दिव्यं ददामि ते चक्षु:
वैसे तो रोज़ प्रभु के दर्शन के लिए हम जाते हैं, लेकिन प्रभु का वास्तविक दर्शन केवल सद्गुरु ही हमें करा सकते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा : दिव्यं ददामि ते चक्षु: – मैं तुझे दिव्य नेत्र देता हूँ, जिस के द्वारा तु प्रभु का दर्शन कर सकेगा। सद्गुरु हमारे तीसरे नेत्र को खोल देते हैं। और जब तीसरा नेत्र खुलता है, तभी प्रभु का वास्तविक दर्शन शुरू होता है।
दर्शन के लिए बहोत विधियाँ हैं, बहोत माध्यम हैं। शब्द भी माध्यम है, शब्द शक्तिपात भी माध्यम है। दोनों में फर्क है। आप प्रवचन सुनते हैं तब सद्गुरु के शब्दों को आप सुनते हैं, लेकिन यह केवल शब्दों का संपर्क हुआ; शब्द शक्तिपात न हुआ। शक्तिपात लेने के लिए सज्जता है – सद्गुरु पर अत्यंत बहुमान। तो सद्गुरु पहले तुम्हें शब्दों के माध्यम से शक्तिपात के लिए तैयार करते हैं। जब तुम तैयार हो जाते हो, शक्तिपात कर देते हैं!
अभी तक बहुत सद्गुरुओं को आपने सुना, लेकिन सद्गुरु के शब्द ही आपने सुने। जो भी सद्गुरु आए थे आपके वहाँ, वे सभी शक्तिपात कर सकते थे। लेकिन आप शक्तिपात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए सद्गुरु शक्तिपात नहीं कर पाए। लेकिन मैं बिना शक्तिपात किए जाने वाला नहीं हूँ! मैंने निश्चित कर लिया है कि शक्तिपात करना ही है। सिर्फ दो या तीन शब्द… लेकिन शक्तिपात के रूप में आप को मिल गए, काम हो गया!
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित ‘स्तवन चौबीसी’। पहला स्तवन, प्रथम पंक्ति—
“जग जीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”
कैसे प्रभु हमें मिले है! रोज़ प्रभु के दर्शन के लिए हम जाते हैं, लेकिन प्रभु का दर्शन सिर्फ सद्गुरु ही करा सकते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा— “दिव्यं ददामि ते चक्षु:” (ददामि दिव्यं चक्षुस्ते)। मैं तुझे दिव्य नेत्र देता हूँ, जिस नेत्र के द्वारा तू प्रभु का दर्शन कर सकेगा। सद्गुरु हमारे तीसरे नेत्र को खोल देते हैं, और जब तीसरा नेत्र खुल गया, प्रभु का दर्शन शुरू हुआ। तो जब तक सद्गुरु के चरणों में हम बैठते नहीं, तब तक प्रभु का वास्तविक दर्शन प्राप्य नहीं हो सकता। तो आज हम महोपाध्यायजी के चरणों में बैठे हैं कि “गुरुदेव कृपा करो और भगवत्-दर्शन आप कराओ। आपके मार्गदर्शन बिना, आपके शक्तिपात के बिना हम प्रभु का दर्शन नहीं कर पाएंगे।”
तो महोपाध्यायजी प्रभु का दर्शन हमें करा रहे हैं, शब्दों के माध्यम से। दर्शन के लिए बहोत विधियां हैं, बहोत माध्यम हैं। शब्द भी माध्यम है, शब्द शक्तिपात ये भी माध्यम है। शब्द और शब्द शक्तिपात, दोनों में फर्क है। आप प्रवचन सुनते हैं, सद्गुरु के शब्दों को आप सुनते हैं, लेकिन ये शब्दों का संपर्क हुआ, शब्द शक्तिपात नहीं हुआ। शक्तिपात कब होता है? सद्गुरु को पहले तुम्हें तैयार करने होता है। जब तक तुम तैयार नहीं होते, तब तक शब्द ही दिए जाते हैं, शब्द शक्तिपात नहीं।
अभी तक बहुत सद्गुरु को आपने सुना, लेकिन सद्गुरु के शब्द ही आपने सुने। जो भी सद्गुरु आए थे आपके वहाँ, वे सभी सद्गुरु शक्तिपात कर सकते थे। लेकिन आप शक्तिपात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए सद्गुरु शक्तिपात नहीं कर सके। लेकिन मैं बिना शक्तिपात किए जाने वाला नहीं हूँ। मैंने निश्चित कर लिया है कि शक्तिपात करना ही है। दो या तीन शब्द… लेकिन शक्तिपात के रूप में मिल गए, काम हो गया।
एक कहानी अपनी परंपरा में आती है। एक गुरुदेव एसे शहर में, एक बड़े उपाश्रय में स्थिर-वास थे। पैरों की तकलीफ थी, चल नहीं सकते थे, तो स्थिर-वास उपाश्रय में थे। लेकिन प्रभु की आज्ञा पर इतना आदर था, गहरा आदर, कि ‘शेष काल में एक महीना पूरा हो गया, रूम को बदल देंगे। मैं विहार नहीं कर सकता हूँ, लेकिन प्रभु की आज्ञा का पालन तो मुझे करना ही है।’ तो आठ मास में, हर महीने पर रूम को बदल देते थे और ऐसे प्रभु की आज्ञा का पालन करते थे। शिष्य भी बहुत थे, मुमुक्षु भी गुरु के पास बहुत आते थे।
एक दिन, एक मुमुक्षु गुरु के पास आया, बिल्कुल कोरी स्लेट! मुझे भी कोरी स्लेट बहुत पसंद है। तुम निश्चित करके आओ ‘गुरु के पास जाना है, गुरु ये पढ़ाएंगे, गुरु ये करेंगे!’ तुम क्यों निश्चित करके आते हो? कोरी स्लेट होकर आओ, कोई तुम्हारी इच्छा नहीं। टोटल चॉइसलेस (Total choiceless) होकर आओ। गुरु को जो भी करना है, गुरु कर देंगे। अब डॉक्टर के पास तुम जाओगे, तो क्या निश्चित करके जाओगे कि ‘डॉक्टर ऑपरेशन ही करेंगे, डॉक्टर को ऑपरेशन करना ही चाहिए’? डॉक्टर ने कहा, ‘ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं है।’ “नहीं साहेब! ऑपरेशन करो ही!” तो एक मुमुक्षु ऐसा आया— टोटल चॉइसलेस, बिल्कुल कोरी स्लेट! “गुरुदेव, आपको जो भी करना हो, सो करो। मेरी ओर से कोई इच्छा नहीं है।” फिर हमे मज़ा आता है। हम हमारे ढंग से काम कर सकते हैं।
गुरु ने उससे कहा कि, “तुझे सुबह-शाम प्रतिक्रमण करने का है, दो प्रतिक्रमण सूत्र का अभ्यास करने का है। और प्रभु पूजा, एक सामायिक करने की। दूसरा जितना भी समय मिले, बड़ा उपाश्रय ये है, उसको साफ़ करना।” जितना भी समय मिले, तुम्हारा काम एक ही— उपाश्रय को साफ़ करो। “तहत्ति!” दो प्रतिक्रमण के सूत्र पढ़ रहा है वो। प्रतिक्रमण, सामायिक, पूजा कर रहा है और आठ से दस घंटे तक उपाश्रय को साफ़ कर रहा है। एक मास हुआ, दो मास हुए, तीन मास हुए। दो प्रतिक्रमण सूत्र पूरे हुए। “साहेबजी! अब क्या करना है?” “अब पाँच प्रतिक्रमण सूत्र पढ़ लो।” इसके बाद जो न्यू कमर्स (New comers) आए, उनको गुरु पंचसूत्र पढ़ाते थे, ज्ञानसार पढ़ाते थे।
इस मुमुक्षु को एक भी क्लास में बैठने का गुरु ने नहीं कहा। सोचो तो, तुम हो तो क्या होगा? “मुझे तो गुरु पढ़ाते ही नहीं! मेरे बाद में आए, उनको गुरु पढ़ाते हैं, और मुझे नहीं पढ़ाते हैं। क्या मैं ज्ञानसार नहीं पढ़ सकता हूँ? मैं पंचसूत्र के क्लास में नहीं बैठ सकता हूँ? तो मेरे लिए उपाश्रय साफ़ करने का काम और दूसरों के लिए पढ़ने का काम?” कोई विचार इसके मन में नहीं! ‘Guru is the supreme boss’ सद्गुरु जो कह रहे हैं, वही मुझे करना है।’
डॉक्टर कहे, वैसा तो आप करते हो। लेकिन गुरु जब कुछ कहेंगे, तब बुद्धि बीच में आएगी। डॉक्टर, बड़े डॉक्टर, राउंड (Round) में घूमते। एक पेशेंट (Patient) है, बिल्कुल स्वस्थ हो रहा है। इसके बेड (Bed) के पास एक मिनट डॉक्टर रुकेंगे, पूछेंगे, “कैसे हो अंकल, मज़ा में? चलो, बाय-बाय (Bye-bye)।” पास के बिस्तर में क्रिटिकल पेशेंट (Critical Patient) है, डॉक्टर आधा घंटा वहाँ रुकेंगे। उस पेशेंट को क्या होगा कि ‘डॉक्टर भी पक्षपाती ही है ना! मेरे पास एक मिनट रुके और इसके पास आधा घंटा रुके!’ वहाँ नहीं होता, यहाँ होगा! “गुरुदेव ने इसको तो एक घंटा दिया, और मैं गया तो पाँच मिनट में पता दिया!” डॉक्टर ये देख रहे हैं कि पेशेंट के लिए कितने समय की आवश्यकता है। जितनी आवश्यकता है, उतना समय वे रुकते हैं। तो डॉक्टर पर आप श्रद्धा रख सकते हैं, सद्गुरु पर नहीं रख सकते हैं। बरोबर? डॉक्टर पर जितनी श्रद्धा है, उतनी श्रद्धा प्रभु पर, सद्गुरु पर आपकी है?
एक बात मैं आपसे कहूँगा, बहुत मार्के की बात है। प्रभु का शासन पहली बार इस जन्म में हमें मिला है? नहीं। अनगिनत जन्मों में कितनी ही बार प्रभु का शासन हमें मिला है। प्रभु की साधना अनगिनत जन्मों में हमें मिली है। दीक्षा इस जन्म में तुमने नहीं ली है, लेने की है! ली नहीं है, लेकिन अतीत की यात्रा में आपने दीक्षा भी ली है। तो एक प्रश्न आपके मन में आता है कि, ‘प्रभु की साधना मिली, प्रभु का ये श्रामण्य मिला, फिर भी संसार चालू क्यों रहा? मैं भी संसार में घूम रहा हूँ, क्यों? शासन प्रभु का मिला, साधना प्रभु की मिली, ये श्रामण्य प्रभु का मिला, फिर भी संसार चालू कैसे रहा? क्या कम रहा? कहाँ हम चूके? व्हेयर वॉज़ आवर फॉल्ट? (Where was our fault?)’
हम चूके वहाँ, कि हमारा समर्पण नहीं था। साधना की, लेकिन अपनी इच्छा से की। सद्गुरु-दत्त साधना आपके पास नहीं थी। आप केमिस्ट हो, बड़ा मेडिकल स्टोर आपका है। आप बीमार हुए, तो क्या ऐसे ही दवाई खा लोगे? और ऐसे ही दवाई लोगे, तो अस्पताल में एडमिट (Admit) करना पड़ेगा आपको। डॉक्टर प्रिस्क्राइब (Prescribe) करे, वही दवा आप ले सकते हो। साधना में भी यही बात है। गुरु आपको जो सूचित करें, वही साधना आपको करनी है।
किसी के मन में राग ज़्यादा है, तो गुरु ऐसी मेडिसिन्स (Medicines) देंगे कि राग कम हो जाए। किसी के मन में गुस्सा बहुत आता है, तो गुरु ऐसी दवाई देंगे कि इसका गुस्सा कम हो जाए। तो सर्दी वालों को सर्दी के लिए दवाई चाहिए, गर्मी वालों को गर्मी के लिए दवाई चाहिए। एक ही दवाई सबके लिए चलती नहीं है। ऐसे ही हमने यह अपराध किया कि सद्गुरु को हम समर्पित ना हुए। हमने हमारी इच्छा के मुताबिक साधना करी। एक समर्पण के बिना, हमारी साधना निष्फल हो गई। और एक समर्पण सद्गुरु के प्रति हमारा हो जाए, हमारी नन्ही सी साधना भी सफल हो जाए।
शास्त्रों ने कहा— “गुरु की आज्ञा से तुम नवकारशी का तप करो, तो भी धर्म है। और गुरु की आज्ञा के बिना मासक्षमण का तप तुम करो, तो भी अधर्म है।” तुम्हारी इच्छा से तुम साधना नहीं कर सकते। समर्पण होना ही चाहिए। सद्गुरु को पूछना है, “गुरुदेव, मैं क्या करूँ?” आप रोज़ सुबह आते हैं ना, साधना को लेने के लिए आते हैं— “गुरुदेव, मेरी साधना आज के लिए क्या होनी चाहिए?” एक समर्पण। आप जीत गए।
वो मुमुक्षु गुरु के पास, पंच-प्रतिक्रमण हो गया। “अब कुछ नहीं, अब उपाश्रय साफ़ करो।” एक बरस, दो बरस, तीन बरस, चौदह साल हुए! आप होते तो क्या होता? “वो कहाँ गया पुणे वाला?” “अरे साहेब, ये तो रहता है? ये तो पढ़ने के लिए आया था, आपने कहा उपाश्रय साफ़ करो, तो वो कोई रहने वाला था? वो तो गया!” चौदह साल हो गए!
एक दिन गुरु के पास आया। रोज़ के मुताबिक वंदन किया। तब गुरु ने पूछा, “मेरे पास तू कब आया था? कितने साल हुए?” तब उसने कहा, “गुरुदेव! चौदह साल हुए।” “अच्छा, चौदह साल हुए, तूने क्या किया?” “गुरुदेव! आपने जो फरमाया वो। आपने कहा उपाश्रय साफ़ करो, तो उपाश्रय साफ़ किया। उपाश्रय में कहीं भी कचरा न हो, इसका ध्यान मैंने रखा।” उस समय सद्गुरु शक्तिपात करते हैं और कहते हैं, “जा, तेरा सब कचरा आज निकल गया!” चौदह वर्षों में नहीं, चौदह जन्मों में नहीं, चौदह सौ जन्मों में भी जो कचरा न निकले, वो राग, द्वेष, अहंकार का कचरा, गुरु ने एक वाक्य के शक्तिपात से निकाल दिया— “जा, तेरा कचरा निकल गया!”
अब आपको एक प्रश्न होगा कि गुरु को शक्तिपात करना था, तो चौदह साल क्यों लिए? चौदह साल क्यों लिए? चौदह साल इसलिए थे कि मुमुक्षु को शक्तिपात लेने के लिए सज्ज होना था। तो शक्तिपात लेने के लिए सज्जता क्या है? ‘सद्गुरु पर अत्यंत बहुमान।’ अत्यंत बहुमान! अब ऐसी परिस्थिति में, सद्गुरु पर बहुमान भाव टिक सकता है? ‘एक वर्ष हो, तुम कुछ पढ़ाओ भी नहीं, खाली कह दो उपाश्रय साफ़ करो! दूसरा वर्ष हुआ… साहेबजी, क्या करूँ? कुछ पढ़नेका? नहीं, पढ़ना कुछ नहीं है, उपाश्रय साफ़ करो!’
चौदह साल तक उपाश्रय को साफ़ कराया! उपाश्रय को नहीं साफ़ कराया, मुमुक्षु को शक्तिपात लेने के लिए सज्ज बनाया। अब ऐसी परिस्थिति में गुरु पर बहुमान भाव पड़े, ये सामान्य व्यक्ति के लिए शक्य नहीं। ‘तुम दूसरों को पढ़ाते हो, मुझे नहीं पढ़ाते हो, क्यों? मैं बुद्धिहीन हूँ, मेरी कोई शक्ति नहीं है, क्यों मुझे नहीं पढ़ाते हो?’ ये बुद्धि आती है। उस मुमुक्षु के पास बुद्धि ही नहीं थी। बुद्धि को गुरु-चरण में डाल दी थी। बुद्धि ही नहीं थी। ‘मुझे कुछ सोचने का होता ही नहीं है, गुरु सोच रहे हैं।’ और उपाश्रय को साफ़ करने का काम, कैसा काम है? कोई आनंद भरा काम तो है नहीं। लेकिन उसमें भी रोज़ गुरु प्रति बहुमान भाव बढ़ता जाता है। ‘वाह! क्या गुरुदेव ने काम दिया है। गुरुदेव ने क्या सेवा का काम दिया है कि सब भक्त गुरु के पास आते हैं, सबकी चरण-रज मुझे मिलती है! सबकी चरण-रज का स्पर्श मुझे होता है! मैं कितना बड़भागी हूँ!’ चौदह साल में वो गुरु के प्रति बहुमान भाव के एक्सट्रीम पॉइंट (Extreme point) पर पहुँच गया, पीक एक्सपीरियंस (Peak experience) पर। गुरुदेव देख रहे थे। और जिस दिन वह बहुमान भाव के शिखर पर पहुँच गया, उसी दिन गुरु ने शक्तिपात कर दिया।
तो मैंने भी निश्चित किया है कि मुझे शक्तिपात करना है। आपको स्वीकारना है कि नहीं स्वीकारना है, ये मुझे देखना ही नहीं है। मैं कुशल गुरु हूँ! आपको तैयार नहीं होना है, तो भी मैं तैयार कर दूँगा। और शक्तिपात करूँगा ही! तो परमात्मा के प्रति एक सम्मोहन हो जाए। ऐसा सम्मोहन कि हमारा पूरा व्यक्तित्व, परममय अस्तित्व में बदल जाए।
दो शब्द हैं— व्यक्तित्व और अस्तित्व। व्यक्तित्व में तुम अकेले होते हो। और अस्तित्व में तुम परम संघटना के साथ एकाकार होते हो। अब तक हम व्यक्ति के रूप में रहे, अकेले रहे। अब व्यक्तित्व को तोड़-फोड़ कर, अस्तित्व के संसार में हमें जाना है। परमात्मा के प्रति हमारा सम्मोहन इतना बढ़ जाए, इतना बढ़ जाए, इतना बढ़ जाए कि हमारा ‘अहं’ रहे ही नहीं। हम रहे ही नहीं, तो व्यक्तित्व, अस्तित्व में बदल गया। हमारा ‘मैं’ जब तक हैं, तब तक तुम व्यक्ति हो। जब ‘मैं’ गया, तुम अस्तित्व की धारा में आए।
रामकृष्ण परमहंस, हमारे युग के बड़े हिंदू गुरु हो गए। उनको गले का कैंसर हुआ। रामकृष्ण व्यक्ति नहीं थे, अस्तित्व के धणी थे। परम चेतना के साथ वे एकाकार हो गए। अब गले का कैंसर हुआ, डिटैच (Detach) भी हो गया। गुरु को कोई चिंता नहीं है। “कैंसर हुआ तो भी क्या, न हुआ तो भी क्या? क्या फर्क पड़ता है?” भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा— ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय…’ मृत्यु का अर्थ क्या है? वस्त्र पुराने हो गए हैं, फेंक दो, नया वस्त्र पहन लो। शरीर साधना के लिए अब सक्षम नहीं है, तो शरीर को बदल दो, नया शरीर ले लो। नया जीवन। वस्त्र बदल लिया, ऐसे शरीर बदल लो। तो रामकृष्ण परमहंस के लिए मृत्यु का दूसरा कोई अर्थ था ही नहीं— ‘वस्त्र का परिवर्तन।’
लेकिन शिष्यों के लिए गुरु का होना महत्वपूर्ण था। सद्गुरु की बॉडी (Body) से जो ऊर्जा निकलती है, वो ऊर्जा हमें प्यूरिफाई (Purify) बनाती है। पहली बार जब ब्रिटिशर्स (Britishers) भारत में आए, तब उन्हें एक दृश्य को देख कर आश्चर्य हुआ। दृश्य क्या था? कोई बड़े संत होते हैं, हज़ारों लोग चरण स्पर्श के लिए लाइन में खड़े हैं। गुरु के पास आए, आधा सेकंड भी नहीं हुआ, और पास वाले लोग कहते हैं— “चलो आगे, चलो आगे, चलो आगे!” तो ब्रिटिशरों को हुआ कि, ‘ये भारतीय लोग क्या कर रहे हैं? गुरु उपदेश देते हैं, तो ठीक है, हम सुन लें। गुरु के पास जाने के लिए दो घंटे धूप में रहने का, और गुरु के पास गए, आधा सेकंड भी नहीं हुआ… चलो आगे, चलो आगे! तो ये क्या कर रहे हैं?’ फिर भारत में वे लोग रहे, सद्गुरुओं के पास गए, तब उन्हें मालूम हुआ कि ये सब तो सद्गुरु की ऊर्जा को लेते हैं। सद्गुरु के पास जाते हैं, आधा सेकंड भी खड़ा रहते हैं, सद्गुरु की बॉडी से जो ऊर्जा निकलती थी, उस ऊर्जा का स्पर्श होता था। और आधे सेकंड के लिए भी गुरु की ऊर्जा का जो स्पर्श हुआ, वो स्पर्श व्यक्ति को बदल डालता था। प्यूरिफाई कर देता है, निर्मल बना देता है।
तो शिष्यों के लिए गुरु का होना महत्वपूर्ण था। तो एक दिन शिष्यों ने गुरु के चरणों में प्रार्थना की कि, “गुरुदेव! आप तो बड़े परमात्मा के भक्त हो। आप जो भी प्रार्थना करते हैं, वो सक्सेस (Success) ही होती है। तो आपके लिए आपके शरीर का कोई महत्व नहीं है, लेकिन हमारे लिए आपके शरीर का महत्व है। तो आप प्रभु से प्रार्थना करो कि आपका कैंसर मिट जाए।” गुरु ने सुना। गुरु तो प्रेम के अवतार होते हैं। प्रेम से सुन लिया, मंद-मंद स्मित कर लिया। दो दिन के बाद शिष्यों ने फिर से गुरु से पूछा कि, “आपने प्रभु से प्रार्थना की कि नहीं की?” गुरु फिर स्मित करते हैं। फिर तीन दिन बाद पूछा कि, “गुरुदेव, आपने हमारे लिए प्रभु से प्रार्थना की कि नहीं की? आपके लिए आपका शरीर हो या न हो, कोई महत्व नहीं रखता, लेकिन हमारे लिए आपका होना बहुत ही महत्वपूर्ण है। तो आपने प्रभु से प्रार्थना की कि नहीं की?” गुरु फिर हँसे। “शिष्य भी बालक जैसे होते हैं!”
“नहीं गुरुदेव! ऐसे हँसने से काम नहीं चलेगा। आप स्पष्ट जवाब दो कि आपने प्रभु से प्रार्थना की या नहीं की?” तब रामकृष्ण परमहंस ने कहा कि, “मेरा मन प्रभु-मय है। मेरा अस्तित्व प्रभु-मय है। उस अस्तित्व को, उस मन को, प्रभु से उठा कर मेरे शरीर पर कैसे मैं फोकस करूँ? मेरी भी एक समस्या है। जैसी तुम्हारी समस्या है, वैसी मेरी भी समस्या है कि मेरा अस्तित्व प्रभु-मय ही हो गया है। चौबीस घंटो प्रभु के सिवा कोई विचार ही नहीं आता है। तो शरीर का विचार मैं लाऊँ तो कैसे लाऊँ? मुझे सूझता नहीं। तुम्हारी इच्छा है, तो मैं प्रार्थना भी कर लूँ। न करूँ, ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता है कि मेरा अस्तित्व, जो प्रभु में पूरेपूरा डूब गया है, उस अस्तित्व को वहाँ से खींच कर शरीर पर मैं कैसे फोकस करूँ!”
ऐसी घटना घटित हो सकती है, और इस जन्म में घटित हो सकती है। अब हमें आगे वर्कशॉप (Workshop) के रूप में काम करना है। आपका प्लानिंग (Planning) क्या होना चाहिए, ये भी हम निश्चित करेंगे और प्लानिंग के मुताबिक हम चलेंगे। संसार में तो प्लानिंग निश्चित है? निश्चित है ना! निश्चित नहीं है। अभी बीस करोड़ का प्लानिंग है, लेकिन बीस करोड़ होंगे, तब पचास करोड़ का प्लानिंग होगा। प्लानिंग बदल जाएगा, बदल जाएगा ना?
आध्यात्मिक जगत में एक ऐसा प्लानिंग करना है कि ‘एक साल के बाद हम कहाँ होंगे? दो साल के बाद हम कहाँ होंगे?’ यदि आप निश्चित कर लो कि आपको मेरे साथ चलना है, तो मैं गारंटी के साथ आपको कह सकता हूँ कि दो बरस के बाद, पाँच बरस के बाद आपकी साधना कहाँ होगी। मैं मेरे लेटरहेड (Letterhead) पर आपको लिख कर देने के लिए तैयार हूँ कि ‘पाँच बरस के बाद आपकी साधना इस पड़ाव पर पहुँच जाएगी।’ और ना पहुँचे साधना, तो मेरा लेटरहेड लेकर मेरे पास आना और मुझे चैलेंज (Challenge) देना कि, “गुरुदेव, मैं क्यू नहीं पहुँचा?” हम तैयार हैं। यदि आप तैयार हैं, तो हम तैयार हैं।
मुझे सिर्फ बातें नहीं करनी हैं। मुझे काम करना है। आपको सिर्फ सुनना है? मुझे सिर्फ सुनाना नहीं है। मैं केवल शब्दों का आदमी नहीं हूँ। मुझे शक्तिपात करना है। और साधना के जगत में आपको आगे और आगे ले जाना है। और इसीलिए मैंने यह ‘स्तवना चौबीसी’ पसंद की, गुजराती भाषा में। आप गुजराती भी जानते हो। गुजराती भाषा में स्तवना है। आप रट सकेंगे, पदार्थों को याद कर सकेंगे।
और आप अब दो प्रश्न अपने मन से पूछेंगे कि—
१. “प्रभु मेरे लिए आनंद-दाता हैं? ‘जगजीवन’ तो हैं, पूरे जगत के लिए जीवनरूप, आनंदरूप हैं, लेकिन मेरे लिए प्रभु आनंदरूप हैं? प्रभु के कौनसे वचन से, प्रभु की किसी साधना से मुझे आनंद मिला?” आपको ये सोचना है।
२. और दूसरा प्रश्न— “‘जगवालहो’ पूरे जगत के लिए प्रभु प्रिय हैं, प्रियतम हैं। क्या मुझे भी प्रभु इतने ही प्रिय लगते हैं? संसार में आप हो, संसार भी आपको पसंद है। लेकिन ‘संसार से ज़्यादा प्रभु पसंद हैं’, ये भूमिका तो आपको मिल गई ना?”
मैंने भूमिका बताई थी— ‘प्रियतर’ की। आपकी भूमिका प्रियतर की है, हमारी ‘प्रियतम’ की है। प्रियतर— संसार से भी ज़्यादा प्रभु वधु पसंद हों। हमारे लिए प्रभु प्रियतम हैं। प्रभु ही प्रिय हैं, उसके अलावा दूसरा सब कुछ अप्रिय है। प्रभु के सिवा दूसरा सब कुछ अप्रिय है। प्रभु ही प्रिय हैं। तो ये दो प्रश्न आप अपने से पूछें। अपने मन से पूछें। और क्या उत्तर आता है, आप सोचें। ठीक है?
