Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 17-07-2026 | Pune Chaturmas

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गुरुगम लेजो रे जोड़

मेरे देखे हमारा अवतार-कृत्य एक ही है : परमात्मा के प्रेम को स्वीकारना, परमात्मा के प्रेम को झेलना। प्रभु का प्रेम हर क्षण हम पर बरस रहा है। उस प्रेम को झेलने के लिए सिर्फ झुकना, समर्पित हो जाना – इतना ही हमें करना है। समर्पण से ही साधना का प्रारंभ है, और समर्पण ही साधना का आखिरी बिंदु है।

आपकी बुद्धि से साधनमार्ग में कुछ मिलनेवाला नहीं है। संपत्ति बुद्धि से मिल सकती है, लेकिन परमात्मा, परमात्मा का मार्ग बुद्धि से नहीं मिलता है। साधनामार्ग आपके लिए अनभ्यस्त है, अपरिचित है। इस मार्ग में अगर जाना हो, तो सद्गुरु के वचनों पर श्रद्धा करनी पड़ती है।

सद्गुरु तुम्हारे चेहरे को देखकर निश्चित कर लेते हैं कि तुम्हारी साधना का अभी का stand-point क्या है और इस जन्म के अंत तक तुम्हें कहाँ तक पहुँचाया जा सकता है। और अगर किसी में शायद ऐसी संभावनाएँ नहीं हैं, तो सद्गुरु संभावनाओं को भी पैदा कर सकते हैं।


महासती सुलसाजी के द्वार पर अंबड़ श्रावक आए। उन्होंने कहा कि, “देवी जी, मैं चंपापुरी गया था। वहाँ त्रिलोकेश्वर, अखिल ब्रह्मांडेश्वर परमात्मा महावीर देव विचर रहे थे। मैंने प्रभु के चरणों में वंदना अर्ज की, और प्रभु से पूछा कि— ‘प्रभु! मैं राजगृही जा रहा हूँ, कोई कार्य-सेवा?’ तब प्रभु ने कहा कि राजगृही में मेरी श्राविका सुलसा रहती है, उसे मेरा धर्मलाभ विदित करना। तो देवी जी, मैं आपके पास आया हूँ, प्रभु ने आपको धर्मलाभ सूचित किया है।”

ये शब्द सुनकर सुलसाजी भाव-विभोर हो गईं। ‘प्रभु मुजे याद कर रहे थे!’ आँखों में आँसू की धार है, सिसक-सिसक कर रो रही हैं सुलसाजी, और उन्होंने कहा, “प्रभु, कहाँ तू, कहाँ मैं? तु त्रिलोक का स्वामी, अखिल ब्रह्मांड का मालिक, मैं तेरे चरणों की दासी। तु मुजे याद करे, तु मुजे धर्मलाभ की आशीष दे। प्रभु, तेरे इस प्रेम का ऋण मैं कैसे चुकाऊँ?”

प्रभु याद करते हैं एक श्राविका को। प्रभु का धर्मलाभ, प्रभु का प्रेम था, मूर्तिमंत प्रेम। सुलसाजी सोच रही हैं, “कहाँ प्रभु, कहाँ मैं? और प्रभु का प्रेम मुजे मिल गया?” सुलसाजी को लगता है कि मेरा पूरा जन्म सार्थक हो गया।

मेरी नजरसे भी हमारा अवतार-कृत्य एक ही है— परमात्मा के प्रेम को स्वीकारना, परमात्मा के प्रेम को झीलना। एक क्षण ऐसा नहीं जब प्रभु का प्रेम न बरस रहा हो। प्रभु का प्रेम सतत हम पर बरस रहा है। हमारी अतीत की यात्रामें भी प्रभु का प्रेम बरस ही रहा था। लेकिन मैं भी अतीत की यात्रा में प्रभु के प्रेम को झील नहीं पाया था। मुजे खयाल ही नहीं था कि प्रभु का प्रेम मेरे पर बरस रहा है। इस जन्म में गुरुदेवों के मुख से जब यह खयाल आया कि प्रभु का प्रेम हम सब पर बरस रहा है, सुनकर ही मैं भाव-विभोर हो गया। और जब प्रभु का प्रेम झीला, प्रभु के प्रेम को स्वीकारा, पूरा संसार बदल गया। मैं कह सकूँ कि जिस क्षण प्रभु का प्रेम मुजे मिला, उसी क्षण दुनिया छूट गई। संसार छूट गया, राग-द्वेष छूट गया। प्रभुके प्रेम से हृदय भर गया। फिर दूसरा कोई तत्व इस हृदय में कैसे टिक पाए, कैसे रह सके? ये सुलसाजी की जो मनोदशा थी, वही मनोदशा हमारी होनी चाहिए।

एक बहुत ही सुंदर बात, साध्वीजी भगवतीओ के लिए और हमारी माताओं के लिए। आज का मनोवैज्ञानिक कहता है कि स्त्री के देह में ऐसी रासायनिक प्रक्रिया होती है कि स्त्री शीघ्र ही समर्पित हो सकती है। पुरुष देह में ऐसी रासायनिक प्रक्रिया होती है कि हम अकड़ू ही होते हैं, हम झुक नहीं सकते हैं। स्त्री देह में ऐसी रासायनिक प्रक्रिया होती है कि वह झुक सकती है। और झुकना, प्रभु के चरणों पर झुक जाना, समर्पित हो जाना, यही तो हमारी साधना है। समर्पण से ही साधना प्रारंभ होती है, और समर्पण ही साधना का आखिरी बिंदू है। तो तुम्हारे लिए तो आनंद की घटना होगी। तुम हमसे भी शायद शीघ्र मोक्ष में पहुँच जाओगी। क्योंकि तुम झुक सकती हो। झुक जाओ। सिर्फ झुक जाओ। जो झुक गया, उसे प्रभु मिल गए। झुकना और मिलना पारस्परिक प्रक्रिया है। तुम झुक गए, प्रभु मिल गए।

जापान का सम्राट सद्गुरु के पास गया। सद्गुरु के चरणों में झुका। तब गुरुने पूछा कि, “तू बाहर से झुका या भीतर से झुका?”

भीतर से झुकते हो? मन झुक जाए, तुम्हारा अस्तित्व झुक जाए, तो तुम भीतर से झुके। और सिर्फ शरीर ही झुका, तो तुम बाहर से झुके। गुरु सम्राट से पूछते हैं कि, “तु भीतर से झुका या बाहर से झुका?” हम तो शायद ऐसा प्रश्न गुरुदेव करें तो उत्तर भी दे दें, “गुरुदेव, मैं तो भीतर से झुका हूँ।” लेकिन जापान का सम्राट, पूरे देश का सम्राट, इतना विवेकी था, उसने कहा, “गुरुदेव, मैं तो निपट अज्ञानी हूँ। मुजे कैसे मालूम हो कि मैं भीतर से झुका या बाहर से झुका?”

गुरु उसके उत्तर से प्रसन्न हुए। और गुरु तो Face Reading के मास्टर होते हैं। तुम तुम्हारी साधना का वर्णन सद्गुरु के पास करो, ये तुम्हारी ओर खुलती बात है। सद्गुरु तो तुम्हारे फेस को देखकर, तुम्हारे चेहरे को देखकर, निश्चित कर लेंगे कि तुम कहाँ पर खड़े हो, तुम्हारी साधना का Stand Point क्या है। गुरु तुम्हारी साधना का अभी का स्टैंड पॉइंट नक्की कर सकते हैं, और इस जन्म के अंत तक तुम्हें कहाँ तक पहुँचाया जा सकता है, वो भी सद्गुरु निश्चित कर लेते हैं। और आप में शायद ऐसी संभावनाएँ नहीं हैं, शक्यताएँ नहीं हैं, Possibilities नहीं हैं, तो सद्गुरु संभावनाओं को भी पैदा कर देंगे। सब कुछ सद्गुरु कर देंगे।

एक बार मैं प्रवचन में कह रहा था कि सद्गुरु ही सब कुछ कर देंगे। तो एक श्रावक ने पूछा—”तो गुरुदेव, हमें क्या करने का? सब कुछ सद्गुरु कर देंगे, तो हमें क्या करने का?”

मैं रिलैक्स मूड में था, तो मैंने कहा कि, “अभी तक हमने क्या किया है? सद्गुरु के प्रेम का झरना बह रहा था, हमने उस पर पत्थर ही डाले हैं, झरने को रोकने के लिए। अब तुम्हें इतना ही करना है कि सद्गुरु के प्रेम का झरना बह रहा है, उसमें तुम्हारी बुद्धि के, तुम्हारे अहंकार के पत्थर नहीं डालने हैं। इतना ही काम तुम्हें करने का है।”

श्रद्धा से सद्गुरु के वचनों को स्वीकार करो। तुम्हारी बुद्धि की गुंजाइश कितनी? ताकत कितनी? मैं कितना भी पढ़ा-लिखा हूँ, मैं विहार कर रहा हूँ, कच्चा रास्ता है, और दो मार्ग पड़ेंगे। एक राइट जाता है, एक लेफ्ट जाता है। अब मैंने सैकड़ों ग्रंथ पढ़े हैं, लेकिन यहाँ वे काम नहीं आएँगे। मुजे जिस गांव जाना है, वो लेफ्ट मार्ग से मिलेगा या राइट मार्ग से मिलेगा, ये मुजे पता नहीं चलेगा। बाजू के खेत में एक आदमी खेती कर रहा है, मैं उससे पूछूँगा कि — “भैया, मुजे इस गांव जाना है, तो मैं किस रास्ते से जाऊँ?” वह कह देगा, “महाराज, लेफ्ट मार्ग से जाओ, तुम्हारा गांव मिल जाएगा।” तो मेरे पास बुद्धि है, लेकिन इस गांव के मार्ग के लिए अभ्यस्त बुद्धि नहीं है।

ऐसे ही आपके पास बुद्धि है, लेकिन साधना मार्ग आपके लिए अनभ्यस्त है, अपरिचित है। तो अपरिचित मार्ग में जाना है, तब गुरु के वचन पर श्रद्धा रखनी है। मैं मेरे गांव को प्राप्त कर लूँगा, कैसे? उस आदमी ने कहा है, वैसे मैं जाऊँगा तो। उसके वचन पर मैं श्रद्धा रखूँगा। सद्गुरु के वचनों पर श्रद्धा करनी है। बुद्धि से क्या मिलेगा? बुद्धि से कुछ मिलने वाला नहीं है। संपत्ति बुद्धि से मिल सकती है, लेकिन परमात्मा, परमात्मा का मार्ग बुद्धि से नहीं मिलता।

तो मैंने कहा उस आदमी से कि सद्गुरु के प्रेम का झरना सतत बह रहा है, उस झरने में बहो। इस चातुर्मास में क्या करना है? चिंतामणि दादा के और गोड़ी पार्श्वनाथ दादा के प्रेम के झरने में बहे या नहीं बहे? बोलो तो?

अब मैं कृपा शब्द का उपयोग ज्यादा नहीं करता, प्रेम शब्द का उपयोग करता हूँ। कृपा तो कब होती है? हम जब दीन-हीन हैं, तब प्रभु कृपा बरसाते हैं। लेकिन जब हम प्रभु के प्रीति-पात्र हैं, हम प्रभु के beloved वंश हैं, तब प्रभु प्रेम देंगे, कृपा नहीं। तो हम प्रभु के प्रेम के अधिकारी हैं।

उपाध्याय यशोविजय महाराजने स्तवना में कहा—

अब तो अधिकारी होई बैठे, प्रभु गुण अक्षय खजाना

अब तो प्रभुका जो खजाना है, वो मेरा है। और प्रभु से अधिकार से कहूँगा कि तुजे देना पड़ेगा। ‘तू कृपा करके दे’, यह बात मुजे मंजूर नहीं है। तुजे देना पड़ेगा। क्यों नहीं देगा? If I am your beloved one, you have to give it.  मैं तेरा प्रीति-पात्र हूँ, तो मुजे देना ही पड़ेगा।

तो जापान का सम्राट कहता है, “गुरुदेव, मैं तो निपट अज्ञानी हूँ। मुजे कैसे मालूम पड़े कि मैं भीतर से झुका या बाहर से झुका?” अब गुरु तो फेस रीडिंग के मास्टर हैं। गुरुदेव को मालूम है कि वह कैसे झुका है, लेकिन सद्गुरु क्या करते हैं? ऐसे Practical Example से लोगों को उपदेश देते हैं। सैकड़ों लोग वहाँ मौजूद थे। सब लोग चौकन्ने होकर सुन रहे हैं कि गुरुदेव क्या कह रहे हैं।

और तब गुरु ने कहा कि, “मैं तेरी परीक्षा करूँगा। और परीक्षा में तु उत्तीर्ण होगा, तभी मैं निश्चित करूँगा कि तु बाहर से झुका या भीतर से झुका।”

सम्राट ने कहा, “फरमाइए, गुरुदेव।”

तो गुरुदेव ने कहा, “तुजे यहाँ से तेरे राजमहल तक जाना है, और लौटकर मेरे पास आना है। लेकिन कैसे जाने का है? तेरे जूते को हाथ में लेने का है, और जूते से इस ललाट को, कपाल को कूटने का है। पैदल चलने का है।”

जापान देश का सम्राट, जो सोने के रथ में घूमता है, जो महल में जाता है, जूते पहनकर, फिर भी Red Carpet पर चलता है, जमीन पर जो पैर नहीं रखता, उस सम्राट को गुरुदेव कहते हैं— “तुजे जूते को हाथ में लेकर, जूते से ललाट को कूटते-कूटते चलना है।” तहत्ति गुरुदेव! और सम्राट ने दोनों जूते हाथ में ले लिए। और जूते थे कैसे? हीरा-मोती से जड़े हुए। अब हीरा और मोती से जड़ा हुआ जूता कपाल में लगेगा तो क्या होगा? हीरा और मोती कपाल को चुभेगा, चमड़ी को चुभेगा। एक किलोमीटर सम्राट चला, तब तो ललाट से लहू झरने लगा।

मंत्रियों को ख्याल आया कि सम्राट अकेले पैदल चल रहे हैं, जूते भी हाथ में रखकर। सम्राट के सोने के रथ को लेकर मंत्रीगण आए, विनंती की, “महाराज, रथ में बैठ जाओ, आपको कहाँ जाना है?” लेकिन सुने कौन? गुरु की आज्ञा का पालन करना है। राजा ने इशारे से मना कर दिया, और चलना चालू रखा। अब छोटे बच्चे सम्राट को देखते थे और चिल्लाते थे, “सम्राट पागल हो गया, सम्राट पागल हो गया।”

छह-सात किलोमीटर का अंतर काटकर सम्राट गुरुदेव के पास आया। ललाट से लहू झर रहा है, लेकिन मुख पर स्मित है। गुरुदेव के चरणों में सम्राट झुका और कहा, “गुरुदेव, आपने तो बहुत बड़ा उपकार किया मेरे पर। अभी तक मैं मानता था कि मैं गुरु के चरणों पर भीतर से झुकता हूँ। आज मालूम हुआ कि मैं बाहर से ही झुकता हूँ, भीतर से नहीं झुकता। आपकी आज्ञा को मैं हृदय से शिरोधार्य कर सकूँ, तो ही मैं भीतर से झुका हुआ हूँ, ऐसा कह सकूँ। लेकिन थोड़े बच्चे चिल्लाते थे कि राजा पागल हो गया। तब ये सुनकर मेरे मन में आपके लिए ये भाव आया था कि आपने ऐसी आज्ञा क्यों प्रदान की? तो आपके पर ऐसा भाव आ गया, तो मैं मानता हूँ कि अभी तक मैं भीतर से नहीं झुका हूँ, बाहर से ही झुका हूँ। गुरुदेव, कृपा करो और मुजे भीतर से झुकाओ।”

तुम कैसे झुके हो? बोलो तो? तुम कैसे झुके हो? भीतर से या बाहर से? सुलसाजी कैसे झुकी थीं? भीतर से झुकी थीं। पूरा मन, पूरा व्यक्तित्व, पूरा अस्तित्व प्रभुमय हो गया था।

तो कल की बात का अनुसंधान करें तो, प्रभु वीतराग भी हैं, भक्तवत्सल भी हैं। और इसीलिए ये बात समझनी थोड़ी टफ (Tough) है। इसलिए आनंदघन जी भगवंत ने कहा—

गुरु गम लेजो रे जोड

ये बात तुम्हारी समझ में न आए कि प्रभु वीतराग भी हैं और प्रेम भी बरसाते हैं, ये बात तुम्हारी समझ में न उतरे, तो सद्गुरु के चरणों पर बैठ जाना। सद्गुरु तुम्हें समझाएंगे कि प्रभु वीतराग भी हैं और प्रेम को बरसाते भी हैं। राग अलग संघटना है, प्रेम अलग संघटना है। जब प्रभु तेरहवें गुणठाणे पर जाते हैं, और फिर सिद्ध शिला पर जाते हैं, तब विभाव समस्त खर (झड़/नष्ट) जाते हैं। संपूर्ण विभावों का क्षय होता है। लेकिन स्वभाव दशा से प्रभु पूर्णतया भरे होते हैं। विभाव गया और स्वभाव आया, तो राग विभाव है, प्रेम स्वभाव है। राग को जाना ही पड़ेगा, क्योंकि राग विभाव है।

आप राग करते हैं? राग की पीड़ा का अनुभव हुआ? मैं बहुत बार मेरे प्रवचन में कहता हूँ कि आपको क्षमा का अनुभव तो शायद नहीं हुआ, लेकिन क्रोध का अनुभव भी नहीं हुआ है। बोलो, क्रोध का अनुभव हुआ है? मैं कहता हूँ नहीं हुआ है। क्रोध का अनुभव आपको नहीं है। क्रोध करते हो, रोज़ करते हो, दिन में दस-बीस बार करते हो, लेकिन क्रोध का अनुभव आपके पास नहीं है। और हम बिल्कुल क्रोध नहीं करते, फिर भी क्रोध का अनुभव हमारे पास है कि क्रोध से कितनी पीड़ा होती है।

एक आदमी रातको प्रतिक्रमण करके घर पर जाता है। सोसाइटी है। सोसाइटी में वह रहता है। बड़ा Campus है। रातको जब वह चलता है, इलेक्ट्रिसिटी फेल हो गई, अंधेरा है, सोसाइटी के प्रांगण में ब्लॉक्स, पेवर ब्लॉक्स जड़े हुए हैं। एक ब्लॉक सहज ऊँचा हुआ था। वहाँ उसका पैर लग गया, तो पैर से लहू निकलने लगा। ठीक है, ड्रेसिंग कर लिया। अब दूसरे दिन, अंधेरा ही है, उसका पैर वहाँ लगेगा? आप ही शायद समझो। आपका पैर वहाँ लगेगा, अंधेरा है, फिर भी? क्यों? आपको अनुभव हुआ कि ये ब्लॉक उखड़ गया है, और वहाँ जो मेरा पैर लगेगा, तो मेरे पैर को चुभन होगी। आप समझ गए? तो ये अनुभव हुआ। तो आप फिर से वहाँ नहीं जाएंगे।

तो क्रोध का अनुभव हुआ है, और क्रोध की पीड़ा का अनुभव किया है, तो दोबारा आप क्रोध नहीं कर सकते। एक बार क्रोध कर लिया, जिंदगी में। जिंदगी में एक बार क्रोध कर लिया, दोबारा क्रोध आप नहीं कर सकेंगे। और बार बार आप क्रोध करते हैं, तो मानना पड़ेगा कि क्रोध का अनुभव आपके पास नहीं है। हम क्या करते हैं, मालूम है? आपके जीवन की बात करूँ। किसी ने कुछ कहा, आपको गुस्सा आया। उस समय आप क्या मानेंगे? आपका तो कोई अपराध है ही नहीं। अपराध किसका? सामने वाले का। उसने कुछ कहा। तुम तो निरंजन, निराकार, वीतराग हो! तुम में कोई दोष हो सकता है? दोष सब उसका है।

अब एक मैं Example आपको दूँ। एक आदमी पेट्रोल पंप पर गया था। उसका मित्र था पेट्रोल पंप का मालिक। तो पेट्रोल पंप पर गया था। वहाँ लिखा था, “नो स्मोकिंग, प्लीज।” धूम्रपान नहीं करने का। फिर भी सिगरेट पीने की बहुत इच्छा हो गई। दियासली जलाई, सिगरेट जलाई, और सिगरेट पीने लगा। वहाँ तक तो ठीक था। लेकिन जलती हुई दियासली को उसने ऐसे ही फेंक दिया। और पेट्रोल पंप, और सुलगती दियासली उसमें पड़ी। क्या होगा? आग… भड़का…। अब आग क्यों लगी? उसने सुलगती हुई दियासली फेंक दी, इसलिए? आप ऐसा मानेंगे?

अब चलो, वही आदमी आगे गया। पानी से भरा हुआ एक हौज है, कुंड है। उसके किनारे पर वह बैठा। और दियासली सुलगाई। सुलगती दियासली कुंड में डाली। पानी से भरे हुए कुंड में डाली। क्या होगा? दूसरी दियासली डाली। तीसरी, चौथी, क्या होगा? कुछ नहीं होगा। तो आप दियासली को देखते हो, सामने वाले की दियासली को आप देखते हो, अपने पेट्रोल पंप को आप नहीं देखते। समझ गए? उसने कुछ कहा, आप आग बबूला हो गए, लेकिन क्यों हुए? सिर्फ उसके वचन से नहीं। उसने दियासली सुलगाई, ठीक बात है। सुलगती दियासली फेंकी, ठीक बात है। लेकिन आपका पेट्रोल पंप नहीं है, और आपका पानी से भरा हुआ कुंड है, तो क्या होगा?

तो अब आप क्या करोगे? अब? दियासली वालों को रोकेंगे, या पेट्रोल पंप को हौज में परावर्तित करोगे? क्या करोगे आप? हमारी शास्त्रीय भाषा में इसको निमित्त और उपादान कहते हैं। निमित्त की कोई ताकत नहीं। अशुभ निमित्त की कोई ताकत नहीं होती। हमारा उपादान, हमारे हृदय की निर्मलता जो है, वो हमारे पास नहीं है। इसलिए हम संकट में पड़ जाते हैं। तो उपादान को शुद्ध करना है, हृदय को निर्मल बनाना है।

तो अब मूल बात पर आएँ। प्रभु वीतराग भी हैं, भक्तवत्सल भी हैं।

 गुरु गम लेजो रे जोड

 गुरु के चरणों में बैठ गए, तब गुरु ने समझाया कि प्रभु जब वीतराग होंगे, प्रभु जब सिद्ध शिला पर जाएंगे, तब विभाव सब छूट जाएंगे, लेकिन प्रभु स्वभाव दशा से परिपूर्ण होंगे। तो राग विभाव है, वह छूट जाएगा। और प्रेम स्वभाव है, वह रह जाएगा। तो प्रभु का प्रेम सतत बरस रहा है। सुलसाजी ने इस प्रेम का अनुभव किया। सिंह अणगार ने भी प्रभु के इस प्रेम का अनुभव किया। जिन्होंने अनुभव किया, उनकी बातें मैं आज क्यों कर रहा हूँ? कि अपन को भी प्रभु के प्रेम का अनुभव करना है। चिंतामणि दादा बैठे हैं, गोड़ीजी दादा बैठे हैं, सतत प्रेम को बरसा रहे हैं। हमारा मन थोड़ा निर्मल हो जाए, हमारी आँखें भीगी हो जाएँ, बस प्रभु की इस प्रेम की वर्षा को हम स्वीकारने लगेंगे।

अब एक बात थोड़ी आगे। प्रभु भक्तवत्सल हैं, लेकिन अभक्तवत्सल भी हैं। भक्तों पर तो प्रभु प्रेम बरसाते ही हैं। अभक्त हैं, उन पर भी प्रभु का प्रेम बरसता है। हम नरक और निगोद में थे, हम भक्त कहाँ थे? भक्ति क्या चीज है, वो तो हम जानते नहीं थे। हम अभक्त थे, तब भी प्रभु की कृपा, प्रभु का प्रेम हम पर बरसा। इसीलिए कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य ने वीतराग स्तोत्र में लिखा—

त्वं अकारणवत्सलः

प्रभु, दुनिया में कुछ कार्य होगा, कुछ कारण होगा, तो प्रेम बरसाने वाले लोग मिलेंगे। लेकिन तु ऐसा प्रेम बरसाने वाला है, जहाँ कोई कारण की आवश्यकता नहीं। प्रेम को बरसाना तेरा स्वभाव है। बारिश है, वो बरसती है। बादल का स्वभाव क्या है? पानी को बरसाना। फिर दरिया पर भी पानी बरसेगा। आवश्यकता नहीं है, तो वहाँ भी बरसेगा। अरे, तो बरसेगा। मीठा पानी खारा हो जाएगा। हो जाएगा तो हो जाएगा, मुजे तो बरसना ही है। तो प्रभु का स्वभाव है बरसना, प्रेम को बरसाना। तो हम जब अभक्त थे, तब भी प्रभु का प्रेम बरस रहा था। और आज हम भक्त बने हैं, तो भी प्रभु का प्रेम हम पर बरस रहा है।

अब एक नया Chapter मैं शुरू कर रहा हूँ, कि हम भक्त कैसे बनें? भक्त बनना है? दो शब्द हमारी परंपरा में हैं, साधक और भक्त। साधक का Composition ये है कि  99% Grace, 1% Effort.  साधक ये होता है, जो मानता है कि ९९% प्रभु का प्रेम, सद्गुरु का प्रेम बरस रहा है, और उससे ही साधना आगे बढ़ती है। लेकिन १% मैं प्रयत्न करूँ। साधक १% एफर्ट वाला है। ‘मैं पूजा करूँ, मैं भक्ति करूँ, मैं ऐसा करूँ, मैं ऐसा करूँ।’

लेकिन जो भक्त है, उसकी भक्ति का कंपोज़िशन क्या है? 100% Grace and we are effortless persons. १००% ग्रेस। १००% प्रेम, कृपा। and we are effortless persons. हमें कुछ भी करना नहीं है। क्योंकि भक्त समर्पित हो गया। और समर्पित हो गया, तो भक्त को कुछ भी करना नहीं है। We have not to do anything absolutely.

और इसलिए मैं भक्त को, भक्त की जर्नी को बैकसीट जर्नी  कहता हूँ। एक ऑफिसर  ऑफिस  से निकला, ऑफिस से ही फोन कर दिया ड्राइवर से, कि जाना है, Car तैयार रखो। शॉफर कार मे AC कर देता है, बिल्कुल तैयार मोड में रखता है। साहब आते हैं, पिछला द्वार खोल देता है ड्राइवर। ऑफिसर विराजमान हो जाते हैं, और अपना काम शुरू कर देते हैं, और कहते हैं, “यहाँ जाना है।” फिर ऑफिसर को कुछ करना नहीं है। शॉफर को ही सब कुछ करना है। शॉफर गाड़ी को वहाँ ले जाकर रुक जाए। ऐसी ही आपकी बैकसीट जर्नी। गुरु आपके शॉफर हैं। प्रभु का दिया हुआ Six Lane, Eight Lane रोड है। प्रभु ने दी हुई इम्पोर्टेड कार  है। सद्गुरु शॉफर हैं, और आपको बैकसीट जर्नी करनी है। सद्गुरु ही शॉफर हो जाएं, कैसी मजा?

यूरोप  में अभी-अभी एक घटना हुई। एक प्रोफेसर थे, उनको योग में गहरी रुचि थी। योग में भी, क्रिया योग में। योग के बहुत प्रकार हैं। और विशुद्धानंद जी ने जो दिया है, वो क्रिया योग है। तो क्रिया योग में प्रोफेसर का गहरा रस था। एक दिन प्रोफेसर इंटरनेट पर सर्फिंग  कर रहे थे, तब एक नाम आया, कि क्रिया योग के मास्टर्स कौन-कौन हैं। एक मास्टर का नाम आया। बांग्लादेश की पाट नगरी ढाका। ढाका से १५० किलोमीटर दूर, जंगल में एक गाँव है, और वहाँ से थोड़ी दूर, जंगल में एक आश्रम है। आश्रम में ये मास्टर गुरु रहते हैं, और वे क्रिया योग में बहुत मास्टरी धराते हैं। तो प्रोफेसर को हुआ, कि मैं वहाँ चला जाऊँ।

यूनिवर्सिटी  में एक महीने की छुट्टी बुक  करके वो प्लेन में बैठ गया। ढाका एयरपोर्ट  पर उतरा। उस गाँव का नाम लिख लिया था। टैक्सी स्टैंड पर जाकर, वो चिट्ठी दिखाता है, कि इस गाँव जाना है। सब ड्राइवर कहते हैं, We don’t know, we don’t know.  सब हाईवे पर चलने वाले थे ड्राइवर। और ये तो इंटीरियर प्रदेश में आया हुआ गाँव था। अब प्रोफेसर विचार में पड़ गए, क्या करना? किसी ड्राइवर को मालूम नहीं है। वहाँ एक गाड़ी खिसक कर आई। और शॉफर ने पूछा, “आपको इस गाँव के पास आए हुए आश्रम में जाना है, क्रिया योग के मास्टर के पास?” प्रोफेसर ने कहा, “हाँ हाँ, वहाँ जाना है।” “तो बैठ जाओ मेरी कार में।” टैक्सी में बिठा लिया।

१० किलोमीटर तक तो हाईवे पर गाड़ी चली। फिर इंटीरियर रोड आया, बहुत ही उबड़-खाबड़ रोड। और जब वो गाँव आया, गाँव के बाद तो कोई रास्ता ही नहीं था। रेत ही रेत। लेकिन ड्राइवर कुशल था, रेत में भी गाड़ी को चला दी, और आश्रम में पहुँच गया। आश्रम में पहुँचने के बाद ड्राइवर ने कहा, “मैं अभी यहाँ ही हूँ, पैसे देने की कोई उतावल (जल्दबाजी) नहीं है, आप आराम से नाश्ता करो, रूम लो, बाथरूम लो।” प्रोफेसर ने रूम लिया, स्नान किया, नाश्ता किया। फिर पूछा, कि गुरु से Appointment कब मिलेगी? तो कहा, “दोपहर ४ बजे मिलेगी।”

दोपहर ४ बजे प्रोफेसर गुरु के चेंबर में गए। तो गुरु के रूप में कौन बैठे थे? वो ड्राइवर! जो उनकी गाड़ी को ड्राइव करके लाए थे, वही गुरु थे। प्रोफेसर आश्चर्य में पड़ गए, “आप? आप तो गुरु हो।”

तब गुरु ने हँसते- उससे कहा, कि “तुम्हारी जीवन की गाड़ी को ठिकाने लाने का काम मेरा है, तो तुम्हारी बाहर की गाड़ी को भी ठिकाने लाने का काम मेरा ही है।” एक महीना प्रोफेसर वहाँ रुके, क्रिया योग में पारंगत हो गए। और गुरु स्वयं उसको छोड़ने के लिए ढाका एयरपोर्ट तक आए। तो गुरु ही शॉफर हैं। कितना मजा, आपको बोलो तो? आपको कुछ भी नहीं करना है, सब कुछ हम कर देंगे।

आपका मुँह हँसता होना चाहिए बस,। हँसते रहो बस। और समयसर आते रहो। और आपको आना हो, आपके शरीर को भेंज नहीं देना, कि ‘मन को मार्केट में रखूँ, और शरीर को व्याख्यान में भेज दूँ’, ऐसा मत करना। आप स्वयं आना। नहीं तो लोग तो शरीर को भेज देते हैं।

फिर कोई पूछेगा व्याख्यान के बाद, “आज प्रवचन में क्या आया था?”

“अरे, बहुत सुंदर बातें थीं।”

“अरे, ये तो सुंदर बातें ही होती हैं, महाराज साहिब कहते हैं वो। लेकिन क्या था?”

“अरे, कुछ-कुछ अच्छा था।”

लेकिन क्या अच्छा था? रिसेप्शन में भोजन करके आए हो, घर पर आए, और किसी ने पूछा, “क्या था भोजन में?” आप क्या कहेंगे? “कुछ अच्छा-अच्छा था।” लेकिन क्या था, वो तो याद नहीं, ऐसा कहेंगे? वहाँ याद रहता है, और यहाँ याद नहीं रहता। क्यों?

मेरा एक सूत्र है—

There should be the totality. There should be the totality.

आप एक घंटे के लिए आओ, मैं तो ४५ मिनट के प्रवचन का ही हिमायती हूँ। ४५ मिनट्स तो बहुत हो गया। लेकिन, There should be the totality. There should be the totality.

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