Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 20-08-2026 | Pune Chaturmas

27 Min Read

*सुरत निरत को दिवलो जोयो*

प्रभु का निरंतर स्मरण। सुख के हर एक क्षण पर प्रभु का Signature होता है; सुख प्रभु की कृपा से मिलता है। और दुःख? वो भी प्रभु की कृपा से मिलता है! आप पूछोगे कि रोग आया शरीर में, उसमें कैसे प्रभु की कृपा?

महापुरुष कहते हैं कि मनुष्य जन्म में, जहाँ हम समझते हैं कि हमारे कर्म के उदय से ही तकलीफ़ आती है, तभी जो रोग, जो तकलीफ़ आनी हो, आ जाएं! इस समझ के कारण मानसिक पीड़ा नहीं होती। और अगर बुखार आया, तो पेईन-किलर ले लोगे, ज्यूस या गरम चाय ले लोगे; तो शरीर में भी पीड़ा मालूम नहीं पड़ेगी।

तो, भले सुख हो या दुःख हो, प्रभु का, प्रभु की कृपा का निरंतर स्मरण बना रहे। हम प्रभु के पास दुःख से मुक्ति नहीं, बल्कि समाधि मांगते हैं कि, “प्रभु! मैंने कर्म बाँधे हैं तो उदय में तो आएँगे ही, लेकिन जब कर्म उदय में आएँ तब मेरे मन में समाधि रहे, मेरा मन प्रसन्न रहे, इतना ही मैं तेरे पास माँगता हूँ।”


महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराज रचित स्तवन चोवीसी, प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति:

“जगजीवन जगवाल हो, मरुदेवी नो नन्दलाल रे।”

प्रभु ऋषभदेव की माताजी का नाम मरुदेवा था। और पार्श्वनाथ प्रभु की माताजी का नाम वामा माता था। ‘वामा’ अर्थात् मनोविजय। जब हमारा मन पर नियंत्रण प्रस्थापित होता है, तभी हम आंतरयात्रा में जा सकते हैं। हमारा इस जन्म का अल्टीमेट गोल (Ultimate goal) एक ही है— आनंद को प्राप्त करना। ऐसा आनंद, जो अतीत की यात्रा में हमे कभी अनुभूत नहीं किया है। ऐसा आनंद आंतरयात्रा में हमें मिल सकता है। लेकिन भीतर की यात्रा, ध्यान की जर्नी (Journey) कब चालू हो सकती है? जब हमारा नियंत्रण हमारे विचारों पर हो, हमारे मन पर हो।

वरना होता है क्या? बिल्कुल निरर्थक बातों में हमारा मन सतत घूमता रहता है। एक बार मैंने साधकों की संगोष्ठी में एक प्रश्न पूछा था। मैंने साधकों से पूछा था कि, “आप जो विचार कर रहे हैं, उसमें से ९९% विचार निकम्मे हैं या १००% विचार निकम्मे हैं?”

उत्तर यही मिला कि, “१००% हमारे विचार मीनिंगलेस (Meaningless) हैं, कोई प्रयोजन नहीं।”

एक आदमी अपने घर पर बैठा हुआ था। एक विचार में इतना गहरा वो उतर गया कि उसका एक मित्र बाहर से भीतर आया, पास की कुर्सी पर बैठा, लेकिन इस आदमी को पता नहीं कि कोई आया है। मित्र १५ मिनट बैठा, लेकिन वो आदमी अपने विचार में ही खोया हुआ था। मित्र उठ गया। एक सप्ताह के बाद मित्र दूसरी बार उस आदमी के घर पर आया, वो स्वस्थ होकर बैठा था। तब मित्र ने पूछा कि, “एक सप्ताह पहले मैं तेरे घर पर आया था, १५ मिनट तेरे पास में बैठा कुर्सी पर, और तुझे ख्याल ही नहीं रहा! तो कौन से विचार में तू डूब गया था?”

तो वो आदमी कहने लगा, “अच्छा? सप्ताह पहले कितने बजे थे?”

“सुबह १०:०० बजे थे।”

“हाँ-हाँ, मैं विचार में खोया हुआ था!”

“हाँ, लेकिन कौन सा विचार था?”

तो वो आदमी कहता है, “अब याद नहीं आता!”

एक सप्ताह पूर्व जो विचार तुम्हें तुम्हारी दुनिया से दूर फेंक देता है, वो विचार कौन सा था? अब तुम्हें पता नहीं! तो विचार ९९% या १००% मीनिंगलेस होते हैं।

लेकिन ये विचार कितना समय तुम्हारा वेस्ट (Waste) करता हैं और कितनी एनर्जी वेस्ट (Energy waste) करता हैं? दो चीज़ें वेस्ट होती हैं— समय और एनर्जी। एक हिसाब लगाओ, रोज़ विचारों में कितना समय जाता है! इतना समय यदि काम में तुम लगाते ने, तो तुम कहाँ से कहाँ पहुँच गए होते। लेकिन विचार में और विचार में रह गए! तो विचार ने समय भी खा लिया, एनर्जी भी खा ली। क्योंकि एक-एक विचार तुम करते हो, उसके पीछे आत्मा की शक्ति का उपयोग होता है। शास्त्रीय भाषा में कहूँ तो उपयोग के बिना एक भी योग चल नहीं सकता है। विचार ये मनोयोग है। और मनोयोग आत्मा की शक्ति के बिना, उपयोग के बिना चल नहीं सकता है। तो विचार समय को वेस्ट करता है, एनर्जी को वेस्ट करता है। और विचार को तुम साइड (Side) में रख दो, तुम्हारी आंतरयात्रा चालू हो जाएगी।

मैं ऐसे ही बैठा होता हूँ, लिखता भी नहीं होता हूँ, पढ़ता भी नहीं होता हूँ, ऐसे ही बैठा हुआ होता हूँ। तो कोई व्यक्ति मुझसे पूछता है कि, “गुरुदेव! क्या विचार कर रहे हैं?”

तो मैं कहता हूँ हँसते-हँसते कि, “अब विचार तो आते ही नहीं! क्या करूँ, विचार गए! अब विचार आते ही नहीं हैं।”

फिर वो व्यक्ति पूछता है, “तो आप करते क्या हो? न लिखते हो, न पढ़ते हो, ऐसे बैठे हो तो करते क्या हो?”

तब मैं कहता हूँ कि, “मैं मेरा अनुभव करता हूँ। मैं मेरे आनंद का, मैं मेरी वीतराग दशा का, मैं मेरे समभाव का एन्जॉयमेंट (Enjoyment) प्रॉपर (Proper) लेता हूँ।” आनंद ही आनंद होता है। तो मैं अपने स्वरूप में होता हूँ, अपने गुण में होता हूँ, अपने में होता हूँ, बाहर कहीं भी नहीं।

तो मनोविजय आंतरयात्रा को चालू करता है। मनोविजय कैसे करना और मनोविजय के बाद की अनुभूति कैसी होती है, इसकी बात भक्तिमती मीरा ने कही:

“सुरत निरत को दिवलो जोयो, मनसा पूरन बाती।”

“अगम घाणी को तेल सिंचायो, बाल रही दिन-राती॥”

अब अनुभूति का दीप रात और दिन जलता ही रहता है। आपका लैंप (Lamp) कभी बुझ जाता है। इलेक्ट्रिसिटी फेल (Electricity fail) हुई या आपका फ्यूज़ (Fuse) उड़ गया तो लैंप बुझ जाएगा, लेकिन भीतर का दीप एक बार जल उठा, फिर कभी भी बुझेगा नहीं। इसलिए मीरा ने कहा, “बाल रही दिन-राती।” दिन और रात ये अनुभूति का दीप जलता ही रहता है, जलता ही रहता है। अनुभूति… कोई दीप को प्रज्वलित करने के लिए क्या करना होता है? प्राचीन समय का कोई भी दीप था, तो उसमें एक ग्लास (Glass) होता है, एक बाती होती है, और तेल या घी भरा हुआ होता है ग्लास में, फिर चिंगारी लगाओ, दीप जल उठता है। तो मीरा कहती है कि भीतर के दीप के लिए काँच का ग्लास नहीं चलेगा। मंदिरजी में तो काँच के ग्लास हैं, लेकिन भीतर का दीया जलाना है तो इसके लिए काँच का ग्लास नहीं चलेगा।

कौन सा ग्लास चाहिए? “सुरत निरत को दिवलो जोयो।” निरंतर स्मृति प्रभु की! ये है ग्लास— निरंतर स्मरण! कल मैंने आपसे पूछा था, सुख के हर एक क्षण पर प्रभु का सिग्नेचर (Signature) होता है। सुख मिला, आनंद मिला, किनसे मिला? पैसे मिल भी गए, स्वास्थ्य अच्छा नहीं है, सुख नहीं है। पैसे भी हैं, स्वास्थ्य भी है, बच्चा नहीं है तो सुख नहीं है। पैसा भी है, स्वास्थ्य भी है, बच्चा भी है, लेकिन गाँव में प्रतिष्ठा नहीं है तो? “साला है तो ब्लैक का आदमी है, काला-धोला ही करता रहता है, उसको बिठाओ पीछे, पंच की जाजम में उसको आगे नहीं बिठाना।” तो प्रतिष्ठा नहीं है तो भी आदमी दुःखी हो जाएगा। तो सुख कैसे मिलता है? कहाँ से मिलता है? प्रभु से मिलता है!

हमको आप पूछेंगे, “साहब! साता में? आप सुखी हो?” हम क्या कहेंगे? “अरे! सुखी नहीं, हम परम सुखी हैं!” दशवैकालिक सूत्र में क्या बोलते हो? “संजया सुसमाहिया।” ‘समाहिया’ नहीं, ‘सुसमाहिया’। भगवान के मुनि, भगवान की साध्वियां सुख में ही नहीं, परम सुख में होती हैं। और परम सुखी बनना है? तो पीछे से आगे आ जाओ। मैं बहुत बार कहता हूँ— There are two chances for you, आपके लिए दो chances हैं। या तो चंदनाजी बन जाओ, या तो सुलसाजी रहो। चंदनाजी ने ये चद्दर पहनी थी प्रभु की, तो आप भी प्रभु की चद्दर पहनोगे तो चंदनाजी हो जाओगे। वरना अभी सुलसाजी तो हो ही! सुलसाजी के पास कितनी श्रद्धा थी! शायद ऐसी ही श्रद्धा तुम्हारे पास है प्रभु के प्रति, प्रभु के चद्दर के प्रति। आपके हृदय में यही श्रद्धा है जो सुलसाजी के पास थी। तो आपके लिए दो स्टेजेस (Stages) हैं— या तो चंदनाजी बन जाओ, या तो सुलसाजी रहो। तुम्हारे लिए भी दो स्टेजेस हैं— या तो मेघकुमार बन जाओ, या तो कुमारपाल रहो! Choice is yours!

एक फ्यूचर प्लानिंग (Future planning) तो प्रभु की चद्दर पहनने का है ना? फ्यूचर प्लानिंग! जब भी मन में एक बात स्थिर हो जाए कि सुख तो मुनिपन में ही है, तब फ्यूचर प्लानिंग में एक बात दृढ़ हो जाएगी कि ‘आखिर मरना है, तो इस चद्दर को लेकर ही मरना है।’

तो “सुरत निरत को दिवलो जोयो”— निरंतर स्मरण! सुख मिला, प्रभु की कृपा और दुःख मिला तो? तो वो भी प्रभु की कृपा! रोग आया शरीर में, तो प्रभु की कृपा नहीं? समझो कि आपने यात्रा में किसी से एक लाख रुपये लिए थे। आप खानदान आदमी हैं। एक लाख रुपये किसी से लिए थे। आपकी पोज़िशन (Position) बहुत अच्छी है, आप करोड़पति हैं। और वो व्यक्ति आएगा, “अरे! मेरे लाख रुपये?”

“अरे! अरे! लाख रुपये ब्याज के साथ ले जाओ! इतनी सुंदर अवस्था में मैं हूँ कि ५ लाख देना पड़े तो भी कोई तकलीफ़ नहीं है, आपका हि है ले जाओ।”

लेकिन परिस्थिति अच्छी नहीं है और कोई लेने के लिए आए तो?

अब असाता वेदनीय कर्म, हमने ही बाँधे हैं, हमने ही बाँधे हैं। अब कर्म का उदय आया, और हम अच्छी परिस्थिति में हैं। बुखार आएगा तो पेन किलर (Pain killer) टैबलेट हाज़िर है, डॉक्टर तैयार हैं, ज्यूस तैयार है, फ्रूट (Fruit) तैयार है, एसी (AC) में बैठे हुए हो। तो ऐसी अच्छी परिस्थिति में बुखार आ जाए तो अच्छा नहीं? बोलो तो! कब ऐसी अवस्था हो कि पैसे चले गए हैं, जॉब (Job) करने की है। मंडे (Monday) का दिन है, सर्विस (Service) पर जाने का समय हो गया है, शरीर में बुखार है, लेकिन जाना ही पड़ेगा! तो उस समय बुखार को भोगना वो अच्छा, या जब परिस्थिति बहुत अच्छी है तब बुखार को एन्जॉय (Enjoy) करना वो अच्छा?

इसलिए महापुरुष तो कहते थे कि मनुष्य जन्म में, और वह भी जब हम ज्ञानी हैं और समझते हैं कि हमारे कर्म के उदय से ही तकलीफ़ आती है, “तो जितनी तकलीफ़ आनी हो यहाँ आ जाए! नरक में तकलीफ़ आएगी ज़्यादा तो? तिर्यंच गति में होंगे और वहाँ कोई तकलीफ़ ज़्यादा आ गई तो? इससे तो अच्छा यही है कि मनुष्य जन्म में और इतनी सुविधापूर्ण अवस्था में बुखार आ भी गया, मालूम भी नहीं हुआ। पेन किलर ले लिया, आराम से सो गए एसी में, थोड़ी वार हुई तो जगाया— ‘क्या है? ज्यूस ले लो, ये फ्रूट लो, ये ये लो, कि ज़रा गरम चाय ले लो, कि गरम कॉफी ले लो’, तो ऐसी अवस्था में बुखार आ जाए तो अच्छा नहीं?”

तो सुख के क्षण भी प्रभु की कृपा से मिलते हैं और दुःख के क्षण भी प्रभु की कृपा से मिलते हैं। इसलिए हम प्रभु के पास समाधि को माँगते हैं कि, “प्रभु! मैंने कर्म बाँधे हैं तो उदय में आएँगे, लेकिन जब कर्म उदय में आएँ तब मेरे मन में समाधि रहे, मेरा मन प्रसन्न रहे, इतना ही मैं तेरे पास माँगता हूँ।” कैंसर (Cancer) आ भी गया तो आ गया, क्या है! लेकिन समाधि रहनी चाहिए। ये शरीर तो आखिर जाने वाला ही है। आज जाए या कल जाए, क्या फ़र्क पड़ता है? फ़र्क क्या पड़ता है?

हमारे बड़े गुरुदेव थे अरविंदसूरी दादा। तो कभी-कभार मेरा शिष्य ये परमयश दादा से कहता, “दादाजी! आप तो गच्छाधिपति हो और आप तो १०८ वर्ष जियोगे!”

तब दादा कहते, “बहुत जीने में क्या सार है? जी लिया, बहुत हो गया, अब चल जाने दो! बहुत जीने में कोई सार नहीं है। जितनी पर्याय शरीर की पूर्ण करने की है, पूर्ण कर दो और चले जाओ आराम से।”

ये हमारे गुरुदेव आबू में विराजमान थे। हम सब आबू में थे, देलवाड़ा में। सुबह-शाम घंटों तक भक्ति करते और दिन में स्वाध्याय करते। एक दिन मैं सुबह भक्ति करके आया गुरुदेव के पास और वंदना की। वंदना के बाद मैंने पूछा, “गुरुदेव साता में?” इतने प्रसन्न रहते थे! काया दुर्बल थी, काया में रोग बहुत थे, लेकिन मन इतना प्रसन्न था। कभी भी पूछो “गुरुदेव साता में?” दोनों हाथ ऊँचे करके, “अरे बहुत मज़ा में! बहुत मज़ा में! बहुत साता में!” उस दिन भी मैंने पूछा, “गुरुदेव साता में?” तो गुरुदेव ने कहा, “हाँ, साता में! बहुत साता में!”

फिर मैं मेरे रूम (Room) पर गया और नवकारशी का पच्चक्खाण पारने लगा। पच्चक्खाण मैंने पार लिया, और तब मेरा दूसरा शिष्य आया नमनयशविजय। उसने कहा, “गुरुदेव! आप तो मंदिरजी पधारे थे और यहाँ दादाजी के पैर से लहू निकलने लगा। कैसे लहू निकलने लगा मालूम नहीं हुआ, लेकिन दादाजी की चमड़ी बहुत ही पतली है, तो कहीं कुछ टच (Touch) हुआ होगा, तो पैर की चमड़ी से लहू निकलने लगा। हमने ड्रेसिंग (Dressing) कर दिया और सब कुछ अच्छा कर दिया, लेकिन बहुत ही लहू बह गया, ब्लीडिंग (Bleeding) बहुत हो गया।”

मैं तुरंत दौड़ा, गुरुदेव के पास गया और गुरुदेव से पूछा, “गुरुदेव! आपको ब्लीडिंग हो गया था? बहुत लहू निकला, क्या हुआ था?”

तब वे क्या कहते हैं? ज्ञानी पुरुष के शब्द कैसे होते हैं! उन्होंने कहा, “यशोविजय! ये तो शरीर है, शरीर में तो ऐसा होता ही रहता है। इसमें तु ऊँचा-नीचा क्यों होता है? शरीर तो स्वस्थ रहे, यही आश्चर्य की घटना है।” बोलो तो! आश्चर्य की घटना कौन सी? शरीर स्वस्थ रहे वो आश्चर्य की घटना, या शरीर अस्वस्थ हो ये आश्चर्य की घटना? मेरा शरीर स्वस्थ होता है ना, तब मैं आश्चर्य में होता हूँ, “ओहो! आज तो शरीर स्वस्थ है!” मन तो मेरा स्वस्थ ही है।

तो गुरुदेव ने कहा कि, “ये तो शरीर है। ये स्वस्थ हो तो ही आश्चर्य में पड़ने का। ब्लीडिंग हुआ तो हुआ, इसमें क्या हुआ? लहू ज़्यादा होगा शरीर में, तो निकल गया।” हमारी दृष्टि शरीर की ओर है, आत्मा की ओर नहीं। ये जो महापुरुष थे, उनकी दृष्टि अपनी आत्मा के ओर थी। वे कहते थे कि, “मैं शरीर कहाँ हूँ? मैं शरीर हूँ नहीं। शरीर तो घर है घर। उसमें मैं रहता हूँ। ज़िंदगी एक किराए का घर है! ज़िंदगी एक किराए का घर है, एक दिन तो निकलना पड़ेगा। मौत जब तुमसे आवाज़ देगी, तब घर से निकलना पड़ेगा।” ये तो घर है। तुम तीर्थ यात्रा पर जाते हो ना? धर्मशाला में कमरा बुक करवाया। फिर ऑफिस से चाबी मिल गई। चाबी लेकर आप बुक हुए कमरे की ओर जाते हो, कमरे को खोलते हो, फिर देखते हो कि पलस्तर टूट गया है। फिर क्या करोगे? सीमेंट-वीमेंट मंगवाओगे? पलस्तर टूट गया है तो क्या करोगे? “अरे! मुझे तो एक दिन रहना है, पलस्तर हो या न हो मुझे क्या फ़र्क पड़ता है!” वहाँ तो व्यवहार से एक दिन रहने की बात है, और आप कहते हैं, “एक दिन रहना है तो फिर पलस्तर हो या ना हो, क्या बात है?” इस घर में तो कितना ठहरेंगे नक्की ही नहीं!

एक भाई मुझसे मिला था कि, “मैं मेरे संबंधी के वहाँ गया, बैठा। फिर संबंधी ने चाय मंगवाई, दो कप चाय आ गई। मैं चाय पीने लगा। संबंधी ने जैसे ही होठ पर कप लगाया और चाय का पहला घूँट सिप (Sip) किया… बस पहला घूँट भीतर नहीं उतरा, बाहर निकल गया और वे भी बाहर चले गए! शरीर पड़ा रहा और वे चल गए।” अभी-अभी ज़िंदा थे, अभी-अभी मज़ा में थे, “बैठो-बैठो आए तुम, बहुत मज़ा आ गया… अरे चाय पीए”, चाय मंगवाई, एक घूँट मुँह में और चल गए! इतना जीवन क्षणभंगुर है! तो रहने वाला कौन? रहने वाला कौन? तुम! आत्मा! और कहाँ रहेंगे? ये घर में, ये धर्मशाला में। ये शरीर क्या है? धर्मशाला का रूम, समझ गए? अब पलस्तर निकल गया तो निकल गया। अब क्रीम-ब्रीम लगाने की ज़रूरत नहीं है! पलस्तर निकल गया तो निकल गया!

तो जब हम आत्मा की ओर दृष्टि करते हैं, और “शरीर घर है, धर्मशाला है”, ऐसा मानते हैं, तब हमारा आनंद अखंड रहता है। मनुष्य को सबसे बड़ा भय कौन सा है? मृत्यु का भय! “मैं मर जाऊँगा!” अरे, लेकिन तुझे मरने का ही नहीं है। आनंदघन जी ने तो गाया:

“अब हम अमर भये न मरेंगे।”

और बाद में कहा:

“नासी जासी हम थिर वासी, चोखे व्है निकरेंगे।”

“नासी जासी”— जो नाशवंत शरीर है वो पड़ा रहेगा, “हम थिर वासी”— मैं, मेरा चैतन्य, मेरा आनंद वो तो स्थिर है, वो कोई अस्थिर घटना नहीं है। “चोखे व्है निकरेंगे”— शरीर से, पिंजरे में से बाहर निकल गए, तो बिल्कुल शुद्ध हो गए हम! फिर तो आनंद ही आनंद! तो हम कौन हैं? हम आत्मा हैं, हम शरीर नहीं।

एक कुम्हार था। उसका एक गधा गुम हो गया। और कुम्हार के लिए तो गधा ही संपत्ति होता है। तो दूसरे कुम्हार मिलने के लिए आए। “अरे! वो गधा तो बहुत अच्छा था और वो गधा गुम हो गया।” तब जिसका गधा गुम हो गया था वो कुम्हार हँसने लगा! वो कुम्हार हँसने लगा! तो दूसरों ने पूछा कि, “हम तो दुःख व्यक्त करने के लिए आए हैं कि तुम्हारा गधा गुम हो गया, और तुम हँसते हो?”

तब उस कुम्हार ने कहा कि, “भगवान की कृपा हो गई!”

“अरे! इसमें भगवान की कृपा क्या हुई? गधा गुम हो गया!”

तो कुम्हार ने क्या कहा मालूम है? कुम्हार ने कहा, “आज तो प्रभु की बहुत बड़ी कृपा हुई।”

“अरे क्या कृपा हुई?”

तब कुम्हार कहता है, “जब मैं मिट्टी लेने के लिए खोदान की ओर जाता हूँ, और मिट्टी भर लेता हूँ और गधे पर लाद देता हूँ। फिर मैं एक ही गधे पर सवार होता हूँ। और वो गधा ये, जो गुम हो गया है वो! दूसरे किसी भी गधे पर कभी भी मैं नहीं बैठता हूँ, मैं एक ही गधे पर बैठता हूँ। आज प्रभु की कृपा हुई कि मैं नहीं बैठा हुआ था गधे पर, वरना मैं ही गुम हो जाता!”

“कैसे प्रभु की कृपा हो गई, वरना मैं ही गुम हो जाता! ये तो गधा ही गुम हो गया!” कुम्हार तो गुम नहीं हुआ! लेकिन तुम तो गुम हो गए। कोई पूछेगा “कैसे हो?” क्या कहेंगे? “शरीर अच्छा है… अच्छा है! कारोबार अच्छा चलता है… अच्छा है!”

वस्तुपाल मंत्री ने कहा था, “लोग आकर मुझे पूछते हैं— कैसे हो? कैसे हो? कैसे हो? अरे! मेरी आत्मा कर्मों से लदी हुई है, कर्मों के भार से भरी हुई है! और लोग पूछते हैं, ‘मज़ा में हो ना?’ हम मज़ा में कैसे रहेंगे?” वस्तुपाल की दृष्टि अपनी आत्मा की ओर थी। आपकी दृष्टि कहाँ पर है?

हमारी सब साधना क्यों? कारण क्या? कारण एक ही है कि हमारी आत्मा सत्ता से निर्मल है। हम बिल्कुल निर्मल ही हैं। लेकिन राग-द्वेष के कारण हम अभी मलिन हो चुके हैं। अभी गंदे विचार, गंदे भाव हमें आते हैं। तो सभी साधना का उद्देश्य एक ही है कि हमारी आत्मा पर जो राग और द्वेष का मल जमा हुआ है, उसको दूर करना और निर्मल होना। हमारी पूरी-पूरी साधना का उद्देश्य एक ही है कि हमें निर्मल होना है। इतने सामायिक किए, कितने निर्मल हुए आप? क्रोध कितना कम हुआ? समभाव कितना बढ़ा? प्रभु की पूजा की, वीतराग प्रभु की पूजा की, राग बढ़ा कि घटा? २५ वर्ष से पूजा करते आए हो, वीतराग परमात्मा की पूजा करते हो, शरीर पर जो राग था वो घटा या बढ़ा? पदार्थों पर जो राग था वो बढ़ा या घटा? क्या हुआ? तो साधना से राग को, द्वेष को, अहंकार को शिथिल करके हमारी आत्मा को हमें निर्मल बनाना है। और जैसे-जैसे निर्मल हमारी आत्मा बनेगी, क्या होगा? प्रभु का सुमिरन हर क्षण होगा। ‘प्रभु! तेरी कृपा!’ मैं शुद्ध हूँ!

हमारी आँखें रोज़ आँसू से भर आती हैं। रोज़ सुबह जब हम उठते हैं, तब सबसे पहला काम हमारा यही होता है कि हम यह रजोहरण को सिर पर लगाते हैं। और जब रजोहरण को सिर पर लगाते हैं, तब हमारी आँखें नम हो जाती हैं। हमारी आँख के आँसू प्रभु से कहते हैं कि, “प्रभु! मेरी कोई सज्जता नहीं, मेरी कोई पात्रता नहीं, और तूने इतना बड़ा वरदान मुझे दे दिया!” तो हमारी सुबह आँसू से उठती है। कृतज्ञता के आँसू!

प्रभु के चरणों में हम आँसू से अभिषेक करते हैं। हम दूध लेकर नहीं जाते, जाते है? नहीं जाते। हम पानी का कलश लेकर नहीं जाते। लेकिन हमारी आँखों के आँसू से हम प्रभु का अभिषेक करते हैं कि, “प्रभु! तूने इतना बड़ा वरदान मुझे दे दिया। ये तेरा जो उपकार है, उस ऋण से मैं मुक्त कैसे होऊँगा?” याद रखो, हमारा और तुम्हारा जीवन ऋण-मुक्ति का एक आयाम है। प्रभु ने इतना दिया, इतना दिया कि हम सोचते हैं कि ‘प्रभु के ऋण से हम मुक्त कैसे हों?’

मुक्त होने का उपाय एक ही है— प्रभु की आज्ञा का पालन। हम साधुपन में साधु के योग्य सभी आज्ञाओं का पालन करने की कोशिश करेंगे, आप श्रावक के योग्य जितनी आज्ञाएँ हैं, उनका पालन करने की कोशिश करेंगे। तो ऋण-मुक्ति का एक ही उपाय है।

तो ग्लास तैयार करो, “सुरत निरत को दिवलो जोयो”— निरंतर स्मरण! और जब भी स्मरण प्रभु का हो, तब आँख से आँसू निकलते हैं। “मेरे प्रभु! मेरे प्रभु! मेरे प्रभु! तूने कितना दिया!” अब ये गीत है ना— ‘मेरे साहिब ने मुझे बहुत कुछ दिया।’ उसमें एक पंक्ति आती है: ‘मैंने कुछ ना दिया, उसने सब कुछ दिया।’ “मैंने कुछ ना दिया… हमारे पास क्या है? हम क्या देंगे प्रभु को? जो भी अच्छा है वो प्रभु का है, प्रभु से मिला है, हमारा तो है नहीं। राग-द्वेष हमारा है, बाकी समभाव तो प्रभु ने दिया है।” तो उसने सब कुछ दिया, मैंने कुछ ना दिया, लेकिन वो देता ही रहता है। वो बरसता ही रहता है।

आज ग्लास को ऐसा तैयार करो कि दूसरा कोई तेल उसमें पूरना न पड़े, तुम्हारे आँसुओं से ये ग्लास परिपूर्ण हो जाए और दीया अखंड जलता रहे।

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