Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 28-07-2026 | Pune Chaturmas

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प्रभु ही साधना का आनंद देते हैं

हमारी साधना का एक केंद्र बिंदु है कि साधना का पूरा का पूरा कर्तृत्व प्रभु का है, सद्गुरु का है, हमारा नहीं है। फिर साधना आपकी भले ही छोटी सी हो, उसका आनंद गहरा होगा। साधना भी प्रभु ने दी, साधना का आनंद भी प्रभु ने दिया, सब कुछ प्रभु का!

जब आप प्रभु की आज्ञा के अनुसार ईर्यासमिति पूर्वक चलने की साधना करते हो, तो उसका आनंद आपको मिलता ही है। ईर्यासमिति की एक शर्त है कि चलते समय तुम न कोई माला गिन सकते हो, न कोई गाथाओं को रट सकते हो; मन में शुभ विचार भी नहीं कर सकते। केवल एकाग्र होकर रस्ते को देख सकते हो।

जब आप ईर्यासमिति पूर्वक चलते हैं तो एक तो प्रभु की आज्ञा का पालन होता है। दूसरा, दृष्टिसंयम मिलता है। आँखों को कहाँ Focus रखनी है, उसका नियंत्रण आपके हाथ में आ जाता है। और तीसरी बात यह होती है कि आप निर्विकल्प हो जाते हो।


प्रभु के प्रेम से जब हृदय भर जाता है, तब आनंद ही आनंद होता है। अजित-शांति स्तोत्र के अंत में महामुनि नंदिषेण ने प्रभु के चरणों में प्रार्थना की — “मम य दिसऊ संजमे नंदिं” प्रभु ये रत्नत्रयी तूने दी; अब रत्नत्रयी के पालन का जो आनंद होता है, वो भी तुझे ही देना है। मैं कहाँ से लाऊँगा? आराधना तूने दी है, आराधना का आनंद भी तुझे ही देना है।” एक प्रार्थना आपके भीतर से प्रकट हो।

अब देखो प्रभु का प्रेम कितना बरसता है! एक घटना मुझे याद आती है। शाहपुर में ‘भुवनभानु मानस मंदिरम’ तीर्थ में उपधान तप होने वाला था। प्रवेश के अगले दिन मुंबई से एक साधक आए हुए थे। मेरे पास वे बैठे थे। उन्होंने मुझे पूछा कि, “गुरुदेव! मेरी स्वाध्याय की धारा है। घंटों तक मैं स्वाध्याय कर सकता हूँ, अनुप्रेक्षा भी कर सकता हूँ। लेकिन क्रिया की धारा मेरी नहीं है। उपधान तप में तो क्रिया ही क्रिया होती है। तो मेरे लिए उपधान तप कैसा रहेगा?”

मैंने कहा, “प्रभु तुम्हें मुंबई से यहाँ लेकर आए हैं। अब प्रभु ही आगे ले जाएंगे। प्रभु पर छोड़ दो। अपने पर तुम क्यों भार रखते हो? मुंबई से उपधान तप करने के लिए तुम आए हो। लेकिन उपधान तप शाहपुर में करना, ऐसा भाव तो प्रभु ने दिया है।” आज आप प्रवचन में आ गए हैं, लेकिन प्रवचन में आने का भाव भी आपको प्रभु ने दिया है। एक भी क्रिया हमारे पास ऐसी नहीं है जो हम हमारे विचार से करें। प्रभु भाव देते हैं, प्रभु विचार देते हैं और प्रभु ही क्रिया करवाते हैं।

ललित विस्तरा की पंजिका में लिखा हुआ है—

“एकोऽपि शुभो भावः भगवत् प्रसादादेव लभ्यते।“ (‘भगवत्प्रसादलभ्यत्वात् कुशलाशयस्य’)

एक भी शुभ विचार प्रभु के प्रसाद से मिलता है, ऐसा नहीं लिखा, ‘प्रभु के प्रसाद से ‘ही’ मिलता है।’ प्रभु की कृपा से ‘ही’ मिलता है। तुम कहोगे, “ये विचार अच्छा मुझे आया!” विचार पर, अच्छे विचार पर कभी भी तुम्हारी मालकियत (अधिकार) नहीं होती। ये विचार प्रभु ने आपको दिए हुए हैं।

तो मैंने उस साधक से कहा कि, “प्रभु ने तुम्हें भाव दिए कि जाओ शाहपुर और उपधान कर लो। अब प्रभु ने भाव दिया है तो उपधान तप तो प्रभु ही कराएंगे। तुम्हें कहाँ करना है?” दूसरे दिन उन्होंने उपधान तप में प्रवेश भी कर लिया। एक सप्ताह बाद एक दोपहर मेरे पास वे आए। चरवले से ज़मीन को पूँजा, कटासना बिछाया, विधिपूर्वक वंदन किया। मेरे पास बैठे, आँख में आँसू थे। मैं समझ गया कि आराधना के आनंद के आँसू थे, हर्षाश्रु… तो मैंने पूछा, “क्या हुआ?”

तब उन्होंने जो बात की, आपको भी लगेगा कि प्रभु कैसे बरसते हैं! प्रभु कितना आनंद देते हैं! आराधना आपकी छोटी होगी, साधना आपकी छोटी होगी, लेकिन इसका आनंद गहरा होगा। आराधना भी प्रभु ने दी, आराधना का आनंद भी प्रभु ने दिया, सब कुछ प्रभु का! तो मैंने पूछा, “क्या हुआ?” तो उन्होंने कहा कि, “गुरुदेव! अभी तो ऐसे हालात हो गए हैं कि मेरी धर्मशाला के रूम से तलहटी के मंदिर तक जाने में मुझे २०-२५ मिनट लग जाते हैं।” मैंने कहा, “वो तो रास्ता १० मिनट का है। २०-२५ मिनट कैसे लगते हैं आपको?”

तब उन्होंने कहा कि, “गुरुदेव, आपने प्रवचन में ईर्यासमिति की बात की कि नीचे देखकर चलना। आप ईर्यासमिति पूर्वक चलते हैं तो क्या होता है मालूम है? एक तो प्रभु की आज्ञा का पालन होता है। दूसरा, दृष्टि संयम होता है। आँखों को कहाँ फोकस (Focus) करनी, उसका नियंत्रण हमारे हाथ में आता है। अभी हमारे हाथ में हमारी आँखों का नियंत्रण नहीं है। लेकिन ईर्यासमिति का अभ्यास तुम्हें हो जाएगा, तो दृष्टि संयम तुम्हें मिलेगा। आँखों पर नियंत्रण तुम्हारा प्रस्थापित होगा। और तीसरी बात होती है, तुम निर्विकल्प हो जाते हो।”

आप शत्रुंजय गिरिराज की ९९ यात्राएं करते हैं। गिरिराज पर चढ़ते हैं, दादा की भक्ति करके नीचे उतरते भी हैं, लेकिन चढ़ना या उतरना ईर्यासमिति पूर्वक होना चाहिए। और ईर्यासमिति की एक शर्त है कि चलते समय तुम ना कोई माला गिन सकते हो, ना कोई गाथाओं को रट सकते हो। शुभ विचार भी तुम्हारे मन में तुम नहीं कर सकते। पंचविध स्वाध्याय पर प्रतिबंध लगा दिया है! तो चिंतन, शुभ विचार करना, वो भी स्वाध्याय है। तो चलते समय, ईर्यासमिति पूर्वक चलते समय, तुम ना तो स्वाध्याय कर सकते हो, ना माला गिन सकते हो, ना शुभ विचार कर सकते हो। तो क्या करने का? एकाग्र होकर सिर्फ रास्ते को देखने का!

मैं मुंबई ग्वालिया टैंक में था, चातुर्मास। वहाँ सुबह चतुर्विध संघ की वाचना होती थी। एक दिन वाचना में मैंने ईर्यासमिति की बात करी कि “ईर्यासमिति तुम्हारी अभ्यस्त हो जाएगी तो निर्विकल्प दशा तुम्हें मिल जाएगी।” एक साधक एक सप्ताह बाद मेरे पास आया। उन्होंने कहा, “गुरुदेव! मैं साधक हूँ और मुझे ख़याल है कि ध्यान में मुझे जाना है, कायोत्सर्ग में मुझे जाना है, तो पहले निर्विकल्प, निर्विचार होना ही पड़ेगा। लेकिन मैं निर्विचार नहीं हो सकता। कितने भी उपाय करूँ, विचार घुस जाते थे मन में। लेकिन आपने ईर्यासमिति की बात की। ऑफिस (Office) तो मेरी दूर है, ऑफिस तो मैं कार में ही जाता हूँ। लेकिन मैंने निश्चित किया कि सुबह वाचना सुनने के लिए आऊँ, तो चलता ही हूँ। मैं फुटपाथ पर चलता हूँ, ईर्यासमिति पूर्वक, नीची दृष्टि रखकर… और आश्चर्य! निर्विकल्प दशा मुझे मिल गई! जिस निर्विकल्प दशा की प्रतीक्षा मैं वर्षों से कर रहा था, एक सप्ताह में आपने मुझे दी।” मैंने कहा, “मैंने नहीं दी, प्रभु ने दी। मैं तो हूँ ही नहीं। यशोविजय नाम की घटना तो है ही नहीं। यशोविजय क्या करेगा? सब प्रभु को ही करना है।”

तो उस साधक ने कहा कि, “गुरुदेव! मैं मेरी धर्मशाला के रूम से तलहटी के मंदिर की ओर निकलता हूँ। १५-२० डग (कदम) मैं चलता हूँ, आँखें आँसू से भर जाती हैं कि ‘मेरे प्रभु ने कैसी-कैसी समितियां बताई हैं! ईर्यासमिति कितनी सुंदर है! एक भी जीव की विराधना ना हो, और दृष्टि संयम मिल जाए, निर्विचारता मिल जाए! समिति एक का पालन और लाभ कितने!’ गुरुदेव! प्रभु पर इतना अहोभाव भीतर छलकता है कि वो अहोभाव आँखों में आँसू होकर झलकते हैं। अब आँख में आँसू आ गए तो रास्ता दिखता नहीं है। अब चला नहीं जाता। मैं खड़ा रहता हूँ, नैपकिन से आँखें पोंछता हूँ, और आँख ठीक होने पर मैं चलता हूँ। फिर १०-२० डग चलता हूँ, और आँखें आँसू से भर जाती हैं। फिर खड़ा रहता हूँ, फिर नैपकिन से आँख पोंछता हूँ और फिर मैं चलता हूँ।”

उस साधक ने कहा, “गुरुदेव! आपने कहा था कि ‘प्रभु ने तुम्हें भाव दिए हैं उपधान करने के, प्रभु तुम्हें मुंबई से शाहपुर तक लाए हैं, तो प्रभु ही उपधान करवाएंगे।’ आज मेरा अनुभव यही है कि प्रभु ही सब कुछ करा रहे हैं।” हमारी साधना का एक केंद्र बिंदु… और केंद्र बिंदु यह है कि साधना का पूरा का पूरा कर्तृत्व प्रभु का है, सद्गुरु का है, हमारा नहीं।

अरणिक मुनि की बात आपने सुनी होगी। अरणिक मुनि दीक्षित हुए थे। एक दिन उन्हाले (गर्मियों) में दोपहर को गोचरी के लिए गए। सुकोमल शरीर था। इतनी धूप, कड़ी गर्मी, चल नहीं सकते थे। एक घर पर गए। घर था वेश्या का। वेश्या ने कहा, “तो तुम्हारा इतना सुंदर शरीर, सुकोमल शरीर और क्यों तुम कष्ट-क्रिया भोग रहे हो? आनंद करो।” और भोगावली कर्म शेष थे, तो वे वहाँ रह गए। फिर साध्वी माँ के वचनों से प्रतिबोध पाकर गुरुदेव के चरणों में गए।

अब एक बात मैं आपसे कहूँ। ये तो बात हुई बाहर की, भीतर का राज़ क्या है? अरणिक मुनि दीक्षित हुए, तपस्वी थे, स्वाध्यायशील थे, जपवान थे। लेकिन उनके मन में एक बात थी कि “साधना मैं करता हूँ!” तो गुरुदेव से कहते, “गुरुदेव, आज अठ्ठम का पच्चक्खाण दे दो। अठ्ठम करना है आज।” समझो कि आप पौषध में अकेले हो। राई मुँहपत्ती आपने की। फिर आप पच्चक्खाण का आदेश कैसे मांगेंगे? “इच्छकारी भगवन्! पसाय करी पच्चक्खाण का देशो जी?” आपने घर से निश्चित किया, ‘आज आयंबिल करना है।’ लेकिन आप कहेंगे नहीं ‘आयंबिल का पच्चक्खाण’। आदेश क्यों कहेंगे? पच्चक्खाण साधना है, और साधना आपकी, आप निश्चित नहीं कर सकते। गुरु ही निश्चित करते हैं। इसीलिए आप कहेंगे “पच्चक्खाण का आदेश दो।” गुरु जो भी पच्चक्खाण दें। तो आपको पच्चक्खाण निश्चित नहीं करने का होता है।

लेकिन अरणिक मुनि कहते थे, “गुरुदेव, अठ्ठम का पच्चक्खाण दे दो। आज छठ का पच्चक्खाण दे दो। आज उपवास का पच्चक्खाण दे दो।” तो हुआ क्या? गलती क्या हुई? और मुनि मार्ग से च्युत हो गए, लेकिन क्यों हुए? गलती क्या हुई? गलती ये हुई कि साधना-मार्ग के कर्ता गुरु थे और वे खुद साक्षी थे। जो साक्षी थे, वे कर्ता बन गए। और जो कर्ता थे, उन्हें साक्षी बना दिया। ये बड़ी गलती हो गई!तो आज निश्चित समझना कि साधना-मार्ग में कर्तृत्व सिर्फ प्रभु का ही है और सद्गुरु का ही है। तुम्हारा नहीं।

वेश्या के घर से निकले अरणिक मुनि और गुरुदेव के चरणों में आ गए। दीक्षा के बाद भी रोज़ गुरुदेव के चरणों में पड़ते थे, रोज़ वंदन करते थे, रोज़ चरण स्पर्श करते थे, चरण को सिर लगाते थे, लेकिन गुरुदेव शक्तिपात नहीं कर सके। गुरुदेव शक्तिपात नहीं कर सके! अब वेश्या के घर से अरणिक मुनि आए, जो सेल्फ कॉन्फिडेंस (Self-confidence) था साधना का, वो निकल गया। कि “मैं साधना का कर्ता नहीं हूँ। मैं साधना कर ही नहीं सकता हूँ!” मेरा सेल्फ कॉन्फिडेंस जो था, आत्मविश्वास था कि ‘मैं साधना करता हूँ’, टूट गया। क्यों? कि अपने पर विश्वास रखा, वेश्या के घर पर पहुँच गया! गुरु पर विश्वास रखा होता तो वेश्या के घर पर नहीं जाने का होता। वेश्या भी कहती ‘मेरे घर पर ठहर जाओ’, कहते “गुरुदेव की आज्ञा हो ऐसा ही मैं कर सकता हूँ। गुरुदेव ही कर्ता हैं। मैं कर्ता नहीं हूँ।” लेकिन खुद कर्ता बन गए। आत्मविश्वास था, कि आत्मविश्वास के कारण वे गिर गए।

तो वेश्या के घर जाने का प्रसंग उनके लिए वरदान साबित हुआ कि आत्मविश्वास टूट गया। और गुरु के पास आए— “गुरुदेव! मैं भूल गया था। आपके चरणों को मैंने छोड़ दिया, मैं भटक गया था, गुरुदेव! इस भव वन में आपके चरण जो नहीं मिलेंगे, तो मैं फिर भी भटक जाऊँगा। अब आपके चरणों से मुझे कभी भी दूर नहीं रखना।” आँख में आँसू हैं, रो रहे हैं और कह रहे हैं, “गुरुदेव! इन चरणों से अब कभी भी दूर नहीं होना।” कल गुरु पूर्णिमा है। कल मैं शक्तिपात की बात करूँगा कि सद्गुरु तुम पर शक्तिपात कैसे करते हैं।

शक्तिपात को मैं लिफ्ट (Lift) समझता हूँ। मुंबई आप गए। ३५वें माले पर आपको जाना है एक फ्रेंड (Friend) के वहाँ। इलेक्ट्रिसिटी (Electricity) चालू है, आप लिफ्ट में बैठे, बटन दबाया, ३५वें माले पर पहुँच गए! लेकिन इलेक्ट्रिसिटी फेल (Fail) है, और सीढ़ियां चढ़नी पड़ेंगी तो? माले चढ़ते-च चढ़ते थक जाओगे। तो ये जो शक्तिपात है, वो लिफ्ट है। हम साधना को कैसे करेंगे? हमें विषय और कषाय का अभ्यास है। हमें अहंकार का अभ्यास है। हम साधना कैसे करेंगे? सद्गुरु की कृपा से, सद्गुरु के शक्तिपात से ही साधना होती है।

गुरुदेव ने अरणिक मुनि पर शक्तिपात किया। सिर पर हाथ रखा। हम वासक्षेप देते हैं ना, क्या करते हैं? शक्तिपात करते हैं। कल मैं बताऊँगा कि सद्गुरु तो शक्तिपात करने के लिए तैयार हैं, उसको झेलने के लिए आप तैयार नहीं हैं। और इसलिए सद्गुरु को डुअल एक्शन (Dual action) करना पड़ता है। पहले आपको तैयार करने पड़ते हैं शक्तिपात को स्वीकार करने के लिए, और फिर शक्तिपात करने का। शक्तिपात करने में तो एक सेकंड लगता है। लेकिन आप शक्तिपात को स्वीकार कर सको, ऐसी भूमिका निष्पन्न करने में बरसों नहीं, जन्मों लग जाते हैं! कितने जन्मों से सद्गुरु चेतना तुम पर काम कर रही है!

गुरुदेव ने शक्तिपात किया अरणिक मुनि पर। भीतर आमूलचूल परिवर्तन हो गया! राग और द्वेष छू हो गए। अहंकार बाज़ू में हट गया। बाहर भी कितना परिवर्तन आया! जो अरणिक मुनि गर्मी में चल नहीं सकते थे धूप में, वे शीला (चट्टान) पर संथारा करके बैठ गए! कैसी शीला? पत्थर की, जो दिन में गरम-गरम-गरम हो जाती है! आराम से सो गए! गुरु का शक्तिपात था! तो साधना का कर्तृत्व हमारा नहीं है, प्रभु का है, सद्गुरु का है। इसी कड़ी में आगे मज़े की बात करनी है।

प्रभु ने साधना दी और प्रभु ने साधना का आनंद भी दिया। प्रभु बरसते ही रहते हैं। अनगिनत जन्मों से हम प्यासे रहे। इस जन्म में ऐसी प्रभु की कृपा हो कि हमारा हृदय प्रभु के प्रसाद से, प्रभु के प्रेम से पूरा का पूरा भर जाए! और जिनका भी हृदय प्रभु के प्रेम से भर गया, वो एवर-फ्रेश (Ever-fresh), एवर-ग्रीन (Ever-green) होगा। उसकी साता पूछनी नहीं पड़ेगी। आपकी तो साता पूछनी पड़ती है! “साता में हैं ना?” सब बोलो तो सही! ‘देव-गुरु पसाय!’ ‘देव-गुरु पसाय? लक्ष्मीजी पसाये तो नहीं? लेकिन लक्ष्मीजी की कृपा भी देव-गुरु की कृपा से ही होती है। तो प्रभु की कृपा, प्रभु का प्रेम अनवरत हम पर बरस रहा है।

इस युग में इतनी दीक्षाएं होती हैं! आप पत्रिकाएं पढ़ते होंगे। ५०-५० दीक्षा, ७०-७० दीक्षा एक साथ! एक युग आया है दीक्षा का। एमबीए (MBA) बना हुआ युवक, एमबीए पढ़ी हुई युवती प्रभु के मार्ग पर चलती है। हमारी आँखें भी नम हो जाएं कि क्या प्रभु की कृपा! जिसकी सैलरी सालाना ५० लाख या करोड़ होती है, वे भी उस सर्विस को छोड़कर प्रभु के मार्ग पर दौड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। और मेरी बात कहूँ तो जब भी कोई युवा-युवती को दीक्षित होते हुए देखता हूँ या कोई बाल मुनि को या बाल साध्वी को देखता हूँ, मेरी आँखें आँसू से भर आती हैं कि “कैसे प्रभु की कृपा बरसी!”

१०० साल पहले की एक घटना है। आठ साल का एक बच्चा। जन्मांतरीय वैराग्य की धारा इसके पास थी। एक बात समझना, इस जन्म में आप जो भी साधना करेंगे, वो अगले जन्म में आपके साथ आएगी। और ऐसा भी हो सकता है कि बचपन में ही कोई निमित्त मिल जाए और अगले जन्म की साधना याद आ जाए, तो आपकी साधना फिर से आगे और आगे बढ़ जाती है। जन्मांतरीय साधना कैसे आगे बढ़ती है? समझो कि रात को आप लेटर (Letter) लिखने के लिए बैठे। चार पंक्तियां लिखी गईं और इलेक्ट्रिसिटी फेल हो गई। आपने सोचा, ‘कल सुबह आगे लिखेंगे, क्योंकि कूरियर तो कल ही करना है।’ अब दूसरे दिन चाय-नाश्ता करके आप उस लेटर को हाथ में लेंगे। चार पंक्तियां रात को लिखी गई हैं। तो अब आप दिन में लिखने का शुरू करेंगे, कौन सी पंक्ति से? पाँचवी पंक्ति से! ऐसे ही जन्मांतरीय साधना आगे बढ़ती है।

इस जन्म में जो भी साधना आपने की, अगले जन्म में रिपीट (Repeat) नहीं करनी पड़ेगी। अगले जन्म में आगे चलो। उससे अगले जन्म में उससे भी आगे बढ़ेगी। ये हमारे बाल मुनि हैं, आठ साल की उम्र थी, उस समय से बस एक ही इच्छा— ‘दीक्षा लेनी है, लेनी है, लेनी है!’ ये इच्छा कहाँ से आई? कहाँ से पनपी? निश्चित ही जन्मांतरीय साधना से ही यह इच्छा निष्पन्न हुई है। अगले जन्म में दीक्षित मुनिराजों को देखा होगा, और परमात्मा से प्रार्थना की होगी कि “प्रभु! तेरा मार्ग मुझे कब मिलेगा?” एक ही रटन, एक ही प्रार्थना— “प्रभु तेरा मार्ग शीघ्र ही मुझे मिले!” और इस जन्म में आठ साल की वय (उम्र) में इच्छा दृढ़ हो गई कि ‘मुझे तो दीक्षा ही लेनी है।’ और दीक्षा मिल भी गई!

तो आठ साल का बच्चा, जन्मांतरीय वैराग्य की साधना! गाँव में गुरुदेव पधारे। गुरुदेव को देखा। गुरुदेव के चरणों में वह बालक बैठा और जन्मांतर के संस्कार खुल गए। “मुझे दीक्षा लेनी है!” पापा से कहा, मम्मी से कहा— “मुझे दीक्षा लेनी है।” अब पुणे वालों का तो नियम है ना, बच्चा या बच्ची दीक्षा के लिए तैयार हो जाए, आप मना नहीं करोगे। ठीक है? पुणे वालों को पूछ रहा हूँ। आप तो ‘हाँ’ ही कहेंगे ना। अरे, हम तो संसार में पड़ गए, संसार के झमेले में पड़ गए, तू तो निकल जा! पापा और मम्मी से कहा, “मुझे दीक्षा लेनी है।” पापा और मम्मी जिनशासन के पूर्ण अनुरागी थे। उन्होंने गुरुदेव से कहा कि, “गुरुदेव! आप इस बच्चे को विहार में ले जाओ। आपको लगे कि बच्चा बिल्कुल तैयार है तो हमारी ‘हाँ’ ही है। हम प्यार से दीक्षा देंगे।”

गुरुदेव के साथ विहार में वो बच्चा गया। लेकिन इतना वैराग्य, इतना वैराग्य… कहीं भी भोजन के लिए जाए वो बच्चा, तो ये माताएं सोचतीं, “दीक्षा लेने वाला बच्चा है, आज हमारे द्वार पर आया है, हम भक्ति करें!” हलवा बनातीं, टॉफी (Toffee) बनातीं, चॉकलेट (Chocolate) बनातीं। लेकिन ये बच्चा कहता, “मुझे त्याग है, मुझे त्याग है, मुझे त्याग है।” ऐसा ही एक बाल मुनि मेरा है, जो अभी आदिनाथ संघ में है। वो जब मुमुक्षु था, तब मुमुक्षुओं की वाचना चलती थी। तो एक दिन मैंने वाचना में कहा कि— “भोजन करना पड़ता है, लेकिन कभी भी आसक्ति से, राग से नहीं खाने का। जो भी चीज़ तुम्हें स्वादिष्ट लगे, उसका त्याग कर देना।”

दूसरे दिन वो बच्चा एकाशने में भोजन करने के लिए गया। बड़ा पंडाल था। बैठा एकाशने के लिए। वेटर (Waiter) को पहले से मना कर दिया कि, “आज मेरे लिए स्वीट (Sweet) नहीं परोसनी।” लेकिन वेटर भी भक्ति वाला था। एक स्वीट पीस (Piece) डाल ही दिया। अब जूठी थाली में स्वीट पीस डाला गया। बाहर तो निकाल नहीं सकते, जूठी थाली थी। उस बच्चे ने क्या किया? दाल की कटोरी थी। स्वीट पीस को चूर दिया, दाल की कटोरी में डाल दिया और दाल पी ली! गुरुदेव ने कहा है कि ‘भोजन शरीर के लिए नहीं, साधना के लिए लेना है, आसक्ति नहीं होनी चाहिए।’ दाल पी गया! तो ऐसा ही यह बच्चा था।

गुरुदेव ने देखा कि वैराग्य परिपक्व है। गुरुदेव ने पापा और मम्मी से कहा कि बच्चे का वैराग्य परिपक्व है। दीक्षा हो गई। दीक्षा के बाद छह महीने हुए। लोच का समय आया। सभी मुनिवरों के लोच हो रहे हैं। ये बाल मुनिराज भी उछल रहे हैं— “मेरा लोच कब आएगा? मेरा लोच कब आएगा?” तो गुरुदेव कहते हैं, “तेरा पहला लोच है, तो मुहूर्त आने पर लोच होगा। अब मुहूर्त का दिन हम देख रहे हैं। मुहूर्त आने पर तेरा लोच हो जाएगा।” ऐसे में एक दिन प्रतिक्रमण के बाद बाल मुनिराज गुरुदेव के पास आए। पूरे दिन के थके हुए थे। गुरुदेव की गोद में सो गए।

आप क्या प्यार देंगे आपके बच्चे को? हम आपसे भी ज़्यादा प्यार देते हैं। एक दफ़े भेजें तो सही यहाँ! माताएं  हु। मैंने पहले कहा है ना— एक बच्चा है तो आपका। लेकिन दो हैं तो ? एक आपका और एक हमारा। ठीक है? बोलो तो सही! बोलते नहीं हैं। एक आपका और एक हमारा। एक प्रभु शासन का!

तो गोद में सो गया गुरुदेव की गोद में। गुरुदेव की गोद, गुरु-माँ की गोद। हम गुरु को ‘माँ’ कहते हैं। गुरु माँ जैसा ही प्यार देते हैं। तो गुरु-माँ की गोद में बाल मुनि सो गए। थोड़ी देर के बाद वो जग गए, लेकिन गुरु की गोद में पड़ा रहना अच्छा लगता था, ऐसे ही पड़े हुए थे। लेकिन जग गए थे। उस समय पन्यासजी भगवंत गुरुदेव के पास आए। तो गुरुदेव ने कहा पन्यासजी से कि, “कल का दिन अच्छा है। ये बाल-मुनि उछल रहा है कब का— मेरा लोच कब, मेरा लोच कब? तो कल उसे बिठा देना। लेकिन इसका शरीर बहुत कोमल है। मन तो उसका दृढ़ है, लेकिन शरीर कोमल है। तुम्हें लगे कि ये बाल-मुनि लोच को सहन नहीं कर सकेंगे, तो मुंडन करवा देना। अपवाद रूप में मुंडन करवा देना।”

ये बाल-मुनि सुन गए। अब पन्यासजी ने बाल-मुनि को उठाकर उनके संथारे (बिस्तर) में रख दिया। अब बाल-मुनि को नींद नहीं आती। “कल लोच के लिए मुझे बिठाएंगे। मैं तो दृढ़ हूँ कि लोच कराना ही है, लेकिन मेरा शरीर टॉलरेट (Tolerate – सहन) ना कर सके और पन्यास गुरुदेव कह दें कि मुंडन कराना होगा, तब गुरु की आज्ञा, मैं मना कैसे करूँ? तो क्या मुझे मुंडन कराना पड़ेगा? नहीं, मुझे तो लोच ही कराना है! तो करना क्या है?” १२ बजे तक नींद नहीं आई। रात के १२ बजे, सब नींद में थे। बाल-मुनि को नींद नहीं आती और एका विचार आया, उठे, दंडासन हाथ में लिया, और पूँजते-पूँजते वहाँ गए, जहाँ सब का लोच होता था। उस रूम में गए। वहाँ राख थी, सब कुछ रखा हुआ था। बाल-मुनि ने लोच का कायोत्सर्ग कर लिया, और फिर अपने हाथ से अपने बाल का लोच कर डाला! रात १२ से ३, तीन घंटों में सिर साफ! लोच पूरा! और फिर आकर सो गए।अब आराम से सो गए।

रोज़ के नियम के अनुसार ५ बजे उठे। उठने के बाद पहली प्रक्रिया यह होती है कि हम हमारे रजोहरण को सिर पर लगाते हैं। और दूसरी प्रक्रिया यह होती है कि हम गुरुदेव के पास जाते हैं और गुरुदेव का चरण स्पर्श करते हैं। तो ५ बजे बाल-मुनि जगे, रजोहरण को सिर पर लगाया और दंडासन लेकर पूँजते-पूँजते गुरुदेव के पास आए। अँधेरा था, गुरुदेव के चरणों में गिरे। गुरुदेव ने सिर पर हाथ फेरा, आश्चर्य में पड़ गए— “अरे ये क्या! रात को मेरी गोद में सोया हुआ था, कितने घने बाल थे, कहाँ गए बाल? अरे बाल मुनि, क्या हुआ ये?” तब बाल-मुनि कहते हैं, “गुरुदेव, मुझे प्रायश्चित्त दो। मुझे प्रायश्चित्त दो।”

कितने ज्ञानी हैं इस छोटी वय में! वे कहते हैं कि, “गुरुदेव! हरिभद्रसूरि भगवंत ने कहा है— ‘मुत्तुण आणपाणं’ श्वासोच्छ्वास की क्रिया को छोड़कर सभी क्रियाएं गुरु को पूछकर करनी चाहिए। मैं रात को जगा हुआ था। आपका वचन मैंने सुना था। मुझे नींद नहीं आ रही थी कि मुझे तो लोच ही कराना है। और मैं १२ बजे उठा, लोच की जगह पर गया, कायोत्सर्ग किया और मैंने मेरे हाथों से लोच कर लिया। गुरुदेव, मुझे प्रायश्चित्त दो। आपकी आज्ञा के बिना एक भी कार्य मैं नहीं कर सकता। लोच जैसा कार्य आपकी आज्ञा के बिना मैंने कर लिया है। अब प्रायश्चित्त दो।” ये क्या था वो? आज्ञा पालन का आनंद!

तो आज चातुर्मासिक पर्व है। आज प्रभु से यही प्रार्थना करेंगे कि, “प्रभु! पूरा चातुर्मास आराधना भी आप देना और आराधना का आनंद भी आप देना।” प्रभु तैयार हैं। ही इज़ एवर रेडी (He is ever ready)। यदि हम तैयार हैं, तो प्रभु तो तैयार ही हैं। प्रभु तो बरस ही रहे हैं। तो दो ही चीज़ें आज मांगनी हैं कि प्रभु साधना की शक्ति दो और साधना का आनंद दो।

मासक्षमण होगा हमारी शक्ति से नहीं, प्रभु की शक्ति से, प्रभु की ताकत से होगा। हम तीन समय खाने वाले, चार समय या पाँच समय खाने वाले, हम एक उपवास भी कैसे कर सकते हैं? लेकिन प्रभु की कृपा होती है तो मासक्षमण क्या… हंसकीर्ति सूरि महाराज हैं, कितना उपवास करते हैं! १८०-१८० उपवास कितनी बार कर लिए। मेरा धर्मचक्र में उपधान था, उस समय हंसकीर्ति सूरिजी (हंसरत्नसूरी) देवलाली में थे। १२० उपवास का उनका पारणा होने वाला था। तो उनकी इच्छा थी कि, “गुरुदेव! आपकी निश्रा में मैं पारणा करूँ।” मैंने कहा, “बहुत सुंदर! मुझे यह लाभ मिलेगा। तपश्चर्या आपने की, अनुमोदना का लाभ मुझे मिलेगा।” तो नासिक में यह प्रोग्राम (Program) रखा गया। ११९वें दिन पर देवलाली से १५ किलोमीटर का विहार करके धर्मचक्र आए! व्हीलचेयर में नहीं, डोली में नहीं, चलते आए!

और फिर उन्होंने कहा कि, “गुरुदेव! ऐसा तो निश्चित किया है कि आपके हाथों से पारणा करना है १२० उपवास का। लेकिन शक्ति बहुत अच्छी है, तो ऐसा विचार आता है कि आगे चलाऊँ उपवास।” मैंने कहा, “मैं तुम्हें पारणा कराने कब आऊँगा? तो मेरे लिए तुम पारणा कर लो? तुम तो करते ही हो उपवास, १८० करना है तो बाद में करना और नासिक में मेरे हाथ से पारणा होगा।” लेकिन १२० उपवास होने पर भी इच्छा यही थी कि ‘मैं आगे बढूँ, शक्ति अच्छी है तो पारणा क्यों करूँ?’ तो प्रभु की कृपा से… दो ही चीज़ मांगनी है प्रभु से! “प्रभु चातुर्मास में साधना की शक्ति दो और साधना का आनंद दो।” आपकी साधना बहुत ही सुंदर आगे बढ़ेगी।

आज तो सब प्रवचन में आ गए हैं। हमारा आमंत्रण है, इनविटेशन (Invitation) रोज़ आने के लिए। आपका तो चातुर्मास भी संक्षिप्त हो गया अब, पर्युषण तक का, डेढ़ महीने का चौमासा, ढाई महीने का चौमासा हमारा! लेकिन डेढ़ महीने तक तो साधना का रहस्य समझो। साधना आप करते हैं, साधना का इतना आनंद आपको नहीं मिलता है। कारण यह है कि साधना का रहस्य आपने नहीं जाना है। ध्यान की भी हम शिबिर रखेंगे, कायोत्सर्ग का भी शिबिर रखेंगे। आपको ज्ञान देने के लिए, साधना का रहस्य समझाने के लिए हम सब कुछ करेंगे। और इस चातुर्मास में ज्ञान और भक्ति का एक समन्वय करना है। भक्ति यात्रा पर चलना है और प्रभु की साधना का जो हार्द (मर्म) है, जो रहस्य है, वो भी आपको समझाना है। तो प्रभु के प्रेम को पीने के लिए रोज़ आना है, मुझे सुनने के लिए नहीं, प्रभु को पीने के लिए! प्रभु को पीना है। पियो, मज़ा आएगा।

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