Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 19-07-2026 | Pune Chaturmas

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प्रभु-प्रभावितता v/s घटना-प्रभावितता

पहली तो बात यह होगी कि प्रभु प्रिय हैं। अर्थात प्रभु भी प्रिय हैं, संसार भी प्रिय है। फिर Comparative Degree – प्रियतर। प्रभु संसार से ज़्यादा प्रिय हैं; लेकिन अभी भी संसार प्रिय तो है ही। और फिर Superlative Degree – प्रियतम। सिर्फ प्रभु ही प्रिय हैं; प्रभु के सिवा दूसरी कोई व्यक्ति, दूसरा कोई पदार्थ मुझे प्रिय नहीं।

जब प्रभु हमारे लिए प्रिय या प्रियतर नहीं; बल्कि प्रियतम बन जाए, उनके प्रति हमारे मनमें तीव्र अनुराग हो, तभी हम प्रभु के प्रेम को झेल सकते हैं। और जब प्रभु का प्रेम हम झेलते हैं, प्रभु से प्रभावित बन जाते हैं, तब फिर घटनाओं से हम प्रभावित नहीं रह जाते। प्रभु-प्रभावितता अर्थात् आनंद; घटना-प्रभावितता अर्थात् पीड़ा।

आप पहले से निश्चित कर लेते हो कि यह घटना अच्छी और यह घटना बुरी। और फिर बुरी घटना घटित हो, तो आप नाराज़ हो जाते हो। पर इस तरह तो आपके आनंद का नियंत्रण आपने दूसरों के, घटनाओं के हाथमें दे दिया! जो भी घटना घटे, अगर आप प्रेम से घटना का स्वीकार कर लो, तो फिर आनंद ही आनंद है।


महामहोपाध्याय यशोविजयजी महाराजा ने परमात्मा की स्तवना करते हुए कहा कि, ‘प्रभु, मेरा पूर्ण प्रेम तेरे प्रति जग गया है।’

मेरे प्रभु सूं प्रगट्यो पूरन राग

पूर्ण प्रीति! एक है प्रीति परमात्मा के प्रति, दूसरी है परम प्रीति। नारद ऋषि ने भक्तिसूत्र के प्रारंभ में भक्ति की व्याख्या दी। किसी ने पूछा कि गुरुदेव, भक्ति क्या है? तब उन्होंने प्रांजल संस्कृत में कहा—

सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा  अमृतस्वरूपा

भक्ति अर्थात् प्रभु के प्रति परम प्रेम! प्रेम जितना उच्चतम हो सके, उतना उच्चतम हो, और वह प्रेम प्रभु के पर हो। तब वह प्रेम भक्ति में कन्वर्ट (Convert) होता है। परमात्मा के प्रति परम प्रेम। मैंने अनुवाद में कहा, ‘परमात्मा के प्रति परम प्रेम।’ लेकिन नारद ऋषि ने मूल में कहा, उसके पर परम प्रेम ‘परमात्मा’ शब्द नहीं वापरते। ‘उसके’ प्रति!

भक्त का व्याकरण बहुत गज़ब का होता है। भक्त के व्याकरण में तृतीय पुरुष में एकवचन होता है, ‘वह’। ‘वह’ माने कि ईश्वर, प्रभु। और प्रथम पुरुष में ‘मैं’,  भक्ति करने वाला। फिर व्याकरण आगे बढ़ता है। ‘मैं’ ‘वह’ में डूब जाता है, व्याकरण पूर्ण हो जाता है।आखिर करना क्या है? इस जन्म में हमें डूबना है। परम के प्रेम में डूबना है। एक दफे परम के प्रेम का अनुभव आपको हो जाए, संसार आपका छूट जाए।

आचार्य रत्नसुंदरसूरीजी ने कलापूर्णसूरी दादा से पूछा था कि, “दादा, आपके पर परमात्मा का प्रेम खूब बरसा, और आपने परमात्मा के प्रेम को स्वीकारा, झेला। हम पर भी परमात्मा बरसते हैं, लेकिन हम परमात्मा के प्रेम को झेल नहीं सकते। आपने परमात्मा के प्रेम को स्वीकारा, प्रेम की एक-एक बूँद को आपने स्वीकारा। आपके पास ऐसी क्या विशेषता है?” बहुत ही अच्छा प्रश्न था।

हमने परमात्मा के प्रेम को स्वीकारा, झेला… अब हम एवरफ्रेस, एवरग्रीन (Ever fresh, Ever green)। हम अत्यंत प्रसन्न हैं। मैं कहता हूँ, जब से प्रभु प्रेम का अनुभव मुझे हुआ, उसके बाद एक क्षण ऐसा नहीं आया, जब मैं विषाद में गया होऊँ। प्रभु ने अपने एयर-कंडीशन्ड (Air-conditioned) हाथ में मुझे रखा है। लेकिन ऐसा नहीं कि प्रभु यशोविजय को ही अपने एयर-कंडीशन्ड हाथ में रखें। आपको भी रखें। तो आपको क्या करना चाहिए?

आपको भी अब मालूम हो गया कि प्रभु के प्रेम को हम झेल लेंगे, हम स्वीकार लेंगे… आनंद ही आनंद है! पूरा आनंद लोक हमारे सामने परिदृश्यमान होता है। आनंद तो चाहिए न? सुख तो चाहिए न? सुख के लिए तो दौड़ते हो? प्रभु की गारंटी है कि मैं तुझे आनंद से भर दूँ। तू तेरे हृदय को मेरे प्रेम से भर दे। प्रभु के प्रेम से हृदय भर गया, आनंद ही आनंद है। एक क्षण मेरे जीवन में ऐसा नहीं आया, जब मैं विषाद में गया होऊँ।

रोग आए, प्रेम से रोग को देखा। प्रेम से रोग को स्वीकारा। कोई भी घटना आई, प्रेम से घटना का स्वीकार किया। आप क्या करते हो? घटना को फेस (Face) करते हो। अनुकूल घटना आई, सुख हुआ। प्रतिकूल घटना आई, पीड़ा हुई। अब आप देखते हैं, अनुकूल घटनाएं कितनी, और प्रतिकूल घटनाएं कितनी? जीवन में प्रतिकूल घटनाएं आती ही रहती हैं। लेकिन हमें घटना-प्रभावित नहीं बनना है। अब तक अनगिनत जन्मों में हम घटना-प्रभावित हुए। इस जन्म में हमें प्रभु-प्रभावित होना है।

राबिया बड़ी संत हो गईं। राबिया के घर पर एक दिन एक श्रीमंत भक्त आया। पहली बार राबिया के द्वार पर वह आ रहा है। नाम बड़ा सुना है कि राबिया इस युग की श्रेष्ठ संत है, और उसके दर्शन से पाप कट जाते हैं। तो वो श्रीमंत राबिया के द्वार पर आया। सोचा था, ‘इतनी बड़ी संत है तो बड़ा आश्रम होगा, आलीशान आश्रम।’ लेकिन एक झोपड़ी में राबिया रहती है। झोपड़ी भी कैसी? टूटी-फूटी। एक पलंग था, वो भी टूटा-फूटा। पानी भरने के लिए एक घड़ा था, वो घड़े के बीच में छिद्र था। दो लोटे से ज़्यादा पानी घड़े में रखो तो छिद्र से पानी निकल जाएगा। श्रीमंत ने यह देखा, आश्चर्यचकित हो गया। ‘इतनी बड़ी संत, पूरे देश में इसका नाम गूँज रहा है… और ऐसे हालात!’

आप सद्गुरु पास आएंगे न, तब क्या देखेंगे? मैंने पहले भी कहा था, सद्गुरु आपके जैसे ही मनुष्य हैं। दो पैर वाले, दो हाथ वाले। सद्गुरु की पहचान उनकी आँखों से होती है। सद्गुरु की आँखों में देखो। जिनकी आँखों में प्रभु हैं, जिनकी आँखों में निर्मलता है, जिनकी आँखों में वीतराग दशा है, वे सद्गुरु हैं। सद्गुरु के पास जो वस्तुएं हैं, वो नहीं देखनी हैं। सद्गुरु के शरीर को भी नहीं देखना है। सद्गुरु की आँखों को देखनी है। आँखों में परमात्मा हैं। जब हृदय में परमात्मा आ गए, तब आँखों में परमात्मा ही होंगे।

तो श्रीमंत ने राबिया की आँखों में नहीं देखा। आँखों में देखा होता तो सब प्रॉब्लम सॉल्व (Problem Solve) हो गए होते। लेकिन इर्द-गिर्द देखा। झोपड़ी टूटी-फूटी, पलंग भी ऐसा, घड़ा भी ऐसा, क्या बात है यहाँ? फिर श्रीमंत ने कहा कि, “ये जो घड़ा है, मिट्टी का, उसके बीच में छिद्र है, तो मैं नया घड़ा यहाँ रिप्लेस (Replace) कर सकता हूँ?” श्रीमंत ने सोचा कि घड़े से शुरुआत करूँ, फिर पलंग नया बना दूँ, फिर झोपड़ी को फाइव स्टार (Five Star) आश्रम में बदल दूँ। तो शुरुआत तो घड़े से की। “मैं इस घड़े को रिप्लेस कर सकता हूँ?” राबिया ने मना कर दिया, “नहीं, घड़े को नहीं बदलने का।” श्रीमंत ने हाथ जोड़कर कहा, “मुझे लाभ दो, आप क्यों मना कर रही हैं?”

तब राबिया ने कहा, “मैं उत्तर तो दूँगी, लेकिन पहले मेरे दो प्रश्नों के उत्तर तुम्हें देने होंगे। पहला प्रश्न मेरा यह है कि प्रभु सर्वज्ञ हैं? इज़ ही ऑल नोइंग? (Is He all-knowing?)” तो श्रीमंत ने कहा, “हाँ, प्रभु तो सब कुछ जानते हैं।” “अच्छा, दूसरा प्रश्न। प्रभु सर्वशक्तिमान हैं? इज़ ही ऑलमाइटी? (Is He almighty?)” तो श्रीमंत ने कहा, “हाँ, प्रभु सर्वशक्तिमान हैं।”

तब राबिया कहती है, “प्रभु ने अपने ज्ञान से देखा कि मेरे घड़े में छिद्र है। प्रभु सर्वशक्तिमान हैं, तो भी प्रभु ने मेरा घड़ा क्यों नहीं बदला?” और राबिया प्रभु के चरणों में गिर जाती है कि, “प्रभु, तेरा कितना उपकार है! कि मेरी निष्पृहता, मेरी त्यागवृत्ति, मेरी वैराग्यवृत्ति डेवलप (Develop) हो, इसलिए तूने छिद्र वाला घड़ा और टूटा-फूटा पलंग मेरे पास रखा है। मेरी निष्पृहता डेवलप हो, इसलिए तूने यह किया है, तेरा कितना उपकार है!”

तो प्रभुमय जीवन राबिया का था। संत जो भी होते हैं, उनका जीवन, उनका हृदय, उनका अस्तित्व प्रभुमय ही होता है।

तो रत्नसुंदरसूरीजी ने पूछा, कलापूर्णसूरी दादा से, कि “दादा, आप पर प्रभु का प्रेम बरसा, मुझे ख्याल है। मेरे पर भी प्रभु का प्रेम इतना ही बरस रहा है। लेकिन मैं झेल क्यों नहीं पाया? और आप झेल पाए, कारण क्या है?” तब गुरुदेव ने कहा कि, “प्रभु के प्रति जब हमारे मन में तीव्र अनुराग होता है, तभी हम प्रभु के प्रेम को झेल सकते हैं। और मेरे पास प्रभु के प्रति अनुराग है, लेकिन वो भी प्रभु ने दिया है। प्रभु के प्रति प्रेम मैं कहाँ से लाऊँगा? मैं तो अकिंचन हूँ। निपट अज्ञानी, मैं कहाँ से लाऊँगा? प्रभु प्रति जो मेरा प्रेम है, वो भी प्रभु का ही दिया हुआ है। प्रभु ने अनुराग दिया, और उस अनुराग के बल पर प्रभु का प्रेम मुझ पर अवतरित हुआ है।”

तो महोपाध्यायजी कहते हैं कि, “प्रभु का परम प्रेम मुझ पर उतरा है।” परम प्रेम। सुपरलेटिव डिग्री (Superlative Degree)। आनंदघनजी भगवंत ने क्या कहा? ऋषभ जिनेसर प्रीतम माहरा प्रभु ‘प्रियतम’ हैं। संस्कृत भाषा में तीन शब्द आएंगे: प्रिय, प्रियतर, प्रियतम। पहली तो बात यह होगी कि ‘प्रभु प्रिय हैं।’ लेकिन प्रभु प्रिय हैं, इसका अर्थ क्या हुआ? प्रभु भी प्रिय हैं, संसार भी प्रिय है। वीतराग भी प्रिय हैं, राग भी प्रिय है। निरहंकारी व्यक्तित्व भी प्रिय है, और अहंकार भी प्रिय है। फिर आगे आप बढ़ेंगे, कम्पैरेटिव डिग्री (Comparative Degree)  ‘प्रियतर’। प्रभु संसार से भी ज़्यादा प्रिय हैं। अब संसार प्रिय तो है, लेकिन प्रभु ‘प्रियतर’ हैं। प्रभु ज़्यादा प्रिय हैं। और फिर सुपरलेटिव डिग्री (Superlative Degree) आएगी, ‘प्रभु प्रियतम हैं।’ प्रभु ही प्रिय हैं। प्रभु के सिवा दूसरी कोई व्यक्ति, दूसरा कोई पदार्थ मुझे प्रिय नहीं।

आप कौन सी डिग्री में है? आपको सुपरलेटिव डिग्री में पहुँचाना है, मेरी इच्छा है। अभी आप कहाँ पर हैं, बोलो? प्रभु प्रिय हैं कि प्रियतर? कम्पैरेटिव डिग्री में आए? नहीं आए? प्रभु भी प्रिय हैं, संसार भी प्रिय है। लेकिन धीरे-धीरे आगे बढ़ना है। कि प्रवचन तो आप सुनते हों, फिर होमवर्क (Homework) करते होंगे। रात को नींद नहीं आती है, तो होमवर्क करते हो? कि गुरुदेव की इच्छा है कि मुझे सुपरलेटिव डिग्री पर पहुँचा देना है। अब मेरी इच्छा क्या है? हमारी दोनों की इच्छा एक हो जाएगी न, तो रिज़ल्ट तुरंत मिल जाएगा। मेरी इच्छा निश्चित है, तुम्हें सुपरलेटिव डिग्री में पहुँचाने का । तुम्हारी इच्छा क्या है? जहाँ हो, वहीं रहना है या आगे जाना है? आगे जाना है? हमारे साथ? गुरु की उँगली पकड़कर? गुरु तैयार हैं।

सद्गुरु की एक फेरी सर्विस (Ferry Service) चलती है। सद्गुरु ऊपर जाते हैं, प्रभु के पास। लेकिन वहाँ ज़्यादा समय रहने का सौभाग्य सद्गुरु का नहीं होता। प्रभु कहते हैं, “अब नीचे उतर जा, और दूसरे को लेकर ऊपर आ।” फिर हम नीचे उतरते हैं, और आपको लेकर ऊपर चढ़ते हैं। आप तो ऊपर बैठ जाएंगे प्रभु के चरणों में। प्रभु हमें कहेंगे, “तू नीचे उतर, दूसरे को लेकर आ।”

सद्गुरु एक विशिष्ट संघटना हैं। ‘लिविंग विद द हिमालयन मास्टर्स’ (Living with the Himalayan Masters) पुस्तक स्वामी राम ने लिखी। उस पुस्तक में एक बड़ा सुंदर प्रसंग आता है। स्वामी राम के गुरु स्वामी राम को पूछते हैं कि, “जब हम सद्गुरु के पास जाते हैं, तब सद्गुरु के चरणों को ही क्यों छूते हैं? न हाथ को छूते हैं, न मस्तिष्क को छूते हैं, सिर्फ चरण को ही छूते हैं। तो चरण-स्पर्श हम क्यों करते हैं?” स्वामी राम ने कहा, “ये परंपरा है, वह मुझे ख्याल है। लेकिन चरण-स्पर्श क्यों किया जाता है, वो मुझे ख्याल नहीं है। आप ही बताओ।”

तब गुरु ने कहा कि, “सद्गुरु का अर्थ क्या होता है? सद्गुरु है— प्रभु के चरणों में विलीन व्यक्तित्व।” कलापूर्णसूरी दादा शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु के दरबार में गए हुए हैं, हम उनके पीछे बैठे हैं। गुरुदेव प्रभु के चरणों में लेट जाएंगे। उनका मस्तिष्क, उनके हाथ, सब कुछ प्रभु के चरणों में होगा। हम पीछे बैठे हैं, हमारी ओर सद्गुरु का कौन सा अंग होगा? हम पीछे बैठे हैं। सद्गुरु प्रभु के चरणों में लेटे हुए हैं, तो हमारी ओर सद्गुरु का कौन सा अंग आएगा? तो ‘चरण’। लेकिन सद्गुरु के चरण को छूने पर हम प्रभु के चरण के स्पर्श तक पहुँच जाते हैं। सद्गुरु का चरण-स्पर्श, प्रभु के चरण-स्पर्श तक हमें पहुँचा देता है। सद्गुरु का एक ही काम है, आपको प्रभु से मिला देना है। फिर सद्गुरु छूट जाएंगे। फिर आप प्रभु में मिल जाएंगे।

तो प्रभु का प्रेम अनवरत बरस रहा है। एक क्षण ऐसा नहीं, एक मिनट ऐसा नहीं, जब प्रभु का प्रेम न बरसता हो। अनंत जन्मों से यह प्रेम बरसता था। लेकिन उस प्रेम को स्वीकारने की सज्जता हमारे पास नहीं है। सद्गुरु ही प्रभु का दर्शन हमें कराते हैं, और सद्गुरु ही प्रभु के प्रेम को कैसे स्वीकारना, वो हमें दिखलाते हैं।

प्रभु का दर्शन कैसे होगा? मैंने एक बार कहा था, हमारी दो आईब्रो के बीच जो सेंटर है, उसको हम ‘आज्ञा चक्र’ कहते हैं। योगियों की परिभाषा में, आज्ञा चक्र के नीचे संसार है, और आज्ञा चक्र के ऊपर मोक्ष है। अब सद्गुरु क्या करते हैं? सद्गुरु हमारे आज्ञा चक्र को पुश (Push) करते हैं, और आज्ञा चक्र को खोल देते हैं। आज्ञा चक्र को इस संदर्भ में ‘थर्ड आई’ (Third Eye), तीसरा नेत्र कहा जाता है। दो आँखें तो आपके पास हैं, लेकिन इन दो आँखों से परमात्मा का दर्शन न होगा। न तो परमात्मा के प्रेम को स्वीकारने का काम होगा। तीसरा नेत्र जब खुल जाएगा, तब प्रभु का दर्शन होगा, और फिर आप आगे बढ़ेंगे।

आज्ञा चक्र से आगे बढ़ेंगे, और ‘सहस्रार’। हमारी जो चोटी का भाग है, उसको हम ‘ब्रह्मरंध्र’ कहते हैं। ब्रह्मरंध्र का अर्थ है, परमात्मा का प्रवेश द्वार। एक हिंदू फिलॉसफर (Philosopher) ने लिखा था कि परमात्मा ने मनुष्य तो बना दिया। हिंदू फिलॉसफी (Philosophy) कहती है कि परमात्मा ने मनुष्य को तो बना दिया। फिर परमात्मा ने सोचा कि ये आदमी बड़ा बुद्धिमान है। वो आँखों से संसार को तो देखेगा, लेकिन मुझे देखेगा या नहीं देखेगा? ये अपने भीतर राग-द्वेष को ले जाएगा, लेकिन मुझे ले जाएगा या नहीं ले जाएगा, वो पता नहीं है। तो मेरे लिए ये आदमी कोई द्वार प्रवेश का रखेगा या नहीं रखेगा? तो प्रभु ने एक स्पेशल डोर (Special Door) अपने लिए रख दिया। और ये है— ब्रह्मरंध्र।

सद्गुरु जब आपके सिर पर वासक्षेप देते हैं, तब ब्रह्मरंध्र खुलता है। और ब्रह्मरंध्र खुलता है, और ऊपर से जो वर्षा हो रही है, उस वर्षा को हम झेल सकेंगे। तो प्रभु के दर्शन के लिए तीसरे नेत्र का खुलना आवश्यक है। और प्रभु के प्रेम को स्वीकारना है, तो सहस्रार का खुलना आवश्यक है।

जब दीक्षा होती है, तब नूतन दीक्षित जो होता है, उसके सिर में जो बाल हैं, उसका मुंडन किया जाता है। लेकिन चोटी के जो बाल हैं, उसको ऐसे ही रखा जाता है। और सद्गुरु अपने हाथों से चोटी के बाल को खींचते हैं। तो ये जो ब्रह्मरंध्र है, उसको सद्गुरु खोलते हैं। सिर्फ बाल को ही नहीं लेते हैं, ब्रह्मरंध्र को खुला कर देते हैं।

आपके लिए डिस्काउंट में बात रखी कि वासक्षेप दे देंगे यहाँ, और सहस्रार को खोल देंगे। लेकिन जो दीक्षा लेता है, उसके ब्रह्मरंध्र को सद्गुरु अपने हाथों से खोल देते हैं। आपके लिए तो बहुत मज़ा आ गया। सद्गुरु ने तुम्हारे बाल खींचे थे, सद्गुरु ने तुम्हारा ब्रह्मरंध्र खोल दिया है। अब तो बस प्रभु के प्रेम को झेलते रहो, झेलते रहो, झेलते रहो…. तो ये अनिवार्य शर्त है। इसके बिना न तो प्रभु का दर्शन होता है, न तो प्रभु के प्रेम को स्वीकारने का होता है।

सो बरस पहले की एक घटना है। एक भक्त था, उसकी इच्छा थी परमात्मा का साक्षात्कार हो, और परमात्मा के प्रेम का अनुभव हो। दो इच्छाएं थीं। परमात्मा का साक्षात्कार, और परमात्मा के प्रेम का अनुभव। नरेंद्र! विवेकानंद जब नरेंद्र के रूप में था, तब गत जन्म की इतनी उनकी साधना थी कि छोटी वय में परमात्मा के साक्षात्कार की इच्छा उसे पैदा हुई। संतों के पास, गुरुओं के पास, नरेंद्र जाता, वंदन करता, और एक ही प्रश्न पूछता— ‘हैव यू रियलाइज़्ड द गॉड?’ (Have you realized the God?) आपने ईश्वर का रियलाइज़ेशन, साक्षात्कार किया है? कोई गुरु कहते हैं कि साक्षात्कार की ये पद्धति है। “नहीं, मुझे पद्धति से कोई काम नहीं है। तुमने साक्षात्कार किया है?”

ऐसे करते-करते रामकृष्ण परमहंस के पास नरेंद्र चला गया। रामकृष्ण परमहंस, उन्होंने प्रभु का साक्षात्कार किया था। रामकृष्ण परमहंस से नरेंद्र ने पूछा, ‘हैव यू रियलाइज़्ड द गॉड?’ तो रामकृष्ण परमहंस हँसते हैं, और कहते हैं, “मैंने साक्षात्कार किया कि नहीं, ये बात छोड़, तुझे साक्षात्कार करना है?” रामकृष्ण हँसते थे कि हमारे वहाँ लोग आते हैं, टाइम पास (Time pass) करने के लिए आते हैं। “तुझे टाइम पास करना है या साक्षात्कार करना है?” तो नरेंद्र ने कहा, “गुरुदेव, साक्षात्कार करना है।” तो गुरु ने कहा, “बैठ जाओ।” नरेंद्र बैठ गए, और गुरु ने अपना वरद हाथ नरेंद्र के सिर पर रख दिया। नरेंद्र समाधि में चले गए। सात दिन तक उनका शरीर… भीतर पहुँच गए। सात दिन के बाद, आठवें दिन, रामकृष्ण परमहंस होश में नरेंद्र को लाए।

तब नरेंद्र के जो शब्द थे, वो आप याद रखेंगे, तो आपकी साक्षात्कार की इच्छा प्रबल हो जाएगी। नरेंद्र ने कहा, “गुरुदेव, इस जन्म में नहीं, पूरे भवचक्र में, मैं होश में रहा हूँ, इतना समय यही था, जो आपने अभी दिया था। अब मुझे बेहोशी की दुनिया में क्यों ले जा रहे हो? मैं समाधि में था, ईश्वर के साथ था, ये मेरे लिए होश का समय था। अब मुझे बेहोशी में क्यों ले जा रहे हो?”

गुरु ने कहा, “तुझे होश में ही रहना है, और मैं तुझे मास्टर की (Mastery key) दे दूँगा, कि तू सदा ही होश में रहे।”

हम होश में नहीं हैं। हम ऐसे जागृत हैं, लेकिन ऐसे जागृत नहीं भी। मैंने एक बार कहा था, यदि आप होश में हों, तो आप क्रोध कर ही नहीं सकते। बेहोशी में ही क्रोध होता है। क्रोध से क्या मिलेगा, बोलो? आप क्रोध कर देंगे, इससे आपको क्या मिलेगा? सिर दर्द मिलेगा। आपको मिलेगा क्या? लेकिन आप क्रोध करते हो, क्योंकि आप बेहोशी में हो। हम होश में हैं, तो हमें गुस्सा आता ही नहीं कभी। कोई भी घटना घटती है, हम प्यार से देखते हैं।

घटनाओं को प्यार से देखो। घटनाएं तो क्रमबद्ध पर्याय हैं। ज्ञानी भगवंतों ने ज्ञान में जो पर्याय देखी है, वो ही पर्याय खुलने वाली है। समझो कि आज शाम चार बजे, एक घटना घटने वाली है, आपके जीवन में। आप चलते-चलते गिर जाने वाले हैं, आपको फ्रैक्चर (Fracture) होने वाला है। आपको ख्याल नहीं है, लेकिन अनंत केवलज्ञानी इस बात को देख रहे हैं। अब चार बजे ये घटना घटित हुई। अब आप क्या करोगे? घटना का स्वीकार करोगे या अस्वीकार करोगे? घटना का अस्वीकार आप करोगे, तो आप क्या करोगे? अनंत केवलज्ञानियों के ज्ञान का अस्वीकार करोगे। अनंत केवलज्ञानियों ने ज्ञान में जो घटना घटित हुई देखी है, उसका आप अस्वीकार कैसे कर सकते हैं? तो जो भी घटना घटे, आपको स्वीकार करनी है। फिर आनंद ही आनंद है। आप पहले से निश्चित करते हो, ये घटना अच्छी, ये घटना बुरी। फिर बुरी घटना घटित हुई, आप नाराज़ हो जाते हैं। तो आपका आनंद आपके पास या दूसरों के पास? आपके आनंद का नियंत्रण आपके पास है या दूसरों के पास?

आपने पाँच मिनट स्पीच (Speech) दी, भाषण किया। कोई कहेगा, “वाह, बहुत सुंदर भाषण दिया।” आप खुश हो जाएंगे। एक मित्र ने कहा, “यार, तू क्या बोला? कुछ समझ में ही बात नहीं आती थी। न सिर, न धड़, कुछ कोई बातें ही नहीं थीं। क्या तू बोल रहा था?” क्या होगा? बुरा लगेगा? तो आपका मज़ा किरकिरा हो जाएगा। तो आपका आनंद आपके हाथों में या दूसरों के हाथों में? हम स्वतंत्र हैं, आप परतंत्र हैं। हम स्वतंत्र हैं, हमारा आनंद हमारे पास है। हम एवर फ्रेश, एवर ग्रीन (Ever fresh, Ever green)। यहाँ पुणे में भी मज़ा में हैं। कोई गाँव में जाएंगे, वहाँ भी मज़ा में होंगे। अब तो साता पूछने के लिए आएंगे पुणे वाले। देखेंगे, उपाश्रय तो ऐसा है, लेकिन महाराज साहेब साता में हैं। न उपाश्रय का कोई असर होता है, न दूसरी कोई चीज़ का असर होता है। हम प्रभु-प्रभावित हो गए।

तो प्रभु-प्रभावितता, अर्थात् आनंद। घटना-प्रभावितता, यानी कि पीड़ा। Now choice is yours. आपको पीड़ा चाहिए या आनंद चाहिए? क्या चाहिए? पीड़ा चाहिए तो घटना-प्रभावित होने का। आनंद चाहिए तो प्रभु-प्रभावित होने का।

प्रभु का दर्शन तो आप करते हो। संतों का भी दर्शन करते हो। कोई भी संत का आप दर्शन करेंगे, संत के चेहरे पर मुस्कान होगी, स्मित होगा, हास्य होगा। ये स्मित, ये मुस्कान, ये हास्य कहाँ से आया? आपने कभी सोचा? महाराज साहेब इतने आनंद में क्यों हैं? कभी सोचा? आप पूछते हैं, “स्वामी, साता छे जी?” अरे, हम तो साता में नहीं, परम साता में हैं। हमें तो लगता है कि आपकी साता हमें पूछनी चाहिए। कि आप साता में हैं? क्योंकि हम तो साता में ही रहेंगे। साता में हैं न सब? हम तो साता में ही रहेंगे। प्रभु का प्रेम उतर रहा है। बस प्रभु ही प्रभु हैं, तो साता ही साता है। तो आपको हमें पूछना है कि आप साता में हैं ना? हमको आप पूछेंगे न? “साहेब, साता में?” तो हम क्या कहेंगे? ‘देव-गुरु पसाय।’ आपको कोई पूछेंगे, “साता में?” आप क्या कहेंगे? ‘लक्ष्मीजी पसाय।’ क्या कहेंगे? आप साता में हैं, तो देव-गुरु की कृपा से या लक्ष्मीजी की कृपा से?

आज प्रश्न ही छोड़ता हूँ, उत्तर मुझे कल देना। आज रात सोचना कि आप साता में हैं, तो प्रभु की या सद्गुरु की कृपा से हैं, या लक्ष्मीजी की कृपा से हैं? ये बड़ा सुंदर प्रश्न है। आपके चित्त को झकझोर देगा। कि मैं प्रसन्न कैसे रह सकता हूँ? आपको आनंद में जाना है, आनंद में रहना है, तो इस प्रश्न की डेप्थ (Depth) में जाना, और सोचना कि मैं सुखी कैसे बन सकता हूँ? महाराज साहेब, प्रभु और सद्गुरु की कृपा से साता में हैं। तो ऐसी साता यदि मुझे प्राप्त करनी है, तो मुझे क्या करना चाहिए? लक्ष्मीजी की कृपा ही चलेगी, या देव-गुरु की कृपा भी चाहिए? सोच कर आएंगे कल? ठीक है? बराबर?

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