MAUN DHYAN SADHNA SHIBIR – 19 | 03-10-2026 | MORNING | KATREJ, PUNE.

3 Views
25 Min Read

*गुणरहितं*

जिन्होंने परमप्रेम का अनुभव किया, उन्होंने परमप्रेम को पाँच विशेषण दिए : _गुणरहितं, कामनारहितं, प्रतिक्षणवर्धमानं, अविच्छिन्नं, सूक्ष्मतरं_। पहला विशेषण: _गुणरहितं_। तीन गुण हैं: रजोगुण, तमोगुण, सत्वगुण। परमप्रेम इन तीनों गुणों से रहित – त्रिगुणातीत – है। तो जब परमप्रेम को आप झेलते हैं, Enjoy करते हैं, तो आप भी त्रिगुणातीत हो जाते हैं।

रजोगुण का अर्थ है राग। तमोगुण का अर्थ है द्वेष। सत्वगुण का अर्थ यह है कि तुमने कोई अच्छा कार्य किया – जैसे कि दो-पाँच करोड़ रुपये खर्च डाले, धर्मशाला बनवाई, संघ निकाला, उपधान कराया – अच्छा कोई भी कार्य तुमने किया, लेकिन भीतर थोड़ा अहंकार रह गया कि _मैंने_ यह किया; तो यह है सत्वगुण।

इस सत्वगुण के भी पार जाना है। अच्छे कार्य करने हैं, लेकिन अहंकारमुक्त होकर, कर्तृत्वमुक्त होकर। अगर आप भक्त हैं, तो सारे कार्यों का कर्तृत्व प्रभु का ही है। और अगर आप साधक हैं, तो सब कुछ क्रमबद्ध पर्याय के अनुसार घटित हो रहा है। तुम कार्य करते हो लेकिन उसका कर्तृत्व तुम्हारे पास नहीं है, तो सत्वगुण भी चला जाएगा।


सुबह की वेला। मीरा गुरु के आश्रम गई हुई है, द्वार बंद है। मीरा ने द्वार खटखटाए, भीतर से गुरु की आवाज आई, “कौन है?” मीरा ने कहा, “मैं मीरा, प्रभु के चरणों की दासी।”

लगेगा कि कितनी सुंदर रीति से मीरा ने अपन को इंट्रोड्यूस किया। मैं मीरा, प्रभु के चरणों की दासी। द्वार खुला, मीरा भीतर गई, गुरु के चरणों पर वंदन अर्ज किया, बैठी। तब गुरु ने पूछा, “मीरा, अभी-अभी तूने कहा, ‘मैं मीरा, प्रभु के चरणों की दासी,’ लेकिन ये दोनों साथ-साथ में कैसे हो सकता है? कि तू मीरा भी हो और प्रभु के चरणों की दासी भी हो?”

मीरा को ख्याल नहीं आया कि गुरुदेव क्या पूछ रहे हैं। मीरा ने पलकें ऊँची उठाईं, प्रश्न की मुद्रा में।

तब गुरुदेवने कहा, “प्रभु के चरणों की दासी होने का मतलब क्या है?” गुरु समझाते हैं, “बारिश की एक बूंद समंदर में गिरी, अब कोई कहे कि उस बूंद को बाहर लाओ, कैसे बाहर लाएँगे? जिस क्षण बूंद समंदर में गिरी, उसी समय वह Identity-less बन गई। बूंद ने अपनी identity खत्म कर दी और समंदर को प्राप्त कर लिया। जब तक बूंद बूंद है, वह समंदर को प्राप्त नहीं कर सकती। लेकिन बूंद बूंद रूप न रही, तो समंदर को पा गई।”

गुरु कहते हैं, “प्रभु के चरणों की दासी बनने का अर्थ है Identity-less बनना, name-less बनना। तू प्रभु के चरणों की दासी है, तो मीरा कैसे है? तेरी identity कैसे है?” मीरा को यह बात इतनी तो appealing लगी, उसी क्षण मीरा ने निश्चित किया कि मीरा केंद्र से विदा हो रही है और केंद्र में प्रभु आ रहे हैं।

तुम्हारा केंद्र से विदा होना, प्रभु का आना, उस समय तक मीरा जो भजन लिखती थी, अंत में आता था, ‘मीरा के प्रभु गिरिधर गोपाल’। प्रभु रहते थे, लेकिन मीरा भी रहती थी। इस घटना के पश्चात मीरा अदृश्य हुई है। इस घटना के बाद जो भी भजन रचे गए, अंत में आता है, ‘रावरी दासी’। मीरा गई, प्रभु के चरणों की दासी प्रकट हुई।

और जब तुम केंद्र में से विदा होते हो, तभी तो परम प्रेम के तुम अधिकारी होते हो। हम परम प्रेम के अधिकारी हो गए। लेकिन कैसे हुए? जिस क्षण गुरुदेव ने यह रजोहरण हमें समर्पित किया, उसी क्षण केंद्र से मैं गिर पड़ा। केंद्र में मैं नहीं था, केंद्र में प्रभु थे, प्रभु की आज्ञा थी।

एक मुनि के हृदय के अस्तित्व के केंद्र में मैं नहीं हो सकता, प्रभु ही होते है। एक साध्वीजी के हृदय के केंद्र में मैं नहीं होता, प्रभु ही होते है। मैं केंद्र से हट गया, प्रभु केंद्र में विराजित हो गए, अब परम प्रेम में झूमो।

यह जो परम प्रेम है, वह कैसा है? नारद ऋषि ने पाँच विशेषण प्रभु-प्रेम के लिए दिए। परम प्रेम को enjoy करना है। और मैं कहूँगा, परम प्रेम को ही enjoy करना है। अब दूसरा सब छूट जाना चाहिए। शायद आपने परम प्रेम का अनुभव नहीं किया है, लेकिन हमारे चेहरे पर परम प्रेम की प्राप्ति के बाद जो आनंद है, उसको तो आप देख सकते हैं। हमारा आनंद संयोगजन्य नहीं है, असंयोगजन्य है।

एक तो है रति, जो संयोगजन्य होती है। चाय tasty मिली, अच्छा लगा। यह संयोगजन्य सुख हुआ। सुख है, रति है, लेकिन संयोगजन्य। ठहरने के लिए कमरा अच्छा मिला, सुख हुआ, लेकिन वह सुख संयोगजन्य है।

आनंद जो है, वह असंयोगजन्य है। तो हमें आनंद की ओर जाना है। प्रभु का प्रेम कोई संयोग नहीं है। प्रभु का प्रेम कोई संयोग नहीं है, वह भीतरी घटना है। प्रेम है ही भीतर, हमें मालूम नहीं था। क्योंकि प्रेम तो बरस ही रहा है। प्रभु का प्रेम हर क्षण बरस रहा है, लेकिन हमें पता नहीं था। आज पता चला।

तो असंयोगजन्य आनंद हमारे चेहरे पर है। उसे देखकर भी आपके मन में एक तीव्र झंखना पैदा होगी कि मुझे भी यह परम प्रेम कब मिले।

आप हमें पूछते हैं न, “साहब, साता में हैं?” हम तो साता में ही हैं। मुझे तो लगता है आपकी साता पूछनी चाहिए। यहाँ तो साता में हैं न? हम साता में क्यों हैं? परम प्रेम के कारण।

तो पाँच विशेषण परम प्रेम को दिया हुआ है।

गुणरहितं, कामनारहितं, प्रतिक्षणवर्धमानं, अविच्छिन्नं, सूक्ष्मतरं।

यह परम प्रेम कैसा है? जिन्होंने परम प्रेम का अनुभव किया, उनकी यह वाणी है। वे कह रहे हैं कि परम प्रेम ऐसा है, और मैंने उसे enjoy किया है। तुम भी enjoy करो।

पहला विशेषण: गुणरहितं।

तीन गुण हैं: रजोगुण, तमोगुण, सत्वगुण। ऐसे प्रभु के अनंत गुण हैं। लेकिन ये जो गुण हैं, उस गुण से पार होने का है। जब परम प्रेम हमें मिलता है, हम उसे enjoy करते हैं, तब क्या होता है? परम प्रेम गुणरहितं। तो हम भी त्रिगुणातीत हो जाएँगे।

रजोगुण का मतलब है राग। तमोगुण का मतलब है द्वेष। तीसरा गुण है सत्वगुण। सत्वगुण का अर्थ यह है कि तुमने कोई अच्छा कार्य किया, दो-पाँच करोड़ रुपये खर्च डाले, धर्मशाला बनाई, या संघ निकाला, या उपधान कराया। अच्छा कोई कार्य तुमने किया, लेकिन भीतर थोड़ा अहंकार रह गया कि मैंने यह किया। तो यह है सत्वगुण।

और सत्वगुण के भी पार जाना है। अच्छे कार्य करने हैं, लेकिन अहंकार मुक्त होकर। इसलिए हमारी परंपरा कहती है कि साधना का पूरा कर्तृत्व प्रभु का है। यदि आप भक्त हैं, तो आपके लिए एक ही बात होगी कि प्रभु मुझे निमित्त बना रहे हैं। मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ। प्रभु मुझे निमित्त बना रहे हैं।

एक श्रीमंत था, रोज़ सुबह हजारों रुपयों का दान वह करता था। लोगों की लाइन लगती थी। किसी के हाथ में सौ के नोट, किसी के हाथ में दो हजार के नोट। देता ही जाता, देता ही जाता, देता ही जाता। लेकिन वह श्रीमंत नीची नजर से दान देता था। किसी का मुँह देखने का नहीं। कौन ले गया, नहीं देखने का।

एक दिन ऐसा हुआ, श्रीमंत के मित्र इकट्ठे हुए। एक मित्र ने कहा कि हमारा मित्र दान तो बहुत देता है, लेकिन नीची नजर से क्यों देता है? तो एक मित्र ने कहा कि ऐसा हो सकता है कि आज किसी को पाँच हजार रुपये दे दिए, और इसका मुँह देख भी लिया। कल वह आदमी रास्ते में मिलेगा, और प्रणाम भी नहीं करेगा, तो मन में वेदना की टीस लगेगी कि कल तो रुपये लेने के लिए आया था, और आज अक्कड़ होकर के फिरता है। तो ऐसा भी भाव मन में न आ जाए, इसलिए नीची नजर से दान देता होगा।

ये लोग बात कर रहे हैं, वहाँ ही वह श्रीमंत आ गया। मित्रों ने कहा, “आओ, हम तुम्हारी ही बात करते थे।” कि तुम नीची नजर से दान क्यों देते हो? तब श्रीमंत ने कहा कि मुझे शर्म आती है। मुझे शर्म आती है। अरे, दान देने में कोई शर्म आती है? क्यों शर्म आती है?

तब श्रीमंत ने कहा कि पैसे प्रभु ने दिए। पैसे दूसरों को देने का भाव भी प्रभु ने दिया। और प्रभु मेरे हाथ का उपयोग कर रहे हैं। तो मैं तो पिक्चर में हूँ ही नहीं। पैसे प्रभु के, पैसे देने का भाव भी प्रभु का, और प्रभु मेरे हाथ को निमित्त बनाते हैं। और लोग कहते हैं कि फलाँ भाई दान देते हैं। मैं कहाँ देता हूँ? मेरा तो कुछ है ही नहीं। सब प्रभु का है।

जो आपके पास संपत्ति है, वह पुण्य से मिली, लेकिन पुण्य के मालिक कौन हैं? प्रभु हैं। नव तत्व किन्होंने बतलाया? प्रभु ने तो ही बतलाया। तो पुण्य के मालिक कौन? प्रभु। आपके पास जो संपत्ति है, उसके मालिक प्रभु हैं। सत्कार्य करने का भाव भी प्रभु ने दिया। और आप निमित्त बने। तो भक्त के संदर्भ में हम सब निमित्त रूप हैं। कार्य करने वाले प्रभु हैं।

अब आप साधक हैं, तो साधक के लिए क्रमबद्ध पर्याय है। पर्याय क्रम से खुल रही है। जो समय, जो पर्याय खुलने वाली है, खुल जाएगी। जिस समय जो कार्य होने वाला है, वह कार्य होगा। आप हो केंद्र में या न हो, कार्य तो होगा ही।

कात्रज तीर्थ में शिविर इस समय होने वाला था, वह क्रमबद्ध पर्याय था। अब यशोविजय बोले या कोई दूसरे प्रवक्ता बोले, क्रमबद्ध पर्याय था। तो यशोविजय तो केंद्र में रहता ही नहीं। होने वाला था, हो गया, हो रहा है।

तो साधक के लिए क्रमबद्ध पर्याय है, और भक्त के लिए निमित्त है। कर्तृत्व प्रभु का ही है, भक्त के लिए और साधक के लिए क्रमबद्ध पर्याय है। तो सत्वगुण भी चला जाएगा। कार्य करो, लेकिन कर्तृत्व तुम्हारे पास न रहना चाहिए।

हमारी परंपरा यही है, कर्तृत्व मुक्त कार्य की। कार्य का निषेध नहीं है। शुभ कार्य करो, लेकिन उसका कर्तृत्व तुम्हारे पास न रहना चाहिए। या तो सद्गुरु को दे दो, या तो प्रभु को दे दो। तुम्हारे पास कर्तृत्व नहीं रखने का। और रखोगे तो अहंकार में गिरोगे, और अहंकार केंद्र में होगा, तो परम प्रेम का अनुभव नहीं होगा।

तो परम प्रेम का पहला विशेषण गुणरहितं।

अब तो आपने निश्चित कर लिया है कि, यहाँ से परम प्रेम लेकर ही जाना है। ऐसे तो नहीं जाना है न? इतनी बातें मैंने परम प्रेम की की। और अनुभूति की बात है। मैंने प्रभु के प्रेम को अनुभव किया। और अब लगता है कि सब कुछ छूट गया। एक प्रभु का प्रेम मिला, सब कुछ छूट गया। कर्तृत्व तो छूटा, अब कार्य भी छूट रहे हैं। सब कुछ छूट जाएगा। केवल प्रेम ही रह जाएगा।

क्या आनंद है मेरे पास! मैं तो बार-बार प्रभु के पास जाता हूँ, तब प्रभु के चरणों में एक ही बात करता हूँ कि प्रभु, तूने क्या दे दिया मुझे? इतना आनंद, जिसकी कोई कल्पना नहीं थी। Beyond the words, beyond the imagination. मैंने कभी कल्पना नहीं की थी, दस वर्ष पहले, कि ऐसा भी आनंद हो सकता है। आज ऐसा आनंद मैं अनुभव कर रहा हूँ। आनंद ही आनंद है।

मेरा एक-एक क्षण आनंद से भरा है। दिन में हो या रात में, वर्तमान योग प्रभु ने दे दिया। मैं वर्तमान में ही रहता हूँ। अतीत गया, भूतकाल गया, कोई विचार ही नहीं आते हैं। ऐसी घटनाएँ घटी थीं। अरे, घटी थीं तो घटी थीं, क्या हुआ? न भविष्यकाल का विचार आता है। वर्तमान का एक क्षण मेरे पास है, और वह क्षण आनंद से भरा हुआ है।

एक प्रोफेसर एक दिन भाषण करने के लिए एक शहर में जाने वाले थे। ट्रेन में कूपे (coupe) का रिजर्वेशन करा दिया था। समय पर पहुँच गए स्टेशन पर। कूपे में गए। चार सीट वाला कूपे था, लेकिन एक ही पैसेंजर आया हुआ था। एक महिला थी। प्रोफेसर ने सोचा, शांति है, भाषण के लिए तैयारी करने की है। पुस्तकें लेकर आया हूँ। जर्नी लंबी है, दस-बार घंटे की। तो मेरा काम हो जाएगा।

प्रोफेसर ने पुस्तकें खोलीं। पेन खोलीं। नोट डाउन करने के लिए तैयार हुए। तभी पास में जो महिला थी, वह बोल रही थी, “हे भगवान, बाथरूम में पानी नहीं आ रहा है। मुझे प्यास लगी है। पानी नहीं है, पानी नहीं है।”

प्रोफेसर को लगा कि इस बहन को पानी दे दूँ तो शांत हो जाएगी। गाड़ी रुकी। प्रोफेसर ने बहन से कहा, “तुम्हारा वॉटर बैग दो।” अपना और उस बहन का वॉटर बैग भरकर प्रोफेसर आए। प्रोफेसर ने उस बहन को वॉटर बैग दे दिया और सोचा कि अब मैं आराम से मेरा काम करूँगा। बहन ने पानी भी पी लिया। और फिर रिकॉर्डिंग शुरू हुआ। “हे भगवान, कितनी प्यास लगी थी। हे भगवान, कितनी प्यास लगी थी।”

अब लगी थी का तो कोई समाधान ही नहीं था। प्यास लगी है तो पानी दे दिया। अब प्यास लगी थी, कैसी प्यास लगी थी, कैसी प्यास लगी थी, कैसी प्यास लगी थी। प्रोफेसर ने सिर पटका कि अब काम नहीं होगा।

तुम तो सब वर्तमान में रहते हो न? ध्यानाभ्यास में एक वस्तु आपने मार्क की होगी। आपका मन जो है न, वह आपको या तो अतीत में ले जाता है या अनागत में। या तो भूतकाल में या भविष्यकाल में। वर्तमान काल में मन का कोई प्रयोजन ही नहीं। तुम भोजन कर रहे हो। अब भोजन कर रहे हो, उस समय विचार कौन सा आएगा? भोजन कर रहे हो। यदि आप भोजन ही कर रहे हैं, तो दूसरा विचार नहीं आएगा। क्योंकि आप वर्तमान में हो।

हम कच्छ में गए थे। गुरुदेव अरविंदसूरी दादा की जन्मभूमि मनफरा – शांति निकेतन थी। वहाँ चातुर्मास था। तो हम कच्छ में गए थे। कटारियाजी तीर्थ में गए। वहाँ से हमें सामख्याली जाने का था। सामख्याली गाँव से पहले एक फैक्ट्री आती थी। फैक्ट्री वाले भाई जैन थे, परिचित भी थे। उन्हें मालूम हुआ कि गुरुदेव कटारिया तीर्थ में आए हुए हैं और सामख्याली पधार रहे हैं।

वे दौड़ते कटारिया तीर्थ आए। और विनंती की, कि गुरुदेव! आप कल सामख्याली पधारने वाले हैं। सामख्याली नगर से पूर्व मेरी फैक्ट्री है। आप मेरी फैक्ट्री में पधारिए। आठ सौ लोग मेरी फैक्ट्री में काम कर रहे हैं। उनका नाश्ता भी वहाँ ही बनता है। तो आपके लिए निर्दोष गोचरी है। मुझे गोचरी का भी लाभ दो। आप मेरी फैक्ट्री को पावन करो।

हमने हाँ कहा। हम वहाँ गए। स्वागत हुआ। नवकारसी हुई। फिर मैं बाहर बैठा था। उस समय फैक्ट्री के मालिक मेरे पास बैठे थे। मैंने कहा, “इतने कर्मचारी आपके पास हैं, कोई दिखता तो नहीं?”

तब उस भाई ने कहा कि योगाचार्य एक आए हुए हैं। और सब कर्मचारी योग को सीख रहे हैं। आज बिजनेस मैनेजमेंट में और सैन्य में भी योग का प्रवेश हो चुका है। आपके पास है कि नहीं, मालूम नहीं। लेकिन बिजनेस मैनेजमेंट में और सैन्य में भी योग का प्रवेश आज हो गया है। क्योंकि बिजनेस मैनेजमेंट में भी एक आदमी लक्ष्यपूर्वक काम कैसे करेगा? जब एकाग्र मन है, तब। मन ही एकाग्र नहीं है, तो काम कैसे करेगा वह?

तो उस भाई ने कहा कि मैं हर साल एक योगाचार्य को बुलाता हूँ और सभी कर्मचारियों को योग की शिक्षा देता हूँ। इससे मुझे भी लाभ होता है कि फैक्ट्री का काम अच्छा होता है। और उन लोगों को भी लाभ होता है कि उनका जीवन आनंदमय होता है।

तो आज योग का प्रचार-प्रसार बहुत हो गया है। और योग का मुख्य सूत्र है वर्तमान में रहना। एक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी हुई है, वर्तमान योग पर। बीस लाख कॉपियाँ उसकी बिक गई हैं, उस पुस्तक की। वर्तमान योग पर ही पुस्तक। कि वर्तमान में कैसे रहना, वर्तमान में कैसे जीना। तो हम वर्तमान योग में हैं। और परम प्रेम को आनंद से स्वीकार रहे हैं और परम प्रेम की धारा में बह रहे हैं।

तो पाँच विशेषण प्रभु-प्रेम को दिए गए हैं। पहला विशेषण गुणरहितं। जब प्रभु का प्रेम हृदय में आ जाता है, तो राग नहीं होता। राग में तुम बंध जाते हो। यह मुझे चाहिए ही। इसके बिना मैं जी नहीं सकूँगा। तो राग छूट जाता है। राग छूट गया, तो द्वेष भी छूट गया। क्योंकि द्वेष जो है न, वह राग की बाय-प्रोडक्ट है। एक चीज तुम्हें पसंद है। किसी ने उस चीज को ले ली, तो तुम्हें उस व्यक्ति पर द्वेष आएगा। उस व्यक्ति पर द्वेष तुम्हें नहीं था। लेकिन क्यों हुआ? राग के कारण हुआ।

तो प्रभु का प्रेम जब हृदय में छा जाता है, तब राग भी नहीं रहता, द्वेष भी नहीं रहता। और अच्छे काम करते हैं, तो भी अहंकार नहीं होता। मैंने नहीं किया, प्रभु ने करवाया। आपकी भाषा है न, वह भाषा भी आपकी परिवर्तित हो जाएगी। मैंने किया, मैंने किया… अभी तक आप बोलते हो, अब आप कहेंगे, प्रभु ने करवाया। महोपाध्याय यशोविजय महाराज ने आनंद की घड़ी आई, स्तवन में कहा,

“करके कृपा प्रभु दर्शन दीनो।“

मैंने प्रभु का दर्शन किया, ऐसी बात वे नहीं कहते। क्या कहते हैं? “करके कृपा प्रभु दर्शन दीनो।“ प्रभु ने कृपा की। प्रभु ने प्रेम बरसाया और प्रभु का दर्शन हुआ। मैं कौन प्रभु का दर्शन करने वाला?

आपको मालूम है, हमारी दो आँखों के बीच तीसरी आँख है। थर्ड आई। सद्गुरु जो होते हैं, वह फेस-रीडिंग के मास्टर हैं और थर्ड-आई-रीडिंग के भी मास्टर हैं। तो दो आँखों के बीच तीसरी आँख है। जिसको हमारी परंपरा आज्ञा चक्र कहती है। सद्गुरु वह तीसरे नेत्र को खोलते हैं। ऐसा करके तुम्हारे तीसरे नेत्र को सद्गुरु खोलते हैं। और जब तीसरा नेत्र खुलता है, तभी प्रभु का दर्शन होता है।

आनंदघनजी भगवंत ने लिखा,

“प्रवचन अंजन जो सद्गुरु करे, पेखे परम निधान, हृदय नयन निहाळे जगदणी।“

तुम हृदय की आँख से, भीतर की आँख से प्रभु का दर्शन करोगे। लेकिन कब? “प्रवचन अंजन जो सद्गुरु करे।“ सद्गुरु जब तीसरे नेत्र को खोल लेंगे, तब प्रभु का दर्शन होगा।

आप कहते हैं, आज मैंने प्रभु का दर्शन किया। अब आपसे मैं पूछूँ, आपने आंगी का दर्शन किया? प्रभु यहाँ पंच धातु के हैं, तो इस सुवर्णका दर्शन किया? या प्रभु के मुख पर जो परम उदासीन दशा है, वीतराग दशा है, उसका दर्शन किया?

आज आप सबका तीसरा नेत्र खोल दूँ। ऐसे ही, समूह में। एक तो व्यक्तिगत रूप से भी काम होता है। एक सद्गुरु समूह में भी प्रयोग करते हैं। तो जितने लोग तैयार हैं, उनके तीसरे नेत्र खुल जाएँ अभी। और आप प्रभु की वीतराग दशा का दर्शन कर सको।

प्रभु के मुख पर वीतराग दशा भी है और परम प्रेम भी है। दोनों साथ-साथ हैं। प्रभु वीतराग हैं। पूरी दुनिया से, पूरी दुनिया के लोगों से प्रभु राग मुक्त हैं, अलिप्त हैं। लेकिन प्रभु का आप सबके प्रति, हम सबके प्रति प्रेम है। आज शाम को जाएंगे, या पूजा करने के लिए जाएंगे, तब प्रभु के मुख पर आपको ये दोनों चीजें दिखेंगी। परम उदासीन दशा और आप पर का प्रभु का प्रेम। और ये दोनों चीजें देखने को मिलीं, तो मान लेना कि तीसरा नेत्र खुल गया है।

परम प्रेम को देखना है, परम प्रेम को पीना है। प्रभु का प्रेम ही हमारा प्राण बन जाए। प्रभु का प्रेम ही हमारा जीवन बन जाए।

जीवन का अर्थ क्या है? साँस लेना और साँस छोड़ना, यह कोई जीवन है? कोमा में जो व्यक्ति होता है न, वह भी साँस लेता है, साँस छोड़ता है। लेकिन उसके पास जीवन है, ऐसा हम नहीं कहेंगे। जीवन कब होता है? जब प्रभु का प्रेम हम एन्जॉय करते हैं, तभी हमारे पास जीवन होता है।

और इसलिए शक्रस्तव में विशेषण आता है। कल्पसूत्र के नमुत्थुणम् में भी विशेषण आता है, जीवदयाणं। प्रभु जीवन के दाता हैं। प्रभु प्रेम के दाता हैं, मतलब प्रभु जीवन के दाता हैं। प्रभु का प्रेम यही जीवन है। तो इस जीवन में प्रभु का प्रेम अनुभव करना है और प्रभु के प्रेम का अनुभव हो जाएगा, तभी सच्चा जीवन का आनंद हमारे पास आएगा।

तो इसी प्रभु प्रेम की थ्योरिकल बातें हुईं, अब प्रैक्टिकल।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *