प्रभु का सुरक्षाचक्र
प्रभु दो प्रकार से हमें सुरक्षित करते हैं। एक बाह्य सुरक्षा, एक आन्तर सुरक्षा। कोई रोग आ भी जाए, फिर भी आपकी समाधि अकबंध रहे – यह बाह्य सुरक्षा। रोग का असर शरीर को शायद हो, मन को तो होगा ही नहीं। मन तो प्रसन्न ही होगा – यह प्रभु की बाह्य सुरक्षा।
और आन्तर सुरक्षा यह है कि एक क्षण भी हम विभाव में नहीं जा सकते। मैं राग, द्वेष या अहंकार में नहीं जाता इसमें मेरी कोई विशेषता नहीं है, कोई उपलब्धि नहीं है! यह तो प्रभु का सुरक्षा चक्र है। प्रभु का प्रेम, प्रभु की कृपा, प्रभु की सुरक्षा… कि एक क्षण भी राग, द्वेष और अहंकार छूता तक नहीं है।
उस पर हमारा परम प्रेम होगा : “प्रभु! तूने इतना दे दिया! मैंने कुछ ना दिया, तूने सब कुछ दिया। मैं तो अकिंचन आदमी हूँ, मैं तुझे दूँ भी क्या? बस, मेरा प्रेम तुझे देता हूँ। और मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि संसार के किसी व्यक्ति या किसी पदार्थ के प्रति मेरा राग नहीं होगा; मेरा प्रेम सिर्फ और सिर्फ तेरे प्रति ही बहेगा।”
महामहोपाध्याय यशोविजय महाराजा ने परमात्मा की स्तवना करते हुए कहा, “प्रभु, तेरा प्रेम कैसा मुझे मिला कि अब मेरे लिए संसार में सिर्फ एक ही घटना अवशिष्ट रही है और वह है— तू।” मेरा पूरा ध्यान तेरी ओर आकृष्ट हुआ। मेरा परम प्रेम तेरे प्रति बह रहा है।
एक घटना याद आती है। परम पावन उत्तराध्ययन सूत्र में ‘मृगापुत्र अध्ययन’ आता है। बड़ी सुंदर कहानी उस अध्ययन में है। मृगापुत्र श्रेष्ठी पुत्र है, एक दिन अपने महल के झरोखे में वो बैठा है और देखता है कि एक मुनिराज रास्ते पर चल रहे हैं। कैसे चल रहे थे? आँखें नीचे टिकी हुई थीं, इर्यासमिति का पालन हो रहा था। प्रभु का परम वेश और मुनिराज की संयम कि एकतानता! मृगापुत्र देखते ही रहा, देखते ही रहा मुनिराज को। देखते-देखते मृगापुत्र को लगा कि यह घटना तो परिचित है, लेकिन परिचित कैसे हो? इस जन्म में तो पहली ही बार मुनिराज का दर्शन हो रहा है, और लगता ऐसा है कि ये घटना अत्यंत परिचित है।
मृगापुत्र विचार में खो जाते हैं। और जातिस्मरण ज्ञान होता है। जातिस्मरण ज्ञान से देखा कि पूर्व जन्म में मृगापुत्र मुनिराज थे और मुनि का भव पूर्ण हुआ और मृगापुत्र के रूप में वह उपस्थित हुआ। पूर्व जन्म याद आ गया और लगा कि कैसा सुख था मुनि जीवन में!
आपने अनुभव नहीं किया है मुनि जीवन का। पूर्व जन्म का याद आता है कुछ? याद आता है? नहीं याद आता। लेकिन मुनिराज का दर्शन तो हुआ है। दर्शन होने के बाद मुनिराज का जो आनंद है, वो आनंद, उसका स्पर्श आपको हुआ? कि एक मुनि के पास कैसा आनंद होता है! मृगापुत्र गत जन्म के आनंद को अनुभूत कर रहे थे। स्वाध्याय में कितना आनंद था? गुरु की सेवा में कितना आनंद था? प्रभु भक्ति में कितना आनंद था? यहाँ तो आनंद ही आनंद है! आपके पास कभी-कभार आनंद होता है। हमारे पास २४ घंटे आनंद ही आनंद होता है।
अब मृगापुत्र को लगा कि संसार में तो कुछ नहीं है। जो भी आनंद है, वो मुनि जीवन में ही है। गत जन्म के मुनि जीवन का आनंद इस जन्म में मृगापुत्र अनुभव करते हैं। हमारे पास तो इस जन्म का मुनि जीवन है। इस जन्म का तुम्हारा साध्वी जीवन है। कितना आनंद अनुभवते हो? आनंद ही आनंद!
मैं बहुत बार तुमसे कहता हूँ, कि कोई साता पूछने के लिए आए तो वो शर्मा जाए कि इनकी साता क्या पूछें, ये तो परम साता में बैठे हैं! क्यों? परम साता में हो ना? साता पूछने वाला शर्मा जाए कि इनकी साता कैसे पूछें, ये तो परम साता में बैठे हैं। “संजया सुसमाहिया” साधु, प्रभुकी साध्वी सातामें नहीं है, परम सातामें है| दशवैकालिक सूत्र’ में ‘समाहिया’ नहीं कहा, ‘सुसमाहिया’ कहा, परम साता। ये मार्ग ही साता का मार्ग है।
मेरे दादा गुरुदेव १०३ वर्ष की उनकी आयु थी। अब शरीर तो शरीर का धर्म बजाता ही है। शरीर एकदम शिथिल हो गया था। लोग आते और गुरुदेव से पूछते, “गुरुदेव, साता में हो न?” तब गुरुदेव हँसते-हँसते कहते, “अरे, परम साता में हूँ!” लोग पूछते, “साहेब, आपका शरीर इतना रुग्ण है, इतना अस्वस्थ है, आप साता में कैसे हैं?” तब गुरुदेव कहते कि, “प्रभु का मार्ग ही साता का मार्ग है। यहाँ असाता आए ही कैसे? प्रभु का मार्ग ही साता का मार्ग है।” और हमारा ये अनुभव है।
मेरा ७२ वर्ष का, ७० इयर्स वर्ष का दीक्षा पालन… मुझे नहीं याद आता है कि एक क्षण भी मैं विषाद में रहा हूँ। सरेंडर के सामने केयर! प्रभु की केयर, प्रभु की सुरक्षा ऐसी हमारे पास थी कि हम साता में ही रहे। प्रभु की सुरक्षा दो जात की, अनुभव की। एक तो बाह्य सुरक्षा, एक आन्तर सुरक्षा। बाह्य सुरक्षा— रोग आ भी जाए, समाधि अकबंध रहे। रोग का असर शरीर को शायद हो, मन को तो होगा ही नहीं। मन तो ऐसा ही प्रसन्न होगा, तो ये प्रभु की बाह्य सुरक्षा। और आन्तर सुरक्षा यह है कि एक क्षण भी हम विभाव में नहीं जाते। हम राग में नहीं जाते। हमारी कोई विशेषता नहीं है, हमारी कोई उपलब्धि नहीं है कि हम द्वेष नहीं करते, हम अहंकार में नहीं जाते, मेरी कोई उपलब्धि नहीं है, ये प्रभु का सुरक्षा चक्र है। प्रभु का प्रेम, प्रभु की कृपा, प्रभु की सुरक्षा… कि एक क्षण भी राग, द्वेष और अहंकार छूता नहीं है।
हम सबके पास ये सुरक्षा चक्र है। इस सुरक्षा चक्र को यदि तुम एक्टिवेट कर दो, तो एक क्षण भी, एक सेकंड भी तुम विभाव में ना जा सको। एक व्यक्ति के प्रति तिरस्कार तुम्हारे मन में नहीं पनपेगा। मात्र प्रेम! मात्र प्रेम!
तो मेरा एक अनुभव है कि प्रभु ने बाह्य सुरक्षा भी दी, आन्तर सुरक्षा भी दी। न राग में जाने का होता है, न द्वेष में जाने का होता है, न अहंकार में जाने का होता है।
एक बात मैं पूछूँ? अहंकार कैसे होता है? अहंकार होता है कैसे? आपके पास कोई गुण है, समझ लो। आपके पास समभाव है। किसी ने कुछ रफली (Ruffly) कहा, आप शांति से सुनते हैं। कोई प्रतिक्रिया, रिएक्शन (Reaction) आपका है नहीं। तो रिएक्शन आपका नहीं है, आप शांति से सुनते हैं, तो कोई कहेगा कि, “वाह, इसका समभाव कैसा सुंदर है।” अब आप कहेंगे कि, “साहेबजी, कोई प्रशंसा करता है, तब अहंकार उठता है।” ठीक है?
अब बात यह है— प्रशंसा तो उसने की। लेकिन तुम्हारे पास जो गुण आया, वो तुम्हारे कारण आया या प्रभु के कारण आया? बोलो। समझो कि क्षयोपम हुआ मोहनीय का। लेकिन मोहनीय का क्षयोपम तुमने किया या प्रभु की कृपा से हुआ? मोहनीय का क्षयोपम कैसे होता है? प्रभु की आज्ञा के प्रति आदर, प्रभु की आज्ञा के जितने भी पालक हैं, उसके प्रति आदर। तो आदर दूसरों के प्रति जाएगा, तो अहंकार क्षीण होगा। अभी तक तुम्हारा ध्यान तुम्हारे पर ही है, दूसरों पर है ही नहीं। अब दूसरों पर ध्यान गया— ‘ये महात्मा कैसे साधक हैं? ये महात्मा स्वाध्यायशील हैं, ये महात्मा वेयावचशील हैं।’ तो प्रभु की आज्ञा के जो पालक हैं, उस पर आपका आदर हुआ, तो आपका मोहनीय कर्म शिथिल हुआ। और मोहनीय कर्म शिथिल हुआ, तो आपको गुण की प्राप्ति हुई। लेकिन मोहनीय कर्म की शिथिलता हुई कैसे? प्रभु के प्रति आदर किया, प्रभु की आज्ञा के प्रति आदर किया, प्रभु की आज्ञा के पालकों के प्रति आदर किया। तो प्रभु के कारण मोहनीय कर्म शिथिल हुआ, बराबर?
तो अब गुण तुम्हारे कारण उत्पन्न हुआ या प्रभु के कारण? प्रभु ने ही गुण दिया है, तो तुम्हारा स्वामित्व गुण पर है नही। किसी ने तुम्हारे समभाव की प्रशंसा की, तुम क्या करोगे? प्रभु के पास जाओगे और कहोगे— “प्रभु, तूने जो गुण दिया, तेरा जो गुण है समभाव, उसकी प्रशंसा हुई है। तू रख लेना, मेरे पास प्रशंसा को आने न देना। मेरे पास प्रशंसा आजाएगी तो मुझे अहंकार हो जाएगा।”
तो अहंकार हो ही कैसे? एक घंटे में आपने १० गाथाएं कर लीं। १० गाथाएं हुईं, फिर क्या करने का? प्रभु का फोटो आपके पास है। वहाँ जाओ, खमासमण दो, और प्रभु को कहो कि— “प्रभु, तूने गाथा करवाई, तुझे अर्पण।” चलो, एक घंटा तक स्वाध्याय किया, एक भी गाथा याद नहीं रही। तो भी निराश नहीं होने का। प्रभु से जाकर कहने का कि— “प्रभु, ज्ञानाचार का पालन तूने कराया, तेरा आभार।” तो अहंकार कैसे हो? जो भी गुण आपके पास हैं, वे गुण प्रभु ने दिए हैं, प्रभु के हैं, तुम्हारे हैं नहीं। तो अहंकार कैसे आएगा?
तो प्रभु हि सुरक्षा चक्र देते है, मुजे दिया हुआ है। जिस दिन रजोहरण दिया, उसी क्षण यह सुरक्षा चक्र भी आ गया। रजोहरण का उपयोग करते हो, लेकिन इस सुरक्षा चक्र का उपयोग नहीं करते। तो आज समझ लो कि जब रजोहरण मिला, तब से प्रभु का सुरक्षा चक्र मिला। न तुम राग में एक क्षण जा सकते हो, न तुम द्वेष में, तिरस्कार में जा सकते हो, न तुम अहंकार में जा सकते हो।
तो मृगापुत्र को लगा कि आनंद तो संयमी जीवन में ही है। राग में क्या है? चलो, राग की बात छोड़ो। द्वेष में क्या है? आप गुस्सा करेंगे, क्या मिलेगा? गुस्से से क्या होता है? सिर दुखता है। होता है क्या?
एक आदमी शहर में गया था। शहर में उसका धंधा अच्छा चलता था। तो पेइंग गेस्ट (Paying Guest) के रूप में वह एक घर पर ठहरता था। उस फ्लैट के बाजू में एक फ्लैट था। उस फ्लैट में पति-पत्नी रहते थे। लेकिन दोनों गुस्से वाले! एक गिलास यहाँ से वहाँ रखा तो आधा घंटा लेक्चर पति का चलता है, फिर एक घंटा पत्नी का लेक्चर चलता है। तो पूरी दिन लेक्चर-बाज़ी चलती रहती।
एक दिन वो आदमी गया पेइंग गेस्ट के रूप में। बाजू के फ्लैट से आवाज़ ही नहीं आती! तो उसने अपने जजमान से पूछा कि, “बाजू वाले गए कहाँ? घर बदलकर कहाँ बाहर गए?” तब जजमान ने कहा, “नहीं-नहीं, वो तो यहीं हैं।” “अरे, यहीं हैं? तो आवाज़ तो आती नहीं! एटम बम ना फूटे ऐसा क्षण ही नहीं होता था, तो आधा घंटा हुआ कोई एटम बम फूटा नहीं, क्या हुआ?”
तब जजमान ने कहा कि, “पति को सीवियर हार्ट अटैक (Severe heart attack) आया है!” ये तो शहर था, और गुजरात में १०८ की सर्विस है, फोन करो, तुरंत गाडी आ जाती है, हॉस्पिटल ले जाती है। हॉस्पिटल में एडमिट किया गया। डॉक्टर ने स्टेंट (Stent) लगा दिए, फ़िर अच्छा हो गया। लेकिन डॉक्टर ने कहा कि, “अब गुस्सा मत करना।” पत्नी जो थी, उसको हाइपरटेंशन (Hypertension) हो गया। ऊपर का बीपी २०० के पार चला गया। हॉस्पिटल में एडमिट किया गया, अच्छा हो गया। लेकिन डॉक्टर ने कहा, “अब यदि गुस्सा किया तो फिर हॉस्पिटल में आने का नहीं, सीधा श्मशान में ही जाने का! अब हॉस्पिटल में नहीं आने का अभी, गुस्सा करो तो फिर श्मशान में सीधा पहुँच जाना।” तो दोनों अब डॉक्टर की आज्ञा में हैं। डॉक्टर ने कहा है ‘गुस्सा नहीं करने का’, इसलिए दोनों शांत बैठे हैं।
आप किनकी आज्ञा से शांत होगे, बोलो? प्रभु की आज्ञा से, बोलो। मेरे प्रभु ने कहा है कि क्रोध नहीं करने का है, तो मैं नहीं करता हूँ। कोई आपसे पूछ भी ले कि, “अरे, तुम्हारा स्वभाव तो कैसा था? बार-बार तुम क्रोध करते थे। अब ये आदमी उल्टा-पुल्टा बोला, फिर भी तुम्हें क्रोध नहीं आया? कारण क्या?”
तब तुम कहोगे कि, “पहले तो क्रोध आता था। लेकिन एक दिन प्रवचन में गया था, और साहेबजी ने फरमाया कि हमारे प्रभु कहते हैं कि क्रोध नहीं करना चाहिए।” बस, इतनी बात हृदय में जच गई कि मेरे प्रभु कहते हैं कि क्रोध नहीं करने का, तो मुझे क्रोध नहीं करना चाहिए।
एक शिष्य था। उसने गुरु से कहा… शिष्य बात तो किससे करे? गुरु से ही करे। दुनिया तो छूट गई। दुनिया छूट गई, अब बात करेगा तो भी प्रभु से करेगा, गुरु से करेगा, दुनिया तो है ही नहीं। तो एक दिन शिष्य ने गुरु से कहा कि, “गुरुदेव, मेरा स्वभाव इतना खराब है कि बार-बार क्रोध आता है। मेरे स्वभाव में क्रोध जुड़ गया।” गुरु भी मनोवैज्ञानिक आयाम के आचार्य हैं। गुरु ने पूछा, “अच्छा, क्रोध तेरा स्वभाव है? क्रोध तेरा स्वभाव है? मैं वन, टू, थ्री कहता हूँ, जब थ्री बोलूँ तब गुस्सा शुरू कर दे।” तो शिष्य ने कहा, “ऐसे तो गुस्सा कैसे आएगा? और आपके चरणों में बैठा हूँ।”
तो गुरु कहते हैं कि, “तू अभी-अभी बोला कि क्रोध मेरा स्वभाव है। जो स्वभाव है, उसको ढूँढने कहाँ जाना है? वो तो हाजिर है।” तब शिष्य को पता चला कि क्रोध मेरा स्वभाव नहीं है, क्रोध को मैं लाता हूँ।
आपसे मैं पूछूँ, आप कहेंगे, “गुरुदेव, क्रोध आता है।” आता है क्या? मैं पूछता हूँ, क्रोध आता है या क्रोध को तुम लाते हो? बोलो? आता है? घुस जाता है? कुछ चोर तुम्हारे घर में घुस जाएगा दिन को? तुम्हारे घर में तुम प्रवेश करोगे, दूसरों का प्रवेश तो वर्जित है ना? पूछकर कोई आ सकता है तुम्हारे घर में, ऐसे कैसे आ सकता है? तो क्रोध ने पूछा था, May I come in, sir? पूछा था? और तुमने हाँ कही थी, फिर आ गया! तो क्या होता है, बोलो? क्रोध आता नहीं है, क्रोध को तुम लाते हो। इन्विटेशन कार्ड (Invitation Card) भेजते हो क्रोध को— ‘आजाओ, तुम्हारे बिना कैसे चलेगा?’
कितने ही लोग मेरे पास आते हैं— “साहेबजी, क्रोध न करें तो कैसे चलेगा? मेरी फैक्ट्री में २०० कर्मचारी हैं। मैं यदि गुस्सा नहीं करूँगा तो कैसे काम चलेगा? गुस्से से काम चलेगा?”
कच्छ में ‘मनफरा’ गाँव है। भूकंप में नष्ट हो गया। फिर नया बसा— ‘शांतिनिकेतन’ नाम से। वो मनफरा गुरुदेव अरविंदसूरी दादा की जन्मभूमि। तो दादा की जन्मभूमि थी, तो जन्मभूमि के लोगों की बहुत इच्छा थी कि दादा हमारे वहां चातुर्मास करें। दादा ने आज्ञा दी, हम सब वहाँ चातुर्मास के लिए चले। बीच में सामखीयाली गाँव आता है| कटारिया तीर्थ से हम सामखीयाली जाने वाले थे। सामखीयाली गाँव से एक किलोमीटर पहले एक बड़ी फैक्ट्री थी। फैक्ट्री वाले मालिक को जब पता चला कि गुरुदेव यहाँ से पसार होने वाले हैं, इस रोड से, तो वे कटारिया तीर्थ आए और उन्होंने विनती की कि, “गुरुदेव, आप कटारिया से सामखीयाली पधार रहे हैं। सामखीयाली में आपकी स्वागत यात्रा है, तो गाँव के बाहर आप रुकेंगे, वहाँ नवकारसी का प्रबंध होगा और फिर ९ बजे स्वागत यात्रा शुरू होगी। तो मेरी विनती है कि सामखीयाली गाँव से बाहर मेरी फैक्ट्री है, १००० कर्मचारी है और सभी का नाश्ता और खाने का वहाँ ही होता है। तो आपके लिए निर्दोष गोचरी है, तो आप कटारियाजी दर्शन करके मेरी फैक्ट्री पर पधारिए, मुझे लाभ मिलेगा और फिर आप सामखीयाली पधार जाएं।”
तो गुरुदेव ने हाँ कही। हम फैक्ट्री में आए, उन्होंने स्वागत किया, फिर नवकारसी का समय आ गया था, मुनिराज वोहरने के लिए गए, वापर लिया, अब सामखीयाली संघ वाले जब आए, तब हमें जाने का था। तो मैं कुर्सी पर बैठा था, वो मालिक भी मेरे पास बैठा। मैंने कहा, “१००० कर्मचारी हैं आपके वहाँ, कोई दिखता तो है नहीं अभी।” तो उन्होंने कहा कि, “गुरुदेव, मैं हर साल एक योग के आचार्य को बुलाता हूँ और सभी कर्मचारियों को कंपलसरी योग की शिक्षा दिलवाता हूँ।” “क्यों?” “कि सब योग को सीखेंगे तो उनका जीवन भी अच्छा होगा, मेरा बिज़नेस भी अच्छा होगा।”
आज सैन्य में भी योगा का प्रवेश हो गया है। सैनिकों को योगा का अभ्यास योग गुरु कराते हैं। बिज़नेस मैनेजमेंट (Business Management) में भी योगा का प्रवेश हो गया। क्योंकि योग का प्रवेश होगा, तो वो निष्ठा से काम करेगा। योग का प्रवेश उसके जीवन में होगा, तो वो शांति से जी सकेगा।
ऐसे तो क्या होता है? आप कभी वर्तमान में होते ही नहीं। आज का मनोवैज्ञानिक कहता है कि १०:०० बजे आदमी भोजन करता है घर पर, लेकिन मन में ऑफिस खुल जाती है! मन में ऑफिस की फाइल खुल जाती है। ऑफिस जाता है तो घर की फाइल खोलकर बैठ जाता है। फिर रात को ऑफिस से घर आता है, लेकिन घर में ना तो बच्चों के साथ खेल सकता है, ना श्राविका के साथ अच्छी बात कर सकता है। घर पर आया है, लेकिन ऑफिस की फाइल खोलकर बैठा है।
तुम वहाँ नहीं होते जहाँ तुम हो। शरीर यहाँ है, मन कहीं! तो योग जब तुम्हारे मन में आ जाएगा, तो तुम वर्तमान में आ जाओगे— खाने के समय खाने का, ऑफिस के समय ऑफिस का काम करने का। और प्रतिक्रमण करो तब, मन प्रतिक्रमण में।
अब व्याख्यान सुन रहे हो, मन कहाँ है? शरीर तो बैठा है यहाँ, मन कहाँ पर है? मन ऑफिस में है। मन कहाँ पर है? कोई पूछेगा कि ‘महाराज साहेब ने क्या बात कही?’ “अरे, बहुत अच्छी बात कही।” लेकिन अच्छी बात कौन सी थी? वो तो महाराज साहेब जा ने! क्योंकि मैं तो शरीर से बैठा था उपाश्रय में, मन तो मेरा ऑफिस में था।
तो उस मालिक ने कहा कि, “मैं हर साल योग शिक्षक को बुलाता हूँ और कंपलसरी हर कर्मचारी को योग की शिक्षा लेने की होती ही है।” तो योग, ध्यान जैसे-जैसे हमारे जीवन में आएगा, वैसे ही हम एकाग्र होंगे। और एकाग्र होंगे, तभी क्रिया का आनंद हमें मिलेगा।
हम मंदिर में गए हैं। शरीर मंदिर में है, मन बाहर है! फिर क्या होगा? दर्शन करके घर पर गए। फिर ये पुणे की हमारी श्राविकाजी। श्राविका तुम्हारी परीक्षा लेंगी— “दर्शन करके आए?” “हाँ-हाँ, दर्शन करके आया, चैत्यवंदन किया।” तब श्राविका पूछेगी— “तो बोलो, आज प्रभु की आंगी कैसी थी?” फिर सिर खुजलाना… ‘आंगी तो थी, लेकिन कैसी आंगी थी, पता नहीं!’
एक भाई मुझे अहमदाबाद में मिले— “साहेबजी पालिताणा जाने का है, कोई कार्य सेवा?” मैंने कहा, “कोई कार्य सेवा नहीं, प्रभु का दर्शन करो, याद कर लेना।” दूसरे दिन प्रवचन शुरू होने का था, और वे आ गए। मैंने कहा, “क्या पालिताणा जाकर आए?” तो, “हाँ, जाकर आया। साहबजी, मुझे कहाँ विहार करने का था? अहमदाबाद से फ्लाइट पकड़ी भावनगर, भावनगर से टैक्सी पकड़ी पालिताणा। धर्मशाला में थोड़ा नाश्ता कर लिया और फिर डोली में ऊपर चढ़ गया। दादा की पूजा की, डोली में नीचे उतर गया। तलेटीसे रिक्शा कर ली, धर्मशाला में आया, भोजन कर लिया। टैक्सी पकड़ी भावनगर, रात को अहमदाबाद (मुंबई) फ्लाइट में आ गया।”
मैंने कहा, “वो तो ठीक है, लेकिन तुम्हारी पूजा कितने बजे हुई थी?” तो, “साहेबजी, करीबन ४ बजे पूजा हुई।” तो मैंने कहा, “उस समय आंगी धराई गई थी?” तो, “हाँ साहबजी, आंगी धराई गई थी।” तो मैंने कहा, “आंगी कैसी थी?” उसने कहा, “साहेबजी, इतना भारी प्रश्न आप पूछते हो! मुझे फिर पालिताणा जाना पड़ेगा।” अरे, पालिताणा जाकर आया, इतना श्रम उठाकर गया, और दादा की आंगी कैसी थी वो तुझे मालूम नहीं? तो क्या हुआ? धर्म क्रिया हम करते हैं, एकाग्रता नहीं!
मृगापुत्र की एकाग्रता कैसी होगी? कि गत जन्म की साधना और उसका आनंद इस जन्म में झंकृत होता है— ‘वाह! मुनि जीवन का आनंद कैसा था!’ फिर मात-पिता से निवेदन किया कि मुझे दीक्षा लेनी है। माता-पिता ने समझाया, “तू हमारा एकलौता बेटा है और तू सुख में पनपा है, तू मुनि जीवन की कष्ट क्रियाएं नहीं भोग सकेगा, तेरे लिए अशक्य है।” लेकिन मुनि जीवन में कष्ट है या आनंद है, बोलो? तुम बोलो, कष्ट है कि आनंद है?
तुम ऑफिस में जाते हो, ग्राहक इतने आए, एक मिनट का फुर्सत नहीं मिला। टिफिन आ गया था, लेकिन खाने का समय नहीं मिला। दोपहर १:०० बजे रोज़ भोजन करते थे, कितने ग्राहक आए, ४ बजे तक एक मिनट का फुर्सत नहीं मिला। आप राज़ी होंगे? कि नाराज़ होंगे? आज धंधा अच्छा हो गया, खाना नहीं मिला उसकी बात नहीं है, लेकिन धंधा अच्छा है। ऐसे शरीर ने क्या कष्ट भोगे, वो हमें पता ही नहीं होता। हमें तो आनंद आता है!
संयम की क्रिया, संयम की साधना, संयम की आराधना हुई, तो हमारे मन में आनंद ही आनंद होता है। तो मृगापुत्र ने कहा कि, “पिताजी, मैंने गत जन्म में मुनि जीवन का आनंद लिया है, और मेरा अनुभव है कि मुनि जीवन में आनंद ही आनंद है।” बहुत समझाया पिता ने, माता ने, लेकिन वो अडिग रहे। अनुमति भी मिल गई, और मृगापुत्र दीक्षा लेने के लिए चले।
उस समय उत्तराध्ययन सूत्र में लिखा गया—
“रेणुअं व पडे लग्गं, निध्धुणित्ता ण निग्गओ।”
वस्त्र पर पड़ी हुई धूल को बिखेर कर कोई चल जाता है, ऐसे ही मृगापुत्र संसार को, विभाव को बिखेर कर चल बसे प्रभु की ओर। विभाव खर जाते हैं, राग और द्वेष खर जाते हैं, अहंकार खर जाता है, क्योंकि ये तुम्हारा स्वभाव नहीं है। जो स्वभाव है, वो कभी जाने वाला नहीं। और जो विभाव है, वो टिकने वाला है नहीं। तुमने विभाव को स्वभाव बना दिया और स्वभाव का पता नहीं!
साहेब! राग हो ही जाता है, द्वेष हो जाता है, क्यों होता है? तुमने यदि स्वभाव का आनंद अनुभव किया है, तो द्वेष में तुम कैसे जा सकते हो? क्रोध तुम कर ही नहीं सकते! वीतराग दशा का आनंद तुमने अनुभव किया है, तो राग की धारा में तुम कैसे जा सकते हो? तो ये जो जन्म मिला है, वो वीत – राग दशा की अनुभव के लिए, वित – द्वेष दशा की अनुभव के लिए और वित – अहंकार दशा की अनुभूति के लिए। तो बोलो, ये अनुभव कितना हुआ?
प्रभु के पास गए, गोड़ीजी दादा के पास गए, चिंतामणि दादा के पास गए, वहाँ आदिश्वर दादा के पास गए। दादा की वीतरागता को देखो और फिर सोचो कि मैं भी वीतराग हूँ। वीतराग दशा मेरे भीतर भी है, लेकिन वो ढकी हुई है, उसे मुझे प्रकट करनी है। और प्रकट करने के लिए ही प्रभु के चरणों में मैं आया हूँ। और वीतराग दशा धीरे-धीरे प्रकट होगी, और वीतराग दशा का आनंद तुम्हारे पास आएगा, तुम राग में जा ही नहीं सकोगे।
तो प्रभु पर जो परम प्रेम हुआ है, वो परम आनंद के कारण हुआ। प्रभु ने परम आनंद हमें दिया, और इसी बदौलत परमात्मा पर हमारा परम प्रेम होगा कि, “प्रभु, तूने इतना दे दिया! मैंने कुछ ना दिया, तूने सब कुछ दिया। मेरे पास तो कुछ था ही नहीं, मैं क्या दूँ तुझे? लेकिन तूने मुझे आनंद से भर दिया। मैं तो अकिंचन आदमी हूँ, मैं तुझे क्या दूँ? बस, मेरा प्रेम तुझे देता हूँ। और मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मेरा प्रेम सिर्फ तेरे प्रति ही बहेगा, संसार के किसी व्यक्ति की ओर, कोई पदार्थ की ओर मेरा राग नहीं जाएगा, मेरा प्रेम सिर्फ तेरे प्रति ही बहेगा।”
ये है पूर्ण प्रेम! ये है परम प्रेम! और इस परम प्रेम की दुनिया में महोपाध्याय यशोविजयजी अपन को ले जाएंगे। आपको जाना है ना? आपको जाना है ना? गुरु तैयार हैं, आप तैयार हैं? अभी तैयारी पक्की नहीं हुई, थोड़ी कच्ची है।
प्रवचन में मेरे पहले तुम सब आ जाते हो कि बाद में आते हो? एक विदेश से डॉक्टर आया हो, नेत्र विशेषज्ञ – Eye Specialist, और आपको कोई दर्द है आँख का, आपने रजिस्ट्रेशन करवा लिया। फिर आप कब पहुँचोगे? डॉक्टर का समय ८:०० बजे आने का है, आप १० बजे पहुँचोगे? कि आप ७:३० बजे पहुँच जाओगे?
मुंबई जाना है फ्लाइट में। फ्लाइट का समय शाम ६ बजे का है, आप एयरपोर्ट पर कब पहुँचोगे? ५:४५ बजे? ५:३० बजे? कि ६: १५ बजे? तो फ्लाइट छूट जाएगी! हमारी फ्लाइट ऐसी छूट नहीं जाती। हमारी फ्लाइट विशेष है कि कभी भी आओ, आप बैठ सकते हो। लेकिन अब धीरे-धीरे आपकी भी सज्जता परिपक्व होगी और समय से पहले आप आ जाओगे। मुझे आपके साथ बातें करनी है। कोई प्रवचन की गंभीरता मैं नहीं रखूँगा। बातचीत करनी है। बस, प्रभु ने आनंद दिया, प्रभु को प्रेम देना है। लेकिन प्रभु को प्रेम कैसे देना? ये अघरी बात है। धीरे-धीरे हम सम
