ऋषभ जिनेश्वर प्रीतम माहरो
आप प्रभु को चाहते तो हैं, लेकिन किस रूप से? प्रभु आपको प्रिय हैं? प्रियतर? या प्रियतम? आपको संसार प्रिय है पर आप जैन कुल में जन्मे हैं इस लिए बचपन से मंदिर में जाते आए हैं, तो प्रभु आपको सिर्फ प्रिय हैं। संसार भी प्रिय है, प्रभु भी प्रिय है।
लेकिन संसार पर जितना प्रेम है, उससे ज़्यादा प्रेम अगर प्रभु पर है… संसार पर प्रेम नहीं है – ऐसा नहीं; पर संसार पर है उससे ज़्यादा प्रेम प्रभु पर है, तो प्रभु प्रियतर हैं। और अगर सिर्फ प्रभु ही प्रिय हैं, दूसरा कुछ नहीं – न कोई व्यक्ति, न कोई पदार्थ, न कोई घटना; प्रभु के सिवा दूसरा कुछ भी प्रिय नहीं है, तो प्रभु प्रियतम।
जो शरीर से, मन से, व्यक्तित्व से, अस्तित्व से, हृदय से पूरा प्रभु का है, वह साधु है। और जिसका शरीर संसार में है, लेकिन मन प्रभु के चरणों में समर्पित हुआ है, वह श्रावक है। आपको संसार में रहना पड़े, तो रहोगे शरीर से। लेकिन मन तो प्रभु को ही समर्पित करना है।
महामहोपाध्याय यशोविजय महाराज रचित स्तवन चौबीसी। पहला स्तवन—
“जगजीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”
प्रभु जीवन-दाता हैं। प्रभु हम सबके प्रिय आराध्य देवाधिदेव हैं। प्रभु प्रिय हैं। एक बार प्रभु के प्रेम में हम पड़े, तो प्रभु के ही हो गए, संसार छूट गया। ऐसा सम्मोहन, ऐसा आकर्षण प्रभु का है।
मेघकुमार पहली बार देवाधिदेव परमात्मा महावीर प्रभु के समवसरण में गए। वेरी फर्स्ट टाइम (Very First Time)! प्रभु का दर्शन हुआ, प्रभु के मुख को नज़दीक से निहारने का हुआ। ऐसा तो सम्मोहन मेघकुमार के मन पर छा गया कि मेघकुमार को लगा कि अब प्रभु के बिना एक क्षण मैं रह नहीं पाऊँगा। आनंदघनजी भगवंत ने भी कहा है—
“आनंदघन बिन प्राण न रहे छिन, कोटि जतन कर लीजे।”
‘मैं करोड़ों उपाय करूँ, लेकिन प्रभु का सम्मोहन इतना तो मन पर सवार हो गया है, हावी हो गया है कि एक क्षण प्रभु के बिना मैं नहीं रह सकता।’
मेघकुमार घर पर आए, माँ के चरणों में पड़े और माँ से कहा, “माँ! पहली ही बार प्रभु के समवसरण में आज मैं गया था। क्या प्रभु का सम्मोहन! माँ, अब मुझे लगता है कि प्रभु के बिना अब रहना मेरे लिए असंभव है। मैं प्रभु के बिना जी नहीं पाऊँगा। प्रभु के चरणों में ही मुझे रहना है, दीक्षा की अनुमति मुझे दे दे।”
इसी संदर्भ में भगवान हरिभद्राचार्य ने ‘चौथे पंचक’ सूत्र में दो शब्द दिए हैं— अभिव्रज्या और प्रव्रज्या। अभिव्रज्या – परमात्मा का सम्मोहन। परमात्मा के बिना न कोई व्यक्ति पसंद है, न कोई पदार्थ पसंद है। सिर्फ एक परमात्मा चाहिए, दूसरा कुछ भी नहीं। मेरे पास मुमुक्षु आते ही रहते हैं। मैं सब मुमुक्षुओं को एक ही बात कहता हूँ कि, “जब प्रभु का सम्मोहन इतना तुम पर हावी हो जाए कि तुम प्रभु के बिना एक क्षण नहीं रह पाओगे, ऐसा तुम्हें लगे, तभी तुम दीक्षा के अधिकारी हो।” परमात्मा ही चाहिए! परमात्मा की आज्ञा ही चाहिए! दूसरा कुछ नहीं! न कोई व्यक्ति पसंद है, न कोई पदार्थ पसंद है।
हमारा ये जो यूनिफॉर्म (Uniform) है, २६०० वर्ष से एक ही यूनिफॉर्म है। ५०० साल पहले की गुरु-मूर्ति आप देखो, यही यूनिफॉर्म है। ७०० वर्ष पहले के गुरुदेव के कोई चित्र को देखो, यही यूनिफॉर्म है। एक ही बात, मेरे प्रभु क्या कहते हैं! दुनिया के साथ अब कोई संबंध नहीं रहा। अब संबंध है केवल परमात्मा के साथ। मेरे परमात्मा को जो पसंद है, वही मुझे पसंद है।
सद्गुरु को हम एक ही बात पूछते हैं कि, “गुरुदेव, प्रभु की आज्ञा के पथ पर हम चलते हैं ना? आप ज़रा देख लो।” ये जीवन पूरा-पूरा प्रभु के चरणों में उँडेल दिया है। जीवन की एक सेकंड (Second) पर, जीवन के एक क्षण पर हमारा अधिकार नहीं है। अधिकार प्रभु का है। इसलिए तृतीय महाव्रत में दो बातें हमारे वहाँ आती हैं— प्रभु-अदत्त और गुरु-अदत्त। एक मुनि के पास, एक साध्वीजी के पास प्रभु-अदत्त एक क्षण भी नहीं होना चाहिए। प्रभु-दत्त ही क्षण होगा। आप जो भी करें, वो प्रभु-दत्त ही होना चाहिए। प्रभु ने जिसकी आज्ञा दी है, ऐसा ही तुम कर सकते हो। आज्ञा के बाहर एक पग तुम नहीं रख सकते। और प्रभु-दत्त जो है, वो भी ‘गुरु-दत्त’ होकर तुम्हारे पास आना चाहिए। प्रभु ने कहा है कि वैयावच्च तुम कर सकते हो, तो गोचरी के लिए जाना वैयावच्च ही है। लेकिन गुरु को पूछे बिना तुम वहोरने के लिए जा नहीं सकते हो। गुरु आज्ञा दें कि ‘हाँ, तू जा सकता है’, तभी तुम जा सकते हो। तो प्रभु-दत्त क्षण गुरु-दत्त क्षण के रूप में आपके पास आए, तभी आप स्वीकार कर सकते हैं।
न तो प्रभु-अदत्त क्षण तुम्हारे पास हो, न गुरु-अदत्त क्षण तुम्हारे पास हो। कितने बड़भागी हैं हम, कि हमारे एक-एक क्षण पर प्रभु के और गुरु के सिग्नेचर (Signature) हैं! है आपके पास ऐसा कुछ? इसलिए तो मैं कहता हूँ कि हमारी ईर्ष्या आती है? अहोभाव तो ज़रूर आता है। ये यूनिफॉर्म को आप देखेंगे, कहीं भी रास्ते में आप चलते होंगे, मुनिराज को देखेंगे, साध्वीजी को देखेंगे, आप वंदन करेंगे अहोभाव से। अहोभाव नो डाउट (No doubt) आपके पास है। लेकिन ईर्ष्या है? “मुझे नहीं मिला!” बोलो। ‘प्रभु का कितना प्रेम हम पर, कि हमारे एक-एक क्षण पर प्रभु सिग्नेचर दें!’ हमारे जीवन का एक क्षण ऐसा न हो, जिसके ऊपर प्रभु का सिग्नेचर न हो। और प्रभु का सिग्नेचर न हो, वो क्षण हमारे लिए निकम्मा है, मीनिंगलेस (Meaningless) है, इसका कोई अर्थ ही नहीं। तो एक-एक क्षण पर प्रभु का सिग्नेचर, सद्गुरु का सिग्नेचर!
मेघकुमार ने कहा माँ से कि, “माँ, प्रभु के बिना अब मैं नहीं टिक पाऊँगा। मेरा जीवन दूभर हो जाएगा। मुझे प्रभु के चरणों में ही रहना है। आप अनुमति दो।” धारिणी माता प्रभु की परम श्राविका थी, प्रभु के चरणों में समर्पित श्राविका। लेकिन पुत्र का मोह तो होता ही है। एक आँख से विरह के आँसू निकलते हैं, दूसरी आँख से हर्ष के आँसू निकलते हैं। हर्ष के आँसू इसलिए कि ‘मेरा बेटा छोटी वय में प्रभु के चरणों में जाने के लिए तैयार हो गया।’ और विरह के, वेदना के अश्रु— ‘मेरा लाडला मुझसे दूर जाएगा।’ आखिर धारिणी माँ ने अनुमति दी, श्रेणिक महाराजा ने भी अनुमति दी और मेघकुमार मुनि हो गए।
कितना प्रभु का प्रेम एन्जॉय (Enjoy) किया होगा कि संसार, एक क्षण में छूट गया! बाद की बात भी आपके ख्याल में है। संथारे में धूल आई, विचार हुआ— ‘ऐसा मुझसे सहन नहीं होगा।’ लेकिन प्रभु का सम्मोहन तो था ही! प्रभु के पास आए मेघकुमार मुनि। ऐसा नहीं कि सीधे घर पर चले गए, प्रभु के चरणों में आए— “प्रभु, ये मैं नहीं सहन कर सकता हूँ।” तो प्रभु ने मेघकुमार के अगले जन्मों की कथा कही कि “हाथी के भव में तुमने इतने कष्ट भोगे थे, अब रज संथारे में आई! लेकिन रज किनके चरणों की थी? वो तो सोच! ऐसे मुनिराज जिन्होंने मेरे चरणों में पूरा जीवन उँडेल दिया है, उनके चरणों की रज तेरे संथारे में! कहाँ से! तू कितना बड़भागी!” और मेघकुमार मुनि स्थिर हो गए।
उस समय मेघकुमार मुनि ने प्रभु से एक प्रार्थना की कि, “प्रभु! मैं तो मानता था कि आपका सम्मोहन इतना ज़्यादा मुझ पर है कि संसार पूरा छूट गया। लेकिन अब लगता है कि सम्मोहन इतना मेरे पास नहीं है। इतना सम्मोहन होता, तो आपको छोड़कर जाने की इच्छा कैसे हुई? प्रभु, शरीर पर जो राग था मेरा, वो आप पर जो मेरा प्रेम था, उससे भी सुपीरियर (Superior) हो गया! नहीं प्रभु, ये नहीं चल सकता। आपके पर का प्रेम ही सुपीरियर होना चाहिए।”
आनंदघनजी भगवंत ने पहले स्तवन में यही बात कही है— “ऋषभ जिनेश्वर प्रीतम माहरो।” प्रियतम! सुपरलेटिव डिग्री (Superlative Degree)! ‘प्रभु से प्रिय ज़्यादा दूसरा कोई नहीं।’ लेकिन मेघकुमार मुनि कहते हैं, “प्रभु! शरीर का प्रेम आपके प्रेम से भी सुपीरियर हो गया, जिससे आपको छोड़कर घर पर जाने की इच्छा हुई। आज आपके चरणों में प्रार्थना है कि मेरा शरीर पर जो राग है, उस राग को भी आप ले लो।” प्रभु के पास जाते हो रोज़, क्या कहते हो? कभी कहा कि, “प्रभु, तेरा राग, तेरा प्रेम इतना हावी हो जाए मेरे मन पर कि पूरा संसार छूट जाए।” संसार में रहना पड़े, रहोगे शरीर से। लेकिन मन तो प्रभु को ही समर्पित करना है। साधु की परिभाषा क्या है? जो शरीर से, मन से, व्यक्तित्व से, अस्तित्व से, हृदय से पूरा प्रभु का है, वो साधु है, वो साध्वी है। और जिसका शरीर संसार में है, लेकिन जिसका मन प्रभु के चरणों पर समर्पित हुआ है, वो श्रावक है। आपका मन संसार में या प्रभु में? बोलो तो! आपका मन कहाँ?
मन भी संसार में! तन भी संसार में, मन भी संसार में! नहीं, तन संसार में रह सकता है, मन कभी भी नहीं। मन प्रभु के चरणों में ही समर्पित हो जाए। उस समय मेघकुमार मुनि ने प्रभु से एक प्रतिज्ञा ली कि, “दो आँखें संयम के लिए साधन हैं। ईर्यासमिति का पालन आँखों के ज़रिए होता है। तो आँखों में कोई तकलीफ हुई, तो मैं दवाई कराऊँगा, चिकित्सा कराऊँगा। आँखों को छोड़कर शरीर के कोई भी अंग में कोई भी पीड़ा होगी, मैं चिकित्सा नहीं कराऊँगा, मैं दवाई नहीं लूँगा।” शरीर पर का राग छूट गया! परमात्मा पर का राग सुपीरियर हो गया। जगवालहो! सभी के प्रिय हैं परमात्मा।
मैंने ११ वर्ष की उम्र में दीक्षा ली। मेरी दीक्षा के दो बरस हुए थे। दादा गुरुदेव भद्रसूरि दादा, उनके चरणों में ही मेरा जीवन बीता, शैशव बीता। तो एक दिन मैंने दादा गुरुदेव से पूछा कि, “दादा! आपको दीक्षा किन महापुरुष ने दी?” तो दादा ने कहा कि, “प्रभु ने मुझे दीक्षा दी।” मैं १३ वर्ष का बाल-मुनि था। हमारे बाल-मुनि है ना, ऐसा छोटा। तो मैंने कहा कि, “गुरुदेव, प्रभु के सानिध्य में दीक्षा होती है। चतुर्मुख परमात्मा विराजमान होते हैं और उनके सानिध्य में दीक्षा होती है। लेकिन दीक्षा देने वाले तो सद्गुरु ही होते हैं, रजोहरण तो सद्गुरु ही देते हैं। तो आपने ऐसा क्यों कहा कि प्रभु ने मुझे दीक्षा दी?”
तब उन्होंने कहा कि, “पहले तू मेरी बात सुन।” मैंने कहा, “सुनाइए।” दादा ने जो बात कही, उसका सार इतना था कि दादा धार्मिक परंपरा के बहुत ही निष्णांत थे। गृहस्थ अवस्था में विधि-विधान के इतने निष्णांत थे कि प्रतिष्ठा की विधि भी गृहस्थ अवस्था में दादा करवाते थे। सुबह प्रभु का दर्शन, मध्याह्न में प्रभु की पूजा, शाम को आरती, ऐसे प्रभु की भक्ति, सामायिक, दो समय प्रतिक्रमण, सब कुछ दादा गृहस्थ अवस्था में करते थे। लेकिन दीक्षा का कोई भाव नहीं था, शादी भी हो गई थी। एक दिन राधनपुर में दादा रहते थे। चिंतामणि पार्श्वनाथ प्रभु के मंदिर में गए। राधनपुर में २५ जिनालय हैं, दो बड़े हैं— आदीश्वर भगवान का और चिंतामणि पार्श्वनाथ का। तो चिंतामणि पार्श्वनाथ प्रभु के जिनालय में दादा मध्याह्न पूजा के लिए गए। चंदन पूजा हो गई, अब पुष्प पूजा आई। पुष्प दादा के हाथ में था। और उस दिन दादा को एक विचार आया और उस विचार को दादा ने प्रभु के चरणों में रखा। दादा ने कहा, “प्रभु! एकेंद्रिय यह पुष्प, यह पुष्प एकेंद्रिय है, मैं आपके चरणों में रखूँगा, आप उसे स्वीकार करोगे, तो पंचेंद्रिय ऐसा हूँ मैं, मेरा आप स्वीकार करोगे?”
कोई दिन नहीं, आज ही ऐसे भाव आ गए! और जैसे ही प्रभु से पूछा कि, “प्रभु आप मेरा स्वीकार करोगे?”, उस समय मुकुट में एक पुष्प था, फिट (Fit) था, निकले ऐसा नहीं था, लेकिन निकला और दादा के हाथ मे पड़ा! दादा ने संकेत समझ लिया कि प्रभु कहते हैं कि “मैं तेरा स्वीकार करूँगा।” ‘अब प्रभु जैसे प्रभु मुझे स्वीकारने के लिए तैयार हैं, तो मुझे प्रभु के चरणों में समर्पित होना ही चाहिए। मुझे दीक्षा लेनी ही चाहिए।’ लेकिन घर वालों की सम्मति मिले, ऐसे कोई आसार नहीं दिखते थे। इतना प्रेम था कि दीक्षा की बात करें तो भी घर में हो-हल्ला मच जाए, ऐसी बात थी। अब मन में एक निर्णय हो गया कि ‘यदि प्रभु ने मेरा स्वीकार किया है, तो मुझे समर्पित होना ही चाहिए। लेकिन दीक्षा कैसे लेनी?’
तो दूसरा विचार आया कि ‘ऐसा कुछ करूँ कि सब संबंधी अनुमति दे दें।’ कैसे अनुमति देंगे? तो उस समय प्रभु ने ही विचार दिया और उन्होंने नियम लिया कि ‘जब तक दीक्षा का मुहूर्त न निकले, वहाँ तक गेहूँ, घी, गुड़ और चावल सबका त्याग।’ प्रभु के सामने हाथ जोड़ दिए। घर पर आए, १२:३० बज गए थे। श्राविका ने कहा, “भोजन के लिए बैठ जाओ।” अब गुजराती थाली में दोपहर को क्या होता है? रोटी, साग, दाल-भात! तो दादा ने कहा, “गेहूँ की रोटी नहीं चलेगी, चावल नहीं चलेगा। बाज़रे की रोटी बनेगी।” बाज़रे की रोटी बिना घी के तो कैसे खाएं? गरम पड़ती है। तो घी भी ‘रोटी को डाल दिया’ और कहा— “लो बाज़रे की रोटी!” घी का त्याग है मुझे, रूखी बाज़रे की रोटी, गुड़ भी नहीं, और दाल… खा ली! अब शाम को क्या खिलाना? शाम को खिलाना क्या? ना भाखरी, न खिचड़ी, कुछ भी चलेगा नहीं। वही बाज़रे की रोटी!
थोड़ी दिन में संबंधी थक गए कि ‘इससे अच्छा तो ये है कि तेरा मुहूर्त निकल जाए।’ मुहूर्त निकल गया, दीक्षा भी हो गई। अब दादा गुरुदेव ने मुझे कहा कि, “तूने ललित-विस्तरा तो पढ़ी है। ललित-विस्तरा पंजिका में आता है— ‘एकोऽपि शुभो भावः भगवत् प्रसाद लभ्यते’ (‘भगवत्प्रसादलभ्यत्वात् कुशलाशयस्य’) एक भी शुभ भाव, शुभ विचार प्रभु की कृपा से ही मिलता है। तो ये जो मुझे विचार आया कि प्रभु मेरा स्वीकार करेंगे या नहीं करेंगे, प्रभु ने स्वीकार किया। तो दूसरा विचार आया— कैसे प्रभु को समर्पित हूँगा? कैसे मैं दीक्षा लूँगा? तो ये जो विचार आए, वो प्रभु ने ही दिए थे। तो प्रभु ने विचार दिए, प्रभु ने भाव दिए और प्रभु ने दीक्षा के पथ पर मुझे दौड़ता किया। इसलिए मैं कहता हूँ कि प्रभु ने मेरी दीक्षा दी।”
एक भी शुभ कार्य तुम्हारे हाथ से हो, अच्छा है, लेकिन मानना कि ‘प्रभु ने मुझे इस कार्य के लिए सिलेक्ट (Select) किया था। मैंने कार्य नहीं किया है, प्रभु ने मुझे निमित्त बनाया।’ ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी (Oxford Dictionary) है ना, उसमें हर साल नए-नए शब्द दाखिल किए जाते हैं। तो ‘निमित्त’ शब्द जो है ना, वो पश्चिम में है ही नहीं। अपने पूर्व देश में ही है— निमित्त। ‘प्रभु ने मुझे निमित्त बनाया।’
अभी मैं प्रवचन देता हूँ, लेकिन मेरे मन में यही भाव है कि प्रभु ने मुझे निमित्त बनाया। मेरा कोई कर्तृत्व इसमें है ही नहीं। मैं जो भगवत्-कर्तृता की बात करता हूँ, उसके मूल में मेरे दादा गुरुदेव हैं। उन्होंने कहा कि “दीक्षा के विचार, दीक्षा के भाव प्रभु ने दिए। दीक्षा के लिए अनुकूलता प्रभु ने कर दी और दीक्षा के पथ पर मुझे दौड़ता किया, प्रभु ने किया, मैंने कुछ नहीं किया। सब उसने ही किया है।”
हम क्या करेंगे? हमारे किए क्या होने वाला भी है? अनंत जन्मों से हम राग और द्वेष में बहे, अहंकार में बहे, हम प्रभु के पथ पर कैसे चलेंगे? बिना प्रभु की कृपा, बिना प्रभु के प्रेम, प्रभु के पथ पर एक inch, एक सेंटीमीटर (Centimeter) चलना असंभव है। क्वाइट इम्पॉसिबल (Quite impossible), क्वाइट इम्पॉसिबल! अशक्य है! प्रभु के प्रेम से ही हम चल सकते हैं।
आनंदघनजी भगवंत को एक जिज्ञासु ने पूछा था कि, “गुरुदेव! हम तो प्रभु को चाहते हैं। हमारे लिए तो प्रभु प्राण से भी ज़्यादा प्रिय हैं। लेकिन क्या प्रभु हमें चाहते हैं?” आपको ऐसा सवाल हुआ? सवाल हुआ? संसार में होता है, ‘मैं उसको चाहता हूँ, वो मुझे चाहती है कि नहीं चाहती?’ यहाँ ये क्वेश्चन (Question) हुआ कि ‘मैं प्रभु को चाहता हूँ, प्रभु मुझे चाहते हैं?’ आप प्रभु को चाहते हैं, लेकिन किस रूप से? तीन अवस्थाएं हैं चाहत की—
१. प्रभु प्रिय लगें।
२. प्रभु प्रियतर लगें।
३. प्रभु प्रियतम लगें।
पहली अवस्था यह है – जैन कुल में जन्मे हैं, बचपन से मंदिर में जाते आए हैं, तो प्रभु प्रिय हैं। लेकिन संसार भी इतना ही प्रिय है। प्रभु भी प्रिय हैं और संसार भी प्रिय है।
फिर कंपैरेटिव डिग्री (Comparative Degree) आई — प्रियतर! संसार पे जितना प्रेम है, उससे ज़्यादा प्रेम प्रभु पर। श्रावक को इस भूमिका पर आना है। ‘संसार पर प्रेम नहीं है’, ऐसा वो नहीं कह सकता। लेकिन ‘संसार पर जो राग है, उससे ज़्यादा प्रेम प्रभु पर है।’ और दिखता भी है। एक लाख रुपिया खर्चना हो या बच्चे को देना हो, आप विचार करेंगे। लेकिन प्रतिष्ठा का अवसर है, मूलनायक दादा की प्रतिष्ठा ४ करोड़… “चलो अपना ४ करोड़ ५५ लाख।” चलो किसी ने कहा ५ करोड़… “अपना ५ करोड़ ५५ लाख।” संसार में थोड़े भी पैसे खर्चने है, आप विचार करोगे। प्रभु शासन के लिए खर्चना है, आप विचार नहीं करोगे। तो प्रियतर प्रभु बन गए। संसार पर जो प्रेम है, उससे ज़्यादा प्रेम प्रभु पर है। तो यह श्रावक की भूमिका है, प्रियतर की।
और सुपरलेटिव डिग्री (Superlative Degree) में क्या है? प्रियतम! प्रभु ही प्रिय हैं। दूसरा कोई कुछ प्रिय है ही नहीं! न कोई व्यक्ति, न कोई पदार्थ, न कोई घटना, न कोई चीज़! एक सिर्फ प्रभु ही प्रिय हैं। प्रभु के सिवा दूसरा कुछ भी प्रिय नहीं। ये सुपरलेटिव डिग्री मुनि की है साध्वीजी की। सुपरलेटिव डिग्री मतलब — प्रभु ही पसंद हैं, दूसरा कुछ भी नहीं।
रामायण की घटना है। लंका विजय के बाद सबका सम्मान रामचंद्रजी करते हैं। हनुमानजी तो बहुत बड़े भक्त हैं राम के। तो रामचंद्रजी ने अपने हाथों से मोती की माला हनुमानजी को पहनाई। फिर क्या हुआ? हनुमानजी ने माला हाथ में ली मोती की, तोड़ डाली। एक-एक मोती छुट्टा पड़ गया। फिर उठाया एक घण, ठोकम-ठोक। लोग समझने लगे, “हनुमान कहो, आखिर तो बंदर ही! बंदर में बुद्धि कितनी होती है? मोती को तोड़ता है!”
लेकिन रामचंद्रजी को पता था कि हनुमान क्या कर रहा है। रामचंद्रजी ने पूछा, “बेटा हनुमान, क्या कर रहा है तू? मोती को क्यों तोड़ रहा है?” तब हनुमानजी कहते हैं, “उसमें राम हैं कि नहीं, मैं देख रहा हूँ! उसमें राम शब्द लिखा है मोती में? जहाँ राम नहीं, उसका मुझे काम नहीं। मोती हो, एक मोती करोड़ रुपिया का हो, लेकिन उसमें राम नहीं है तो मेरे काम का नहीं है। जहाँ राम, वहाँ ही मेरा काम। जहाँ राम नहीं, उसका मुझे काम नहीं।”
तो हमारे लिए यह बात होती है, सुपरलेटिव डिग्री में परमात्मा। प्रभु हैं, प्रभु की आज्ञा इसमें है? हाँ, तो मुझे काम है। प्रभु की आज्ञा नहीं है? तो मुझे काम नहीं। जहाँ प्रभु हैं, वहाँ मैं हूँ। जहाँ प्रभु नहीं, वहाँ मैं भी नहीं हूँ। ये सुपरलेटिव डिग्री। तो आप कंपैरेटिव डिग्री में आ जाओ, हम सुपरलेटिव डिग्री में, कितना मज़ा आ जाएगा! मासक्षमण वाले जो भी तपस्वी आगे बढ़ रहे हैं, इन सबके लिए मैं कहूँगा कि वे कंपैरेटिव डिग्री से सुपरलेटिव डिग्री की ओर जा रहे हैं। शरीर का राग भी छोड़ देना, ये कोई सामान्य बात नहीं है।
शुरुआत के दिन में शरीर भी जो है वो ठीक नहीं रहेगा। सिर दर्द होगा, वोमिटिंग (Vomiting) होगी, कुछ ना कुछ होगा। लेकिन एक अड़ग निर्धार… मुझे मासक्षमण करना है। कितनी श्राविकाएं आती हैं, आँखों में आँसू होते हैं— “गुरुदेव, मासक्षमण करना है। कितने सालों से इच्छा थी लेकिन नहीं कर पाई। अब आप आए हैं, समूह मासक्षमण का उपक्रम है, मुझे करना है, लेकिन श्रावकजी मना कर रहे हैं।” एक तो ऐसा चमत्कार हुआ, एक श्राविकाजी मासक्षमण के सप्ताह पहले कहती थीं— “साहेबजी, क्या करूँ? मुझे मासक्षमण करना है लेकिन श्रावकजी मना कर रहे हैं।” दो दिन पहले वे श्रावकजी के साथ आईं और कहा— “साहेबजी! श्रावकजी ने भी मासक्षमण ले लिया!” मैंने कहा— “वाह! ये तो मिरेकल (Miracle) हो गया!”
तो जग जीवन जग वालहो… प्रभु ही जीवन हैं और प्रभु ही हमारे लिए प्रिय हैं। तो कंपैरेटिव डिग्री से सुपरलेटिव डिग्री की ओर जाने का।
