MAUN DHYAN SADHNA SHIBIR – 19 | 02-10-2026 | NOON | KATREJ, PUNE.

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भगवत्-प्रेम

प्रभु का प्रेम कितना विस्तृत, कितना गहन… प्रभु ने ऐसा नहीं कहा कि मैं मेरे संघ में सिर्फ उसको स्थान दूँगा जो संसार को छोड़ दे। प्रभु ने कहा कि जिसके मन में मेरे प्रति, मेरी आज्ञा के प्रति प्रेम है, उन श्रावकों को, श्राविकाओं को भी मेरे धर्म संघ में स्थान है। आपको प्रभु ने अपने धर्म संघ में प्रविष्ट किया और अपने परमप्रेम का अधिकारी बनाया!

हो सकता है कि आपका शरीर प्रभु की आज्ञा के मुताबिक शत-प्रतिशत नहीं चलेगा। सामायिक में होंगे, तब शरीर प्रभु की आज्ञा के मुताबिक चलेगा। लेकिन जब आप संसार में हैं, ऑफिस में हैं, घर में हैं, तो शरीर प्रभु की आज्ञा के मुताबिक नहीं चल पाएगा।

लेकिन आप अपना मन प्रभु को दे सकते हो। जैसे ही आपका मन प्रभु को आपने दे दिया, परम प्रेम के आप भी अधिकारी हो गए। मन प्रभु को देना, प्रभु को समर्पित करना, इसका अर्थ इतना ही है कि प्रभु! भले ही मैं तेरी आज्ञा का पूर्णतया पालन नहीं कर सकता, लेकिन मेरे मन में तेरे प्रति, तेरी आज्ञा के प्रति पूर्णतया अनुराग है।


परम प्रेम का आस्वाद भीतर पहुँचा; संसार छूट गया। ऐसा एक रस, ऐसा एक आस्वाद, जिसकी हमने कल्पना भी न की हो। तैत्तिरीय उपनिषद में ऋषि कहते हैं: “रसो वै सः।“ रस एक ही है: परम प्रेम। इस परम प्रेम की अनुभूति करनी है।

हमारे युग में पूज्यपाद कलापूर्णसूरी दादा हो गए। आपके उपनिषद में हम बैठते थे; परम प्रेम की अनुभूति हमें होती थी। एक सूत्र मैं बहुत बार रिपीट करता हूँ: “There is the same fragrance and same taste in all the respected Gurus.” पहुँचे हुए सब सद्गुरुओं में एक सरीखा ही आस्वाद, एक समान ही सुगंध होती है। क्योंकि वह आस्वाद, वह सुगंध परमात्मा की है।

सद्गुरु ने अपना हृदय, अपना पूरा अस्तित्व वेकेंट कर दिया, खाली कर दिया, रीता कर दिया। और उस रीतेपन में परम चेतना का अवतरण हुआ। तो सद्गुरु के चरणों में हम बैठते हैं, तब हमें परम प्रेम की भनक मिलती है। वही सुगंध, वही आस्वाद।

पन्यासजी भगवंत के पास तुम जाओ; कलापूर्णसूरी दादा के पास तुम जाओ; या सिद्धिसूरी भगवंत के पास तुम जाओ। कहीं भी तुम जाओ, पहुँचे हुए सद्गुरु के चरणों में तुम्हें परम रस का, परम प्रेम का अनुभव होगा।

तो एक सूत्र यह मिला कि, परम चेतना अवतरित होने के लिए तैयार है। हमें सिर्फ हमारे हृदय को वेकेंट करना है। बाइबल में भी क्राइस्ट ने कहा: “Empty thy vessel and I’ll fill it.” तेरा हृदय तू खाली कर दे, मैं भर दूँगा। और तुम खाली न कर सको, तो सद्गुरु तैयार हैं तुम्हारे हृदय को खाली करने को। सद्गुरु को देखो; सद्गुरु के चेहरे पर जो आनंद है, उस आनंद को देखो।

यह आनंद कहाँ से आया? हमारे पास दूसरा कुछ भी नहीं है। यह उपाश्रय भी तुम्हारा। भोजन भी तुम्हारे वहाँ से हम लाएँगे। वस्त्र भी तुमने हमें दिया है। हमारे पास सिर्फ परमात्मा है। और हम इसलिए तो निकले है: परमात्मा को पाने के लिए। परमात्मा मिल गए।

अब आप पूछेंगे: “साहिब जी, क्या खप है?” हम कहेंगे बस, हृदय भर गया है; प्रभु मिल गए हैं; प्रभु के प्रेम से पूरा हृदय भर चुका है; अब कुछ भी न चाहिए।”

तो आपके हृदय में एक स्वप्न को संजोना है। एक स्वप्न आपके मन में रखना है। बस आपके मन में यह फीलिंग पैदा हो जाए कि परम प्रेम के बिना मेरा यह जीवन meaningless है। परम प्रेम मिला, हमारा जीवन सार्थक हो गया। यह आस्वाद ऐसा होता है कि जन्म बदल जाए, शरीर छूट जाए, आस्वाद न जाए। शरीर छूट जाए, आस्वाद नहीं छूटेगा।

मृगापुत्र श्रेष्ठिपुत्र थे। एक दिन अपने बंगले में झरोखे में बैठे हुए थे, और उन्होंने एक मुनिराज का दर्शन किया। मुनिराज विहार करके जा रहे हैं। मुनिराज का दर्शन हुआ। इस जन्म में पहली बार मुनिराज का दर्शन हुआ। लेकिन भीतर एक खलबली मची। एक स्ट्राइक, ऐसा तो कुछ अनुभूत किया है। कहाँ किया था? इस जन्म में तो अनुभूति नहीं हुई है। और जातिस्मरण ज्ञान हुआ। पूर्व जन्म की स्मृति मन में उभरी। पूर्व जन्म में वे मुनि थे।

मुनि का जीवन क्या है? एक साध्वीजी का जीवन क्या है? क्षण-क्षण परम प्रेम की अनुभूति। यही है एक मुनि का जीवन; यही है एक साध्वीजी का जीवन। एक-एक क्षण में परम प्रेम की अनुभूति।

मैं वहाँ धर्मशाला में बैठा हूँ; यहाँ सुधर्मा पीठ पर बैठा हूँ। दोपहर को मैं गोचरी वापर रहा था। क्रिया कोई भी चलती हो, स्थान कोई भी हो, परम प्रेम की अनुभूति क्षण-क्षण होती रहती है। आपको हमारी ईर्ष्या आती है? आती है?

मन में सवाल उठता है: क्या होगा परम प्रेम? साहब इतने खुलकर बात करते हैं, तो क्या होगा यह परम प्रेम? एक-एक क्षण हमारे परम प्रेम में… और हमारे पास जो आनंद है, वह आनंद यह परम प्रेम का है।

आप श्रावक हो, लेकिन आपको भी प्रभु के संघ में स्थान मिला है। हम सुबह उठते हैं, सबसे पहले इस रजोहरण को सिर पर लगाते हैं। और उस समय हमारी आँखें नम हो जाती हैं। हमारी आँख के आँसू प्रभु से कहते हैं कि प्रभु, मेरी कोई सज्जता नहीं, मेरी कोई पात्रता नहीं, और तूने तेरा यह श्रेष्ठ वरदान मुझे दे दिया।

आप पूजा करने के लिए गए हो, टीका लगाते हो, उस समय ये भाव आपके मन में भी उठेंगे कि प्रभु का प्रेम कितना विस्तृत, कितना गहन… प्रभु ने ऐसा नहीं कहा कि जो संसार को छोड़ दे, उन्हें मेरे संघ में मैं स्थान दूँ। प्रभु ने कहा कि जिनके मन में मेरी आज्ञा के प्रति प्रेम है, मेरे प्रति प्रेम है, उन श्रावकों को और उन श्राविकाओं को भी मेरे धर्म संघ में स्थान है। आपको प्रभु ने अपने धर्म संघ में प्रविष्ट किए।

तो परम प्रेम के आप भी अधिकारी हैं। आप क्या कर सकते हैं? मैं कहूँ: आप श्रावक हैं, श्राविका हैं। शरीर आपका प्रभु की आज्ञा के मुताबिक शत-प्रतिशत नहीं चलेगा। सामायिक में होंगे, तब शरीर प्रभु की आज्ञा के मुताबिक चलेगा। लेकिन आप संसार में हैं, ऑफिस में हैं, घर में हैं, तो शरीर प्रभु की आज्ञा के मुताबिक नहीं चल पाएगा। लेकिन आप अपना मन प्रभु को दे सकते हो। आपका मन प्रभु को आपने दे दिया, परम प्रेम के आप भी अधिकारी हो गए।

मन प्रभु को देना, मन प्रभु को समर्पित करना, इसका अर्थ यही है कि प्रभु, तेरे प्रति मेरा पूर्ण प्रेम है; तेरी आज्ञा के प्रति मेरा पूर्ण प्रेम है; लेकिन मैं तेरी आज्ञा पूर्णतया पालित नहीं कर सकता, लेकिन मेरे मन में पूर्णतया अनुराग है। हम भी कहेंगे प्रभु से कि प्रभु, तेरी सब आज्ञाएँ मैं भी नहीं पाल सकता, लेकिन इतना जरूर है कि प्रभु की एक-एक आज्ञा पर तीव्र अनुराग है। मेरे प्रभु की आज्ञा।

और इस संदर्भ में प्रीति अनुष्ठान की बात आती है। ऐसा अनुष्ठान जो भगवत्-प्रेम में रंगा हुआ हो। आप पौषध में हैं, एक नैपकिन का आप प्रतिलेखन कर रहे हैं। दो तरह से प्रतिलेखन होगा। विधि है, कर लो। यह एक बात। मेरे प्रभु ने कहा है, और मुझे करना है। तो यह नैपकिन के प्रतिलेखन की क्रिया, १० सेकंड या १५ सेकंड की प्रक्रिया, भगवत्-प्रेम से जुड़ी हुई है। मेरे परमात्मा ने कहा है।

शाहपुर में उपधान था। एक साधक मुंबई से उपधान करने के लिए आए थे। प्रवेश के पूर्व दिन, पूर्व संध्या पर, मुझे वे मिले। और उन्होंने कहा कि गुरुदेव, मुझे स्वाध्याय की धारा मिली है। मैं घंटों तक स्वाध्याय कर सकता हूँ, चिंतन भी कर सकता हूँ, लेकिन क्रिया की धारा मेरे पास नहीं है। और उपधान में बहुत क्रियाएँ होती हैं, तो मैं उपधान कर पाऊँगा?

मैंने उनसे कहा कि प्रभु, तुम्हें मुंबई से यहाँ तक लाए हैं, तो प्रभु ही करवाएँगे, प्रभु ही करवाएँगे। वे उपधान में दाखिल हो गए। एक सप्ताह बाद, एक दोपहर को, मेरे पास वे आए। चरवले से जमीन को पूंजी, कटासना बिछाया, विधिपूर्वक वंदन किया, बैठे। उनकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।

मैंने पूछा, क्या हुआ? तो उन्होंने कहा कि गुरुदेव, ये आँसू भगवत्-प्रेम के आँसू हैं। परम प्रेम के आँसू हैं। मैंने कहा, जरा बात तो करो। तब उन्होंने कहा कि गुरुदेव, उपधान में मेरा प्रवेश तो हो गया। आपके प्रवचन में ईर्यासमिति की बात आई। अब ऐसा होता है कि मैं मेरी धर्मशाला की रूम से तलहटी के मंदिर जाता हूँ, तो मंदिर पहुँचने में मुझे २० मिनट लगते हैं। मैंने कहा, २० मिनट? रास्ता तो ८ मिनट का है। तब उन्होंने जो बात कही, लगेगा कि भगवत्-प्रेम क्या होता है।

उन्होंने कहा कि गुरुदेव, मैं चलता हूँ ईर्यासमिति पूर्वक, रास्ते को देखते-देखते, १५-२० डग मैं चलता हूँ, और मेरी आँखें आँसू से भर जाती हैं कि मेरे प्रभु ने कितना सुंदर अनुष्ठान बताया है। तो भगवान के प्रति प्रेम से मेरी आँख में आँसू आ जाते हैं। अब आँख में आँसू आ गए, रास्ता दिखेगा नहीं। तो मैं खड़ा हो जाता हूँ, नैपकिन से आँखें पोंछता हूँ, और फिर चलता हूँ। फिर १०-१५ फीट चला, आँख में आँसू, फिर खड़ा रहता हूँ, फिर आँखें पोंछता हूँ। थोड़ा-थोड़ा चलने में आँखें आँसू से भर जाती हैं। क्या मेरे प्रभु ने बताया है!

हम प्रभु के दर्शन करते हैं, कैसे दर्शन करेंगे? आँख से आँसू बहेंगे। शुरुआत आँसू से करनी है, अहोभाव से। बाद में वीतरागता का भी दर्शन करना है। अंत में तो शुद्ध में जाना ही है। लेकिन शुरुआत शुभ से होगी। दर्शन दो प्रकार से होते हैं।

आप मंदिर गए, सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, प्रभु का दर्शन होता है, और आँख से सावन-भादो शुरू हो जाता है। भीगी-भीगी आँखों से दर्शन, यह पहली रीत। कभी ऐसा हो जाए, आँखें नम नहीं हैं, आँखें गीली नहीं हैं, भीगी नहीं हैं, और प्रभु के भीगे-भीगे रूप का दर्शन करना है, तब क्या करना? आँख में आँसू हैं, तब तो प्रभु के भीगे-भीगे रूप का दर्शन होगा। लेकिन आँख में आँसू नहीं हैं, और प्रभु के भीगे रूप का दर्शन करना है, कैसे करोगे?

तब सद्गुरु की आँखों में झाँकना है। सद्गुरु की आँखों में तरलित प्रवाही पर प्रभु के रूप का दर्शन होगा। भीगे-भीगे प्रभु-रूप का दर्शन होगा। तो भगवत्-प्रेम… आप भी भगवत्-प्रेम के अधिकारी है।

मृगापुत्र को जातिस्मरण ज्ञान हुआ। परम पावन उत्तराध्ययन सूत्र में इस मृगापुत्र की कहानी आती है। तो जातिस्मरण ज्ञान हुआ, पूर्व जन्म का जो मुनि जीवन था, उसकी स्मृति उभर आई मन में। क्या था, मैंने पहले बताया। मुनि जीवन की एक-एक क्षण परम प्रेम में डूबे हुए थे। एक-एक क्षण, एक-एक सेकंड, प्रभु प्रेम, प्रभु प्रेम। उस प्रभु प्रेम की स्मृति हुई। मुनि जीवन की स्मृति हुई, मतलब परम प्रेम की स्मृति हुई।

और ऐसी स्मृति हुई कि उस समय मृगापुत्र परम प्रेम की अनुभूति करने लगे। कभी-कभी ऐसा होता है, किसी के साथ थोड़े क्षण हमने बिताए हैं, लेकिन इतने सघन क्षण मिलन के, कि जब उसकी स्मृति आती है, तब तुम अनुभूति कर सकते हो। मृगापुत्र सिर्फ परम प्रेम की स्मृति नहीं करता है, अनुभूति करता है। पूर्व जन्म की बात, कैसा अनुभव किया होगा? कैसा अनुभव किया होगा कि इस जन्म में भी यह स्मृति अनुभूति के रूप में परिवर्तित हो जाती है।

और परम प्रेम की अनुभूति, संसार मन से छूट गया। अब मृगापुत्र ने माता से, पिता से कहा, मुझे दीक्षा लेनी है। माँ ने कहा, तू मेरा इकलौता बेटा, तेरे पर तो मेरा जीवन का आधार है, तू कैसे चला जाएगा? लेकिन मृगापुत्र की आँख के आँसू कहते थे कि, वह संसार में नहीं रह सकेगा। वैराग्य के, प्रकर्ष की यह बात है।

विराग शब्द का मैं अर्थ दूसरे संदर्भ से करता हूँ। एक तो विराग का अर्थ है राग गया, राग शिथिल हो गया, वैराग्य हुआ। मैं दूसरा अर्थ करता हूँ, विराग यानी विशेष राग। प्रभु पर इतना उत्कट प्रेम हो गया कि बस अब दूसरों के साथ प्रेम करने की कोई मनोस्थिति न रहे।

हीरसूरि महाराज साहिब के एक शिष्य थे, पन्यास भानुचन्द्र गणी। जब हीरसूरि दादा को दिल्ली से जाने का हुआ, बड़े महान आचार्य थे, तो एक जगह तो नहीं रह सकते, लोगों की विनंती होती है। तो साहिब को जाने का था, तब अकबर बादशाह ने कहा कि आप तो बड़े गुरु हो, आपको मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ। और आपके भक्त भी अनेक हैं, तो आपको जाना पड़ेगा, लेकिन रोज़ मैं उपदेश सुन सकूँ, इसलिए आप मुनिराज को रखकर जाओ। और गुरुदेव ने पन्यास भानुचन्द्र को आदेश दिया कि तुझे तेरे शिष्यों के साथ यहाँ रहने का है, और रोज़ बादशाह को उपदेश सुनाने का है।

अब बादशाह और उसका परिवार श्रोता थे। और भानुचन्द्र गणी बहुत ही सुंदर प्रवक्ता थे। अभिव्यक्ति इतनी कुशल थी कि बादशाह की छोटी लड़की उसके एकतरफे प्रेम में पड़ गई। बादशाह की उस लड़की ने निश्चित कर लिया, शाहज़ादी ने, कि मैं शादी करूँगी तो इसके साथ ही… उसको यह मालूम नहीं कि यह जैन साधु है। बादशाह की बहुत प्यारी बच्ची थी वह।

तो उस बच्ची ने बादशाह से कहा कि मेरी शादी सिर्फ इस युवा मुनि के साथ हो सकती है। मैं दूसरे किसी के प्रेम में नहीं जाऊँगी। बादशाह ने कहा, यह तो जैन मुनि है, और वे तो करोड़ों रुपये छोड़कर दीक्षित हुए हैं। वह कैसे संसार में आएँगे? लेकिन यह तो बच्ची नादान थी। तो नादान बच्ची ने कहा, नहीं, मैं तो उसके साथ ही शादी करूँगी।

अब बादशाह सोच में पड़ गया। बादशाह ने एक दिन भानुचन्द्र जी से कहा कि यदि आप संसार में आ जाओ, तो मेरी शाहज़ादी का ब्याह आपके साथ करा दूँ, और आपको बड़े राज्य के शासक बना दूँ।

उस समय भानुचन्द्र जी ने कहा था कि यह प्रभु का प्रेम मुझे मिला है, यह प्रभु की प्रसादी मुझे मिली है। तुम तो कहते हो मैं राज्य दे दूँ, इंद्र आकर कह दे कि मेरा इंद्रासन दे दूँ, तो भी मैं इससे हटने वाला नहीं। तीन लोक का साम्राज्य मिल जाए, तो भी मैं इसे नहीं छोड़ूँगा।

यह क्या था? भगवत्-प्रेम का अनुभव। इस प्रेम का अनुभव आपको करना है। मुझे तो कराना ही है, आपको करना है न? कि सिर्फ बातें सुननी हैं? बोलो, आमने-सामने हो जाए। मुझे अनुभव कराना है। अनुभव करना है? ऐसा परम प्रेम का अनुभव हो जाए, सब छूट जाए। कोई कहेगा, यहाँ ऐसा हुआ, उसने ऐसा किया। अरे, सब बात छोड़ो, सब बात छोड़ो। प्रभु की बात करो। दूसरी कोई बात सुननी ही नहीं।

नारद ऋषि ने कहा था, तत्प्राप्य तदेव अवलोकयति, तदेव श्रृणोति, तदेव चिंतयति भगवत्-प्रेम मिल गया, फिर दूसरी कोई बात सुननी ही नहीं। त्वदेव श्रृणोति. प्रभु की बात कहते हो, तो कहो। दूसरों की बात है, तो मुझे नहीं सुननी। त्वदेव चिंतयति चिंतन किसका? भगवत्-प्रेम का। और मैं तो कहता हूँ, श्रवण भी छूट जाए, चिंतन भी छूट जाए, अनुभूति ही रह जाए।

तो मृगापुत्र की आँख के आँसू कह रहे थे कि भगवत्-प्रेम का अनुभव ऐसा हुआ है कि अब दूसरे प्रेम में वह नहीं जा सकेगा। और दीक्षा की अनुमति मिली। और जब मृगापुत्र दीक्षा लेने के लिए जा रहे हैं, उस समय का वर्णन परम पावन उत्तराध्ययन सूत्र में आया।

रेणुअं व पडे लग्गं, निध्धुणित्ता ण निग्गओ

वस्त्र पर पड़ी हुई रज को निकालकर कोई चले, ऐसे ही मृगापुत्र राग-द्वेष-अहंकार सब कुछ छोड़कर प्रभु-प्रेम की सघन अनुभूति के लिए निकल पड़े।

भगवत्-प्रेम, प्रेम ही पीना है, प्रेम ही खाना है। पंचसूत्र में कहा, आज्ञा अर्थात प्रभु का प्रेम। आज्ञा कोई खाओ, आज्ञा कोई पियो।

मीरा के पास कैसा प्रभु-प्रेम था? मीरा ने कहा था,

जो दे सो ही पहनूँ, जो दे सो ही खाऊँ, जो पहनावे सो ही पहनूँ, जो दे सो ही खाऊँ, जिहाँ बैठावे तित ही बैठूँ…

क्या कहती है मीरा? जो पहनावे सो ही पहनूँ। मेरी कोई इच्छा नहीं कि यह चुंदरी पहननी है या यह चुंदरी पहननी है। जो पहनावे सो ही पहनूँ। मेरा प्रभु जो वस्त्र मुझे दे, वही मैं पहनूँगी। जो दे सो ही खाऊँ।

हम भी क्या खाते हैं? व्यवहार से ऐसा कहेंगे कि आप देते हैं और हम खाते हैं। लेकिन हम हमारे प्रभु की आज्ञा से भोजन लेते हैं। आप कहेंगे, महाराज साहिब, यह आम का रस है, ले लो। फ्रिज से निकाला और कहा, ले लो। हम कहेंगे, नहीं, हमारे प्रभु की ऐसी आज्ञा नहीं। तुरंत आपने निकाला, तो हम नहीं ले सकेंगे। तो मीरा कहती है, जो दे सो ही खाऊँ।

आगे कहा, जिहाँ बैठावे तित ही बैठूँ। वह कहेगा, यहाँ बैठ जा, मैं बैठ जाऊँ।

और अंत में मीरा ने कहा, गज़ब बात कही, “बेचे तो बिक जाऊँ।“ बेचे तो बिक जाऊँ। वह मुझे बेच दे, तो मैं बिकने के लिए तैयार हूँ। मैं हूँ ही नहीं, वह ही है। यह भगवत्-प्रेम है।

इसीलिए हम भगवत्-प्रेम को कब अनुभव कर सकते हैं? आपके लिए बात है, तुम्हारे लिए। भगवत्-प्रेम का अनुभव तुम कब कर सकते हो? जब तुम totally choice-less हो तब। इच्छा मुक्त हो तब। कोई इच्छा ही नहीं है, उसकी जो आज्ञा हो। इच्छा होगी तो गड़बड़ हो जाएगी। मेरी यह इच्छा है और प्रभु की, सद्गुरु की यह आज्ञा है। अब क्या करूँ?

तो भगवत्-प्रेम का अनुभव शायद नहीं हुआ है, तो इसका कारण यही है कि तुम इच्छा मुक्त नहीं हुए। totally choice-less बन जाओ। एक भी इच्छा नहीं। तो यह भगवत्-प्रेम…

भक्ति का मारग झीणा झीणा रे, नहिं अचाह, नहिं चाहना, चरनन लय लीना रे

नहिं अचाह, कहीं पर भी द्वेष नहीं, अरुचि नहीं। यह गलत है, ऐसा विचार ही कभी नहीं आता। नहिं अचाह, नहिं चाहना, चाहत भी नहीं है।

प्रभु पर प्रेम हो गया, अब नश्वर देह पर प्रेम होगा? हो सकता है? Is it possible? प्रभु पर प्रेम हो गया। आनंदघनजी ने पहले स्तवन में कहा,

“रीझियो साहिब संग न परिहरे, भांगे सादि अनंत.”

प्रभु के साथ एक बार मिलन हो गया, फिर अनंत समय तक प्रभु इस प्रेम को संजोएगा। तो प्रभु के साथ प्रेम हो गया, तो इस नश्वर देह के साथ, नश्वर देह के धारक किसी व्यक्ति के साथ प्रेम हो सकता है? नहिं अचाह, नहिं चाहना।

तो क्या कर देगा? चरनन लय लीना रे। प्रभु के चरणों में लीन हो जाना है, पिघल जाना है।

एक सद्गुरु को एक युवा ने पूछा था कि गुरुदेव, प्रभु कैसे मिले? तब गुरुदेव ने कहा था, तुम मिटो तो मिलना होय। तुम मिट जाओ, पिघल जाओ, तुम्हारा अस्तित्व न रहे, प्रभु मिल जाएंगे।

सुलसाजी मिट गई, प्रभु को पा गई। चंदनाजी मिट गई, प्रभु को पा गई। रेवतीजी मिट गई, प्रभु को पा गई।

एक बात आज माताओं से, बहनों से विशेष रूप में करूँ। स्त्री देह की एक विशेषता है। स्त्री देह में ऐसी एक रासायनिक प्रक्रिया होती है कि स्त्री देह झड़प से पिघल जाता है, विलीन हो जाता है। पुरुष अकड़ू है, अहंकारी है। स्त्री देह में एक विशेषता है। ऐसी एक रासायनिक प्रक्रिया होती है। तभी तो सुलसाजी मिट सकी, रेवतीजी मिट सकी, चंदनाजी मिट सकी। प्रभु के साधु कितने और साध्वियाँ कितनी? हर साल कल्पसूत्र में सुनते हो, प्रभु के श्रावक कितने और श्राविकाएँ कितनी? क्यों? इसका राज यह है कि समर्पण के मामले में स्त्री, माता, बहन हमसे आगे है।

तो चरनन लय लीना रे। प्रभु के चरणों में लीन हो जाना है, हम रहें ही नहीं। तुम मिटो तो मिलना होय। तुम्हारा होना, यही बड़ी समस्या है। तुम्हारे अहंकार का होना, यही बड़ा अवरोध है भगवत् प्राप्ति में, भगवत्-प्रेम प्राप्ति में। तुम न हो, तो वही होगा।

एक भाई ने मुझसे पूछा था कि गुरुदेव, हम प्रभु से विनती करते हैं, मन मंदिर आवो रे, लेकिन प्रभु तो आए ही नहीं। मैंने कहा, प्रभु आए थे, लेकिन लौट गए। उसने पूछा, क्यों? क्यों लौट गए?

तो मैंने कहा, सिंहासन एक था हृदय का, और उस पर तू चढ़ गया था। प्रभु आकर बैठे कहाँ? तू सिंहासन खाली कर दे, प्रभु आ जाएंगे।

चरनन लय लीना रे। इस भगवत्-प्रेम की बातें रोज़ हम करेंगे। अनुभव इतना है कि शब्दों में मैं प्रस्तुत भी नहीं कर सकता । लेकिन थोड़ी-थोड़ी बातें, ऊपर-ऊपर की बातें, प्रस्तुत करनी होंगी।

अब इसी भगवत्-प्रेम की धारा में, अनुभव से चलें। ध्यानाभ्यास शुरू करें।

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