भक्तवत्सल
प्रभु जीवन के दाता हैं। सिर्फ साँस लेना और छोड़ना जीवन नहीं है; उतना तो Coma में पड़ा हुआ आदमी भी कर लेता है! खाना-पीना और मौज करना यह भी जीवन नहीं है। जब हृदय प्रभुमय हो जाए, अस्तित्व के कोने-कोने में सिर्फ और सिर्फ प्रभु का ही वास हो, तब हम कहेंगे की हम सप्राण हैं, जीवंत हैं।
प्रभु की साधना, प्रभु के चरणों के प्रति कृतज्ञता के भाव से झुक जाना – यही हमारा जीवन है। अनंत जन्मों में हमने राग और द्वेष के कचरे से हृदय को भर दिया और प्रभु के लिए सूचनापट (Board) लगाया: “No vacancy for you! आपके लिए जगह नहीं है।” इस जन्म में प्रभु से हृदय को भर देना है और सूचनापट लगाना है: “No vacancy for others!”
जब सद्गुरु तुम्हें एक आज्ञा देते हैं, तब मानना कि प्रभु के प्रेम की ही वर्षा हो रही है। और जब तुम प्रभु की आज्ञा का पालन करते हो, तब तुम्हें प्रभु के प्रेम का स्पर्श होता है। प्रभु वीतराग जरूर हैं, लेकिन हर क्षण प्रेम भी बरसा ही रहे हैं क्योंकि प्रेम प्रभु का स्वभाव है। प्रभु वीतराग भी हैं और भक्तवत्सल भी!
परम आर्हत कुमारपाल महाराजा ने परमात्मा के सम्मुख प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! तेरी आज्ञा का पालन ऐसा हो कि मैं आनंद से झूम उठूँ।” आज्ञा का मिलन, अर्थात् प्रभु के प्रेम की वर्षा। सद्गुरु एक आज्ञा तुम्हें देते हैं, मानना कि प्रभु के प्रेम की ही वर्षा हो रही है। और जब तुम प्रभु की आज्ञा का पालन करते हो, तब प्रभु के प्रेम का स्पर्श तुममें होता है।
प्रभु के प्रेम का अनुभव, एक-एक साधना में प्रभु के प्रेम का स्पर्श, प्रभु के प्रेम का अनुभव—यह बात आनंदघन जी भगवंत ने भी 15वें स्तवन में कही। एक भक्त ने आनंदघन जी भगवंत से पूछा कि, “भगवन! हम तो प्रभु को प्राण से भी ज्यादा चाहते हैं, और यही हमारा अवतार कृत्य है। लेकिन क्या प्रभु हमें चाहते हैं?” आनंदघन जी भगवंत ने कहा, “हाँ, प्रभु तुम्हें चाहते हैं।” भक्त विचार में पड़ गया, “प्रभु वीतराग हैं, कैसे चाहेंगे?”
आनंदघन जी भगवंत ने कहा कि, “प्रभु तुझे चाहते हैं, और इसका Proof यह है कि तुम साधना मार्ग में चलते हो। तुम साधना मार्ग में एक Inch, एक Centimetre भी चलते हो, कारण एक ही है: प्रभु का तुम पर बरस रहा प्रेम। यदि प्रभु का प्रेम तुम पर नहीं बरस रहा है, और तुम उस प्रेम को झेल नहीं पा रहे हो, तो तुम साधना जगत में एक Inch भी आगे नहीं बढ़ सकते।”
“दौड़त दौड़त दौड़ियो, जेती मननी रे दौड़, प्रेम प्रतीत विचारो ढूकडी”
प्रभु का प्रेम तेरे पर बरस रहा है, उसकी प्रतीति तुझे अभी हो जाएगी। और बाद में कहा, “गुरु गम लेजो रे जोड़।” प्रभु वीतराग हैं, तो प्रभु कैसे चाहेंगे? इस प्रश्न का उत्तर सद्गुरु तुम्हें देंगे।
हमारे युग के महान साधना गुरु, साधनाचार्य, पन्यासप्रवर भद्रंकरविजय महाराज साहेब ने कहा है कि, “प्रभु वीतराग जरूर हैं, लेकिन प्रेम को तो बरसा ही रहे हैं।” प्रेम प्रभु का स्वभाव है। और जो स्वभाव है, वो सिद्धशिला में भी जाता है। अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत चारित्र—ये प्रभु का स्वभाव है। तो वीतराग अवस्था में सिद्धशिला पर ये स्वभाव जाता नहीं; ऐसे ही प्रेम बरसाना, ये प्रभु का स्वभाव है। हमारे लिए तो बहुत बड़ी उपलब्धि ये हो गई कि प्रभु हर क्षण हम पर प्रेम बरसा रहे हैं। प्रभु वीतराग भी हैं, भक्तवत्सल भी हैं।
प्रभु महावीरदेव के शिष्य सिंह अणगार थे। प्रभु के ही शिष्य। एक बार सिंह अणगार को एक विचार आया कि, “मैं एकांत में जाकर प्रभु ने Theorycal form में जो कहा है, उसका Practical form में अनुवाद करूँ।” आप प्रवचन सुनेंगे कि पिएंगे? Theorycal form में मैं बातें करूँगा। फिर आप क्या करेंगे? आप Theorycal form में जो बातें कही गई हैं, उसका Practical form में अनुवाद करेंगे। तुम तो करोगे ही। मुझे पूरी श्रद्धा है। आज ही प्रभु के प्रेम का स्पर्श तुम अनुभव करो। आज से ही Practical form चालू।
वैसे तो प्रवचन बहुत सुने तुमने, लेकिन ये चिंतामणि दादा और गोड़ीजी पार्श्वनाथ के सानिध्य में जो प्रवचन हो रहे हैं, वे जीवन परिवर्तन वाले होने जा रहे हैं। और मुझे तो बोलना ही नहीं है, दादा बोल रहे हैं! दादा जो Theorycal form में कह रहे हैं, उसका Practical form में अनुवाद कर दो। प्रवचन के अंत में मैं बताऊँगा कि आज Theorycal form में क्या आया, और आपको Practical form में क्या करना है।
मैं बहुत बार कहता हूँ, धन्ना और शालिभद्र मुनि वैभारगिरि की गुफा में थे। लेकिन जब राजगृही नगरी में प्रभु का समवसरण होता, तब दोनों मुनिवर प्रभु के समवसरण में आते। प्रभु को वंदना करके बैठ जाते। आँखों से आँसू बह रहे होते, और प्रभु के शब्दों को वे पीते रहते। प्रभु की देशना पूर्ण होती, प्रभु को वंदना करके दोनों मुनि वैभारगिरि की गुफा की ओर चलने लगते। गुफा में आकर वे क्या करते? ईर्यावही कर ली, आसन पर बैठे, और यही बात वे करते थे कि प्रभु ने जो Theorycal form में दिया है, उसका Practical form में अनुवाद करो।
वाचना के बाद कोई पाठ तुरंत रखना नहीं। 20 मिनट, कम से कम 20 Minutes वाचना के बाद के Practical form के लिए रखना। उपाश्रय में जाकर ईर्यावहीया करके बैठ जाने का। और आज Theorycal form में जो बातें आईं, उसको Practical form में कैसे अनुदित करना, वो आपको अनुप्रेक्षा करनी है।
तो सिंह अणगार ने सोचा कि प्रभु ने Theorycal form में मुझे बहुत दिया है। इस साल से मेरे साधु-साध्वी बहुत संघों में जा रहे हैं। तो उनसे मैं कहूँगा कि वहाँ जाकर क्या करोगे? Theorycal form में बहुत बातें सुनी हैं। उन बातों का Practical form में अनुवाद करना।
सिंह अणगार प्रभु के पास आए। प्रभु को वंदना अर्ज की। और पूछा कि, “गुरुदेव! प्रभु! आपकी आज्ञा हो तो मैं एकांत में, जंगल में कहीं भी जाऊँ और साधना को सुदृढ़ करूँ।” तो ये बात हुई कि विचार अच्छा था। बहुत बड़ी सुंदर बात है, ये। विचार सुंदर भी हो, लेकिन जहाँ तक प्रभु उस विचार पर Signature न करें, सद्गुरु तुम्हारे उस विचार पर Signature न करें, तब तक तुम्हारा ये विचार ‘विचार’ के रूप में ही रहेगा। विचार आचार में कब परिणत होगा? जब प्रभु का Signature होगा, सद्गुरु का Signature होगा। प्रभु की आज्ञा के बिना, सद्गुरु की आज्ञा के बिना, हम साधना मार्ग में एक डग भी नहीं चल सकते।
गुरुदेव ही जानते हैं कि हम एकांत में जाएँगे, हमें लाभ होगा या नहीं होगा। सद्गुरु ज्ञान से भरे हुए हैं। प्रभु तो अनंत ज्ञानी हैं। तो हम हमारे विचार को सीधे ही आचार में रूपांतरित नहीं कर सकते। चलो, विचार आया जंगल में जाना है। साहेबजी, जंगल में जाऊँ? ऐसा नहीं। “साहेबजी, मैं जा सकता हूँ? आपकी आज्ञा है तो मैं जाऊँ?” प्रभु ने कहा, “तू जा सकता है।” और सिंह अणगार अकेले जंगल के प्रति विहार कर रहे हैं।
हमारे वहाँ साधना के दो प्रकार हैं:
“(एगो ) गियत्थो य विहारो बीओ गियत्थमीसिओ भणिओ”
एक गीतार्थ की साधना यात्रा है। दूसरी गीतार्थ की निश्रा की साधना यात्रा है। तीसरी कोई साधना यात्रा प्रभुशासन में है ही नहीं। एक गीतार्थ की साधना यात्रा है। सिंह अणगार गीतार्थ हैं। तो गुरु, प्रभु कहते हैं, “तू जा सकता है। तेरी साधना को कैसे मोड़ देना, कैसे Twist करनी, वो तू जानता है। तू जा सकता है।”
लेकिन जब हम गीतार्थ नहीं हैं, तब हमें गीतार्थ गुरुदेव की निश्रा में ही साधना करनी चाहिए। और निश्रा का मतलब क्या? साथ में रहना, वो निश्रा नहीं है। शरीर साथ में रहे, वो निश्रा नहीं है। मन सद्गुरु के चरणों में रहे, वो निश्रा है। पूरा तुम्हारा मन, तुम्हारा न हो, प्रभु का और सद्गुरु का हो, तब आप प्रभु की और सद्गुरु की निश्रा में हो।
मन तुम्हारा या हमारा, बोलो तो? तुम्हारा मन तुम्हारा या हमारा? आपके लिए एक Discount दूँगा। Discount तो देना ही पड़ेगा, पुणे में पहली बार आया हूँ। और प्रभु की बातें आप तक पहुँचानी हैं, तो Discount देना पड़ेगा। हम शरीर से, मन से, चित्त से, व्यक्तित्व से, अस्तित्व से प्रभु के हैं, सद्गुरु के हैं। आपके लिए Discount: आपका शरीर शायद 24 घंटों प्रभु की आज्ञा में नहीं होगा। सामायिक करोगे, तब आप प्रभु की आज्ञा में हैं। लेकिन जब आप घर में हैं, जब आप Office में हैं, शायद शरीर आपका प्रभु की आज्ञा में नहीं है। लेकिन मन तो प्रभु की आज्ञा में ही है। बरोबर है?
यहाँ से आप Office जाएँगे। Office जाकर आप पहले क्या काम करेंगे? भगवान का Photo है, उसके सामने धूप-दीप करेंगे। गुरु महाराज का Photo है, तो उसको वंदन करेंगे। प्रभु को और सद्गुरु को मंदिर में या उपाश्रय में तो बिठाते ही हो, Office में क्यों बिठाएँ? आपको भी मालूम नहीं है। है मालूम? हाँ, आपको इतना मालूम है: “प्रभु और गुरु हैं Office में, तो ज्यादा मुनाफा होगा।” प्रभु और सद्गुरु Office में क्यों हैं? आप प्रभु से कहेंगे कि, “प्रभु! आप Office में ही नहीं हैं, मेरे मन में भी हैं। और इसलिए ऐसा कोई सौदा आ जाए जिसमें मैं अनीति करूँ और दो लाख रुपये मिलते हों, आप बैठे हैं मेरे मन में, आप बैठे हैं मेरी Office में, तो आप ऐसा करना कि मेरे हृदय में अनीति की भावना ही नहीं रहे!” प्रभु इसलिए हैं।
और गुरुदेव क्यों हैं? हमारे पुराने गुरुदेव थे। वहोरने के लिए जाते, एकाकी यात्रा करते। मासक्षमण का पारणा हो, मध्याह्न गोचरी जाते। निर्दोष गोचरी मिल गई, तो कहते, “संयम वृद्धि होगी।” निर्दोष भोजन मैं वापरूँगा और संयम की पुष्टि होगी। निर्दोष भोजन नहीं मिला, तो गोचरी नहीं वोहरते। उस दिन 31वें दिन उपवास का पच्चक्खाण कर लेते और कहते, “तपोवृद्धि।” गोचरी मिली, तो संयम वृद्धि; गोचरी नहीं मिली, तो तप की वृद्धि।
आप भी ऐसा ही करोगे। पैसे मिल गए, तो धर्म की वृद्धि होगी। आपके पैसे आपके तो हैं ही नहीं, प्रभु के ही हैं। आप प्रभु के हैं, तो आपकी संपत्ति प्रभु की ही है न? “मैं प्रभु तेरा, तू प्रभु मेरा।” आप प्रभु के हैं, तो आपकी संपत्ति किसकी? प्रभु की। तो मुनाफा ज्यादा हो गया, तो आप क्या सोचेंगे? “धर्म की वृद्धि होगी। आज जो संपत्ति आई, उससे मैं थोड़ा धर्म करूँगा, धर्म में खर्चूँगा, तो धर्म की वृद्धि होगी।” और मुनाफा कम मिला, या ग्राहक भी कोई नहीं आया, तो भी आप निराश नहीं होंगे। आप क्या कहेंगे? “आज आसक्ति बढ़ेगी नहीं।” पैसे ही नहीं आए, तो आसक्ति कैसे बढ़ेगी? तो पैसे मिले, तो धर्म की वृद्धि; पैसे नहीं मिले, तो आसक्ति नहीं बढ़ी, उसका भी आनंद। तो इसलिए आप Office में प्रभु को और सद्गुरु को रखते हैं। अब समझ गए आप?
तो मन तुम्हारा या प्रभु का, बोलो तो? शरीर की बात छोड़ देना। Discount करो। मन किसका? लेकिन हमारे लिए तो पूरा आनंद। शरीर भी प्रभु का, मन भी प्रभु का, हम निर्भार! शिष्य की व्याख्या क्या? शिष्य की व्याख्या एक ही है— जो निर्भार है, वो शिष्य। क्या करना? गुरुदेव जानें। तुम्हें कोई चिंता ही नहीं है। चातुर्मास पूरा होगा, एक भी शिष्य, एक भी शिष्या नहीं सोचेगी कि कहाँ जाना है। गुरुदेव जहाँ कहें, वहाँ जाने का। हम निश्चिंत, निर्भार।
एक बात पूछूँ मैं आपसे? पुणे में मैंने देखा, अहोभाव तो आपके पास बहुत ही है। एक साधु भगवंत को, एक साध्वीजी भगवती को आप देखते हैं और आपकी आँखें नम हो जाती हैं। आपकी आँखें आँसू से भर आती हैं— ‘मेरे प्रभु के वेष-परमात्मा!’ अहोभाव आपके पास बहुत ही है। लेकिन ईर्ष्या है? आज ईर्ष्या की बात करूँगा।
ये हमारे बाल मुनि हैं न? इन बाल मुनि को देखकर इन माताओं को ईर्ष्या होती है? आपको ईर्ष्या होती है कि मेरा लाडला भी कब जिनशासन का मुनि हो जाए और ऐसे सुधर्मा पीठ पर विराजमान हो? और आपको हमें देखकर, हमारे ये सब मुनिराजों को देखकर ईर्ष्या आती है, कि कैसे आनंद में झूम रहे हैं? कोई भी मुनि से पूछना कभी भी कि, “साहेबजी! इतना आनंद कैसे है?” और वे कहेंगे, “आनंद न हो तो क्या होगा? हम निश्चिंत हैं और निर्भार हैं।” सब गुरुदेव को, प्रभु को सौंप दिया है। जो भी करना है, गुरुदेव आज्ञा करेंगे। अगले क्षण के लिए हमें कुछ सोचना नहीं। अगला क्षण तो आएगा जब आएगा। आप तो कब की चिंता कर रहे हैं, अगले साल की, अगले पाँच साल की, Future planning! लेकिन हमारे ये मुनि अगले क्षण का भी विचार नहीं करते। वर्तमान युग में हैं, और इसलिए आनंद में हैं।
तो सिंह अणगार जंगल में गए और वहाँ साधना को सुदृढ़ करने लगे। प्रभु ने जो Theorycal form में कहा था, उसका Practical form शुरू हो गया। उन दिनों में गोशालक द्वारा परमात्मा के परम पावन शरीर पर उपसर्ग हो गया। और प्रभु की काया थोड़ी शिथिल हो गई। ऐसे तीर्थंकरों की काया कभी भी तेजोहीन होती नहीं। लेकिन एक आश्चर्य हुआ कि गोशालक के उपसर्ग से प्रभु की काया थोड़ी निस्तेज हुई, शिथिल हुई।
अब लोग चिंता में पड़ गए। शिष्य तो चिंता में थे ही। अब बात आगे चली कि प्रभु बीमार हैं, बहुत बीमार हैं, बहुत बीमार हैं। ऐसे करते-करते सिंह अणगार जहाँ थे, वहाँ से थोड़े यात्रिक चल रहे थे। वे यात्रिक परस्पर बात कर रहे थे कि, “हमारा दुर्भाग्य कैसा कि भगवान महावीर चले गए!” बात ऐसे Develop हो गई। प्रभु की काया में थोड़ी शिथिलता है, बाकी कुछ नहीं है। प्रभु का समोवसरण, देशना सब कुछ चलता है। लेकिन बातों का Development कैसे होता है, आप तो जानते ही हैं। तो ऐसा Development हुआ कि प्रभु नहीं हैं, प्रभु निर्वाण को प्राप्त हो गए।
सिंह अणगार ने सुना, “प्रभु गए?” इतनी गहरी पीड़ा हुई। छाती में दर्द शुरू हुआ। आँखों से आँसू की बौछार। “प्रभु चल गए? प्रभु गए? प्रभु तो मेरा जीवन थे। और प्रभु नहीं हैं, तो मेरा जीवन कैसा?”
अपन जो ‘नमोત્થુણં सूत्र’ बोलते हैं, इसमें एक पद नहीं आता, जो ‘कल्पसूत्र’ के नमोત્થુણં सूत्र में आता है: जीवदायणं। प्रभु जीवन के दाता हैं। साँस लेना और साँसों को छोड़ना, ये जीवन नहीं है। Coma में पड़ा हुआ आदमी भी साँस लेता है, साँस छोड़ता है। लेकिन उसके पास जीवन नहीं है। जीवन क्या है? जब हृदय प्रभुमय हो जाता है, तब हम कहते हैं कि वो हृदय सप्राण है, वो जीवन सप्राण है।
बाकी जीवन का कोई अर्थ ही नहीं है। अनंत जीवन हमने पसार किए, वो जीवन नहीं थे। साँसों को लेना और छोड़ना था। इस बार हमारे पास जीवन चाहिए। क्योंकि प्रभु ‘जीवदायणं’ हैं, जीवन के दाता हैं। प्रभु जीवन देते हैं। प्रभु की साधना, प्रभु के चरणों के प्रति कृतज्ञ भाव से झुक जाना, यही तो हमारा जीवन है। खाना-पीना और मौज करना, ये कोई जीवन नहीं है, साँसों को लेना और छोड़ना यह कोई जीवन नहीं। जीवन तो ये है, जब हृदय में, अस्तित्व के कोने-कोने में प्रभु ही प्रभु हों। प्रभु के सिवा दूसरा कुछ न हो।
एक ही काम करना है इस जन्म में, जो अनंत जन्मों में नहीं हुआ। अनंत जन्मों में हमने क्या किया, मालूम है? राग और द्वेष के कचरे से हृदय को भर दिया। और प्रभु के लिए सूचना पट (Board) लगाया: ‘No vacancy for you!’ आपके लिए जगह नहीं। अब प्रभु से हृदय को भर देना है, और सूचना पट लगाना है: ‘No vacancy for others!’ दूसरों के लिए जगह नहीं।
प्रभु से ही हृदय भर गया। हम Ever fresh, Evergreen हैं! पुणे में ही Ever fresh हैं ऐसा नहीं, हम कहीं भी हों, आनंद में ही हैं। और इसका कारण ये है कि पूरा हृदय प्रभु से भर गया, दूसरा कुछ चाहिए ही नहीं। प्रभु के बिना दूसरा कुछ नहीं चाहिए। और प्रभु मिल गए, हमारा अवतार कृत्य पूर्ण हो गया।
सिंह अणगार फूट-फूट कर रो रहे हैं। “प्रभु गए? मैं कैसे जिंदा रहूँगा? अब मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा। प्रभु ही मेरे जीवन का पर्याय थे। अब जीवन का पर्याय ही गया। अब जीवन कैसा?”
प्रभु अपने केवलज्ञान में इस घटना को देखते हैं कि ‘मैं तो जिंदा हूँ और ये मान रहा है कि प्रभु चल बसे।’ प्रभु ने गौतमस्वामी को बुलाया। “गौतम! यहाँ आओ।” गौतम स्वामी कितने बड़भागी हैं कि प्रभु के मुख से उनका ही नाम बोला जाता है। कोई भी काम हो, प्रभु गौतम स्वामी को याद करते हैं। गौतम स्वामी आ गए। प्रभु के चरणों में झुके, वंदन किया, “फरमाओ प्रभु!”
तब प्रभु ने कहा, “दो मुनिराजों को जल्द ही जल्द वहाँ भेजो, जहाँ सिंह अणगार साधना कर रहे हैं। और वहाँ जाकर इतना ही कहना है कि प्रभु तुम्हें बुला रहे हैं।”
दो मुनिराज तुरंत निकले। और जहाँ सिंह अणगार साधना कर रहे थे, वहाँ पहुँचे। जैसे ही दूर से दो मुनिराजों को आते देखा, सिंह अणगार का विश्वास दृढ़ हुआ कि जरूर प्रभु चल बसे हैं, ये समाचार देने के लिए भगवान गौतम ने इनको भेजा है।
लेकिन जब दोनों मुनिराज आए, उनका चेहरा स्मित (मुस्कान) से परिपूर्ण था। आश्चर्य हुआ! प्रभु यदि चल बसे हों, और उसके समाचार देने के लिए ये मुनिराज आए हैं, तो उनके चेहरे पर स्मित नहीं होता। प्रभु गए हैं तो दुख है ही, दर्द है ही।
एक सद्गुरु जाते हैं न, हम समझते हैं कि ये क्रमबद्ध पर्याय है। जब भी गुरु की आयु पूर्ण होगी, गुरु का शरीर, पार्थिव शरीर यहाँ ही रह जाएगा। गुरुदेव अनंत की यात्रा पर चल जाएंगे। हमें मालूम है। लेकिन जब गुरुदेव चले जाते हैं, तब हम भी फूट-फूट कर रोते हैं। क्यों रोते हैं? कि इस शरीर से जो ऊर्जा निकलती थी और हमें Purify करती थी, वो ऊर्जा अब हमें नहीं मिलेगी। जरूर सूक्ष्म ऊर्जा वहाँ है। जहाँ भी अंतिम संस्कार होता है, वहाँ सूक्ष्म ऊर्जा होती है। और इसीलिए समाधि तीर्थों की रचना होती है। समाधि तीर्थ इसलिए ही हैं कि सद्गुरु की ऊर्जा हमें मिले। तो गुरुदेव जब जाते हैं, तो हम भी वेदना से व्याकुल हो ही जाते हैं।
तो सिंह अणगार ने सोचा कि यदि प्रभु चल बसे हैं और इसके समाचार देने के लिए आए हैं, तो इनके चेहरे पर स्मित नहीं हो सकती।
और तब मुनिराजों ने कहा, “पधारो मुनिराज! प्रभु आपको बुला रहे हैं।”
“क्या कहते हो? प्रभु मुझे बुलाते हैं? “
“हाँ प्रभु तुम्हे बुलाते है|”
“तो प्रभु हैं? प्रभु हैं?”
“अरे प्रभु विद्यमान हैं! समवसरण में बैठकर रोज प्रभु देशना फरमाते हैं। और तुम्हें याद किया है कि सिंह अणगार को जल्द से जल्द बुलाओ।”
और सिंह अणगार पुलकित हो गए, आनंदित हो गए। ‘प्रभु हैं तो सब कुछ है, प्रभु नहीं हैं तो कुछ भी नहीं।’ ये सूत्र था: प्रभु हैं तो सब कुछ है, प्रभु नहीं हैं तो कुछ भी नहीं। प्रभु के पास गए। हर्ष-विभोर हो गए। “मेरे प्रभु तो विद्यमान हैं! अब मेरे रोने का कोई अर्थ नहीं। अब मैं जिऊँगा।”
लेकिन प्रभु का शरीर शिथिल तो हुआ ही है। तो फिर वेदना के अश्रु आए। “मेरे प्रभु का शरीर, और इसमें इतनी शिथिलता! ये कैसे?”
और प्रभु प्रेम से सिंह अणगार को देखते हैं। और कहते हैं, “मेरे शरीर को शिथिल देखकर तुझे पीड़ा होती है? तू एक काम कर, रेवती श्राविका के वहाँ जा। और उसने अपने लिए जो औषधि पाक बनाया है, वो लेकर आ। औषधि पाक मैं लूँगा और मेरा शरीर पूर्ववत् हो जाएगा।”
पहली बार जब घटना मैंने पढ़ी, मैं तो आश्चर्यचकित हो गया। कहाँ वीतराग परमात्मा! और कहाँ ये भक्तवत्सल! देहाध्यास से लाखों योजन दूर हैं परमात्मा। और प्रभु कह रहे हैं, ‘मेरा शरीर शिथिल है और तू पीड़ित है, जा औषधि पाक लेकर आ।’ क्या था ये? ये क्या था? आप केवल कर्म ग्रंथों को पढ़ेंगे, तो वीतरागता ही आपको मालूम होगी। हरिभद्रसूरि भगवंत को आप पढ़ेंगे, तब अंदरूनी बात जो है, उसका साक्षात्कार आपको होगा। तो भक्तों के लिए प्रभु वीतराग नहीं हैं। प्रभु भक्तवत्सल हैं।
ये चिंतामणि दादा हमारे लिए वीतराग नहीं हैं। हमारे लिए तो प्रेम बरसाने वाले हैं। ये गोड़ीजी दादा वीतराग नहीं हैं हमारे लिए। प्रेम बरसाने वाले हैं। तो प्रभु वीतराग भी हैं और प्रेम बरसाने वाले भी हैं। पहले तो बुद्धि में ये बात नहीं उतरेगी। ‘वीतराग भी हैं और प्रेम भी हैं?’ उतरेगी बात? ये बात Sensitive है, भेजा बहार की है।
दो शब्द हमारे वहाँ हैं: बुद्धिजीवी और हृदयजीवी। आप सब हृदयजीवी हैं, बुद्धिजीवी नहीं। जो श्रद्धा से जीता है, वो हृदयजीवी है। जो बुद्धि से जीता है, वो सामान्य आदमी है। हमें बुद्धि से नहीं जीना है। बुद्धि से होगा भी क्या? बुद्धि से क्या होगा? बुद्धि से परमात्मा नहीं मिलते।
वीरविजय महाराज ने निन्यानवे (99) प्रकार की पूजा में लिखा: श्रद्धा विन पुण्य इहां आवे। ये सिद्धगिरिराज की भी बात है, प्रभु शासन की भी बात है। यदि तुम्हारे पास श्रद्धा नहीं है, तो तुम गिरिराज पर जाकर भी क्या करोगे? डोली वाले कितनी बार 99 (नवाणुं) कर रहे हैं। “हम तो जिंदगी में एक बार करते है।” डोली वाले? लेकिन श्रद्धा नहीं है। तो श्रद्धा के बिना गिरिराज पर गए तो भी निरर्थक। श्रद्धा के बिना जिनशासन में आए तो भी निरर्थक। लेकिन आप सब श्रद्धाजीवी हैं, हृदयजीवी हैं।
तो दो बातें आईं। प्रभु वीतराग भी हैं, भक्तवत्सल भी हैं। भक्तों पर प्रेम बरसाने वाले हैं। तो इस विषय में हम थोड़ा और गहराई में जाएंगे। आज का समय पूरा हो गया है। कल जाएंगे। कि प्रभु वीतराग भी हैं, तो प्रेम कैसे बरसाते हैं? और राग क्या है और प्रेम क्या है? उसमें फर्क क्या है? प्रभु भक्तवत्सल हैं। सिंह अणगार की बात भी चलती रहेगी। और राग और प्रेम, उसमें क्या अंतर है, उसकी बात भी चलेगी।
मैं मेरे समय में Punctual रहूँगा। 9 बज गए हैं। मेरा प्रवचन आज का पूरा।
