शक्तिपात
सद्गुरु आँख से शक्तिपात करते हैं। वासक्षेप देते समय हाथ से भी शक्तिपात करते हैं। अपने शब्दों से भी शक्तिपात करते हैं। और सद्गुरु की पावन देह से सतत झर रही, बिखर रही ऊर्जा को तुम अगर meditation में पकड़ लो, तो उस ऊर्जा से भी शक्तिपात हो जाता है।
सद्गुरु का dual action आपके ऊपर चल रहा है। पहले आपको तैयार करना और बाद में शक्तिपात कर देना! शक्तिपात करने में एक second से ज़्यादा समय नहीं लगता लेकिन उसको झेलने के लिए आपको तैयार करने में वर्षों नहीं, जन्मों लग गए। जिस दिन आप सद्गुरु के चरणों में झुक गए; शक्तिपात हो जाएगा!
गुरुपूर्णिमा का दिन गुरु-ऋण से मुक्त होने का दिन है। लेकिन जो भी शुभ आपके पास है, वो तो गुरुने ही दिया है; आपका है ही नहीं; वह आप कैसे गुरु को दोगे! आज के दिन आपकी जो भी बुराई हो, व्यसन हो, जो भी कचरा आपके पास हो – राग-द्वेष-अहंकार का – वह आप हमारे चरणों में रख सकते हैं; आपका कचरा हमें स्वीकार्य है!
In Autobiography of a Yogi नामक ग्रंथ के प्रसिद्ध लेखक स्वामी योगानंदजी के जीवन की एक घटना है। १६ वर्ष की उम्र में योगानंदजी अपने कुलगुरु युक्तेश्वर गिरि के चरणों में गए और गुरुदेव से विनंति की कि, “गुरुदेव! मुझे साधना दीक्षा दो।”
अपनी परंपरा में तीन दीक्षाए होती हैं: साधना दीक्षा, मंत्र दीक्षा और जीवन-व्यापिनी दीक्षा। १८ दिन के उपधान आपने किए और गुरुदेव ने नमस्कार महामंत्र आपको दिया, ये ‘मंत्र दीक्षा’ है। गुरुदेव आपको साधना देते हैं, वह ‘साधना दीक्षा’ है। और कोई मुमुक्षु रजोहरण का स्वीकार करता है, तब वह ‘जीवन-व्यापिनी दीक्षा’ को स्वीकारता है।
योगानंदजी ने अपने गुरु से कहा कि, “गुरुदेव! मुझे साधना दीक्षा दो।” गुरु तो तैयार ही होते हैं। मैंने कल ही कहा था— सद्गुरु का डुअल एक्शन (Dual action) आपके पर चल रहा है। पहले आपको तैयार करना और बाद में शक्तिपात करना। आपको तैयार करने में वर्षो नहीं, जन्मों लग गए। अब तो तैयार होंगे ना? शक्तिपात करने में एक सेकंड (Second) से ज़्यादा समय नहीं लगता हैं। सद्गुरु आँख से शक्तिपात करते हैं। तुम्हारी आँख सद्गुरु की आँख से मिल गई और सद्गुरु ने तुम पर देखा— शक्तिपात आँख से हुआ। सद्गुरु ने वासक्षेप दिया तो हाथ से गुरुदेव ने शक्तिपात किया। गुरुदेव ने शब्द दिए— शब्द शक्तिपात हुआ। और अंतिम शक्तिपात है— ऊर्जा शक्तिपात। सद्गुरु की पावन देह से सतत ऊर्जा खर रही है, बिखर रही है। तुम ध्यान में बैठे हो, मेडिटेशन (Meditation) में, और तुम सद्गुरु की ऊर्जा को पकड़ लो, तो सद्गुरु की ऊर्जा से भी शक्तिपात होता है। तो हमारा डुअल एक्शन (Dual action) तुम्हारे पर चलता है। जिस दिन तुम पक जाओगे, तैयार हो जाओगे, उसी दिन, उसी क्षण शक्तिपात हो जाएगा।
योगानंदजी ने साधना दीक्षा के लिए प्रार्थना की। गुरुदेव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर ली। और साधना दीक्षा देकर गुरु स्वयं योगानंदजी को ग्रंथ पढ़ाने लगे। एक सप्ताह बीत गया। अब ग्रंथ कौन सा पढ़ाना, कैसे पढ़ाना… वो तो सद्गुरु देखते हैं। शिष्य को देखने का काम नहीं होता है। शिष्य को तो सिर्फ समर्पित होनेका है। लेकिन योगानंदजी समर्पित नहीं थे। तो योगानंदजी को हुआ कि, ‘गुरु तो बहुत धीमी स्पीड (Speed) से ग्रंथ पढ़ाते हैं। ऐसे में मैं साधना के शिखर पर कैसे चढूँगा? कब चढूँगा?’
एक रात गुरु को पूछे बिना, आश्रम को छोड़कर दूसरे गुरु के आश्रम में गए। वहाँ एक सप्ताह रहे, वहाँ भी ठीक नहीं लगा। तीसरे आश्रम में गए। दो महीने में सात आश्रम में घूम लिए! और बाद में ब्रह्मज्ञान हुआ कि ‘मेरे गुरुदेव सबसे अच्छे हैं।’ तो एक रात गुरु के आश्रम में आए। आश्रम में तो आ गए। सुबह गुरु के चरणों पर वंदन के लिए हाज़िर हो गए। और गुरु प्यार से उन्हें देखते हैं और ग्रंथ को पढ़ाना शुरू कर देते हैं। गुरु पूछते भी नहीं, “कहाँ गया था तू?” ‘मुझे पूछे बिना तू कहाँ गया था?’ गुरु पूछते भी नहीं!
लेकिन योगानंदजी बड़े बुद्धिमान थे। उन्होंने सोचा कि, ‘आज पहला दिन है, लेकिन दूसरे दिन तो गुरु डाँटेंगे ही डाँटेंगे। गुरु लड़ेंगे।’ दूसरा दिन हुआ। गुरु उतने ही प्यार से ग्रंथ पढ़ाते हैं। प्रेम ही प्रेम। कोई पृच्छा नहीं— ‘तू कहाँ गया था, तूने क्या किया?’ तीसरा दिन… उतना ही प्रेम! तब योगानंदजी रोने लगे। उनकी आँख में आँसू थे। उन्होंने गुरुदेव से पूछा कि, “गुरुदेव! आप मुझे डाँटते क्यों नहीं? मैंने आपके पास साधना दीक्षा ली और साधना दीक्षा लेने के बाद गुरु को पूछे बिना कहीं भी मैं जा नहीं सकता हूँ। डेढ़ महीना, पौने दो महीने तक मैं घूम कर आया बाहर, आप पूछते भी नहीं कि तू कहाँ गया था?”
उस वक्त गुरु युक्तेश्वर गिरि ने जो कहा था, वो आज गुरु पूर्णिमा के दिन आप सबको याद रखना है। गुरु ने कहा था कि, “बेटा! गुरु के प्रेम की जो नदी है, उसके किनारे नहीं होते। गुरु का प्रेम सतत बहता ही रहता है।”
मैं कई दिनों से कह रहा हूँ कि परमात्मा का प्रेम हमें मिलता है और वही प्रेम हम आपको देते हैं। तो हमारे पास प्रेम के सिवा कुछ भी नहीं है। हम शब्द देंगे, लेकिन शब्द देना मेरा तो प्रयोजन नहीं ही है। मेरा प्रयोजन तो सिर्फ एक ही है— आपको प्रेम देना। तो युक्तेश्वर गिरि ने कहा कि, “सद्गुरु की प्रेम की नदी के किनारे नहीं होते। ये सद्गुरु हैं! जिनके पास प्रेम ही प्रेम है। कभी वे डाँटते हैं ना, तो डाँट के पीछे भी उनका प्रेम ही होता है। जैसे माँ बच्चे को डाँटती है, लेकिन माँ के हृदय में प्रेम ही होता है। तो सद्गुरु के हृदय में प्रेम ही होता है। और इसलिए सद्गुरु की इच्छा एक ही है— प्रेम से आपको उठाना।
और उठाने के लिए सद्गुरु के पास एक जो साधन है, वह है शक्तिपात। शक्तिपात का मतलब यह है कि गुरु ने जो शक्ति अर्जित की है, जो शक्ति प्राप्त की है, वो शक्ति आपको दे देंगे। ५० वर्ष का संयमी जीवन जिन्होंने पाला है, उन सद्गुरु के पास आप जाओगे, वासक्षेप आपको देंगे, शक्तिपात करेंगे, तो क्या होगा? ५० वर्ष के संयमी जीवन का आनंद आपको मिलेगा।
लेकिन एक बात मैं बार-बार कहता हूँ— शक्तिपात करने वाले गुरु तो तैयार हैं, लेकिन शक्तिपात को स्वीकारने वाले, शक्तिपात को झीलने वाले शिष्य कहाँ हैं? गुरु आपको दोष से मुक्त कर देते हैं। आपको गुण से भर देते हैं। आपके पास सिर्फ सद्गुरु के प्रति बहुमान होना चाहिए। आप सद्गुरु के चरणों में झुक गए, शक्तिपात हो जाएगा!
एक बड़ी सुंदर बात भारतीय परंपरा में आती है। बायज़ीद (Bayazid) नाम के एक चमत्कारिक संत थे। दो तरह के संत होते हैं। एक तो आध्यात्मिक संत, जो भीतर उतरे हैं। दूसरे चमत्कारिक संत, जो अहंकार की दुनिया में जी रहे हैं। तो बायज़ीद चमत्कारिक संत थे। जैसे-जैसे चमत्कार करते जाते, त्यों-त्यों उनका अहंकार बढ़ता जाता था। एक दिन की घटना है। बायज़ीद जंगल से गुज़र रहे थे। जंगल में एक पेड़ के नीचे एक बड़े ही आध्यात्मिक सद्गुरु विराजमान थे। उन्होंने बायज़ीद को देखा। सद्गुरु फेस रीडिंग (Face reading) के मास्टर होते हैं। आइब्रो रीडिंग (Eyebrow reading) के मास्टर, फोरहेड रीडिंग (Forehead reading) के मास्टर। आप सद्गुरु को आपकी साधना की बात करें, वो आपकी ओर खुलती बात है। सद्गुरु तो आपको देखते ही आपकी साधना का स्टैंडपॉइंट (Standpoint) समझ लेंगे कि आप कहाँ खड़े हो।
सद्गुरु ने देखा कि बायज़ीद के पास चमत्कार भी है, अहंकार भी है। और जब तक अहंकार है, तब तक अध्यात्म की दुनिया में प्रवेश ही नहीं होता। सद्गुरु का प्रेम बायज़ीद के पर उमड़ गया। सद्गुरु प्रेमावतार हैं। मैं कृपावतार नहीं कहता हूँ, प्रेमावतार कहता हूँ और वह मेरे संदर्भ में है। मैं आपको कृपा देना नहीं चाहता हूँ। कृपा तो प्रभु देंगे। मुझे तो आपको प्रेम ही देना है। प्रवचन में आप आएंगे, आपका हृदय प्रेम से भर जाएगा। क्योंकि मुझे प्रेम ही देना है और मेरे पास दूसरा कुछ है भी नहीं प्रेम के सिवा। सिर्फ प्रेम मेरे पास है। आपका हृदय राग से भरा है, अहंकार से भरा है, और इससे आप पीड़ित हो। आप पीड़ित क्यों हो? आप वेल-सेट (Well-set) हैं पुणे वाले! लेकिन दर्द क्या है? पीड़ा क्या है? “वो मुझसे आगे निकल गया!” अरे निकल गया तो निकल गया, उसके पुण्य से निकल गया। तुम्हें क्या दिक्कत है? “लेकिन नहीं, मेरे पास के फ्लैट में रहता था और वह पहुँच गया, उसने अपना बंगला बना लिया! मैं तो फ्लैट में ही पड़ा हूँ और वो बंगले वाला बन गया!” क्या हो गया? ईर्ष्या होगी, जलन पैदा होगी और आप पीड़ित होंगे। अरे, आपका फ्लैट किसी ने ले लिया? क्यों पीड़ित हैं आप? आप पीड़ित क्यों हो? आपका फ्लैट किसी ने नहीं लिया। आपका फ्लैट आपके पास है। तो फिर पीड़ित क्यों हुए? ‘वो बंगले में क्यों गया?’ उसके पुण्य से गया। तो इस जलन से आप पीड़ित हो।
मैं ऐसा प्रेम आपको देना चाहता हूँ, आज गुरु पूर्णिमा है इसलिए नहीं, रोज़…हमेशा… ऐसा प्रेम देना चाहता हूँ कि आपका हृदय सिर्फ प्रेम से भर जाए। आपका पड़ोसी बंगले में गया, आप राज़ी होंगे। आप आनंदित होंगे, आप आनंद में होंगे कि, “चलो अच्छा ही हुआ, मेरा पड़ोसी है, बंगले में गया तो अच्छा ही हुआ।” तो प्रेम आपके पास आ जाएगा, आप सुखी हो जाएंगे। तो आपका हृदय प्रेम से भर जाए, इसका अर्थ यही है कि आपका हृदय आनंद से भर गया। अब मैं आपसे पूछूँ— सुख,आनंद किसको नहीं चाहिए, वो बोलो। मैं कहूँगा हाथ खड़ा करो। किसको सुख नहीं चाहिए? सबको चाहिए। किसको आनंद नहीं चाहिए? सबको चाहिए। तो मैं ऐसा प्रेम दे सकता हूँ कि आपका हृदय आनंद से भर जाए। हमारे मुनिराजों को देखो, सब आनंद में हैं। साध्वीजी भगवंतों को देखो, सब आनंद में हैं। क्यों आनंद में हैं? बस प्रेम से हृदय भर गया, आनंद से हृदय भर गया।
तो सद्गुरु ने बायज़ीद को देखा और प्रेम हृदय में उमड़ पड़ा कि, ‘मेरा प्रेम उसको दे दूँ और उसके अहंकार को खत्म कर दूँ, जिससे कि वह आध्यात्मिक दुनिया में चला जाए।’ तो बायज़ीद चल रहा था। उसे तो पता भी नहीं था कि पेड़ के नीचे कोई सद्गुरु बैठे हैं। लेकिन सद्गुरु ने कहा, “बायज़ीद, यहाँ आ!” बायज़ीद को आना पड़ा। अहंकारी था, किसी के पास जाता नहीं, किसी को झुकता नहीं, लेकिन यहाँ आना पड़ा। और सद्गुरु के चरणों में झुकना पड़ा।
हमारे वहाँ गुरुओं की दो परंपराए हैं। एक सद्गुरु ऐसे होते हैं जिनको शिष्य-वृंद पर काम करना है। तो ऐसे सद्गुरु आज्ञा-चक्र को डेवलप (Develop) करते हैं। यहाँ दो आइब्रो के बीच आज्ञा-चक्र है। उस आज्ञा-चक्र को जब हम डेवलप करते हैं, तब हमारी बात सबको मान्य करनी ही पड़ती है। तो जो सद्गुरुओं को अपने शिष्य-वृंद पर काम करना है, वे सद्गुरु अपने आज्ञा-चक्र को सतेज, सप्राण बनाते हैं। और जिनको भीतर ही उतर जाना है, जिन्होंने अपना शिष्य-वृंद अपने उत्तराधिकारी को सौंप दिया और वे निवृत्त हो गए गच्छाधिपति पद से, वे सद्गुरु आज्ञा-चक्र को अब सतेज नहीं करेंगे। वे सीधे सहस्रार में जाएंगे और सहस्रार को डेवलप करेंगे। सहस्रार डेवलप होगा और परम चेतना का प्रवेश सहस्रार से भीतर होगा।
तो ये जो सद्गुरु थे, उनका आज्ञा-चक्र बहुत ही सप्राण था और इसलिए उन्होंने कहा, “बायज़ीद, यहाँ आ!” पहले तो आश्चर्य हुआ बायज़ीद को कि ‘मेरा नाम भी जानते हैं!’ लेकिन अहंकारी चेतना— ‘मेरा नाम कौन नहीं जानता? मैं कितना प्रसिद्ध आदमी हूँ!’ सद्गुरु के पास आया, झुका। अब सद्गुरु को काम ये करना है— शक्तिपात करके उसके अहंकार को खत्म करना है। तो सद्गुरु ने कहा कि, “थोड़ा सामान है। पूर्व दिशा में एक आश्रम है। वहाँ तू इस सामान को लेकर जा और वहाँ विराजमान संत को ये सामान दे दे।”
अब गुरु का एक ऑरा फील्ड (Aura Field) होता है। आपको धीरे-धीरे समझाऊँ। सद्गुरु यहाँ बैठे हैं, लेकिन सद्गुरु की ऊर्जा फैलती है। तो जहाँ तक सद्गुरु की ऊर्जा फैलती है, उसे ‘ऑरा फील्ड’ कहते हैं— ऊर्जा क्षेत्र। तो बायज़ीद सद्गुरु के ऊर्जा क्षेत्र में था, तो गुरु की आज्ञा माननी ही पड़ी। लेकिन थोड़ी दूर गया, ऑरा फील्ड के बाहर, और तब अहंकार प्रबल हुआ— “क्या मैं मज़दूर हूँ? मैं सामान लेकर वहाँ जाऊँ? मैं मज़दूर हूँ? मैं तो संत हूँ!”
वहाँ से दिन-दहाड़े एक बाघ गुज़र रहा था। जंगल का मामला था। बायज़ीद ने बाघ को रोका, शक्ति थी। बाघ को रोका, बाघ रुक गया। बाघ की पीठ पर सामान डोरी से बाँधा और अपने वस्त्र दिखाए— “ऐसे वस्त्र, और ये दिशा, जाओ, देकर आओ।” बाघ चला सामान लेकर। लेकिन सद्गुरु देख रहे हैं। सद्गुरु प्रभावित होने वाले नहीं हैं। मैं बार-बार कहता हूँ, सद्गुरु ना किसी से प्रभावित होते हैं, ना किसी को प्रभावित करते हैं। हम कोई भी व्यक्ति से प्रभावित नहीं होंगे। “साहेब, मैं अरबपति हूँ!” अरबपति हो, तेरे घर जा! मुझे क्या? मुझे एक पैसा नहीं चाहिए।
मे वालकेश्वर, मुंबई में चातुर्मास था, तो डायबिटीज़, हाइपरटेंशन था, तो डॉक्टर ने कहा— “मॉर्निंग वॉक (Morning Walk) करो।” मैं मॉर्निंग वॉक के लिए हैंगिंग गार्डन (Hanging Garden) की ओर जाता था, तो मेरे साथ कई भक्त जुड़ जाते थे। एक भक्त ने एक दिन कहा कि, “साहेबजी! महाराष्ट्र गवर्नमेंट (Government) के सभी मिनिस्टर (Minister) वालकेश्वर में ही रहते हैं, इस टेकरी पर। मेरा सबसे संबंध अच्छा है। आप कहो तो उस मिनिस्टर को आपकी सभा में लेकर आऊँ?” मैंने कहा, “मेरी धर्मसभा है और धर्मसभा में एक भी मिनिस्टर नहीं चाहिए! हाँ, उसको श्रोता के रूप में नीचे बैठना हो और प्रवचन सुनना हो, तो आए। लेकिन उसका सम्मान कराना पड़े, उसको कुर्सी देनी पड़े, ऐसी कोई व्यवस्था मेरे पास नहीं है। मिनिस्टर से मेरा क्या काम है? मुझे कोई काम नहीं है मिनिस्टर से। तो ना कोई सत्ताधीशों से हम प्रभावित होते हैं, ना कोई श्रीमंत से हम प्रभावित होते हैं। और दूसरी ओर, हम किसी को प्रभावित करना चाहते भी नहीं हैं।
तो सद्गुरु बायज़ीद के इस कृत्य से प्रभावित नहीं हुए। ‘ठीक है, ये तो अहंकार की विद्या है। बाघ को वश करना, इसमें क्या है? अहंकार को वश करो, तब मैं तुम्हें महान मानूँ।’ अब गुरु ने फिर से बायज़ीद को बुलाया— “यहाँ आ।” फिर जाना पड़ा। तब गुरु ने शक्तिपात किया— शब्द शक्तिपात! गुरु ने कहा, “तेरे जैसा अहंकारी, नालायक, निकम्मा आदमी मैंने देखा नहीं।” शब्द शक्तिपात!
बायज़ीद की भी योग्यता रही कि वह गुरु के शब्द शक्तिपात को झील सका। गुरु ने कहा, “तेरे जैसा अहंकारी आदमी देखा नहीं। इतना अहंकार! ‘मैं मज़दूर हूँ, मैं सामान उचक्कर जाऊँ?’ ऐसा अहंकार! किसने तुम्हें काम सौंपा था? मैंने सौंपा था। तुम मज़दूर हो या गुरु के भक्त हो? लेकिन तुम्हारा अहंकार कहता है तुम मज़दूर हो। तो तेरे जैसा अहंकारी आदमी देखा नहीं। और नालायक! मेरे सामने तू ये चमत्कार दिखाता है, मुझे प्रभावित करने के लिए कि ‘मैं बाघ को भी वश कर सकता हूँ।’ अरे! बाघ को वश किया, उसमें क्या बड़ी बात थी? तेरे अहंकार को वश कर! और तेरे जैसा निकम्मा आदमी मैंने नहीं देखा। तेरे पैर तूट गए थे? बाघ को हैरान किया! क्यों तू नहीं गया?”
गुरु का प्रेम! गुरु ने शब्द शक्तिपात कर दिया, बायज़ीद ने झील लिया। और चमत्कारिक, अहंकारी बायज़ीद आध्यात्मिक संत हो गया। एक ही सेकंड! परिवर्तन! तो शक्तिपात तुम स्वीकार कर सको, इसलिए तुम्हें तैयार करने में वर्षों बीत गए, जन्मों बीत गए। लेकिन तुम तैयार हो गए, तो शक्तिपात इसी क्षण हो सकता है।
हमारी परंपरा में एक बड़ी सुंदर बात आती है। एक आचार्य भगवंत एक नगर में पधारे। हमारे आचार्य भी कैसे हैं? चौमासा में एक जगह चार महीना रहेंगे। चौमासा सिवाय के काल में एक जगह ज़्यादा से ज़्यादा एक मास तक रहेंगे। तो नगर जनों ने विनंति की कि, “आप बड़े गुरु यहाँ पधारे हैं, तो आप एक मास-कल्प का हमें लाभ दीजिए।” गुरुदेव ने स्वीकृति दी। भक्तगण आनंद में आ गए। प्रवचन आदि शुरू हो गया। भक्तों की इच्छा थी, ‘प्रभु भक्ति का कोई उत्सव करें।’ उत्सव के बाद गुरुदेव को कही। गुरुदेव ने कहा, “मेरी एक इच्छा है। मेरे एक शिष्य को मुझे आचार्य पद देना है और मुहूर्त थोड़े दिन के बाद ही आता है, तो उस दिन आप प्रभु भक्ति उत्सव रख सकते हैं।” लोग तो बड़े आनंद में आ गए। “आचार्य पद अर्पण समारोह हमारे नगर में होगा! हमारी तो स्मृति में भी नहीं कि कोई आचार्य भगवंत की पदवी हमारे नगर में हुई हो, हम धन्यभागी!”
अब आचार्य पदवी का दिन नज़दीक आ रहा था। लेकिन गुरु ने किसी का भी नाम नहीं खोला था कि किसको मैं आचार्य बनाऊँगा। Guru is the supreme boss, लोग कल्पना करते कि ‘नेक्स्ट टू आचार्य देव (Next to Acharya Dev) ये भगवंत हैं, तो शायद उन्हें आचार्य पद मिले।’ लेकिन गुरुदेव किसी का भी नाम खोलते नहीं। यूँ करते-करते आचार्य पद अर्पण का दिन आ गया। सुबह ९:०० बजे क्रिया शुरू होने वाली है। ८:०० बजे तक गुरु ने किसी को नहीं कहा कि ‘तेरी आचार्य पदवी होने वाली है।’ ये शिष्य भी कैसे होंगे! किसी के मन में जिज्ञासा भी नहीं कि ‘गुरुदेव किसे आचार्य पदवी देंगे?’ Guru is the supreme boss! गुरुदेव के मन में जिनका नाम होगा, वो आचार्य बन जाएंगे। हमें कोई विचार करने का होता ही नहीं। शिष्य के पास विचार होता ही नहीं। जिसके पास विचार हो, विकल्प हो, वो शिष्य नहीं है। समझ गए? गुरु का कोई भी कृत्य हो, उस पर विकल्प आते हैं? ‘गुरुदेव ने ऐसा क्यों किया?’ अरे, तुमने विकल्प किया, तुम शिष्य मिट गए! तुम शिष्य ही नहीं थे।
८:३० बजे, एक महाराज साहब थे, पढ़े-लिखे नहीं थे। व्याख्यान तो दे ही नहीं सकते थे, वार्तालाप भी नहीं कर सकते थे। सिर्फ पच्चक्खाण आता था, पच्चक्खाण देते थे, और आवश्यक क्रिया के सूत्र आते थे। गुरुदेव ने उस महाराज साहब को कहा ८:३० बजे कि, “तुम नए वस्त्र पहन लो। नए वस्त्र पहन कर सभा में आओ।” वे इतने आज्ञांकित थे कि ‘गुरुदेव बोले, वो जीवन-मंत्र।’ कभी उन्होंने विचार किया भी नहीं था और कभी विचार करने वाले भी नहीं थे। गुरुदेव ने कहा “नए वस्त्र पहन कर आओ”, नए वस्त्र पहन कर आए। बैठ गए सब के पीछे। ९ बजे क्रिया का समय आ गया।
अब सब श्रावकों के मन में उत्सुकता थी। श्रावकों के मन में हों, साधुओं के मन में नहीं। किसीके मन मे उत्सुकता नहीं थी। श्रावकों के मन में थी कि गुरुदेव किसको क्रिया के लिए खड़े करते हैं। तब गुरुदेव ने कहा उस महाराज साहब को जो नए वस्त्र पहन कर आए थे— “चलो तुम आ जाओ और प्रदक्षिणा दो भगवान से”। श्रावकगण आश्चर्य में पड़ गए। लेकिन ये लोग आश्चर्य में नहीं पड़े। तुम्हें आश्चर्य होगा कभी! गुरुदेव जो भी करें, श्रावकों में भी जो समर्पित थे, उन्हें विचार नहीं आया। लेकिन थोड़े कुतूहल वाले भी थे, उनके मन में विचार आया कि “ये महाराज साहब आचार्य बनेंगे? उनको व्याख्यान देना नहीं आता है, वार्तालाप भी नहीं कर सकते हैं, तो फिर व्याख्यान कैसे देंगे? ये तो गुरु के उत्तराधिकारी के रूप में आ जाएंगे!”
आचार्य पदवी हो गई। और फिर… आपने कभी आचार्य पदवी देखी हो, तो एक रहस्यमय क्रिया अंत में आती है। रहस्यमय क्रिया ये है कि गुरु स्वयं शिष्य को वंदन करते हैं। गुरु नीचे जाते हैं, शिष्य को सिंहासन पर बैठाते हैं, नए आचार्य को, और गुरु स्वयं वंदन करते हैं। क्यों? इसलिए, गुरु कहना चाहते हैं कि ‘मेरे पास जो भी था, मैंने उसमें उँडेल दिया है। अब मुझसे भी ज़्यादा हैं ये!’ फिर ये क्रिया हो गई और गुरुदेव ने नए आचार्य से कहा, “अब धर्मदेशना करो।” अब लोग चौकन्ने हो गए कि ‘महाराज साहब क्या बोलेंगे?’
उस समय संस्कृत में कोई भाषण दे, तो वो तो बड़ा ही अच्छा माना जाता था। संस्कृत विद्वानों की भाषा है। लेकिन संस्कृत में दो विभाग आते हैं। एक तो गद्य, जैसे हम हिंदी में बोलते हैं, ऐसे बोलना। दूसरा है पद्य, श्लोकबद्ध बोलना। जैसे— ‘सकलार्हत्…’, ‘संसारदावा…’ है, तो श्लोक में। तो नए आचार्य श्लोकबद्ध संस्कृत में धर्मदेशना देने लगे! एक घंटे तक अविरत देशना उन्होंने दी। सब लोग चमत्कृत हो गए कि ‘ये क्या!’
यही गुरु का शक्तिपात है। आपने देखा होगा, जब हम सूरि-मंत्र हमारे शिष्य को देते हैं, तब उसके कान में देते हैं। ये बड़ी प्राचीन विधि है कि गुरु के पास जाकर कर्ण-विद्या लें। गुरु कान में फूँक लगाते हैं और वह शब्द सीधे ही सहस्रार में… ऐसे कान से निकल नहीं जाते, गुरु के शब्द हैं। तो ये जो सूरि-मंत्र दिया था, शक्तिपात किया था, उसका ये प्रभाव था।
तो आज का दिन गुरु पूर्णिमा का दिन है। गुरु का आशीर्वाद आप सबको है। हिंदू कैलेंडर में गुरु पूर्णिमा का बहुत ही महत्व है। महत्व इसलिए है कि ३५९ दिन गुरु बरसते ही रहते हैं, गुरु बरसते ही रहते हैं, गुरु देते ही रहते हैं। एक दिन ऐसा रखा, जब शिष्य-भक्त भी गुरु के चरणों में कुछ समर्पित कर सके। गुरु पूर्णिमा का दिन गुरु-ऋण से मुक्त होने का दिन है। लेकिन जब गुरु निर्ग्रंथ हैं, तब आप देंगे क्या? हिंदू गुरु के पास कोई जाएंगे… हिंदू गुरु में भी दो विभाग होते हैं। कोई गुरु पैसे को छूते भी नहीं, कोई रखते भी हैं। जो पैसे को रखते हैं, उनके पास तुम जाओगे, १००० रुपिये, १०,०००, लाख, दो लाख दे देंगे। लेकिन जो गुरु पैसे को छूते भी नहीं, उनके पास तुम जाओगे, आज आए हो तो क्या दोगे? दोगे क्या? जो भी शुभ आपके पास है, जो भी अच्छा आपके पास है, वो तो सद्गुरु ने दिया है। तुम्हारा तो है ही नहीं! जो तुम्हारा है ही नहीं, तुम कैसे गुरु को दोगे?
इसलिए भक्त भी बड़ा होशियार आदमी है। भक्त ने एक रास्ता निकाला है— “त्वदीयं तुभ्यमेव समर्पयामि।” जो तुम्हारा है, वो तुम्हें सौंप रहा हूँ। जो अच्छा तुमने दिया है, उसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ। लेकिन आपकी जो भी बुराई हो, जो भी व्यसन हो, जो भी कचरा आपके पास है— राग का, द्वेष का, अहंकार का… वे हमारे चरणों पर आप रख सकते हैं। आपका कचरा हमें स्वीकार्य है।
फाइटिंग (Fighting) करते हैं घर में? आज से घर में फाइटिंग नहीं करने की। मैंने पहले भी कहा था कि भक्त फाइटिंग कहाँ-कहाँ करते हैं? एक तो मंदिर में प्रभु के पास और एक उपाश्रय में हमारे पास। दो जगह फाइटिंग करने की, घर में नहीं करनेकी। समझ गए? घर में फाइटिंग नहीं करनी। प्रभु के पास करने की— “सुलसाजी को तीर्थंकर पद दिया, रेवतीजी को तीर्थंकर पद दिया, तो मुझे क्यों नहीं दिया?” लड़ो प्रभु से! और आप भी लड़ना प्रभु से— “श्रेणिक महाराजा को तीर्थंकर पद आपने दे दिया, तो मुझे क्यों नहीं दिया?” और हमारे साथ भी लड़ो— “इतने सारे को दीक्षा दे दी, तो हमें क्यों भूल गए? हमको क्यों रजोहरण नहीं दिया?” लड़ेंगे ना हमारे साथ? तो फाइटिंग दो जगह ही करने की— प्रभु के पास और गुरु के पास। अब घर में नहीं, समझ गए?
तो आज आपने त्याग किया कि घर में या ऑफिस में गुस्सा नहीं करनेका। ठीक है? आज गुरु के चरणों में क्रोध को रख दो। अहंकार करेंगे? किसका अहंकार करेंगे? “ऐसे दादा हमें पुणे वालों को मिले हैं”, अहंकार करो! कौन ना बोलता है? चिंतामणि दादा और गोड़ीजी दादा। कहीं एक पार्श्वनाथ भगवान होते हैं चमत्कारिक, यहाँ तो दो चमत्कारिक पार्श्वनाथ दादा, पुणे वाले को मिले हैं! तो अहंकार करो, “हमें ऐसे भगवान मिले हैं!” तो आज जो पैसे का अहंकार है, संपत्ति का, अपने घर का अहंकार है, वो सब यहाँ रख दो। प्रभु का अहंकार करो, कोई बात नहीं।
तो सद्गुरु शक्तिपात करते हैं। तो मैंने पहले कहा, आँख से करते हैं, हाथ से भी करते हैं, शब्द से भी करते हैं और ऊर्जा से भी करते हैं। तो प्रवचन में भी शक्तिपात होता है और वह शक्तिपात है— शब्द शक्तिपात। और आपकी आँख हमारी आँख से मिल जाएगी, कहीं और आप नहीं देखते रहे हो, तो आँख से भी शक्तिपात हो जाएगा। तो कल से व्याख्यान सुनने के लिए इसलिए आना है कि ‘कभी तो शक्तिपात हो ही जाएगा!’ और नहीं होगा ना, तो कार्तिकी पूर्णिमा के पहले हम समूह शक्तिपात उत्सव रखेंगे, सबको शक्तिपात कर देंगे!
तो आज गुरु पूर्णिमा है। सद्गुरु के चरणों में हमारे भाव-पुष्प हम समर्पित करें। और हम पवित्र बनें, निर्मल बनें, हमारा जीवन आगे और आगे बढ़े।
