सुमिरन और साक्षात्कार
लोग मुझे बहुत बार पूछते हैं कि प्रभु को हम कैसे मिलें? प्रभु को मिलना है; प्रभु कैसे मिलें, प्रभु कैसे रीझें? तब मैं कहता हूँ कि प्रभु अपनी ओर से तो तुममें मिले ही हुए हैं, तुम्हारा मिलने का बाकी है! प्रभु तो आ गए हैं तुम्हारे द्वार पर। प्रभु तो तुममें मिले ही हुए हैं। अब तुम्हें उनसे मिलना है।
प्रतिष्ठा और अंजनशलाका इसलिए है कि प्रभु तो आ गए हैं, अब प्रभु से हम मिल जाएँ। प्रभु हमें मिल गए, हम प्रभु से मिल जाएँ। इसलिए अंजनशलाका, इसलिए प्रतिष्ठा और उसके लिए ही उपवास और तपश्चर्या। प्रभु में ऐसे डूब गए कि न शरीर की याद, न समय की याद, न भोजन की याद; सब भूल गए।
फिर दो ही चीजें रहती हैं – साक्षात्कार और सुमिरन। सुमिरन प्रगाढ़ बनता है, तो प्रभु का साक्षात्कार होता है। प्रभु तो 24 घंटे का वादा करके आए हैं, लेकिन हम उस साक्षात्कार में टिक नहीं पाते हैं। तो प्रभु चले जाते हैं। तब साक्षात्कार छूट जाता है, लेकिन सुमिरन छूटता नहीं। तो या तो साक्षात्कार, या तो सुमिरन – चलता रहना चाहिए!
श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित स्तवन चोवीसी, पहली कंडिका, उत्तरार्ध: “मुख दिठे सुख उपजे, दरिशने अतिही आनंद लाल रे।”
परमात्मा का मुख हम देखें, अपार सुख भीतर पनपता है। संसार में ऐसा मुख कभी हमने देखा नहीं। अनगिनत जन्म हमारे बीत चुके, लेकिन ऐसा सुंदर मुख अभी तक हमने नहीं देखा। क्या विशेषता है प्रभु के मुख की? प्रभु के मुख पर प्रेम ही प्रेम झलकता है। पूरी सृष्टि पर का प्रेम प्रभु के मुख पर झलकता है। इस प्रेम को देखा और शालिभद्र जी प्रभु के सम्मोहन में पड़ गए। ‘ऐसा मुख, ऐसा मुख तो कभी मैंने नहीं देखा है।’ धन्ना जी ने पहली बार प्रभु का मुख देखा, और वे भी प्रभु के प्रेम में पड़ गए।
महोपाध्यायजी ने एक स्तवना में लिखा है कि “मैंने भी जब प्रभु का यह रूप देखा, प्रभु के मुख पर का यह प्रेम देखा, मैं भी प्रभु के रंग में पूरा रंग चुका हूँ।” मीरा ने कहा था: “लाल न रंगाऊँ, हरि न रंगाऊँ, तेरे ही रंग में रंग दे चुनरिया।” प्रभु! दूसरा कोई भी रंग अब मुझे नहीं चाहिए। तेरा रंग इतना पसंद आ गया है, तेरा प्रेम इतना तो भा गया है, दिल पर छा गया है कि अब तेरे प्रेम के सिवा कोई दुनिया मेरे पास बची नहीं। तो मीरा ने कहा, “लाल न रंगाऊँ, हरि न रंगाऊँ।” दूसरे किसी भी रंग में मेरे अस्तित्व को मुझे रंगना नहीं है। तेरे ही रंग में रंग दे चुनरिया। मेरी अस्तित्व की चुनरी को तू तेरे ही रंग में, तेरे ही प्रेम में रंग दे। ऐसा प्रेम, ऐसा रंग, संसार में कहीं भी देखा नहीं।
फिर मीरा ने कहा: “ऐसा ही रंग दो कि रंगना ही छूटे, धोबिया धोए चाहे सारी उम्र।” प्रभु! तेरे प्रेम का रंग मेरे अस्तित्व पर ऐसा लग जाए, ऐसा लग जाए कि शाश्वत काल तक यही रंग मेरे अस्तित्व पर रहे। तेरे प्रेम का रंग, दूसरा कोई भी रंग अब मुझे नहीं चाहिए।
यही बात महोपाध्याय यशोविजयजी कहते हैं:
“वासत है जिन गुण मुझ दिल को, जैसो सुरतरु बाग,
और वासना लगे न ताको, जस कहे तू बड़ भाग।”
प्रभु का रंग, प्रभु के प्रेम का रंग, ऐसा तो अस्तित्व पर चढ़ गया है कि अब दूसरा कोई रंग मेरे अस्तित्व पर अब लगने वाला नहीं है। कितना प्रेम प्रभु का, आप कल्पना नहीं कर सकेंगे। ऐसे तो मैं एक सूत्र देता हूँ— Surrender के सामने care। जितना तुम्हारा समर्पण, उतना ही प्रभु का प्रेम। ऐसा नहीं है कि प्रभु को समर्पण चाहिए, लेकिन बिना समर्पण तुम प्रभु के प्रेम को कैसे झेल पाओगे?
लेकिन हम जब नरक में थे, निगोद में थे, एक अनहोनी घटना घटी। वहाँ भी प्रभु का प्रेम हम पर उतरा, हम पर बरसा। बरसा इतना ही नहीं, हम झेल नहीं पाते थे। तो प्रभु ने यह कृपा करी और कि अपने प्रेम को खुद उसने स्वीकाराया। हम स्वीकार नहीं कर सकते थे। उसके प्रेम ने ऐसा एक मार्ग बता दिया, जिस मार्ग से हम उसके प्रेम को स्वीकार सकते हैं।
एक बहुत अच्छी कहानी यूरोप में लिखी गई है। यूरोप में और अमेरिका में लाखों लोगों ने यह कहानी पढ़ी है, और कहानी पढ़कर वे सब प्रभु के प्रेम में डूब गए थे। आज हमें भी प्रभु के प्रेम में डूबना है। आज तो दो बात है, थ्योरीकली (Theoretically) भी डूबना है, प्रैक्टिकली (Practically) भी डूबना है। थ्योरीकली तो हम रोज प्रभु के प्रेम में डूब रहे हैं। आज प्रैक्टिकली भी डूबने का है।
आज दो मांगलिक प्रसंग हमारे सामने हैं। कैवल्यधाम तीर्थ से भक्तगण आया है, ट्रस्टीगण के साथ। वहाँ प्रतिष्ठा होने वाली है, उसका मुहूर्त लेने के लिए। तो यह भी एक प्रैक्टिकल एप्रोच (Practical approach) हुआ, परमात्मा की प्रीति का। बिना परमात्मा हम रह ही नहीं सकते। परमात्मा का जिनालय तो होना ही चाहिए। सुंदर जिनालय बन गया। साध्वीजी कैवल्यरत्नाश्रीजी की प्रेरणा से एक तीर्थ धाम बन गया। आप लोगों ने सुचारू प्रयास किए। परमात्मा की कृपा, परमात्मा का प्रेम, और आपका प्रयास। सुवर्णा दीदी का तो जोरदार प्रयास है। प्रेम और प्रयास दोनों का मिलन हुआ, और तीर्थधाम आज खड़ा हो गया है। उस तीर्थधाम में अंजनशलाका प्रतिष्ठा होने वाली है, इसका मुहूर्त लेने के लिए आप लोग आए हैं।
दूसरा प्रैक्टिकल एप्रोच है, ३१ उपवास का पारणा। साध्वीजी अर्हंकृपाश्रीजी ने ३१ उपवास पूर्ण किए हैं, आज उनका पारणा है। मैं उपवास का अर्थ यह करता हूँ, सिर्फ खाना नहीं, उसका नाम उपवास नहीं। तुम प्रभु के प्रेम में इतने डूब गए, इतने डूब गए कि खाने की याद भी न आए, वह उपवास। प्रभु के प्रेम में तुम इतने डूब गए, खाने की याद कहाँ से आएगी? भोजन तो अनंत जन्मों में अनंती बार किया। परमात्मा के प्रेम में डूब जाने का यह अवसर मिला, तब तो डूब ही जाने का ना। सुमिरन भी परमात्मा का, साक्षात्कार भी परमात्मा का। दो चीजें उपवास में होती हैं— साक्षात्कार और सुमिरन। जब सुमिरन प्रगाढ़ बन जाता है, प्रभु का साक्षात्कार होता है। प्रभु तो तैयार हैं, सामने से आते हैं।
लोग मुझे बहुत बार पूछते हैं कि प्रभु को हम कैसे मिलें? प्रभु को मिलना है, प्रभु कैसे मिलें, प्रभु कैसे रीझें? तब मैं कहता हूँ कि प्रभु अपनी ओर से तो तुममें मिले ही हुए हैं, तुम्हे मिलने का बाकी है। प्रभु तो आ गए हैं तुम्हारे द्वार पर। प्रभु तो तुममें मिले ही हुए हैं। अब तुम्हें उनसे मिलना है। तो प्रतिष्ठा और अंजनशलाका इसलिए है कि प्रभु तो आ गए हैं, अब प्रभु से हमे मिल जाना है। प्रभु हमें मिल गए, हम प्रभु से मिल जाएँ। इसलिए अंजनशलाका, इसलिए प्रतिष्ठा, और इसलिए ३१ उपवास। प्रभु में डूब गए, न शरीर की याद, न समय की याद, सब भूल गए। तो दो ही चीजें रहती हैं— साक्षात्कार और सुमिरन। सुमिरन प्रगाढ़ बनता है, प्रभु का साक्षात्कार होता है। हम साक्षात्कार में जब नहीं रह सकते, प्रभु तो २४ घंटे का वादा करके आए हैं, लेकिन हम नहीं टिक पाते हैं। किसी की याद आती है तो प्रभु चले जाते हैं। तो साक्षात्कार छूट जाता है, लेकिन सुमिरन छूटता नहीं। तो या तो साक्षात्कार, या तो सुमिरन। तो ये दो प्रैक्टिकल एप्रोचेस आज के हैं।
तो मैं बात कर रहा था यूरोप में लिखी हुई एक कहानी की। कहानी का शीर्षक है, “Footprints in the sand” बहुत सुंदर छोटी सी कहानी है, लेकिन आप भी सुनोगे, आप प्रभु के प्रेम में डूब जाओगे। और बाद में मुहूर्त करोगे। पहले प्रभु के प्रेम में डूब जाना है, फिर मुहूर्त झेलना है। तुम तो प्रभु के प्रेम में डूब गई हो। अब प्रभु की आज्ञा है कि शरीर को कुछ दे दो। तो शरीर को कुछ देने का है, लेकिन आत्मा तो अणहारी है। तुमे कुछ खाने का नहीं है, इसको खिलाने का है।
एक छोटी सी कहानी है। एक आदमी, बिल्कुल सामान्य। आपके संसार में मूल्य किसका होता है? पैसे वाले का। मुंबई में कोई आता है न, कोई पूछता है, कहाँ से आए हो? “विरार से, वसई से।” “अच्छा, अच्छा, ठीक है।” दूसरा कोई आया, कहाँ से आए हो? “वालकेश्वर से।” “अरे, आओ, आओ ।” तो यहाँ आदमी का मूल्य है कि पैसे का मूल्य? तो वह आदमी बिल्कुल सामान्य कोटि का था। कोई फ्रेंड भी नहीं थे उसके।
एक दिन रण (रेगिस्तान) के पेले पार, एक गांव था, छोटा सा। वहाँ काम के लिए उसे जाना पड़े ऐसा हुआ। रण की जर्नी, Desert journey, और पहली बार जिंदगी में करने की थी। अकेला, अकेला, रण की जर्नी कैसे करे? लेकिन किसको भी कहे, कोई साथ में तो आने वाला है नहि। लेकिन कोई साथ में न आए, तब साथ में कौन आते हैं? आप गीत में बोलते हैं: “जब कोई नहीं आते, मेरे दादा आते हैं।” कोई हमारे साथ नहीं है, तब भी हमारे दादा, हमारे प्रभु हमारे साथ हैं।
जिस दिन जर्नी शुरू करने की थी, सुबह ५ बजे उठा, स्नान कर लिया, चाय पी लिया, नाश्ता कर लिया, पानी से वॉटर बैग भर लिया, और ६ बजे रण की जर्नी उसने शुरू की। पहला ही पैर रण में रखा, और उसने प्रभु से प्रार्थना की कि, “प्रभु! कोई मेरे साथ आने वाला नहीं है, लेकिन मुझे श्रद्धा है कि तू तो मेरे साथ आएगा ही।”
जर्नी शुरू हुई। बाद में उसने देखा, वह अकेला चल रहा है। तो उसके दो पगलिये पड़ने चाहिए न। लेकिन रण की रेती में चार पगलिये पड़ रहे थे। कोई दिखता नहीं था। दो पगलिये तो अपने खुद के। दो पगलिये अपने पगलिये से बड़े पगलिये। तो वह समझ गया कि प्रभु आ गए हैं। प्रभु दिखते नहीं हैं, लेकिन प्रभु के पदचिह्न तो रेत में पड़े हुए हैं। अब प्रभु साथ में हैं, तो चिंता कैसे? लेकिन रण का अनुभव उसे नहीं था। शाम ५ बजे तक उसे जर्नी करनी थी। तो पानी का रेशनिंग (Rationing) करना चाहिए। थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा, घूंट-दो-घूंट पानी पीना चाहिए। साढ़े आठ बजे प्यास लगी, आधा वॉटर बैग खाली। १० बजा, पूरा वॉटर बैग खाली। अब साढ़े ग्यारह बजे। रण की रेत तप गई। ऊपर से धूप, नीचे से गरम रेत। पानी का बिंदु नहीं। अब शरीर में बिना पानी डिहाइड्रेशन हो जाता है। तो डिहाइड्रेशन हो गया, और वह बेहोश होकर रेत में पटक गया। थोड़ा होश में आया, थोड़ा होश में आया। पूरे होश में नहीं, थोड़े होश में। तब सबसे पहले यह सोचा कि प्रभु मेरे साथ हैं कि नहीं। यह बात मन में आज पक्की रखो। प्रभु होने ही चाहिए साथ में।
लंदन के पास एक छोटा सा गांव। वहाँ क्रिस्टोफर नाम की एक बहन रहती थी। वृद्ध। उसके मन में इच्छा हुई कि मंदिर बनवाऊँ। गांव के अग्रणियों को इकट्ठे किए, और अपनी बात रखी कि मुझे मंदिर बनवाना है, पैसे मेरे, लेकिन काम आपको करना है। अग्रणियों ने सोचा कि ये बाई, उसका पति एक्सपायर हुआ हैं, बच्चे हैं नहीं, तो इसके पास संपत्ति कितनी है। तो पूछा कि तेरे पास पैसे कितने हैं? तो क्रिस्टोफर ने कहा, “वन थाउजेंड डॉलर्स” (One Thousand Dollars)। एक हजार डॉलर। तो अग्रणियों ने कहा, “एक हजार डॉलर में कोई मंदिर बन जाए? फाउंडेशन भी नहीं बनेगा। मंदिर कैसे बनेगा?” तब क्रिस्टोफर ने कहा कि, “आप सब अग्रणी हो, आपके सामने मैं छोटी बच्ची हूँ, लेकिन मैं आपसे एक बात कहूँ, “क्रिस्टोफर प्लस वन थाउजेंड डॉलर्स, नो टेम्पल, नो फाउंडेशन। मैं भी मानती हूँ। लेकिन अब मैं दूसरी बात करती हूँ। क्रिस्टोफर प्लस वन थाउजेंड डॉलर्स प्लस गॉड (Plus God)। प्लस गॉड! अब मंदिर बनेगा कि नहीं बनेगा, बोलो? बनेगा! प्लस गॉड।” जीवन में प्रभु उतर आए, फिर न्यूनता किस बात की? फिर कमी कोई बात की नहीं है। खुद प्रभु उतर आए, प्लस गॉड!
तो वह आदमी होश में आया। सबसे पहले देखता है, प्रभु मेरे साथ हैं कि नहीं। यदि प्रभु मेरे साथ हैं, तो कोई चिंता की बात नहीं। और प्रभु नहीं हैं मेरे साथ, तो चिंता ही चिंता है। संत कबीर जी ने बहुत अच्छी बात कही। उन्होंने कहा: “पहले हम थे, प्रभु नहीं।” पहले मेरे हृदय के केंद्र में मैं था। प्रभु नहीं थे। अब प्रभु ही नहीं थे, तो मेरा जीवन शून्य था। पहले हम थे, प्रभु नहीं। किसी ने पूछा, “अब क्या है?” तो कबीर जी ने कहा: “अब प्रभु है, हम नाही।” अब प्रभु ही केंद्र में हैं, मैं परिध में हूँ। तो किसी ने पूछा कि ऐसा क्यों? क्यों केंद्र में दोनों साथ में नहीं रह सकते? तुमने तो ऐसा ही किया है ना। प्रभु रह जाओ यहाँ, मैं भी रहूँगा, पार्टनरशिप। मैं भी रहूँगा यहाँ, और तुमको भी रहना है। प्रभु कहते हैं, “मुझे फुर्सत नहीं है।”
“प्रेम गली अति साकरी, तामें दो न समाय।” प्रेम की गली, भक्ति की गली, संकरी गली है। उसमें दो का समावेश शक्य नहीं है। या तो तुम रहो, या प्रभु रहे। Now choice is yours. लेकिन आपने तो चॉइस कर ली कि प्रभु को ही केंद्र में रख लें।
आज तो झांकी देखने की है। पिक्चर तो बाकी है। केवल एग्जाम में देखने की। आपका उल्लास, आपका उत्साह। अंजनशलाकाए तो बहुत होती है। मुंबई में १०-१५ दिन के लिए जाता हूँ, और पाँच प्रतिष्ठा है, अंजनशलाका है। तो यह तो रोज होता है हमारे लिए। लेकिन आपका जो उत्साह है, आपका उल्लास है, उसे देखने के लिए मुझे आना है। आप नाचोगे। एक बात मैं आपसे कहूँ नृत्य जो है न, वह भक्ति की सुपर्ब टेक्निक (Superb technique) है। सुपर्ब टेक्निक। क्यों? क्योंकि नृत्य जब एक्सट्रीम (Extreme) पलों में होता है, तब नृत्यकार नहीं, नाचने वाला नहीं, सिर्फ नृत्य ही रहता है।
और मीरा ने तो उससे भी आगे कहा था। किसी ने मीरा से पूछा था कि, “तुम इतनी नाचती हो, थकती नहीं?” तो मीरा ने क्या कहा था? मीरा ने कहा, “मैं कहाँ नाचती हूँ, वह नाचता है। I am not dancing, he is dancing. मैं हूँ, तब नाचूँ? मैं हूँ ही नहीं! मैं उसमें मिल गई, घुल गई, विलीन हो गई। अब मैं कहाँ हूँ? अब तो वह ही है। मैं नहीं नाचती हूँ, वह नाचता है।”
तो उस आदमी ने देखा, आधी होश में, कि प्रभु मेरे साथ हैं कि नहीं। अब उसने देखा रेत में। ऐसे तो प्रभु दिखने वाले नहीं थे। रेत में देखा, पहले चार पगलिये दिखते थे न, अब दो पगलिये दिखते हैं। अब वह चिंता में आ गया। प्रभु गए। उसने बूम लगाई। “प्रभु, प्रभु, प्रभु, तुम कहाँ हो?” तब उसके कानों में विस्परिंग (Whispering) हुआ। प्रभु ने कहा, “मैं तो यहाँ ही हूँ। तू क्यों चिल्लाता है? मैं यहाँ ही हूँ।” “अरे, तुम यहाँ हो, तो तुम्हारे पगलिये क्यों नहीं पड़ते हैं?” तब प्रभु ने उसके कानों में कहा कि, “तू तो बेहोश होकर रण की गर्म-गर्म रेती में पड़ गया था। मैंने तुझे उचक लिया (उठा लिया) है, और मैं तुझे उचक कर चल रहा हूँ। अब तेरे पगलिये कहाँ से पड़ेंगे? दो पगलिये मेरे हैं।”
ऐसे ही प्रभु हमें उचक कर नरक और निगोद से मनुष्य जन्म में लाए। पाँच इंद्रियाँ, मन और बुद्धि, सब प्रभु ने दी। अब तो प्रभु ने उसे उचका था। प्रभु की स्पीड तो कैसी होती है? दो मिनट में गांव आ गया। तुरंत ठंडा पानी मिल गया। गर्म-गर्म चाय मिल गई। होश में पूरा आ गया। तो यह छोटी सी कहानी कि प्रभु हमें उचक कर ले जाता है। तो साधना का सूत्र यह है, जब तुम असहाय हो, जब तुम तुम्हारे पैरों पर नहीं चल सकते, तब प्रभु तुम्हें उचक लेते हैं।
तो “मुख दिठे सुख उपजे”। चिंतामणि दादा का, गोड़ी पार्श्वनाथ दादा का, मुख देखते हैं सुख ही सुख। अपार सुख। क्योंकि ऐसा प्रेम संसार में कहीं भी हमने देखा नहीं है, और शायद देख भी नहीं सकेंगे। तो थ्योरीकली तो प्रभु के प्रेम की बात करी। प्रैक्टिकल में भी यही बात की कि आपको मुहूर्त झेलना है। साध्वीजी भगवती को तप का समर्पण करना है।
