अगर उपयोग बाहर नहीं है, तो भीतर है
ध्यान में आप उपयोग को पर से हटा देते हैं। ध्यान में निर्विकल्प दशा, निर्विचार दशा फाउंडेशन है। विचार नहीं है, तो राग-द्वेष कैसे आएँगे? विचारों की खिड़की से ही तो राग-द्वेष की हवा भीतर प्रवेश करती है। विचार ही नहीं हैं, तो राग-द्वेष कैसे भीतर आएँगे?
इस निर्विचार दशा के फाउंडेशन से उपयोग बाहर नहीं जाएगा। कोई आया, कोई गया, कोई भी घटना हुई – तुम्हारा उपयोग कहीं नहीं जाएगा। आँखे बंद, मन बंद, विचार के द्वार भी बंद; अब बाहर की कोई घटना तुम्हारे लिए है ही नही। तुमने उपयोग को बाहर से Recall कर लिया। और अगर उपयोग बाहर नहीं है, तो भीतर है।
फिर वह सूक्ष्म होगा, सूक्ष्मतर होगा, तब परमप्रेम पकड़ा जाएगा। प्रभु से प्रार्थना करनी है कि अस्तित्व के धरातल पर परमप्रेम का अनुभव मुझे हो जाए; ऐसा अनुभव जो कभी छूटे नहीं। प्राण छूट जाएँ, देह छूट जाए, पर वह अनुभव न छूटे।
परम प्रेम, हर क्षण बरसता रहा है। एक क्षण ऐसा नहीं कि परम प्रेम हम पर न उतरा हो, न बरसा हो। प्रभु त्रिलोकेश्वर, अखिल ब्रह्मांडेश्वर महावीर भगवान की निश्रा में, उनके परम प्रेम का अनुभव हमने किया।
कैसा है परम प्रेम? हम अनुभूति कर सकेंगे, परम प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं कर सकेंगे। We can experience it, we can’t say it. महर्षि नारद ने भक्तिसूत्र में परम प्रेम की पाँच विशेषताएँ दर्शाईं: गुणरहितं, कामनारहितं, प्रतिक्षणवर्धमानं, अविच्छिन्नं, सूक्ष्मतरं।
चौथा विशेषण: परम प्रेम की चौथी विशेषता, अखंडता। अस्तित्व के धरातल पर एक बार परम प्रेम का अनुभव हो गया, फिर कभी वह जाने वाला नहीं। दुनिया जाएगी, पूरी दुनिया छूट जाएगी, लेकिन परम प्रेम नहीं जाएगा।
आज अंतिम दिन है। कोशिश यही करनी है। प्रभु से प्रार्थना करनी है कि अस्तित्व के धरातल पर तुम्हारे प्रेम का अनुभव मुझे हो जाए। ऐसा अनुभव जो कभी छूटे नहीं। प्राण छूट जाएँगे, देह छूट जाएगी, अनुभव नहीं छूटेगा।
पाँच सौ वर्ष पहले की एक घटना। आठ साल का एक बच्चा गुरुदेव के पास आया, और उसने गुरुदेव से विनति की, “गुरुदेव, कृपा करके मुझे दीक्षा दो।” गुरुदेव फेस-रीडिंग (face reading) के मास्टर थे। उन्होंने बच्चे के मुख पर दृष्टि डाली, और समझ गए कि जन्म-जन्म से यह बच्चा परम प्रेम की धारा में बहता आया है। परम प्रेम। अब संसार में वह कैसे रह सके?
आनंदघन जी भगवंत ने इस परम प्रेम की अनुभूति के बाद कहा था:
“आनंदघन बिन प्राण न रहे छिन, कोटि जतन करिएजी।”
करोड़ों उपाय किए जाएँ, लेकिन ये परम प्रेम के बिना एक क्षण जीना मुश्किल है। ऑक्सीजन (oxygen) बिना तुम रह सकते हो एक-दो मिनट। प्राणायाम का तुम्हारा अभ्यास है, तो तुम बिना ऑक्सीजन एक-दो मिनट रह सकते हो। लेकिन परम प्रेम की अनुभूति के बाद, एक सेकंड भी परम प्रेम के बिना हम नहीं रह सकते। ऐसा यह परम प्रेम है। इसका अनुभव हुआ मुझे। पहले क्षण तो मैं स्तब्ध हो गया कि क्या ऐसा भी प्रेम हो सकता है? वह परम प्रेम, beyond the words, beyond the imagination था।
नारद ऋषि ने परम प्रेम की विशेषताएँ दर्शाईं, लेकिन वह भी आउटर स्पेस (outer space) की बात है, इनर स्पेस (inner space) की बात नहीं। आउटर स्पेस का वर्णन किया जाता है, इनर स्पेस का तो अनुभव ही हो सकता है। देअर इज़ नो अदर वे (There is no other way)। सिर्फ तुम अनुभव कर सकते हो।
गुरुदेव ने देखा कि यह बच्चा परम प्रेम की अखंड धारा में बहता आया है। अब यह संसार में कैसे रह सकेगा? शक्य ही नहीं है। लेकिन बहुत भावक बैठे हुए थे, तो गुरुदेव ने पूछा, “कि तू इतना छोटा बच्चा, तुझे दीक्षा का विचार क्यों आया?”
तब उस बच्चे ने कहा, “गुरुदेव, कल की ही बात है, माँ रसोई कर रही थीं, चूल्हे के पास बैठी थीं, मैं माँ के पास बैठा था, मेरी नजर चूल्हे पर पड़ी। छोटी-छोटी लकड़ियाँ जल्दी ही जल गईं। बड़ी लकड़ियाँ धीरे-धीरे जलने लगीं। तो मुझे हुआ कि मैं तो महाकाल की भट्टी में छोटी लकड़ी हूँ। मैं कब जल जाऊँगी? गुरुदेव, आप मुझे महाकाल की भट्टी से बाहर निकालो।”
दीक्षा का अर्थ क्या है? परम प्रेम की धारा में बहना। आप शाता पूछने के लिए आते हो हमारी। कभी देखे हम अशाता में हैं? व्यवहार है, आप शाता पूछ लेते हैं। हम शाता में नहीं, परम शाता में हैं। परम प्रेम मिल गया, अब दूसरा कुछ चाहिए ही नहीं। अशाता में कौन रहेगा? जिसको कुछ चाहिए और मिलता नहीं, वह अशाता में रहेगा। हमें कुछ चाहिए ही नहीं। हमारा तो सूत्र है, ‘खप नहीं, खप नहीं’, और तुम्हारा, ‘खप है, आनंद है।’
हम सब परम प्रेम की धारा में बह रहे हैं। ऐसा आनंद, ऐसा आनंद, जिसकी हमने भी कल्पना नहीं की थी। मैं तीस वर्ष पहले “आनंद” शब्द पर प्रवचन करता था, लेकिन मुझे ख्याल नहीं था कि आनंद क्या घटना है। मैं रति के प्रकर्ष को आनंद समझता था। संयोगजन्य जो सुख है, वह रति है। तो आनंद क्या, मुझे पता भी नहीं था, और आनंद पर मैं प्रवचन करता था। और संयोगजन्य रति के प्रकर्ष को मैं आनंद समझता था।
बाद में ख्याल आया कि रति अलग चीज है, सुख अलग चीज है, आनंद अलग संघटना है। आनंद असंयोगजन्य संघटना है। भीतर से पनपने वाली घटना। बाहर से जो घटना आती है, वह रति है, वह सुख है। सुख के साथ दुख जुड़ा हुआ है। लेकिन जब आनंद की धारा चालू हो जाएगी, आनंद ही आनंद। तुम्हारा सुख पराधीन है। चाय अच्छी पी ली सुबह, तो सुख ही सुख। चाय टेस्टी (tasty) नहीं मिली, तो पीड़ा ही पीड़ा। तो तुम्हारा सुख पराधीन है। हमारा आनंद स्वाधीन है।
बस परम प्रेम की एक अखंड धारा चली। और अब विश्वास आया कि अस्तित्व की धारा पर, यह आनंद, यह परम प्रेम जुड़ गया है। इसलिए मोक्ष में जाएँगे तब तक यह धारा नहीं छूटेगी। अब कहीं भी जाएँगे, पदार्थों में सुख की कल्पना हो ही नहीं सकेगी। व्यक्तियों से सुख की कोई संभावना पैदा ही नहीं होगी। जो आनंद होगा, भीतर से ही होगा। परम प्रेम भीतर गया, पूरा हृदय परम प्रेम से भर गया, बस आनंद ही आनंद।
तो वह छोटा बच्चा परम प्रेम की अखंड धारा में था। आठ साल का हुआ, बेचैनी बेचैनी। पहले तो ख्याल भी नहीं आया, बेचैनी क्यों है। लेकिन जब मुनिराज को देखे, तब जाति-स्मरण ज्ञान हुआ, और ख्याल आ गया कि परम प्रेम के बिना मैं बेचैन हूँ। यह जो पीड़ा है, वह परम प्रेम के अभाव की है। अखंड धारा थी, सुषुप्त थी। रजोहरण जैसा ही गुरुदेव ने दिया, प्रकट धारा बहने लगी।
तो चौथी विशेषता परम प्रेम की थी, अविच्छिन्नं। और पाँचवी विशेषता थी सूक्ष्मतरं। सूक्ष्म भी नहीं, सूक्ष्मतर कहा। अत्यंत सूक्ष्म। अत्यंत सूक्ष्म परम प्रेम है। तो उसे झेलने के लिए तुम्हारी जागृति प्रबल होनी चाहिए।
एक बात मैं कहूँ, केवली भगवंत समुद्घात करते हैं। अब समुद्घात के समय क्या करते हैं? एक समय में अपने आत्म प्रदेशों को पूरे ब्रह्मांड में फैला देते हैं। हर छह महीने एक केवली समुद्घात तो होगा ही। तो ऐसे कितने केवली समुद्घात हमारे जीवन में हो गए? हमारे आत्म प्रदेशों से ये निर्मल आत्म प्रदेश एक समय के लिए मिले, जुड़े, लेकिन हमें उसका अनुभव नहीं।
ठीक है, हमारे पास मतिज्ञान, श्रुतज्ञान है, और उसका उपयोग मुकने के लिए असंख्यात समय चाहिए। लेकिन कुछ हुआ, ऐसा तो अनुभव हो सकता है। ऐसी निर्मल चेतना, केवली भगवंत की, वह हमें टच (touch) हुई। हम बेख़बर हैं। कहाँ हैं आप? कहाँ रहते हैं? ‘पर’ में ही रहते हैं। इसलिए परम का अनुभव नहीं होता।
तो परम प्रेम सूक्ष्मतर है। तो इसकी अनुभूति के लिए तुम्हारी जागृति सूक्ष्मतर चाहिए। मैं रोज़ कहता हूँ कि परम चेतना पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई है। महोपाध्याय यशोविजय महाराज ने लिखा, पंचविंशतिका में:
“व्यक्त्या शिवपदस्थोऽसौ, शक्त्या जयति सर्वगः।”
व्यक्ति रूप से परमात्मा सिद्धशिला पर हैं। अभी। महावीर प्रभु अभी कहाँ है? सिद्धशिला पर। सीमंधर भगवान महाविदेह में हैं, लेकिन महावीर प्रभु कहाँ हैं? सिद्धशिला पर हैं। लेकिन यह व्यक्ति रूप से सिद्धशिला पर है। शक्ति रूप से पूरे ब्रह्मांड में है। उस शक्ति को हम आर्हंत्य कहते हैं।
इसलिए सकलार्हत् के प्रारंभ में कलिकालसर्वज्ञश्री ने लिखा:
“भूर्भुवःस्वस्त्रयीशानम् आर्हंत्यं प्रणिदध्महे।”
तीन लोक पर जिसका शासन है, वैसे आर्हंत्य को हम प्रणाम करते हैं, उसका हम ध्यान करते हैं। तो परंपरा ऐसी है कि सामान्य तीर्थंकरों का आर्हंत्य सदा काल रहता है। और विशेष तीर्थंकर भगवंत हैं, उनका आर्हंत्य उनके शासन तक रहता है। तो अभी दोनों आर्हंत्य हमारे पास, हमारे इर्द-गिर्द हैं। सामान्य तीर्थंकरों का आर्हंत्य और महावीर प्रभु का आर्हंत्य। महावीर प्रभु का शासन दुप्पसह सूरी के बाद, जब विदा होगा, तब आर्हंत्य भी विदा होगा।
तो यह शक्ति पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई है। तो परम प्रेम पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ है। लेकिन तुममें उसका अनुभव नहीं। क्योंकि वह सूक्ष्मतर है। तो इसकी अनुभूति करनी है, तो ध्यान में जाना ही होगा।
ध्यान में सबसे पहले क्या होता है? उपयोग को हम ‘पर’ से हटा देते हैं। ध्यान में निर्विकल्प दशा, निर्विचार दशा, यह फाउंडेशन (foundation) है। तो फाउंडेशन में क्या हुआ? कि विचार नहीं है। और विचार नहीं है, तो राग-द्वेष कैसे आएँगे? खिड़की खुली है, तो हवा आएगी। खिड़की बंद है तो? ऐसे विचारों की खिड़कियाँ खुली हैं, तो राग-द्वेष आएँगे। विचार ही नहीं है, तो राग-द्वेष कैसे आएँगे भीतर?
तो निर्विचार दशा फाउंडेशन है। और फाउंडेशन से क्या होगा? कि उपयोग बाहर नहीं जाएगा। कोई आया, कोई गया, कोई भी घटना हुई, बाहर की कोई भी घटना पर, तुम्हारा उपयोग नहीं है। तुमने विचार के द्वार ही बंद कर दिए। आँखें भी बंद कर दीं, मन को भी बंद कर दिया। अब बाहर की कोई घटना तुम्हारे लिए है हि नही। तो निर्विचार तुम हुए। तो उपयोग को तुमने बाहर से रिकॉल (recall) कर लिया। अब उपयोग बाहर नहीं है।
अब उपयोग बाहर नहीं है, तो कहाँ है? भीतर है। अब उपयोग सूक्ष्म हुआ, सूक्ष्मतर हुआ, अब परम प्रेम पकड़ा जाएगा।
इसलिए आज यह बात भी कहनी है कि घर जाकर प्रभु को कितना समय दोगे? तुम तो ऐसे परोपकारी आदमी हो। स्व के लिए कुछ करने वाले तुम नहीं हो। पत्नी के लिए कुछ करोगे, बच्चों के लिए कुछ करोगे, तुम्हारे शरीर के लिए कुछ करोगे, तुम्हारी आत्मा के लिए कुछ नहीं करोगे। क्योंकि तुम परोपकारी आदमी हो। स्व के लिए कुछ नहीं करोगे।
इसलिए कहता हूँ कि परमात्मा को कितना समय दोगे? चलो, हमने कुछ दीया, तो गुरुदक्षिणा भी देनी होगी न? तो गुरुदक्षिणा में क्या दोगे? कितना समय दोगे? आधा घंटा दोगे? पौना घंटा दोगे? फिर आप दो-तीन महीने के बाद, या चार-पाँच महीने के बाद, मेरे पास आओगे, आप कहोगे, “गुरुदेव, कात्रज शिबिर में आपने परम प्रेम की बातें कही थीं। बातें अपीलिंग (appealing) थीं। मुझे पसंद भी आ गई थीं। लेकिन वहाँ अनुभव नहीं हुआ था। यह पाँच महीने के बाद अब अनुभव होने लगा है।”
अब ‘पर’ की घटना, उसका अनुभव, उसका असर कम होता है। कोई कुछ बोल रहा है, तो बोल रहा है। वह बोल रहा है, तो बोले। इसमें मुझे क्या है? और एक बात है, वह कहेगा, तो किसको कहेगा? कोई ने गालियाँ दीं, समझो। लेकिन गालियाँ किसको दीं? आपको दीं, या आपके शरीर को दीं, या आपके कॉन्शियस माइंड (conscious mind) को दीं? किसको दीं?
मेरे एक मुनिराज थे, मेरे पास आए। उन्होंने कहा, “गुरुदेव, एक महात्मा ने मुझे ऐसे रफ़ली (roughly) कहा।”
मैंने कहा, “मैं कह दूँगा, कोई भी साधु प्रेम से ही बोल सकता है। रफ़ली कोई बोल नहीं सकता।” फिर मैंने कहा, “वह तो बात पूरी हो गई। अब तेरी बात करूँ। कि तू मिथ्यात्वी हो गया, तो इसका क्या करेंगे?”
वह तो आश्चर्यचकित हो गए। “मैं मिथ्यात्वी?”
मैंने कहा, “हाँ, तू कहता है, मुझे किया, मुझे कहा। तो ‘मैं’ शब्द का प्रयोग, तू किसके लिए कर रहा है? शरीर के लिए कर रहा है। ‘पर’ को ‘स्व’ मानना, वह हि मिथ्यात्व। तूने शरीर को ‘मैं’ माना, तो तू मिथ्यात्वी हो गया।”
अब क्या कहोगे? बुखार आ भी गया, तो क्या कहोगे? ‘मेरे शरीर को बुखार आया, मुझे नहीं। मैं तो आनंदघन हु। मैं तो निरोगी हूँ। मेरा तो शरीर ही नहीं है, बुखार कैसे आएगा? शरीर तो मेरा घर है, मैं नहीं हूँ।’ तो आपको यह अभ्यास करना है।
कोई नियम नहीं देता हूँ। आपकी इच्छा हो तो नियम भी दे दूँ, जिसको लेना हो। आप मन में धार लो। 15 मिनट, 30 मिनट, 45 मिनट, एक घंटा, आपको जो भी इच्छा हो। लेकिन इस धारा को जीवंत रखनी है। इतना समय आपने मुझे दिया, तो मुझे भी कुछ देना तो होगा। साढ़े पाँच दिन आपने मुझे दिए। तो मैं एक घंटा तो दे दूँ आपको।
एक दूसरी बात इस चिट्ठी में आई थी, कि मौन का पच्चक्खाण सबने लिया था, लेकिन किसी-किसी का पच्चक्खाण भंग हो गया है। तो जिसका भी पच्चक्खाण टूट गया हो, उन सबको तीन नवकारवाली गिननी है। दंड मे।
तो आज हमारी यह साधना शब्दों के रूप में परिपूर्ण होती है। अब शक्तिपात करना है। मंत्र दीक्षा देनी है।
सद्गुरु हाथ से भी शक्तिपात करते हैं, आँख से भी करते हैं, और मुँह से भी करते हैं। तो शब्द मैंने दिए, तो होंठ से शक्तिपात हो गया। वासक्षेप दिया, और अभी मैं देने वाला हूँ, तो हाथ से भी शक्तिपात हो जाएगा। नज़र से सबको देखा, तो यह दृष्टि-शक्तिपात भी हो गया।
अब मंत्र दीक्षा देनी है। 18 दिन के उपधान आप करो, तब ही आपको नवकार मंत्र मिल सकता है। अब नवकार मंत्र गिनने के आप अधिकारी बन सकते हैं। जब भी समय मिले, अनुकूलता मिले, उपधान कर लेना। जहाँ तक न कर सको, वहाँ तक यह मंत्र दीक्षा काम आएगी। तो आज से नमस्कार महामंत्र की दीक्षा लेने के बाद, एक नवकारवाली, 108 नवकार की, आपको अवश्य गिननी है।
मंत्र में ऐसी बात है कि सातत्य न हो, अखंडितता न हो, तो मंत्र की शक्ति इतनी नहीं चलती। तो रोज़ आप सबको एक नवकारवाली गिननी है।
