Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 24-07-2026 | Pune Chaturmas

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पूरन मन, पूरन सब दीसे

मुझे आपकी दृष्टि को बदलना है; आपके मन को बदलना है जिससे कि आप पूर्ण आनंद में रह पाएं। अगर आपके मन में प्रभु बस गए, प्रभु का प्रेम बस गया, मन पूर्ण हो गया, तो फिर आपको सब पूर्ण ही दिखेगा। मन पूर्ण हो जाए, तब पूरी दुनिया पूर्ण दिखती है।

किसीका दोष आपको दिखता है, वह आपकी दोष-दृष्टि के कारण दिखता है। आप बड़े प्रबुद्ध हैं इस लिए औरों में जो राग-द्वेष-अहंकार है – वे सब आपको दिखते हैं! लेकिन प्रबुद्धता का यह उपयोग सही नहीं है। अपने भीतर झाँकोगे तब आप को दिखेगा कि औरों में तो एकाध दोष है, मुझ में तो सब दोष भरे हुए हैं!

मन पूर्ण हो जाए फिर आप घटनाओं के प्रति सर्वस्वीकार में रहते हैं। अभी तो आप पहले से निश्चित करते हैं कि यह घटना ऐसे ही घटित होनी चाहिए। फिर घटना आप की अपेक्षा से अलग घटित हो, तो आप नाराज़ हो जाते हैं। अगर जैसी भी घटना घटित हो, उसे आप स्वीकार कर लें, तो क्या होगा? आप सदैव आनंद में रहेंगे!


महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराजा ने प्रभु से प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! मेरा मन जब पूर्ण प्रेम से भर गया, तब मेरा मन पूर्ण हो गया।”
“पूरन मन पूरन सब दीसे, नहीं दुविधा को लाग।”
प्रभु मन में बस गए। प्रभु का प्रेम मन में बस गया। मन पूर्ण हो गया। ऐसा मन पूर्ण हो गया कि घटना कैसी भी घटे, उसका असर साधक के मन पर नहीं होता।
एक बार मैं प्रवचन दे रहा था। एक भावक ने मुझसे पूछा कि, “गुरुदेव! प्रभु की साधना का संपूर्ण प्रतिनिधित्व करने वाला एक शब्द आपको पसंद करना हो तो आप कौन से शब्द को पसंद करेंगे?”
तब मैंने कहा— “सर्व-स्वीकार।”
एक शब्द ऐसा है जो प्रभु की संपूर्ण साधना का प्रतिनिधित्व करता है। प्रभु ने खुद ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ के १५वें अध्ययन में कहा है— “जो कसिणं अहिआसए स भिक्खू”
जो सर्व स्वीकार करता है, वही मेरा भिक्षु है। वही मेरी भिक्षुणी है, वही मेरे साधक और साधिका हैं।
यदि हम प्रभु के साधक बनना चाहें, तो हमें ‘सर्व-स्वीकार’ को अपनाना पड़ेगा। सर्व-स्वीकार! जैसी भी घटना घटित हो, हमें स्वीकार कर लेनी है। घटना कैसे खुलेगी हम नहीं जानते। लेकिन जैसी भी घटना घटित हुई, हम स्वीकार कर लें, तो क्या होगा? हम सदैव आनंद में रहेंगे। अभी क्या होता है? हम पहले से निश्चित करते हैं कि ‘यह घटना ऐसे घटित होनी चाहिए। ये व्यक्ति है सामने वाला, तो उसको ऐसा बोलना चाहिए।’ अब तुम कैसे ये निश्चय कर सकते हो कि वो आदमी ऐसा ही बोलेगा? वो दूसरे रूप से बोला, आप नाराज़ हो जाएंगे। तो आप नाराज़ तो हुए, लेकिन कारण क्या था? कारण सामने वाला व्यक्ति नहीं, आपकी अपेक्षा थी। आपने सोचा था ‘ये व्यक्ति मेरे साथ ऐसा वर्तन करेगा।’ उसने ऐसा नहीं किया, तो क्या फर्क पड़ता है? फर्क क्या पड़ता है? मैं बहुत बार कहता हूँ कि किसी आदमी ने गाल पर चांटा जड़ दिया, तो गाल पर सूजन आ जाएगी। लेकिन किसी ने कड़वे शब्द बोल दिए तो क्या होगा? कान में सूजन आ जाएगी? क्या होता है? चांटा जड़ दिया तब तो हम समझते हैं कि गाल पर सूजन है, लेकिन किसी ने कड़वे शब्द बोले तो क्या हुआ? उससे कान में सूजन आ जाए? तो उसकी जैसी मर्जी थी, उसने वैसा शब्द बोला। उसकी मर्जी थी, बोल दिया। हम स्वीकार कर लें।
मेरे दादा गुरुदेव भद्र सूरी महाराज साहेब । उनकी एक आँख में ग्लूकोमा (Glaucoma) आ गया— झाँमर, और एक आँख की रोशनी खत्म हो गई। दूसरी आँख में कैटरेक्ट (Cataract – मोतियाबिंद) आया था। उसका ऑपरेशन हुआ। ऑपरेशन फेल (Fail) हुआ। दूसरी आँख की रोशनी भी चली गई। अब दूसरी कोई भी इंद्रिय हो, उसका अभाव उतना नहीं अखरता, जितना अभाव यदि आँख की रोशनी खत्म हो जाए, तो अखरता है। दोनों आँखों की रोशनी खत्म हो गई। बिना आँखें क्या करना? लेकिन गुरुदेव घटना को स्वीकार करने वाले थे। उनके चेहरे पर इतना ही आनंद था, जितना पहले था। किसी ने पूछा, “गुरुदेव! आपकी दोनों आँखों की रोशनी खत्म हो गई, फिर भी आप आनंद में हैं?”
तब गुरुदेव ने कहा कि, “ये तो प्रभु का संकेत है। अब तक मैं स्वाध्याय करता था। अब प्रभु कह रहे हैं कि तेरे स्वाध्याय का समय पूरा हो गया, अब तुझे ध्यान में जाना है। अब ध्यान में ही जाना है तो आँख की क्या आवश्यकता है? यूँ भी ध्यान में तो आँखें बंद करनी होती हैं। तो आँखें बंद हो गईं, अब ध्यान में चले जाएंगे।” घटना कोई भी हो, हम स्वीकार कर लें।
एक घटना मुझे याद आती है। पालनपुर में (उत्तर गुजरात में) एक श्रावकजी रहते थे। प्रभु की आज्ञा के पालक। पर्व दिवस में पौषध करने वाले। पर्युषण में तो आठों दिन के पौषध! एक दफ़े पर्युषण की आराधना चल रही थी। वे पौषध में थे। उनके एक संबंधी मुंबई रहते थे। संबंधी के युवा लड़के ने ‘सोलभत्ता’ (१६ उपवास) किया। उसकी पत्रिका छपवाई गई। पर्युषण के पारणे के दिन उसका पारणा था। पत्रिका पालनपुर भी आ गई उस श्रावकजी के हाथ में। श्रावकजी ने देखा कि ‘मैं तो ६४ प्रहर के पौषध में हूँ।’ तो पंचमी को तो जाने का होता ही नहीं, और वे संघ के अग्रणी भी थे। पंचमी का पारणा, छठ का वरघोड़ा (शोभायात्रा), फिर सातम का-तपस्वियों का बहुमान, फिर चैत्य परिपाटी… ये सब कार्यक्रम थे। तो उन्होंने सोचा कि ‘सब कार्यक्रम निपटा कर मैं मुंबई जाऊँगा और उस युवा की साता पूछ लूँगा।’
एक सप्ताह के बाद (पर्युषण के एक सप्ताह के बाद) वे मुंबई गए। मुंबई सेंट्रल उतरे। टैक्सी ली, नज़दीक में ही संबंधी का घर था। रात को १०:३० बजे संबंधी के घर पर पहुँचे। अब जिसने सोलभत्ता किया था, वो युवा रूटीन लाइफ (Routine Life) में आ गया था। जॉब पर से छूट कर ट्रेन में घर पर आने में उसे रात के १० बज जाते थे। १० बजे रात को युवा आया। हाथ-मुँह धोया और डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। और गरम भाखरी और साग खा रहा है। उसी समय पालनपुर वाले श्रावक आए। आए हैं क्यों? सोलभत्ता की साता पूछने! और सोलभत्ता का तपस्वी क्या कर रहा है? रात को १०:३० बजे भोजन कर रहा है।
पालनपुर वाले श्रावकजी ने क्या सोचा, वो बाद में कहूँगा। यदि आप हैं, आप क्या सोचेंगे? “लो, ये सोलभत्ता किया! अरे, १६ दिन तू भूखा रह सका और अब रात को खाना नहीं छोड़ सकता है?” ऐसा ही विचार आएगा ना? घटना को सम्यक् रूप से स्वीकारना, यही जिनशासन है। इसलिए मैंने कहा था कि निश्चय से जिनशासन में प्रवेश हमारा कब होता है? जब हम मानते हैं कि ‘सब लोग अच्छे हैं। सब अच्छे ही हैं। बुरा हो तो सिर्फ एक मैं ही हूँ।’ ऐसा विचार जब तक आपके मन में स्थिर ना हो, तब तक निश्चय से जिनशासन में प्रवेश नहीं होता। व्यवहार से तो आप श्रावक भी हो गए।
पाँचवे गुणस्थानक पर पाँचवी दृष्टि छट्टी दृष्टि… ‘योगदृष्टिसमुच्चय’ ग्रंथ हरिभद्र सूरि महाराजा ने लिखा है। उसमें आठ दृष्टियों की बात आती है, विकास क्रम की बात कि कैसे विकास क्रम होता है। वहाँ पाँचवी दृष्टि में सम्यक् दर्शन होता है। सम्यक् दर्शन के पूर्व चार दृष्टियां हैं। पहली दृष्टि है ‘मित्रा दृष्टि’। मित्रा दृष्टि में जब साधक आता है, तब पूरी दुनिया के लोग उसको मित्र लगते हैं। आपने तो दो विभाग बनाए हैं कि कितने मित्र हैं, कितने अमित्र हैं। सब मित्र हैं? आपके लिए क्या है? All are friends? नहीं। “मेरे अहंकार को जो सहलाता है, वो मेरा मित्र है। जो मेरे अहंकार को नेगलेक्ट (Neglect) करता है, वो मेरा अमित्र है, शत्रु है।” आपने दो विभाग कर दिए।
जब आप मित्रा दृष्टि में आते हैं (पहली दृष्टि में), तब आपके लिए सभी आत्माएं मित्र ही हैं। कोई शत्रु नहीं। हम कहते हैं ये मिथ्यादृष्टि हैं, मिथ्यादृष्टि हैं, लेकिन मिथ्यादृष्टि में भी कितने गुण होते हैं! चार दृष्टि तक तो मिथ्यात्व है, सम्यक् दर्शन नहीं है। लेकिन चार दृष्टियों में जो गुण बताए हैं, आप यदि सुनें तो आपको हो जाए कि पहली दृष्टि में भी मेरा ठिकाना नहीं! तो सबको मित्र मानना, क्योंकि सभी सिद्धात्माएं हैं। सभी सिद्धात्मा।
एक युवा आया आपके वहाँ, और आपको ख्याल आया कि ये दीक्षा लेने वाला है। आप कहेंगे, “साहेबजी! संघ की ओर से हमें सम्मान करना है, और ये तो दीक्षार्थी है। भविष्य में दीक्षा लेने वाला है।” लेकिन इसके ऊपर आपका बहुमान भाव कितना है? और ऐसा कोई दीक्षार्थी है, आपको मालूम नहीं, और वह चलता था और आपको पैर लग गया। आप गुस्से हो जाएंगे! “देखता है कि नहीं देखता है?” फिर कोई कहेगा, “अरे ये कौन था मालूम है? ये तो दीक्षार्थी है, दीक्षा लेने वाला है।” “ओह! वो दीक्षा लेने वाला है? भविष्य में दीक्षा लेने वाला है? उसका मैंने अपमान कर दिया! आप क्षमा मांगेंगे।” भविष्य में दीक्षा लेने वाला जो है, उसका भी आप अपमान कभी नहीं करोगे, उसका बहुमान ही करोगे। तो भविष्य में जो मोक्ष में जाने वाला है, उसके लिए आप क्या करोगे? सब बोलो। तुम भी बोलो। क्या करोगे? ये सब भविष्य में मोक्ष में जाने वाले हैं, उस पर बहुमान है? सब पर बहुमान है? ये मेरे प्रभु के श्रावक हैं, ये मेरे प्रभु की श्राविका हैं।
मुझे जब प्रभु का प्रेम मिला और मेरा मन पूर्ण हुआ, तब से एक क्षण ऐसा नहीं आया कि किसी व्यक्ति पर मेरा तिरस्कार हुआ हो। सबके प्रति प्रेम! सबके प्रति प्रेम। तुम कौन हो, कैसे हो, इससे मुझे कोई संबंध नहीं। मुझे संबंध इतना ही है कि तुम भविष्य के सिद्ध आत्मा हो। और भविष्य के सिद्ध आत्मा जो हैं, वो मेरे लिए पूजनीय हैं। आप अनंत गुण के स्वामी हो। अनंत ज्ञान आपके पास है। केवलज्ञान कहाँ है? कहाँ छुपा हुआ है? आपके भीतर छुपा हुआ है। आप केवलज्ञानी बनोगे तो केवलज्ञान बाहर से आने वाला नहीं है। आपके भीतर ही छुपा हुआ है। ज्ञानावरणीय कर्म क्षीण होगा तो आप केवलज्ञानी हो जाएंगे। तो अभी भी अनंत गुणों के स्वामी आप हो, और मैं आपको इस रूप में ही देख रहा हूँ।
और आज मुझे यही कहना है कि आप भी इस रूप से सबको क्यों नहीं देखते? देखो ना! यही तो प्रभु शासन है। इत्तियकं जिणसासणं, इत्तियकं जिणसासणं।
इतना ही जिनशासन है कि सब में सिद्धात्मा को देखें। एक श्रावक की कोई भूल हो गई और श्रावक क्षमा मांगेगा, मैं कहूँगा— “नहीं नहीं नहीं, ऐसा कुछ मन में लाना नहीं, मुझे ऐसा कुछ लगा भी नहीं।” प्रभु ने मुझे प्रेम दिया है और प्रभु ने प्रेम से मेरे मन को, हृदय को, अस्तित्व को भर दिया है। अब मेरा काम एक ही है— आपको प्रेम देना। प्रवचन के शब्द तो सिर्फ एक बहाना हैं। मुझे प्रभु के प्रेम का अनुभव आपको कराना है कि प्रभु का प्रेम कैसा होता है। ये मेरा प्रेम नहीं है। यशोविजय का नहीं है। प्रभु का है। प्रभु ने जो मुझे दिया है, वही मैं आपको दे रहा हूँ। प्रभु आप सबको चाहते हैं। कितना प्रभु का प्रेम… कितना प्रेम!
टॉलस्टॉय (Tolstoy) की एक कथा है। टॉलस्टॉय रूस के बड़े साहित्यकार हो गए। टॉलस्टॉय ने एक कथा लिखी है— एक माँ थी। उसके दो बच्चे। एक दिन आठ साल के बच्चे ने माँ से कहा कि, “माँ! तेरा प्रेम तो हम पर सदैव बरसता ही है और माँ का प्रेम तो अतुलनीय होता है।” Beyond the words, Beyond the imagination! प्रभु और सद्गुरु के प्रेम के बाद तुरंत जो प्रेम आता है, वो माँ का प्रेम है। आपका स्थान बहुत ऊँचा है। आप जो बच्चे को दे रहे हो वो बेमिसाल है, लाजवाब है। आप सिर्फ आपका प्रेम ही आपके बच्चे को नहीं देते हो, आप जिनशासन भी आपके बच्चे को देते हो। मुझे दीक्षा मेरी माँ ने दी। माँ ही संस्कार देती है। माँ ही दीक्षा के मार्ग पर ले जाती है।
तो प्रभु और सद्गुरु के प्रेम के बाद तुरंत जो प्रेम आता है, वो माँ का प्रेम है। माँ ने कितना प्रेम किया! हम छोटे थे। बिल्कुल छोटे। रातों की रातों माँ हमारे लिए जगी थी। हम बीमार थे, चिल्लाते थे। माँ एक पल के लिए रात को सोई नहीं थी। ये माँ का प्रेम है। तुम कितना भी करो, माँ के प्रेम का जो ऋण है, उस ऋण से मुक्त होना ना तुम्हारे लिए संभवित है, ना मेरे लिए संभवित है। हम दीक्षित हुए हैं, संसार के सब संबंधों को हमने त्यागा है। लेकिन माता और पिता हमारे लिए भी उपकारी हैं।
तो आठ साल के बच्चे ने माँ से कहा कि, “माँ! तेरा प्रेम तो अतुलनीय है, लेकिन आज मुझे कहना है कि तेरा हम दोनों पर जो प्यार है, उससे ज्यादा प्यार हमारा तेरे पर है।” दो बच्चे थे। एक आठ साल का, एक छह साल का। तो आठ साल का बच्चा कह रहा है कि, “माँ तेरा जो हम दोनों पर प्यार है, उससे ज्यादा प्यार हमारा तेरे पर है।” माँ हँसने लगी। माँ तो हँसती ही है। माँ ने पूछा, “कैसे?” तो बच्चे ने कहा, “गणित तो साफ़-साफ़ है। तेरे दो बच्चे हैं। तो तेरा प्रेम आधा-आधा बँट जाता है। हमारे लिए माँ एक ही है, तो हमारा पूरा प्रेम तुझे मिलता है।”
टॉलस्टॉय की कहानी यहाँ पूर्ण होती है। हम उस कहानी को आगे ले जाएं। हमारी माँ ये चिंतामणि दादा, गोड़ीजी पार्श्वनाथ दादा… उसके दो बच्चे नहीं, हज़ार बच्चे नहीं, अनगिनत बच्चे हैं! फिर भी हम सब पर उसका प्यार बह ही रहा है। एक-एक बच्चे की पर्सनल केयर (Personal Care) हमारी माँ लेती है। आपको मालूम है? अनुभव है? मुझे तो अनुभव है। मैं तो कहता हूँ कि प्रभु के एयर-कंडीशंड (Air-Conditioned) हाथों में ही मैं हूँ। कभी भी विषाद की रेखा, तनिक रेखा भी मुँह पर नहीं झलके, हृदय में नहीं झलके। बस आनंद ही आनंद! क्यों कि में प्रभु के एयर-कंडीशंड हाथ में हूँ। आनंद ही आनंद! तो हमारी सब की पर्सनल केयर हमारी माँ करती है।
ये माँ भी पूजनीय है। जन्मदात्री माँ भी कम पूजनीय नहीं, ये भी पूजनीय है कि जिसने नौ-नौ महीना हमें पेट में रखा। क्या झेला होगा पीड़ा हमारे लिए हमारी माँ ने! कभी आप सोचते हो? माँ के प्रेम का अनुभव आपके पास है। माँ ने क्या-क्या किया तुम्हारे लिए… और यदि माँ का उपकार आपकी स्मृति में सदा रहेगा, तो ही गुरु और प्रभु का उपकार आपकी स्मृति में आएगा। जन्मदात्री माँ, उसका ऋण भी आप नहीं चुका सकते। तो प्रभु और गुरु का ऋण तो हम कैसे चुकाएंगे?
तो हमारी प्रभु माँ ने, हमारी गुरु माँ ने और हमारी जन्मदात्री माँ ने हमारी पर्सनल केयर की है। हम नरक में थे, निगोद में थे, वहाँ भी चिंतामणि दादा की पर्सनल केयर हमें मिली। और उस पर्सनल केयर से ही हम इस मनुष्य जन्म में आए हैं। तो प्रभु के ऋण से कभी भी मुक्त हम नहीं हो सकते। ना गुरु के ऋण से मुक्त हो सकते हैं, ना जन्मदात्री माँ के ऋण से हम मुक्त हो सकते हैं। हमारी साधना और आपकी साधना केवल ऋण मुक्ति का आयास है कि ‘प्रभु के ऋण से हम मुक्त कैसे हों? सद्गुरु ने इतनी साधना दी, सद्गुरु के ऋण से हम मुक्त कैसे हों?’
बस प्रभु की आज्ञा का पालन करें। महोपाध्याय यशोविजय महाराज को किसी ने पूछा था कि ‘प्रभु के ऋण से मुक्त हम कैसे हों?’
तब उन्होंने कहा था – “आणा पाले साहिब तूसे”
जब तुम प्रभु की आज्ञा का पालन करते हो, तब प्रभु के ऋण से तुम मुक्त हो सकते हो। प्रभु तुम्हारे पर प्रसाद बरसाते हैं, प्रभु तुम्हारे पर प्रेम बरसाते हैं।
तो वो पालनपुर वाला भाई, सोलभत्ता वाले युवा को रात को १०:३० बजे भोजन लेते हुए देखता है। आपको क्या विचार आया था? “लो सोलभत्ता किया! क्या सोलभत्ता किया? ऐसा सोलभत्ता? रात को १०:३० बजे खाते हो!” हम क्या देखेंगे दूसरों में? गुण को देखेंगे? क्या देखेंगे? गुलाब है ना, गुलाब का फूल, उसमें एक साहचर्य होता है— पुष्प और काँटा। गुलाब के फूल के पास काँटे होते ही हैं। अब तुम कैसे देखते हो, इस पर पूरी बात निर्भर होती है। तुम काँटों में गुलाब देखोगे तो तुम्हें होगा— “वाह! कितना सुंदर! इतने तीक्ष्ण काँटे और उसमें सुकोमल गुलाब! वाह कितना अच्छा!” लेकिन गुलाब में काँटे को देखें, तो? अभी तक क्या किया? काँटों में गुलाब देखा या गुलाब में काँटे देखे? क्या किया? अब क्या करना है? अब काँटों में गुलाब को देखना है।
उस पालनपुर वाले ने काँटों में गुलाब देखा। लिटरली (Literally) वो युवा के पैरों में पड़ गया! वो युवा भोजन लेता है रात को १०:३० बजे, उसके पैरों में वो श्रावक पड़ जाते हैं! युवा शर्मिंदा हो गया। भोजन उसका पूरा हो गया। फिर सब बैठे, तब पालनपुर वाले श्रावकजी ने कहा कि, “वाह! कैसा ये प्रभु का शासन है! कैसा गुरुदेव का पच्चक्खाण होता है! आपने सोलभत्ता कर लिया!” और फिर पालनपुर वाला कहता है कि, “आप सुबह नवकारसी का पच्चक्खाण पार कर नाश्ता यहाँ लेते होंगे। फिर १० बजे आप ट्रेन में सवार होकर जॉब के स्थल पर जाते होंगे टिफिन लेकर, और १२ – १२:३० बजे गरम रोटी और साग खाते होंगे। फिर ३ बजे चाय पीते होंगे। ५:०० बजे फ्रूट्स या नाश्ता लेते होंगे। फिर भी आपको रात को खाना पड़ता है! और आप सोलभत्ता कर सके!”
ये भी देख सकते हो! “ऐसा युवा जिन्होंने नाश्ता किया, दोपहर भोजन किया, दोपहर चाय पी, फिर नाश्ता किया ५:०० बजे और तो भी रात को खाना पड़ता है… वही युवा १६ दिन के उपवास कर सकता है!” आप ऐसा देख सकते हो? अब तो देखेंगे ना? आज से देखने का चालू! तो पालनपुर वाले श्रावकजी की आँखों में आँसू थे कि “यही प्रभु शासन है कि आपको इतनी शक्ति दी। गुरु महाराज ने आपको शक्ति दी। गुरु महाराज के पच्चक्खाण ने आपको शक्ति दी।”
इसलिए मैंने कल कहा था, पच्चक्खाण ले लो, बस हो गया तुम्हारा। हमारी गारंटी! एक डॉक्टर गारंटी देता है, “अरे इतना कोर्स कर लो, तुम रोग मुक्त हो जाओगे।” तो भी तुमको श्रद्धा होती है। और हम सद्गुरु कहते हैं कि पच्चक्खाण ले लो, तुम्हारी तपश्चर्या हो जाएगी। मन ढीला है तो भले ढीला रहे, लेकिन गुरु तो सक्षम हैं। प्रभु तो सक्षम हैं। आपकी शक्ति से आपको मासक्षमण कहाँ करना है, प्रभु की शक्ति से, सद्गुरु की शक्ति से आपको करना है।
तो “पूरन मन पूरन सब दीसे”, जब आपका मन पूर्ण हो गया तो पूरी दुनिया पूर्ण दिखेगी। अभी तो क्या दिखता है? “इसके पास जाने का है। अरे क्या जाएं इसके पास, साला क्रोधी!” अरे छोड़ो इसकी बात, उसके पास जाएंगे। संघ का कार्य है और जाने का है… अरे क्या जाएं उसके पास, वो तो अहंकारी आदमी है! आपको सबके दोष दिखते हैं। आप बड़े प्रबुद्ध हैं। किसी में राग है, किसी में द्वेष है, किसी में अहंकार है, आपको दिखता है, आप प्रबुद्ध हैं। लेकिन प्रबुद्धता का ये उपयोग सही नहीं है। प्रबुद्ध तुम हो, तो प्रबुद्धता का उपयोग यही करो कि ‘तुममें क्या भरा हुआ है।’
तुम्हारे भीतर झाँको। किसी और में तो एकाद दोष होगा, यहाँ तो सब दोष भरे हुए हैं। ऐसे तो गुण ही देखना है, दोष को देखना नहीं है। लेकिन कभी-कभी इच्छा हो जाए… रोज़ मिष्टान्न खाते हो तो कभी-कभी नमकीन की भी इच्छा हो जाए। तो रोज़ गुण देखते हो, कभी दोष देखने की इच्छा हो जाए, तो भीतर झाँक लेना, बाहर नहीं झाँकना। भीतर झाँक लेना, सब दोष भीतर भरे हैं। यशोविजय में क्या नहीं है? सब दोष भरे हुए हैं। मैं जब तक वीतराग नहीं होऊँगा, तब तक सब दोष मेरे में भरे हुए हैं। तो मुझे दोष देखने ही हैं तो मेरे भीतर में झाँकूँ, बाहर देखने की क्या आवश्यकता है? और सभी आदमी में गुण तो होते ही हैं। आपके पास देखने की दृष्टि चाहिए।
एक दिन मैं विहार यात्रा में था। उनाले (गर्मियों) का समय, शाम का विहार था। मैं व्हीलचेयर (Wheelchair) में था और सेवक भरत व्हीलचेयर चला रहा था। उसको प्यास लगी। वहाँ एक प्याऊ दिखी। रोड से थोड़ी दूर थी, तो भरत व्हीलचेयर प्याऊ की ओर ले गया। प्याऊ वाले आदमी ने देखा— “ओह! संत आ रहे हैं! संत आ रहे हैं!” हिंदू लोगों में जो भक्ति होती है, मैंने देखी है क्या भक्ति होती है! उनके लिए सब संत ‘संत’ ही होते हैं। तो प्याऊ वाले ने देखा— “संत आ रहे हैं, बापू आ रहे हैं।काठियावाड़ में बापू कहते है। बापू आ रहे हैं।” मैं देख रहा था। उसने थाली को पोंछा, लोटे को पोंछा, ग्लास को भी पोंछा, सब कुछ साफ़ किया। फिर लोटे में पानी भरा, ग्लास में पानी भरा, सब थाल में रखा और नैवेद्य का थाल लेकर जैसे तुम प्रभु के पास जाते हो, इस भाव से मेरी ओर आया।
मैं उसके चेहरे का भाव देखता ही रहा, क्या भाव था! और कहा, “बापू, लो पानी।” तब भरत ने कहा कि, “बापू को तो ये पानी नहीं चलेगा। उबाला हुआ पानी होता है, वही बापू को चलता है। और ऐसा पानी हमारे पास है।” लेकिन मुझे पानी पीना है। तो प्याऊ वाला आदमी क्या कहता है? “अरे अरे अरे! तुम भी पियो! तुम भी भगवान हो। तुम भी भगवान हो!” एक हिंदू आदमी के पास यह दर्शन होता है। आपके पास तो क्या नहीं होगा? आपको तो प्रभु का शासन मिला है। जिसको प्रभु का शासन नहीं मिला, उसकी दृष्टि में क्या बात है— ‘अरे तुम भी भगवान हो, तुम पानी पियो।’ और भरत को भी इतने भाव से पानी पिलाया, मैं देखता ही रह गया।
तो आप यदि देखना चाहें, तो कोई भी व्यक्ति में आप ऐसा गुण देख सको। आपके नौकर को आपने कभी भी देखा है इस तरीके से? चिंतामणि दादा की पूजा करते हो, चिंतामणि दादा के पुजारी को इस रूप से आपने देखा है कि ‘मेरे भगवान की पूजा करता है’? गाँवों में ऐसा होता है, आप गाँवों से ही आए हैं। गाँवों में ऐसा होता है। पुजारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहा। अब लड़का बड़ा हुआ, उसकी शादी करनी है। तो पुजारी क्या करता है? उस गाँव वाले (सेठ लोग) मुंबई और अहमदाबाद जहाँ भी रहते हैं, वहाँ जाता है। खाने की कोई चिंता नहीं। किसी के भी वहाँ जाओ, “अरे पुजारी महाराज आए हैं, खाना बनाओ!” और फिर सब दुकान पर जाते हैं— “मेरे बच्चे की शादी है।” आप लिखाते हो, कोई ५०००, कोई १००००, कोई २००००। एक लाख की इच्छा हो तो दो लाख लेकर घर पर जाता है!
लोगो के मन में यही भाव था कि हमारे भगवान! हमारे भगवान की पूजा हम नहीं कर सकते, लेकिन ये आदमी हमारे भगवान की पूजा करता है। तो ये हमारे भगवान का सेवक है। उस सेवक की कोई भी इच्छा अपूर्ण रहनी नहीं चाहिए। हमारे भगवान का सेवक भी मज़ा में, आनंद में रहना चाहिए।
तो “पूरन मन पूरन सब दीसे”— आपका मन पूर्ण हो जाएगा, आपको सब पूर्ण दिखेगा। कहीं दोष है ही नहीं। दोष दिखता है, वो दोष-दृष्टि से दिखता है, नहीं के उसी व्यक्ति में दोष है, उस व्यक्ति में दोष नहीं है, तुम्हारी दोष-दृष्टि से दोष दिखता है। मैंने पहले भी कहा था, मेरे चश्मे के ग्लास में स्पॉट्स (Spots) हैं तो मुझे सब जगह स्पॉट्स दिखेंगे। लेकिन फर्श को साफ़ कराने की आवश्यकता नहीं, मेरे चश्मे के ग्लास को पोंछने की आवश्यकता है। तो आपकी दृष्टि को बदलना है। आपके मन को बदलना है। हम यही धारा में आगे चलेंगे कि आपकी दृष्टि कैसे बदल जाए, आपका मन कैसे बदल जाए और आप पूर्ण आनंद में कैसे रहें।

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