Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 11-08-2026 | Pune Chaturmas

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त्रिशल्या

प्रभु महावीर की माता का नाम त्रिशला महादेवी। मूल शब्द है त्रिशल्या, और उसका संक्षिप्त रूप हुआ त्रिशला। ‘शल्य’ का अर्थ है भीतर का घाव, जो सतत शरीर को, Nervous System को पीड़ा का बोध कराता रहता है। मन की, वचन की और काया की – सब पीड़ाओं से जो रहित हैं, तीनों शल्यों से जो रहित हैं, वह है त्रिशल्या माता!

तुम्हारे मन में किसी के प्रति ईर्ष्या का, द्वेष का भाव है, तो तुम्हारे मन में पीड़ा का जन्म होगा। जिसकी ईर्ष्या तुम कर रहे हो, वह व्यक्ति भौतिक क्षेत्र में या आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ता ही रहेगा, बढ़ता ही रहेगा… और साथ में आपकी पीड़ा भी बढ़ती चली जाएगी। मन की इस पीड़ा को लेकर हम अनगिनत जन्मों से चल रहे हैं। जब हमारे मन में सबके प्रति मैत्री-भाव आ जाता है, तब मन के इस शल्य से हम पार हो सकते हैं।

आपको अगर किसी व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या है, द्वेष है तो गोड़ीजी दादा या चिंतामणि दादा के पास जाकर उनसे कहिए : “प्रभु! आपके मन में आपकी पूजा करनेवाले धरणेंद्र के प्रति जो भाव था, वही भाव आपके परम पावन शरीर पर उपसर्ग बरसाने वाले कमठ के लिए भी था (तुल्य-मनोवृत्ति)। प्रभु! मुझे भी ऐसा भाव दो, ना!” जरूर प्रभु आपको ऐसा भाव देंगे; प्रभुका स्पर्श आपको मिलेगा।


महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित ‘स्तवन चौबीसी’। प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति—

“जगजीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”

परमात्मा ऋषभदेव की माता का नाम मरुदेवा था और प्रभु महावीर की माता का नाम त्रिशला महादेवी था। मूल शब्द है ‘त्रिशल्यातीता’, और उसका संक्षिप्त रूप हुआ ‘त्रिशला’। त्रिशल्यातीता! मन, वचन, काया की पीड़ाओं से जो रहित हैं, वो त्रिशल्यातीता।

‘शल्य’ का अर्थ है भीतर रिसता घाव, जो सतत शरीर को, नर्वस सिस्टम (Nervous system) को पीड़ा का बोध देता है। एक पीड़ा मन की है, दूसरी वचन की है, तीसरी काया की है। तुम्हारे मन में किसी के प्रति ईर्ष्या का भाव है, तो क्या हुआ? तुम्हारे मन में पीड़ा का जन्म हुआ। जिसकी ईर्ष्या तुम कर रहे हो, वह व्यक्ति भौतिक क्षेत्र में या आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ता ही रहेगा, आगे बढ़ता ही रहेगा… और आपकी पीड़ा बढ़ती जाएगी। तो ये मन की पीड़ा को लेकर हम अनगिनत जन्मों से चल रहे हैं। जब हमारे मन में सबके प्रति मैत्री-भाव आ जाता है, तब मन के शल्य से हम पार हो जाते हैं। फिर मन की पीड़ा हमारे पास नहीं है। सबके साथ मैत्री! फिर क्या होगा? कोई भी व्यक्ति आगे बढ़ेगा तो तुम राज़ी होंगे— “अच्छा हुआ, मेरा मित्र है! आगे बढ़ा तो मेरे काम में ही आएगा।” तो ईर्ष्या मन का शल्य है, और मैत्री-भाव तुम्हारे मन में आया, तो तुम शल्य से रहित हुए।

मैं धर्म का अर्थ करता हूँ— ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ (Art of Living), जीवन जीने की कला। आप वेल-सेट (Well set) हो, आपका अच्छा फ्लैट (Flat) है, आपके पास एक नहीं, दो कार (Car) हैं। लेकिन आपको जिसके प्रति ईर्ष्या है, वो आगे बढ़ गया, तो आपको पीड़ा होती है। अरे भाई, क्या हुआ? तुम्हारा फ्लैट गया? तुम्हारा फ्लैट तो वैसा का वैसा ही है। तुम्हारी कारें कम हुईं? तुम्हारे पास दो कार थीं, तो दो कार तो हैं ही! इसलिए मैंने कल कहा था कि आपकी दृष्टि Haves पर नहीं है, Have-nots पर है। तुम्हारे पास क्या नहीं है, वो तो बोलो! पाँच इंद्रियां हैं, मन और बुद्धि है। आपके पास क्या नहीं है?

अभी-अभी घटी हुई एक घटना मैं आपसे कहूँ। गुजरात के एक छोटे से गाँव में रहने वाला एक आदमी, गाँव में बिज़नेस नहीं चला तो मुंबई गया। अकाउंट (Account) का जानकार था, तो दो-चार पीढ़ियों में अकाउंट का काम करता। एक रूम किराए पर रखा। लॉज में भोजन कर लेता। परिवार तो देश में था। सौ रुपिये की सैलरी (Salary) थी, उस ज़माने में, १०० वर्ष पहेले। १०० रुपिये की सैलरी! ३०-४० रुपिये में वो अपना जीवन गुज़ारता और ६० रुपिये देश में भेजता। एक दिन उसकी चप्पल फट गई। ऐसी फट गई कि किसी भी रूप से काम में आए ऐसी नहीं थी, तो नई चप्पल लेनी ही पड़ेगी। क्योंकि कभी-कभार दोपहर को  भी ऑफिस पर जाना पड़ता। अब चप्पल खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। तो उसको हुआ कि ‘संडे (Sunday) के दिन मंदिर में जाऊँ महालक्ष्मी माता के पास।’ हिंदू आदमी था। और ‘महालक्ष्मी माता को कह दूँ कि मुझे ऐसी कोई लक्ष्मी नहीं चाहिए, मुझे महल नहीं चाहिए, लेकिन ये चप्पल चाहिए, तो चप्पल के पैसे तो दे दो! तो संडे के दिन प्रार्थना करने के लिए जाऊँगा!’ ऐसा सोचा।

संडे को वो मंदिर में पहुँचा। मंदिर के आगे एक भिक्षुक बैठा था। पैर उसके कटे हुए थे। लेकिन मुँह थोड़ा परिचित लगा। तो वो आदमी विचार में पड़ा कि ‘मुँह तो परिचित है, लेकिन ख्याल नहीं आता है।’ लेकिन वो भिक्षुक पहचान गया। भिक्षुक ने कहा, “मैं तुम्हें पहचानता हूँ। तुम हमारी झुग्गियों में आते थे। हम रेलवे की पटरी के और सामने छोर पर जो झुग्गी है, झोंपड़ी है, उसमें रहते हैं। तो वहाँ आप आते थे सेठ की उघराणी के लिए। और मैंने आपको चाय भी पिलाई है।” “अब आपको याद आया?” “ओह, याद आ गया! तो बहुत भले मानस, अरे पैर कैसे कट गए? पैर कैसे कट गए?”

तब उस भिक्षुक ने कहा कि, “मे एक दिन उतावल थी, तो रेल की पटरियों को क्रॉस करके निकला। एक पटरी पर मैं चल रहा था, मेरा पैर सहज फँस गया तार में, मैं निकल नहीं पाया और रेलवे का इंजन मेरे पैर से पसार हो गया। पूरी गाड़ी नहीं थी, केवल इंजन था, लेकिन इंजन पसार हो गया। मेरे पैर दोनों कट गए। एक चैरिटेबल संस्था ने खर्च उठा लिया, हॉस्पिटल में मुझे एडमिट (Admit) कराया और मेरे दोनों पैर काटने पड़े। अब मैं क्या करूँ? मेरे पैर कट गए, तो अब मेरी पत्नी रोज़ सुबह लारी में बिठाकर मुझे यहाँ लाती है। अब दूसरा तो कोई मार्ग रहा नहीं मेरे लिए, भिक्षा के सिवा, मैं भिक्षा माँगता हूँ। शाम को मेरी पत्नी आएगी, तो लारी में बिठाकर मुझे घर पर ले जाएगी।”

अब उस आदमी को लगा कि ‘महालक्ष्मी माता को प्रार्थना क्या करूँ? मेरे पैर तो साबुत हैं! उसके तो पैर ही नहीं, पैर कट गए! मेरे पैर साबुत हैं।’ अब चप्पल के लिए पैसा नहीं माँगने। माताजी के पास गया और कहा, “शुक्रिया! तेरा आभार कि मेरे पैर साबुत हैं!” तो ये है ‘Haves’ पर आया। कि मेरे पास ये है। ‘Have nots’ की बात नहीं है, Haves की बात।

तो आज पहली बात हम करें मन की पीड़ा की। क्योंकि आप सब मन की पीड़ा से पीड़ित हो। मैंने संडे को भी कहा था कि मोटिवेशनल स्पीकर्स (Motivational speakers) का एक युग आया है। पॉजिटिविटी (Positivity) पर बोलने वाले इतने लोग खड़े हो गए! क्यों खड़े हुए हैं? क्योंकि समाज में नेगेटिविटी (Negativity) बहुत बढ़ गई है। ‘मेरे पास ये नहीं, मेरे पास ये नहीं, मेरे पास ये नहीं…’ लेकिन ये तो दूसरों की बात है। आपकी तो नहीं ने? आप तो प्रभु-शासन को प्राप्त कर चुके हो। और आपका आदर्श कौन है? बोलो। संयमी महात्मा? बोलो। रोज़ आएंगे, वंदन करेंगे, तो आपके आदर्श कौन हैं? त्यागी महात्मा! जिनके पास कुछ भी नहीं है। हम तो कहेंगे कि “शरीर भी मेरा नहीं है। शरीर पुद्गल है और पुद्गल के साथ मेरा कोई संबंध नहीं है। मैं आत्म-तत्व हूँ, मैं पुद्गल नहीं हूँ।” तो हमारे पास कुछ नहीं है, फिर भी हम आनंद में हैं! Ever fresh, Ever green! तो हमारी Ever freshness को देखकर आपको क्या होगा? बोलो।

कितने मुनि भगवंतों का दर्शन किया? बोलो। कितनी साध्वीजी भगवंतों का आपने दर्शन किया? सबके चेहरे पर एक मुस्कान होती है, आनंद होता है। हमारे मन में यही बात होती है कि प्रभु की प्रसादी हमें मिल गई। २४ घंटों हमारे मन में इसका आनंद रहता है, कि जो दुर्लभ चीज़ थी, इस मनुष्य जन्म में ही नहीं, पूरे संसार में जो दुर्लभ से भी दुर्लभ चीज़ है, वो हमें प्राप्त हो गई! तो आप मुनि भगवंतों को देखो, उनके चेहरे पर जो प्रसन्नता है, उसको आप देखेंगे।

पुणे वाले कोई महात्मा दीक्षित हुए है और आपके मित्र थे, क्लासमेट (Classmate) थे, अरे बेंचमेट (Benchmate) थे! फिर आप उनसे पूछेंगे ना, “महाराज साहेब, कैसे हो?” महाराज साहेब कहेंगे, “अरे, बहुत आनंद में!” “ये महाराज साहेब, आप बताओ तो सही! आपके पास इतना आनंद कैसे है? मेरे पास तो मेरा घर है, बड़ा सा फ्लैट, कारें हैं, करोड़ों रुपए हैं, फिर भी मैं असंतुष्ट हूँ, मैं पीड़ित हूँ। आपके पास कुछ भी नहीं, और आनंद में हैं आप! आपके पास है क्या बताओ तो?” पूछा?

एक बात आज आप निश्चित करो। आपके पास दो मन हैं— एक ‘संस्कार-वासित’ मन है, एक ‘संज्ञा-वासित’ मन है। तो जो संस्कार-वासित मन है, वो मन कहेगा कि “त्याग में ही सुख है। महाराज साहेब त्यागी हैं, वैरागी हैं और इसलिए सुखी हैं।” तो प्रभु के धर्म के संस्कारों से वासित जो मन है, उस मन में यह बात पड़ी है कि ‘महाराज साहेब सुखी हैं क्योंकि त्याग में सुख है।’ लेकिन दूसरा मन ‘संज्ञा-वासित’ है, जो कहता है कि “जिसके पास पैसे ज़्यादा, वे ज़्यादा सुखी।” दो विचारधाराएं चलती हैं ना? दो विचारधाराएं चलती है।

अब आज आप क्या निश्चित कर सकोगे? कि एक ही धारा अच्छी है। आप संसार में हैं। आपकी जितनी भी आवश्यकता है, आवश्यकता की पूर्ति आप कर सकते हैं। इसीलिए आपके व्रत में ‘अपरिग्रह’ नहीं है, ‘परिग्रह-परिमाण’ है। आप संसार में हैं और सद्गृहस्थ के रूप में आपको रहने का है। आप अच्छे कपड़े पहन सको, आप अपनी संतानों को अच्छी शिक्षा दे सको, आप बाहर से भी सुखी रह सको, समाज में-संघ में आप अग्रणी हैं, तो वहाँ भी जो दान का समय आएगा वहाँ आप अच्छी सी रकम लिखा सके, तो इतनी आवश्यकता जो है, उस आवश्यकता के मुताबिक आप संपत्ति की प्राप्ति करो, वहाँ तक तो कोई धर्मशास्त्रों कि भी बाधा नहीं है। लेकिन एक सीलिंग (Ceiling – सीमा) नक्की करो कि “इतने से ज़्यादा नहीं चाहिए।”

आप कुछ कर सकते हो। एक ज़माना था जब लोग कहते, “५-१० लाख तो बहुत हो गए।” आज ये ज़माना नहीं है। आज तो अच्छा फ्लैट लेने के लिए जाओगे पॉश एरिया (Posh area) में, तो ५-१० करोड़ का तो फ्लैट मिलेगा। तो चलो, आप २५ करोड़, ५० करोड़ कुछ भी रख लो, लेकिन एक्सटेंड पॉइंट (Extend point) रख लो कि ‘इससे ज़्यादा मुझे नहीं चाहिए।’ एक बात तो यह। और दूसरी बात यह कि ‘मैं जो कमा रहा हूँ, वो मेरे बल से नहीं, मेरी बुद्धि से नहीं, मेरे पुण्य से कमा रहा हूँ।’ ये बात तो निश्चित है। बल से नहीं, बुद्धि से नहीं, पुण्य से कमा रहे हो। और पुण्य पर स्वामित्व, आधिपत्य प्रभु का है। प्रभु ने ही नव-तत्त्व बताए। प्रभु ने ही पुण्य का मार्ग बताया। तो पुण्य से जो संपत्ति मिली, उस पर अधिकार प्रभु का, तो आपकी संपत्ति प्रभु की।

लेकिन व्यवहार में हम ऐसा करें कि जो नेट प्रॉफिट (Net profit) है, मार्च-एंडिंग (March ending) पर हिसाब किया। नेट प्रॉफिट जो हुआ, उसमें से १% या २% आप चैरिटी (Charity) में डाल सकोगे? मेरा चातुर्मास राजस्थान पावापुरी में था। गुरुदेव अरविंद सूरि दादा की निश्रा में। के.पी. ट्रस्ट (K.P. Trust) ने पावापुरी तीर्थ बनाया है। के.पी. ट्रस्ट के उस समय के प्रमुख बाबू भाई मेरे रूम में सामायिक के लिए कभी-कभार आते थे। उनका एक नियम था कि एक सामायिक तो अवश्य करने की हि। यूँ तो व्याख्यान में भी कर लेते, लेकिन सुबह जाना होता बाहर, तो मेरे रूम में आते, सामायिक करते और बाद में बाहर जाते। जहाँ तक सामायिक ना हो, वहाँ तक वे बाहर नहीं जाते। तो एक दिन सामायिक लेकर मेरे रूम पे वे बैठे थे, तब मैंने बाबू भाई से पूछा कि, “बाबू भाई! संपत्ति तो अपने जैनों के वहाँ बहुत ही है। आज करोड़पति नहीं, अरबपति जैन बहुत हैं। लेकिन तुम जितनी स्पीड (Speed) से पैसे खर्च सकते हो, ऐसी स्पीड से कोई पैसा खर्चता दिखता नहीं। लोग खर्चते तो हैं, लेकिन विचार कर-करके, सोच के।” चढ़ावा होता है ना? ‘१० लाख मण!’ तो एक मिनट तो चुप्पी होगी, संगीतकार को रखना पड़ेगा! फिर दो मिनट के बाद जवाब आएगा ‘१० हजार और ५ मण!’

तो मैंने पूछा कि, “तुम इतनी स्पीड से पैसे खर्च सकते हो, इसके पीछे क्या राज़ है?” भारत में कहीं भी पांजरापोल (गौशाला) खोल ली, ५ लाख रूपिये लिखा दिए! अपना मंदिर तो उन्होंने स्वद्रव्य से बनाया, लेकिन देवद्रव्य के पैसे इतना उनके पास थे कि हर साल मंदिरों के ट्रस्टियों को बुलाते, उनको भोजन कराते, उनका सम्मान करते और सम्मान के साथ देवद्रव्य का पैसा अर्पण करते। तो मैंने कहा कि “तुम इतनी स्पीड से कैसे खर्च कर सकते हो?”

तब उन्होंने कहा कि, “साहेबजी! मेरा गाँव मालगाँव, आबू के पास। मालगाँव में कुछ बिज़नेस नहीं था। मुझे मुंबई जाना था, क्योंकि मुंबई में हमारे रिश्तेदार थे। लेकिन मुंबई जाने की रेलवे की टिकट का किराया हमारे पास नहीं था। मेरी माँ संबंधियों से पैसे माँग कर आई और मैं मुंबई आया। फिर तो बस पुण्य प्रबल बन उठा, आज अरबोपति हूँ मैं! लेकिन मेरी माँ ने कहा था कि ‘बेटा! ये सब पुण्य का खेल है। तेरी बुद्धि से तू कमाया, ऐसा कभी भी मानना नहीं। तेरे बल से तूने संपत्ति प्राप्त की, ऐसा कभी मानना नहीं, ये पुण्य से मिला है।’ तो उसी समय मा ने कि तू जो नेट प्रॉफिट प्राप्त करे, उसमें से इतने परसेंट पांजरापोल में, इतने परसेंट देवद्रव्य में, इतने परसेंट साधारण में, इतने साधर्मिक में, इतने अनुकंपा में… वो निश्चित करा दिया। अब निश्चित हो गया है कि मेरी फर्म वर्ष में इतने करोड़ या इतने अरब कमा रही है। तो पहले से मुझे ख्याल है कि २% में कितने आ गए, ५% में कितने आ गए। तो अब वे तो मेरे रहे ही नहीं! तो मेरी कोशिश ये रहती है कि साल पूरे हों, ये पहले ये सब पैसे बाँटे जाएं। इसलिए मैं स्पीड से पैसे यूज़ (Use) कर सकता हूँ। तो पुण्य से मिला है!” आपके मन में भी निश्चित है ना? बोलो?

एक मारवाड़ी सेठ थे, करोड़पति। उसका मैनेजर था, एमबीए (MBA) पढ़ा हुआ और वह भी विदेश की डिग्री लेकर आया हुआ। लेकिन उसको हर मास उस समय १०,००० की सैलरी मिलती और सेठ करोड़ों रुपया कमाते। एक दिन बैंक मैनेजर ने इस सेठ के मैनेजर को बुलाया और कहा कि, “तुम्हारे जो सेठ हैं ना, उनका सिग्नेचर (Signature) एक समान नहीं होता है। तो तुम्हारे सेठ चेक तो लिखते हैं, लेकिन सिग्नेचर एक समान नहीं होता है, तो मैं कभी फँस जाऊँगा। क्योंकि सिग्नेचर उनके ही होने चाहिए और एक समान होने चाहिए। तो आप ऐसा काम करो, एक सिग्नेचर निश्चित कर दो और आपके सेठ को कह दो कि इसको घोंटा करें, जिससे कि एक समान सिग्नेचर हो।”

मैनेजर ने एक कागज़ पर सेठ का सिग्नेचर लिखा और कहा कि, “सेठजी! इसको घोंटा करो, जिससे आपका सिग्नेचर एक समान हो।” सेठ तो पढ़े-लिखे थे ही नहीं। तो सिग्नेचर को घोंट रहे थे। मैनेजर देख रहा था कि ‘साला ये आदमी अनपढ़ आदमी, सिग्नेचर भी अपना उसको लिखना आता नहीं, और वो हर महीने लाखों रुपए कमाता है! और मुझे तो महीने के १०,००० रुपए मिलते हैं। ये क्या खेल है? ये खेल क्या है?’

सेठ पढ़े नहीं थे, लेकिन यूँ बड़े बुद्धिमान थे। मैनेजर के मुख के भाव से सेठ को मालूम हो गया कि मैनेजर क्या सोच रहा है। तब सेठ ने कहा कि, “ये बुद्धि से पैसे नहीं आते हैं, पुण्य से पैसे आते हैं। तुम सोचते हो तुम एमबीए पढ़े हुए हो, तुम्हारे पास बुद्धि है, लेकिन बुद्धि कितना कमा सकती है? दस हज़ार ही कमा सकती है! मेरा पुण्य जो है, वो हर मास लाखों रुपए कमाता है। मैं नहीं कमाता हूँ। मेरी बुद्धि तो है ही नहीं, लेकिन मेरा पुण्य जो है, वो कमाता है।”

तो दो बातें आज मैंने आपसे कहीं। पहली बात तो यह कही कि आप एक सीलिंग  निश्चित करो कि २५ करोड़, ५० करोड़ कितने चाहिए? एक तो रण में जर्नी (यात्रा) होती है, और एक सड़क पर जर्नी होती है। सड़क पर जर्नी होती है ना, तो इसमें होटल (Hotel) भी आते हैं, आप रुक सकते हैं, चाय पी सकते हैं। रण की जर्नी में कोई स्टेशन नहीं आता, कोई होटल नहीं आता। अभी आपकी जर्नी रण की जर्नी जैसी है। कहाँ अटकने का है? कहीं भी अटकने का ही नहीं! जहाँ तक जीता है, वहाँ तक काम करता है। लेकिन अब स्टेशन आ जाएंगे। तो बस इतना कमा लेना है, इतने से ज़्यादा नहीं। तो एक बात तो यह हुई। और दूसरी बात यह हुई कि जो भी नेट प्रॉफिट है, उसमें से १%, २%, ५% आपकी जो भी इच्छा हो, चैरिटी में डालो।

और आपको मैं एक अनुभव की बात कहूँ कि जिन्होंने ऐसा किया, उनका अनुभव यह है कि “मैंने १% प्रभु को दिया, प्रभु ने ९९% मुझे दिया!” आचार्य रत्नसुंदर सूरीजी की सभा में एक युवान आया था। आचार्यश्री ने यही कहा कि, “पुण्य से तुम कमाते हो, प्रभु से कमाते हो, तो प्रभु को तुम कितना दोगे?” एक युवान प्रवचन के बाद आचार्यश्री के पास आया और उसने कहा, “गुरुदेव! नियम दे दो। नेट प्रॉफिट जो भी हो, १०%! वन टू फाइव (1 to 5) नहीं, १०% चैरिटी पे, प्रभु के उपदेश के मुताबिक साधर्मिक मे, आयंबिल शाला में और कहीं भी अच्छे क्षेत्र में मैं यूज़ करूँगा।” नियम ले लिया।

तीन-चार वर्ष के बाद वही युवान आचार्यश्री के पास आया। आचार्यश्री पहचान गए— ‘अरे! यह तो १०% वाला युवा है।’ तो आचार्यश्री ने पूछा, “नियम चलता है ना?” इतना ही पूछा— नियम चलता है कि ना? १०% वाला? तब युवा ने कहा, “गुरुदेव! नियम चलता भी है, नहीं भी चलता है।” आचार्यश्री भी हैरान हो गए। “अरे! या तो नियम चलता है या तो नहीं चलता है, दोनों साथ कैसे? नियम चलता भी है, नहीं भी चलता है?” तो आचार्यश्री ने पूछा कि, “ये कैसे बन सकता है कि नियम चलता भी है और नहीं भी चलता है?”

तब युवान ने जो बात कही, रत्नसुंदर सूरीजी अपने प्रवचन में कहते हैं कि ‘उस युवान की बातें सुनकर मेरी आँखें नम हो गईं कि वाह! क्या प्रभु शासन है!’ उस युवान ने कहा, “गुरुदेव! आपके पास से जब मैंने नियम लिया, तब मेरे मन में यही भाव था कि मैं कमाऊँगा, नेट प्रॉफिट जो होगा उसमें से १०% प्रभु को दूँगा। आज चार बरस हो गए, मैं १०% देता हूँ, ९०% मेरे पास होते हैं। लेकिन मेरी कोई कल्पना में बात नहीं बैठती। आपके पास जब नियम नहीं लिया था, तब मेरी सालाना आय ५० लाख की थी। और मैंने सोचा था पाँच लाख रुपया चैरिटी में यूज़ करूँगा। इस नियम लेने के बाद जो सालाना इनकम मेरी बढ़ी है, मेरी कल्पना में भी बात नहीं उतरती! ५० लाख का ६० लाख, ७० लाख हो सकता है, लेकिन ये तो दो करोड़, पाँच करोड़, १० करोड़! आज मैं १० करोड़ सालाना कमाता हूँ। तो अब मेरा विश्वास है, अब मेरी श्रद्धा है कि मैं प्रभु को कुछ नहीं देता हूँ। प्रभु कृपालु हैं, तो ९०% मुझे देते हैं। ९०% प्रभु मुझे देते हैं! मैं प्रभु को देता हूँ, ये भाव नहीं है। इसलिए मैं कहता हूँ कि नियम नहीं भी चलता है, नियम चलता भी है, १०% यूज़ करता ही हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि मैं १०% प्रभु को नहीं देता हूँ, प्रभु मुझे ९०% देते हैं! ९०% प्रभु की ओर से मुझे मिलते हैं।”

ये अनुभव आपका भी हो सकता है। और शायद आज कोई नियम ले और बाद में मेरे पास आवे, तो मैं अगले प्रवचन में पुणे वालों की बात करूँ। आज मुंबई वाले की बात की, कल पुणे वाले की बात करूँ! क्योंकि एक बात तो समान ही है— जहाँ भी प्रभु-शासन है, वहाँ अहोभाव, श्रद्धा, भक्ति गहरी ही है। मैं तो जहाँ भी जाता हूँ, आपकी आँखों में सिर्फ मुझे अहोभाव दिखता है। सिर्फ श्रद्धा दिखती है।

दो वर्ष पहले हम मुंबई में थे चौमासे में। घाटकोपर इलाके में जहाँ इस साल आचार्य रत्नसुंदर सूरि हैं, तो मेरे साधु-साध्वी कहते थे कि “उस घाटकोपर में, जहाँ लोग प्रवचन के बाद तुरंत ऑफिस के लिए निकल जाते हैं, वहाँ ११:३० बजे, १२ बजे पूरी कामा लेन (Cama Lane) में लोग खड़े होकर बोलते थे— महाराज साहेब मेरे घर पर चलो, मेरे घर पर चलो, मेरे घर पर चलो!” तब लगा, ये प्रभु शासन कितना सुंदर हमें मिला है!

और एक बात मैं आपसे करूँगा। सिर्फ अहोभाव आपके पास है। इस सफेद चद्दर को देखकर आपकी आँखें नम हो जाती हैं, तो आपने सब कुछ प्राप्त कर लिया। क्योंकि साधना का कंपोज़िशन (Composition) ये है— ९९% ग्रेस, १% एफर्ट! ९९% सिर्फ कृपा, १% आपका प्रयत्न है। और ये प्रयत्न है— आँखों का भीगापन, हृदय का भीगापन, आपकी श्रद्धा, आपका अहोभाव। प्रभु को देखकर, प्रभु के मुनि और साध्वीजी को देखकर आपकी आँखें नम हो गईं, १% आपने दिया, ९९% प्रभु की ओर से आपको मिल गए! १००% आपका हो गया! एक श्रद्धा, दूसरा कुछ नहीं चाहिए। एक श्रद्धा आपके पास है, पूरा प्रभु का शासन आपको मिल गया। पूरा साधना का सार, साधना का हार्द, साधना का अर्क आपको मिल गया।

और मैंने देखी है श्रद्धा आप सबके हृदय में है। रास्ते में आप जाते होंगे, इस श्वेत चद्दर को आप देखेंगे, आपका मस्तक झुक जाएगा। मेरे परमात्मा के मुनि, मेरे परमात्मा की साध्वी! मैं मेरी बात करूँ। किसी छोटे बाल-मुनि को मैं देखता हूँ, कोई नन्हे साध्वीजी को मैं देखता हूँ, तब मेरी आँखें आँसू से भर जाती हैं, हर्ष के आँसू से! क्या जिन-शासन हमें मिला है कि इतनी छोटी वय में बालक और बालिका जिन-शासन को समर्पित हो गए! और बालक-बालिका तो पूर्व जन्म के वैराग्य से वासित थे, आपका समर्पण कहाँ कम है? लाखों रुपए दे देना सरल बात है, लेकिन अपने संतान को प्रभु-शासन को समर्पित कर देना, ये कोई सरल बात नहीं है। लेकिन आपके पास भी ये समर्पण है। बेटी तैयार हो गई— “पापाजी मुझे दीक्षा लेनी है, मम्मी मुझे दीक्षा लेनी है”, आप प्रेम से रजा देते हो, अनुमति देते हो, ये आपका समर्पण कोई कम समर्पण नहीं।

तो ये श्रद्धा, ये समर्पण, ये भक्ति आपके पास है। आपके मन में है, तो आपके मन में तो आनंद ही आनंद होगा। पीड़ा कहाँ से आएगी? मन का शल्य, मन की पीड़ा किसके पास होती है? जिसके मन में ईर्ष्या है, जलन है, राग है, द्वेष है। लेकिन जिनकी आँखों में, जिनके हृदय में समर्पण की भावना है, श्रद्धा की भावना है, इनके मन में पीड़ा कैसे हो?

संत विनोबा जी, अपनी ग्राम-यात्रा में एक गाँव में गए थे। वहाँ एक छोटा सा आश्रम था। आश्रम वालों ने विनंति की तो विनोबा जी आश्रम में ठहरे। अब आश्रम वालों ने एक योजना बनाई। उस गाँव में एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर था। और ये बहुत साल पहले की बात है, जब हरिजनों को लोग मंदिर में प्रवेश करने नहीं देते थे। तो आश्रम वालों ने योजना बनाई कि हरिजनों को लेकर मंदिर में दर्शन के लिए जाया जाए। और ऐसे में विनोबा जी का पदार्पण हुआ, तो आश्रम वाले बहुत आनंद में आ गए कि ‘दो दिन बाद तो ये कार्यक्रम है, और विनोबा जी आ गए हैं, एक विश्व-विभूति! तो विनोबा जी की अगुवानी में ही हम ये कार्यक्रम करें।’ तो विनोबा जी को विनंति की।

विनोबा जी ने कहा, “हरिजन मंदिर प्रवेश में मुझे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन ट्रस्टियों की अनुमति होनी चाहिए। किसी के विरोध पर कहीं पर जाना, ये मेरे सिद्धांत से बाहर है। ट्रस्टियों की अनुमति हो तो हम जाएंगे।” अब आश्रम वालों ने क्या किया? गड़बड़ की! ११ ट्रस्टी थे। मंदिर के लेटर-हेड पर पाँच ट्रस्टियों ने सिग्नेचर कर दी कि ‘हरिजन मंदिर प्रवेश में हम सहमत हैं।’ और इस लेटर को विनोबा जी को दिखाया। विनोबा जी तो बाहर से आए थे, उन्हें तो मालूम नहीं कि मंदिर में ११ ट्रस्टी हैं और पाँच के ही सिग्नेचर हैं। विनोबा जी ने सोचा, ‘मंदिर के ट्रस्टियों के सिग्नेचर हैं और वे लोग सहमत हैं, तो फिर जाने में कोई हर्ज नहीं।’

निकला सरगस! सैकड़ों हरिजन दर्शन के लिए निकले, विनोबा जी आगे। पाँच ट्रस्टी सहमत, छह ट्रस्टी विरोध में! और उन छह ट्रस्टियों ने ठान लिया कि किसी भी हालात में हरिजनों को प्रवेश नहीं करने देंगे। उन्होंने गुंडे रोक दिए थे। ‘जब ये लोग मंदिर के पास आएं, लाठी लेकर टूट पड़ो।’ और जैसे ही ये लोग मंदिर के पास आए, सब गुंडे हाथ में लकड़ी लेकर आ गए। पहली लकड़ी विनोबा जी को लगी। सबसे आगे चलते थे। विनोबा जी की काया दुर्बल, मनोबल मज़बूत, आत्मा निर्मल, लेकिन काया दुर्बल। सिर पर लकड़ी पड़ी, नाक से लहू, ब्लीडिंग (Bleeding) और मूर्छित होकर विनोबा जी ज़मीन पर ढल गए। फिर तो सरगस तितर-बितर हो गया। विनोबा जी को स्ट्रेचर में सुलाया और आश्रम में ले गए। डॉक्टर आए, सब औषधि की।

विनोबा जी भान (होश) में आए। मूर्छा से बाहर आए। तब विनोबा जी ने सबसे पहला वाक्य यह कहा कि— “वाह! क्या प्रभु की कृपा! मैं तो प्रभु के दर्शन के लिए गया था और प्रभु ने सामने से चलकर मुझे स्पर्श दिया!” गुंडे की लकड़ी टच (Touch) हुई, उस समय भी उस गुंडे पर भी इतना मैत्री-भाव था! और इसलिए विनोबा जी कह रहे हैं कि ‘यह मैत्री-भाव का स्पर्श अर्थात् परमात्मा का स्पर्श!’ मैं तो सिर्फ दर्शन के लिए गया था और प्रभु का स्पर्श मुझे मिल गया!

आपको किसी के पर ईर्ष्या है, द्वेष है। आप जिनालय में आए, गोड़ीजी दादा के, चिंतामणि दादा के दर्शन आपने किए। और आप बोले—

“कमठे धरणेन्द्रे च, स्वोचितं कर्म कुर्वति।

प्रभुस्तुल्यमनोवृत्तिः, पार्श्वनाथः श्रियेऽस्तु वः॥”

(“कमठे धरणेन्द्रे च, स्वोचितं कर्म कुर्वति।

प्रभुस्तुल्यमनोवृत्तिः, पार्श्वनाथः)

‘प्रभु! धरणेंद्र आपकी पूजा करते थे। आपके मन में उनके पर जो भाव था, वही भाव आपके परम पावन शरीर पर उपसर्ग बरसाने वाले पर भी इतना हि भाव था! प्रभु मुझे ऐसा भाव दो ना!’ और आप बाहर निकलेंगे और वो आदमी मिलेगा जिस पर आपको द्वेष है। आप सामने जाएंगे, हाथ जोड़ेंगे, जय-जिनेंद्र कहेंगे, प्रणाम करेंगे और कहेंगे, “कोई काम हो तो कहना।” ये प्रभु का स्पर्श! समझ गए? प्रभु का दर्शन तो आपको मिला। प्रभु का स्पर्श मिला कि नहीं मिला?

तो प्रभु महावीर देव की माताजी का नाम है— ‘त्रिशल्यातीता ‘। मन, वचन और काया की पीड़ाओं से जो रहित हैं, वो प्रभु की माता होती है। इसलिए तो कहा गया कि ‘प्रभु की माता वो जगत की माता है।’ ‘प्रभु माता तू जगत नी माता’। वो जगत-जननी कैसे होती है? एसे होती है? कि ‘मन आनंदमय है, काया भी आनंदमय है, वचन भी आनंदमय है।’

तो आपका मन पीड़ा-रहित और आनंद से भरपूर कैसे हो? आपकी काया में भी आनंद की लहरें कैसे उठें? ये बात कल कहनी है। लेकिन आपका तो नियम है ना, मंगलाचरण को सुनने का नहीं! क्यों? मंगलाचरण का समय ख्याल मे है? आज तो मैं ८:२० पर आ गया था। ८:२०-८:२२ पर मैं आ जाता हूँ। तो आपको आने का समय क्या होता है? ८:१५। मेरे पहले आ जाते हैं ना आप? की मेरे पीछे आएंगे? ‘महाजनो येन गत: स पंथा’, आप आगे चलो, मैं पीछे आऊँगा। लेकिन प्रवचन में पहले तुम्हें आने का है, मैं बाद में आऊँगा। तो कल ये बात बतानी है कि आपका मन आनंदपूर्ण कैसे हो। ये तो आपके लिए भी आवश्यक है। आप स्ट्रेस एज (Stress age) में जी रहे हो। स्ट्रेस एज से निकालकर आपको आनंद के युग में प्रतिष्ठित मुझे करना है।

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