Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 21-07-2026 | Pune Chaturmas

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पुद्गल अनुभव त्यागथी करवी जसु परतीत

पुद्गल के अनुभव से अपरम रस मिलता है और पुद्गल का अनुभव छूट जाए, तो परम रस मिलता है। शरीर के रूप में बड़ा पुद्गल जब तक है, उसके लिए आहार, वस्त्र इत्यादि छोटे-छोटे पुद्गल चाहिए। इस लिए पुद्गल का त्याग नहीं; पुद्गल के अनुभव का त्याग।

चाय-नाश्ता, भोजन इत्यादि कौन करता है? शरीर या तुम? भोजन शरीर को चाहिए। शरीर को खाने दो; तुम तुम्हारे स्वभाव में रहो! You are bodyless, mindless, nameless experience! तुम शरीर से पर हो, मन से भी पर हो और तुम तुम्हारे नाम से भी पर हो।

आज एक Practical मार्ग आपको देता हूँ। जब भोजन करने के लिए आप बैठो, तब मन को किसी स्तवन की पंक्तियों में स्थिर कर देना। शरीर भोजन करेगा पर मन स्तवन में रहेगा, तो भोजन के पुद्गलों का उपयोग होने के बावजूद उनका राग-द्वेषात्मक अनुभव आप को नहीं होगा।


महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराजा ने प्रभु की प्रार्थना में कहा कि— ‘प्रभु, तेरा जो मुझ पर प्रेम है, उस प्रेम के कारण मेरा तेरे प्रति परम प्रेम हो उठा है।’ परम प्रेम को ही परम रस कहते हैं। देवचंद्रजी महाराज साहेब ने चौथे स्तवन के प्रारंभ में कहा कि, ‘प्रभु, मुझे परम रस कैसे मिले?’ अपन प्रभु के पास जाते हैं। अब प्रभु से यही प्रार्थना करनी है कि, “प्रभु, मुझे परम रस दो। परम प्रेम दो। “

देवचंद्रजी महाराज साहेब ने प्रभु से पूछा कि, “प्रभु, मुझे परम रस कैसे मिले?” तब उत्तर मिला कि पुद्गल का जो अनुभव है, वो अनुभव छूट जाए तब परम रस मिल जाता है। पुद्गल का त्याग नहीं कहते हैं। पुद्गल के अनुभव का त्याग! परम रस कैसे मिले? पुद्गल के अनुभव से अपरम रस मिलता है। और पुद्गल के अनुभव के त्याग से परम रस मिलता है। तो पुद्गल का त्याग नहीं कहा। बड़ा पुद्गल तो ये है। और इसके लिए छोटे-छोटे पुद्गल चाहिए। वस्त्र के पुद्गल, आहार के पुद्गल… लेकिन पुद्गल का अनुभव नहीं चाहिए।

आज तो आठम थी, एकाशना, आयंबिल होगा… शायद नवकारसी भी की होगी, चाय पी, नाश्ता भी किया… लेकिन चाय-नाश्ता किसने किया? शरीर ने किया या तुमने किया? बोलो? दोपहर भोजन करोगे, लेकिन भोजन कौन करेगा? शरीर करेगा या तुम करोगे? You are the bodyless experience। तुम शरीर से पर हो। You are the mindless experience। तुम मन से भी पर हो। You are the nameless experience। तुम तुम्हारे नाम से भी पर हो। नाम तो इस शरीर का है। तुम तो अनामी हो। तो भोजन करेगा, लेकिन कौन करेगा? शरीर करेगा या तुम करोगे? शरीर को भोजन करने दो। तुम अपने स्वभाव में रहो!

आज एक प्रैक्टिकल (Practical) आपको मार्ग दूँ। जब भोजन करने के लिए आप बैठो, तब कुछ स्तवन मन में रटना। स्तवन की पंक्तियों में मन को स्थिर कर देना। शरीर भोजन करेगा, मन स्तवन में जाएगा, तो दो ट्रैक (Track) अलग-अलग हो जाएंगे। फिर कोई पूछेगा, “भोजन में क्या लिया?” तब आप कहोगे, “मुझे तो कोई ख्याल भी नहीं है। जो थाली में परोसा गया था, वो मैंने खा लिया। मेरा मन तो स्तवना में था।” तो ये छोटा सा प्रैक्टिकल मार्ग! शरीर को खाने दो। तुम तुम्हारे स्वभाव में रहो।

एक बॉस (Boss) नौकर को कहेगा, ‘पानी लाओ।’ नौकर फ्रिज के पास जाएगा, तो बॉस भी पीछे-पीछे जाएगा? नहीं। नौकर पानी का गिलास टेबल पर रखेगा, तब बॉस पानी पी लेगा। नौकर के पीछे-पीछे बॉस को जाने का नहीं है। ऐसे ही शरीर भोजन कर लेता है, तो मन को वहाँ रखने की ज़रूरत क्या?

मैं दो गारंटी कार्ड (Guarantee Card) देता हूँ। एक गारंटी कार्ड साधकों को देता हूँ। कोई भी साधक मेरे पास आया, और वह प्रभु की आज्ञा को समर्पित है। सद्गुरु की आज्ञा को समर्पित है। तो मैं मेरे लेटर-हेड (Letterhead) पर लिखकर दूँगा कि तुम्हारी साधना पाँच वर्ष के बाद यहाँ पहुँचेगी। और मैं कहता हूँ कि मेरा लेटर-हेड बराबर अल्मारी में संजोकर रखना। यदि तुम पाँच वर्ष के बाद इस पड़ाव पर नहीं पहुँचे हो, तो मेरे पास मेरा लेटर-हेड लेकर आना कि, “साहेबजी, आपने लिखा था, आपने गारंटी कार्ड दिया था कि तुम ५ वर्ष के बाद यहाँ पहुँचोगे। मैं तो नहीं पहुँचा।” सद्गुरु ज़िम्मेदार हैं। तुम यदि प्रभु की आज्ञा को समर्पित हो, सद्गुरु को समर्पित हो, तो सद्गुरु भी ज़िम्मेदार हैं, तुम्हारी साधना को अपलिफ्टेड (Uplifted) करने के लिए सद्गुरु तैयार हैं। आज बोलो तो, हम तैयार रहेंगे कि तुम तैयार? कौन तैयार नहीं है? हम तो तैयार हैं!

तो एक गारंटी कार्ड मैं यह देता हूँ और दूसरा भी एक गारंटी कार्ड देता हूँ कि— तुम भोजन करने के लिए बैठोगे। चावल तुम्हारे हाथ में है, और तुम खाने लगते हो, तो मेरी गारंटी है कि चावल का ये जो हाथ है, चावल भरा हाथ… वो कान में नहीं जाएगा, नाक में नहीं जाएगा, मुँह में ही जाएगा। मेरी गारंटी! अब हाथ मुँह में ही जाता है, ऑटोमैटिकली (Automatically) प्रक्रिया होती है, तो फिर तुम्हें तुम्हारे मन को वहाँ रखने की आवश्यकता क्या है? मन को स्तवना में रख दो। मन को प्रभु में रख दो। मन को स्व में रख दो। शरीर को जाने दो भोजन में।

तो देवचंद्रजी महाराज साहेब कहते हैं—

“पुद्गल अनुभव त्यागथी करवी जसु परतीत।”

परम रस अभी मिल सकता है ! Now and here ! मैं तो now और here का आदमी हूँ। कोई उधारी-बुधारी नहीं। आज ही, अभी आ जाओ। परम रस चाहिए? अभी दे दूँ। पुद्गल का अनुभव छूट जाना चाहिए।

चाय पी। चाय पिया। ठीक है। लेकिन ‘चाय अच्छी थी’ या ‘अच्छी नहीं थी’, ऐसे राग-द्वेष नहीं करने का। राग-द्वेषात्मक अनुभव भोजन का ना करो, तो पुद्गल का अनुभव छूट गया। और पुद्गल का अनुभव जब छूट जाता है, तब परम रस मिलता है।

मैं साधकों के लिए एक लिटमस टेस्ट (Litmus Test) देता हूँ। तुम पूजा करके घर पर गए। घर पर गए, वॉर्डरोब (Wardrobe) में तुम्हारे लिए जो वस्त्र रखे गए थे, तुमने पहन भी लिए। पायजामा पहना और शर्ट भी पहना। फिर तुम नाश्ते के लिए टेबल पर बैठे। नाश्ता पूरा हो गया। अब एक मिनट आँख बंद करो, और स्वयं से पूछो कि, ‘आज मैंने जो शर्ट पहना है, वो मरून कलर (Maroon Color) का है या ऐश कलर (Ash Color) का है? कौन से कलर का है?’ जवाब सच्चा ना मिले, तो तुम सच्चे साधक। और जवाब सच्चा मिल गया, तो तुम सच्चे साधक नहीं। जवाब सच्चा कब मिलेगा? जब तुम्हें याद है कि, ‘मैंने मरून कलर का शर्ट पहना है।’ इस शर्ट को देखा, दर्पण में भी देखा… ‘मरून कलर का शर्ट कैसा अच्छा लगता है!’ तो तुम्हारे मन ने भी शर्ट पहन ली। शरीर ने तो पहना था शर्ट। मन ने भी पहन ली। और आँख बंद की, और तुम स्वयं से पूछते हो कि ‘कौन से कलर का शर्ट आज पहना है?’ और सच्चा जवाब मिला तो तुम सच्चे साधक नहीं। लेकिन तुम गड़बड़ा जाओगे— ‘कौन से कलर का शर्ट? वो तो याद नहीं है। वॉर्डरोब में रखा था मेरे लिए। वो मैंने पहन लिया। अब मरून कलर का था, ऐश कलर का था या व्हाइट (White) कलर का था, मुझे तो कोई पता नहीं।’ बस आपको पता नहीं है। और आप गड़बड़ा जाते हैं, तब आप सच्चे साधक हैं। तो क्या हुआ? पुद्गल का त्याग नहीं हुआ। लेकिन पुद्गल के अनुभव का त्याग हुआ। ‘मैंने शर्ट पहना है, वो अच्छा लगता है’, तो ये जो राग हुआ… ये पुद्गल का अनुभव हुआ।

तो परम रस अपन को पीना है। आनंदघनजी भगवंत ने कहा—

“सगरा हो सो भर-भर पीवे, नगरा जाय प्यासा।”

दो शब्द हमारी परंपरा में: सगरा और नगरा। नगरा का अर्थ तो सीधा है— ‘जिसके सिर पर गुरु नहीं, वो नगरा।’ लेकिन सगरा कौन? तुमने सिर्फ गुरु का नाम धरा लिया, इससे तुम सगरे नहीं बन जाते। तुम गुरु के चरणों पर समर्पित हो, तभी तुम सगरे। इसलिए मेरी एक व्याख्या है: १+१ = १ (One plus One is equal to One)। गुरु और शिष्य दो मिलते हैं, लेकिन रहता है एक। १+१ = १। शिष्य गया, साधक गया, गुरु ही रहते हैं। तब तुम सगरे बनते हो। तुम्हारी कोई इच्छा नहीं। तुम चॉइसलेस पर्सन (Choiceless Person) हो। कोई इच्छा तुम्हारी नहीं। जो भी आज्ञा सद्गुरु की हो, वह तुम्हारे लिए शिरोधार्य होती है।

सद्गुरु क्या कहते है? सद्गुरुकी इच्छा क्या है?हम लोग जो आनंद में हैं न, उसका कारण यह है कि हम चॉइसलेस पर्सन हैं। कोई इच्छा हमारी नहीं होती। चातुर्मास परिपूर्ण होगा, और आप कोई भी शिष्य को पूछेंगे, “महाराज साहेब, चातुर्मास के बाद का कार्यक्रम क्या है?” तो शिष्य कहेगा कि, “गुरुदेव जानें, गुरुदेव को ही पता है कहाँ जाना है, ये मेरा विषय नहीं है। गुरुदेव कहते हैं ‘यहाँ जाने का है’, तो मुझे वहाँ जाने का है। गुरुदेव कहते हैं कि ‘यहाँ वेयावच्च की टुकड़ी में रहने का है’, तो मुझे यहाँ रहने का है। मेरी कोई चॉइस नहीं।” तो जिसके पास कोई इच्छा नहीं, आज्ञा गुरु की आई, वही जिसके लिए प्रधान मंत्र है… वो सगरा।

तो सगरा बनना बहुत मुश्किल है कि हम हैं ही नहीं, सद्गुरु ही हैं। मैं बहुत बार कहता हूँ कि हमारा होना यही तो बड़ी तकलीफ है। प्रभु नहीं मिले, सद्गुरु नहीं मिले। क्यों नहीं मिले? क्यों नहीं मिले? अतीत की यात्रा में यदि सद्गुरु मिले होते, तो हम यहाँ नहीं होते। हम मोक्ष में होते। सद्गुरु के चरणों में हम झुक गए होते। हमारी कोई इच्छा नहीं होती। और सद्गुरु की जो आज्ञा थी, उस आज्ञा का हमने पालन किया होता, तो हम मोक्ष में ही होते। यहाँ होते नहीं। लेकिन हम संसार में हैं, तो कारण यही है कि हमारे पास सद्गुरु का समर्पण अतीत में नहीं था।

लेकिन इस जन्म में क्या करना है? इसलिए तो प्रभु के पास रोज़ माँगते हैं—

“सुहगुरु जोगो।”

प्रभु! मुझे सद्गुरु योग दो। सिर्फ सद्गुरु नहीं, मैं सद्गुरु के चरणों में झुक सकूँ, ऐसा वरदान मुझे दो। मैं रहूँ ही नहीं, सद्गुरु के चरणों में झुक जाऊँ।

एक बड़ी सुंदर कहानी अपनी परंपरा में आती है। एक श्रीमंत आदमी था। अरबपति। उस ज़माने में! पत्नी एक्सपायर्ड (Expired) हुई है। संतान है नहीं। वो अकेला है। और ढेरों रुपए उसके पास हैं। फिर भी नए-नए बिज़नेस वो कर रहा है। सुबह से शाम तक वो बिज़नेस में जुटा रहता है। आपको मैं पूछूँ, आप बिज़नेस करते हैं। जॉब करते हैं, ऐसा कोई निर्णय मन में है कि ‘जब मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए पर्याप्त संपत्ति मिल जाए, तब बिज़नेस क्लोज (Close) करके सद्गुरु के चरणों में बैठ जाने का?’ फ्यूचर प्लानिंग (Future Planning) है? कि ‘जब संपत्ति इतनी हो जाए कि मैं और मेरा परिवार एक भी पैसा ना कमाएं, फिर भी आराम से रह सकें… इतनी संपत्ति आ गयी, फिर बिज़नेस नहीं करने का। बिज़नेस क्लोज करके बैठ जाने का।’

एक भाई मुझे मिले थे सूरत में। उन्होंने कहा कि, “गुरुदेव, इनफ इज़ इनफ (Enough is enough)। मेरे पास बंगला है। दो-चार गाड़ियां हैं। बच्चे भी बिज़नेस में जुड़े हुए हैं। अब मैंने निश्चित कर लिया है कि दो वर्ष में मैं रिटायर (Retire) हो जाऊँ।” ५६ की उसकी उम्र थी। उसने कहा, “५८ पर मैं निवृत्त हो जाऊँ।” Enough is enough! बाकी तो ‘मैं इकट्ठा करता ही जाऊँ, करता ही जाऊँ…’ तो, तो कोई छोर ही नहीं! करोड़ों हो जाएं, अरबों हो जाएं, तो भी तृप्ति नहीं होगी।

एक बात मैं पूछूँ आपसे? इस जन्म में नहीं, बहुत जन्मों में बहुत संपत्ति कमाई। लेकिन तृप्ति नहीं हुई। हुई है तृप्ति? बस, चार रोटियां खाईं तो तृप्ति हो जाएगी। बस अब पाँचवीं नहीं! संपत्ति में तृप्ति होती है? नहीं होती है। तो इसका कारण क्या है? आपको लगता है कि ‘अभी कम है, कम है’, इसलिए तृप्ति नहीं होती। बात यह है कि हम सब परमात्मा को पाने की प्यास लेकर निकले हुए यात्री हैं। जब तक परमात्मा नहीं मिलेंगे, तब हमारी प्यास तृप्ति में बदलेगी नहीं। तो परमात्मा को पाना है। संपत्ति कितनी भी मिली, तृप्ति नहीं होती है। आपका अनुभव है ना? है ना अनुभव? संपत्ति कितनी भी मिली, तृप्ति नहीं होती है। लेकिन कारण क्या है? कारण यही है कि प्यास परमात्मा को पाने की है! प्यास पानी की हो, और तुम रोटी खाओ तो क्या होगा? प्यास पानी की है तो पानी ही पीना पड़ेगा। प्यास परमात्मा को पाने की है, और तुम संपत्ति को इकट्ठी करते हो। तो तृप्ति कैसे होगी? तो जब तक परमात्मा नहीं मिलेंगे, तब तक तृप्ति नहीं होगी।

तो वो अरबपति बिज़नेस में जुड़ा हुआ है। पूरा दिन बिज़नेस में। फिर रात को सपना भी क्या आएगा? रात को सपना क्या आएगा? बिज़नेस का ही आएगा। एक दिन उस श्रीमंत के मित्र ने कहा कि, “हमारे नगर से ५० किलोमीटर दूर जंगल में एक संत रहते हैं। बड़े अच्छे गुरु हैं। उनका दर्शन एक बार करो।” लेकिन श्रीमंत को समय कहाँ?

‘श्रीपाल रास’ में एक घटना आती है। जब श्रीपाल महाराज को ख्याल हुआ कि नज़दीक में एक मंदिर है, जिनालय, और उसके द्वार बंद हो गए हैं, और कोई पुण्यशाली जाएगा, द्वार खुल भी जाएगा, प्रभु का दर्शन होगा… तो श्रीपाल जी दर्शन करने के लिए जाने को तैयार हुए। उन्होंने धवल सेठ को पूछा कि, “आपको आना है दर्शन के लिए?” तब धवल सेठ क्या कहते हैं? कि, “तुम भगत हो तो दर्शन के लिए जाओ। हमें कहाँ समय है? मुझे तो खाने का समय नहीं है। सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन और शाम का सपर तीनों एक साथ करता हूँ। मुझे खाने का समय नहीं है। तुम दर्शन की बात करते हो?” मैं बहुत बार कहता हूँ कि आपको श्रीपाल बनना है ना? आपको तो श्रीपाल बनना है ना? तो श्रीपाल की व्याख्या क्या हुई? जो प्रभु के लिए तैयार हो, वो श्रीपाल। और जो बिज़नेस के लिए तैयार हो, वो धवल सेठ। प्रभु के लिए तैयार है वो श्रीपाल, और बिज़नेस के लिए तैयार है वो धवल सेठ। आपको तो श्रीपाल ही बनना है ना?

समयसर आप आ जाते हो, बहुत अच्छा है। ये प्रभु के शब्द हैं। मुझे कुछ नहीं कहना है। प्रभु की वाणी, प्रभु के शब्द, एक शब्द भी भीतर जाएगा, तो परिवर्तन हो ही जाएगा। सद्गुरु के एक शब्द में ताकत होती है कि जीवन को परिवर्तित कर दे।

एक साधक गुरु के पास गया। गुरु के चरणों में वंदन अर्ज किया। साधक को १० मिनट में जाना है। सद्गुरु के चरणों में रहने की इच्छा तो है, लेकिन ऐसा आवश्यक कार्य है कि १० मिनट से ज़्यादा वो सद्गुरु के चरणों में रह नहीं सकता। तो उसने गुरुदेव के चरणों में निवेदन किया कि, “गुरुदेव, सिर्फ १० मिनट आपके पास हूँ। कुछ मुझे प्रभु के शब्द दो।” सद्गुरु तैयार हैं। सद्गुरु तैयार थे। लेकिन वो साधक तैयार नहीं। हमें ये देखना पड़ता है कि आप तैयार हो कि नहीं। एक शब्द काफी है। एक शब्द यदि वो शब्द आपके अंतःस्तर में घुस गया! तो गुरु तैयार थे, लेकिन साधक तैयार नहीं था। गुरु ने सोचा, ‘पाँच मिनट, छह मिनट, अरे सातवें मिनट पर भी साधक तैयार हो जाए, तो दो शब्द दूँ!’ लेकिन जब तैयार ही नहीं है, तब वे शब्द दूँगा, उसके अंतर में वे शब्द नहीं जाएंगे। छह मिनट हो गए, गुरुदेव बोलते नहीं। अब साधक ने सोचा, ‘Guru is the boss, Guru is the supreme boss। हम तो साधक हैं, शिष्य हैं। गुरु को क्या करना, क्या नहीं करना, वो तो हम कह नहीं सकते। अब गुरुदेव नहीं बोलते हैं, तो गुरुदेव के मौन को भी स्वीकार करूँ।’ छह मिनट के बाद वो निकला। दस-पंद्रह डग (कदम) गया गुरु से दूर, और गुरु ने देखा कि हाँ, अब तैयार हो गया! मैंने पहले भी कहा था, सद्गुरु फेस रीडिंग के मास्टर होते है। उसका फेस नहीं दिखता है, लेकिन उसकी बॉडी लैंग्वेज (Body Language) को देखकर गुरु को लग गया कि वो तैयार हो गया है। तब गुरु ने कहा। क्या कहा गुरु ने? गुरु ने कहा—

“खड़ा रह! खड़े रह जा!”

एक ही वाक्य, ‘खड़े रह जाओ!’ वो खड़ा रह गया। गुरु की ओर देखा। समझा कि गुरु मुझे बुला रहे हैं। लेकिन जब गुरु के मुँह को देखा, तब वो समझ गया कि गुरुदेव क्या कह रहे हैं। गुरुदेव ने इतना ही कहा है: “खड़े रह जाओ!” गुरुदेव के मुख को देखकर वो समझ गया कि गुरुदेव क्या कह रहे हैं। गुरुदेव कह रहे हैं, ‘तू विभाव में जा रहा है। अब विभाव में नहीं जाना है। खड़े रह जा, और स्वभाव में आ जा।’ एक ही वाक्य! वो झुक गया। उसने कहा, “गुरुदेव, आपका बहुत ऋणी हूँ। आपने मुझे बहुत ही सुंदर धर्म उपदेश दिया।”

एक ही वचन— ‘खड़े रह जा!’ तू कहाँ जा रहा है? तू राग और द्वेष की ओर जा रहा है। तू अहंकार की ओर जा रहा है। ‘खड़े रह जा!’ आपको भी एक वचन छू जाए तो? हृदय को? किसी के ऊपर गुस्सा आ भी गया कि वचन याद आ जाए— ‘अरे, खड़े रह जाने का। क्रोध में जाने का नहीं।’ भोजन के लिए बैठे, टेस्टी (Tasty) चीज़ आई, राग की संभावना है, तुरंत ये वचन याद आ जाएगा— ‘खड़ा रह जाने का है। राग में नहीं जाने का है।’ किसी ने कहा, ‘तुम बहुत भले मानस हो, तुम बहुत अच्छे हो’, अहंकार आने की संभावना है, और उस समय पे ये वचन याद आ जाए तो? अहंकार में नहीं जाना है।

साधक को सतत यही सोचना है कि ‘मैं साधना पथ पर हूँ या नहीं?’ आप चलते तो हैं, लेकिन सही रोड पर चलते हैं या नहीं चलते हैं, वो देखना है। तो आपकी साधना प्रॉपर वे (Proper Way) पर परफेक्टली (Perfectly) चल रही है या नहीं चल रही, उसका आप पृथक्करण कर सकते हो। साधना आपकी शायद २५ बरस से चल रही है या ५० बरस से चल रही है। अब आपको यही देखना है कि मेरा राग कितना कम हुआ? मेरा द्वेष कितना कम हुआ? मेरा अहंकार कितना कम हुआ?

कभी गुरुदेव के पास गए? कि, “गुरुदेव, रोज़ की दो सामायिक करता हूँ। समभाव में मुझे रहना है। लेकिन एक भी निमित्त मिलता है, मैं क्रोध में चला जाता हूँ।” गुरुदेव के पास जाकर आपने कभी आँसू की धार बहाई है?

आनंदमयी माँ! हिंदू संतों में भी बहुत निर्मल हृदय की, पवित्र हृदय की संत थीं। एक भक्त, आनंदमयी माँ का भक्त था। २० बरस से हर महीने एक बार माँ के चरणों में वंदन करने के लिए वो आता था। जब २० वर्ष पूरे हुए, एक दिन आनंदमयी माँ के पास वो भक्त आया। और उस भक्त ने माँ के चरणों में पड़कर, फूट-फूट कर रोकर कहा कि, “माँ, २० बरस से मैं तेरे पास आता हूँ, लेकिन मुझमें कोई परिवर्तन नहीं! तो मुझे शर्माना चाहिए या तुझे शर्माना चाहिए?”

गुरु को चैलेंज (Challenge) दो! वो भक्त कहता है, “मैं तेरा भक्त हूँ माँ। अब ज़िम्मेदारी तेरी है। परिवर्तन मुझमें नहीं हुआ, तो मुझे शर्माना चाहिए या तुझे शर्माना चाहिए?” आपके गुरु जो भी हों, आप गुरु के पास जा सकते हो और कह सकते हो, “गुरुदेव, आपने मेरी ज़िम्मेदारी ली। अब मेरी साधना परफेक्टली और प्रॉपर्ली नहीं चलती है, तो आपको देखना है। मैं तो अज्ञानी आदमी हूँ। मैं क्या करूँ?” तो वो भक्त गुरु से चैलेंज मारता है कि, ‘मुझे शर्माना चाहिए या तुझे शर्माना चाहिए? कि तेरा भक्त हूँ मैं, और मुझमें कोई परिवर्तन नहीं!’

प्रभु से कभी कहा कि, ‘आपके चरणों पर चंडकौशिक साँप आया और आपने चंडकौशिक सर्प में परिवर्तन कर दिया! मैं तो आपके चरणों में डंस देने के लिए नहीं आता हूँ। पूजा करने के लिए आता हूँ। फिर भी मुझमें परिवर्तन क्यों नहीं?’ प्रभु से लड़े कभी? प्रभु से लड़ो। कि ‘चंडकौशिक साँप के हृदय को तू बदल सकता है। उसकी आँखों को तू बदल सकता है। उसकी आँखों में जो ज़हर था, उस ज़हर को तू समाप्त कर सकता है। तो मेरी आँखों में वासना का ज़हर है। उस ज़हर को तू समाप्त क्यों नहीं करता?’

अब है ना फाइटिंग (Fighting)! घर में नहीं करने की। श्राविका भी राज़ी हो जाएगी। घर में फाइटिंग नहीं। अब फाइटिंग एक प्रभु के पास! कि चंडकौशिक को बदला तो मुझे क्यों नहीं बदला? दूसरी फाइटिंग हमारे पास। इतने सारों को दीक्षा दे दी, तो हमको क्यों नहीं? प्रभु के पास जाओ, फूट-फूट कर रोओ। और रोना नहीं आए, तो लड़ो। लड़ना तो आता ही है, फाइटिंग तो आती है। प्रभु से लड़ो।

वीरविजय महाराज ने बताया कि प्रभु के साथ कैसे लड़ना।

“सुलसादीक नव जणने जिनपद दीधु।”

‘प्रभु आपने सुलसा को तीर्थंकर पद दिया। रेवतीजी को तीर्थंकर पद दिया। श्रेणिक महाराजा को तीर्थंकर पद दिया। तो मुझे क्यों नहीं? क्यों पक्षपात करते हो तुम? कि सुलसाजी को देना, रेवतीजी को देना, और मुझे नहीं देने का? तो पक्षपाती हो!’ लड़ो!

तो परम रस कैसे?

“सगरा हो सो भर-भर पीवे, नगरा जाय प्यासा।”

अब हम सगरा बन जाएं, तो परम रस के ग्लास पर ग्लास हम पी सकते हैं। लेकिन सगरा होना पड़ेगा। तो सगरा कैसे बनना, वो कल जानेंगे। क्या बात है!

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