अविच्छिन्नं
परमप्रेम का तीसरा विशेषण है : अविच्छिन्नं। परमप्रेम की धारा अखंड रूप से चलती है। अस्तित्व के स्तर पर एक बार भी परमप्रेम का अनुभव हो गया, तो फिर यह धारा जन्मों तक अखंड रूप से चलती रहेगी।
जब अस्तित्व के स्तर पर अनुभूति होती है, तब आपके एक-एक क्षण पर प्रभु का हस्ताक्षर होता है। प्रभु की जो आज्ञा है, उस आज्ञा के मुताबिक ही आप चलते हो। एक-एक क्षण पर प्रभु का हस्ताक्षर आ गया, फिर ऐसे क्षणों का एक प्रवाह अखंड रूप से – अविच्छिन्न – चलेगा।
फिर आप बाहर से संसार में होंगे, लेकिन भीतर से संसार छूट जाएगा। यह खास ख़याल में रख लेना – परमप्रेम को आप लाएँगे, फिर बाकी सब छूट जाएगा। तो जब तक आपको बाकी सब रखना हो, संसार रखना हो, तब तक परमप्रेम को मत लाना!
परम प्रेम सतत बरस रहा है। एक क्षण ऐसा नहीं कि परम रस न बरसता हो। अनगिनत समय से परम प्रेम बरस रहा है। अभी तक हम उसे स्वीकार नहीं पाए हैं। इस जन्म का हमारा अवतार कृत्य इतना ही है कि हम परम प्रेम को जी लें, परम रस को पी लें।
जिन्होंने परम प्रेम का अनुभव किया, उन्होंने परम प्रेम की विशेषताएँ दर्शाईं। ऐसे अनुभूतिवान् सद्गुरुओं में नारद ऋषि भी अग्रणी हैं। उन्होंने परम प्रेम को अनुभूत किया और परम प्रेम की पाँच विशेषताएँ दर्शाईं।
तीन विशेषताओं को हमने देखा: गुणरहितं, कामनारहितं, प्रतिक्षणवर्धमानं। इन तीन विशेषताओं का हमने स्वाध्याय किया। अब चौथी विशेषता आती है: अविच्छिन्नं।
परम प्रेम की धारा अखंड रूप से चलती है। अस्तित्व के स्तर पर परम प्रेम का अनुभव हो गया, फिर यह धारा जन्मों तक अखंड रूप से चलेगी। मैंने कल भी कहा था कि जब अस्तित्व के स्तर की अनुभूति होती है, तब हमारे एक-एक क्षण पर प्रभु का हस्ताक्षर होता है। हम ever-fresh हैं, evergreen हैं। कारण एक ही है: हमारे एक-एक क्षण पर प्रभु का सिग्नेचर (signature)। प्रभु की जो आज्ञा है, उस आज्ञा के मुताबिक ही हमें चलना है। जब एक-एक क्षण पर प्रभु का हस्ताक्षर आ गया, फिर ऐसे क्षणों का एक प्रवाह चलेगा, और वह अखंड रूप से चलेगा।
गुणसागर श्रेष्ठी-पुत्र थे। एक दिन मुनिराज का दर्शन हुआ। दर्शन होते ही भीतर खलबली मच उठी। ‘ऐसा तो कहीं अनुभूत किया है? कहाँ अनुभूति हुई थी?’ जातिस्मरण ज्ञान, पूर्व जीवन में वे मुनिराज थे। मुनि जीवन में जो परम प्रेम का अनुभव हुआ था, उसकी स्मृति तीक्ष्ण रूप से उपस्थित हुई।
यह स्मृति स्मृति नहीं थी, अनुभूति थी। एक-एक क्षण जो पूर्व जीवन में अनुभूत की थी, उसका अनुभव हो रहा है। सिर्फ स्मरण नहीं, अनुभव। कैसा परम प्रेम! आश्चर्य होता है, ऐसा परम प्रेम मुझे मिला था। मुझे भी आश्चर्य होता है कि मेरे जैसे मनुष्य पर परम का प्रेम इतना उतरा, इतना उतरा। आज मैं परम आनंद में हूँ। मेरा एक क्षण विषाद युक्त नहीं है। पीड़ा क्या है, मैं जानता नहीं हूँ। हाँ, एक बात है: करुणा का द्वार मैंने खुला रखा है। दूसरों की पीड़ा का अनुभव कभी-कभार मैं करता हूँ, लेकिन मेरे जीवन में तो पीड़ा है ही नहीं। आनंद ही आनंद है।
और अब मैं शब्दों को बाँटने वाला आदमी नहीं हूँ। मुझे इस प्रेम को बाँटना है। यह परम प्रेम का अनुभव हुआ, संसार छूट गया। राग-द्वेष कहीं छू हो गए। अहंकार कहाँ गया, पता नहीं चलता। ऐसा परम प्रेम मुझे आपको देना है। शब्दो तो माध्यम हैं। मुझे शब्द नहीं देने हैं, मुझे यह परम प्रेम देना है।
गुणसागर गत जन्म के परम प्रेम का अनुभव कर रहे हैं। ऐसा अनुभव हुआ, संसार भीतर से छूट गया। बाहर से संसार में हैं, भीतर से संसार छूट गया। एक बात है: परम प्रेम को लाएँगे, सब छूट जाएगा, वह ख़याल में रखो। जहाँ तक सब रखना हो, वहाँ तक परम प्रेम को नहीं लाना। सब छूट जाएगा। भीतर से संसार छूट गया।
आठ कन्याओं के साथ एंगेजमेंट (engagement) हुआ है। लग्न होने वाला है। अब लग्न किससे हो? मीरा ने भी कहा था, “मैं किससे शादी करूँ? किससे करूँ?” मिट्टी के आदमी से मैं प्रीति करूँ? या शाश्वत प्रेम देने वाले प्रभु से मैं प्रीति करूँ? मैं प्रीति किससे करूँ? प्रभु अपने प्रेम को निभा सकते हैं। जो वादा वो करते हैं, वो निभाते हैं। “रीझियो साहिब संग न परिहरे, भांगे सादि अनंत।”
एक बार आपका हाथ उसने पकड़ा, फिर छोड़ेगा नहीं।
गुणसागर ने कह दिया मात-पिता से, “अब सिर्फ परम प्रेम की दुनिया में जाना है। मैं इस संसार में एक क्षण टिक नहीं पाऊँगा।” परम प्रेम का अनुभव इतना गहरा है कि यहाँ तो क्या है! मैं भी आपसे पूछूँगा: राग में क्या है? द्वेष में तो तकलीफ ही तकलीफ है। राग में भी क्या है? और अहंकार की धारा में आप परतंत्र बन जाते हैं। किसी ने कहा, “तुम अच्छे हो,” अहंकार हो गया। किसी ने कहा, “तुम्हारे पास कोई योग्यता नहीं है, कोई सज्जता नहीं है,” बस, अहंकार का फुग्गा फूट गया। क्या है राग में? क्या है द्वेष में? क्या है अहंकार में?
लेकिन एक बात है: You have no option. अनगिनत जन्मों से अपना यह जन्म इस रूप से अलग पड़ सकता है कि अनगिनत अतीत में we had no option. हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं था। राग से द्वेष में जाओ, द्वेष से अहंकार में जाओ। लेकिन इस जन्म में प्रभु ने एक सुंदर ऑप्शन (option) दिया है: प्रेम का। उस प्रेम का अनुभव करो। फिर आप ही कहेंगे, क्या है राग में? क्या है द्वेष में? क्या है अहंकार में?
गुणसागर ने कहा, “पिताजी, माताजी, मैं यहाँ नहीं रह सकूँगा। मुझे परम प्रेम की दुनिया में जाने दो। मुझे दीक्षा की अनुमति दो।”
माँ की आँख में आँसू। माँ ने कहा, “बेटा, हमारी प्रतिष्ठा का तो ख़याल रख। आठ कन्याओं के साथ तेरा वाग्दान हुआ है। अब शादी नहीं होगी तो हमारी प्रतिष्ठा का क्या होगा?”
तब पिता ने और माता ने कहा, “तू शादी कर ले।” शादी हो गई। “दूसरे दिन हमारी अनुमति दीक्षा लेने की।” सोचते हैं, आठ कन्याएँ आएँगी, वे ही रोक लेंगी। लेकिन ये गुणसागर थे। गुणों के सागर। परम प्रेम मिलता है तो दोषों का सागर, गुणों का सागर हो जाता है।
शादी का जुलूस निकल रहा है। और गुणसागर मन में सोचते हैं, “कल ही सचमुच जुलूस निकलेगा दीक्षा का। गुरु के पास जाएँगे, गुरु के चरणों में समर्पित हो जाएँगे। और गुरु के चरणों में समर्पित हो, प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाएँगे। प्रभु प्रेम के अधिकारी हो जाएँगे।” फिर एक-एक क्षण पर प्रभु के हस्ताक्षर। प्रभु का प्रेम।
शादी के लिए चौरी में बैठते हैं और वहाँ केवलज्ञान होता है। यह परम प्रेम। ऐसा परम प्रेम हमें चाहिए।
पंचविंशतिका में महोपाध्याय जी ने कहा,
“परमज्योतिषः स्पर्शात् अपरं ज्योतिरेधते।”
परम ज्योतिर्मय। प्रभु का परम प्रेम। इसका स्पर्श हो गया, फिर परम प्रेम की अखंड धारा चलेगी। यह परम प्रेम ज्योति रूप है, आनंद रूप है।
मीरा ने ये परम प्रेम की बात की है। एक पद में:
“सुरत निरत को दीवलो जोयो, मनसा पूरन बाती,
अगम घाणी को तेल सिंचायो, बाल रही दिन राती।”
अब दिन और रात, यह परम प्रेम की ज्योति प्रज्वलित हो ही रही है। तो क्या चाहिए? परम ज्योति को, परम प्रेम की ज्योति को उदीप्त करने के लिए क्या चाहिए? ऐसेमे लिए तीन चीजें चाहिए: ग्लास, बाती, और तेल या घी।
तो मीरा कहती हैं, “सुरत निरत को दीवलो जोयो।” ग्लास कौन सा है? काँच का ग्लास नहीं। ज्योति भीतर की है। परम प्रेम भीतर की घटना है। तो ग्लास भी भीतर ही चाहिए। “सुरत निरत को दीवलो जोयो।” सुरति और निरति, ये दो शब्द योगी परंपरा के हैं। और इसके बहुत अर्थ होते हैं। लेकिन हमारे संदर्भ में हम इसका अर्थ करेंगे: निरंतर स्मृति। सुरति अर्थात् स्मृति। निरति अर्थात् निरंतर। प्रभु की स्मृति निरंतर चले, वह ग्लास हुआ। दीपाधार।
एक-एक क्षण पर प्रभु का सुमिरन होता है। सुख के एक-एक क्षण पर प्रभु का सुमिरन होगा। सुख कैसे प्राप्त हुआ? प्रभु की आज्ञा का पालन किया तो सुख प्राप्त हुआ। तो सुख के एक-एक क्षण पर प्रभु का सुमिरन। और दुख क्यों प्राप्त हुआ? प्रभु की आज्ञा का विराधन किया। तो दुख के क्षणों में भी प्रभु का सुमिरन होगा। निरंतर स्मरण।
प्रभु ही जीवन है। मैंने पहले भी कहा था, सिर्फ साँस लेना, सिर्फ साँस छोड़ना, यह कोई जीवन नहीं है। एमर्सन (Emerson) ने कहा है, “We have lost the life.” हमारा जीवन हमने गँवा दिया है। क्योंकि कैसे जीना, वह हमें आया नहीं।
कैसे जीना चाहिए? आपका जीवन आनंद से परिपूर्ण है या सुख-दुख से परिपूर्ण है? सुख-दुख में भी सुख कितना और दुख कितना? सुख तो 10% होता है। 90% तो दुख ही दुख होगा। क्योंकि पुण्य ही ऐसा है। तो आपके पास जीवन है? आनंदपूर्ण जीवन।
इसलिए मैं मेरे प्रवचनों में कहता हूँ कि हमारी ईर्ष्या आती है। एक बात तो निश्चित है: इस वेष को देखकर, इस प्रभु की चद्दर को देखकर, आपके मन में अहोभाव तो छा ही जाता है। लेकिन इस चद्दर को देखकर ईर्ष्या आती है? हमारे पास इतना घना आनंद है, जिसकी कल्पना भी न हो सके। Beyond the words, beyond the imagination.
आप कहेंगे कि गुरुदेव, आपके पास कैसा आनंद है, इसका वर्णन तो करो। तो हमें कहना पड़ेगा, Beyond the words. शब्दों के पर की एक घटना है। शब्दों में इस आनंद को हम व्याख्यायित नहीं कर सकते। ऐसा आनंद हमारे पास है। उस आनंद की ईर्ष्या आती है? आती है?
हमारे पास आनंद क्यों है? परम प्रेम है, इसलिए। आप भी परम प्रेम को प्राप्त कर लो। यह रजोहरण को प्राप्त करना हो तो दीक्षा लेनी पड़ेगी। लेकिन परम प्रेम तो आप प्राप्त कर ही सकते हो। इसी क्षण।
“सुरत निरत को दीवलो जोयो।” निरंतर स्मृति। निरंतर स्मृति क्यों? हम निरंतर स्मृति क्यों करते हैं? थैंक्स (Thanks) देने के लिए। कि प्रभु, तेरा ऋणी हूँ। कि तूने इतना दे दिया। मैंने कुछ न दिया, तूने सब कुछ दे दिया। तेरे पास जो था, वह तूने दे दिया। मैंने तो कुछ भी नहीं दिया। तो निरंतर स्मरण। थैंक्स देने के लिए।
अब बाती कौन सी है? “मनसा पूरन बाती।” पूर्ण मन। यह बाती है। पूर्ण मन की व्याख्या महोपाध्याय जी ने एक स्तवना में की है। “पूरन मन, पूरन सब दीसे, नहि दुविधा को लाग।” पूरन मन, पूरन सब दीसे। जब मन पूर्ण हो गया, तो सभी व्यक्ति पूर्ण दिखेंगे। सभी व्यक्ति।
अब तो क्या लगता है? इसमें यह दोष है, इसमें यह दोष है, इसमें यह दोष है। यह अधूरा है, यह अपूर्ण है। अरे, कोई अपूर्ण नहीं है, तू अपूर्ण है। अपूर्ण तू है। और तू कहता है, यह अपूर्ण, यह अपूर्ण, यह अपूर्ण।
उपनिषद के ऋषि कहते हैं,
“पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।”
“पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।”
यह भी पूर्ण, वह भी पूर्ण। पूर्ण से पूर्ण बढ़ता है। और पूर्ण में से पूर्ण को ले लो, तो भी पूर्ण बचता है।
तो कोई अपूर्ण नहीं है। सभी आत्माएँ पूर्ण हैं। हमारी दृष्टि अपूर्ण है। सद्गुरु क्या करते हैं? आपके विजन (vision) को ठीक कर देते हैं। आपके विजन में जो तकलीफ है, वह दूर कर देते हैं। फिर लगता है, ओह, सभी आत्माएँ पूर्ण ही हैं।
प्रभु का साक्षात्कार जब मुझे हुआ, तब यह घटना घटित हुई। सभी आत्माएँ पूर्ण दिखने लगीं। कोई अपूर्ण नहीं है। सभी आत्माएँ पूर्ण हैं। सब सिद्ध की आत्माएँ हैं। अनंत गुणों से युक्त आप सब हो।
तो “मनसा पूरन बाती।” पूर्ण मन, यह बाती है। अब मन को पूर्ण करना, यह आपके हाथ की बात है कि नहीं? मन को अपूर्ण तुमने किया। अब पूर्ण करना है। चलो, हम मार्गदर्शन देंगे। हम गाइडेंस (guidance) देंगे। अरे, हम सहाय देंगे। आपकी इच्छा है कि आपका विजन बदल जाए? इच्छा है? आपकी श्राविका भी आपको सिद्ध की आत्मा लगे। आपका बच्चा भी आपको सिद्ध का आत्मा लगे। ऐसा करना है? फिर तो आपके घर में स्वर्ग उतर जाएगा। कोई झगड़े नहीं।
मैं एक बात कहता हूँ कि झगड़ा करना है, तो कहाँ करने का? दो ही जगह झगड़े करने के होती हैं। एक मंदिर में प्रभु के साथ, एक उपाश्रय में हमारे साथ। घर में झगड़े क्यों करें? मंदिर में प्रभु के साथ झगड़ा करने का है। वीरविजय महाराज ने वह बताया, कैसे झगड़ा करना। पूजा में लिखा उन्होंने कि प्रभु, सुलसा जी को तीर्थंकर पद तूने दे दिया। रेवती जी को तीर्थंकर पद दे दिया। मुझे क्यों नहीं दिया? लाओ।
और हमारे साथ झगड़ा करने का? इतने सबको दीक्षा दे दी, तो हमें क्यों नहीं? अब समझ गए ना आप भी? झगड़ा कहाँ करने का? मंदिर में या उपाश्रय में। घर में नहीं करने का।
तो “मनसा पूरन बाती।” मन पूर्ण हो गया। आनंद ही आनंद।
अब तेल कहाँ से लाना? “अगम घाणी को तेल सिंचायो।” अगम्य। शब्दों से अगम्य, विचारों से अगम्य। कौन है? परमात्मा। परमात्मा सिर्फ अनुभूति से ही गम्य है। अनुभूति से परम चेतना को हम समझ सकते हैं। न शब्दों से, न विचारों से।
भगवान वीतराग हैं। सुन लिया शब्दों से। क्या हुआ इससे? विचार भी कर लिया। प्रभु वीतराग हैं। प्रभु परम प्रेम के मालिक हैं। और हम परम द्वेष के मालिक हैं। विचार से क्या होगा? अनुभूति। उस वीतराग दशा की आंशिक अनुभूति होगी, तब मालूम होगा कि, ओ, मेरे पास तो वीतराग दशा की आंशिक अनुभूति है, तो भी मुझे इतना आनंद आता है। तो प्रभु के पास तो कितना आनंद होगा!
एक मुनिराज के पास वीतराग दशा की आंशिक झलक है। इसलिए आपके द्वार पर आएँगे। आप कहेंगे, साहिब जी, यह लो। साहिब जी, यह लो। साहिब जी क्या कहेंगे? खप नहीं। खप नहीं। खप नहीं। क्यों? क्यों कहते हैं ऐसा? वीतराग दशा का आंशिक अनुभव है। इसके बिना चल सकता है, तो मैं क्यों वापरूँ? तपस्वी मुनिराज हैं। अपने लिए गोचरी के लिए निकले हैं। तो भी मिष्ठान नहीं लेंगे। रोटी से चल जाता है, तो मिष्ठान मैं क्यों लूँ? तो राग थोड़ा भी गया, और इतना सुख आ गया, तो प्रभु संपूर्ण राग से पर हैं। तो प्रभु का आनंद तो कितना घना होगा!
तो वीतराग दशा की आंशिक झलक आई, तो भी मुनिराज कहते, खप नहीं। खप नहीं। खप नहीं। हमारा सूत्र क्या? खप नहीं। खप नहीं। खप नहीं। आपका सूत्र क्या? खप है। खप है। आने दो। आने दो। समझो कि रोज बीस हजार रुपये मिलते हैं। आज बीस हजार रुपये मिल गए, दस बजे। फिर धंधा बंद कर देंगे? आज के लिए। हाँ? कि आने दो। आने दो।
“अगम घाणी को तेल सिंचायो।” तो परमात्मा शब्दों से अगम्य है। विचारों से अगम्य है। अनुभूति से ही परम चेतना को हम समझ सकते हैं। तो ऐसे जो अगम्य परमात्मा हैं, उनकी कृपा, उनका प्रेम, यही तेल है।
ग्लास आ गया, निरंतर स्मृति का। बाती आ गई, पूर्ण मन की। और प्रभु का प्रेम तेल है। फिर मीरा कहती है, बाल रही दिन राती। ये तीनों मिल जाएँ, फिर क्या करना होता है, आपको मालूम है? आप दियासलाई से दीपक को जलाओगे। पुराने जमाने में दीपक से दीपक जलाते थे। कोई जीवंत दीप है, वहाँ अपनी बाती को रख दो। अपनी बाती जल जाएगी। अपना दीपक जल जाएगा।
तो ये तीन सज्जताएँ आपके पास आ गईं। फिर आप सद्गुरु के चरणों में बैठेंगे। भगवान बुद्ध के जीवन की एक घटना आती है। बुद्ध ध्यान में बैठे हुए हैं, और एक आदमी आता है। भगवान के चरणों में नमस्कार करता है। बैठता है पाँच मिनट। और फिर खड़ा होता है, और कहता है, “प्रभु, तेरा बहुत आभार। बहुत शुक्रिया।” और चला जाता है।
पट्टशिष्य आनंद ने बाद में बुद्ध से पूछा था कि, “भगवन, आप तो ध्यान में थे। आप तो एक शब्द बोले भी नहीं थे। आपने आँखें भी नहीं खोली थीं। तो उसने आभार किसका माना? किस लिए माना?” तब बुद्ध ने कहा कि, “उसके पास ग्लास तैयार था। बाती तैयार थी। तेल भी पूरा हुआ था। अब जीवंत दीप की आवश्यकता थी। मेरे पास आया, उसकी बाती जल उठी, वह चला गया।”
तो इस जीवन में परम प्रेम का अनुभव करना है। गुणसागर ने परम प्रेम का अनुभव किया। संसार छूट गया। भीतर से कैसे छूट गया? कि शादी के लिए आठ कन्याओं का हाथ पकड़कर चौरी में बैठा है। और वहाँ शुक्ल ध्यान की धारा चलती है। और केवलज्ञान होता है। यह परम प्रेम। जो हमें मोक्ष तक पहुँचाए, वह परम प्रेम। ऐसा परम प्रेम देने के लिए परमात्मा तैयार है।
आप तैयार? तैयार?
बस अहोभाव से हृदय को भर दो। दूसरा कुछ नहीं करना है। चंदना जी के पास आँसू थे, और प्रभु को लौटना पड़ा। आँसू में बल है। चंदना जी के स्मरण में बल है। चंदना जी ने कहा था, “प्रभु, एक साँस पर सौ बार तुम्हारा सुमिरन मैं करती हूँ। तुम मेरे द्वार से कैसे लौट सकते हो?” और प्रभु को आना पड़ा। तो चंदना के सुमिरन की यह ताक़त। चंदना के आँसू की यह ताक़त।
प्रभु को हीरा-मोती नहीं चाहिए। तुम्हारा सोना तुम्हारे पास रखो। प्रभु को नहीं चाहिए। प्रभु को सिर्फ तुम्हारे दो आँसू चाहिए। दो आँसू तुम्हारे पास हैं, तो तुम परम प्रेम के अधिकारी हो।
तो आज थ्योरिकली परम प्रेम की बात करी। अब प्रैक्टिकली परम प्रेम का अनुभव।
