सिद्धार्थ
इंद्र महाराजाने सिद्धार्थ राजा को ही क्यों पसंद किया प्रभु वीर के पिता के रूप में? सिद्धार्थ राजा कोई बड़े राज्य के राजा नहीं थे; क्षत्रियकुंड तो बहुत छोटा सा राज्य था। उस समय में मगध वगैरह और बहुत बड़े बड़े राज्य थे। तो ऐसे किसी बड़े राजा के वहाँ प्रभु की आत्मा को क्यों न रखा?
क्योंकि प्रभु का पितृत्व और प्रभु का मातृत्व किसी सामान्य पुरुष या स्त्री को नहीं मिलता है। प्रभु के माता और पिता वे ही हो सकते हैं, जो साधना के क्षेत्र में आगे निकले हुए हैं। बड़े राजा तो उस समय बहुत थे, लेकिन सब असंतुष्ट थे। सिद्धार्थ महाराजा सचमुच सिद्धार्थ थे; साक्षी-भाव में आए हुए थे।
सिद्धार्थ। जिसके सब काम पूर्ण हो गए; जिसका Doing समाप्त हो गया और जिसके पास सिर्फ Being ही बचा, वह सिद्धार्थ। प्रभु के नाम की तो ताक़त है ही; प्रभु के जो माता-पिता हुए, उनके नाम में भी एक ताक़त होती है। आप भी अगर सिद्धार्थ हो गए, साक्षित्व में आ गए, तो फिर आनंद ही आनंद है!
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित ‘स्तवन चौबीसी’। प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति—
“जगजीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”
प्रभु! जगत के लिए, हमारे लिए जीवन-रूप हैं, आनंद-रूप हैं, और हम सबके प्रिय भी प्रभु ही हैं। ऐसे प्रभु! माता का नाम क्या था? मरुदेवा।
तीर्थंकरों के नाम में तो एक ताक़त होती है कि प्रभु का नाम तुम लो और एक घटना घटित हो। क्या घटना घटित होती है? मानविजय महोपाध्याय ने स्तवन में लिखा है— “नाम ग्रहे आवी मिले मन भीतर भगवान।” प्रभु का नाम तुम उच्चारते हो, उसी क्षण प्रभु का अवतरण तुम्हारे हृदय में, तुम्हारे व्यक्तित्व में, तुम्हारे अस्तित्व में हो जाता है। सिर्फ प्रभु का नाम-मंत्र का उच्चारण, और प्रभु का अवतरण हृदय में! यह तो प्रभु के नाम की ताक़त है। लेकिन प्रभु के जो माता-पिता हुए, उनके नाम में भी एक बड़ी ताक़त थी। और उस ताक़त की बात हम कल कर रहे थे।
देवाधिदेव परमात्मा महावीर देव। पिता का नाम क्या? सिद्धार्थ। ‘सिद्धार्थ’, जिनके सभी काम पूर्ण हो गए। जिनका Doing समाप्त हो गया। जिनके पास सिर्फ Being ही रहा, वे सिद्धार्थ। हमें भी सिद्धार्थ बनना है। साक्षी-भाव में जब हम चले जाते हैं, आनंद ही आनंद होता है। दो शब्द हैं: कर्तृत्व और साक्षीत्व। कर्तृत्व यानी कि ‘Doing’, साक्षीत्व यानी कि ‘Being’। Doing में पीड़ा ही पीड़ा है। एक काम तुमने किया, किसी ने कहा, “क्या काम किया है? कुछ ठिकाना ही नहीं है! ऐसे काम कोई किया जाता है?” क्या हालात हो गए आपके, बोलो! बहुत लोग कहते हैं, “साहेबजी! इतना काम करते हैं, जश तो मिलता ही नहीं।” तो तुम जश के लिए काम करते हो? कल मैंने एक बात कही कि कार्य करना है, हो भी जाए कार्य, लेकिन कर्तृत्व को नहीं रखना है।
और इस संदर्भ में, हमारी परंपरा में एक शब्द आया— ‘निमित्त’। ‘मैंने कुछ नहीं किया, प्रभु ने मुझे निमित्त बनाया।’ हिंदी में एक कहावत है— ‘नेकी कर, और कुएँ में डाल।’ अच्छा काम कर लो, लेकिन फिर कुएँ में डाल दो। फिर उसका ढिंढोरा नहीं पीटना है कि ‘मैंने ऐसा काम किया।’ सापुतारा में ध्यान-शिबिर था। ४०० साधक आए हुए थे। अंतिम दिन प्रवचन में मैंने इस ‘निमित्त’ शब्द को खोला था। मैंने कहा कि, “प्रभु की इच्छा थी कि सापुतारा में ४०० साधकों को साधना का ज्ञान मिले। अब प्रभु की इच्छा थी, तो प्रभु के पास तो अनगिनत साउंड सिस्टम्स (Sound Systems) हैं। यशोविजय से बहुत अच्छी-बहुत अच्छी साउंड सिस्टम्स प्रभु के पास हैं। लेकिन प्रभु ने यशोविजय की साउंड सिस्टम को पसंद किया, तो इसका अर्थ यह हुआ कि यशोविजय को प्रभु ने निमित्त बनाया। मैंने कुछ नहीं किया है, प्रभु ने मुझे निमित्त बनाया।”
दो बातें हैं। आप भक्त हो या साधक हो? यदि आप भक्त होंगे, तो आप कहेंगे— ‘प्रभु ने मुझे निमित्त बनाया, मैंने कुछ नहीं किया।’ आप यदि साधक हैं, तो आप कहेंगे— ‘यह तो क्रमबद्ध पर्याय था। यह पर्याय इस रूप से खुलने वाला था, तो खुल गया। इसमें यशोविजय ने क्या किया? पर्याय खुलने वाली थी, खुल गई।’ अब मैं पूछूँ आपसे? आप साधक हैं या भक्त हैं? मैं आपको कंपोज़िशन (Composition) बता दूँ। साधक कौन है? जिसके पास एक श्रद्धा है कि 99% तो Grace ही काम करती है, 1% Effort मेरा है। 99% Grace प्रभु की, सद्गुरु की कृपा, 1% Effort मेरा। ऐसी श्रद्धा जिसकी है, वह साधक है। और जिसकी श्रद्धा है कि ‘I have not to do anything absolutely, He has to do’ जिसकी श्रद्धा में एक बात बैठ गई कि 100% Grace, and I am effortless person. ‘I have not to do anything absolutely’ ऐसी जिनकी श्रद्धा हो गई, वह भक्त है।
अब आप साधक हैं या भक्त हैं, बोलो! 1% Effort वाले आप हैं, तो आप साधक हैं। और आप Effortless person हैं, तो आप भक्त हैं। मैं भक्त हूँ, क्योंकि मैं Effortless person हूँ। मुझे कुछ भी करना नहीं है। जो भी करना है, प्रभु को करना है। मैं तो प्रभु के पास बैठ जाता हूँ। ‘तुझे जो करना है, सो कर! मैं बैठा हूँ। मैं कुछ नहीं करूँगा। तू ही कर जो भी करना हो।’ तो साधक के शब्दकोश में ‘निमित्त’ शब्द आएगा— ‘प्रभु ने मुझे निमित्त बनाया।’ भक्त की डिक्शनरी (Dictionary) में ‘निमित्त’ शब्द आएगा— ‘प्रभु ने मुझे निमित्त के रूप में चुना।’ क्योंकि 1% Effort आपके पास है। और यह 1% Effort निमित्त के रूप में बदल जाएगा। और जब आप Effortless person हैं, आप भक्त ही हो गए पूरे। तब आपको कुछ करना भी नहीं है।
एक बड़ी सुंदर घटना अपनी परंपरा में है। एक श्रीमंत थे। तुम श्रीमंत किसको कहते हो? मेरा प्रवचन है ना, ऐसे ही चलेगा। आप मिले तो आपके साथ बात करेंगे। तो तुम्हारी परिभाषा में श्रीमंत कौन होता है? “जिसके पास पैसे ज़्यादा, वह श्रीमंत।” मेरी परिभाषा यह नहीं है। अंग्रेजी में शब्द है— ‘रिच (Rich), रिच मैन (Rich man)।’ उसका कोई हिंदी पर्याय ‘पैसे वाला’ करेगा, तो मुझे इष्ट है। लेकिन कोई हिंदी पर्याय में ‘श्रीमंत’ शब्द को चुने, तो मुझे वह नापसंद है।
पैसा अलग संघटना है। लक्ष्मीजी अलग संघटना हैं। श्री यानी कि लक्ष्मी। श्री का अर्थ क्या होता है? लक्ष्मी! तो श्रीमंत का अर्थ क्या हुआ? लक्ष्मी वाला। बराबर? अब पैसा अलग चीज़ है, लक्ष्मी अलग चीज़ हैं। हमारी हिंदू संस्कृति में भी लक्ष्मीजी का बड़ा स्थान है। अपनी जैन परंपरा में भी लक्ष्मीजी का बड़ा स्थान है। पर्युषण के दिन आएंगे, फिर स्वप्न उतारने का दिन आएगा। महावीर-जन्म-वाचन श्रवण का! आप आए होंगे, पहला सपना, दूसरा सपना, तीसरा… ठीक है, नींद भी नहीं उड़ती, दोपहर को आए हो तो। लेकिन चौथा सपना आया— लक्ष्मीजी! तो सबकी नींद उड़ जाती है! लक्ष्मीजी! मुंबई में तो लाख-लाख मण, दस लाख मण, बीस लाख मण… ऐसे चढ़ावे होते हैं लक्ष्मीजी के! तो अब पैसे की परिभाषा क्या और लक्ष्मीजी की परिभाषा क्या? जो तुम्हारे पास है और तुम्हारे काम में आए या तुम्हारे परिवार के काम में आए, वह पैसा। और तुम्हारे पास जो संपत्ति है, वह राष्ट्र के काम में आए, समाज के कार्य में आए, संघ के कार्य में आए, वह है लक्ष्मीजी। समझ गए आप? आपके पास है, सिर्फ आपके काम में आए तो पैसे। और राष्ट्र के, समाज के, संघ के कार्य में यह यूज़ (Use) हो, तो लक्ष्मीजी।
तो जिस आदमी की मैं कहानी कहता हूँ, वह सच्चे अर्थ में श्रीमंत था। वह समझता था कि ‘यह लक्ष्मी मुझे कैसे मिली?’ आपको मैं पूछूँ? आपके साथ पूछ लूँ पहले। साता में हैं ना? बोलो, लक्ष्मीजी पसाय? साता में हैं ना? अब आप वेल-सेट (Well-set) हैं, मज़ा में हैं, क्या कारण? आप कहेंगे, “गत जन्म में दान किया था। और उस दान के प्रभाव से इस जन्म में मुझे संपत्ति मिली।” कहेंगे ना? तो ‘दूसरों को’ आपने दिया था गत जन्म में, तो इस जन्म में आपको मिला। अब गत जन्म में कोई लेने वाला ही नहीं होता, तो आप क्या करते? तो आप किनको दान देते? लेने वाला ही न हो, तो आप किनको दान देते? तो लेने वाले थे, तो आपने दान दिया। तो इस जन्म में आपको जो संपत्ति मिली, इसमें उस लेने वालों का हिस्सा है कि नहीं? बोलो। गत जन्म में जिन्होंने लिया था, उसके कारण आपके पास लक्ष्मी आई! तो आप संपत्तिवान बने, इसमें हिस्सा लेने वालों का है कि नहीं? तो संपत्ति आपकी ही है या सब की है? मैंने एक वाक्य कहा था— ‘You are only the trustees, and not the owners’ You are only the trustees, and not the owners. तुम तुम्हारी संपत्ति के मालिक नहीं हो, ट्रस्टी हो।
तो यह श्रीमंत वास्तविक अर्थ में ट्रस्टी था। रोज़ सुबह नोटों के बंडल लेकर बैठ जाता। सौ का, दो सौ का, पाँच सौ का… कोई भी व्यक्ति आए, ‘ले जाओ, ले जाओ, ले जाओ, ले जाओ!’ किसी का मुँह देखने का नहीं, नीची नज़र से पैसा देनेका। रोज़ बीस-पच्चीस हज़ार रुपिये वह सुबह में दे जाता था। सुबह में ही दे देता था। लेकिन नीची नज़र से! एक दिन ऐसा हुआ, उस श्रीमंत के मित्र इकट्ठे हुए। श्रीमंत नहीं था, उसके मित्र ही इकट्ठे हुए थे। एक मित्र ने दूसरे मित्र से पूछा कि, “हमारा यह मित्र श्रीमंत, दान तो बहुत देता है, लेकिन नीची नज़र से क्यों देता है?” तब दूसरे ने कहा कि, “मुझे भी सही कारण का पता तो नहीं है, लेकिन मैं मानता हूँ कि आज किसी को पाँच हज़ार रुपिये दे दिए, और ऊँची नज़र से देखकर दिया होता, तो क्या होता? उसका चेहरा दिख जाता। अब आज उसको पाँच हज़ार रुपिये दिए हैं, कल वह सामने रास्ते में मिलेगा और प्रणाम भी नहीं करेगा। अब अकड़ से चलेगा। तब मन में होगा कि कल तो पाँच हज़ार रुपिये लेने के लिए आए थे, और आज अकड़ कर फिरते हो! ऐसा भी भाव ना हो जाए, इसलिए वह नीची नज़र से दान देता होगा।” मित्र को लगा कि ‘बात तो ठीक है।’ लेकिन यह बात करते थे, वहाँ ही श्रीमंत आ गया। तो सबने कहा, “आओ-आओ, तुम्हारी बात चलती थी। अब एक प्रश्न का जवाब दो, कि तुम नीची नज़र से दान क्यों देते हो?” तब श्रीमंत ने कहा, “मुझे शर्म आती है, इसलिए मैं नीची नज़र से दान देता हूँ।” अरे भाई! दान देने में कोई शर्म आती है? काला-धौला किया तो शर्म आती है, दान देने में कोई शर्म आती है?
तब उस श्रीमंत ने जो कहा, वह आप याद रखना। उस श्रीमंत ने कहा कि, “पैसे प्रभु ने दिए हैं। प्रभु के वचन के मुताबिक मैंने अगले जन्म में दान दिया था, तो इस जन्म में मुझे संपत्ति मिली। तो प्रभु के वचन पर चलकर मैंने यह संपत्ति अर्जित की है, तो इस संपत्ति प्रभु की कृपा से मिली है। तो प्रभु ने मुझे संपत्ति दी है, तो संपत्ति प्रभु की है।” आपकी तिजोरी में है, वह आपका या प्रभु का? बोलो। आपका या प्रभु का? तो संपत्ति प्रभु की। अब दूसरी बात, उस संपत्ति को दूसरों को देने का भाव भी प्रभु ने दिया! वह भाव भी मैं कहाँ से लाता? सद्गुरु के पास बैठा, सद्गुरु ने प्रभु की बात कही कि प्रभु कहते हैं कि “तुम्हें जो मिला है, उसमें दूसरों का हिस्सा है, तो दूसरों को दो।” तो संपत्ति प्रभु की – पहली बात, संपत्ति दूसरों को देने का भाव प्रभु ने दिया – दूसरी बात। और मेरे हाथ को प्रभु निमित्त बनाते हैं – तीसरी बात। मेरा तो कुछ है नहीं! ना संपत्ति मेरी, ना दूसरों को देने का भाव मेरा! सब प्रभु का! और प्रभु मेरे हाथ का उपयोग कर रहे हैं। मेरे हाथ से प्रभु दान दे रहे हैं। और लोग कह रहे हैं कि ‘फलां सेठ दान दे रहे हैं!’ अब मुझे शर्म ना आए, तो क्या आए? मेरा कुछ हो, तब तो ठीक है। मेरा तो कुछ है ही नहीं!
आप पालिताणा जा रहे हो और किसी ने कहा कि ‘एक लाख रुपिये का चेक है। आपको पालिताणा में जो भी संस्था अच्छी लगे, उसका नाम भरकर चेक दे देना।’ आप पालिताणा गए। बाल आश्रम देखा, गुरुकुल देखा, श्राविकाश्रम देखा। और आपको लगा कि ‘श्राविकाश्रम बहुत अच्छा है। हमारी बालिकाएं जो त्यक्ताएं होती हैं, जो निराधार होती हैं, उनको आधार देने वाली यह संस्था है। यह निराधार बच्ची को आधार देती है।’ तो आपने सोचा कि एक लाख का चेक श्राविकाश्रम को दे देना। आप उसकी ऑफिस में गए और पूछा कि ‘एक लाख की स्कीम क्या है?’ मैनेजर तो खुश-खुश हो जाएगा! एक लाख रुपिये का दान! “अरे साहेब बैठो, मैं चाय मंगाऊँ, कॉफी मंगाऊँ?” “नहीं, बिल्कुल नहीं। चाय नहीं चलेगी, पानी भी नहीं चलेगा। क्योंकि ये पैसे मेरे नहीं हैं, मेरे मित्र के हैं। इस पर मुझे क्रेडिट (Credit) नहीं चाहिए। तुम ले लो, स्कीम में जमा कर दो, मैं आपको चेक दे दूँ, बात पूरी हो गई।” मेरा नहीं है! अब आपका एक लाख रुपिया है ही नहीं, तो आपको अहंकार आएगा? ‘मैंने लाख रुपिये दिए!’
गुजरात में धानेरा के पास धाखा गाँव है। वहाँ प्रतिष्ठा हुई। प्रतिष्ठा में बहुत अच्छी इनकम (Income) हुई। फिर ट्रस्टियों ने निश्चित किया कि कोई भी मंदिर पैसे से रुका हुआ हो काम उसका, तो पैसे देकर काम पूरा करवाना। “तीस लाख रुपिये का काम बाकी है? तीस लाख का चेक दे दो! पचास लाख का काम बाकी है? पचास लाख दे दो, काम पूरा हो जाए।” ऐसे स्थलों पर जाकर वे चेक देने लगे। अब एक साथ पचास लाख या करोड़ का अनुदान मिल जाए, तो संघ वाले तो प्रसन्न हो जाएंगे! अब संघ वाले कहेंगे कि ‘आपका सम्मान करना है।’ तो वे ट्रस्टी कहते हैं, “नहीं, सम्मान नहीं। पैसे प्रभु के हैं और प्रभु को हमने दिए हैं। हम तो बिचौलिए हैं। हमारा सम्मान कहाँ से?”
एक दिन धाखा संघ के प्रमुख मेरे पास आए। और उन्होंने मुझसे कहा कि, “गुरुदेव, मैं रिज़ाइन (Resign) कर रहा हूँ।” मैंने कहा, “क्यों? तुम क्यों रिज़ाइन कर रहे हो? क्या कुछ ट्रस्टी के साथ बोलचाल हो गई? कुछ अप्रिय घटना घटित हुई? क्या हुआ?” तब प्रमुख ने कहा कि, “साहेब, कुछ नहीं घटा। सब ट्रस्टी प्रेम वाले हैं। क्योंकि आप ही प्रेम वाले हमारे गुरु हैं, तो हम सब प्रेम वाले ही हैं। तो कोई अप्रिय घटना नहीं घटी है। लेकिन जहाँ भी हम जाते हैं, देवद्रव्य के पैसे लेकर, और पचास लाख रुपिये एक साथ दे देते हैं, तब वे संघ वाले कहते हैं कि ‘तुम्हारा सम्मान करना है।’ हम मना करते हैं, तो वे लोग सोगन्द देते हैं— ‘संघ की सोगन्द! संघ का सम्मान स्वीकारना ही पड़ेगा।’ सोगन्द देते हैं, तब हमें टीका तो करवाना पड़ता है, तिलक करवाना पड़ता है। लेकिन गुरुदेव! मुझे यह पसंद नहीं है। प्रभु के पैसे, प्रभु को दे दिए, हम कौन हैं बीच में? हमने पैसे कहाँ दिए हैं? हमारे पैसे कहाँ हैं? यह तो प्रभु के पैसे हैं। प्रभु के पैसे प्रभु को दिए, हमारा सम्मान कैसा? लेकिन वे लोग सोगन्द देकर हमारा सम्मान करते हैं। तो मैं सोचता हूँ कि प्रेसिडेंटशिप (Presidentship) से मैं रिज़ाइन कर दूँ। मुझे प्रमुख के रूप में नहीं रहना है।” फिर मेरी आज्ञा हुई तो उनको रहना पड़ा। लेकिन यह भाव था कि ‘प्रभु के पैसे मैं प्रभु को दे रहा हु, इसमें मेरा सम्मान कैसा?’
तो यह है साक्षीत्व की बात। प्रभु महावीर देव के पिता का नाम सिद्धार्थ। जो सिद्धार्थ होते हैं ना, उनके वहाँ ही वर्धमान का जन्म होता है। एक दिन कल्पसूत्र मैं पढ़ रहा था। एक भाई ने एक प्रश्न किया कि, “इंद्र महाराज ने सोचा कि प्रभु को राजकुल में रखना है। तो उस समय बड़े राजा तो बहुत थे, बड़े समृद्ध। यह सिद्धार्थ महाराजा इतने बड़े राज्य के राजा नहीं थे, क्षत्रियकुंड राज्य छोटा सा राज्य था। उस समय बड़े-बड़े राज्य मगध के और दूसरे बहुत थे।” तो मुझे पूछा गया कि, “इंद्र महाराज ने सिद्धार्थ महाराज को क्यों पसंद किया पिता के रूप में? दूसरे बहुत बड़े महाराजा थे, उनके वहाँ प्रभु की आत्मा को क्यों ना रखा?”
तब मैंने कहा कि, “प्रभु का पितृत्व ऐरे-गैरे को नहीं मिलता। जैसे-तैसे आदमी को प्रभु का पितृत्व मिलता नहीं है। प्रभु का मातृत्व भी ऐसे कोई स्त्री को मिलता नहीं है। प्रभु के पिता वे ही हो सकते हैं, जो साधना के क्षेत्र में आगे निकले हुए हे। बड़े राजा बहुत थे, लेकिन सब असंतुष्ट थे। सिद्धार्थ महाराजा सचमुच सिद्धार्थ थे, साक्षी-भाव में आए हुए थे। इसलिए वे इतने प्रसन्न थे, वे इतने सुखी थे, कि उनकी नज़र बड़े राजाओं की तरफ थी ही नहीं।”
आपकी नज़र कहाँ होती है, बोलो! फुटपाथ पर जो लोग रहते हैं, उन पर आपकी नज़र जाए, तो आपको आपका जीवन सुखी लगेगा कि ‘हम तो घर में रहते हैं, फ्लैट में, और वह भी अच्छे पॉश (Posh) एरिया (Area) में, लग्ज़रीयस अपार्टमेंट (Luxurious apartment) में रहते हैं!’ लेकिन अंबानी और अदानी को देखेंगे तो? आप दुखी क्यों होते हैं? आप दुखी क्यों होते हैं?
अहमदाबाद में एक आदमी ने नया फ्लैट लिया, पॉश एरिया में, लग्ज़रीयस अपार्टमेंट में। और फ्लैट भी बड़ा, दस हज़ार स्क्वायर फीट के एरिया का। इंटीरियर डेकोरेशन (Interior decoration) भी अच्छा किया था। फिर तो वास्तु-पूजा पढ़ाते हैं ना आप? सब संबंधियों को बुलाते हैं। क्यों? पूजा में शामिल होने के लिए? कि फ्लैट दिखाने के लिए? सबको क्यों बुलाते हो? ‘देख लो, मेरा फ्लैट कैसा है!’ भगवान के दर्शन के लिए बुलाते हो कि फ्लैट के दर्शन के लिए? सब संबंधी आए। कोई भी संबंधी इस पॉश एरिया में नहीं रहता था। और इसमें भी इतना बड़ा फ्लैट, इसकी तो किसी के मन में कल्पना ही नहीं थी। तो सबने कहा कि, “वाह! तुम बहुत कमाए। तुमने तुम्हारा नाम ऊँचा किया। बहुत कमाए तुम, और इतना बड़ा लग्ज़रीयस फ्लैट तुमने ले लिया!” और सबका सर्टिफिकेट मिला, तो आनंद में आ गया। अब उस घर में रहने का शुरू कर दिया।
फिर हाइपरटेंशन था, डायबिटीज़ था। तो डॉक्टर ने कहा— “रोज़ मॉर्निंग वॉक (Morning Walk) करने का।” रोज़ तीन-चार किलोमीटर चलता था। डेढ़ किलोमीटर आगे एक बड़ा बंगला बन रहा था। बहुत बड़ा बंगला था। बंगले के आसपास बड़ा बगीचा भी था। ‘होगा किसका?’ एक दिन उस बंगले के पास से वह पसार हो रहा था। वहाँ एक बड़ी लंबी गाड़ी आकर रुकी। और उसमें से उसका स्कूलमेट, बेंचमेट, छगन निकला! तो छगन और मगन दोनों मिले। कंधे से कंधे मिले। बैठे। तो मगन ने पूछा छगन से, “तू तो यार बंबई रहता है ना?” “हाँ, बंबई रहता हूँ। लेकिन अब बच्चे बड़े हो गए, कारोबार संभालते हैं, तो अब मैंने सोचा कि अब अहमदाबाद में जाना और पूजा-पाठ करना, महाराज साहेब का प्रवचन सुनना और आराम से रहना, तो यह बंगला अपना बन रहा है। चलो।”
मगन तो चौंक गया! ‘यह छगन, बेंचमेट, जब पढ़ता था ना, तब कुछ उसको आता नहीं था, डब्बू का ढ जैसा! साला बंबई गया, करोड़ों रुपिये कमा गया!’ फिर तो बंगले में गए। दस तो रूम थे बड़े-बड़े। मास्टर बेडरूम दस! रहने वाले दो ही थे। बड़ा हॉल, बड़ा बगीचा। फिर बैठे बंगले में। फिर छगन ने कहा, “पाँच करोड़ में जगह ली, पच्चीस करोड़ का कंस्ट्रक्शन (Construction) हुआ। अब दस करोड़ का इंटीरियर डेकोरेशन कराने का है। पैसे तो बहुत हैं अपने पास! फिर यहाँ रहेंगे और साधु-साध्वी महाराज का लाभ लेंगे। तीनों समय बस रसोड़ा (भोजनशाला) खुला अपना! बंबई में तो लाभ मिलता नहीं है, पच्चीसवें माले पर रहते हैं। यहाँ नीचे बंगला है, उपाश्रय बाजु में है, बड़े-बड़े संत आते हैं, तो लाभ लेंगे और बस मज़ा में रहेंगे।”
अब मगन को यह सुनकर क्या होगा? “साला यह छगन! पैंतीस करोड़ का बंगला, दस करोड़ का इंटीरियर, पैंतालीस करोड़, और बगीचे में एक डालेगा वह अलग, तो पचास करोड़ रुपए तो बंगले में डालेगा। तो सारे इसके पास पैसे कितने होंगे? मैंने तो पाँच करोड़ में फ्लैट लिया, और मैं फुला रहा हूँ! पाँच करोड़ का फ्लैट… पाँच करोड़… क्या पाँच करोड़ में!” अब मगन का फ्लैट छोटा हुआ? फ्लैट तो छोटा नहीं हुआ। मगन का फ्लैट तो छोटा नहीं हुआ। फिर दुखी क्यों हो गए अब? दुखी क्यों हुआ?
सुखी क्यों था? कि अपने सब संबंधी ऐसे पॉश एरिया में नहीं हैं। और जहाँ भी हैं, वहाँ भी इतना बड़ा फ्लैट तो किसी के पास नहीं है। ‘मैं सबसे सुखी हूँ।’ और आज हो गया यह मेरा बेंचमेट छगन, उसके पास इतना बड़ा बंगला और अपना तो छोटा फ्लैट है! क्या छोटे फ्लैट को? अब दृष्टि को कहाँ डालनी, वह तुम्हारे हाथ में नहीं है। तुम अंबानी और अदानी की संपत्ति गिने ही रहोगे, गिने ही रहोगे, और दुखी होगे, तो उसमें कोई क्या करेगा? बोलो!
मैंने बहुत बार मेरे प्रवचन में श्रीमंतों से कहा है कि “तुम्हारे पास इतने पैसे हो जाएं, कि बैंक में रख दो, इंटरेस्ट (Interest) इतना आता है महीने पर कि तुम इंटरेस्ट को भी यूज़ नहीं कर सकते। पाँच करोड़ का इंटरेस्ट आता है, तो पाँच करोड़ महीने में खर्चोगे कैसे तो? तो इतना इंटरेस्ट आता है, इतनी संपत्ति तुम्हारे पास है, अब बिज़नेस को वाइंड अप (Wind up) कर देना।” बोलो, नियम लेना है? बड़े-बड़े श्रीमंत बैठे हुए थे। “साहेबजी! आपकी बात तो सच्ची है, लेकिन…” मैं पूछता हूँ, ‘लेकिन’ क्या, बोलो! अब ‘लेकिन’ क्या बचा? इतनी संपत्ति तुम्हारे पास है, कहाँ डालनी, वह तुम्हें समझ में नहीं आ रहा है। अब तो निवृत्त हो जाओ!
एक अंकल आईटी (IT – Income Tax) ऑफिस में गए थे। संपत्तिवान थे। आईटी ऑफिस में गए। आईटी ऑफिस में गए और ऐसे ही एक चेयर (Chair) पर बैठकर देखने लगे। एक ऑफिसर, बड़ा आदमी था। उसने सोचा, कोई अंकल हैं, अंग्रेजी उसको नहीं आता होगा, और यहाँ तो अंग्रेजी में सब व्यवहार चलता है। तो अंकल से पूछ लूँ, कोई काम हो तो। तो अंकल के पास आया— “अंकल, कोई काम है? कोई सेवा हो तो मुझे कहिए, मैं यहाँ का ऑफिसर हूँ।” तो अंकल ने कहा, “नहीं, कोई काम नहीं है मुझे।” “काम नहीं है? ऐसे ही आप आए?” “हाँ, ऐसे ही आया हूँ, आप सबका दर्शन करने के लिए।”
अंकल कहते हैं, “आप सबके दर्शन के लिए आया हूँ!” “अरे, हमारे दर्शन के लिए? भगवान का दर्शन होता है, हमारा कोई दर्शन होता है? आप सच बोलो, आप क्यों आए हो? कोई काम से आए होंगे?” “नहीं, नहीं, कोई काम नहीं। मैं तो यूँ ही देखने आया हूँ, मैं किनके लिए कमा रहा हूँ? मैं कमाता हूँ, कमाता हूँ और इनकम टैक्स भरता हूँ, तो मैं सोचता हूँ कि इनकम टैक्स वाले को देख लूँ! उनका दर्शन कर लूँ कि मैं किनके लिए कमा रहा हूँ?”
भारत में टैक्स की सीलिंग (Ceiling) शायद सब देशों से ज़्यादा है। आगे तुम जाओगे, तब मालूम होगा। तुम दो अरब कमाओगे, और सच-सच तुम गवर्नमेंट को टैक्स दे दो, तो तुम्हारे पास श्रम ही बचेगा, पैसे नहीं बचेंगे। तो मैं आपसे पूछ रहा हूँ, ‘पैसे कमा रहे हो, लेकिन उसका हेतु क्या?’ आप कहोगे, ‘मेरे बच्चों के सुख के लिए।’ मैं हाँ कहूँगा। आप संसार में हैं, आपके बच्चे हैं। बच्चों को अच्छी पढ़ाई दो। बच्चों को सुविधा दो। बच्चों को संस्कार दो। लेकिन, आपके पास फ्लैट अच्छा है। दूसरा फ्लैट भी है कि ‘बच्चा बड़ा होगा, अलग होगा’, तो दूसरा फ्लैट भी आपने रख लिया है। दो-तीन कारें आपके पास हैं। साला इतना कमा रहे हैं कि इंटरेस्ट में से आपका चल जाता है। और फिर भी आप बिज़नेस में लगे ही रहते हैं सुबह से शाम तक।
अब मेरा प्रश्न है कि आप कमा रहे हो, लेकिन उसका हेतु क्या है? हेतु हो तब तो ठीक है। कि “साहेबजी, संसार में रहना है। तो संसार में अच्छे रूप से रह सकूँ एक सद्गृहस्थ के रूप में, इसलिए मैं कमा रहा हूँ।” ठीक है। लेकिन, सब कुछ मिल गया, अब क्यों कमा रहे हो? कल जवाब लेकर आओगे? आज रात सोचेंगे कि ‘मैं क्यों कमा रहा हूँ?’ आपको आवश्यकता है और आप कमा रहे हैं, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं। लेकिन आवश्यकता नहीं है कमाने की, फिर भी बिज़नेस चालू है। तो बिज़नेस क्यों चालू है, इसका आप निरीक्षण करेंगे, तो ही आपको ‘साक्षी भाव’ का अर्थ सच्चा मालूम होगा। आप ‘कर्तृत्व’ की दुनिया से हटकर ‘साक्षी भाव’ की दुनिया में कैसे आओगे, वह मैं कल बताऊँगा।
