*मनोविजय के लिए साधक की तीन सज्जताएं*
मनोविजय के लिए साधक की पहली सज्जता : _औदासीन्यनिमग्नः_। साधक उदासीन भाव में लीन होना चाहिए। उदासीन भाव का अर्थ यह है कि किसी के प्रति मन का आकर्षण ना हो। ना किसी पदार्थ के प्रति, ना किसी व्यक्ति के प्रति और ना ही कोई घटना के प्रति।
दूसरी सज्जता : _प्रयत्नपरिवर्जितः सततमात्मा_। जिसे भीतर ही डूबना है, उसे बाहर की कोई क्रियाओं में कोई रस नहीं है। औरों को प्रसन्न करने की कोई चेष्टा उसकी नहीं है। कोई और प्रसन्न हो या न हो, इससे क्या? जब भीतर ही जाना है, तब बाहर की दुनिया के कृत्यों से क्या प्रयोजन?
तीसरी बात : _भावितपरमानन्द:_। ऐसा साधक परम आनंद में डूबा हुआ है। पीड़ा की संभावना वहाँ है जहाँ आपको कुछ चाहिए। लेकिन जिसे कुछ चाहिए ही नहीं वह परम आनंद में डूबा हुआ है। और जो भी परम आनंद में डूबा हुआ है, वह मनोविजेता है; उसे विचारों का कोई प्रयोजन नहीं है इसलिए उसे कोई विचार ही नहीं आता!
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराज रचित स्तवना चोवीसी, पहला स्तवन, पहली पंक्ति:
“जगजीवन जगवाल हो, मरुदेवी नो नन्दलाल रे।”
ऋषभदेव परमात्मा की माता का नाम मरुदेवा था। पार्श्वनाथ प्रभु की माता का नाम वामा माता था। वामा का अर्थ मनोविजय। साधक मनोविजेता होना चाहिए। मनोविजय के दो सूत्र हैं। एक सूत्र साधक के संदर्भ में, दूसरा सूत्र भक्त के संदर्भ में। पहला सूत्र कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य ने योगशास्त्र के १२वें प्रकाश में दिया है।
योगशास्त्र का १२वाँ प्रकाश, अंतिम चैप्टर (Chapter) बहुत महत्वपूर्ण है। आचार्यश्री ने अंतिम चैप्टर के प्रारंभ में लिखा कि, “यहाँ तक मैंने जो कुछ लिखा, वो परंपरा से मिला हुआ था, गुरु परंपरा से प्राप्त हुआ था। लेकिन अब जो मैं कह रहा हूँ, वो मेरी अनुभूति का शब्द-देह है।” तो इस अंतिम चैप्टर में मनोविजय की, मनोलय की बात करते हुए उन्होंने मनोविजय का सूत्र दिया:
“औदसिन्यनिमग्न:, प्रयत्नपरिवर्जित: सततमात्माl
भावितपरमानन्द:, क्वचिदपि न मनो नियोजयति”॥
(औदासीन्यनिमग्नः प्रयत्नपरिवर्जितः सततमात्मा।
भावितपरमानन्दो न मनः कदाचिद्योजयेत्॥)
ऐसा साधक कि जिनके पास तीन सज्जताएँ हैं, वह साधक मनोविजय कर सकता है। आपको भी करना है? मन पर आपका नियंत्रण हो। अभी तो मन का आप पर नियंत्रण है। मन कहे वैसा करना पड़ता है। चाय का एक कप लिया या न लिया, क्या फ़र्क पड़ता है? यहाँ स्टमक (Stomach) में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। एक गिलास पानी पी लो या एक गिलास चाय पी लो, क्या फ़र्क पड़ता है? फ़र्क स्टमक को नहीं पड़ता है, लेकिन मन को पड़ता है। मन कहता है, “चाय पीनी है! और वो भी टेस्टी (Tasty) चाय होनी चाहिए!” तो अभी आप पर मन का नियंत्रण है। यदि आप चाहें कि मन पर आपका नियंत्रण प्रस्थापित हो, तो तीन सज्जताएँ हैं।
पहली सज्जता— “औदासीन्यनिमग्नः”! साधक उदासीन भाव में लीन होना चाहिए। उदासीन भाव का अर्थ यह है कि किसी के प्रति मन का आकर्षण न हो। ना कोई पदार्थ के प्रति, न कोई व्यक्ति के प्रति, कि न कोई घटना के प्रति। कहीं भी हमारा आकर्षण न हो। घटना-घटना है, पदार्थ-पदार्थ है। कोई पदार्थ अच्छा नहीं होता, कोई पदार्थ बुरा नहीं होता। तुम्हारा मन जो है ना, वो स्टीकर (Sticker) लगाते घूमता है— ‘ये अच्छा, ये बुरा, ये अच्छा, ये बुरा!’ और मनुष्य तो सब अच्छे हैं। सब सिद्ध के परमात्मा, कोई बुरा नहीं है। लेकिन तुम्हारा मन वहाँ भी स्टीकर लगाते घूमता है— ‘ये अच्छा व्यक्ति, ये अच्छा नहीं है।’ अब ये नक्की कौन करता है? तुम्हारा मन नक्की करता है! ‘इस व्यक्ति ने मुझे प्रेम से देखा, मेरे साथ प्रेम से बात की, तो ये व्यक्ति अच्छा है। इस व्यक्ति ने सही ढंग से बात नहीं की, तो ये अच्छा नहीं है।’ तो तुम्हारा मन वर्गीकरण करता ही रहता है।
तो पहली सज्जता यह है कि मन में ये जो बात पड़ी है कि ‘ये अच्छा, ये बुरा’, ये निकल जाना चाहिए। पदार्थ-पदार्थ ही है। कोई पदार्थ अच्छा नहीं है। रसगुल्ले भी अच्छे कहाँ तक? बोलो! पाँच-छह-सात रसगुल्ले खाए, और रिसेप्शन (Reception) में थे या शादी में गए थे, वेवई साहब खुद आए रसगुल्ले की प्लेट (Plate) लेकर, “मेरे हाथ से तो लेना ही पड़ेगा!”
“अरे नहीं-नहीं-नहीं, अब नहीं चलेगा! अब नहीं चलेगा!”
रसगुल्ला अच्छा है या बुरा है? बोलो! भूख है तब तक अच्छा है, भूख नहीं है तो अच्छा नहीं है। रसगुल्ला अच्छा नहीं है, भूख के कारण अच्छा लगता है। तो पहली सज्जता यह है कि किसी के प्रति आकर्षण न हो। हम आनंद में क्यों हैं? हमारे आनंद का कारण यही है। ऐसे उपाश्रय में रहेंगे तो भी मज़ा, कोई गाँव में जाएँगे बिल्कुल छोटा सा उपाश्रय है, असुविधा वाला है, वहाँ भी मज़ा से रहेंगे। क्योंकि ‘ये अच्छा, ये अच्छा नहीं’, ये बात हमारे मन से निकल गई।
एक घटना मैं आपसे कहूँ। एक मुनिवृंद विहार में जा रहा था। पाँच-सात मुनियों का वृंद था, विहार में चल रहा है। सामने से भी एक मुनिवृंद आ रहा है। परस्पर आनंद से मिले, वंदन-व्यवहार हुआ, सुखसाता पूछी। अब जो सामने से मुनि आ रहे थे, उनमें से एक मुनिराज को थोड़ी शारीरिक तकलीफ़ें थी। तो धूप में वे बैठ भी नहीं सकते थे, धूप-गर्मी उनसे सहन भी नहीं होती थी। तो उन्होंने इस मुनिवृंद से पूछा कि, “आप जहाँ से आ रहे हैं, हम वहाँ जा रहे हैं। तो वहाँ का उपाश्रय कैसा है? अच्छा है? पवन वाला है, शांत है, कैसा है?”
ये जो मुनिवृंद था, प्रभु की आज्ञा को इतना तो समर्पित था कि मुनिवृंद के अग्रणी ने कहा, “साहबजी! हम तो वहाँ गए, दंडासण से काजा लीया, वहाँ उतरे, फिर सूत्र पोरिसी किया, पात्रा पोरिसी का पड़िलेहण किया, अर्थपोरिसी कीया, फिर देरासर गए, गोचरी वापरी, फिर स्वाध्याय किया। तो ये पता भी नहीं है कि वहाँ हवा कैसी आती है! वहाँ खिड़कियाँ कितनी थीं, वो भी ख्याल नहीं है। हाँ, इतना ख्याल है कि शाम तक, सूर्यास्त तक हम स्वाध्याय कर सके थे, इसलिए प्रकाश था। लेकिन हवा कैसी थी, वो मालूम नहीं!” कैसे शरीर से बेपरवाह हैं! जब आराधना में, आराधना के आनंद में हम लग जाते हैं, तब शरीर को हम भूल भी जाते हैं। तो पहली सज्जता यह कि कोई पदार्थ, कोई व्यक्ति, कोई घटना, कोई मकान… किसी का भी आकर्षण नहीं। घटना-घटना है, पदार्थ-पदार्थ है, व्यक्ति-व्यक्ति है।
फिर दूसरी सज्जता— “प्रयत्नपरिवर्जितः सततमात्मा”! अब जिसे भीतर ही डूबना है, उसे बाहर की कोई क्रियाएँ करनी नहीं। आप आएँगे वंदन के लिए, कोई बड़े महाराज साहब हैं, स्वाध्याय में लगे हुए हैं, आपने वंदन कर लिया। साहिबजी अपने स्वाध्याय में डूबे हुए थे, उन्हें पता भी नहीं लगा कि आपने वंदन किया है। पता होता तो आपको ‘धर्मलाभ’ का आशीर्वाद देते। अब समझो कि स्वाध्याय में डूब गए। आपको क्या विचार आएगा? “कैसे हैं हमारे महात्मा! कैसे स्वाध्याय में डूब गए है कि हम वंदन कर रहे हैं, साहिबजी को ख्याल नहीं!” इस कलिकाल में भी आश्चर्य की कोई घटना हो, तो जिनशासन के मुनि और जिनशासन की साध्वी! एक द्वंद्व है। आपके पास भक्ति है, हमारे पास निस्पृहता है। आप कहेंगे, “साहबजी! क्या खप है?” हम कहेंगे, “कुछ खप नहीं है।” ‘खप नहीं’, यह हमारा सूत्र है। हमारा सूत्र पसंद आ गया?
नहीं आया? हम क्या कहेंगे? आप वोहराने के लिए जाएँगे, आप रोटी की थप्पी ऑफर (Offer) करेंगे। हम कहेंगे, “नहीं-नहीं-नहीं-नहीं, इतना नहीं, इतना नहीं, इतना खप नहीं!” तो ‘खप नहीं’ यह हमारा सूत्र है। ये सूत्र आपको पसंद आ गया?
ऑफिस में जाओ, रोज़ ₹५००० कमाते हो। १० बजे तक ₹५००० मिल गए, फिर क्या करेंगे? उपाश्रय में आ जाएँगे? “मेरे पुण्य में ₹५००० हैं और सुबह से शाम तक मैं ऑफिस में बैठता हूँ, ₹५००० कमाता हूँ। आज प्रभु ने सुबह १०:०० बजे ही ₹५००० दे दिए। अब मेरे पुण्य में ५००० ही हैं, तो अब ऑफिस में बैठने का काम क्या? अब तो खप नहीं!” ५००० मिलने के बाद, पहले नहीं! ५००० मिल गए, फिर कहना, “बस! अब आज के लिए खप नहीं।” पाँच मुनिराज हैं और एकासना है, वोहराने के लिए आएँगे, फिर कितना वोहरेगे? एकासने में जितना पूरा हो उतना ही वोहरेगे। शाम को तो वापरने का नहीं है, कल के लिए रखने का नहीं है, तो कितना वोहरेगे? जितना आज के लिए खप है उतना वोहरेगे। आप भी ऐसा करेंगे?
मैं एक गाँव में गया था। विहार का क्षेत्र था, और वहाँ जो भाई थे सेवा में, वे मेरे परिचित थे। वे सेवा के लिए ही वहाँ रहते थे। बच्चे मुंबई रहते थे। बच्चे कहते, “पापा आ जाओ मुंबई” वह कहते, “नहीं, यहाँ आठों महीना महाराज साहब का विहार चालू है, कितना लाभ यहाँ मिलता है! तो ये लाभ छोड़कर वहाँ क्यों आऊँ?” मैं वहाँ गया, दोपहर का समय, वे बैठे थे मेरे पास। बात-बात में उन्होंने कहा, “महाराज साहब! आप कहते हैं कि शालिभद्र की आत्मा ने एक बार महाराज साहब को वोहराया और फिर ९९ पेटी उतरने लगी, बराबर?”
तो उस भाई ने कहा, “महाराज साहब! मैं तो यहाँ ही रहता हूँ भक्ति के लिए, आठों महीना भक्ति करता हूँ, एक भी पेटी उतरी नहीं!”
तो मैंने पूछा, “तुझे शालिभद्र बनना है?” बड़ा बुद्धिमान आदमी था। उसने कहा, “हाँ, लेकिन दीक्षा लेने से पहले शालिभद्र थे वैसा शालिभद्र! फिर आप कहेंगे शालिभद्र ने दीक्षा ली थी, ये नहीं! दीक्षा के पहले के शालिभद्र आप बना सकते हो तो बनना है।”
मैंने कहा, “बना दूँ? बोलो, आपको बनना है? दीक्षा के पहले के शालिभद्र बनना है? ९९ पेटी आएँगी!”
मैंने उससे कहा कि, “शालिभद्र के वहाँ एक दिन श्रेणिक महाराजा खुद आए। जो रत्न-कंबल श्रेणिक महाराजा अपनी पटरानी चेलना के लिए न खरीद सके, ऐसे १६ रत्न-कंबल शालिभद्र की माता ने ले लिए और कहा कि, ‘१६ ही रत्न-कंबल हैं, मेरी तो ३२ पुत्रवधुएँ हैं’, तो एक-एक शाल के दो टुकड़े कर दिए! और पुत्रवधुओं ने पैर को साफ़ कर कर गटर में फेंक दिए! तो श्रेणिक महाराजा उस शालिभद्र के घर पर आए कि ‘मुझे देखना है कि मेरी नगरी में कैसे धनकुबेर रहते हैं।’ भद्रा माता ने स्वागत किया, शालिभद्र भी आए।
फिर भद्रा माता ने कहा, “आप यहाँ पधारे हो, थोड़ा प्रसाद भी हमारा लो।” श्रेणिक महाराज ने हाँ कही, थोड़ा मिष्ठान्न, नमकीन, सब थाली में परोसा गया। श्रेणिक महाराज ने हाथ धोए वॉश बेसिन (Wash basin) में, खाना खाया। बाद में देखा तो ख्याल आया, एक अंगूठी अँगुली में से निकल गई। तो भद्रा माता को कहा, “मेरी एक अंगूठी वॉश बेसिन में गई है।” वॉश बेसिन हौज़ में जुड़ता था।
तो भद्रा माता ने दासी से कहा, “जाओ हौज़ में और श्रेणिक महाराजा की वींटी लेकर आओ, अंगूठी लेकर आओ।” दासी वहाँ गई, हौज़ में तो इतनी अंगूठीया! टोकरा भरकर वो लेकर आई कि “महाराज! आपकी वींटी कोनसी है?” श्रेणिक महाराजा ने अपनी अंगूठी पहचान भी ली, ले भी ली, लेकिन भद्रा माता से पूछा, “हौज़ में इतनी अंगूठियाँ?”
तो भद्रा माता ने कहा, “मेरा शालिभद्र और उसकी ३२ पुत्रवधुएँ रोज़ स्नान के लिए बाथरूम (Bathroom) में जाती हैं और सब गहने छोड़कर आती हैं। बाथरूम हौज़ से जुड़ा हुआ है, तो सब गहने हौज़ में इकट्ठे होते हैं। अब तो हमारी मेहतरानी भी थक गई! कभी-कभार आती है वो ले जाती है, वो समझती है कि यहाँ कोई लेने वाला है नहीं। हमारे नौकर-चाकर भी थक गए ले-लेकर!”
“तो मैंने उस भाई से कहा कि आज जो मिला है, वो दूसरे दिन फेंक दे, वो शालिभद्र! बराबर? पत्ते खुल गए! आज जो मिला है, जो कल फेंक दे, वो शालिभद्र! बोलो, आपको बनना है? शालिभद्र बनना है?”
तो दूसरी सज्जता यह थी— “प्रयत्नपरिवर्जितः सततमात्मा”! दूसरों को प्रसन्न करने की कोई चेष्टा नहीं। दूसरा प्रसन्न हो न प्रसन्न हो, इससे क्या? जब भीतर ही जाना है, तब बाहर की दुनिया से कोई प्रयोजन ही नहीं है। राजरानी आनंदघन जी के पास आई, “मेरे बेटा नहीं है। आप जोगंदर हो, लोगों ने कहा है आप समर्थ हो, मुझे बच्चा दीजिए।”
आनंदघन जी ने कहा, “ये कोई मेरा काम नहीं है, तुम्हारे पुण्य में होगा तो मिल जाएगा।”
“नहीं, आपसे ही चाहिए मुझे! आप कुछ औषधि दो, कुछ मंत्र दो, कुछ दो!”
तब आनंदघन जी ने एक पत्र में लिखा “राजरानी को बेटा हो तो भी आनंदघन को क्या, और ना हो तो भी आनंदघन को क्या!” और ये कागज़ लेकर जा!
तो दूसरी सज्जता यह है— प्रयत्न परिवर्जित:! किसी को प्रसन्न नहीं करना। हम प्रभु को ही समर्पित हैं। हमारी दृष्टि प्रभु की ओर ही जाएगी। आपकी दृष्टि हम पर हो, ठीक है, लेकिन हमारी दृष्टि आप पर नहीं, प्रभु पर है। क्योंकि हम प्रभु को समर्पित हैं, प्रभु की जो आज्ञा है उस आज्ञा के मुताबिक हमें चलना है, और इसीलिए तो हम सुखी हैं। एक राजनेता होता है, इलेक्शन (Election) का समय होता है, कहाँ-कहाँ घूमता है बेचारा! “मुझे वोट (Vote) देना, मुझे वोट…” भिखारी की तरह भीख माँगता है। क्यों? उसे कुछ चाहिए। हमें कुछ चाहिए ही नहीं! इस शरीर को रोटी और दाल तो मिल ही जाती है, हमें कुछ चाहिए नहीं।
और फिर तीसरी बात कही— “भावितपरमानन्दो”! ऐसा साधक परम आनंद में डूबा हुआ है। दो सज्जताएँ पहले कही, जिसका किसी के प्रति आकर्षण नहीं, वो पहली सज्जता। किसी को भी प्रसन्न नहीं करना है, ऐसी जिसकी धारणा है, वह दूसरी सज्जता। अब ऐसा कोई साधक है, तो वह परम आनंद में डूबा हुआ है। उसके लिए पीड़ा की कोई संभावना ही नहीं। पीड़ा की संभावना कहाँ है? जहाँ कुछ चाहिए। ‘ये मुझे चाहिए और ये मुझे नहीं मिलता है’, बस पीड़ा शुरू हो गई! लेकिन कुछ चाहिए ही नहीं तो?
आप बहुत सी चीजें लेकर आते हैं, “साहब वोहरो! साहब वोहरो!” हम कहते हैं, “नहीं, हमें कुछ नहीं खप है।” ये वस्त्र हैं, बस ये जीर्ण हो जाएँगे तब नए लेंगे, वहाँ तक नए लेकर क्या करेंगे? लाइट ट्रेवलिंग (Light traveling) के हम आदमी! तो ‘भावितपरमानन्द:’, वो परम आनंद में डूबा हुआ है। और जो भी परम आनंद में डूबा हुआ है, वो मनोविजेता है। क्यों? कि कोई विचार ही नहीं आता! मैं ऐसे बैठा हुआ होता हूँ, लोग मुझे पूछते हैं, “आप क्या सोचते हैं?” तो मैं कहता हूँ, “अब विचार आते ही नहीं है! अब विचार ही नहीं आते।” क्योंकि विचार हमारा स्वभाव नहीं है। जैसे कृत्य शरीर का स्वभाव है, बोलना ये वाणी का व्यवसाय है, ऐसे विचार ये मन का व्यापार है, आत्मा का नहीं। हम जब सिद्धशिला में जाएँगे, तब न काया होगी, न वचन होगा, न विचार होगा। विचार जो है ना! वही पीड़ा का मूल। तो ‘भावितपरमानन्द:’, जो परम आनंद में डूब गया, उसके पास विचार ही नहीं हैं। आनंद, आनंद, आनंद…! आप देखना, जब आनंद में होंगे, विचार नहीं होंगे।
रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि ब्राह्मण इकट्ठे हुए हैं, भोजन मंडप में भोजन करने। अब आवाज़ आती रहेगी— “लड्डू! दाल! पूरी! सेव! खमण!” लेकिन जब ‘हर हर महादेव’ होगा और खाने का चालू होगा, आवाज़ चुप! अब आवाज़ नहीं है। तो विचार कहाँ तक हैं? जब तक अनुभव नहीं है तब तक! खाने का अनुभव शुरू हुआ, विचार बंद हो गए! ऐसे आत्मा का अनुभव होगा, तब सब विचार बंद हो जाएँगे। तो मनोविजय के इस सूत्र कितने अच्छे! किसी का आकर्षण न हो, किसी को प्रसन्न करने की इच्छा न हो, तुम आनंद में हो— मनोविजय प्राप्त हो गया! ये साधक के लिए सूत्र था।
भक्त के लिए भी मनोविजय का एक सूत्र जो मीरा ने दिया है। मीरा ने अनुभूति की बात कही, क्योंकि अनुभूति आती है तो वो विचार छूट जाते हैं, मनोविजय हो जाता है। तो भीतर की अनुभूति कैसी होती है? उसकी बात मीरा ने कही। मीरा ने कहा है कि ‘प्रभु की कृपा से आत्मा की अनुभूति का दीप जल उठा… बस जल ही उठा!’ तो मीरा का सूत्र है:
“सुरत निरत को दिवलो जोयो, मनसा पूरन बाती।”
“अगम घाणी को तेल सिंचायो, बाल रही दिन-राती॥”
हमारे विद्वान आचार्य प्रद्युम्नसूरि महाराज मेरे मित्र थे, गाढ़ मित्र, क्लोज़ फ्रेंड (Close friend)। एक दिन आचार्य भगवंत मुंबई की एक सभा में बोल रहे, और वहाँ उन्होंने मीरा का एक पद कोट (Quote) किया। तब एक साधक ने पूछा कि, “गुरुदेव! मीरा कौन सी दृष्टि में थी?” जैसे गुणस्थानक १४ हैं, ऐसे दृष्टियाँ आठ हैं। तो पूछा कि मीरा कौन सी दृष्टि में थी? अब एक बात मैं आपसे कहूँ, पाँचवीं दृष्टि में सम्यक दर्शन आता है। चार दृष्टि तक सम्यक दर्शन नहीं है। लेकिन इतने गुण बताए गए हैं चार दृष्टियों में, कि हमें भी लगे कि हमारे पास शायद ये चार दृष्टियाँ हैं या नहीं! पहली ही जो दृष्टि है ‘मित्रा दृष्टि’, उसमें जब साधक जाता है तब वो सबका मित्र बन जाता है, सबका मित्र! इसके लिए कोई शत्रु नहीं। ५० लाख किसी ने आपका ले लिया, आपको पता है, तो भी वह आपका मित्र! ऐसा भाव जब आपके मन में जगे, तब आप पहली दृष्टि में आते हैं।
तिब्बत में ऐसा हुआ, रातों-रात चाइना (China) का शासन आ गया। तिब्बत के प्रधान धर्मगुरु दलाई लामा अपने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण से भारत में आ गए, और अभी भी वे भारत में धर्मशाला विस्तार में ही स्थिर हैं। कितने बौद्ध भिक्षु तिब्बत में रह गए थे। अब चाइना का शासन आ गया। चाइना के शासकों ने जितने भी बौद्ध भिक्षु रह गए, उन्हें पकड़ लिया और जेल में डाल दिया। अपराध कोई नहीं, “तुम भिक्षु हो बस! तुम्हारे पास भिक्षु के वस्त्र हैं, तुम भिक्षु हो, जेल में चले जाओ।” और जेल में भी न पूरा खाने का मिले, थोड़ा भी अपराध हो जाए तो डंडे की बौछार पड़े। मच्छर इतने कि दिन-दहाड़े भी शरीर को काट लें, न कोई मच्छरदानी की व्यवस्था, न कोई पंखे की व्यवस्था। १८ वर्ष जेल में भिक्षुओं को गुज़ारना पड़ा! इतनी तकलीफ़ों के बीच! जो अपने आश्रमों में रहते थे मज़ा से, मज़ा से स्वाध्याय करते थे, ध्यान करते थे, उनको जेल में डाल दिया गया।
१८ वर्ष बाद चीन के राज्य का एक महोत्सव आया, तब सब कैदियों को मुक्त कर दिया गया। ऐसे में बौद्ध भिक्षु भी मुक्त हो गए। एक बौद्ध भिक्षु मुक्त होकर भारत आया, अपने धर्मगुरु दलाई लामा के पास। दलाई लामा के चरणों में पड़ा, आँखें भर आईं। “गुरुदेव! १८ वर्ष हो गए, आपका दर्शन नहीं मिला।” सिसक-सिसक कर रो रहा है। गुरु ने आश्वासन दिया, “अब तो कोई बात नहीं, अब तो मुक्त हो गया तू। अब मेरे पास रहना, कोई चिंता मत करना।”
फिर गुरु ने पूछा शिष्य से कि, “१८ वर्ष तू जेल में रहा, तेरे लिए सबसे कष्टदायक चीज़ कौन सी थी?”
अब आप हों तो क्या बोलें? “शायद कष्ट की क्या बात करें? खाने को मिलना नहीं था और डंडे की बौछार पड़ती थी, मच्छर शरीर काट लेते थे, कष्ट की क्या बात करें? कष्ट ही कष्ट थे!” लेकिन ये भिक्षु था। आप में और भिक्षु में फ़र्क यही है। आप शरीर को मुख्य करके चलते हैं, भिक्षु, मुनि, साध्वी साधना को आगे करके चलते हैं।
भिक्षु ने कहा, “गुरुदेव! १८ वर्ष में सबसे कष्टदायक चीज़ मेरे लिए यह थी, टफेस्ट (Toughest), कि किसी के पर मुझे द्वेष न हो जाए। जो जेलर बिना अपराध मुझे डाँटता रहता, मुझे मारता रहता, उस पर भी मुझे क्रोध ना आए। चाइना के शासकों प्रति भी मुझे द्वेष ना आए, ये काम सबसे टफ (Tough) था। क्योंकि रोज़ ५० घटनाएँ घटतीं। एक नहीं ५० घटनाएँ! रोज़ ५० घटनाएँ घटती, और एक-एक घटना पर द्वेष आना संभावित था कि ‘मेरा तो कोई अपराध नहीं है, सिर्फ़ मैं बौद्ध भिक्षु हूँ बाकी मेरा कोई अपराध नहीं है, और बिना अपराध ये लोग इतने हैरान-परेशान मुझे करते थे’, तो क्रोध आना संभावित था, दिन में ५० बार संभावित था! तो मेरे लिए सबसे टफ यह था कि मेरा जो मैत्री व्रत है, मैत्री व्रत अखंड रहे! किसी के ऊपर मुझे द्वेष ना हो।”
तब गुरु ने पूछा कि, “यह तो तेरी साधना थी। रिज़ल्ट (Result) क्या मिला?”
एक भिक्षु की नम्रोक्ति कैसी होती है! भिक्षु ने कहा, “गुरुदेव! प्रभु की कृपा, आपकी कृपा कि १८ वर्ष में एक सेकंड (Second) भी किसी के पर द्वेष नहीं आया!”
कैसा मैत्री भाव घोंटा होगा! कैसा घोंटा होगा! इतनी हैरानी, इतनी परेशानी, और इतनी परेशानी के बीच भी किसी के प्रति क्रोध नहीं! मैत्री भाव अखंड धारा में बहता रहा।
तो प्रद्युम्नसूरि महाराज को पूछा गया कि मीरा कौन सी दृष्टि में थी? तब प्रद्युम्नसूरि महाराज ने कहा कि, “मीरा कौन सी दृष्टि में होगी वो तो ज्ञानी पुरुष ही कह सकते हैं। लेकिन मीरा ने अपनी अनुभूति को शब्दों में रूपांतरित की है। उन शब्दों को मैं देखता हूँ, तब लगता है कि मैं उस भूमिका तक नहीं पहुँचा हूँ।” एक जिनशासन के प्रबुद्ध आचार्य कहते हैं कि “मीरा की जो भूमिका है, भीतर की भूमिका, उस भूमिका तक मैं नहीं पहुँच सका हूँ।”
तो ये मीरा मनोविजय का सूत्र देती हैं। आज सिर्फ़ सूत्र ही देंगे, कल इंटरप्रिटेशन (Interpretation) करेंगे।
“सुरत निरत को दिवलो जोयो”— ग्लास निरंतर स्मृति प्रभु की, इसका एक ग्लास है। फिर बाती, बाती किसकी? “मनसा पूरन बाती”, पूर्ण मन, ये बाती है। “और अगम घाणी को तेल सिंचायो”— प्रभु की कृपा रूपी तेल उसमें आ गया। अब ये दीया रात-दिन प्रज्वलित हो रहा है। तो ग्लास क्या है? तेल क्या है? और बाती क्या है? उसकी विशेष बातें कल।
