कामनारहितं
आपके पास करोड़ों की संपत्ति हो, तब भी आप प्यासे रह जाते हो; और अधिक चाहिए, और चाहिए, और…। बहुत सारा प्राप्त करने के बाद भी प्यास बनी रहती है। क्योंकि आपको मालूम ही नहीं है कि यह प्यास बाह्य पदार्थों की नहीं है; परम प्रेम की है!
प्यास है परमप्रेम की; पर उसको बुझाने के लिए आप संपत्ति इकट्ठी करते जाओ, तो वह प्यास बुझेगी कैसे?! पानी की प्यास हो और कोई रोटी खाता जाए, तो कैसे बुझे? अरे भाई! प्यास पानी की है; उसे मिटाने के लिए पानी ही चाहिए।
हम सब परमप्रेम की प्यास को लेकर अनगिनत जन्मों से चल रहे हैं। जब तक परमप्रेम नहीं मिलेगा, तब तक यह प्यास बुझने वाली नहीं है; वैसी की वैसी रहेगी। परमप्रेम का अनुभव हो जाए, तब आप_कामनारहित बन जाते हो; फिर कोई प्यास, कोई इच्छा नहीं रह जाती।
एक आचार्य भगवंत एक नगर में पधारे थे। दोपहर का समय, एक मुनिराज गोचरी वोहर कर उपाश्रय में आए। गुरुदेव के पास आकर, इरियावहि आदि विधि करने लगे। उस समय गुरुदेव ने देखा कि मुनिराज के मुख से लहू टपक रहा है। लहू भी टपक रहा था, स्मित भी मुख पर था। किसी ने पत्थर मारा था, घटना हुई थी, लेकिन घटना का असर नहीं था।
दो शब्द संसार की भाषा में है। एक्शन और रिएक्शन। प्रभु की परिभाषा में दो शब्द है, लेकिन एक शब्द बदल जाता है। एक्शन-नॉन एक्शन। एक्शन के सामने रिएक्शन, यह संसार की परिभाषा। प्रभु शासन की रीत यही है कि एक्शन के सामने नॉन-एक्शन। कोई भी क्रिया हुई, स्वीकार कर लो। लड़ने की कोई आवश्यकता नहीं, रिएक्शन देने की कोई आवश्यकता नहीं। स्वीकार।
एक बात कहूँ, बीच में। तुम पौषध में होते हो, बाहर गए, उपाश्रय में आए, इरियावहि करो। उपधान में साधक प्रश्न करते हैं कि गुरुदेव, यह वारंवार इरियावहि क्यों है? दो बातें हैं। एक बात तो आपके ख्याल में है कि चलते-चलते जो विराधना हुई, उस विराधना से मुक्त होने के लिए इरियावहिया। दूसरी बात यह है कि जो भी क्रिया बाहर हुई थी, उसे बाहर ही रखनी है, मन में नहीं आने देनी है। इरियावहि का मतलब यह है कि तुम्हारा मन विभाव मुक्त बने।
इरियावहि में कायोत्सर्ग करेंगे, “चंदेसु निम्मलयरा“ तक, पच्चीस श्वासोच्छ्वास का। क्यों? मन में क्रोध आया, आप एक प्रयोग करो। क्रोध आया, साँस को एकदम धीमी कर दो। धीरे-धीरे साँस लो, आवेग कम हो जाएगा। आवेग और श्वास का संबंध है। क्रोध में आप होंगे, श्वास झड़प से चलेंगे। तो यदि हम राग और द्वेष को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, श्वास पर नियंत्रण करो। आमने-सामने दोनों हैं। एक ओर आवेग है, दूसरी ओर श्वास है। श्वास धीरे-धीरे लेंगे, rhythmically लेंगे, आवेग शिथिल हो जाएगा।
बाहर आप गए थे, कोई दृश्य देखा आपने, मन में राग या द्वेष की तरंगें उत्पन्न हुईं। अब मन को निस्तरंग बनाना है। राग और द्वेष की तरंगें मन में हो, और आप साधना करो, यह बन नहीं सकेगा। तो राग और द्वेष की जो तरंगें उठी है, उस तरंगों को बिल्कुल निष्फल बनाना होगा।
तो इसीलिए यह कायोत्सर्ग है, पच्चीस श्वासोच्छ्वास का। श्वास रिदमिकली लेंगे, आवेग शिथिल हो जाएगा, तो आपका मन निर्मल हो जाएगा, निस्तरंग हो जाएगा। मैं वहाँ से यहाँ आया, यहाँ बैठा, सबसे पहले मैंने इरियावहि किया, बस इरियावहि हो गई, सब घटनाएँ मेरे लिए डेड (dead) हो गईं। कोई घटना मेरे मन में नहीं है।
तो आप भी घटना-प्रभावित हैं, लेकिन आपको प्रभु-प्रभावित बनना है, तो यह ध्यान को सीखना पड़ेगा। ऐसे बैठ जाओ, दो मिनट, घटना-प्रभावितता दूर हो जाएगी। गुरुदेव ने देखा कि मुनिराज के मुख से लहू टपक रहा है, लेकिन उस घटना का असर मुनिराज के मुख पर नहीं था, क्योंकि मुनिराज प्रभु-प्रभावित थे।
हम एवरग्रीन (evergreen), एवरफ्रेश (ever-fresh) होते हैं। घटना-प्रभावितता का मतलब यह है कि आपका सुख दूसरों के हाथ में चला गया। पाँच मिनट आप बोले, किसी ने कहा, बहुत अच्छा बोले तुम, अहंकार उत्पन्न होगा। और कोई कहेगा, क्या बोला तुमने, कुछ समझ में ही नहीं आता था, न सिर था, न कोई विषय था, क्या बात तूने की? फिर क्या होगा?
यदि तुम घटना-प्रभावित हो, तो तुम्हारा सुख तुमने दूसरों के अधीन कर दिया। हम प्रभु-प्रभावित हैं, और प्रभु तो प्रेम ही बरसा रहे हैं, तो हम एवरफ्रेश ही होंगे। आपको भी एवरफ्रेश बनना है। बनना है न? तो घटना-प्रभावितता को छोड़ देना पड़ेगा।
तो मुनिराज के पास रिएक्शन नहीं था। किसी ने पत्थर मारा तो मारा। कैसर की एक कविता है:
“किसको पत्थर मारूँ कैसर, कौन पराया है, इस शीश महल में अपना ही चेहरा है।“
किसको पत्थर मारूँ कैसर, कौन पराया है? सभी हमारे ही तो रूप हैं। जहाँ चैतन्य है, वहाँ तुम हो, जहाँ जड़ है, वहाँ तुम नहीं हो। तो किसको पत्थर मारूँ कैसर, कौन पराया है? इस शीश महल में सब चेहरे अपने लगते हैं।
गुरुदेव ने देखा कि किसी ने पत्थर मारा है। गुरुदेव शासन के नायक होते हैं। गुरुदेव को विचार हुआ कि आज तो यह मुनि हैं, कल कोई साध्वीजी गाँव में आएँ, और कोई अनाड़ी आदमी हो, और साध्वीजी भगवती को परेशान करे तो? तो जानना चाहिए कि कौन व्यक्ति ऐसा है, और संघ को हम सूचित कर दें। कि साध्वीजी भगवती कोई भी गाँव में आएँ, और वोहरने के लिए जाएँ, तो लोग साथ में जाएँ।
तो गुरुदेव ने पूछा कि तू वोहरने के लिए गया था, कौन सी शेरी में, किस घर से यह पत्थर उछला था, तू कह सकता है? और तब मुनिराज कहते हैं, “गुरुदेव, प्लीज, दो मिनट मुझे दो, मैं याद कर लूँ।” पत्थर लगने की घटना से अपन को बेख़बर रखने वाली मस्ती कैसी होगी? “मैं याद कर लूँ, किस घर से पत्थर उछला था।” दो मिनट सोचा, और फिर कहा, “गुरुदेव, ऐसा लगता है कि तीसरी शेरी में तीसरा या चौथा घर था, और उस घर से पत्थर निकला था।”
तो यह क्या था? यह परम प्रेम का अनुभव था। परम प्रेम का अनुभव जब होता है, तब पत्थर लगे तो भी क्या, हम मिट जाएँ तो भी क्या, क्या फ़र्क़ पड़ता है? हमारा जीवन तो सार्थक हो गया। परम प्रेम का अनुभव नहीं हुआ, तो जीवन यों भी मीनिंगलेस (meaningless) है। और परम प्रेम का अनुभव हो गया, तो जीवन सार्थक हो गया। फिर हम रहें न रहें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है।
क्योंकि यह जो अनुभव इस जन्म में हमने लिया, वह साथ में आएगा। आप जो साधना करते हो न, वह कॉन्शियस माइंड (conscious mind) के स्तर पर करते हो, और इसलिए अगले जन्म में वह साथ आएगी ही, ऐसा हम नहीं कह सकते हैं। लेकिन जब अस्तित्व के धरातल पर कोई भी साधना जाती है, तब वह अनुभूति बनती है। और अनुभूति जो बन गई, वह अगले जन्म में भी साथ में आएगी।
कॉन्शियस माइंड के स्तर पर आपने साधना की, कॉन्शियस माइंड के स्तर पर तो विचार ही विचार हैं। और यह कॉन्शियस माइंड अगले जन्म में नहीं होगा। जैसे यह शरीर नहीं होगा, ऐसे कॉन्शियस माइंड भी यह अगले जन्म में नहीं होगा। हम होंगे। तो जो आत्म-तत्व है, जो अमर है, वहाँ अनुभूति साधना की पहुँचनी चाहिए।
मैं बहुत बार कहता हूँ। एक सैनिक बंकर में है, भूगर्भ में है, और दुश्मन सैनिक बाहर से बंदूक की गोलियाँ छोड़ेगा, तो क्या होगा? वह सैनिक तो बंकर में है, जहाँ दुश्मन है, वहाँ गोली पहुँचनी चाहिए।
राग, द्वेष, और अहंकार हमारे अस्तित्व के स्तर पर हैं, क्योंकि जनम-जनम के साथी हैं। और साधना को आपने कॉन्शियस माइंड के स्तर पर रखी, अब क्या होगा? राग, द्वेष, और अहंकार शिथिल नहीं होते हैं। लेकिन होंवे भी कैसे? कैसे होंगे? अस्तित्व के स्तर पर राग, द्वेष, अहंकार हैं, वहाँ साधना पहुँचनी चाहिए।
तो यह जो परम प्रेम है, उसकी अनुभूति अस्तित्व के धरातल पर होनी चाहिए। और अस्तित्व के धरातल पर जो अनुभूति हुई, वह जनम-जनम में साथ में चलेगी।
अभी-अभी हम देखते हैं, पाँच साल का बच्चा होता है, और कहता है, मुझे दीक्षा लेनी है। अरे, पाँच साल का बच्चा है, यह भाव कहाँ से आया? यह जन्मांतरीय धारा के संस्कार हैं। तो हमारे पास भी जो भी साधना है, वह साधना अस्तित्व के धरातल पर जानी चाहिए। तो परम प्रेम भी अनुभूति का विषय होना चाहिए।
राग अनुभूति का विषय है। राग को करने के लिए कुछ सोचना नहीं पड़ता है, राग अनायास हो ही जाता है, क्योंकि यह धारा अनुभूति के स्तर की है। अब वीतराग दशा को आपने उजागर किया? एक छोटी साधना आपको दूँ। आप चाय पीते हैं, चाय टेस्टी (tasty) है, आसक्ति हो गई, राग पनप गया। वहाँ तक तो आपका अनुभव है। अब साधना यह है कि उस राग को देखो, उस आसक्ति को देखो। मुझे राग हो रहा है, ऐसा अनुभव करो।
हो सकता है? चाय भी पीते हो, चाय अच्छी लगती है, राग होता है, तो मुझे चाय पसंद है, मुझे चाय पर आसक्ति होती है, ऐसा आप सोच सकते हैं न? तो अब क्या हुआ? चाय तो दृश्य है ही, राग भी दृश्य हो गया। दृष्टा तुम हो, राग दृश्य हो गया।
अब सूत्र यह है कि दृश्य और दृष्टा एक नहीं होते, वे अलग ही होते हैं। यह टेबल को मैं देख रहा हूँ, तो यह दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। तो दृश्य अलग है, दृष्टा अलग है। तो राग भी अलग है, और तुम भी अलग हो। तो यह जो भ्रमणा थी कि राग, द्वेष, अहंकार स्वभाव है, यह भ्रमणा निकल जाएगी। स्वभाव नहीं है, स्वभाव तो समभाव ही है, स्वभाव तो वीतराग दशा ही है।
एक साधक ने गुरु से कहा था कि गुरुदेव, क्या करूँ? मैं बहुत ही परेशान हूँ, बार-बार क्रोध आता है। क्रोध ही मेरा स्वभाव बन गया है। गुरु भी बड़े मनोवैज्ञानिक आयाम के आचार्य थे। गुरु ने कहा, “अच्छा, क्रोध तेरा स्वभाव है।” आप भी मानते हो? क्रोध मेरा स्वभाव है। तो गुरु ने कहा, “क्रोध तेरा स्वभाव है न? तो मैं वन, टू, थ्री कहता हूँ, जब मैं थ्री कहूँ, क्रोध शुरू कर देना।” तो साधक ने कहा, “ऐसे तो क्रोध कैसे आएगा?” “क्यों? तेरा स्वभाव है, तेरा स्वभाव है, तो स्वभाव तो साथ में रहता है।” तब साधक समझा कि क्रोध मेरा स्वभाव नहीं है।
तो राग दृश्य है, क्रोध दृश्य है, अहंकार दृश्य है, तुम दृष्टा हो। अलग पड़ जाओ, दूरी कर दो। राग तुम्हारा स्वभाव नहीं है, द्वेष तुम्हारा स्वभाव नहीं है। तुम्हारा स्वभाव वीतराग दशा ही है। और इसलिए प्रभु के दर्शन के लिए हम जाते हैं, कि वीतराग प्रभु के मुख का दर्शन करके, उस वीतरागता का अनुभव हमारे भीतर हम भी करें।
समवसरण में हम जाकर आए, समवसरण में गए, लेकिन जो देखने का था, वह देखा ही नहीं। प्रभु की उदासीनता नहीं देखी, चौंसठ इंद्रों को देख लिया। “ओह, इतने इंद्र प्रभु की सेवा कर रहे हैं!” चामर को देखा, देव दुंदुभि को सुना। अरे, समवसरण में इसके लिए तुम नहीं गए थे, तुम प्रभु के दर्शन के लिए गए थे। प्रभु के मुख पर जो उदासीन दशा थी, यह सब हो रहा है, मुझे इससे कोई संबंध नहीं है। प्रभु का न चौंसठ इंद्रों से कोई संबंध था, न कोई अतिशयों से, प्रातिहार्यों से संबंध था। प्रभु अपने भीतर ही थे।
एक बार शंखेश्वर में मैंने एक प्रवचन में पूछा था कि आज प्रभु का दर्शन हम करके आए हैं। शंखेश्वर दादा का, दादा ने कुछ कहा था? तो मेरे सामने एक श्रावक बैठा हुआ था, उसने कहा, “गुरुदेव, प्रभु ने कुछ कहा हो तो भी प्रभु की भाषा हम कैसे समझ सकते हैं? आपको ही ख्याल आता है।”
तो मैंने कहा, “प्रभु अपने मुख से, बॉडी लैंग्वेज (body language) से, कह रहे थे कि मैं मेरे भीतर हूँ, तुम भी भीतर पहुँच जाओ।” प्रभु स्वस्थ हैं, स्व में डूबे हुए हैं। हम कहाँ डूबे हैं? पर में।
हमारी भाषा में एक बहुत ही सुंदर शब्द है। आप पूछते हैं किसी से, “स्वस्थ हो न?” स्वस्थ का मतलब क्या होता है? ‘स्व’, माने कि मैं। तुम ‘तुम’ में हो या ‘पर’ में हो? तुम ‘स्व’ में हो या ‘पर’ में हो? तुम सब स्वस्थ हो न? कि परस्थ हो? स्वस्थ हो कि परस्थ?
तो कितना सुंदर शब्द, स्वास्थ्य। अंग्रेजी में ‘हेल्थ’ (health) शब्द है, आरोग्य। लेकिन हमारी भाषा में कितना सुंदर शब्द आया, स्वास्थ्य। तुम स्वस्थ हो? और सुनने वाला भी कहेगा, “हाँ, मैं स्वस्थ हूँ।” न पूछने वाले को पता है, न बोलने वाले को पता है। तुम स्वस्थ हो? हाँ, मैं स्वस्थ हूँ। क्या स्वस्थ हो? तुम स्वस्थ हो कि विचारस्थ हो? शब्द तुम्हारा स्वरूप नहीं, विचार भी तुम्हारा स्वरूप नहीं है। केवल अनुभूति, यही तुम्हारा स्वरूप है। यही तुम्हारा स्वरूप, केवल अनुभूति। न शब्द, न विचार। तो अभी आप कुछ सोच रहे हो, तो स्वस्थ नहीं हो, विचारस्थ हो।
यह साधना शिविर, प्रारंभिक साधकों के लिए जब होती, तब प्रवचन अधिक होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे साधक साधना में अभ्यस्त होते जाते हैं, वैसे प्रवचन संक्षिप्त होते जाते हैं। शब्दों की आवश्यकता नहीं, तुम अनुभव करो। अनुभूति के लिए ही तुम यहाँ आए हो। शब्द तो तुम सुनते ही हो, प्रवचन में, तुम्हारे नगरों में, मुंबई में, पुणे में, सब जगह। यहाँ प्रवचन के लिए नहीं आए, यहाँ अनुभूति के लिए आए हो।
तो परम प्रेम का अनुभव करना है। नारद ऋषि ने परम प्रेम के पाँच विशेषण दिए। पहला विशेषण था गुणरहितं। अब दूसरा विशेषण आया कामनारहितं।
जब परम प्रेम तुम्हारे हृदय में आ गया, छा गया, तब कोई कामना नहीं रहती।
एक बात मैं आपसे कहूँ। तुम्हारे पास करोड़ों की संपत्ति है, फिर भी तुम प्यासे हो। अधिक प्राप्त करो, अधिक प्राप्त करो, अधिक प्राप्त करो। अब बहुत अधिक प्राप्त कर लिया, फिर भी प्यास रहती है। आपको मालूम नहीं है, यह प्यास बाह्य पदार्थों की नहीं है, परम प्रेम की है।
जहाँ तक परमात्मा का प्रेम नहीं मिलेगा, प्यास बुझेगी नहीं। प्यास वैसी की वैसी रहेगी। क्योंकि प्यास थी परम प्रेम की। और आपने संपत्ति इकट्ठी कर ली। प्यास है पानी की, और कोई रोटी देगा तो क्या होगा? अरे भाई, प्यास पानी की है, पानी चाहिए।
तो हम सब परम प्रेम की प्यास को लेकर अनगिनत जन्मों से चल रहे हैं। जब तक परम प्रेम नहीं मिलेगा, तब तक यह प्यास बुझने वाली नहीं है। तो इस जन्म में परम प्रेम का ही अनुभव करना है। और यह अनुभव हो गया तो कामनारहितं। फिर कोई इच्छा नहीं रहेगी। अब प्यास ही नहीं रही, इच्छा कैसे रहेगी? अब तुम संतुष्ट हो गए।
एक मुनिराज को आप पूछो, “गुरुदेव, आपको क्या चाहिए?” मैं भी कहूँगा, “मेरे शरीर को रोटी और दाल चाहिए, लेकिन मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं स्वयं संपूर्ण हूँ। मैं स्वयं संपूर्ण हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए।” परम प्रेम मिल गया, अब कोई इच्छा ही नहीं रही, रोटी-दाल भी इस शरीर को चाहिए, मुझे नहीं।
तुम्हारी तकलीफ क्या है? शरीर को तो बहुत कम चाहिए, तुम्हारे मन को ज़्यादा चाहिए। और तुम तो परोपकारी आदमी हो। तुम्हारे लिए नहीं चाहिए, सोसायटी के लिए चाहिए। 2 BHK फ्लैट है, एक बच्चा है, तो पर्याप्त है। लेकिन 5 BHK फ्लैट किसके लिए चाहिए? सोसायटी के लिए, सोसायटी को दिखाने के लिए। कि सोसायटी को रुलाने के लिए? और आगे पूछो, सोसायटी को दिखाने के लिए या जलाने के लिए? अब बोलो।
एक भाई, दोपहर को, ऑफिस से घर आए, भोजन के लिए, साढ़े बारह बजे। luxurious apartment में वे रहते थे। और ऐसा स्वच्छ अपार्टमेंट, जहाँ एक तिनका भी कहीं न मिले। कॉरिडोर में भी नहीं, सीढ़ियों में भी नहीं। जगह-जगह डस्टबिन रखे हुए हैं। लेकिन जैसे ही वह अपने फ्लैट के पास गया, फ्लैट के दरवाजे के पास, आम के छिलके और आम की गुठलियाँ खुली पड़ी थीं। उसका तो मगज गर्म हो गया। मेरे फ्लैट के बाहर किसने फेंका यह? लेकिन सद्बुद्धि सूझी कि, पहले अंदर तो पूछ लूँ। भीतर गया, श्राविका से पूछा, “यह आम की गुठलियाँ और आम के छिलके किसने डाले हैं?” तो उसने कहा, “मैंने डाले हैं।” “अरे, अपन इतने सोफिस्टिकेटेड (sophisticated) अपार्टमेंट में रहते हैं, लग्ज़रीअस अपार्टमेंट में, और खुले में तुम ऐसा डालते हो? तुम्हारे में कुछ समझ है कि नहीं?”
तो श्राविका ने कहा, “तुम ऑफिस के मामले में होशियार हो, घर के मामले में तुम होशियार नहीं हो। आज पहली बार आम आई है हमारे घर पर। हम रस-पूरी खाने वाले हैं, तो दूसरों को क्या मालूम?”
लेकिन आपकी तो बात यह नहीं हो सकती। आप तो क्या करेंगे? आम आई, तो पहली टोकरी मंदिर में। टोकरी? क्या आम? फिर रस निकाला है, फ्रिज में नहीं डाला है। और मुनिराज आ गए, और कृपा करके वोहर लिया, तो दूसरे नंबर पर महाराज साहेब की भक्ति हो गई। तीसरे नंबर में अपार्टमेंट में रहने वाले सब साधर्मिक। और चौथे नंबर ऊपर आप। ठीक?
मैंने एक प्रवचन में ऐसा कहा था, तो एक भाई ने कहा, “महाराज साहेब, आपकी बात सच्ची है। तीसरे नंबर पर साधर्मिक ही।” मैंने कहा, “कैसे?” तो उसने कहा, “मेरे घर पर सब साधर्मिक हैं। जैन धर्म को पालने वाले साधर्मिक हैं। तो मेरा बच्चा, मेरी श्राविका, सब साधर्मिक हैं।”
कामनारहितं। परम प्रेम मिल गया, कोई कामना नहीं रही। कोई इच्छा नहीं रही। तो हम जो आनंद में हैं, उसका राज यह है, कोई इच्छा ही नहीं है।
आप अपन को अपूर्ण महसूस करते हो। क्योंकि इच्छाएँ हैं। और जब तक इच्छाएँ पूर्ण नहीं होंगी, तब तक अपन को आप अपूर्ण महसूस करेंगे। और आज तो पाँच करोड़ हो या पच्चीस करोड़ हो, मीडिया वाले अदाणी की और अंबानी की संपत्ति को गिनाते हैं। “इतने लाख करोड़ इसके पास हैं!” ओहो, इतने लाख करोड़। अपने पास तो ख़ाली सिर्फ पच्चीस करोड़ हैं।
तो यह जो कामना है तुम्हारे पास, यह कामना क्यों है? परम प्रेम नहीं मिला है, तो प्यास ही प्यास है, और कामना ही कामना है। तो परम प्रेम मिल गया, तो क्या हुआ? हम इच्छा-रहित, टोटली चॉइसलेस (totally choice-less) हो गए। कोई इच्छा ही नहीं। कोई भी मुनिराज को आप पूछेंगे, “साहेबजी, क्या खप है?” “अरे, कुछ खप नहीं है, कुछ नहीं चाहिए। हम स्वयं संपूर्ण हैं, हमें कुछ नहीं चाहिए।”
तो यह जो हमारी स्वयं-संपूर्णता है, आपको पसंद आई? आई? कुछ नहीं चाहिए। आपको यह पसंद आ गया? बस तो परम प्रेम का अनुभव कर लो।
तो थ्योरिकली परम प्रेम की बात की, अब प्रैक्टिकल। अब तो प्रैक्टिकल फब गया है न? कि विचार आते हैं? विचार को कह देने का…
