Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 06-08-2026 | Pune Chaturmas

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जितनी संपत्ति ज़्यादा, उतना सुख ज़्यादा??

आप प्रवचन में आएंगे, तो हमारे चेहरे पर आनंद ही आनंद देखकर प्रभु मिलन की आपकी प्यास गहरी हो जाएगी। आपको प्रश्न होगा कि “गुरुदेव! हमारे पास तो मकान है, संपत्ति भी है, कार भी है और परिवार भी है। आपके पास तो कुछ भी नहीं है, फिर भी आप इतने आनंद में क्यों?” हम कहेंगे : “हमारे पास प्रभु हैं! और जिसे प्रभु मिल गए, वह सतत आनंदमय रहता है।”

हकीकत में संपत्ति से सुख मिलता है, पदार्थों से सुख मिलता है – यह केवल एक भ्रम है। संपत्ति से, पदार्थों से केवल आपका दुःख दूर होता है; सुख मिलता नहीं है। दोपहर ज़ोर की भूख लगी हो और आपको गरम-गरम रोटी परोसी जाए। पहली रोटी खाने पर आपको बहुत सुख मिला। रोटियां खाते जाओ, आपका सुख बढ़ता जाएगा? चार रोटियां आपने खा ली। अब आप कहेंगे कि “बस, अब और नहीं”। फिर भी आपको रोटी खिलाई जाए, तो अब तो पीड़ा होगी।

ऐसा क्यों हुआ? पहली रोटी खाते समय तो लगा था कि रोटी खाने से सुख मिलता है! पर अगर सच में रोटी से सुख मिलता होता, तो पहली रोटी से सुख और पांचवी रोटी से दुःख न मिलता। रोटी तो वही है; फिर सुख अब दुःख में क्यों बदल गया? क्योंकि रोटी से सुख नहीं मिलता है; सिर्फ भूख का जो दुःख था, वह दुःख ख़त्म होता है। सिर्फ दुःख खत्म होता है पर आप भ्रम में रहते हो कि “मुझे सुख मिला!”

महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित ‘स्तवन चौबीसी’।

परम तारक ऋषभदेव परमात्मा के चरणों में समर्पित प्रथम स्तवन। उसकी प्रथम पंक्ति:

“जगजीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”

प्रभु की माता का नाम मरुदेवा था, और प्रभु के पिताश्री का नाम था नाभि राजा।

परमात्मा का नाम तो मधुर ही होता है, लेकिन परमात्मा के माता-पिता के नाम में भी एक मनोहर साधना गुंफित रहती है। प्रभु का नाम! उसकी तो क्या बात करें? ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्।’ माधुर्य के अधिपति जो परमात्मा हैं, उसका सब कुछ मधुर है। ‘गमनं मधुरं, वचनं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्।’ प्रभु सुवर्ण-कमल पर विहार करते हैं, यह दृश्य देखने को मिल जाए, हमारी आँखों के लिए यह उत्सव बन जाएगा! परमात्मा का चलना मधुर घटना, परमात्मा समवसरण में बैठकर देशना देते हैं, ये भी मधुर घटना। प्रभु का जो भी है, सो मधुर है। प्रभु का नाम भी मधुर! लेकिन आज ये बात करनी है कि प्रभु के माता-पिता के नाम में भी कैसी सुंदर साधना गुंफित होती है!

प्रभु महावीर देव— पिता का नाम सिद्धार्थ महाराजा, माता का नाम त्रिशला महादेवी। सिद्धार्थ का क्या अर्थ होता है? ‘जब जिसके सब कार्य सिद्ध हो गए, वह उस समय सिद्धार्थ हो गया।’ अब करने का कुछ ना रहा, Doing गया, Being  रहा, तुम सिद्धार्थ हो गए! साधना की भाषा में, Doing ही संसार है, Being ही मोक्ष है।

हमारी एक परंपरा थी, और वह परंपरा थी ‘कर्तृत्व मुक्त कार्य’। साधना की धारा में, भक्ति की धारा में हम जाएंगे। साधना करेंगे, भक्ति करेंगे, कार्य होगा, लेकिन कर्तृत्व नहीं होगा। हमारी साधना के, हमारी भक्ति धारा के कर्ता प्रभु हैं, कर्ता सद्गुरु हैं, हम केवल साक्षी हैं। साक्षी को कुछ करने का नहीं होता है। हम क्या करेंगे, बोलो तो? अनगिनत जन्मों से राग और द्वेष की धारा में बहे हुए हम, करेंगे तो भी क्या करेंगे? हमारी आदत हमें राग और द्वेष के कर्तृत्व की ओर ले जाएगी। तो आज एक बात निश्चित करनी है कि कार्य हमारे पास हो, लेकिन उसका कर्तृत्व ना हो।

एक बड़ी सुंदर घटना हमारी परंपरा में आती है— संप्रति महाराजा का पूर्व जन्म। पूर्व जन्म में वे भिक्षुक थे, घर-घर पर भिक्षा मांगने के लिए जाते, लेकिन कुछ मिलता नहीं। ऐसे में उसने देखा, दो मुनिराज एक हवेली से बाहर आते हैं भिक्षा लेकर। उस भिक्षुक ने मुनिराज से विनंति की, “मैं भूखा हूँ, मुझे खाने का दो।” तब मुनिराज ने कहा कि, “हम भिक्षा को कलेक्ट (Collect) करने वाले हैं, भिक्षा को लेने वाले हैं। लेकिन भिक्षा में जो भी मिला है, उस पर अधिकार हमारा नहीं है। उस पर अधिकार हमारे गुरुदेव का है।”

भिक्षुक सोच रहा है कि ‘ये लोग भी मना तो नहीं करते हैं। नहीं, हम तुझे नहीं देंगे! ऐसा तो नहीं कहते है, ये कहेते हैं कि भिक्षा पर हमारा अधिकार नहीं है, अधिकार हमारे गुरुदेव का है। गुरुदेव चाहें तो तुझे दे सकते हैं, हम नहीं दे सकते। अरे, ये भी इतने दयालु हैं, तो उनके गुरु तो कितने दयालु होंगे!’

भिक्षुक मुनिराज के पीछे-पीछे उपाश्रय तक आया। गुरुदेव की दृष्टि उस भिक्षुक पर पड़ी। गुरु की दृष्टि तुम पर पड़े, और उस समय तुम्हारी दृष्टि गुरुदेव पर हो, तो शक्तिपात हो सकता है! आँख से भी शक्तिपात हो सकता है। जैसे शब्द से शक्तिपात होता है, ऐसे आँख से भी शक्तिपात होता है। इसीलिए हमारे लिए एक साधना आई— आचारांग सूत्र में ‘तद्-दिट्ठी’! हमारी आँख सतत प्रभु की ओर एवं सद्गुरु की ओर फोकस (Focus) होनी चाहिए। ख्याल नहीं है कब सद्गुरु शक्तिपात करेंगे, लेकिन कभी ना कभी तो करेंगे। लेकिन जब गुरुदेव आँखों से हमें देखेंगे, उस समय हमारी आँखें गुरुदेव के सम्मुख नहीं होंगी, तो हम शक्तिपात को स्वीकार नहीं कर सकेंगे।

गुरुदेव ने भिक्षुक को देखा। बड़े ज्ञानी गुरु है। गुरु ने देखते ही निश्चित कर लिया कि अगले जन्म में यह संप्रति राजा होने वाला है और भविष्य में इसके हाथों से जिनशासन की बड़ी प्रभावना होने वाली है। तो गुरुदेव ने प्रेम से भिक्षुक को बुलाया— “बेटा यहाँ आओ।” भिक्षुक के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। ‘इतने बड़े गुरुदेव और मुझे बुलाते हैं… यहाँ आओ,  भिखारी वहाँ गया। गुरुदेव ने पूछा, “तुझे भोजन चाहिए ना?” “हाँ गुरुदेव, मैं भूखा हूँ, मुझे भोजन चाहिए।” “आज मैं तुझे भोजन दूँगा, लेकिन भोजन के पहले थोड़ी विधि करनी पड़ेगी।” “अरे साहेब! जो विधि करनी हो, सो कर लो, लेकिन मुझे खाने को दो।”

इसकी प्रबल झंखना थी भोजन की। आप सबकी प्रबल झंखना किसके लिए है? ‘गुरुदेव के पास जाना है, प्रवचन में जाना है।’ क्यों? ‘क्योंकि सद्गुरु आपको प्रभु देते हैं।’ उस भिक्षुक को सिर्फ भोजन नहीं मिलने वाला है, प्रभु भी मिलने वाले हैं। लेकिन आया है भोजन की इच्छा से! आप सब क्यों आए हो? मैं मानता हूँ कि आज तक तो ऐसे ही आ गए होंगे— ‘महाराज साहेब आए हैं, तो प्रवचन में जाना चाहिए।’ अब कल से लक्ष्य बदल जाना चाहिए! ‘गुरुदेव के पास जाता हूँ, प्रभु को लेने के लिए!’ सद्गुरु के तुम्हारी ओर खुलते दो ही कार्य हैं। दो ही कार्य!

तुममें प्रभु की प्यास नहीं जगी, तो सद्गुरु प्रभु की प्यास जगा देंगे। और प्यास जगी है, तो प्रभु से तुम्हारा मिलन करा देंगे। हमारे दो ही काम हैं। फिर ‘उपधान’ कराना है, भाइयों को कहाँ रखना है, बहनों को कहाँ रखनी है… चिराग भाई जाने! मैनेजमेंट (Management) की बात में हम नहीं आएंगे। हमारे तो दो ही काम हैं! तुम आ गए हमारे पास, तो पहले प्रभु मिलन की प्यास जगाएंगे। और प्यास गहरी हो जाएगी, तो प्रभु आपको दे देंगे।

अब पहली बात, प्रभु मिलन की प्यास गहरी हो जाएगी। कैसे होगी? हमें देखकर होगी। हमारा फेस (Face) आप देखोगे, आनंद ही आनंद है। स्वीट ही स्वीट (Sweet) है। तब आपको प्रश्न होगा कि, “गुरुदेव, आपके पास क्या है?” तुम कहोगे, “साहेब! हमारे पास तो मकान है, हमारा फ्लैट, लग्ज़रीयस (Luxurious) फ्लैट है और संपत्ति भी है, कार भी है, परिवार भी हमारा है। आपके पास कुछ नहीं है, फिर भी आप आनंद में क्यों?” तो हम कहेंगे, “प्रभु हमारे पास हैं! जिसे प्रभु मिल गए, वे सतत आनंद में रहते हैं।”

मैं आपसे पूछूँ, चलो, ‘पैसे से सुख मिलता है’, ऐसी आपकी धारणा है। मान लिया। अब मैं आपको आगे पूछूँ, ‘कितनी संपत्ति हो तो आप सुखी हो जाएं?’ पाँच करोड़, दस करोड़, पच्चीस करोड़, पचास करोड़, सौ करोड़, कितने करोड़, कितने अरब, आप बोलो! और इतने मिल जाएंगे, मैं आपसे पूछूँगा— ‘कैसे हो?’ आप कहेंगे, “महाराज साहेब! ये तो पहले कहा था कि पचास करोड़ मिल जाएं तो बहुत, लेकिन इस ज़माने में पचास करोड़ का क्या मूल्य है? अच्छा फ्लैट और पॉश एरिया (Posh area) में लेने के लिए जाओ, तो बीस-पच्चीस करोड़ लग जाते हैं। अच्छी कार लो… अरे इंटीरियर डेकोरेशन (Interior decoration) में दस-पंद्रह करोड़ लग जाते हैं! तो पचास करोड़ से क्या होगा?” आपकी धारणा बदल जाएगी!

तो ‘सुख संपत्ति से मिलता है? पदार्थों से मिलता है? दोपहर साढ़े बारह बजे भूख लगी है, ज़ोरदार। और श्राविकाजी बड़ी भक्तिमती हैं आपकी। गरम-गरम बाटी और सब्ज़ी तैयार है। आप बैठेंगे, एक-एक रोटी गरम-गरम आपको परोसेगी। चार रोटियां आपने खाईं, फिर पाँचवीं, फिर छठवीं, ‘कोटा पूरा हो गया आज का।’ अब सातवीं रोटी आएगी, तो आप क्या कहेंगे? ‘अब नहीं, अब नहीं चाहिए!’ क्यों? रोटी तो अच्छी है ना? पहली रोटी खाई, कैसा लगा था? कि ‘रोटी से सुख मिलता है।’ अब रोटी से सुख मिलता है, तो पहली रोटी से सुख मिला और सातवीं रोटी से दुःख मिला! वेवईसा के घर पर गए, भोजन-वोजन हो गया, फिर गुलाब जामुन की थाली लेकर आए— “ये तो लेने ही पड़ेंगे, मेरे हाथ से।” एक गुलाब जामुन, दूसरा, तीसरा… फिर आप क्या कहेंगे? “अरे! अब नहीं, अब नहीं चलेगा।” तो पहले तो गुलाब जामुन बहुत अच्छे लगे थे, वही गुलाब जामुन! तो क्या बदल गया? गुलाब जामुन बदल गए या तुम बदल गए? कौन बदला?

तो अब आपको ख्याल आया? रोटी से या गुलाब जामुन से सुख नहीं मिलता है, लेकिन भूख का जो दुःख था, वो दुःख ख़त्म होता है। होता है दुःख ख़त्म, और आपकी भ्रमणा यह होती है कि ‘मुझे सुख मिला!’ तो रोटी में, गुलाब जामुन में, आप निश्चित कर लेते हो। ठंड लग रही, एक ब्लैंकेट ओढ़ाया, अच्छा लगा। दूसरा ब्लैंकेट ओढ़ाया, अच्छा लगा। दस-बारह ब्लैंकेट ओढ़ा दें तो? क्यों? ब्लैंकेट अच्छे हैं? यदि ब्लैंकेट अच्छे हैं, तो जितने ब्लैंकेट ज़्यादा ओढ़ेंगे, उतना सुख ज़्यादा होगा। मैं आपके पक्ष में हूँ! मैं आपके पक्ष में हूँ अभी! कि ब्लैंकेट ओढ़ने से सुख मिलता है, तो जितने ब्लैंकेट ज़्यादा ओढ़ेंगे, उतना सुख ज़्यादा होना चाहिए। क्यों नहीं होता है? तो बात यही हुई कि ब्लैंकेट ओढ़ने से सुख नहीं मिलता है, लेकिन जो ठंड का दुःख था, वो दुःख टलता है। तो दुःख कम हुआ, आपने भ्रमणा कर ली कि ‘सुख मिला!’ तो रोटी से सुख नहीं मिलता।

अब आप किनके पक्ष में हैं? मेरे पक्ष में, या संसार के पक्ष में हैं? अब किसके पक्ष में हैं? “जितनी रोटी ज़्यादा खाएंगे, उतना सुख ज़्यादा?” बोलो। नहीं? तो ‘रोटी से सुख मिलता है’, यह बात आपकी नहीं ना? ‘कंबल ओढ़ने से सुख मिलता है’, यह बात आपकी नहीं,  तो ‘संपत्ति जितनी ज़्यादा हो, उतना सुख ज़्यादा है’, ये भी आपकी मान्यता है? नहीं। तो तो हमारे पक्ष में आ गए! तो अच्छा ही हुआ। यदि आप हमारे पक्ष में आ गए विचार से, तो क्या होगा? आप सुखी ही होंगे। ‘जितना कम है, उतना सुख ज़्यादा!’

हमने तो अरबपतियों को देखा है, रात को चैन से नींद नहीं ले सकते। रात को कॉलबेल (Call bell) की आवाज़ आए… “आईटी (Income Tax) वाले आए, ईडी (ED) वाले आए, कौन आया है?” अब तो दो ही मेहमान आपके घर पर आते रहते हैं— ईडी वाले और आईटी वाले! आप श्रीमंत हैं, तो दो मेहमान आपके घर पर रोज़ आएंगे— आईटी वाले और ईडी वाले! कॉलबेल की आवाज़ आए, “अरे कौन आया? आईटी वाला आया, ईडी वाला आया, कौन आया?” और हमारा उपाश्रय खुला ही रहता है। बंद भी नहीं करते हैं। ‘जिसको भी आना हो, आ जाओ! तलाश कर लो, कुछ यहाँ है नहीं!’ तो आज मुझे ये बात करनी है कि वैचारिक रूप से आप किस पक्ष में हैं। संसार में हैं, संपत्ति चाहिए, मैं मानता हूँ। लेकिन वैचारिक रूप से आप किस पक्ष में हैं? “जितनी संपत्ति ज़्यादा, उतना सुख ज़्यादा?” ऐसी तो आपकी कोई धारणा नहीं है ना? अभी तक थी, आज तो नहीं है ना? नवकारशी करके आए हैं ना? चाय-पानी पी कर आए हैं ना? अब आपकी धारणा क्या है?

पुरानी एक घटना आती है। एक सम्राट, उसका राज्य छोटा था। उसके पास में एक बड़ा राज्य था। दूसरी ओर भी दूसरा बड़ा राज्य था, तीसरी ओर भी तीसरा बड़ा राज्य था। तो ये सम्राट रोज़ इंफिरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स (Inferiority complex – हीन भावना) में रहता कि ‘मेरे पास तो कुछ नहीं है। राज्य तो उन लोगों के पास है, कितना बड़ा राज्य! मेरे पास तो कुछ नहीं है।’ ऐसे में एक हिंदू सद्गुरु नगर में पधारे। राजा भी प्रवचन में गया। राजा को प्रवचन अच्छा लगा। प्रवचन के बाद सब लोग बिखर गए, सम्राट गुरु के पास बैठा रहा। और सम्राट ने गुरु से कहा कि, “गुरुदेव! मैं दुःखी हूँ।” “अरे तू दुःखी? सम्राट है, फिर भी दुःखी? क्यों दुःखी है?” “मेरा राज्य तो छोटा है। देखो ना, इन लोगों का कितना बड़ा-बड़ा राज्य है!”

गुरु ने सोचा कि ‘अभी मैं त्याग की बात करूँगा ना, तो सम्राट कपड़े खंखेर कर रवाना हो जाएगा!’ तो संत ने कहा, “हाँ, तेरी बात तो ठीक है। तेरा छोटा राज्य है, तो थोड़ा बड़ा राज्य तो होना ही चाहिए। ऐसा कर तू, सेना लेकर चल पड़। और जो दुश्मन राजा निर्बल है, उस पर टूट पड़। उसके राज्य का थोड़ा भाग को तेरे राज्य में सम्मिलित कर ले।” सम्राट को हुआ— ‘ये गुरु, सच्चे गुरु! आपको तो अच्छा है कि परंपरा से त्याग की बातें सुनने को मिली हैं कि हमारे गुरु त्यागी ही होते हैं और त्याग में ही सुख है!’

सम्राट सेना लेकर गया। एक राजा थोड़ा निर्बल था, उसका सैन्य इतना बड़ा नहीं था। वहाँ हल्ला मचा दिया और उसके राज्य का थोड़ा हिस्सा अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। अब राज्य थोड़ा बड़ा हुआ, अब सुख भी बढ़ गया! ‘राज्य बढ़ा, तो सुख भी बढ़ा ना?’ लेकिन हुआ क्या? सेना के ज़ोर से उस प्रदेश को अपने राज्य में खींच लिया था, लेकिन वे लोग जो थे, उस राजा के राज्य में सुखी थे। और ये जो सम्राट था, उसके टैक्सेज़ (Taxes) बहुत थे। तो प्रजा हैरान हो गई। प्रजा हैरान हो गई तो फिर प्रजा राजा के सामने पड़ी।

अब सम्राट को हुआ कि ‘अभी भी सुख नहीं मिला।’ फिर संत के पास गया— “बापजी! अभी सुखी नहीं हुआ।” “अच्छा-अच्छा! इतना साम्राज्य तूने बढ़ाया, वो तो देखा?” उसने कहा, “इतना बढ़ाया।” “ओह! पूर्व दिशा में इतना बढ़ाया, तो पश्चिम में क्यों नहीं बढ़ाया? अब पश्चिम में जा।” सम्राट को लगा, ‘हाँ, गुरु तो सच्चे गुरु!’ पश्चिम में सीमा बढ़ाई। सीमा तो बढ़ गई, लेकिन दुःख भी बढ़ गया। अब सम्राट को हुआ कि जैसे-जैसे प्रदेश बढ़ता गया, एसे-एसे पीड़ा बढ़ती गई। अब गुरु के पास आया— “साहेब! आपने दवाई तो दी, लेकिन ज्यों-ज्यों दवाई ली, दर्द बढ़ता गया।”

तब गुरु ने कहा— “अब तू ठिकाने पर आया! कहीं राज्य बढ़ने से सुख बढ़ता है? संपत्ति बढ़ने से सुख कहीं बढ़ता है? तुझे सचमुच सुखी बनना हो, तो मेरे पास आ जा। इस झोंपड़ी में रह जा। तेरा महल छोड़ दे। मेरी झोंपड़ी में आ जा, सुखी हो जाएगा।”

अपन आज ये बात करते थे कि सिद्धार्थ महाराजा! नाम भी कितना प्यारा है— सिद्धार्थ! यानी कि ‘साक्षी’। जो केवल साक्षी हो गया, दृष्टा हो गया। Doing जिसका ख़र गया। कुछ करना नहीं है। करेंगे प्रभु, करेंगे सद्गुरु, हम तो आनंद में झूमेंगे!

तो गुरु ने उस भिक्षुक को कहा कि, “थोड़ी विधि करनी पड़ेगी, मैं तुझे भोजन खिलाऊँगा।” “अरे, विधि कर दो!” तुरंत मुंडन करवाया, दीक्षा की विधि कराई, प्रभु के दर्शन कराए, पच्चक्खाण पराया और वापरने के लिए बैठा दिया। और गुरु स्वयं परोसें— “ले, खा। ले, खा।” भोजन किया। कितने दिनों से भूखा था! आज भरपेट भोजन हुआ। तो भरपेट भोजन होता है, इसके बाद क्या इच्छा होती है? सोने की इच्छा होती है। तो भिक्षुक महाराज सो गए! शाम को उठे, पानी पिया, पडिलेहण  किया, सब विधियां हुईं।

रात को जब प्रतिक्रमण का समय हुआ, करोड़पति-अरबपति श्रेष्ठी अपने रथ ले-लेकर उपाश्रय के पास आते हैं प्रतिक्रमण करने के लिए। प्रतिक्रमण पूर्ण हुआ और सबको मालूम हुआ कि आज जो भिक्षुक महाराज ने दीक्षा ली है, उसके पेट में थोड़ा दर्द है। मुझे तो उस साधु-संघ की, साध्वी-संघ की और श्रावक-श्राविका संघ की ईर्ष्या आती है! दोपहर साढ़े बारह बजे गुरुदेव ने दीक्षा दी, पूरी नगरी में समाचार फैल गए कि हमारे वहाँ जो भिक्षुक भिक्षा माँगने के लिए आता था, गुरुदेव ने उसको दीक्षा दे दी।

एक भी श्रावक की कमेंट (Comment – टिप्पणी) यह नहीं थी कि “जिसको नमस्कार महामंत्र भी नहीं आता है, उसको दीक्षा? गुरुदेव कैसे दीक्षा दे सकते हैं?” ऐसा विचार भी किसी को नहीं आया। ना किसी की कमेंट आई। एक ही बात— “गुरुदेव ने जो भी किया होगा, वो सही ही होगा।” गुरुदेव के प्रति समर्पण! ये समर्पण कब आता है? जब साक्षी-भाव आता है, तब आता है। जब तक साक्षी-भाव नहीं आता है, तुम्हारा कर्तापन जब तक विदा नहीं लेता है, तब तक ये समर्पण-भाव नहीं आ सकता है। एक भी श्रावक और एक भी श्राविका के मन में ये विचार नहीं आया कि गुरुदेव ने इसे क्यों दीक्षा दी। क्या गुरुदेव के शिष्य कम थे कि ऐसे भिक्षुक को दीक्षा देनी पड़ी? नहीं। ‘गुरुदेव ने जो भी किया होगा, वो सही ही होगा।’ हम मानते हैं कि साधु-साध्वियों के मन में तो गुरुदेव के कोई भी कृत्य के प्रति शंका ना उठे। बरोबर? सुनते हो ना बरोबर? साधु-साध्वियों के मन में तो गुरुदेव के किसी भी कृत्य के प्रति मन में अश्रद्धा नहीं होती। लेकिन ये श्रावक और श्राविकाएं संसार में रहते थे, लेकिन कितने समर्पित थे कि ‘गुरुदेव ने जो भी किया है, वो ठीक ही किया है।’

उत्तराध्ययन सूत्र में, पहले अध्ययन में, पहले गाथा (सूत्र) में प्रभु ने अपनी साधना-पद्धति की बात की। प्रभु की साधना क्या है? साक्षी-भाव + समर्पण। मैंने साक्षी-भाव की बात कही— “तुम साक्षी हो जाओ!” लेकिन समर्पण यदि नहीं होगा, अकेला साक्षी-भाव होगा, तो अकेला साक्षी-भाव भी शुष्क हो जाएगा। और शायद पिछले द्वार से अहंकार प्रविष्ट हो जाएगा— “मैं साक्षी-भाव के शिखर पर आ गया। साक्षी-भाव मैंने प्राप्त किया”, उसका भी अहंकार आ जाएगा! लेकिन जब समर्पण होगा साथ में, तब अहंकार नहीं आएगा— ‘प्रभु की कृपा से हुआ। सद्गुरु के प्रेम से हुआ। मैंने कुछ नहीं किया।’

आज मासक्षमण में तीसरे अठ्ठम का पच्चक्खाण। मासखमण सरल भी है, कठिनतम भी है। इज़ीएस्ट (Easiest) भी है, और टफेस्ट (Toughest) भी है। इज़ीएस्ट! मुझे करना ही नहीं, प्रभु करवाते हैं। कल मैं आदिनाथ संघ में गया था। वहाँ हमारे एक मुनिराज हैं, सोलह-सत्रह की उम्र में मासक्षमण कर रहे हैं। और उनकी संसारी बहन-साध्वीजी, अठारह-उन्नीस साल की, वो भी मासक्षमण कर रही हैं। लेकिन दोनों के चेहरे पर जो आनंद देखा! तुम तीन बार भोजन लेते हो— नाश्ता, डिनर (Dinner), सपर (Supper), लेकिन जो फ्रेशनेस तुम्हारे फेस (Face) पर नहीं है, उतनी फ्रेशनेस उनके फेस पर है। एक ही बात, “गुरुदेव! हम कहाँ कर रहे हैं, ये तो प्रभु करवा रहे हैं! ये तो आप करवा रहे हो। हम नहीं करते। हम करने के लिए जाएं तो एक उपवास भी हमारे लिए टफेस्ट हो जाएगा। लेकिन प्रभु करवाते हैं, सद्गुरु करवाते हैं, तो मासक्षमण भी इज़ीएस्ट हो जाएगा!”

तो जो भी तपस्विनी बहनें, जो भी तपस्वी भाई मासक्षमण में आगे बढ़ रहे हैं, उनको प्रभु की ओर से खूब-खूब मंगलकामना, आशीर्वाद। प्रभु कह रहे हैं— “तुम आगे बढ़ो। कोई चिंता मत करो। तुम्हें कुछ करना ही नहीं है।” चिंतामणि दादा कह रहे हैं, गोड़ीजी दादा कह रहे हैं, “मैं सब कुछ देख रहा हूँ। तुम्हें कुछ करना नहीं है। तुम तो केवल मन में विचार करो कि मुझे मासक्षमण करना है।” सिर्फ तुम्हारा विचार! विचार तुम्हारा, कृत्य प्रभु का— ये साक्षी-भाव! जब कृत्य तुम्हारा हो गया, तो तुम कर्ता हो गए, साक्षी ना रहे। साक्षी का मतलब यही है— कृत्य तुम्हारा नहीं है, कृत्य प्रभु का है। सब प्रभु करवा रहे हैं।

मैं कभी नहीं कहता हूँ कि मैंने दीक्षा ली। मैं यही कहूँगा कि प्रभु ने मुझे दीक्षा दी। ये प्रभु के मार्ग पर एक डग भरना मेरे लिए कोई सुकर कार्य नहीं था, लेकिन प्रभु ने मुझे उचक लिया। हम नहीं चल पाते हैं, तो क्या? प्रभु उचकने के लिए तैयार बैठे हैं। प्रभु हमारी माँ हैं। बच्चा थक गया, माँ क्या करेगी? उचक लेगी। तो सिर्फ मासक्षमण का विचार तुम्हें करना है, मासक्षमण का कृत्य प्रभु कराएंगे। अब छह दिन तो हो गए। अब पित्त का, वोमिटिंग (Vomiting) का, वो सब समय गया। दो-तीन दिन तो शरीर जो है ना, वो भी तुम्हारे सामने पड़ता है— ‘आ जाओ!’ तुम्हारी इच्छा तो है मासक्षमण की, लेकिन मैं शरीर हूँ, मैं नहीं करने दूँगा। लेकिन अब शरीर के पार तुम निकल गए, अब प्रभु के प्रदेश में तुम आ गए। अब तो आठ अठ्ठम बाकी रहे! कितने? “मासक्षमण”— वो बहुत भारी लगता है। “आठ अठ्ठम करना है!” बोलो! दो अठ्ठम हो गए, आठ अठ्ठम करने हैं। तो आज भी अठ्ठम का पच्चक्खाण लेने का है।

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