संत हृदय नवनीत समाना
संतों की एक Identity है, एक पहचान : संत हृदय नवनीत समाना। उनका हृदय मक्खन जैसा कोमल-कोमल होता है। प्रभु का प्रेम जिन्हें मिला, उनका हृदय तो कोमल ही होगा! आपको भी अगर प्रभु का ध्यान करना है, तो आपका हृदय भी कोमल होना चाहिए।
हमारे यहाँ भारत में Heart का अर्थ सिर्फ Blood Pumping Machine नहीं है! भारत में हृदय की व्याख्या है – जो संवेदनाओं को ले सके और दे सके। संवेदनाओं के आदान-प्रदान का जो तंत्र है, उसको हमारे भारत में हम हृदय कहते हैं।
यदि हृदय में परमात्मा की प्रतिष्ठा न हुई, तो हमारा यह जन्म Meaningless है, निरर्थक है। यह जन्म सार्थक तभी होता है, जब हमारे हृदय में प्रभु की प्रतिष्ठा हो जाए। और प्रभु के आते ही मन पूर्ण हो जाता है; कोई अपूर्णता नहीं रह जाती।
एक भक्त ने नारद ऋषि से पूछा था कि, “गुरुदेव! आपने प्रभु के प्रेम का अनुभव किया है। आप इस प्रेम की बात तो थोड़ी करें।” उस समय नारद ऋषि ने कहा—
“अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्।“
परमात्मा का जो प्रेम है, उसका मैंने अनुभव किया है, लेकिन उस अनुभव की अभिव्यक्ति देने में, मैं असमर्थ हूँ। हमारी भाषा में हम कहें तो नारद ऋषि ने कहा, “I can’t say it, but you can experience it. मैं उस अनुभव को शब्दों में ढाल नहीं सकता हूँ। शब्द में रूपांतरित नहीं कर सकता हूँ, लेकिन उस अनुभव को तुम खुद प्राप्त कर सकते हो।” ‘अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्!’
और बाद में एप्रोप्रियेट (Appropriate) एग्ज़ाम्पल (Example) दिया— ‘मूकास्वादनवत्।‘ इस सूत्र का अनुवाद कबीरजी ने किया है— “गूँगे केरी शर्करा!” स्पीचलेस (Speechless) आदमी जो बोल नहीं सकता है, उसने शक्कर खाई। आप पूछेंगे शक्कर कैसी लगी, वो क्या कहेगा? He is a speechless person, how can he say? तो परमात्मा का जो प्रेम है, उसका अनुभव हम कर सकते हैं, लेकिन उस अनुभव को शब्दों में कहने की शक्ति, ताकत हमारे पास नहीं है।
और बाद में नारद ऋषि ने कहा— “प्रकाशते क्वापि पात्रे।“ जब हमारी पात्रता डेवलप (Develop) हो जाती है, तब परमात्मा का प्रेम हमारे भीतर अवतरित होता है। तो इस जन्म में हमारा अवतार कृत्य एक ही है कि हम परमात्मा के प्रेम का अनुभव करें और परमात्मा के प्रेम से हृदय को भर दें। फिर क्या होगा?
“पूरन मन पूरन सब दीसे।“
वो हृदय परिपूर्ण हो जाएगा। मन परिपूर्ण, हृदय परिपूर्ण, अस्तित्व परिपूर्ण! और जब मन पूर्ण हो गया, तो पूरी दुनिया पूर्ण हो गई। आपको कहीं भी अपूर्णता का अनुभव नहीं होता है। किसी भी व्यक्ति को आप देखो, आपको लगेगा कि ये तो पूर्ण हैं।
हिमालय में एक यात्री गण यात्रा के लिए जा रहा था। रास्ते के पास एक छोटी सी गुहा थी और उसमें एक संत बैठे हुए थे। तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है— “संत हृदय नवनीत समाना।“ संतों की एक आइडेंटिटी (Identity), एक पहचान – संत हृदय नवनीत समाना। संतों का हृदय नवनीत जैसा, मक्खन जैसा कोमल-कोमल होता है। जिसका हृदय कोमल हो गया, वो संत। और इसी संदर्भ में महोपाध्याय यशोविजय महाराज ने स्तवना में लिखा— “हृदय कमल में ध्यान धरत हूँ।” मैं प्रभु का ध्यान कब कर सकता हूँ? जब मेरा हृदय कमल जैसा कोमल हो जाता है, तभी मैं प्रभु का ध्यान कर सकता हूँ। जब तक मेरा हृदय कोमल नहीं होगा, तब तक प्रभु मेरे हृदय में अवतरित नहीं होंगे। प्रभु को हृदय में उतारना है, तो हृदय को कोमल-कोमल बनाना होगा। तो संत हृदय नवनीत समाना, संतों का हृदय मक्खन जैसा, कमल जैसा कोमल-कोमल होता है।
हमारे यहाँ भारत में ‘हार्ट’ (Heart) का अर्थ ‘ब्लड पंपिंग मशीन’ (Blood Pumping Machine) नहीं है। Heart – ‘हृदय’ अर्थात् ‘ब्लड पंपिंग मशीन’, ये तो अमेरिका की बात है, यूरोप की बात है। हमारे भारत की बात नहीं है। भारत में हृदय की व्याख्या अलग है। संवेदनाओं को जो ले सके और दे सके, वो हृदय। संवेदनाओं के आदान-प्रदान का जो तंत्र है, उसको हमारे भारत में हम हृदय कहते हैं।
एक मिल मालिक (Mill Owner) था। बहुत ही कठोर हृदय का आदमी। कोई भी कर्मचारी हो, एक दिन छुट्टी ली तो सैलरी (Salary) कट गई! बहुत ही कठोर हृदय का आदमी। एक दिन रात को उसे अटैक (Attack) आया और अटैक में मिल मालिक एक्सपायर्ड (Expired) हो गया। सुबह एक कर्मचारी ने दूसरे कर्मचारी से पूछा कि, “हमारे मालिक कैसे एक्सपायर्ड हो गए?” तब दूसरे ने कहा कि, “हार्ट अटैक हो गया, हार्ट बंद हो गया।” तब पहले कर्मचारी ने पूछा, “क्या उनके पास हार्ट था? उनके पास हार्ट था?”
एक गाँव में रहने वाला आदमी, गाँव में बिज़नेस (Business) नहीं चलता था तो शहर में गया। शहर में घर किराए पर लिया। बिज़नेस चालू किया, लेकिन बिज़नेस जमता नहीं। महीना पूरा हुआ। मकान मालिक ने कहा, “चलो, किराए का पैसा दे दो।” उस आदमी ने कहा, “साहब, एक खानदान आदमी हूँ। एक-दो महीने में आपके किराए का पैसा दे दूँगा। अभी धंधा जम नहीं रहा।” मकान मालिक ने कहा, “मैं कोई दूसरी बात सुनने वाला नहीं हूँ। रात १२ बजे तक किराए का पैसा जमा कराओ, वरना तुम्हारा सामान रोड पर फेंक दिया जाएगा। तुम्हें घर से बाहर फेंक देंगे हम!” अब वह संबंधियों के पास से पैसा लेकर आया। मकान मालिक को दे भी दिया। दूसरे महीने धंधा जम गया। फिर तो किराये का पैसा पहले से दे देता।
ऐसे में नाग पंचमी आई। वह हिंदू आदमी था, जब गाँव में रहता था तब दूध का गिलास लेकर जंगल में जाता था और साँप को दूध पिलाता था। अब शहर में साँप कहाँ ढूँढता? लेकिन एक विचार आया और सुबह दूध को उबाला, शक्कर डाला, बादाम-पिस्ता डाला और मकान मालिक के घर पर गया, प्रणाम किया। उसने कहा, “साहब, आज तो ये दूध लाया हूँ, आप पियो, मजे से।” मकान मालिक ने सोचा, ‘जैसा मेरा एक्शन (Action) ऐसा ही रिएक्शन (Reaction) होता है ना! मैंने उससे बदतमीजी ही की है, तो सारा दूध में ज़हर डालकर तो नहीं लाया होगा?’ मकान मालिक ने कहा, “दूध? दूध क्यों?” अरे साहब पियो! दूध में कुछ दूसरा नहीं डाला है। बादाम डाली है, पिस्ता है, शक्कर है। दूसरा कुछ नहीं। आप आराम से पियो। लेकिन मकान मालिक ने पूछा, “आज दूध क्यों?” वो आदमी मन में बोलता है कि ‘आज नाग पंचमी है। नाग तो शहर में कहाँ मिलेगा? तू नाग के बाप जैसा है! तुझे दूध पिला दूँ तो मेरी नाग पंचमी उजवी जाए (मना ली जाए)!’
मनुष्य के दो रूप हैं। मनुष्य देव भी बन सकता है, राक्षस भी बन सकता है। Choice is yours. तुम परोपकार के कार्य करो, लोगों की सेवा करो, तुम देव के रूप में प्रतिष्ठित होगे। और तुम दूसरों को पीड़ा ही दोगे, तो राक्षस के रूप में प्रतिष्ठित होगे। चॉइस इज़ योर्स! लेकिन संत के लिए तो निश्चित है— ‘संत हृदय नवनीत समाना।’ संतों का हृदय मक्खन जैसा कोमल-कोमल होता है। क्योंकि प्रभु का प्रेम उन पर बरसा है। और प्रभु का प्रेम जिन्हें मिला, उनका हृदय तो कोमल-कोमल ही होगा।
हमारे पास आपको क्या मिलेगा? सिर्फ प्रेम। ये शब्द तो आपको खींचने के लिए एक बहाना हैं। मैं कहूँगा मैं प्रवचन दूँगा, तो आप आएंगे। लेकिन मुझे शब्द नहीं देने, मुझे प्रभु के प्रेम का अनुभव आपको कराना है कि तुम्हारा जीवन एक ही लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ना चाहिए, और वह लक्ष्य है प्रभु के प्रेम को पाना।
तो यात्री गण ने देखा कि छोटी सी गुफा में संत विराजमान हैं। गए वहाँ, प्रणाम किया। एक प्रश्न हुआ कि ‘हिमालय में तो बड़ी-बड़ी गुफाएं बहुत हैं। तो इतनी छोटी सी गुफा में संत क्यों बैठे थे?’ इतनी छोटी गुहा थी कि आदमी लंबे पैर करके सो भी ना सके! तो एक यात्री ने पूछा कि, “आप इतनी संकरी गुहा में क्यों?” तब संत ने कहा, “क्यों? बड़ी गुहा का क्या काम है? मैं और मेरे भगवान, दो तो यहाँ रहते हैं। फिर तीसरे का काम भी क्या है?”
ये पूर्ण मन था। बड़ी गुहा, उससे बड़ी गुहा, उससे बड़ी गुहा… क्या करूँ? छोटी गुहा मिल गई, आराम से रह गए। मैं और मेरे भगवान, दो तो यहाँ रहते हैं। फिर तीसरे का काम भी क्या है? आपका घर है! अच्छा, फिर क्या इच्छा होगी? ये गुरुवार पेठ (Guruwar Peth) में नहीं रहना है, कोंढवा (Kondhwa) में, गंगाधाम टावर (Gangadham Tower) में या हाइड पार्क (Hyde Park) में जाना है! क्यों? जब मन पूर्ण हो गया तो कोई भी घर होगा, अच्छा ही लगेगा। हम जहाँ भी रहते हैं, कोई भी उपाश्रय में हमें उपाश्रय अच्छा ही लगता है। ये तो बड़ा उपाश्रय है। छोटा सा उपाश्रय हो, बिल्कुल छोटा सा हो, हम आराम से रहते हैं। क्योंकि हमारा आनंद उपाश्रय से नहीं आता है। भीतर से आता है।
हम में और आप में फर्क क्या है? ये बताओ। हमारा आनंद हमारे भीतर से आता है। आपका आनंद कहाँ से आता है? बाहर से! बाहर से यानी कि पदार्थों से और व्यक्तियों से। ‘बड़ा घर होना चाहिए। फर्नीचर अच्छा होना चाहिए। टीवी भी स्लिम (Slim) टीवी चाहिए।’ क्या फर्क पड़ता है? Slim टीवी ना हो तो फर्क क्या पड़ता है? लेकिन ये प्रेस्टीज (Prestige) का एक चिह्न बन गया है कि ‘स्लिम टीवी होना चाहिए और बड़ा होना चाहिए। स्क्रीन बड़ी चाहिए।’ तो पदार्थ ऐसे होने चाहिए। और फिर जो संबंधी आएं, वो कहें, “हाँ, घर तो बहुत सुंदर है!” तब आपको लगेगा ‘हाँ, अच्छा घर है।’ तो आपके लिए परिपूर्ण घर कौन सा? दूसरों का सर्टिफिकेट (Certificate) मिले, वो घर पूर्ण! तुम्हारी कोई राय नहीं, तुम्हारा कोई अभिप्राय नहीं, तुम्हारा कोई सर्टिफिकेट नहीं। दूसरों के सर्टिफिकेट पर तुम्हें जीना है।
हम प्रभु के सर्टिफिकेट पर, हमारे गुरुदेव के सर्टिफिकेट पर जीने वाले हैं। तो हमारा आनंद भीतर से आता है। हम कहीं भी होंगे, आनंद में ही होंगे। चातुर्मास पूरा होगा, फिर दो घटना घटेगी। या तो हमारे साथ चलेंगे, नहीं तो साता पूछने के लिए कभी-कभी आएंगे। जब भी आओ, तब देखना हम आनंद में ही होंगे। उपाश्रय के साथ हमारा कोई संबंध नहीं। गाँव छोटा है या बड़ा, उससे हमारा कोई संबंध नहीं। हमारा संबंध भीतर से है। भीतर परमात्मा हैं। और भीतर के परमात्मा के साथ हमारा संबंध जुड़ गया, बस आनंद ही आनंद है!
और आपके हृदय के भीतर भी परमात्मा को मुझे प्रतिष्ठित करना है। जिनालय में तो प्रभु प्रतिष्ठित हैं, लेकिन आपके हृदय में प्रभु की प्रतिष्ठा मुझे करनी है, आप सबके हृदय में… पत्रिका छपवाओगे न? “हमारे हृदय मंदिर में प्रभु की प्रतिष्ठा होने वाली है!” शास्त्रो ने कहा: हिययंमि वीयरागो, न धारीओ हारीओ जम्मो।
यदि हृदय में परमात्मा की प्रतिष्ठा ना हुई, तो ये हमारा जन्म मीनिंगलेस (Meaningless) है, निरर्थक है। हमारा जन्म सार्थक तभी होता है, जब हमारे हृदय में प्रभु की प्रतिष्ठा हो जाए। तो हमारे हृदय में प्रभु की प्रतिष्ठा होगी और हम आनंद में… पूर्ण आनंद! “पूरन मन पूरन सब दीसे।” कहीं भी अपूर्णता हमें लगती ही नहीं। आप पूछेंगे, “महाराज साहब कैसा है? पुणे में कैसा लगा?” हम कहेंगे, “बहुत अच्छा।”
भावकों का पत्र आता है। मैं उत्तर लिखता हूँ। उत्तर में एक बात अवश्य लिखता हूँ कि ‘पुणे वालों का भाव हमारे हृदय को छू गया है। आपके हृदय का भाव हमें छू गया है। आपके हृदय के भावों का स्पर्श हमें मिला है।’ सब साध्वीजी को पूछा, “पुणे कैसा लगा?” सबका अभिप्राय एक ही है कि “साहेब, क्या लोगों का भाव है! अद्भुत भाव है।” तो ये जो भाव आपके पास है, वो आपकी बड़ी संपत्ति है। मैंने पहले भी कहा था कि कोई भी मुनिराज को आप देखेंगे, कोई भी साध्वीजी भगवती को आप देखेंगे, तो आपके हृदय में, आपकी आँखों में अहोभाव छलकेगा— “मेरे प्रभु के वेष परमात्मा मेरे द्वार पर कहाँ से?” आपके घर पर महात्मा पधारते हैं और धर्मलाभ का आशीर्वाद देते हैं, आपका रोम-रोम पुलकित हो जाता है! ‘मेरे घर पर प्रभु के वेष परमात्मा पधार चुके।’ ये अहोभाव आपके पास है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि इतना अहोभाव जिनके पास है, उसके हृदय में प्रभु की प्रतिष्ठा हो सकती ही है।
बस आप निश्चित करो कि, “गुरुदेव, मेरे हृदय में आप प्रभु की प्रतिष्ठा कर दो, हम तैयार हैं।” आप भी तैयार हैं? इतना अहोभाव जो है आपके पास, वो प्रभु को पधारने के लिए पूर्व सज्जता रूप है। प्रभु कब पधारेंगे? जब हमारा हृदय निर्मल होगा तब। इसलिए शास्त्रों में लिखा है कि परम चेतना गुरु चेतना को भेजती है कि, “तुम जाओ और उसके हृदय को निर्मल बनाओ। मुझे वहाँ आना है।” प्रभु तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं। He is waiting for you. और इसलिए प्रभु गुरु चेतना को कहते हैं कि, “तुम जाओ और पुणे वासियों के हृदय को निर्मल बनाओ। मुझे उनके हृदय में अवतरित होना है।”
प्रभु तैयार हैं। हम भी तैयार हैं। और आप भी तैयार हो गए अब। अब तो समयसर आने लगे हो! तो हम भी तैयार, आप भी तैयार और प्रभु तो तैयार हैं ही। तो फिर देर किस बात की? अभी तो तुरंत काम निपटा लो! तो प्रभु की प्रतिष्ठा हृदय में करनी है। आप तो कभी पूछते भी नहीं कि “महाराज साहेब, आप इतने आनंद में हैं, कारण क्या है?” हमारे बाल मुनिराज को पूछो, इतने आनंद में नाचते-घूमते हैं, उनको भी पूछो कि, “आप इतने आनंद में क्यों हैं?” तो कहेंगे, “मुझे प्रभु मिल गए!” और जिन्हें प्रभु मिल गए, वो तो आनंद में ही होगा।
मीरा को प्रभु मिल गए। मीरा आनंद में आ गई। एक दिन मीरा को किसी ने पूछा था कि, “तू इतनी छोटी सी बच्ची और तुझे प्रभु कैसे मिल गए?” आप तो हमें नहीं पूछते, लेकिन मीरा को एक भक्त ने पूछ लिया कि तू इतनी छोटी सी बच्ची और तुझे प्रभु कैसे मिल गए? तब मीरा ने कहा:
अंसुवन सींच सींच प्रेम बेलि बोई।, अंसुवन सींच सींच प्रेम बेलि बोई।
आँसू के घड़े पर घड़े प्रभु के चरणों पर रख दिए, तब प्रभु प्रसन्न हुए और तब प्रभु मुझे मिले। उस भक्त को प्रभु मिलन की अत्यंत तड़पन थी, प्यास थी, तो उसने पूछा कि “चलो आँसू के घड़े के घड़े प्रभु को दे दें, लेकिन कितने घड़े आँसू से प्रभु मिलते हैं?” क्या प्रश्न किया! ‘हम भी दे दें आँसू, प्रभु के चरणों में आँसू की धार बहा दें। लेकिन कितने घड़े आँसू से प्रभु मिलते हैं?’
तब मीरा ने कहा— “जितने घड़े आँसू से तुम्हारा अहंकार विलीन हो जाए, डिलीट (Delete) हो जाए, समाप्त हो जाए, उतने ही आँसू की आवश्यकता है। उसके बाद एक भी ज़्यादा अश्रु बिंदु की आवश्यकता नहीं।” तुम ना रहो, प्रभु आ जाएं। इसलिए मैंने पहले भी कहा था कि तुम्हारा होना ही प्रभु के आने में अवरोध है। तुम सिंहासन पर बैठे हुए हो। प्रभु आएंगे तो बैठेंगे कहाँ? कहाँ बिठाओगे प्रभु को? तुम्हें सिंहासन खाली करना होगा। अहंकार के सिंहासन पर से नीचे उतर जाओ। अहं शून्य हो जाओ। प्रभु ये रहे। प्रभु कहाँ दूर हैं?
एक भक्त ने कहा था— “He is closer to me than myself”. He is closer to me than myself. मेरी जात से, मेरे हृदय से भी प्रभु ज़्यादा नज़दीक मुझसे हैं। प्रभु ये रहे, प्रभु कहाँ दूर हैं? हमारा ना होना, प्रभु का होना। हम केंद्र में नहीं होंगे, प्रभु केंद्र में आ जाएंगे। हमें केंद्र में नहीं रहना है। परिधि में रहना है। प्रभु को केंद्र में बिठा देना है।
गुरुदेव ने प्रसन्न होकर ये रजोहरण हमको दिया। ये रजोहरण जब मिला, तब क्या हुआ? केंद्र से मैं निकल गया। जब रजोहरण मिला, तब केंद्र से मैं निकल गया और केंद्र में प्रभु आकर बैठ गए, हम परिधि में हैं। हमारी नज़र, हमारी दृष्टि सदा प्रभु पर है कि ‘हमारे प्रभु क्या कहते हैं। मेरे प्रभु की आज्ञा क्या है।’ हम यही यूनिफॉर्म (Uniform) पहनेंगे। क्यों? ‘क्योंकि हमारे प्रभु ने कहा है।’ हम ऐसे ही खाएंगे जिस रूप से खाने का हमारे प्रभु ने कहा है। हमारी जीवन की पद्धति ऐसी ही होगी जैसी हमारे भगवान ने बताई है। हमारा पूरा जीवन प्रभु के चरणों में समर्पित हो गया। न्योछावर हो गया। और ये समर्पण का आनंद हमारे पास है।
गुजरात में एक जगह दीक्षा का समारोह था। दीक्षा के कुछ दिन पहले हम उस गाँव में गए थे। वो जो गाँव था वो विलीनीकरण के पहले ‘स्टेट’ था। एक नवाब मुस्लिम राजा उसका शासक था। विलीनीकरण के बाद तो सब भारत के नागरिक हो गए। उस नवाब का जो बेटा था, वो यूनिवर्सिटी (University) में पढ़ा-लिखा था। वो मेरे पास आया और उसने मुझे कहा कि, “साहब, मैंने सभी धर्मों का अभ्यास किया है, लेकिन जैन धर्म का अभ्यास मैंने नहीं किया है। तो मेरी इच्छा है कि जैन धर्म का अभ्यास मैं आपके पास से करूँ। आप मुझे समय देंगे?” मैंने कहा, “ज़रूर।”
रोज़ दोपहर वो आने लगा। मैं ‘जैनोलॉजी’ (Jainology) उसे पढ़ाने लगा। ऐसे करते-करते दीक्षा का दिन आया। तो दीक्षा के दिन सुबह उसने पूछा कि, “साहब, मैं तो नॉन-जैन (Non-Jain) हूँ, मुस्लिम हूँ, तो मैं दीक्षा देखने के लिए आ सकता हूँ?” मैंने कहा, “हाँ तुम आ सकते हो।” वो दीक्षा देखने के लिए आया। बड़े भाव से उसने दीक्षा देखी, क्योंकि उसको ख़याल था कि गाँव के करोड़पति के बेटे और बेटियां दीक्षा लेते हैं। तो उसके मन में जैन धर्म के प्रति गहरा अहोभाव था कि इतनी संपत्ति छोड़कर ये लोग दीक्षा के मार्ग पर जाते हैं।
दीक्षा की पूरी विधि उसने देखी। फिर दोपहर मेरे पास अभ्यास के लिए आया, तो उसने पहला ही प्रश्न मुझे किया कि, “साहब, उस बहन की दीक्षा हुई। जब गुरुदेव ने ये जो है (रजोहरण), वो उस बहन को दिया, तब वो बहन नाच उठी। तो नाचना क्या कोई रिचुअल था? विधि विधान था?” मैंने कहा, “नहीं, वो जो नृत्य था वो विधि-विधान नहीं था, वो अंतर के भाव थे। दो वर्ष से वो बहन गुरुदेव को विनंती करती थी कि ‘गुरुदेव मुझे प्रभु के मार्ग में आप ले जाओ।’ लेकिन जब तक गुरुदेव को उसकी सज्जता नहीं लगी, तब तक गुरुदेव ने प्रभु के मार्ग पर उसे स्वीकृति नहीं दी आने की। आज जब गुरुदेव को लगा कि प्रभु के मार्ग पर जाने के लिए वो सज्ज हो गई है, तब गुरुदेव ने ‘हाँ’ कही और गुरुदेव ने ये रजोहरण दिया, तो वो नाच पड़ी।”
इतना भाव अंतःस्तर में आया कि ‘ओह! प्रभु की प्रसादी मुझे मिल गई। प्रभु की प्रसादी मिल गई!’ वो नाच पड़ी। और मैंने कहा कि, “तुमने तो दो चरणों से, दो पैरों से उसे नाचते हुए देखा । लेकिन वह सिर्फ दो चरणों से नाची हुई नहीं थी। साढ़े तीन करोड़ रोंएं से वो नाची थी! एक-एक रोंआ नृत्य में शामिल था। ‘प्रभु की प्रसादी मुझे मिली!’ इतना आनंद, इतना आनंद! हृदय में इतना आनंद था कि उसे डिस्चार्ज (Discharge) करना ज़रूरी था।” जैसे आघात का आवेग होता है, ऐसा आनंद का भी आवेग होता है। आनंद को भी… घने आनंद को हमारा हृदय सह नहीं पाता है। तो आनंद को भी डिस्चार्ज करना ज़रूरी होता है। तो मैंने कहा कि “यह जो नृत्य था, वो आनंद को डिस्चार्ज करने के लिए था।”
इतना आनंद, इतना आनंद कि ‘प्रभु की प्रसादी मुझे मिल गई।’ हमारे युग के श्रेष्ठ साधक हुए ऋषभदासजी। पन्यासजी भगवंत गुरुदेव भद्रंकर विजय महाराज साहेब के गृहस्थ शिष्य थे। ऋषभदासजी ने एक दिन साधना के आनंद की बात अपने शब्दों में कही। उन्होंने कहा था कि— “एक खमासमण देता हूँ और इतना आनंद भीतर छलकता है कि मुझे चिंता होती है कि मेरा हृदय इस आनंद को सह पाएगा या नहीं सह पाएगा।” एक खमासमण देने में इतना आनंद!
और इसलिए मैंने कहा था पहले कि आपके पास साधना है, लेकिन क्या साधना का आनंद है? आप टिका लगते यहाँ, कपाल तो टीका लगाते समय क्या भाव आते हैं? उस समय ऐसे भाव आने चाहिए… आपकी आँख से आँसू बहें…! “प्रभु ने कैसी कृपा की, अपने धर्मसंघ में मुझे भी स्थान दे दिया।” प्रभु ने ऐसा नहीं कहा कि “जो साधु बन जाए, साध्वी बन जाए, संसार को छोड़ दे, उसको तो मैं मेरे धर्मसंघ में स्थान दूँ, लेकिन जिसको संसार में रहना है और संसार को भोगना है, उसको मेरे धर्मसंघ में मैं कैसे स्थान दूँ?” ऐसा प्रभु ने नहीं कहा। प्रभु ने कहा— “जो श्रावक और जो श्राविका संसार में रहने पर भी मेरी आज्ञा के प्रति उत्सुक है, मेरी आज्ञा के पालन में जिनकी रुचि है, उनको भी मेरे धर्मसंघ में मैं स्थान देता हूँ।”
हम रजोहरण को रोज़ सुबह सिर पर लगाते हैं, और तब हमारी आँखें नम हो जाती हैं कि हमारी कोई सज्जता नहीं, हमारी कोई पात्रता नहीं और ये प्रभु की प्रसादी हमें मिल गई! आप प्रतिक्रमण करते हैं सुबह, सामायिक करते हैं। चरवला और मुँहपत्ती को आप हाथ में लेते हैं, तब भी आपकी आँखें नम होनी चाहिए। आपकी आँख से आँसू बहने चाहिए कि “प्रभु की कैसी कृपा कि प्रभु ने अपने धर्मसंघ में मुझे स्थान दे दिया।”
तो “पूरन मन पूरन सब दीसे।“ मन जब पूर्ण हो जाएगा, तब दुनिया पूर्ण ही है। दुनिया अपूर्ण लगती है क्योंकि तुम अपूर्ण हो। जब तुम्हारा मन पूर्ण होगा, तुम्हारी श्राविका भी तुम्हें पूर्ण लगेगी। तुम्हारे बच्चे भी तुम्हें पूर्ण लगेंगे। किसी के प्रति तुम्हारी शिकायत नहीं होगी।
एक दिन मुझे पूछा गया था प्रवचन में कि, “गुरुदेव, ऐज इज़ द ऐज (Age is the age)। What’s the difference? युग तो आखिर युग है। पहले का युग और आज का युग… फर्क क्या पड़ा?” तब मैंने कहा— “अंतर बहुत पड़ा है। फर्क बहुत पड़ा है।” ५० वर्ष पहले एक श्रावक थे। उनके हृदय में क्या भाव थे? कि ‘मेरी श्राविका मेरे लिए, बच्चों के लिए कितना काम करती है!’ तब आप श्राविका से कहेंगे कि, “शाम को तुझे प्रतिक्रमण के लिए जाना है तो घर काम की चिंता छोड़ देना, मैं कर लूँगा, लेकिन तू प्रतिक्रमण के लिए चली जाना।” बच्चे आपके वहाँ आए हैं। आप सोचेंगे, ‘मेरे वहाँ जैन कुल में ये बच्चे आए हैं। उनको जिनशासन का स्पर्श कैसे कराऊँ?’ बच्चों के हृदय में ये भाव थे: ‘ये मेरे पापा हैं, ये मेरी मम्मी हैं, इनका कितना उपकार है! इनके कारण मैं इस आनंद लोक में आया, मैं प्रभु के शासन में आया।’
तो सबके हृदय में दूसरों के लिए भाव था। पति का पत्नी के लिए, पत्नी का पति के लिए, पिता का बच्चों के लिए, बच्चों का पिता के लिए। आज क्या हुआ? पति कहता है, “पत्नी ने क्या किया मेरे लिए?” और पत्नी कहेगी, “तुमने क्या किया मेरे लिए? अभी तक मेरे लिए कितने गहने तुम लाए? क्या करते हो तुम? बाजू वाले को देखो। कितने गहने आ गए बाजू वाले के पास और मेरे पास एक भी गहना नहीं है। तुम क्या करते हो?” पत्नी पति से शिकायत करती है। पति पत्नी से शिकायत करता है। बच्चे माता और पिता से शिकायत करते हैं: “तुमने क्यों हमें पैदा किया? पैदा कर दिया, फिर हमारी इच्छाओं को तुम परिपूर्ण नहीं कर सकते हो, तो पैदा किस लिए किया तुमने हमें?” सबकी शिकायत एक-दूसरे के लिए!
और ५० वर्ष पहले क्या था? एक-दूसरे का के प्रति प्रेम था। बस इतना ही अंतर हुआ। लेकिन ये दूसरे घरों की बात है। जैन घरों में तो यही वातावरण आज भी होगा, है ना? आपके वहाँ तो कोई शिकायत नहीं है? है शिकायत कोई? कोई शिकायत नहीं है ना? बोलो तो… एक भी शिकायत नहीं… क्यों? ये सब कल्याण मित्र हैं। पति के लिए पत्नी कल्याण मित्र है। पत्नी के लिए पति कल्याण मित्र है। और बच्चे भी कल्याण मित्र हैं। सब कल्याण मित्र हैं आपके लिए। फिर शिकायत कैसी? आनंद ही आनंद है!
तो प्रभु शासन मिला तो मन पूर्ण हो गया। प्रभु मिले, प्रभु का प्रेम मिला, मन पूर्ण हो गया। और मन पूर्ण हो गया तो घर भी पूर्ण और दुनिया भी पूर्ण। सब पूर्ण है। घर में कहीं भी अपूर्णता तुम्हें लगती ही नहीं। “अरे बहुत अच्छा है! हमारे यहाँ तो लोग फुटपाथ पर कितने रहते हैं। भारत में कितने लोग फुटपाथ पर रहते हैं। हमें तो इतना मज़े का आश्रय स्थान मिल गया।” आपका मन पूर्ण ही होगा।
लेकिन अडानी और अंबानी को देखोगे तो? “उसके पास तो ५ लाख करोड़ है। हमारे पास तो ५ करोड़ ही है। अब ५ करोड़ कम हो गए!” तो मन अपूर्ण हो गया, और फुटपाथ वाले को देखो तो? “अरे हमको देखो, हम कितने आनंद में हैं! आनंद ही आनंद। हमारे पास ना घर है, ना खेत है, ना वाड़ी है, कुछ भी नहीं है। एक पैसा नहीं है, लेकिन हम मज़ा में हैं।” तो आप हमें देखेंगे, तो भी आपका मन पूर्ण हो जाएगा।
तो महोपाध्यायजी ने कहा— “पूरन मन पूरन सब दीसे।“ जब मन पूर्ण हो गया, तो दुनिया पूर्ण है, घर भी पूर्ण है। कोई शिकायत रही नहीं। प्रभु ने आपकी सभी शिकायतें ले लीं और आपको आनंद दे दिया। कैसे प्रभु मिले हमें! ये चिंतामणि दादा सब चिंता ले रहे थे, कोई चिंता हमारे पास भी रहती नहीं। दादा को सौंप दो सब। सब दादा को सौंप दो, हम निर्भय रहेंगे। ऐसा प्रभु का शासन मिला है, हम आनंद में रहें!
