प्रतिक्षणवर्धमानं
परमप्रेम कैसा होता है? प्रतिक्षणवर्धमानं। यदि प्रभु का प्रेम आपको मिल गया, तो वह हर क्षण बढ़ता ही जाएगा। फिर आपको कुछ नहीं करना है; वह स्वयं बढ़ता जाएगा। उसका स्वभाव ही है – प्रतिक्षणवर्धमानं। वह फैलता ही जाएगा, फैलता ही जाएगा, फैलता ही जाएगा…
शुरुआत आपकी फैमिली से होगी। श्राविका के साथ प्रेम। राग नहीं, प्रेम। आपको मालूम है? एक श्रावक के लिए अपनी श्राविका या अपने बच्चे भी कल्याणमित्र होते हैं। कल्याणमित्र का अर्थ क्या हुआ? जो आपको धर्म के मार्ग में रख दें। आप भी श्राविका के, बच्चों के कल्याणमित्र हैं।
कल्याणमित्रता का अर्थ है प्रेम का फैलाव। राग नहीं, प्रेम। राग का तो अर्थ है ममत्व, मेरा बच्चा, मेरी पत्नी। प्रेम का अर्थ है वह भी प्रभु का भक्त है और मैं भी प्रभु का भक्त हूँ। एक साधर्मिक का संबंध, कल्याणमित्र का संबंध परिवारजनों के साथ हो जाएगा। प्रेम का फैलाव ऐसे परिवार से शुरू होगा और फिर उसका विस्तार होता ही जाएगा। प्रतिक्षणवर्धमानं…
पूज्यपाद, गीतार्थमूर्धन्य आचार्य भगवंत जयघोषसूरी दादा, “सूरीमंत्र पट्ट” की आराधना करने के लिए तैयार हुए। पट्ट प्रस्थापित किया गया, नमस्कार महामंत्र का पट्ट भी प्रस्थापित किया गया, हाथ में माला भी आ गई, और गुरुदेव जाप शुरू करने वाले थे। उस समय एक मुनिराज वहाँ आए, गुरुदेव की चेंबर में।
गुरुदेव को वंदन तो किया, लेकिन जाने लगे मुनिराज। गुरुदेव फेस रीडिंग के मास्टर थे। मैं बहुत बार कहता हूँ, तुम्हारी साधना का वर्णन तुम गुरुदेव के पास करो, यह तुम्हारी ओर खुलती बात है। सद्गुरु तो आपको देखकर ही, आप कहाँ पर हैं, आपकी साधना का अभी का स्टैंड पॉइंट कौन सा है, वह निश्चित कर लेंगे। अभी की साधना का स्टैंड पॉइंट क्या है, वह भी सद्गुरु निश्चित करते हैं, और इस जन्म के अंत तक आपको कहाँ तक पहुँचा जा सकता है, वह भी सद्गुरु देख लेते हैं। और आप सद्गुरु को समर्पित हो गए, तो सद्गुरु आपको साधना मार्ग पर उसी रूप से चला भी देते हैं।
तो गुरुदेव ने देखा कि मुनिराज कुछ पूछने के लिए आए हैं, तो गुरुदेव ने कहा, “बोल, तेरा प्रश्न क्या है?” मुनिराज ने कहा, “गुरुदेव, आप आराधना शुरू कर रहे हैं, आपकी आराधना पूर्ण हो जाए, बाद में मैं आऊँगा।”
तब गुरुदेव ने कहा, “नहीं, पहले तू तेरा प्रश्न पूछ ले।” और उस समय गुरुदेव ने जो कहा, हमें लगेगा कि परम प्रेम क्या होता है। गुरुदेव ने कहा, “तू जीवंत परमेष्ठी है।” मुनि अर्थात् पंचम पद में स्थित परमेष्ठी। तू जीवंत परमेष्ठी है, मैं तेरी अवगणना करूँगा, तो पट्ट में रहे हुए परमेष्ठी चले जाएँगे।
परमेष्ठी शब्द बहुत ही सुंदर है। आपको तो अर्थ मालूम है,
परमे तिष्ठति इति परमेष्ठी।
जिसका मन, जिसका तन परम में ही रहता है, वह परमेष्ठी। आपका मन एक क्षण के लिए भी पर में नहीं जाना चाहिए। तभी तुम परमेष्ठी हो सकते हो।
तो गुरुदेव ने कहा, “तू जीवंत परमेष्ठी है, तेरी अवगणना मैं करूँगा, तो पट्ट में रहे हुए चित्रित परमेष्ठी चले जाएँगे। तू तेरा प्रश्न पूछ ले।”
इस घटना के पश्चात्, एक दिन महाबोधिसूरी जी ने गुरुदेव से पूछा था कि, “गुरुदेव, आप श्रावक और श्राविका को वासक्षेप देते हो, उस समय क्या सोचते हो?”
और गुरुदेव ने जो कहा, मैंने महाबोधिसूरी की पुस्तक में यह प्रसंग पढ़ा, मैं आश्चर्यचकित हो गया, मेरा रोम-रोम पुलकित हो गया कि ऐसा उत्तर! परम प्रेम से जब हृदय पूर्ण भर जाता है, तभी ऐसा उत्तर मुँह से निकल सकता है।
गुरुदेव ने कहा कि कोई भी श्रावक हो या कोई भी श्राविका हो, व्यवहार से सम्यग्दृष्टि तो है, निश्चय से सम्यग्दृष्टि बनना बहुत टफ है। सम्यग्दर्शन तो पाँचवीं दृष्टि में मिलता है, चौथे गुणस्थानक में। लेकिन पहली दृष्टि में आना, वह भी बड़ा कठिन है।
हरिभद्रसूरी भगवंत ने ‘योगदृष्टिसमुच्चय’ ग्रंथ लिखा है, उसमें आठ दृष्टियों का वर्णन है। पाँचवीं दृष्टि जब मिलती है, तब सम्यग्दर्शन मिलता है। लेकिन पहली दृष्टि में साधक मैत्र योगी बन जाता है, पूरी दुनिया का मित्र।
अभी-अभी मैंने गोड़ीजी में एक संगोष्ठी में कहा था मुनियों से कि, जब तक हमारी दृष्टि विकसित न हो, तब तक हमारी साधना हमारी दृष्टि से सफल नहीं है। साधना सफल तभी हो सकती है जब दृष्टि हमारी विकसित हो। सामायिक आपने किया, रोज़ दो सामायिक करते हो, लेकिन दृष्टि में, मन में, हृदय में समभाव मुखरित नहीं हुआ, तो सामायिक की साधना के द्वारा जो लाभ मिलने वाला था, वह आपको नहीं मिला।
तो सम्यग्दर्शन मिलना बहुत ही कठिन है, स्व की आंशिक अनुभूति होनी चाहिए। हम प्रभु का दर्शन इसलिए ही करते हैं कि प्रभुदर्शन करके हम स्वगुण के दर्शन, स्वरूप के दर्शन में जाएँ, और स्वगुण की और स्वरूप की अनुभूति हम करें। वीतराग दशा की अनुभूति आंशिक रूप से भी हुई, तो सम्यग्दर्शन।
तो गुरुदेव ने कहा कि निश्चय से सम्यग्दर्शन कठिन बात है, लेकिन व्यवहार से हम समझते हैं कि एक श्रावक है, एक श्राविका है, तो सम्यग्दृष्टि है। अब मैं वासक्षेप देता हूँ, तब मेरे मन में यह भाव आता है, गुरुदेव ने कहा कि सिद्धचक्र पूजन में सम्यग्दर्शन पद की हम पूजा करें, सम्यग्दर्शन पद पर हम वासक्षेप करें, उस समय हमारे मन में जो भाव पनपता है, ऐसा ही भाव मेरे हृदय में एक श्रावक और श्राविका के सिर पर वासक्षेप देने के समय उभरता है।
यह क्या था! परम प्रेम का फैलाव। प्रभु का प्रेम जब हृदय में फैल जाता है, फिर वह फैलता ही जाता है, फैलता ही जाता है, और पूरी सृष्टि के प्रेम में वह परिवर्तित होता है।
पहली दृष्टि से जो मैत्री भाव चालू हुआ, छठी दृष्टि तक वह चालू रहेगा। छठी दृष्टि में एक मुनि है, एक साध्वी है, उसका मुनित्व, उसका साध्वित्व क्या है?
सर्व जीव स्नेह परिणामः साधुत्वम्।
सभी आत्माओं पर एक सरीखा प्रेम तुम्हारे पास है, तो ही तुम प्रभु के मुनि हो, तुम प्रभु की साध्वी हो।
जिनशासन मिला, क्या मिला? अद्भुत तत्त्व मिला। जब तक शासन मेरे पास भी नहीं था, आपके पास भी नहीं था, तब हमारी दृष्टि क्या थी? हमारी दृष्टि में दुनिया की सभी आत्माएँ दो भाग में वर्गीकृत हुई थीं: अच्छे लोग, बुरे लोग। अब अच्छे लोगों की व्याख्या क्या थी? मेरे अहंकार को जो लोग सँवारते हैं, वे अच्छे लोग, और जो मेरे अहंकार को निग्लेक्ट करते हैं, वे बुरे लोग।
मैं बहुत बार हँसते-हँसते कहता हूँ कि क्या तुम सृष्टि के केंद्र में हो? कि तुम्हारे आधार पर दुनिया की सभी आत्माओं का वर्गीकरण हो जाए? तुम केंद्र में हो? तो जब तक प्रभु का शासन मुझे और आपको नहीं मिला था, तब हमारी दृष्टि यहाँ थी। प्रभु का दर्शन मिला, दृष्टि पूरी बदल गई। अब तो आप में सम्यग्दर्शन तो मैं देखता हूँ, सिद्धत्व को भी मैं देखता हूँ।
‘नमो सिद्धाणं’ कहता हूँ, तब आप लोगों को मैं नमस्कार करता हूँ। आपका जो पर्याय है भविष्य का, सिद्धत्व का, उस सिद्धत्व के पर्याय को मैं नमन करता हूँ। आप सभी भविष्य की सिद्ध आत्माएँ हैं। आप ‘नमो सिद्धाणं’ बोलते हैं? भूतकाल में जो सिद्ध भगवंत हुए, उन्हें आपका नमस्कार है। वर्तमान काल में महाविदेह क्षेत्र से कोई भगवंत सिद्धि पद को प्राप्त करे, आपका नमस्कार? नमस्कार है न? और भविष्य में जो सिद्धि पद को पाने वाले हैं, उन सबको भी नमस्कार? सबको?
किसी अंकल ने बिना कारण तुम्हें गालियाँ दीं, और वह भी एक-दो गालियाँ नहीं, पूरा भंडार, आधे घंटे तक। और आप, आपका सिर उनके चरणों पर डाल देंगे और कहेंगे, “नमो सिद्धाणं।” होगा न ऐसा? ये भी भविष्य की सिद्ध आत्मा है, उनको भी आपका नमस्कार है।
तो परम प्रेम का तीसरा विशेषण था प्रतिक्षणवर्धमानं।
गुणरहितं, कामनारहितं, प्रतिक्षणवर्धमानं।
परम प्रेम कैसा होता है? प्रतिक्षणवर्धमानं। यदि प्रभु का प्रेम आपको मिल गया, तो हर क्षण यह बढ़ता ही जाएगा। फिर आपको कुछ नहीं करना है। वह स्वयं बढ़ता जाएगा। उसका स्वभाव है – प्रतिक्षणवर्धमानं। वह फैलता ही जाएगा, फैलता ही जाएगा, फैलता ही जाएगा।
शुरुआत आपकी फैमिली से होगी। श्राविका के साथ प्रेम, राग नहीं। आपको मालूम है, एक श्रावक के लिए अपनी श्राविका या अपने बच्चे कल्याणमित्र होते हैं। कल्याणमित्र का अर्थ क्या हुआ? कि वह श्राविका आपको धर्म के मार्ग में रख देगी। आप भी श्राविका के कल्याणमित्र हैं। आपके हृदय में यह बात होगी, आप कहेंगे उससे, “तुझे शाम प्रतिक्रमण करने को जाना है, तो तू पहुँच जाना। घर की चिंता छोड़ देना, वह हम कर लेंगे।”
तो श्रावक, श्राविका और बच्चे सब अरस – परस कल्याणमित्र। तो कल्याणमित्रता का अर्थ हुआ प्रेम का फैलाव। राग नहीं, प्रेम। राग का अर्थ है ममत्व, ‘मेरा बच्चा’। प्रेम का अर्थ है ‘यह प्रभु का भक्त है, मैं भी प्रभु का भक्त हूँ।’ एक साधर्मिक का संबंध, कल्याणमित्र का संबंध, परिवारजनों के साथ हो जाएगा। तो प्रेम का फैलाव फैमिली से शुरू होगा और विस्तरता ही जाएगा।
हम थ्योरिकली भी यही बात करते हैं, प्रैक्टिकली भी यही बात करते हैं। प्रैक्टिकल साधना में चार चरण आते हैं। पहला चरण सजेशन का है। मन को सजेशन देना है कि मैं प्रभु के प्रेम को स्वीकार रहा हूँ। यह सजेशन।
आज के मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हमारे इर्द-गिर्द दो तरह के आंदोलन हैं: पॉजिटिविटी के और नेगेटिविटी के। हमारे जैसे संतों ने पॉजिटिविटी के आंदोलन छोड़े हैं। हमारे पास पॉजिटिविटी के आंदोलन ही हैं। हम सदा आनंद में ही हैं। तो आनंद की विकिरणें हम बिखरते रहते हैं। और दूसरे लोग जो हैं, वह नेगेटिविटी के आंदोलन प्रसार रहे हैं। तो आपके इर्द-गिर्द पॉजिटिविटी के आंदोलन भी हैं, नेगेटिविटी के आंदोलन भी हैं।
अब आपको पॉजिटिविटी के आंदोलन लेने हैं, तो आपको क्या करना चाहिए? जैसे रेडियो में, टीवी में सुविधा होती है कि आप किसी निश्चित स्टेशन को पकड़ सको, ऐसी ही व्यवस्था हमारे मन में है।
सुबह उठकर पाँच मिनट पॉजिटिविटी के आप विचार करें। ‘मैं कितना बड़भागी हूँ, प्रभु का शासन मुझे मिल गया, ऐसे सुंदर विचार मुझे मिल गए, ऐसे सद्गुरु मुझे मिल गए, ऐसे परमात्मा मुझे मिल गए।’ यह पॉजिटिविटी के विचार आप पाँच मिनट तक करोगे, तो पॉजिटिविटी के जो आंदोलन हैं, वह खींचे जाएँगे। और आपका मन पॉजिटिविटी के आंदोलनों से भर जाएगा।
लेकिन कोई सुबह उठकर नेगेटिव विचार ही करेगा, “क्या है यह जीवन? कुछ मिला नहीं। हमारे पास तो कुछ भी नहीं है। क्या हमने किया?” यह नेगेटिव विचार करेगा कोई आदमी, तो नेगेटिविटी के आंदोलन जो हैं, वह खींचे जाएँगे। और उसका मन नेगेटिविटी से भर जाएगा।
तो आपका सजेशन बहुत ही महत्वपूर्ण है। तो यह विधि आपको अभी और घर जाने के बाद भी रोज़ करनी है। उठें, शुरू में क्या करेंगे? प्रभाते कर दर्शनम्। दोनों हाथ को इकट्ठा करेंगे, सिद्धशिला का आकार होगा। मेरा गंतव्य स्थान सिद्धशिला है। और सिद्धशिला में जाना है, तो पॉजिटिविटी के आंदोलन मेरे पास चाहिए। अब पॉजिटिविटी के विचार करो। पॉजिटिविटी के आंदोलन आपके पास आएँगे, आपका मन पॉजिटिव विचारों से भर जाएगा।
तो हमारी प्रैक्टिकल साधना का पहला जो चरण है, वह सजेशन का है। कि मन को सजेशन देना है कि हमारे इर्द-गिर्द परम चेतना फैली हुई है, और परम चेतना का परम प्रेम भी हमारे इर्द-गिर्द फैला हुआ है। हम सजेशन करें कि हमें परम प्रेम को स्वीकारना है। तो हमारे मन की मुद्रा परम प्रेम को स्वीकारने के लिए तैयार हुई, तो परम प्रेम को हम झेल सकेंगे।
अभी तो मोटिवेशनल स्पीकर्स बहुत काम में लग गए। क्योंकि लोग नेगेटिविटी में ही घूम रहे हैं। तो मोटिवेशनल स्पीकर्स का बाज़ार बहुत गर्म है अभी।
मेरा चातुर्मास सूरत में था। डॉक्टर ने कहा था, तो मैं रोज़ मॉर्निंग वॉक के लिए जाता था। पाँच-दस लोग भी मेरे साथ आते थे। उन दिनों में मोटिवेशनल स्पीकर में भी अग्रणी शिव खेरा सूरत आने वाले थे। अब शिव खेरा जैसा अग्रणी आने वाला हो, तो मीडिया में चर्चा तो शुरू होती ही। मीडिया में चर्चा शुरू हो गई।
शिव खेरा आ भी गए। उनका प्रवचन भी हो गया। दूसरे दिन मैं मॉर्निंग वॉक में था। एक भाई ने कहा, “गुरुदेव, आपको ख्याल है शिव खेरा कल आ गए?”
मैंने पूछा, “तुम गए थे प्रवचन में?”
तो उसने कहा, “हाँ, मैं गया था।” और इतने श्रोता आए थे कि हॉल छोटा पड़ा। बाहर स्क्रीन लगानी पड़ी, और बाहर कुर्सियाँ लगानी पड़ीं, हॉल के बाहर। एक दिन की, एक प्रवचन की दस लाख रुपये की फीस थी। प्लेन में आया, प्लेन में गया, फाइव स्टार होटल में ठहरा। सब खर्चा आयोजक का। डेढ़ घंटे प्रवचन देकर चला गया।
मैंने पूछा, “क्या कहा शिव खेरा ने?”
तो उसने कहा, “गुरुदेव, इतना बड़ा नाम है, तो काम भी ऐसा ही होता है। डेढ़ घंटे तक हम सब सुनते ही रहे, सुनते ही रहे। और उस समय तो सबका मन पॉजिटिव हो गया था।”
लेकिन अंत में उस भाई ने मार्के की बात कही कि, “गुरुदेव, आपके प्रवचन को जो लोग रोज़ सुनते हैं, उनके लिए कोई नई बात नहीं थी। आप बिना फीस के प्रवचन देते हैं, वह फीस के साथ प्रवचन है।”
तो मोटिवेशनल स्पीकर्स का बाज़ार इतना गर्म क्यों है? नेगेटिविटी बहुत फैल चुकी है। तो ऐसा सजेशन सुबह में भी दो कि नेगेटिविटी चली जाए। आपके विचार पॉजिटिव ही रहें। जो भी घटना होती है, होने वाली है, स्वीकार कर लो।
एक दिन मुझे प्रवचन में पूछा गया था कि, “गुरुदेव, प्रभु की साधना को एक शब्द में प्रस्तुत करनी हो, तो आप कौन सा शब्द का प्रयोग कर सकते हैं?” तो मैंने कहा कि, “प्रभु की साधना का संपूर्ण प्रतिनिधित्व एक शब्द करता है, और वह है सर्वस्वीकार।” जो भी घटना घटित हो, स्वीकार करो। हम आनंद में हैं, क्यों? हमारे पास सर्वस्वीकार है। यहाँ ऐसे भवन में भी रहेंगे, विहार में जाएँगे, छोटा उपाश्रय होगा, असुविधा वाला होगा, आराम से रहेंगे। सर्वस्वीकार है।
तो पहला चरण सजेशन का।
दूसरा चरण है भाष्य जाप। भाष्य जाप क्यों? ध्वनि का एक महत्व है। गणधर भगवंतों के शब्द, उसकी जो ध्वनि होती है, वह ध्वनि ही प्रसन्नता को फैला देती है। हमारे मन को प्रसन्न करने के लिए, स्थिर करने के लिए यह ध्वनि है।
हमारे वहाँ दो सूत्र आते थे: उत्थान सूत्र, समुत्थान सूत्र। उत्थान सूत्र ऐसा था कि इसका पाठ करो, लोग बिखर जाएँ। कोई साध्वीजी भगवती हैं, गुंडे लोग आ गए। तब वे क्या करेंगी? उत्थान सूत्र का पाठ करेंगी। सबको भाग जाना पड़ेगा। और समुत्थान सूत्र ऐसा होता है कि लोग भयभीत होते हैं, बिखरे हुए होते हैं। समुत्थान सूत्र की ध्वनि उनके कानों में जाती है, और उनका भय निकल जाता है।
तो ध्वनि की यह ताक़त है। इसलिए भाष्य जाप कराते हैं कि पूरा वायुमंडल इस ध्वनिमय हो जाए। “तित्थयरा मे पसीयन्तु“ का एक गुंजन, एक घोष। पूरा एटमॉस्फियर (atmosphere) बदल जाए।
तीसरा चरण है मानस जाप। हम मन में जाप करते हैं: “तित्थयरा मे पसीयन्तु“। अब क्या करना है? मन को स्थिर बनाना है, एकाग्र बनाना है। आँखें आपकी बंद हैं, शरीर ऐसा स्थिर है। शरीर को ऐसा ही रखना चाहिए, ऐसा नहीं, ऐसा। क्योंकि कुंडलिनी शक्ति जब मूलाधार से उठेगी और सहस्रार में जाएगी, तो रास्ता यह है। तो रास्ता सीधा होना चाहिए। स्पाइनल कॉर्ड (spinal cord) जो है हमारी, वह सीधी होनी चाहिए। रीढ़ सीधी होनी चाहिए। तो बैठने की आदत ऐसी ही होनी चाहिए। रीढ़ टट्टार (सीधी)। तो आँखें बंद आपकी हैं, रीढ़ ऐसी स्थिर है, और आप मानस जाप करेंगे।
एकाग्रता। मन को एक पद में पिरो देना है। दूसरी कोई घटना आपके सामने नहीं है। एक ही पद है, और उस पद में आपके मन को स्थिर कर देना है। और यह जो एकाग्रता है, वह साधन एकाग्रता है। कि स्वरूप में एकाग्र नहीं हुए, शब्द में एकाग्र हुए। तो शब्द में एकाग्र हुए, वह साधन एकाग्रता है। साध्य एकाग्रता नहीं।
चौथे चरण में साध्य एकाग्रता आती है। कि हम हमारे स्वरूप में स्थिर होते हैं। हम हमारे गुण में स्थिर होते हैं। परमात्मा का प्रेम जो है, वह ही हमारा गुण है। क्योंकि हम भी प्रेम से ही भरे हुए हैं। राग, द्वेष, अहंकार, यह हमारा स्वभाव नहीं है। कल ही मैंने कहा था, हमारा स्वभाव प्रेम है। हमारा स्वभाव क्षमा है। हमारा स्वभाव निरहंकार दशा है। हमारा स्वभाव समत्व है। तो हमें हमारे स्वभाव में स्थिर होना है। आप परम प्रेम का अनुभव करो, समभाव का अनुभव करो, आनंद का अनुभव करो। भीतर जो शांति है, उसका अनुभव करो। तो यह क्या हुआ? साध्य एकाग्रता ।
पहले चरण में सजेशन, दूसरे में भाष्य जाप से ध्वनिमय वातावरण बनाना। तीसरे चरण में मानस जाप के द्वारा एकाग्रता प्राप्त करनी। और उस एकाग्रता को भीतर ले जाकर, भीतर जो आनंद है, परम प्रेम के कारण भीतर जो शांति है, उसका अनुभव करना।
तो अब हम प्रैक्टिकल शुरू करेंगे। आँखें बंद, रीढ़ स्थिर।
