे याद आति है, हिम्मतभाई बेड़ावाले, हमारे युग के श्रेष्ठ साधक, बद्री की यात्रा पथ पर वे चल रहे थे, साथ में प्राणलालभाई दोशी, शशिकांतभाई महेता, चन्द्रकान्तभाई आदि थे। कार एक जगह रुकी, ओर मालूम हुआ, की थोड़ी दूर एक गुहा में बड़े ही पूजनीय संत रहते है, सोचा की चलो, संत के दर्शन के लिए चल पड़े। कार को वहाँ छोड़कर सब गुहा की ओर चले; शशिकांत भाई, चन्द्रकान्तभाई, प्राणलालभाई दोशी, गुहा में पहुँच गए, प्रणाम करके संत के पास बैठ गए, इच्छा थी सत्संग थोड़ा हो जाये; हिम्मतभाई धीरे धीरे चलते थे, पाँच मिनिट बाद हिम्मतभाई गुहा में enter हुए; जैसे ही हिम्मतभाई गुहा में enter हुए, संत खड़े हो गए, अपने आसन से; हिम्मतभाई के सामने आये ओर कहा, की आप यहाँ क्यू पधारे? आप तो मुझ से संत हो ! आप मुझ से भी बड़े संत हो! आप यहाँ क्यू आये? अभी तो गुहा में enter ही हुए है, हिम्मतभाई, लेकिन भाव जगत विशुद्ध होने से ऊर्जा इतनी purify बनी हुई थी, की संतने उस ऊर्जा को पकड़ लिया।
हम आज ऊर्जा तीर्थ की छाया में है। शत्रुंजय तीर्थ को हम ऊर्जातीर्थ कहेंगे। एक-एक कण से ऊर्जा बह रही है, अनंत सिद्धों की ऊर्जा बह रही है। लेकिन बात यह है की, हमारे पास receptivity है? में बहुत बार कहता हूँ, एक ही receptivity हमारे पास चाहिये, जिससे की ये ऊर्जा को हम प्राप्त कर सके। ओर इस संदर्भ में, में प्रभु की साधना को इस रूप में प्रस्तुत करता हूँ, की 99% grass, 1% effort. तुम्हारे पास सिर्फ receptivity आ गई, ग्राहकता आ गई; ऊर्जा को तुम भी पकड़ लोगे। आज शाम तलहटी जायेंगे आप, कल सुबह भी तलहटी जायेंगे आप, जैसे ही तलहटी में आप बेठेंगे, सिद्धशीला के पास, ऊर्जा मोजूद है वहाँ। अभी तक शायद आपने उस ऊर्जा को पहचाना नहीं, उस ऊर्जा को अनुभूत नहीं किया है। अब आंतरयात्रा में जब-जब आप जायेंगे, ऊर्जा का आपको अनुभव होगा। दूसरे तीर्थों पर भगवान का माहात्म्य होता है, भगवान कितने प्राचीन है, यहाँ परमात्मा से ज्यादा गिरिराज का महत्व है! गिरिराज पूर्ण तीर्थ ही है! ओर इस तीर्थ से सतत ऊर्जा बह रही है, उस ऊर्जा को हमें लेना है। ओर यहाँ से आप जायेंगे ना, ऊर्जा लेकर, तब क्या होगा मालूम है, फिर इतना तो विश्वास पेदा होगा, इतनी तो श्रद्धा पेदा होगी, आप कहेंगे की बस ,अब में ओर मेरे भगवान दो ही काफी है, ओर तीसरे गुरुदेव, चौथे का कोई काम नहीं।
हिमालय में ही एक संकरी गुहा थी। ओर उस संकरी गुहा में एक संत रहते थे, भक्तगण दर्शन के लिये गए, बहुत संकरी गुहा थी, तो एक भक्त ने पूछा संत से, की हिमालय में तो बड़ी-बड़ी गुहाए बहोत है, आप इतनी संकरी गुहा में क्यू हो? तब संत ने कहा, क्यू? बड़ी गुहा का क्या काम है? में ओर मेरे भगवान, दो तो यहाँ रहते है, फिर तीसरे का काम भी क्या है?! आंतरयात्रा जब हमारे पास आती है, हमारी ऊर्जा purify हो जाती है, हमारी श्रद्धा बढ़ जाती है।
हमें theorical ओर practical दोनों तरीके से काम करना है, यहाँ आपको सिर्फ प्रवचन सुनने के नहीं है, मेडिटेशन भी करने का है। आंतरयात्रा के लिये जो भी उचित मार्गदर्शन आपके लिये है, वो भी हम देंगे, लेकिन हमारा जोर practical साधना पर होगा; प्रवचन आपने बहुत सुने theorical, practically कुछ नहीं हुआ।
ओर में तो कहूँगा, की theorical भी प्रवचन आपने नहीं सुने। प्रवचन सुनने की theory क्या होती है, मालूम है? प्रवचन नौ बजे शुरू होता है, आपके शहर में; 8.45 पर आपको सभाखंड में आ जाना है। आँख बंध करके नवकार मंत्र का जाप करना है या ध्यान करना है। ओर उस ध्यान की आधारशीला ऊपर प्रभु के शब्द बरसेंगे! हमें कुछ करना नहीं है! में तो बहोत बार कहता हूँ, I have not to speak a single word. मुझे कुछ भी नहीं कहना है, या तो प्रभु के शब्द बरसेंगे (या) प्रभु ही खुद बरसेंगे। मैं भी श्रोता ही हूँ। तो theorical आप प्रवचन कैसे सुनेंगे? 15 मिनट पहले आ जाना है, ओर प्रवचन खत्म होने के बाद, साधना का कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी 10-15 मिनट बैठना है; जिससे की ये प्रभु के शब्द भीतर उतरे।
ओर आपके लिये मौन अत्यंत आवश्यक है, अनिवार्य रूप से, संपूर्ण तया मौन आप करेंगे, तभी ये साधना शिबीर का लाभ आपको मिलनेवाला है। आपने theorical भी सुन लिया, practical भी कर लिया, लेकिन मौन आपने नहीं किया, तो ये आंतरयात्रा सिर्फ शब्दों मे रह जायेगी, आपको आंतरयात्रा नहीं मिलेगी। प्राप्त करनी है ना भैया? बोलो तो… मुझे आपका अनुभव तो सुनाओ, बाहर क्या मिला? ओर में मेरा अनुभव सुनाऊ, मुझे भीतर क्या मिला…
लोग मुझे पूछते है, प्रभु आपको मिले, क्या हुआ? तो में कहता हूँ, जब से प्रभु मुझे मिले, में प्रभु के एर-कंडीशन हाथों में हूँ। घटना कितनी भी प्रतिकूल न हो जाये, में प्रभु के एर-कंडीशन हाथों में रहता हूँ; ever green ओर ever fresh रहता हूँ, लेकिन प्रभु की कृपा से! तो मौन बहुत ही आवश्यक है, जिससे की प्रभु की कृपा आपके भीतर भीतर भीतर जायेगी।
आपको एक बात कहु में, धन्नाजी ओर शालीभद्रजी वैभारगिरि की गुहा में रहते थे, आपको मालूम है। बस गुहा में रहते थे, बड़े ही प्रसन्नता से, बडा ही आनंद था, दूसरे किसी से कुछ लेना नहीं था, कुछ देना नहीं था! अपने भीतर जो था उसको अनुभूत करने का था। फिर गुहा से बाहर आने का प्रयोजन क्या था? लेकिन जब भी राजगृही नगरी में प्रभु का समवसरण होता, तब दोनों मुनिवर प्रभु के समवसरण में जाते। इरियासमिति पूर्वक चलते चलते समवसरण में जाते, प्रभु को वंदना समर्पित करते, बैठ जाते आँख बंध करके। कानों से सुनना है, इन्द्रियों के विषय में एक नियम है, इन्द्रियों की चेनल, एक समय दो साथ में नहीं चल सकती। आप को सिर्फ सुनना ही है। मैं तो आगे बढ़कर कहूँगा, प्रभु को पीना ही है। सुना तो बहोत, अब पीना है! तो पियोगे तो क्या होगा? पियकड़ से पूछो, क्या होता है? पी लिया, मस्ती आ गई! तो दोनों मुनिवर समवसरण में बैठ जाते, प्रभु को पीते थे। प्रभु को सुनते नहीं थे, आप यहाँ सूनने के लिये आये है ना… सुनना नहीं है; पीना है प्रभु को! मुझे नहीं पीना, में तो हूँ ही नहीं। प्रभु ही बरस रहे है, प्रभु ही सबकुछ कहेंगे, आपको प्रभु को पीना है। ओर फिर जब समवसरण पूर्ण होता प्रभु का, दोनों मुनिवर वहाँ से निकल जाते, ओर इरियासमितिपूर्वक अपनी गुहामें आते, इरियावही करके दोनों संत आसन पर बैठ जाते, फिर क्या करते? प्रभु ने theorical form में जो कहाँ था, उसका practical form में कैसे करना उसका चिंतन करते। यहाँ हमारे प्रवचन तो होंगे ही, लेकिन आपका अनुप्रेक्षण ज्यादा होना चाहिये।
श्रवण, अनुप्रेक्षण ओर अनुभूति ये अपना क्रम है। घर पर जहाँ पर आप है, प्रवचन सुनते है, अनुप्रेक्षण नहीं करते है। बहुत उदार आदमी है ना आप तो! म. सा. आप ही कर लेना हमारी ओर से अनुप्रेक्षण! ठीक है ना? हम ही को तकलीफ देते हो! आप ही सबकुछ कर लेना। लेकिन यहाँ तो में तकलीफ दूँगा आप को, श्रवण भी करना है, पूरी दिन में दो-ढाई घंटे का प्रवचन, या तीन घंटे का प्रवचन होगा, लेकिन आपका अनुप्रेक्षण एससे ज्यादा होगा।
ओर ध्यानाभ्यास जो कल हम सिखाएंगे, वो आप को तीन-चार बार करना है। क्योंकि ध्यानाभ्यास से ही आप आंतरयात्रा में जा सकेंगे। सिर्फ शब्द कुछ काम के नहीं है, शब्द से आगे जाना है, भीतर जाना है। तो दोनों मुनिवर एक ही काम करते थे। प्रभु ने जो कहाँ था समवसरण में, theorical form में, उसका practical कैसा हो सकता है, वो सोचते थे। आपको भी यह सोचना है। रात को नींद न आये तो क्या करेंगे? दो ही काम करने का है, या तो अनुप्रेक्षा या अनुभूति। आप सबका में अभिवादन करता हूँ। ओर आपकी receptivity को बढ़ाना है। इस खंड में टी.वी. के द्रश्य – श्राव्य raise मोजूद है, न मुझे मालूम होता है, न आपको क्यू? हमारे पास उन raise को झेलने की receptivity नहीं है। यही बात है, प्रभु बरस रहे है!
महोपाध्याय यशोविजयजी ने पंचविंशतिका में लिखा, क्या कहा- ‘व्यक्तया शिवपदस्थोЅसौ, शक्त्या जयति सर्वग:’ लिखते है वे, कहते है वे, ‘व्यक्तया शिवपदस्थोЅसौ, शक्त्या जयति सर्वग:’ व्यक्ति रूप से परमात्मा सिद्धशीला पर है, या महाविदेह में अभी है। लेकिन शक्ति रूप से प्रभु पूरे ब्रह्मांड में मोजूद है! ब्रह्मांड का एक tiniest portion एसा नहीं है, जहां प्रभु के हस्ताक्षर न हो। लेकिन हमारे पास receptivity नहीं है। अब उस कॉसमॉस में फैली हुई चेतना को, परम चेतना को नहीं झेल पाते। ओर इसीलिए अंजनशलाका, प्राणप्रतिष्ठा का अनुष्ठान होता है। ये जो सूक्ष्म परम शक्ति है, उसको आप नहीं झेल सकते, आप के पास इतनी receptivity नहीं है, तो आचार्य भगवंतों ने क्या किया? कॉसमॉस में बिराजित उस सूक्ष्म परम चेतना को मूर्ति में केन्द्रित किया।
में बार-बार कहता हूँ, भक्त की dictionary में, भक्त की vocabulary में मूर्ति शब्द का अस्तित्व होता ही नहीं है। मूर्ति तो कब तक? जयपुर से आई तब तक, जब प्राण प्रतिष्ठा हो गई, भगवान हो गये! में कहूँगा, महाविदेह में बिराजमान सीमंधरदादा जो कार्य अपने पर कर सकते है, वो ही कार्य यह मंदिर में प्रतिष्ठित सीमंधरदादा कर सकते है! क्यू? क्योंकि वो सीमंधरदादा में भी, मंदिर में प्रतिष्ठित सीमंधरदादा में भी प्राणचेतना, परमचेतना अवतरित हुई है।
ओर जिनविजयजी महाराज ने तो आगे बात उठाई, उन्होंने कहा, की प्रभु! जब सुषम काल था, ओर इस भरतक्षेत्र में आपका समवसरण होता था, में समवसरण में आता था, लेकिन मेरा उपादान अशुद्ध था, मेरा ह्रदय निर्मल नहीं था, मेरे पास receptivity नहीं थी; तो में आपको सुन न पाया, आप से कुछ पा न सका; लेकिन अब जब मेरा ह्रदय निर्मल है, उपादान शुद्ध है तो, आपकी मूर्ति से भी में इतना पा सकता हूँ, जो समवसरण में आपसे भी नहीं पा सका था!
तो theorical भी एसे सुनना है, practically भी सबकुछ करना है। एक बात अंत में कह दूँ, theorical प्रवचन कैसे सुनना? में बहोत बार कहता हूँ, आप समवसरण में तो गये थे ना? अतीत में। सब गए थे ना। याद है? में भी जाकर आया हूँ, आप भी जाकर आये हो। मालूम है? याद आता है कुछ? प्रभु के दर्शन होने पर समवसरण की याद आती है ना.. तो हम बहोत बार समवसरण में जाकर आये। जब जिज्ञासा वश गये, तब तो कुछ नहीं बना, लेकिन भक्ति वश जब हम गये, तब एक घटना घटी थी। क्या घटना घटी थी? में सिर्फ आपको याद दिला रहा हूँ। शायद आपको याद भी आ जाये, की एसा कुछ मेरे जीवन में हुआ था।
तो आप समवसरण में गये, भक्ति से वश, अब मनमें दुविधा पेदा हुई। क्या दुविधा हुई? दुविधा यह हुई, की प्रभु को निहारना? या प्रभु को सुनना? आँखों के सामने प्रभु का अप्रतिम रूप था! कानों के सामने प्रभु के प्यारे प्यारे, मीठे मीठे शब्द थे! क्या करना? कैसा रूप परमात्मा का!
महोपाध्याय यशोविजयजी ने कहा, ‘कोटि देव मिलकर न कर सके एक अंगुष्ठ प्रति छंद, एसो अद्भुत रूप तिहारो, मानु वर्षत अमृत के बूँद’ करोड़ देव एकत्र हो जाये, ओर अपने रूप को एकत्रित करे, तो भी वो रूप प्रभु के चरण के अंगुष्ठ जितना भी नहीं होता है! एसे रूप की extreme point हमारे सामने थी, प्रभु हमारे सामने थे! ओर प्रभु के मीठे मीठे शब्द हमारे कान के लिये मोजूद थे! तो दुविधा हुई, क्या करना है? मैंने पहले ही कहा, इन्द्रियों की दो चेनलों को हम एक साथ नहीं चला सकते। या तो हम देख सकते है, या तो सुन सकते है। मैंने मेरी वाचना सत्रों में बहोत ही साधकों को देखा है। डेढ़ घंटे तक में बोलता रहता हूँ, एसे साधक होते है, वीरासन में या सुखासन में बैठे हुए है, आंखे बंध है ओर कान से प्रभु को सुन रहे है, पी रहे है, ओर आँखों से आँसू बरस रहे है। तो इन्द्रियों की दो चैनल एकसाथ नहीं चल सकती। या तुम देखने में ध्यान रख सकते हो, या सुनने में ध्यान रख सकते हो।
तो हमारे जीवन में क्या घटना हुई थी? हम गये थे समवसरण में, तो हमारे जीवन में कौन सी घटना घटित हुई थी? Obviously औडियो विजन ओर वीडियो विजन दोनों होते है, तब हमारा ध्यान वीडियो विजन की ओर आकृष्ट होता है। तो उस समय भी प्रभु का रूप निहारने का हुआ, प्रभु के शब्द छूट गए। ओर ये जो प्रभु के शब्द जो वहाँ छूट गये थे, उनका ही अनुसंधान यहाँ करना है। आप बंद आँख से है, आपको लगे की में समवसरण में आ गया हूँ, ओर उस अतित में जो प्रभु के शब्द छूट गये थे, में प्रभु को निहारने में लगा था, शब्द छूट गये थे, वो प्यारे प्यारे शब्द मेरे सामने आज बरस रहे है।
ऊर्जातीर्थ में हम आये है, ओर आंतरयात्रा हमें करनी है, ऊर्जातीर्थ में आंतरयात्रा बहोत बड़ी बात है। एसे तो आंतरयात्रा करने में थोड़ी दिककते होती है। क्योंकि हमारे लिये वो अभ्यस्त नहीं है। बाहर ही घूमे है, अनंत जन्मों से; लेकिन इस ऊर्जातीर्थ में आप आये हुए है, तो गिरिराज की ऊर्जा आपको बहोत ही सहायक होगी। तो इस ऊर्जातीर्थ में आप आये हुये है। कल से तीनों प्रवचन ध्यान से सुनने है, एसे सुने की प्रभु के शब्द भीतर उतर जाये! कान तक न रहे, मन तक न रहे, आप के भीतर उतर जाये! में बहोत बार पूछता हूँ मेरे प्रवचन में, की तुम सुन तो रहे हो, प्यार से सुन रहे हो, लेकिन सुनता कौन है? सुनता कौन है? सुननेवाला कौन है? तुम्हारे कान सुननेवाले है? तुम्हारा मन सुनता है? या तुम स्वयं सुनते हो? श्रोता कौन है? ये तो मुझे पता चलना चाहिये ना… श्रोता कौन है? तुम्हारे कान, तुम्हारा मन, की तुम खुद? बोलो? वक्ता अस्खलित गति से प्रवचन देंगा, तुम्हारे कानों के लिये ओच्छव हो जाएगा, अब बडा मजा आ गया। प्रवचनकार महात्मा ने एसी बाते कही, की जो तुमने पहले भी कभी नहीं जानी थी। ओहो ये तो बहोत ही सुंदर बाते हो गई। मनको मजा आ गया, लेकिन तुम कहाँ थे? यो आज पहला दिन है, में कह देता हूँ, मुझे आपको ही सुनाना है, न आपके कानों को, न आपके मन को, conscious mind को नहीं सुनाना है। खुद आपको ही सुनाना है। तो कल से आप खुद आयेंगे, कान को नहीं भेज देंगे, conscious mind को नहीं भेज देंगे, आप खुद आयेंगे।
