*विचारों पर नियंत्रण*
आत्मानुभूति के लिए साधन हैं – मनोविजय, मनोनियंत्रण, मनोलय! जहाँ तक विचारों पर नियंत्रण हमारा स्थापित नहीं होता, आत्मानुभूति शक्य नहीं है। आत्मानुभूति के लिए पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि हम निर्विचार दशा को अभ्यस्त करें।
विचारों को कैसे Off करना यह कला जिसको हस्तगत हो गई, उसके लिए आत्मानुभूति कोई दूर की बात नहीं है। अभी विचारों पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं है। बैठे हो मंदिर में, प्रभु के विचार आने के बदले कोई व्यक्ति के विचार आ जाएँगे। उस व्यक्ति पर प्रेम है तो राग के विचार आएँगे, उस व्यक्ति पर द्वेष है तो क्रोध के विचार आएँगे।
जब विचारों पर हमारा नियंत्रण स्थापित हो जाए, तब हम अशुभ विचारों को Off कर सकते हैं। राग, द्वेष, अहंकार के विचारों में जाना ही नहीं है ऐसा आप नियंत्रण कर सकते हैं। मन पर, विचारों पर नियंत्रण स्थापित हो गया, तो फिर आप स्व में जा सकेंगे।
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराज रचित स्तवना चोवीसी, पहला स्तवन, पहली पंक्ति:
“जगजीवन जगवाल हो, मरुदेवी नो नन्दलाल रे।”
ऋषभदेव परमात्मा की माताजी का नाम मरुदेवा था। पार्श्वनाथ प्रभु की माताजी का नाम वामा माता था। तीर्थंकर भगवंतों के नाम में तो विशेषता होती ही है, प्रभु का नाम मंगलमय होता है। और महोपाध्याय मानविजय महाराज ने कहा कि “प्रभु का नाम उच्चारने पर तुरंत ही प्रभु का अवतरण हमारी चेतना में होता है।” तो तीर्थंकर भगवंतों का नाम तो बहुत ही पुण्यमय है। लेकिन उनके पिता और माता के नाम में भी विशेषता है। और ये विशेषता साधना के संदर्भ में है। ‘वामा’ का अर्थ है मनोविजय।
जहाँ तक विचारों पर नियंत्रण हमारा स्थापित नहीं होता, आत्मानुभूति शक्य नहीं है। आत्मानुभूति के लिए पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि हम निर्विचार दशा को अभ्यस्त करें। विचारों को कैसे ऑफ (Off) करना, यह कला जिसको हस्तगत हो गई, उसके लिए आत्मानुभूति कोई दूर की बात नहीं है। अभी क्या होता है? विचारों पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं है। बैठे हो मंदिर में, प्रभु के विचार आने के बदले कोई व्यक्ति के विचार आ जाएँगे। उस व्यक्ति पर प्रेम है तो राग के विचार आएँगे, उस व्यक्ति पर द्वेष है तो क्रोध के विचार आएँगे। जब विचारों पर हमारा नियंत्रण स्थापित हो जाए, तब हम अशुभ विचारों को ऑफ कर दें— ‘राग में जाना ही नहीं है, द्वेष के विचारों को करना ही नहीं है, अहंकार के विचारों को करना ही नहीं है।’ तो क्या होगा? कि तुम स्व की ओर आगे बढ़ सकेंगे। बाकी तो प्रवचन में बैठे हो, प्रवचनकार महात्मा बहुत ही सरलता से शास्त्र की बातें आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं और आपका मन कहीं-कहीं घूमता रहता है।
ये मन पर, विचारों पर नियंत्रण स्थापित हो गया, फिर आप स्व में जा सकेंगे। तो आत्मानुभूति सरल है। तो आत्मानुभूति के लिए साधन है— मनोविजय, मनोनियंत्रण, मनोलय!
तो ये मनोविजय के बाद जो अनुभूति होती है, उसकी बात मीरा कह रही है। मीरा कहती है कि “मेरे भीतर अनुभूति का दीप सतत प्रज्वलित है। एक क्षण अंधेरा नहीं होता।” अनुभूति का दीप सतत प्रज्वलित होता है। तब किसी ने पूछा कि दीप के लिए तीन सामग्री चाहिए। आपके पास तो अब एक ही सामग्री चाहिए, स्विच (Switch) और ऑन (On) कर दो! लेकिन पुराने ज़माने में तीन चीज़ें चाहिए थीं— एक ग्लास (Glass), दूसरी बाती और तीसरा तेल या घी। ये तीन तुम्हारे पास हैं और दीये को जलाया गया तो दीप प्रज्वलित रहेगा।
बुद्ध भगवान मौन में बैठे थे, ध्यान में, आँखें बंद थीं। एक साधक वहाँ पर आया। ५ मिनट के लिए भगवान बुद्ध के चरणों में वो बैठा। ५ मिनट के बाद तुरंत वह खड़ा हुआ और बुद्ध से कहा, “प्रभु! आपका बहुत-बहुत आभार, आपने मुझे बहुत दिया।” और वह चल पड़ा।
पट्टशिष्य आनंद पास में बैठे थे, उन्हें विचार हुआ कि ‘बुद्ध भगवान तो ध्यान में बैठे हैं, एक शब्द भी बोले नहीं हैं, आँखें भी खोली नहीं हैं, तो उस व्यक्ति ने आभार कौन सी प्रक्रिया के लिए माना?’
जब बुद्ध का ध्यान पूरा हुआ, तब आनंद ने बुद्ध से पूछा कि, “प्रभु! वो व्यक्ति आपके पास आया था, ५ मिनट बैठा था और बाद में आपका खूब-खूब आभार मानकर वो चल पड़ा था, तो आपने उसे क्या दिया था?”
आप भी यहाँ चूक जाते हो! गुरु महाराज के पास गए, गुरु महाराज ने दो शब्द भी कहे… अरे! शब्द तो बहुत ही स्थूल घटना है। सद्गुरु की देह में से जो पावन ऊर्जा हर क्षण बिखर रही है, उस ऊर्जा को प्राप्त करना यही बड़ी बात है। सद्गुरु के पास बैठो, सिर्फ़ बैठो, शब्द तो प्रवचन में मिल जाएँगे, बाकी बैठो! गुरु की ऊर्जा में बैठो। आप न्यूट्रल (Neutral) होंगे, वेकेंट (Vacant) होकर आए होंगे, तो सद्गुरु की ऊर्जा से आपका हृदय भर जाएगा।
तो बुद्ध ने कहा कि, “वो आदमी ५ मिनट बैठा था, उसके पास ग्लास था, बाती तैयार थी, तेल भी ग्लास में भरा हुआ था। अब उसे आवश्यकता एक जीवंत दीये की थी। या तो दीयासलाई सुलगाओ, दीयासलाई नहीं है तो जीवंत दीप के पास जाओ, और तुम्हारी बाती जीवंत दीप से टच (Touch) करो, तुम्हारी बाती जल उठे, तुम चल पड़ो।” तो बुद्ध ने कहा कि, “मेरे पास ५ मिनट वो बैठा, उसका दीया जल उठा, वो चल पड़ा।”
तो इस संदर्भ में मीरा कहती है:
“सुरत निरत को दिवलो जोयो, मनसा पूरन बाती।”
“अगम घाणी को तेल सिंचायो, बाल रही दिन-राती॥”
‘बाल रही दिन-राती’— दिवस और रात, ये दीप अब जल ही रहा है, जल ही रहा है। तो ग्लास क्या है? “सुरत निरत को दिवलो जोयो।” सुरति और निरति, ये दो शब्द योगियों की परंपरा के हैं। सुरति-निरति का बहुत अर्थघटन हुआ है, लेकिन अपने संदर्भ में हम सुरति का अर्थ करेंगे— स्मृति और निरति का अर्थ करेंगे— निरंतर। तो ग्लास क्या है? पहले मिट्टी का दीपाधार आता था, अब ग्लास आता है, कोई फ़र्क नहीं है। तो निरंतर प्रभु की स्मृति, एक ग्लास है, जिसमें तेल भी रहेगा, बाती भी रहेगी। बिना ग्लास, तेल कहाँ रहे? बाती कहाँ रहे? तो “सुरत निरत को दिवलो जोयो”— निरंतर स्मृति!
चंदनाजी ने क्या कहा था? प्रभु जब पीछे लौट गए चंदनाजी के द्वार से, चंदनाजी रोती नहीं थीं। प्रभु का अभिग्रह पूर्ण नहीं हुआ, प्रभु लौट पड़े, तब चंदनाजी सिसक-सिसक कर रोने लगीं। और उस समय चंदनाजी ने जो कहा था, वो शब्द वीरविजय महाराज १२ व्रत की पूजा में कोट (Quote) करके लाए। क्या कहा था चंदनाजी ने?
“एक श्वास मांहि सौ वार समरूँ तमने…”
“प्रभु! एक श्वास पर एक बार नहीं, एक श्वास पर १०० बार तुम्हारा सुमिरन मैं करती हूँ! आप मेरे द्वार से ऐसे लौट सकते हैं?”
एक श्वास पर १०० बार सुमिरन! कैसे हो सकता है? श्वास लिया, श्वास छोड़ा, एक साइकिल (Cycle) श्वास की हुई। तो इसमें तो आधा सेकंड (Second) भी नहीं लगता। उतने समय में चंदनाजी कहती हैं, “मैं १०० बार प्रभु का सुमिरन करती हूँ।” बस, वीर… वीर… वीर… वीर… भीतर एक गुंजन निरंतर चालू रहता है। किसी की याद नहीं है, सिर्फ़ स्मृति प्रभु की है। हमारी तो तकलीफ़ बड़ी है, कितने-कितनों की स्मृति करने की है! वहाँ प्रभु कब याद आएँगे? ‘बेटा परदेस गया है अब्रॉड (Abroad) पढ़ने के लिए, उसकी याद आती है। बेटी अमेरिका (America) में दामाद के साथ रहती है, उसकी याद आती है।’ किस-किसकी याद आती है तुम्हें?
सिर्फ़ प्रभु की ही नहीं आती! इसलिए सूरदासजी ने कहा:
“जिन तनु दियो सो ही बिसरायो, ऐसो निमक हरामी।”
“प्रभु! तूने मुझे इस संसार में भेजा है…” मम्मी-पापा ने हमें इनवाइट (Invite) नहीं किया था कि ‘बेटा, तू ही आना!’ पसंदगी हुई थी मम्मी-पापा द्वारा? प्रभु ने तय किया था, हमारे पुण्य ने तय किया था कि हम कहाँ जाएँगे। तो सूरदासजी कहते हैं, “जिन तनु दियो सो ही बिसरायो” जिसने मुझे शरीर देकर इस संसार में भेजा, उस प्रभु को भी मैं भूल गया! “कैसो निमक हरामी” मेरे जैसा निकम्मा, अधम, निमकहरामी आदमी कौन होगा?” क्या प्रभु को हम भूल सकते हैं? श्वास लेना भूल जाते हैं? नींद में भी श्वास चालू होता है। और श्वास बंद हो जाए तो हम मर जाएँ! तो चंदनाजी की बात कितनी न्यारी थी कि श्वास एक बार, सुमिरन १०० बार! श्वास से सुमिरन १०० गुना ज़्यादा! हमारी श्वास कितनी और सुमिरन कितना? बोलो! प्रभु को कब-कब याद करते हैं, बोलो!
लोग कहते हैं, “सुखे समरे सोनी, दुःखे समरे राम!” सुख के समय में सोनी को याद करेंगे— गहने-वहने घड़वा लो! और दुःख के क्षणों में भगवान को याद करेंगे। आज एक बात याद कर लो, याद रख लो कि सुख के हर एक क्षण पर प्रभु का सिग्नेचर (Signature) है। सुख का एक क्षण भी प्रभु की कृपा बिना हम तक नहीं आ सकता। तो हम सुखी हैं, आनंद में हैं, मज़ा में हैं, कारण क्या?
मासक्षमण के तपस्वियों को पूछेंगे, “साता में हो?”
क्या कहेंगे? “देव-गुरु पसाय!”
“देव-गुरु पसाय” कहेंगे। और पारणे के बाद क्या कहेंगे? “ज्यूस पसाय!”
नहीं, उस समय भी देव-गुरु पसाय ही होगा। प्रभु की कृपा, सद्गुरु की कृपा, कि हम आनंद में हैं।
समझो कि पुण्य के उदय से पैसे मिल गए, पैसे मिल गए, लेकिन हो गया डायबिटीज़ (Diabetes)! और वो भी इतना तेज़ कि डॉक्टर (Doctor) ने कह दिया, “शुगर (Sugar) को तो टच (Touch) भी नहीं करने का है! चाय में भी शुगर-फ्री (Sugar-free) की टैबलेट (Tablet) डालो या पाउडर (Powder) डालो, शक्कर तो नहीं, बिल्कुल नहीं!”
एक बहुत पुरानी, अच्छी बात आती है। एक आदमी आर्थिक अभावों से पीड़ित था। तो उसके मन में यही बात थी कि पैसे ज़्यादा मिल जाएँ तो सुखी हो जाऊँ। लेकिन पैसे लाने कहा से? कोई मशीन (Machine) तो है नहीं। वहाँ उसे समाचार मिले कि जंगल में एक देव है और देव बड़े ही चमत्कारी। देव के पास जाकर अठ्ठम-बठ्ठम कर लो, तीन दिन भूखे रह जाओ, देव प्रसन्न हो जाएगा। वो तो गया जंगल में, देव के मंदिर में बैठ गया। एक दिन, दो दिन, तीसरा दिन ना खाया, ना पिया।
तीसरी रात देव प्रसन्न हो गए, “बोल! तुझे क्या चाहिए?”
अब उसे लगा कि तीन दिन भूखा रहा, तब ये देव प्रसन्न हुए हैं। और कहते हैं कि “बोल तुझे क्या चाहिए!” आज कुछ माँग भी लूँ, और कुछ रह जाए तो फिर तीन दिन भूखा रहना पड़ेगा! इसलिए उसने कहा देव से कि, “१५ दिन मुझे दीजिए, १६वें दिन यहाँ आऊँगा और आपके पास माँगूँगा, जो माँगू सो देना।” देव ने कहा, “तथास्तु!”
अब वो जहाँ रहता था, उस नगर में गया। वो तो झोपड़ी में रहता था गाँव के बाहर, अब नगर के अंदर गया। एक बड़े सेठ थे, गाँव के पहले नंबर के। उसका घर देखा, सात माले की हवेली, हाथी-घोड़े बाँधे हुए हैं। फिर उसकी दुकान पर गया, ऑफिस (Office) पर। ऑफिस में तो ५० मुनीम काम कर रहे हैं, १००-१५० मज़दूर यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ सामान ले जा रहे हैं, और सेठजी बैठे हैं गद्दी पर। उसने सोचा कि ‘सेठ को बड़ा सुख है, सब कुछ सेठ के पास लगता है। पैसे भी हैं, नगर में नामना भी उनकी है, बेटा भी है, सब कुछ है। तो इस सेठ जैसा रेडीमेड (Readymade) सुख माँग लूँ।’ इसलिए दुकान के कोने पर बैठा हुआ था।
वहाँ सेठ की नज़र पड़ी, बुलाया अंदर। सेठ उदार हृदय के आदमी थे। उसको देखा, फटे हुए कपड़े, दाढ़ी बढ़ी हुई। “इधर आओ? क्या तुझे चाहिए? खाना है तो खिला दूँ, धंधा करना है, ५-१०-१०० रुपये चाहिए, मैं दे दूँ।”
उस समय उस आदमी ने कहा कि, “सेठजी! कल कहा होता ना, तो कल ५००० माँग लेता। आज कुछ माँगने वाला नहीं हूँ।”
“क्यों?”
तब उसने बात कही कि, “देव मुझ पर प्रसन्न हुए हैं। और देव ने कहा, तुझे जो चाहिए वो मैं दूँगा। तो मैं सोच रहा हूँ कि आपके पास सब कुछ है, तो आपका जैसा सुख माँग लूँ!”
कितना ये परोपकारी सेठ होगा! विचारो। सेठ ने कहा, “नहीं! मेरे जैसा सुख नहीं माँगना। मैं सुखी नहीं हूँ। बाहर से सुखी लगता हूँ, भीतर से सुखी नहीं हूँ।”
“क्यों?”
तब सेठ ने कहा, “मुझे डायबिटीज़ है।” आयुर्वेद के ग्रंथों में भी डायबिटीज़ का नाम आता है। उस समय उसका नाम ‘मधुप्रमेह’ था, मीठे पेशाब का रोग, अब डायबिटीज़ हम कहते हैं। तो सेठ ने कहा कि, “डायबिटीज़ है तो सुबह करेला का जूस (Juice) पीना पड़ता है। आँख बंद करके पी जाता हूँ। बाद में दो खाखरे घी बिना के, बिना चुपड़े, और उकाळा जिसमें दूध-बूध कुछ नहीं होता, ऐसा उकाळा और दो खाखरे नाश्ते में मिलते हैं। मेरी श्राविका पास में ही बैठती है, मैं दूसरा कुछ खा भी नहीं सकता। दोपहर को दो रोटी घी बिना की और मूँग की दाल बस, दो ही चीज़ें। शाम को खिचड़ी घी बिना की और थोड़ी कढ़ी, बस दो। मेरे वहाँ ५० मेहमान तो हर टंक (समय) होते हैं। और मेहमानों के लिए सुबह रबड़ी, पेंडे, मलाई सब कुछ होता है। मैं देखता हूँ, गरम-गरम शीरा आया है, मैं देखता हूँ, लेकिन मुझे कुछ नहीं मिलता। दोपहर को ५ मिष्ठान्न होते हैं, लेकिन मुझे देखने के ही होते हैं। दहीबड़े होते हैं, मुँह में पानी आ जाता है, लेकिन मैं दहीबड़े खा नहीं सकता। इसलिए मेरे जैसा सुख कभी भी माँगना नहीं। मैं तो तीनों समय भोजन के समय दुःखी-दुःखी हो रहा हूँ। मैं तो सोचता हूँ कि इससे तो भला था कि मैं मज़दूर होता। मज़दूरी करके घर पर आता और मेरी पत्नी और मैं लुक्खी रोटी और साग खाते, और वो रोटी और साग गुलाब जामुन से भी ज़्यादा लगते। लेकिन यहाँ तो सब देखना और कुछ खाने का नहीं। मेरे जैसा सुख नहीं माँगना।”
तो उस आदमी को हुआ कि ‘यह बात तो ठीक ही है! चलो, तीनों समय मिष्ठान्न देखने का, नमकीन देखने का, और कुछ खाने का नहीं, तो फिर पैसे क्या काम के?’ दूसरे नंबर के सेठ के घर पर गया। वहाँ भी सात माले की हवेली, बड़ी ऑफिस, मुनीम, मज़दूर काम कर रहे हैं, बैठा वहाँ पर भी। सेठ की नज़र पड़ी, बुलाया अंदर।
“क्या काम है भैया? कुछ चाहिए पैसे-वैसे?”
“नहीं साहब! आज तो पैसे नहीं चाहिए। लेकिन आप सुखी हो ना?” अब पूछता है, “आप सुखी हो ना?”
“अरे! मैं सुखी हूँ या नहीं हूँ, तुझे क्या काम है? तुझे पैसे चाहिए तो बोल ले।”
“नहीं, मुझे पैसे नहीं चाहिए। मुझे तो पूछना है आपसे कि आप सुखी हो?”
“लेकिन कारण क्या है?” तब कहा कि ‘देव का वरदान मिला है, तो आपका जैसा सुख माँग लूँ।’
तब उस सेठ ने कहा, “नहीं-नहीं-नहीं! मेरे जैसा सुख नहीं माँगने का।”
“क्यों, क्या हुआ? आपकी हवेली बड़ी है, ऑफिस इतनी बड़ी है, करोड़ों रुपये आपके पास हैं!”
“अरे! मेरे बेटा नहीं है। बहुत ही मानताएँ कीं, लेकिन बच्चा नहीं हुआ। बच्चा नहीं हुआ तो भी ठीक है, अपन तो जैन हैं तो अपन सोचते हैं कि अपने पुण्य में नहीं है तो नहीं मिला। पैसे हैं तो धर्म-ध्यान करेंगे, उपधान कराएँगे, संघ निकालेंगे। लेकिन बात ऐसी है कि मेरे सब संबंधी सोच रहे हैं कि ये कब मर जाए, और इसकी संपत्ति का भाग पाड़ लें! सब मेरी मृत्यु की राह देख रहे हैं कि कब ये मर जाता है! देखते हैं, इतना नहीं, मुझे मारने के लिए प्रयोग भी हो गए! मेरे रसोइयों को फोड़ दिया गया, हज़ार रुपये दिए गए कि सेठ की दाल और सब्ज़ी जो है, इसमें ये पड़िकी (पुड़िया) डाल देना। ये तो अच्छा हुआ कि रसोइया भला मानुष था, उसने ऐसा काम नहीं किया, नहीं तो मैं उस दिन मर जाता! आज मुझे न मेरे रसोइये पर विश्वास है, न मेरे कोई कर्मचारी पर या मुनीम पर विश्वास है। चार शिकारी कुत्ते मेरे पास हैं। मैं रात को सो जाता हूँ तो पलंग के चारों पाए पर चार कुत्ते रहते हैं। और तब मैं सो सकता हूँ। लेकिन सहज भी आवाज़ होती है, मैं जग जाता हूँ, ‘कोई गुंडा तो नहीं आ गया मुझे मारने के लिए!’ मैं रात-दिन भय से भीत होता हूँ। मैं इतना भयभीत हूँ, न खाना अच्छी तरह से खा सकता हूँ, न सो सकता हूँ, न पानी पी सकता हूँ। तो मैं सुखी कहाँ से? ये तो बाहर से सुख लगता है, भीतर से सुख नहीं है।”
अब उसने कहा कि ‘ऐसा हो तब तो पैसे का कोई अर्थ नहीं!’ “चलो, अब तीसरे नंबर के सेठ पर जाऊँ।” वो आदमी पुणे में नहीं आया था! वो आया था? तुम्हारे घर पर तो नहीं आया था? घर पर आया होता और तुमसे पूछा होता तो तुम क्या कहते? “मैं बहुत सुखी हूँ… ऐसा कहते, ये थोड़ा बाकी है, थोड़ा बाकी है!” कुछ ना कुछ तो बाकी रहता ही है!
तीसरे नंबर के सेठ पर गया। उसकी भी संपत्ति ज़ोरदार है, ऑफिस बड़ी है। ऑफिस के बाहर बैठा हुआ है। वो सेठ भी भले मानस थे, नज़र पड़ी, बुलाया भीतर। “बोलो, क्या चाहिए?”
तब उसने कहा, “कुछ चाहिए नहीं, एक ही प्रश्न है मेरा कि आप सुखी हो?”
“अरे! मैं सुखी हूँ या नहीं हूँ, तुझे क्या काम है?”
“नहीं, मुझे बहुत काम है। आप सुखी हो या नहीं?”
“लेकिन तुझे क्या काम है?” तब कहा कि ‘देव का वरदान मिला है।’
“अच्छा, ऐसा है? तब तो मैं सुखी नहीं हूँ! और मेरे जैसा सुख माँगना भी मत!”
कैसे ये उदार हृदय श्रेष्ठी थे! इतना तो कह दें कि ‘मेरे जैसा सुख नहीं माँगना।’ ये पूछता है कि “क्या दुःख है आपके पास?” तब खोल कर कह देते हैं। बोलो, ऐसी उदारता हृदय की, ये भी कम ही मिलती है! ऐसा सामान्य आदमी, उसके पास हृदय को खोल लें।
उसने कहा, “बच्चा नहीं था। देव-देवियों की मानता की, बच्चा हो भी गया। लेकिन मैं बड़ा श्रीमंत हूँ, करोड़पति। मेरा बच्चा बड़ा हुआ, स्कूल में उसको भेजा, लेकिन वहाँ कुछ पढ़ता ही नहीं। और मित्र ऐसे मिल गए जो शराब के अड्डे पर उसे ले जाते हैं, जुगार (जुआ) के अड्डे पर ले जाते हैं। चलो लाख रुपया हार गया, मुझे कोई चिंता नहीं है, आखिर सब उसका ही है। लेकिन मैंने जो प्रतिष्ठा जमाई थी पूरे नगर में, पूरे हमारे प्रदेश में, मेरी सब प्रतिष्ठा इस मेरे बेटे ने खत्म कर डाली! कि ‘ऐसे भले मानुष और उसका बच्चा ऐसा?’ आज बात ऐसी है कि मेरे बच्चे के लिए लोगों की लाइन (Line) लगती थी बच्चियाँ लेकर कि ‘मेरे घर पर आपके बच्चे की शादी हो, मुझे वेवाई (समधी) बनने का सौभाग्य दो’, लाइन लगती थी! लेकिन आज एक भी व्यक्ति मेरे पास नहीं आता कि ‘मुझे तुम्हारे साथ संबंध करना है।’ मेरी प्रतिष्ठा बिल्कुल खत्म हो गई। अब मैं क्या करूँ? पैसे को तो कुछ खाने का नहीं है, पैसे तो करोड़ों या अरबों हों, खाने के पैसे नहीं हैं, नोट के बंडल खाने के काम में नहीं आते। आदमी की प्रतिष्ठा हो, वही तो जीवन है। मेरी प्रतिष्ठा मेरे बच्चे ने खत्म कर दी। अब मेरा जीवन दूभर हो गया है। मेरी पत्नी रात-दिन रोती रहती है कि अब हमारे जीवन का कोई अर्थ न रहा, हम ज़हर घोल कर मर जाएँ। ये तो मैं धर्म को समझा हुआ हूँ, इसलिए उसको रोकता हूँ कि नहीं, ऐसी मृत्यु हमें नहीं चाहिए, हमारे धर्म में मना है। लेकिन मुझे भी लगता है कि अब मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा। मैं ऑफिस आता हूँ, बैठता हूँ, या काम को देखता हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि पैसे बढ़ें तो भी क्या! किसके हाथ में देने के हैं? इसके हाथ में देने के पैसे? जिसने मेरी प्रतिष्ठा सब खत्म कर डाली! और जिसके हाथ में पैसे आएँगे… हम दोनों मर जाएँगे और बच्चे के हाथ में पैसे आएँगे, ऐसे मित्र उसके पीछे लगे हैं कि एक-दो वर्ष में सब तिजोरी खाली कर देंगे। इसलिए मेरे जैसा सुख माँगना नहीं!”
वो तो १४ दिन तक घूमा। कितने दिन? १४ दिन! एक व्यक्ति ऐसा नहीं मिला कि जिसने कहा कि ‘मैं सुखी हूँ और मेरे जैसा सुख माँगना!’ अब वो घबरा गया कि ‘१६वें दिन तो देव के पास जाने का है और माँगने का है। १४ दिन तो हो गए। अब चलो पास के नगर में जाऊँ। बीच में जंगल था और पास में दूसरा नगर था। चलो, अभी एक-दो दिन रहे हैं तो एक-दो दिन में पास के नगर में भी पहुँच जाऊँ, वहाँ भी श्रीमंतों को देख लूँ।’
जंगल में से जाता है, तब जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक मुनि भगवंत बैठे थे। अब क्या हुआ था? एक अनुभव हुआ था। अनुभव ये हुआ था कि आदमी के चेहरे को देखकर वो सुखी है या दुःखी है, उसका पता लग जाता है। तो मुनिराज को देखे, तो चेहरे पर से लगा कि ये तो बड़े सुखी हैं! ये तो बड़े सुखी हैं! अब देखता है— एक वस्त्र नीचे, एक वस्त्र ऊपर, पास में एक लकड़ी का पात्र है, दूसरा तो कुछ है ही नहीं! लेकिन सोचा कि ‘ये जो श्रीमंत होते हैं ना, उनकी धुन भी अलग-अलग होती है! तो उनके पास तो बंगला बड़ा होगा, ऑफिस भी बड़ी होगी, करोड़पति आदमी होगा, लेकिन जंगल में ट्रैकिंग (Trekking) के लिए निकला होगा।’ बैठा और पहला ही प्रश्न पूछा— “तुम सुखी हो?”
महाराज साहब ने कहा, “हम तो परम सुखी हैं!”
१४ दिन में पहला आदमी मिला। अब तक सब कहते थे, “हम दुःखी हैं, दुःखी हैं, हमारे जैसा सुख माँगना नहीं।” आज ये मुनिराज मिले, “सुखी नहीं, परम सुखी!” परम सुखी? परम सुखी? मैं कहता हूँ तुम्हें कि कोई तुम्हारी साता पूछने के लिए आए तो वो शर्मिंदा हो जाए कि ‘इनकी साता क्या पूछें! ये तो बड़ी साता में बैठे हुए हैं!’ तुम्हारे मुख को देखकर उन्हें लगना चाहिए कि ये तो परम साता में, परम आनंद में हैं।
तो मुनिराज ने कहा, “परम सुखी हैं।”
अब उसने आगे पूछा, “तो तुम कहाँ के रहवासी हो? तुम्हारा बंगला कहाँ पर है?”
“बंगला? बंगला तो था, लेकिन सब छोड़ दिया।”
“छोड़ दिया मतलब? अब बंगला-बंगला कुछ नहीं है मेरे पास।”
“तो पैसे तो होंगे ना? कितने करोड़ रुपये हैं? ५ करोड़ हैं? कितने हैं?”
“एक भी पैसा नहीं है मेरे पास!”
“अरे! अभी नहीं हैं पैसे वो तो मैं देखता हूँ। लेकिन तुम्हारे घर में तो पैसे होंगे! बंगला नहीं है तो घर होगा, तो घर में तो ५-१० करोड़ रुपये होंगे ना?”
“अरे! घर भी नहीं है।”
“एक रुपया नहीं है! एक रुपया नहीं है तुम्हारे पास? घर भी नहीं है? वाड़ी-बाड़ी होगी कुछ, खेत-बेत होंगे?”
“ना वाड़ी, ना खेत, कुछ नहीं है। जो है वो ये है— ये लकड़ी का पात्र और ये चद्दर, इतना ही मेरे पास है।”
“इतना ही तुम्हारे पास है, और तुम सुखी हो?”
मुनि ने कहा, “इसलिए ही सुखी हूँ! मेरे पास कुछ नहीं है, इसलिए ही मैं सुखी हूँ।”
आपको तो जन्म से यह बात मिली है कि महाराज साहब के पास कुछ नहीं होता और वे परम सुखी होते हैं। आपको तो मिली है ना ये बात? तो त्याग में सुख या भोग में सुख? सुख कहाँ पर है? चलो, मैं इतना भी कह दूँ, एक कॉम्प्रोमाइज़ेशन (Compromisation) बना जाए, कि तुम संसार में हो, एक सद्धर्म गृहस्थ के रूप में आपको जीना है, तो एक अच्छा घर चाहिए, कार (Car) चाहिए, बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकें इसलिए पैसे चाहिए। चलो, ५ करोड़, १० करोड़, २५ करोड़ आपको चाहिए, चाहिए, लेकिन कितने चाहिए वो नक्की (तय) करो।
हमारे पास कुछ नहीं है और हम आनंद में हैं। क्योंकि तुम वोहराने के लिए आओगे, हमारा पात्र तुम भर दोगे, जो भी हमें चाहिए आप देने के लिए तैयार हो। हमें तो कुछ चाहिए भी नहीं, लेकिन आपकी भक्ति बहुत ही है। संसार में आप हैं, आपको चाहिए पैसे, कितने चाहिए वो नक्की करो। और इतने हो जाएँ, फिर आराम से बैठ जाओ। होगा ना इतना? फिर वाइंड अप (Wind up) कर देना बिज़नेस (Business)। “बस हो गया!” शाम को भोजन के लिए बैठेंगे, भाखरी और साग है, तीन भाखरी खाई, पेट भर गया, “चलो बस, अब समाप्त! अब आज के लिए दुकान बंद!” बंद कर दोगे ना दुकान? ऐसे वो दुकान बंद करोगे?
महाराज साहब ने कहा, “हम परम सुखी हैं और इसलिए ही सुखी हैं कि हमारे पास कुछ नहीं है। जब शरीर अशक्त हो जाए, तो हम ये लकड़ी का पात्र लेकर गाँव में जाते हैं, रोटी-साग लेकर आते हैं, खा लेते हैं। दूसरा हमें कुछ चाहिए नहीं।”
अब इसको भी लगा कि ‘बात तो यह सच्ची है। जिसके पास करोड़ों रुपये हैं, अरबों रुपये हैं, वे दुःखी हैं, तो जिसके पास कुछ ना हो वह सुखी हो ही सकता है।’ ठीक है ना? करोड़ रुपये वाला दुःखी है, ५ करोड़ वाला दुःखी है, २५ करोड़ वाला दुःखी है, तो फिर जिसके पास कुछ नहीं है, वो सुखी होगा ही। एक रोग हो तो आदमी दुःखी होता है। पाँच रोग होते हैं— डायबिटीज़ भी है, हाइपरटेंशन (Hypertension) भी है, तीसरा भी रोग है, चौथा भी रोग है, किडनी (Kidney) की तकलीफ़ है— पाँच रोग हैं तो ज़्यादा दुःख है। सात रोग हैं तो उससे भी ज़्यादा दुःख है। लेकिन एक भी रोग नहीं है तो? तो सुख-सुख है ना भाई! निरोगी काया है। जैसे-जैसे पैसे बढ़ते जाएँगे, दुःख बढ़ता जाएगा और पैसे कम होते जाएँगे, सुख बढ़ता जाएगा।
उस आदमी को यह सत्य मिल गया। आपको कब मिलेगा? आज सोचना, कि पैसे जितने बढ़े उतना दुःख बढ़ा या सुख बढ़ा? सोचना। और मैंने कॉम्प्रोमाइजेशन (Compromisation) भी दिया— आप संसार में हो, जितना चाहिए उतना रख भी लो, लेकिन ये निश्चित करो कि इससे ज़्यादा नहीं। डायबिटीज़ हो लेकिन नियंत्रण में हो, तब क्या होता है? टैबलेट से चल जाता है। लेकिन बहुत भारी हो तो तीन टाइम इंसुलिन (Insulin) का इंजेक्शन (Injection) लेना पड़ता है। तो टैबलेट से चल जाए तब अच्छा, कि इंजेक्शन लेना पड़े?
तो आज सोचना, कल सोच कर आना। मीरा की जो बात है, उस बात पे भी अपन आगे चलेंगे।
