अवतार-कृत्य
इंद्रियां और मन जब प्रभु के साथ जुड़ जाते हैं, तब सुख ही सुख है। हमारी एक-एक इंद्रिय और हमारा मन प्रभु के साथ जुड़ जाए, इतना ही हमारा अवतार-कृत्य है। कोई पूछे आपको कि What’s your life mission? तुम्हारा अवतार-कृत्य क्या है? तो कह देना कि “मेरी इंद्रियां और मेरा मन प्रभु के साथ जुड़ जाए, यही मेरा अवतार-कृत्य है।”
तो इस जन्म में हमारा पहला अवतार-कृत्य यह हुआ कि जिन आँखों से अनंत जन्मों में हमने संसार को देखा था, उनसे अब सिर्फ प्रभु को देखना है; सिर्फ़ प्रभु को। और मैं भी आपको देखूँगा न, तो भी मैं प्रभु को ही देखता हूँ। तुम सब कौन हो? सिद्ध भगवंत हो, भविष्य के! “नमो सिद्धाणं।” तुम्हारी ओर मैं देखता हूँ, तो भी मैं तुम्हारे सिद्धत्व की पर्याय को ही देखता हूँ।
मासक्षमण का पारणा हो गया; अब हमें अभ्यंतर तप में जाना है। अभ्यंतर तप में प्रभु को ही निहारना है, प्रभु को ही सुनना है। तुम्हारे कान भी सिर्फ प्रभु की बातें सुनने के लिए हैं; आज से एक प्रतिज्ञा कर लो कि किसी भी व्यक्ति की निंदा कभी भी सुनने की नहीं। और स्तवना करेंगे, स्तुति करेंगे, तो वह भी प्रभु की ही करेंगे।
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित स्तवना चोवीसी। प्रथम स्तवन, प्रथम कंडिका: “मुख दिठे सुख उपजे…”
परमात्मा का मुख हम देखते हैं; अपार सुख हमारे भीतर पनपता है। परमात्मा के मुख को निहारो, परमात्मा की दो आँखों को निहारो। कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य ने प्रभु महावीर के दोनों नयनों की बात की है। प्रभु के नयन कैसे हैं? प्रभु की आँखें कैसी हैं? “कृतापराधेऽपि जने कृपामंथरतारयोः। ईषद्बाष्पार्द्रयोः…” एक अनाड़ी व्यक्ति प्रभु के कानों में कीलें ठोंक रहा है, और उस समय प्रभु की आँखों से आँसू बह रहे हैं। प्रभु की आँखों में आँसू? क्यों? प्रभु की आँखों में आँसू क्यों आए? उस समय प्रभु सोच रहे हैं कि ‘कान में कीलें ठोंकने वाला मेरा मित्र है, मेरा उपकारी है।’
ये हमारे प्रभु! और प्रभु का शासन हमें मिला है। तो ये हमारे प्रभु थे, जिन्होंने सोचा कि ‘मेरे कान में कीलें ठोंकने वाला मेरा मित्र है, मेरा उपकारी है। मैंने जो कर्म बाँधे हैं, उन सब कर्मों को मुझे क्षीण करना है। तो ये मेरा मित्र, मेरा उपकारी, मेरे कर्मों को दूर कर रहा है। लेकिन इस समय ये मेरा मित्र अशुभ विचारों में है, द्वेष के विचारों में है। इन विचारों के कारण ये दुर्गति में जाएगा? मेरा मित्र, मेरा उपकारी, और वह दुर्गति में जाएगा?’ इस सोच ने प्रभु की आँखों में आँसू ला दिए।
तो प्रभु की आँखें कोमल-कोमल होती है। हृदय का पूरा प्रतिनिधित्व हमारी आँखें करती हैं। प्रभु का हृदय अत्यंत कोमल है। उस कोमलता का दर्शन हम प्रभु की आँखों में कर सकते हैं। इसलिए कहा, स्तवना में: “आँखड़ी अंबुज पाँखड़ी” प्रभु की आँखें कैसी हैं? कमल की पंखुड़ी जैसी। कमल की पंखुड़ी जितनी कोमल होती है, उससे भी ज्यादा कोमल प्रभु की आँखें हैं।
उपाध्याय यशोविजय महाराज ने अभिनंदन प्रभु की स्तवना के अंत में एक सुंदर प्रार्थना की है। उन्होंने प्रभु की आँखों को देखा, और फिर प्रार्थना की: “तेरे नयन की मेरे नयन में, जस कहे दियो छवि अवतारी।” प्रभु! मुझे दूसरा कुछ भी नहीं चाहिए। तेरी आँखों में जो कोमलता है, तेरी आँखों में संपूर्ण सृष्टि पर जो मैत्री भाव है, तेरी आँखों में पूर्ण जगत के प्रति जो अलिप्त दशा है, वो मुझे मिल जाए। प्रभु! बस उससे ज्यादा मुझे कुछ चाहिए नहीं। “तेरे नयन की मेरे नयन में, जस कहे दियो छवि अवतारी।”
हम रोज़ प्रभु के पास जाते हैं, क्या माँगते हैं? प्रभु के पास जाकर हम क्या माँगते हैं? प्रभु के अनंत गुण हैं। एक भी गुण हमारे जीवन में आ जाए, हमारा जीवन प्रसन्न बन जाए, आनंदमय बन जाए। “मुख दिठे सुख उपजे” इंद्रियां और मन जब प्रभु के साथ जुड़ जाते हैं, तब सुख ही सुख है। हमारी एक-एक इंद्रिय और हमारा मन प्रभु के साथ जुड़ जाए, इतना ही हमारा अवतार-कृत्य है।
कोई पूछे आपको कि “व्हाट्स योर लाइफ मिशन (What’s your life mission)?” तुम्हारा अवतार-कृत्य क्या है? लाइफ मिशन क्या है? तो कह देना कि ‘मेरी इंद्रियां और मेरा मन प्रभु के साथ जुड़ जाए, यही मेरा अवतार-कृत्य है।’
हम पर प्रभु का प्रेम कितना उतरा है! जब सोचते हैं हम, हमारी आँखें भर जाती हैं कि प्रभु के प्रेम ने हमारे जीवन को कैसे परिवर्तित कर दिया। जिन आँखों से अनंत काल में मैंने भी संसार को देखा था, प्रभु का प्रेम इस जन्म में इतना तो बरसा कि अब प्रभु के सिवा दूसरे किसी को देखने का मन नहीं होता।
मैंने एक बार प्रवचन में कहा था कि कलापूर्णसूरी दादा प्रवचन करते हैं। २००० श्रोता सामने बैठे हुए हैं। दादा का प्रवचन चल रहा है। श्रोताओं को लगेगा कि दादा हमारी ओर देख रहे हैं। लेकिन कलापूर्णसूरी भगवंत सिर्फ़ प्रभु को ही देख रहे हैं। उनके सामने न कोई श्रोता थे, न कोई सभा थी, न कोई व्यक्ति था। उनके सामने सिर्फ़ प्रभु थे। तो प्रभु के प्रेम ने हमारे जीवन को बदल दिया।
कबीर जी ने कहा: “जिन आँखिन में नवि रूप वस्यो, उन आँखिन से अब देखियो क्या?” जिन आँखों में प्रभु का रूप नहीं पड़ा, आँखों का क्या अर्थ रहा? जर्मन कवि रिल्के (Rilke) ने कहा, “पुट आउट माय आइज़, इफ़ दैट कैन सी यू।” (Put out my eyes, if that can see you)। प्रभु! मेरी आँखें तुम्हें देख सकें, तब तो मेरी आँखें सफल हैं। लेकिन यदि मेरी आँखों से मैं संसार को ही निहारता रहा हूँ, तो मेरी आँख हो या न हो, कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
तो इस जन्म में हमारा अवतार-कृत्य पहले नंबर का यह हुआ कि जिन आँखों से अनंत जन्मों में हमने संसार को देखा था, अब प्रभु को देख रहा है। सिर्फ़ प्रभु को। और मैं आपको देखूँगा ने, तो भी मैं प्रभु को ही देखता हूँ। तुम सब कौन हो? सिद्ध भगवंत हो, भविष्य के! “नमो सिद्धाणं।” तुम्हारी ओर मैं देखता हूँ, तो भी मैं तुम्हारे सिद्धत्व पर्याय को देखता हूँ। लेकिन ये बात प्रभु की कृपा के बिना, प्रभु के प्रेम के बिना, असंभव है। मेरी कोई सज्जता नहीं थी कि मैं इतना कर सकूँ। लेकिन जब प्रभु का प्रेम उतरता है, तब कोई बात इम्पॉसिबल (Impossible) रहती ही नहीं है। अशक्य रहती ही नहीं है। सब बातें शक्य हो जाती हैं। तुम पर भी प्रभु का प्रेम उतरा है। अब प्रभु को ही देखते हो या दूसरों को भी देखते हो? तो इसका अर्थ ये हुआ कि प्रभु का प्रेम तो तुम पर बरसा, लेकिन तुम झेल न पाए। अब प्रभु के सामने प्रार्थना बदल लेनी है। अब नहीं कहना है कि ‘प्रभु, तुम बरसो, तुम बरसो, तुम बरसो।’ अरे, तुम बरस ही रहे हो। लेकिन ‘मैं झेल सकूँ तुम्हारे वरदान को, ऐसी पात्रता मुझे दो।’
दूसरा अवतार-कृत्य: सिर्फ प्रभु के ही शब्द सुनने हैं। मीरा ने कहा था: “बोल माँ, बोल माँ, बोल माँ, राधा कृष्ण वीणा, बीजूँ बोल माँ।” कोई दूसरी बात कह रही थी, तो मीरा ने कह दिया, “नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, ऐसी बात तुम मत करो। बात करनी ही है, और मुझे सुनानी है, तो प्रभु की बात करो।”
तुम्हारे कान सिर्फ प्रभु की बातें सुनने के लिए हैं। कोई आदमी तुम्हारे पास आएगा, और शायद कह दे कि ‘फलाँ आदमी धर्म करता है, लेकिन भीतर से पोलम-पोल है।’ तुम्हारा रस बढ़ जाएगा। ‘अरे, क्या बात कर रहे हो? वो तो बहुत धर्मिष्ठ है!’ ‘अरे, क्या धर्मिष्ठ है? साले, इसके जीवन की बात करें तो निकम्मा आदमी है। इतने-इतने दोषों से भरा हुआ है।’ यदि तुम्हें दूसरों की निंदा में रस आता है, तो मानना कि अनगिनत जन्मों में जो अवस्था थी, वही अवस्था इस जन्म में भी है। मैं तो मानता हूँ कि यह जन्म पूरा का पूरा बदल जाना चाहिए। और बदलना है? I am ready. Are you ready? Are you ready? तैयार?
आज से एक प्रतिज्ञा कर लो। कोई भी व्यक्ति की निंदा कभी भी सुनने की नहीं। कोई बड़ा आदमी है, तुम छोटे हो। और बड़ा आदमी कहता है, “फलाँ आदमी ऐसा है, फलाँ आदमी ऐसा है।” तुम्हारी आँखों में आँसू आ जाएँगे। तुम बड़ों के चरणों में पड़कर कहेंगे, “साहब! मैंने प्रतिज्ञा ली है कि किसी की भी निंदा नहीं सुननी। आप मेरे पर कृपा करो, प्लीज (Please), किसी की भी बुराई की बात मेरे सामने न बोलो।”
मयणा सुंदरी शादी के दूसरे दिन श्रीपाल राजा को लेकर मंदिर जा रही है। उस समय अनाड़ी लोग कह रहे हैं, “देखा ये दृश्य? ये लड़की कल राजा को कह रही थी कि मेरे कर्म से मैं सुखी हूँ। देखो, इसके कर्म ने क्या किया? इसके धर्म ने क्या किया? इसके धर्म ने कोढ़ी वर को दे दिया!” मयणा सुंदरी गुरु के पास जाती है, सिसक-सिसक कर रोती है, और कहती है, “गुरुदेव! मयणा को कोई कुल-कलंकनी कहे, मयणा को कोई दिक्कत नहीं है। मैं प्रेम से सुनूँगी। लेकिन मेरे धर्म के प्रति, मेरे शासन के प्रति, मेरे महात्मा के प्रति कोई भी अंगुली उठाएगा, मैं सहन नहीं कर पाऊँगी।”
तो आपको ये करना है कि ये जो कान हैं, ये प्रभु की बातें सुनने के लिए ही हैं। प्रभु के शब्द… हमने दीक्षा ली है। हमारे पास कौन सा बल था दीक्षा लेने के लिए? कोई ज्ञानी पुरुष अभी नहीं है। अतींद्रिय ज्ञानी महापुरुष अभी कोई भी नहीं है। लेकिन प्रभु के शब्दों के बल पर हमने दीक्षा ली। प्रभु ने कहा है कि संसार बुरा है, संयम जीवन ही श्रेष्ठ है। प्रभु के शब्दों पर आधार रखकर हमने हमारा पूरा जीवन प्रभु के चरणों पर न्योछावर कर दिया। तो प्रभु के शब्दों की ये ताकत है। आपने मासक्षमण किया, किसके बल पर किया? प्रभु के बल पर किया। प्रभु के शब्दों के बल पर किया। मेरे प्रभु कहते हैं कि तपश्चर्या करनी चाहिए। तो प्रभु के शब्दों के बल पर आपने इतनी बड़ी तपश्चर्या कर दी। तो शब्द का एक बल है।
तो दूसरा हमारा अवतार-कृत्य क्या हुआ? कि कानों से हम प्रभु को ही सुनेंगे। निश्चित है? दूसरों को सुनना पड़े तो सुनेंगे। लेकिन कोई भी व्यक्ति किसी की निंदा करेगी, तो तुम नहीं सुनोगे। निश्चित है इतना? इतना नहीं? अब तो तैयार हो गए हो। अब ऐसा है न, शुरुआत से हम आए, तब से तो मासक्षमण के लिए आपको तैयार किया। आप सारी संख्या में तैयार भी हो गए। मासक्षमण का पारणा भी हो गया। अब हमें अभ्यंतर तप में दिखाना है। ये अभ्यंतर तप! प्रभु को ही निहारना है। प्रभु को ही सुनना है। और स्तवना करेंगे, स्तुति करेंगे, तो प्रभु की ही करेंगे।
स्तुति किसकी करेंगे? प्रभु की करेंगे। ये जो हमारा सिर है, हमारा जो मन है, हमारा हृदय है, कहाँ झुकेगा? प्रभु के चरणों पर झुकेगा। संतों के चरणों पर झुकेगा। क्यों? कि हमारे लिए आदर्श महापुरुष यही हैं।
एक सेठ के वहाँ रसोइया था। जो रसोइया था, वो रामानंदी महाराज का भक्त था। अपने भारत में बहुत सी परंपराएँ हैं। लेकिन हमारी हिंदू संस्कृति बहुत ही सुंदर है। संस्कृति एक ही है। उपासना की पद्धतियाँ अलग-अलग होती हैं। तो रसोइया रामानंदी महाराज का भक्त था। और सेठ जो थे, वो वैष्णव थे। अब वैष्णवी तिलक अलग होता है, रामानंदी तिलक अलग होता है। अब क्या होता है? दूसरों की जो श्रद्धा है, उसका सम्मान करना चाहिए। आखिर तो दोनों हिंदू ही। रामानंदी महाराज का भक्त भी हिंदू है। वैष्णव भक्त भी हिंदू ही है। दोनों हिंदू हैं। उपासना की पद्धति अलग है, तो तिलक अलग होगा। लेकिन संस्कृति तो एक है। तो एक संस्कृति है, तो मन में दूसरों के प्रति विरोध नहीं होना चाहिए। इसलिए प्रभु ने हमें अनेकांतवाद दिया।
जैनों के पास जो उदारता है, शायद ही दूसरों के पास ऐसी उदारता होगी। मेरी सभा में स्थानकवासी उपासक भी बहुत आते हैं। और महाराष्ट्र में तो मैंने देखा, कोई ‘वासी’ है नहीं, सब फ्रेश (Fresh) हैं, ताज़े हैं सब। न कोई स्थानकवासी है, न कोई देरावासी है। वासी कोई नहीं है। सब फ्रेश हैं। तो स्थानकवासी मित्रों से मैं बहुत बार कहता हूँ कि “यू आर ऑल्सो राइट (You are also right)। तुम भी सच्चे हो, अपेक्षा से।” क्यों? कि तुमने अनालंबन का मार्ग लिया। दो मार्ग हैं: आलंबन और अनालंबन। प्रभु की मूर्ति और प्रभु के शब्द, उसका आलंबन लेकर तुम ऊपर चढ़ो, तो आलंबन मार्ग है। जब तुम आँख बंद करते हो और प्रभु की वीतराग दशा तुम्हारे स्मृति पथ में आती है, तब बाहर जिनालय की आवश्यकता न रही। तुम्हारे भीतर ही जिनालय है, तुम्हारे भीतर ही परमात्मा है। तो फिर आलंबन की आवश्यकता न रही, अनालंबन आ गया। तो मैं स्थानकवासी मित्रों से कहता हूँ कि तुम भी राइट हो। यू आर ऑल्सो राइट। क्यों? कि अनालंबन का मार्ग है।
लेकिन बात क्या होती है? कि आलंबन परिपक्व हो जाए, फिर अनालंबन का मार्ग आना चाहिए। लेकिन केजी (KG) में पढ़ता हुआ बच्चा एसएससी (SSC) के वर्ग में जा नहीं सकता। ऐसे आप भी आलंबन को दृढ़ करो, फिर अनालंबन में जाओ। हमें भी अनालंबन में जाना ही है। ऐसे बौद्धों से हम कहते हैं कि यू आर ऑल्सो राइट। तुम मानते हो सब क्षणिक है, तो पर्याय तो क्षणिक ही है। द्रव्य ही नित्य है। तो हम कथंचित पर्यायवादी भी हैं, तो तुम्हारी बात भी सच्ची है। तो हमें कहीं भी विरोध नहीं है। अपेक्षा से तुम सच्चे हो।
अब सेठ जो थे, वे इतने उदार नहीं थे। संकुचित मानस की वृत्ति कहते हैं। तो सेठ ने सोचा, ‘मेरा रसोइया मेरे वहाँ काम करता है। मैं उसको हर मास सैलरी (Salary) देता हूँ। और वह तिलक अन्य तरीके से करता है, यह तो कैसे चलता है?’ तो रसोइया को बुलाया। “यहाँ आओ। तुम्हें नौकरी पर रहना है?” नौकरी बहुत अच्छी। सेठ-सेठानी दो ही। काम बहुत थोड़ा। सैलरी उस समय महीने २०००। कल्पना से भी ज्यादा। तो सेठ ने पूछा, “नौकरी करनी है?” तो कहे, “हाँ जी, करनी है।” “तो नौकरी करनी है, तो कल से ये तुम्हारा वाला तिलक नहीं चलेगा। मैंने मेरे कपाल में जैसा तिलक किया है, वैष्णवी तिलक, वैसा तिलक करके आओ। या तो नौकरी को छोड़ दो, या तो तिलक को छोड़ दो।”
रसोइया शाम को घर गया। पूरी रात नींद नहीं आई। ‘धर्म को हम कैसे छोड़ें? क्या पैसे के लिए, पेट के लिए धर्म को छोड़ा जाता है?’ लेकिन रसोइया सोचता है कि ‘कुटुंब देश में है। हर मास पैसे मूकने (भेजने) ही पड़ते हैं घर पर। यहाँ तो ठीक है, मैं भोजन सेठ के वहाँ ही कर लेता हूँ। लेकिन मेरे परिवार का क्या? और ये नौकरी मैं छोड़ दूँगा, तो दूसरी नौकरी मिलने वाली है नहीं। क्यों? कि ऐसे सेठ ने जिसे छोड़ दिया है, वो अच्छा आदमी नहीं होगा, ऐसी मेरी छाप लग जाएगी।’ पूरी रात नींद नहीं आई।
सुबह उठा। लेकिन आखिर तो धर्म का ही विजय होगा। उसने सोचा कि ‘नहीं, तिलक को तो मैं कैसे बदल सकता हूँ? सवाल ही नहीं!’ स्नान किया और ठाठ से अपना रामानंदी तिलक ही किया। समझता है कि ‘जब सेठ के घर पर जाऊँगा और सेठ देखेंगे, तुरंत ही नौकरी से छुट्टी मिल जाएगी। लेकिन छुट्टी मिली तो मिली, धर्म को नहीं छोड़ना है।’ शान से तिलक लगाया। और गया सेठ के वहाँ।
अब सेठ तो समझते थे कि तिलक बदलकर ही आएगा आदमी। ‘मैंने पूरी नोटिस (Notice) दे दी है।’ लेकिन जब रसोइया आया, सेठ को प्रणाम किया। सेठ ने उसके कपाल पर देखा। तिलक तो वही का वही है, रामानंदी तिलक! और सेठ बिगड़े। “क्यों? कल ही मैंने कहा था, या तो तिलक बदलो या नौकरी बदलो। नौकरी से डिस्मिस (Dismiss) होना है?”
तब उस रसोइया ने शर्ट (Shirt) को ऊँचा किया। पैंट और शर्ट पहनकर आया था, शर्ट को ऊँचा किया। अपना पेट दिखाया। पेट पर वैष्णवी तिलक किया था! और बड़ा तिलक! सेठ जो करते थे, उससे भी बड़ा। और कहा, “सेठ! इस पेट के लिए तुम्हारे वहाँ नौकरी करता हूँ, तो पेट पर इससे भी बड़ा तिलक, वैष्णवी तिलक करूँगा। लेकिन ये सिर तो रामानंदी महाराज को दे दिया है, उसमें कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं!”
ये क्या था? अपने धर्म के लिए, अपनी संस्कृति के लिए प्राण देने की तैयारी। इसलिए तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा: “प्राण जाए पर वचन न जाए।” प्राण जाए तो भले जाए, कोई चिंता नहीं। लेकिन हमारा वचन न जाए, हमारा धर्म न जाए, हमारा सत्य न जाए।
तो स्तवना प्रभु की हम करेंगे। गुणगान किसका गाएंगे? किसका गाएंगे? प्रभु का। कि पैसे वाले का? प्रभु ने हमें तो कितना अच्छा मार्ग दिया है। मैं तो बार-बार कहता हूँ कि मेरी सभा में जो भी आए, जब आओ, पीछे बैठ जाओ। तुम करोड़पति हो तो तुम्हारे घर के। हमें क्या काम है तुम्हारे करोड़पति से? तुम अरबपति हो तो तुम्हारे घर के। बैठ जाओ पीछे। आगे आने की कोशिश नहीं करना। ये धर्म सभा है। यहाँ मूल्य धर्म का है, पैसे का नहीं। यहाँ आगे कौन बैठेगा? सामायिक वाले बैठेंगे। महात्मा तो बैठते ही हैं। सामायिक वाले आगे बैठेंगे। पैसे वाले पीछे बैठेंगे। तो मैं तो स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि ये प्रभु की सभा है। और प्रभु की सभा में पैसे वालों का कोई महत्व नहीं।
तुम पैसे को त्यागते हो, तब त्याग का महत्व है। पैसे का नहीं, याद रखना। तुमने संघ निकाला, पाँच करोड़ रुपये खर्च डाले, तो हम कहेंगे कि तुमने अच्छा सुकृत किया। लेकिन हमारा एक वाक्य सुनने के लिए पाँच करोड़ खर्चने की तैयारी तुम्हारी चाहिए। ऐसे तो हम कहेंगे नहीं, “तुम्हारा बंगला बहुत अच्छा है।”
पाटण में ऐसा हुआ था। शांतनु मंत्री ने उस समय ८४ लाख सुवर्ण मुद्रा का व्यय करके बंगला बनाया था। पाटण में ऐसा बंगला किसी का भी नहीं था। वास्तु पूजा के समय आचार्य भगवंत की पधरामणी हुई। आचार्य भगवंत पधारे, प्रवचन दिया। अब शांतनु मंत्री की इच्छा कि ‘इतने बड़े आचार्य भगवंत आए और इतनी बड़ी सभा है, तो मेरे बंगले के लिए आचार्य भगवंत दो शब्द बोलें। कि वाह, बहुत बंगले में पगलीये है, लेकिन ऐसा बंगला नहीं देखा।’ लेकिन आचार्य भगवंत को तो कैसे कहें? एक छोटे मुनिराज से कहा कि, “ज़रा भगवंत को कहो, ऐसा बंगला साहेब ने भी कभी नहीं देखा होगा। तो साहेब दो शब्द बोलें मेरे बंगले के लिए।”
छोटे महाराज ने कहा, “ये तो जिन शासन के आचार्य हैं, तुम्हारे बंगले की प्रशंसा करेंगे? कि तुम्हारे बंगले में क्या होगा? संसार की क्रियाएँ होंगी। विराधना होगी। पाप होगा। तो इसकी अनुमोदना आचार्य भगवंत करेंगे?” तब शांतनु मंत्री ने पूछा, “कोई रास्ता है?” छोटे महाराज ने कहा, “एक रास्ता है। तुम अभी-अभी उद्घोषणा कर दो कि ये बंगला मैंने मेरे लिए बनवाया था, लेकिन अब मैं संघ को आराधना भवन के लिए समर्पित कर रहा हूँ। तब आचार्य भगवंत बोलेंगे।”
आचार्य भगवंत के दो शब्द सुनने के लिए मंत्री खड़े हो गए। ८४ लाख सुवर्ण मुद्रा से बना हुआ महल! एक मिनट विचार नहीं किया। नहीं कोई बच्चों को पूछने का था। तुरंत जाहिरात कर दी— “ये मेरा बंगला श्री संघ को मैं समर्पित कर रहा हूँ। संघ आराधना भवन के रूप में उसका उपयोग करे।” तब आचार्य भगवंत ने कहा, “तुमने बहुत सुंदर काम किया।” हमारे दो शब्द सुनने हैं तो इतना खर्च? हम तुम्हारी संपत्ति का कभी भी वर्णन नहीं करेंगे। लेकिन संपत्ति का त्याग तुम करोगे, तो त्याग की महिमा हम गाएँगे। तो ये जो रसनेन्द्रिय हमें मिली है, ये इसलिए मिली है कि प्रभु का गुणगान हम करें।
