मनोविजय
वैसे तो मन के प्रकार बहुत हैं— Conscious Mind, Unconscious Mind, Subconscious Mind वगैरह। लेकिन अपनी परंपरा में मन को दो विभागों में विभाजित किया गया है: एक अपूर्ण मन, एक पूर्ण मन।
संज्ञा-वासित, राग-द्वेष-अहंकार से प्रभावित जो मन है, वो अपूर्ण मन है। और जो प्रभु से प्रभावित है, वो पूर्ण मन है। जब तक मन में संज्ञाओ का प्रभाव रहेगा, मन अपूर्ण ही रहेगा। और जब मन प्रभु से प्रभावित होगा, मन पूर्ण हो जाएगा।
प्रभुने कहा है : “तु सम्यक् रूप से सभी आत्माओं को देख।” तो अब हमें सम्यक् रूप से एक-एक आत्मा को देखना है कि “एक-एक आत्मा अनंतगुण से युक्त है।” ऐसे प्रभु प्रभावित मन हुआ, मैत्री भाव से युक्त मन हुआ, तो मन पूर्ण हो गया; अब आनंद ही आनंद है! अपूर्ण मन के बदले आपके पास पूर्ण मन आ जाए, तो आप मनोविजेता हो जाएँगे।
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराज रचित स्तवना चोवीसी, प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति:
“जगजीवन जगवाल हो, मरुदेवी नो नन्दलाल रे।”
परमात्मा ऋषभदेव के चरणों में समर्पित प्रथम स्तवना। ऋषभदेव परमात्मा की माताजी का नाम था मरुदेवा। तीर्थंकर भगवंतों के मात-पिता के नाम में भी एक साधना रखी हुई होती है। हम देख रहे थे पार्श्वनाथ परमात्मा के पिता का नाम अश्वसेन, माता का नाम वामा देवी।
अश्वसेन अर्थात इंद्रिय विजेता साधक। और वामा का अर्थ होता है मनोविजेता साधक।
आज ये बात करनी है कि हमारे मन पर हमारा नियंत्रण कैसे हो। वैसे तो मन के प्रकार बहुत हैं— कॉन्शियस माइंड (Conscious mind), अनकॉन्शियस माइंड (Unconscious mind), सबकॉन्शियस माइंड (Subconscious mind)। लेकिन अपनी परंपरा में मन को दो विभागों में विभाजित किया गया है: एक अपूर्ण मन, एक पूर्ण मन।
संज्ञा-वासित, राग-द्वेष से प्रभावित, अहंकार से प्रभावित जो मन है, वो अपूर्ण मन है। जो प्रभु से प्रभावित है, वो पूर्ण मन है। जब तक मन में संज्ञाओ का प्रभाव रहेगा, मन अपूर्ण ही रहेगा। और जब मन प्रभु से प्रभावित होगा, पूर्ण मन हो जाएगा।
“हमारा मन पूर्ण है।” आप पूछेंगे, “साहब क्या खप है? क्या चाहिए?” हम कहेंगे, “कुछ नहीं चाहिए! एक ही इच्छा थी प्रभु मिल जाएँ, प्रभु मिल गए। बस अब मन पूर्ण हो गया, अब कोई इच्छा नहीं है।” We are totally choiceless persons, और इसीलिए हम आनंद में हैं।
पहली दृष्टि से मन प्रभु प्रभावित होता जाता है और पूर्णता की ओर बढ़ जाता है। पहली दृष्टि में जब साधक आता है, तब उसका मन मैत्री भाव से परिपूर्ण हो जाता है। दशवैकालिक सूत्र में सद्गुरु ने शिष्य को आशीर्वाद दिए। आशीर्वाद में सद्गुरु ने कहा कि, “तू सर्व प्राणियों का मित्र बन जा!”
शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव! आपने आशीर्वाद तो बहुत अच्छे दिए। अब वहाँ तक पहुँचने का मार्ग कौन सा है? आपकी आज्ञा है, आपका आशीर्वाद है, मैं ज़रूर वहाँ पहुँच जाऊँगा।”
गुरु का आशीर्वाद माने कि शक्तिपात! और शक्तिपात हुआ, तुम्हें कुछ करना नहीं है, तुम्हें सिद्धि प्राप्त हो जाएगी। गुरु के शक्तिपात को मैं लिफ्ट (Lift) कहता हूँ। कोई आदमी लिफ्ट में घुसा, ३५वें माले पर उसको जाना है, बटन (Button) दबा दिया, लिफ्ट ३५वें माले पर जाकर रुकेगी। लेकिन इलेक्ट्रिसिटी फेल (Electricity fail) है और दादर-सीढ़ियां चढ़नी पड़ें तो?
सद्गुरु का आशीर्वाद, सद्गुरु का शक्तिपात, ये हमें अपलिफ्टेड (Uplifted) करते हैं, हमारी साधना को उचक लेते हैं। तो शिष्य ने पूछा कि, “गुरुदेव! आप ही मुझे उचक लेंगे, लेकिन आप यह भी तो बताओ कि वहाँ तक पहुँचने का मार्ग कौन सा है? सब प्राणियों का मित्र बन जाना बहुत ही सुंदर बात है, लेकिन वहाँ तक पहुँचना कैसे?”
तब गुरुदेव ने कहा— “सम्मं भूयाइं पासओ।”
“तू सम्यक् रूप से सभी आत्माओं को देख।” अभी तक हमने कोई भी आत्मा को सम्यक रूप से नहीं देखा। “ये व्यक्ति मेरे अहंकार को पुष्ट करता है, मुझे अच्छा मानता है तो वो अच्छा। ये व्यक्ति मुझे बुरा मानता है तो वो बुरा।” तो आपने उस व्यक्ति को नहीं पहचाना! अपन को केंद्रबिंदु बनाकर आपने वर्गीकरण किया। अब क्या करना है? सम्यक् रूप से एक-एक आत्मा को देखना है कि ‘एक-एक आत्मा अनंतगुण से युक्त है।’
तो प्रभु प्रभावित मन हुआ, मैत्री भाव से युक्त मन हुआ, मन पूर्ण बन गया। आनंद ही आनंद है! अब कोई व्यक्ति बुरा नहीं है, सब व्यक्ति अच्छे हैं। अब किसी के साथ झगड़ा नहीं होगा, किसी के साथ टंटा-फसाद नहीं होगा। प्रेम ही प्रेम! सबसे प्रेम! तो अपूर्ण मन आपके पास है, आपके पास पूर्ण मन आ जाए तो आप मनोविजेता हो जाएँगे।
सिकंदर विश्व विजेता, अपनी जात को कहलाता था, “मैं विश्व विजेता हूँ।” जंगल में से गुज़र रहा था, एक संत को देखा। संत को देखे, प्रणाम किया। लेकिन अहंकार तो वहाँ भी था। शरीर झुका था, मन नहीं झुका था। संत को तो कोई परवाह नहीं है, कौन झुक रहा है, कौन नहीं झुक रहा है। लेकिन सिकंदर ने अपनी आइडेंटिटी (Identity) दिखाई— “मैं सिकंदर विश्व विजेता हूँ!”
संत ने पूछा, “अच्छा? तू विश्व विजेता है? पूरे विश्व पर, पूरे संसार पर तेरा आधिपत्य है?”
सिकंदर ने कहा, “हाँ। आप बताइए, फ़रमाइए आपकी क्या सेवा करूँ?”
तब संत ने कहा, “एक मक्खी शरीर पर लगी हुई है, उस मक्खी को कह दे कि वहाँ से उड़ जाए! मेरे शरीर पर एक मक्खी है, और उस मक्खी के कारण मेरा ध्यान वहाँ जाता है। तो तू विश्व विजेता है, पूरे संसार पर तेरा आधिपत्य है, तो इस मक्खी को कह दे कि मक्खी उड़ जाए यहाँ से!”
तो सिकंदर ने कहा, “मक्खी तो मेरा कहा कैसे मानेगी?”
“अरे! एक मक्खी तेरा कहा नहीं मानती और तू कहता है मैं विश्व विजेता हूँ?”
फिर सिकंदर आगे जाते हैं। सिकंदर के गुरु थे डायोजिनिस (Diogenes)। डायोजिनिस ने कहा था कि, “भारत तू जाता है, तो भारत से कोई एक संत अपने वहाँ आ जाए तो बहुत अच्छा। भारत के संत विश्व-विख्यात हैं। एक भी संत हमारे वहाँ आ जाए तो हमारा देश बड़भागी हो जाएगा।”
तो सिकंदर ने एक संत को देखा। संत का नाम था ददामि (Dandami)। झोपड़ी के बाहर बैठे हुए थे। सिकंदर ने कहा, “आप मेरे साथ मेरे देश आओ।”
संत ने कहा, “क्यों? मैं तेरे देश क्यों आऊँ? कोई भी व्यक्ति कोई कार्य करता है तो उसके पीछे कारण होता है, मैं क्यों आऊँ? मैं यहाँ आराम से बैठा हुआ हूँ, परमात्मा का भजन करता हूँ, मुझे कुछ चाहिए नहीं। मैं पूर्ण हूँ।” संत कहते हैं, “मैं पूर्ण हूँ! मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
तुम्हारे पास आज रात कोई देव आ जाए और कह दे “माँग, माँग, जो माँगे सो दूँ!”, लिस्ट (List) तैयार है ना? लिस्ट तैयार है ना? और हमारे पास कोई आएगा तो हम कहेंगे, “तेरे पास क्या है? तेरे पास कोई साधना नहीं है, हम साधना मार्ग में आगे बढ़े हुए हैं और अभी आगे बढ़ना है तो हमें सद्गुरु की आवश्यकता है, नहि कि कोई देव की। हम पूर्ण हैं! भौतिक एक भी चीज़ की हमें आवश्यकता नहीं।” पूर्ण होना है? बोलो तो, पूर्ण होना है! आप पूर्ण हो जाएँगे तो क्या होगा?
महोपाध्याय यशोविजय महाराज ने स्तवना में कहा—
“पूरन मन पूरन सवि, दिसे नहीं दुबिधा को लाल।”
जब मन पूर्ण हो गया तो इर्दगिर्द आस-पास सब पूर्ण ही लगता है। मैं यदि पूर्ण हूँ तो मुझे आप सब पूर्ण ही लगते हैं। क्योंकि आप सब सिद्धात्माएँ हैं। मैं नमस्कार महामंत्र रटता हूँ, “नमो सिद्धाणं” बोलता हूँ, तब आपको नमस्कार करता हूँ। आपका जो भविष्य का पर्याय है सिद्ध-स्वरूप का, उसको मैं नमन करता हूँ। तो मेरी दृष्टि में आप सभी पूर्ण हैं। आज आपको पूर्णत्व की दीक्षा देनी है।
आपके मन में हो जाए कि ‘मैं पूर्ण हूँ!’ मेरे शरीर को रोटी और दाल चाहिए, मुझे कुछ नहीं चाहिए। क्योंकि मैं पूर्ण हूँ। इतनी ही अपूर्णता है कि मैं शरीरधारी हूँ, शरीर भी छूट जाएँगे तो पूरा पूर्ण हो जाऊँगा। तो शरीर को रोटी दाल चाहिए, मुझे कुछ नहीं चाहिए। आपके शरीर को जो भी चाहिए है वो मिल जाता है। लेकिन आपके मन की आवश्यकताएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं। ५ करोड़ हुए तो २५ करोड़ पर आप जाएँगे। २५ करोड़ मिल गए, “अरे! २५ करोड़ से क्या होगा? १०-१५ करोड़ का तो फ्लैट (Flat) आता है पुणे में, अच्छे एरिया में फ्लैट लो और बंगला लेने जाओ तो ५० करोड़ का मिले। तो २५ करोड़ से क्या होता है? ५० करोड़… अरे! ५० करोड़ का तो एक बंगला आएगा, फिर दूसरा कहाँ जाएगा? एक अरब चाहिए!” आप कभी पूर्ण होंगे?
और हम पूर्ण हो गए, क्योंकि हमारा मन प्रभु प्रभावित हो गया। आपका भी मन प्रभु से प्रभावित हो जाए तो आप भी पूर्ण हो जाओ।
तो सिकंदर ने संत ददामि से कहा कि, “आपको मेरे देश आना ही पड़ेगा।”
“मुझे नहीं आना है, मैं यहाँ ठीक हूँ, मैं क्यों आऊँ? मैं किसी की आज्ञा मानूँ भी क्यों? मेरे परमात्मा की आज्ञा को मैं मानूँगा, मैं दूसरों की आज्ञा क्यों मानूँगा? मुझे नहीं आना है।”
अब सम्राट का बल कहाँ होता है? तलवारों में। “कि देखिए ये तलवार, आपका सिर उड़ जाएगा!”
तो दंदामि कहते हैं, “उड़ जाएगा तो उड़ जाएगा! एक दिन उड़ने वाला तो है ही। आज उड़े, कल उड़े क्या फ़र्क पड़ता है? देखेंगे, सिर उड़ेगा तो उसको देखेंगे उसमें क्या! मैं तो ये शरीर हूँ नहीं, मैं तो अमर आत्मा हूँ, मैं तो मरने वाला हूँ ही नहीं!”
मनोविजय! आज साध्वीजी सहजानंदीश्रीजी के ३६ उपवास का पारणा है। ३६ उपवास उन्होंने, मनोविजय के बिना ये तपश्चर्या हो नहीं सकती। प्रभु की कृपा, सद्गुरु की कृपा और साधक का संकल्प, ये तीन जब एक रेखा में आते हैं तभी कोई भी साधना सिद्धि में रूपांतरित होती है। एक दृढ़ निश्चय था कि प्रभु के चरणों में साधना का पुष्प समर्पित करना है। आज उन्होंने यही काम किया। गोड़ीजी दादा के चरणों में, चिंतामणि दादा के चरणों में साधना का पुष्प समर्पित किया। आज उन्होंने प्रार्थना में कहा था कि, “प्रभु! तेरी कृपा से यह साधना हुई है, तेरी कृपा से हुई ये साधना तेरे चरणों में मैं समर्पित कर रही हूँ।”
प्रभु की कृपा के बिना साधना जगत में एक इंच, एक सेंटीमीटर (Centimeter) हम चल नहीं पाते। तो प्रभु गोड़ीजी दादा की, चिंतामणि दादा की कृपा इतनी बरसी कि ३६ उपवास आराम से हो गए। ३६ उपवास तक, और आज भी पारणे के दिन दो माले चढ़कर वंदन करने के लिए सुबह-शाम वे आते थे। मैं कहता था “सुबह आ गए हो शाम को नहीं आना”, तब वे कहते थे “मुझे कहाँ आना है? मुझे कहाँ चढ़ना है? कृपा से मैं चढ़ती हूँ, मैं नहीं चढ़ती हूँ, कृपा मुझे चढ़ाती है!”
आज का दिन मासधर का दिन है। कल ही एक-दो साधक मिले थे। एक साधिका तो ऐसी थीं जिन्होंने मासक्षमण शुरू किया था, शरीर की अस्वस्थता के कारण मासक्षमण छोड़ना पड़ा था। कल वे कहती थीं कि, “गुरुदेव! आज से फिर शुरू करना है मासक्षमण! आप पुणे में आए हो, फिर कब आओगे? बस दादा के चरणों में, सद्गुरु के चरणों में मासक्षमण की साधना का पुष्प समर्पित करना है, तो आज से फिर से शुरू करना है।” एक बच्ची मिली थी, लड़की, उसने भी कहा था “मुझे भी स्टार्ट (Start) करना है।” तो आज जिन्होंने नवकारसी नहीं पारी हो, यूँ भी पांचम है, नवकारसी नहीं पारी हो, आयंबिल-बायंबिल करने का है, तो उपवास कर लो आज। या अठ्ठम का पच्चक्खाण कर लो। एक अठ्ठम अच्छा हो गया, तो बाद में नव अठ्ठम, मासक्षमण तुम्हारा पूरा!
तो आज साध्वीजी भगवती सहजानंदीश्रीजी का ३६ उपवास का पारणा है। हम तो उनकी तपश्चर्या की अनुमोदना करेंगे। इतनी छोटी वय में दीक्षा लेकर मासक्षमण कर लिया था, और ३६ उपवास भी कर लिए! तो आगे-आगे कौन जाने कौन सी तपश्चर्या वे करेंगी, हम तो आशीर्वाद देते हैं।
