Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 10-08-2026 | Pune Chaturmas

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साक्षीभाव

साक्षी-भाव के दो चरण। पहले में कर्तृत्व जाता है। मैं कुछ करता ही नहीं। मैं कर्ता हूँ ही नहीं। कर्ता सिर्फ परमात्मा हैं। कर्ता सिर्फ सद्गुरु हैं। मुझे तो बस कार्य सौंपा गया था; मैंने कार्य कर लिया, लेकिन मैं कर्ता नहीं हूँ। ऐसे जब कर्तृत्व निकल जाता है, फिर आनंद ही आनंद रहता है। और यह कर्तृत्व निकल जाने के बाद, दूसरे चरणमें कार्यों पर जो आस्था थी, वह भी निकल जाती है।

साक्षीभाव के दूसरे चरण में कार्य भी छूट जाते हैं। ऐसी एक अवस्था आती है, जीवन में एक समय आता है जब तुम्हें भी लगता है कि जितने भी कार्य किए, कुछ ख़ास काम के नहीं थे। तुम तुम्हारे किए हुए कार्यों से थक जाते हो। और तुम निश्चित करते हो कि अब कोई कार्य नहीं, अब सिर्फ निवृत्ति तुम बाह्य प्रवृत्तियों से थकोगे, तो ही तुम भीतर जाओगे। तुम बाहर खोजते हो ना आनंद को – यहाँ से आनंद मिलेगा, वहाँ से आनंद मिलेगा… पर Actually आनंद कहाँ है – कभी सोचा है?

हमारे पास क्या है, बोलो। उपाश्रय भी तुम्हारा है, हमारा नहीं है; एक घर भी हमारे पास नहीं है। कोई बिज़नेस हमारे पास नहीं है। एक पैसा भी नहीं है। कुछ भी नहीं है। और फिर भी हम सिर्फ आनंद में नहीं, परम-आनंद में हैं! तो हमारा यह आनंद कहाँ से आता है? हमारे भीतर से आता है! याद रखो, आनंद भीतर से ही आता है, बाहर से नहीं आता है।


महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित ‘स्तवन चौबीसी’। पहला स्तवन, पहली पंक्ति—
“जगजीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”
यहाँ पार्श्वनाथ प्रभु मूलनायक हैं। आप सबको पार्श्वनाथ प्रभु की कितनी स्तवनाए याद होंगी? ३० स्तवनाए आपको याद हैं, तो आप हर महीने, हर दिन पर नई-नई स्तवना पेश कर सकते हैं। ऐसे सुंदर भाव स्तवनाओं में भरे पड़े हैं कि आप संस्कृत नहीं जानते हैं, प्राकृत भाषा नहीं जानते हैं, लेकिन गुजराती और हिंदी में ऐसी स्तवनाएं हमारे पास हैं कि प्रभु-शासन का पूरा हार्द हमें मिल जाए।
पूज्यपाद अध्यात्म-योगी कलापूर्ण सूरि दादा का अंतिम मिलन मुझे राजस्थान में हुआ था। एक छोटा सा गाँव और वहाँ गुरुदेव का मिलन हुआ। शाम गुरुदेव के चरणों में मैं बैठा हुआ था और मैंने गुरुदेव से विनंति की कि “मेरे लिए कुछ हित-शिक्षा आप प्रदान करें।” तब गुरुदेव ने कहा कि, “यशोविजय! देवचंद्र चौबीसी तुम्हें कंठस्थ भी करनी है, और उन स्तवनाओं के भावों के भीतर तुम्हें जाना है।” गुरुदेव ने कहा कि “एक ‘देवचंद्र चौबीसी’ तुम्हारे पास होगी, पूरा जिन-शासन तुम्हारे पास आ जाएगा।” महापुरुषों ने कितना परिश्रम उठाया हमारे लिए! एक ‘स्तवना चौबीसी’ में देवचंद्रजी भगवंत ने जिन-शासन की साधना का हार्द रख दिया! ऐसी ही चौबीसी महोपाध्याय यशोविजय महाराज की है। पहली पंक्ति में कहते हैं—
“जगजीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”
तीसरा विशेषण: ये परमात्मा मरुदेवा माता के लाडले पुत्र हैं। मरुदेवा माता का नाम क्यों लिया? इसलिए लिया कि तीर्थंकर के मात-पिता के नाम में भी साधना होती है। और हम देख रहे हैं, प्रभु महावीर के पिताजी का नाम सिद्धार्थ महाराजा था। ‘सिद्धार्थ’ यानी कि साक्षी-भाव! साक्षी-भाव के दो चरणों की बात हम कर रहे हैं। पहला चरण यह है, साक्षी-भाव का कि हम ‘कर्तृत्व-भाव’ से ऊपर उठ जाते हैं। कार्य हम करते हैं, अच्छा कार्य हम करते हैं, लेकिन उस कार्य पर का कर्तृत्व हमारा नहीं रहता। ‘प्रभु ने करवाया!’ एक उपधान तप कराने का आपको लाभ मिल गया। उपधान तप तो पूर्ण हो गया, माला परिधापन भी हो गया। लेकिन जब-जब भी आपकी स्मृति में ये बात आएगी, तब आपकी आँखें नम होंगी कि “कैसी प्रभु की कृपा! कि प्रभु की कृपा से उपधान तप कराने का लाभ मिला!” उपधान तप कराने वाले प्रभु, कराने वाले सद्गुरु, तुम तो सिर्फ निमित्त-रूप हो। प्रभु ने तुम्हें निमित्त के रूप में पसंद किया। तो पहला चरण यह है, जहाँ कार्य होते हैं, लेकिन कर्तृत्व नहीं होता। आयंबिल की ओली भी आपने कर ली, तो आपके मन में यही भाव आएगा कि ‘प्रभु की कृपा से यह आयंबिल की ओली परिपूर्ण हुई।’
हम पालिताणा में थे। गुरुदेव अरविंद सूरीश्वर दादा की निश्रा में। पालिताणा में चातुर्मास था। ५००-७०० आराधक साधना कर रहे थे। हिम्मत भाई बेड़ा वाले भी आराधना करने के लिए आए थे। चातुर्मास में उनकी एक ओली परिपूर्ण हो रही है। ७८ ओली परिपूर्ण हो रही है, लेकिन शरीर की शक्ति अच्छी है। तब उन्होंने सोचा कि ‘पारणा क्यों करूँ? पारणा तो करना पड़ता है, क्यों? कि यदि शरीर साधना के लिए उपयुक्त ना हो, तो पारणा करना भी पड़े। लेकिन मेरा शरीर स्वस्थ है, मैं पारणा क्यों करूँ?’ तो बिना पारणा किए, दूसरी ओली शुरू करने का उन्होंने निर्णय किया।
जिस दिन एक ओली परिपूर्ण हुई, दूसरी ओली शुरू हो रही है, उस दिन परमात्मा के पास में गए। परमात्मा के सामने बैठे, आँखों से आँसू निकल रहे हैं कि, “प्रभु! तेरी कृपा से ये ओलीजी की साधना हुई। मेरी कोई ताक़त नहीं है। एक एकासना करना, वो भी मेरी शक्ति के बाहर की बात है। लेकिन तेरी कृपा से ओलीजी की आराधना परिपूर्ण हुई। और नई ओली आज से शुरू हो रही है। और नई ओली भी मैं शुरू कर रहा हूँ, ऐसी बात नहीं है। आपकी कृपा से शुरू हो रही है, और आपको ही यह ओली परिपूर्ण करानी है!”
क्या बात थी! साधना का कार्य मेरा है, लेकिन कर्तृत्व मेरा नहीं है। कर्तृत्व प्रभु का है।
फिर दूसरा चरण आएगा। जब कार्य भी कम होते जाएंगे, और फिर लुप्त हो जाएंगे। हमारी परंपरा में एक सुंदर बात है। एक मुनिराज हैं, अभी-अभी उन्होंने दीक्षा ली है, तो गुरुदेव उन्हें स्वाध्याय की धारा में रख देंगे। और कहेंगे, “तुझे वैयावच्च की साधना भी करनी है, तो चार-पाँच घड़ा पानी वहोरकर लाना और ठार देना।” जैसे-जैसे दीक्षा पर्याय बढ़ता जाएगा, पानी का कार्य उसके हाथ से लिया जाएगा— “अब तुम्हें पानी भरने के लिए नहीं जाना।” फिर पर्याय आगे बढ़ेगा— “अब तुम्हें गोचरी के लिए भी नहीं जाने का है।” क्यों? ये परंपरा क्यों है? इसलिए है कि प्रारंभिक कक्षा का साधु और साध्वी सीधा भीतर उतर नहीं सकता है। उसके लिए स्वाध्याय भी ज़रूरी है और भीतर उतरने की शक्ति प्राप्त हो, इसलिए वैयावच्च की धारा भी आवश्यक है। वैयावच्च बहुत ही आवश्यक साधना है। तुम वैयावच्च करोगे जिन-जिन महात्माओं की, उनके आशीर्वाद तुम्हें मिलेंगे। और उनके आशीर्वाद से तुम्हारी साधना अनायास अपलिफ्टेड (Uplifted) हो जाएगी, उचक जाएगी।
अब दीक्षा पर्याय बढ़ गया, ‘तुम भीतर जा सकते हो’, तो कहा कि “अब बाहर का काम छोड़ दो, भीतर उतर जाओ।” तो दीक्षा के २० वर्ष हुए, अब कोई काम तुम्हारे पास नहीं है। लेकिन एक बड़ा काम तुम्हारे पास है, और वह है आंतर-यात्रा का! ‘तुम्हें तुम्हारे भीतर उतरना है।’ तो पहले चरण में कर्तृत्व नहीं होता है, दूसरे चरण में कार्य भी कम होते जा रहे हैं।
अभी-अभी एक घटना हुई। अमेरिका में एक बड़े प्रसिद्ध लेखक थे, जिन्होंने बहुत पुस्तकें लिखीं, लेकिन उनकी एक पुस्तक बेस्ट-सेलर (Best-seller) कृति है— ‘सिद्धार्थ’, जो संसार की २५-५० भाषाओं में अनूदित हुई, ट्रांसलेटेड (Translated) हुई है। तो ‘सिद्धार्थ’ के लेखक हरमान हेस (Hermann Hesse), बड़े प्रसिद्ध लेखक, बड़े समाज सेवक, बहुत ही समाज-सेवा का और शब्द-सेवा का कार्य उन्होंने किया। ६५ की वय उनकी हुई, तब उन्हें लगा कि ‘अब कार्य से निवृत्त होना चाहिए।’
एक अवस्था आती है। एक समय जीवन में आता है, जब तुम्हें भी लगता है कि जितने भी कार्य किए, कुछ ऐसे काम के नहीं थे। तुम तुम्हारे किए हुए कार्यों से थक जाते हो। और तुम निश्चित करते हो कि ‘अब कार्य नहीं, अब निवृत्ति!’ आप थके कि नहीं? थके हो तो साता पूछ लूँ? नहीं थके हो, तो आशीर्वाद दूँ कि ‘थक जाओ!’ युवा मित्रों के लिए ये बात नहीं है, लेकिन जो ६० और ६५ के करीब आ गए हैं, उनके लिए थकना ज़रूरी है। तुम बाह्य प्रवृत्तियों से थकोगे, तो ही तुम भीतर जाओगे। और आनंद कहाँ है, बोलो तो? आनंद तुम्हारे भीतर ही है! तुम बाहर खोजते हो ना आनंद को— ‘यहाँ से आनंद मिलेगा, यहाँ से आनंद मिलेगा!’
आनंद कहाँ है? बोलो, हमारे पास क्या है, बोलो। उपाश्रय भी तुम्हारा है, हमारा नहीं! एक घर हमारे पास नहीं है। कोई बिज़नेस हमारे पास नहीं है। एक पैसा हमारे पास नहीं है। हमारे पास कुछ भी नहीं है! और फिर भी हम आनंद में नहीं, परम-आनंद में हैं। तो ये आनंद कहाँ से आया? हमारे भीतर से आया! तो याद रखो, आनंद भीतर से ही आता है, बाहर से नहीं आता है।
बोलो, आपसे पूछूँ? क्या आपके पास कोई रेश्यो (Ratio) है कि ‘एक करोड़ रुपिये वाले के पास इतना सुख होता है, दो करोड़ रुपिये हैं, उसका सुख दुगुना हो जाता है। और चार करोड़ रुपिये हुए हैं, तो सुख चौगुना हो गया!’ है ऐसा कोई रेश्यो आपके पास? आपका भी अनुभव है। कहाँ से कहाँ पहुँचे हो? ७०-७५ वाले आदमी को पूछो— “कहाँ से कहाँ तुम आए? तुम बचपन में कहाँ थे?” तो वे कहते थे कि “लाख रुपिये तो बहुत बड़ी बात हमारे युग में कहलाती थी। लाख रुपिया जिसके पास हो, वो तो बड़ा धनिक कहलाता था। अब पाँच करोड़ हैं मेरे पास, तो भी मुझे कुछ लगता नहीं।”
अब एक बात पूछूँ। ‘लाख रुपिये थे, तब जितना सुख था, आज पाँच करोड़ रुपिये हैं, सुख बढ़ा कि घटा?’ एक आदमी था, सट्टे में लगा हुआ था। तो सट्टे में क्या होता है? रोडपति से करोड़पति, करोड़पति से रोडपति! तो लाख रुपिये हुए, और कमा लिया— ‘इतना आनंद हुआ! लाख रुपिये मेरे पास!’ फिर तो तेज़ी की सरपट गाड़ी दौड़ी! दो लाख, चार लाख, पाँच लाख! जिस दिन पाँच लाख रुपिये मिले, कितना सुख उसके पास होगा, आप कल्पना करो! ‘ज़िंदगी में पहली बार पाँच लाख रुपिये देखे!’, कितना सुख होगा! फिर पाँच से दस लाख पर गया। दस से पंद्रह लाख पर गया। अब गाड़ी रिवर्स (Reverse) में चली! पंद्रह से दस पर आई। अब मैं पूछता हूँ। पाँच से दस लाख पर वो आया था, तब उसके पास क्या था? सुख था! सुख था ना? अब बोलो ना! चाय पीकर आए हो ना? मासक्षमण वालों की तो अनुमोदना है। मासक्षमण कोई सरल तप नहीं है। बहुत ही दुष्कर है। वर्षी-तप एक वर्ष का, लेकिन एक उपवास, ज्यादा से ज्यादा, छठ और बियासणा आ जाता है। उसमें तो लगातार एक महीने तक कुछ खाने का नहीं। पित्त चढ़ता है, वोमिटिंग होती है। लेकिन तपस्वियों के पास एक अवधारणा, एक श्रद्धा है कि ‘मुझे कहाँ मासक्षमण करना है, मासक्षमण तो प्रभु कराते हैं!’ अब मैं पूछता हूँ कि पाँच से दस लाख तक वो गया था, और जब पहली बार दस लाख रुपिये उसके पास थे, तब सुख था ना? आज पंद्रह लाख पर होकर आया और फिर दस लाख हैं। अब सुख कितना होगा, बोलो? पंद्रह लाख हो गए और गाड़ी रिवर्स में चली। रूपिये चलते गए, चलते गए। पाँच लाख रूपिये गए, लेकिन दस लाख तो हैं ना? तो दस लाख हैं, तो दस लाख होने का सुख उसके पास है?
तो एक बात आप याद रखो। आपके पास ‘Haves’ का सुख नहीं है, ‘Have-nots’ का दुःख है! आप दुखी क्यों हो? इसका मूल राज़ यहाँ है। ‘Haves’ का सुख नहीं है, ‘Have-nots’ का दुःख है। टीवी है आपके वहाँ, और वो भी कलर टीवी ही है अभी तो! लेकिन पड़ोसी के पास स्लिम टीवी (Slim TV) आ गया, तो क्या होगा? “उसके पास तो स्लिम टीवी है! इतना पतला, कागज़ जैसा पतला! और अपने वहाँ तो ये सब पेटी जैसा है, बड़ा!” अरे, देखने में तो कोई दिक्कत नहीं है। फिर पेटी जैसा हो या कागज़ जैसा हो, फर्क क्या पड़ता है? लेकिन एक अवधारणा कि ‘स्लिम टीवी अच्छा होता है।’ और ‘हमारे पास स्लिम टीवी नहीं है।’ तो क्या हुआ? ‘Haves’ का सुख आपके पास नहीं है। ‘Have-nots’ का दुःख आपके पास है। अब ऐसे आदमी को सुखी कैसे करना? भगवान ऊपर से उतर जाएं, तो भी आपको सुखी कैसे करना? आप कहेंगे— “प्रभु! ऐसा मुझे चाहिए, ऐसा नहीं, पड़ोसी के पास यह नहीं होना चाहिए। मेरे पास हो, ना हो, कोई बात नहीं, लेकिन उसके पास तो नहीं ही होना चाहिए!” ये बात है ना?
अपने वहाँ एक लोककथा आती है। एक गाँव में एक माँ थी, बुढ़िया। झोंपड़ी में रहती थी। लोगों का काम-काज करती थी, तब रोटी मिलती थी। एक दिन उसे हुआ कि ‘ये तो क्या कोई ज़िंदगी है? ८० साल की उम्र हुई, तो भी मुझे काम करना पड़ता है, और तभी रोटी मिलती है।’ वहाँ उसके सुनने में आया कि जंगल में एक मंदिर है। मंदिर में यक्षराज हैं। वहाँ जाकर बैठ जाओ और यक्षराज प्रसन्न हो जाएं, आप जो भी मांगो, वो मिल जाए। माँजी तो पहुँच गईं जंगल में, यक्षराज के मंदिर में। पहले दिन खाया-पिया कुछ नहीं। दूसरा दिन नहीं खाया, नहीं पिया। एक ही बात, ‘यक्षराज प्रसन्न होने चाहिए।’ तीसरी रात यक्षराज प्रसन्न हुए और कहा, “बोल, तुझे क्या चाहिए?”
माँजी भी बड़ी पैत थीं। ८० साल की उम्र थी ना? अनुभव तो था ही। तो सोचा कि ‘आज कुछ मांग लूँ, और कुछ बाकी रह जाए, तो दोबारा आना पड़े यहाँ!’ बड़ी बुद्धिमती! माँ ने यक्ष से कहा कि, “यक्षराज! एक काम करो। तुम्हारा नाम लेकर जब मैं कुछ भी माँगूँ, तब मुझे मिल जाना चाहिए। जब भी माँगूँ!” यक्षराज ने कहा, “तथास्तु!” वो तो गई अपने घर। और यक्षराज का नाम लिया, और मांगा— “झोंपड़ी के बदले सात माले का महल हो जाए!” महल हो गया। “फर्नीचर हो जाए!” फर्नीचर हो गया। अब तीन दिन की भूखी थी, पारणा करना था। अब कहाँ काम करने का है? अब तो माँगना ही है। “चलो, सीरा, रबड़ी, मालपुआ सब कुछ आ जाओ।” थाली में आ गया सब। पारणा कर लिया।
अब उसके पड़ोस में दूसरी माँ रहती थी। उसने सोचा— ‘ये इसने क्या गड़बड़ कर दी? ओहो! सात माले का महल और ये फर्नीचर, सब कहाँ से लाया?’ पूछा, लेकिन वो कहने वाली नहीं! दुनिया के कोई भी लोग— अफ्रीका वाले, अमेरिका वाले सुखी बनें, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन पड़ोसी तो दुखी बनना चाहिए, सुखी बनना नहीं चाहिए! ठीक है ना? पड़ोसी के लिए तो बहुत प्रेम है ना? तो माँ ने तो नहीं कहा, लेकिन दूसरी माँ भी बड़ी पैत थी। उसने सोचा— ‘तीन दिन ये हाज़िर नहीं थी। कहाँ गई थी?’ सब पता इकट्ठा कर लिया। वो भी गई यक्षराज के मंदिर। यक्षराज प्रसन्न हुए— “बोल, तुझे क्या चाहिए?” तो उसने कहा, “हमारे गाँव की एक बुढ़िया आपके पास आई थी। आपने उसे वरदान दिया है। अब मुझे इतना माँगना है कि आप उसको जितना भी देना हो, उतना दो, लेकिन उससे दुगुना मुझे मिलना चाहिए! इसको जितना मिले, उससे दुगुना मुझे मिले!” यक्षराज ने कहा, “तथास्तु!”
अब वो बुढ़िया तो घर पर आई, चौदह माले का महल! पहले वाले का सात माले का, उसका चौदह माले का! सब डबल (Double)! पहले वाली को मालूम हो गया कि ‘अब मैं माँगूँगी, वो तो मुझे मिलेगा ही, लेकिन इसको डबल मिलेगा! ये तो कैसे, कहाँ से चलेगा? इसको डबल मिल जाए!’ अब तो कुछ माँगना ही नहीं। लेकिन एक दिन मांगा कि, “हे यक्षराज! मेरी एक आँख की रोशनी ख़त्म हो जाए!” ‘मैं एक आँख से अंधी हो जाऊँगी, वो दो आँखों से अंधी हो जाएगी!’ मेरी एक आँख की रोशनी ख़त्म हो जाओ। उसकी एक आँख फूट गई, और दूसरी वाली की दो आँखें फूट गईं। अंधी हो गई वो! अब फिर मांगा पहले वाली ने कि, “मेरे महल के आँगन में एक कुआँ हो जाए!” उसका तो एक कुआँ हो गया, दूसरी वाली के वहाँ दो कुएँ हो गए! और थी अंधी, कुएँ में जाकर पड़ गई। और पहले वाली ख़ुश हो गई— ‘वाह! गई वो तो!’ तो आपका सुख कहाँ पर है? ‘Haves’ में या ‘Have nots’ में?
हरमन हेस ने सोचा कि ‘सब कार्यों से अब निवृत्त हो जाएं।’ कार्यों से थक गए कि ‘ये सब कार्य किया, क्या अर्थ है? लोग प्रशंसा करते हैं, ‘तुम अच्छे हो।’ इससे मुझे क्या मिलता है?’ लोग आपको कहेंगे— “आपने बहुत अच्छा काम किया।” लेकिन इससे क्या होता है? यदि आप साधक हैं, तो आपके लिए प्रशंसा की बजाय निंदा अच्छी है। कोई भी साधक कभी भी इच्छा नहीं करेगा कि ‘कोई व्यक्ति मेरी प्रशंसा करे।’ इच्छा यही होगी कि ‘मेरी साधना में कहीं भी गलती है, कहीं भी फॉल्ट (Fault) है, तो दूसरा आदमी उस फॉल्ट को निकाले।’
तुम गुरुदेव के पास क्यों आते हो? गुरुदेव के पास तुम क्यों आते हो? मेरे पास बहुत साधक आते हैं। ऐसे साधक आते हैं, जो रोज़ के चार-पाँच सामायिक करते हैं। लेकिन मेरे पास आकर वे रड़ते हैं, उनकी आँखों से आँसू गिरते हैं कि “गुरुदेव! चार सामायिक एवरीडे (Everyday) मैं करता हूँ, लेकिन मेरा समभाव पुष्ट नहीं हुआ है!” आपका समभाव कैसा पुष्ट हुआ, बोलो?
आप सुबह पूजा करते होंगे। अब चंदन पूजा आती है ना? तब आप बोलेंगे शायद—
“शीतल गुण जेमां रह्यो, शीतल प्रभु मुख अंग।
आत्म शीतल करवा भणी, पूजो अरिहा अंग॥”
‘मैं प्रभु के नौ अंगों पर चंदन से पूजा कर रहा हूँ।’ लेकिन क्यों कर रहा हूँ? क्यों कर रहा हूँ? प्रभु तो ठंडे ही हैं। प्रभु तो शीतल ही हैं। लेकिन चंदन से मैं पूजा करूँगा, मैं ठंडा हो जाऊँगा! “आत्म शीतल करवा भणी”, मेरी जात को ठंडी पाड़ने के लिए मैं प्रभु की चंदन से पूजा करता हूँ। तो आप चंदन की पूजा करते हैं। और ये दुहा बोलते हैं। और आपकी श्राविकाजी दर्शन के लिए आई हैं। और वे सुनती हैं— “ओहो! हमारे श्रावकजी तो प्रभु से कहते हैं, ‘आत्म शीतल करवा भणी’!” तो आप तो ज़रा देख लें कि ‘श्रावकजी कितने ठंडे पड़े है?’ फिर वो घर पे जाएं, अपने लिए गरम चाय अच्छी-टेस्टी (Tasty) बनाकर पी लें। और तुम्हारे लिए चाय बनाएं, ना चाय को उबालें, ना शक्कर डाली हो, सिर्फ गर्म पानी आपके कप में उँडेल दें। और आप चाय ऐसे ही प्रेम से पी जाओगे। बरोबर ना? क्यों? अब तो आप ठंडे हो गए ना? ‘बॉयलर (Boiler) फट जाएगा!’ “क्या बनाया है ये? एक चाय बनाने की है, उसमें भी तेरा मन ठिकाने नहीं रहता! क्या करती है, क्या सोचती है, कहाँ-कहाँ उलझती रहती है? चाय तो ठीक से बनाओ, ढंग से बनाओ!” तो परीक्षा में आप फेल (Fail) हो गए! परीक्षा में आप फेल हो गए। तो प्रभु की पूजा चंदन से हम इसलिए करते हैं कि हम ठंडे हो जाएं।
तो ऐसे साधक मेरे पास आते हैं। जिनकी आँख में आँसू होते हैं कि “गुरुदेव! चार सामायिक रोज़ के होते हैं। फिर भी दाल में नमक कम है, और मेरा बॉयलर फट जाता है! गुरुदेव, कुछ कृपा करो। मेरे क्रोध को शांत करो। वरना ये मेरे सामायिक द्रव्य क्रिया हो जाएंगे। ये भाव क्रिया नहीं होगी।”
तो दो चरण की बात हम कर रहे हैं। साक्षी-भाव के दो चरण। पहले में कर्तृत्व गया। बहुत मज़ा आता है ना? तुम जब तक कार्य के कर्ता रहते हो, तब पीड़ा में ही रहोगे। “किसने ऐसा किया काम? और तुमने किया है काम? क्या इसके काम का कोई ठिकाना है? ऐसा काम किया जाता है?” क्या होगा? कितना दर्द होगा! लेकिन ‘मैंने कुछ किया ही नहीं’ तो? मैंने कुछ नहीं किया। मैं कर्ता हूँ ही नहीं। कर्ता सिर्फ परमात्मा हैं। कर्ता सिर्फ सद्गुरु हैं। मुझे तो कार्य सौंपा गया। मैंने कार्य कर लिया, लेकिन मैं कर्ता नहीं हूँ।
और ये कर्तृत्व निकल जाने के बाद, कार्यों पर जो आस्था थी, वो कार्य पर की आस्था भी निकल जाती है। ‘काम किए, क्या मिला? समाज की सेवा बहुत की।’ बहुत लोग मेरे पास आते हैं, साठ वर्ष के हो गए हैं, फिर भी संघ में ट्रस्टी हैं। तो मैं कहता हूँ कि “अब तुम रिज़ाइन (Resign) कर दो। अब साठ-पैंसठ वर्ष के हो गए हो, अब रिज़ाइन कर दो। और तुम घर में बैठकर साधना को सुदृढ़ करो।”
हमारे वहाँ भी एक परंपरा में बात आती है। गच्छाधिपति आचार्य भगवंत, जब उन्हें लगता है कि ‘मेरा समय नज़दीक आ गया है’, तब गच्छाधिपति पद अपने अनुगामी को सौंप देते हैं। उनके साथ विहार करते हैं। लेकिन अब कुछ करने का नहीं है। गाँव में गए। प्रभु का दर्शन हुआ। मंगलाचरण सुना दिया। ये गच्छाधिपति भगवंत, नए गच्छाधिपति को सब सौंपकर, उनके लिए निश्चित हुए एक खंड में पहुँच जाएंगे। पूरा दिन उस खंड में! किसी को आने की इजाज़त नहीं। एक शिष्य खंड के बाहर बैठेगा, खंड में नहीं। खंड के बाहर। और गुरुदेव का प्रतिलेखन का समय है, भीतर जाकर पडिलेहण कर लेंगे। गुरुदेव को गोचरी वापरनी है, तो पात्रा लेकर जाएगा, गुरुजी वापर लेंगे, पात्रा लेकर बाहर आएगा। चौबीस घंटों गुरुदेव स्वयं की साधना में रत रहते हैं।
तो ऐसा विचार यहाँ अमेरिकी विद्वान को आया कि ‘सब कुछ छोड़कर मैं कहीं चला जाऊँ। और ऐसी जगह चला जाऊँ, लोगों को पता भी ना चले।’ एक समुद्र किनारे पर एक बड़ा रिसॉर्ट (Resort) था। उसमें एक बंगला खरीद लिया गया उनके लिए। और एक दिन वे वहाँ पहुँच गए। एक रसोइया, एक घाटी (नौकर) और ये साहेब, तीन ही बंगले में, चौथा कोई नहीं। पूरा दिन स्वाध्याय करते, ध्यान करते, समुद्र के किनारे पर जाकर बैठते। किसी के साथ मिलने का नहीं। किसी के साथ एक शब्द बोलने का नहीं। किसी के साथ परिचय करने का नहीं।
अब अपन के साथ तो परिचय करो! दुनिया के साथ तो परिचय कर लिया, तुम्हारे साथ तुमने किया? ‘सबकी अपॉइंटमेंट (Appointment) तुमने ले ली, तुम्हारी अपॉइंटमेंट तुमने ली?’ आज एक प्रैक्टिकल एप्रोच (Practical approach) आपको दूँ— रोज़ रात को सोने से पहले, दस मिनट तुम्हारी अपॉइंटमेंट के लिए। तुम तुमसे पूछो— “क्या दोपहर इतना गुस्सा आ गया था, क्या ये गुस्सा वाजिब था? ये गुस्सा योग्य था?” तुम्हें लगेगा कि ये गुस्सा बिल्कुल अयोग्य था। प्रेम से यही बात उससे कही गई होती, तो इससे बहुत अच्छा रिज़ल्ट मिला होता। तो आप आंतर-निरीक्षण करते हैं, इंट्रोस्पेक्शन (Introspection) करते हैं, आपकी भूल आपकी नज़र में दिखती है, और आप निश्चित करते हैं कि ‘अब दोबारा यह भूल का पुनरावर्तन नहीं होना चाहिए।’
हरमान हेस बंगले में पहुँच गए। और बंगले के बाहर एक बोर्ड (Board) लगा दिया कि “पैंसठ वर्ष तक जिसने समाज की सेवा की है, उस आदमी को निजी एकांत में रहने का अधिकार है। इसलिए मेरे एकांत में खलल करने के लिए किसी को भी भीतर आना नहीं।”
अब अमेरिका का ‘न्यूयॉर्क ट्रिब्यून’ (New York Tribune), बड़ा अख़बार। उसके एडिटर (Editor) को हुआ कि हरमान हेस कहाँ गए? फिर पता चला कि उस रिसॉर्ट में गए हैं। एक पत्रकार, एक फोटोग्राफर (Photographer), सब लेकर चार्टर्ड प्लेन (Chartered plane) से वो वहाँ रिसॉर्ट में गया। रिसॉर्ट में फाइव-स्टार होटल (Five-star hotel) में वे उतरे। और पूछा होटल में कि “ऐसा कोई आदमी यहाँ आया है? हरमान हेस नाम है।” अब हरमान किसी से मिलते नहीं, किसी से परिचय करते नहीं। तो ना होटल वालों को मालूम है, ना किसी और को मालूम है। सब कहते हैं कि “ऐसे आदमी को हम पहचानते नहीं हैं।” सारे रिसॉर्ट में चक्कर लगा दिए। और वहाँ ये बंगला मिल गया।
लेकिन जब बोर्ड पढ़ा कि “पैंसठ वर्ष तक जिसने समाज-सेवा की है, साहित्य-सेवा की है, उसको अपने निजी एकांत में रहने का अधिकार है। तो आप कोई भी भीतर नहीं आ सकते।” न्यूयॉर्क ट्रिब्यून का एडिटर डिसिप्लिन (Discipline) वाला आदमी था। उसने सोचा कि ‘इसकी इच्छा नहीं है, तो अब हम भीतर नहीं जा सकते।’ वो चार्टर्ड प्लेन में फिर न्यूयॉर्क आ गया। लेकिन हरमान हेस से इंटरव्यू (Interview) नहीं लिया।
तो ये क्या था? साक्षी-भाव! कर्तापन को हम छोड़ दें, हम साक्षी हो जाएं। हम आनंद में हैं। क्यों आनंद में हैं? कुछ करना नहीं है, बैठे हैं। कुछ करना नहीं है, साक्षी-भाव में बैठे हैं तो मज़ा में हैं। आपके लिए भी इतनी परमिशन (Permission) दूँ, कि आप संसार में हैं, फ्यूचर प्लानिंग (Future planning) भी कर लो आप। लेकिन ऐसा प्लानिंग न करो कि जो प्लानिंग आपके मन की शांति को दूर कर दे। ऐसा सोचो कि ‘ऐसा हो जाए तो अच्छा। प्रभु की कृपा हो जाए और ऐसा हो जाए, बच्चे भी अच्छे हों, बच्चे अच्छे पढ़े-लिखे हों, संस्कारी हों।’ लेकिन ये सब पुण्य के बिना होता नहीं है। तो ‘ऐसा हो गया तो प्रभु की कृपा, नहीं हुआ तो हमारा पुण्य थोड़ा कम है, तो हम पुण्य को थोड़ा बढ़ा देंगे।’ तो फ्यूचर प्लानिंग भी होगा और आप आनंद में भी रहेंगे।
तो साधना जो है, वो आपको आनंद में रखने के लिए है, आपको आनंद देने के लिए है। हम यहाँ बैठे हैं सिर्फ आपको आनंद देने के लिए। कल मेडिटेशन (Meditation) हमने किया था। आप सिर्फ पचहत्तर मिनट बैठे थे। लेकिन आपको लगा होगा कि आनंद का एक मार्ग खुलता है। तो हर संडे को ये साधना-सत्र होगा और प्रैक्टिकली आनंद का मार्ग आपके लिए खुलेगा। और दूसरे दिनों में भी थ्योरेटिकली आनंद का मार्ग ही खोलना है। शास्त्रों की बात इस संदर्भ में करनी है कि ‘आपका जीवन आनंद से पूर्ण कैसे हो।’
प्रभु का शासन मिला है। प्रभु की साधना मिली है। जिस-जिस को प्रभु का शासन मिल गया, प्रभु की साधना मिल गई, वे आनंद में ही रहते हैं। आप सब आनंद में रहें, इतना ही आशीर्वाद।

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