ध्यानयोग
अभी विदेशों में हमारे भारतीय योगाचार्य जाते हैं और योग का, ध्यान का शिबिर करवाते हैं। समृद्ध देशों के लोग अब भौतिकवाद के अंतिम छोर पर आ गए हैं फिर भी उनको सुख का अनुभव नहीं होता। इसलिए वे अब भौतिकता से थककर योग की शरण में आ रहे हैं। लेकिन उनके योग का उद्देश्य सिर्फ इतना ही है – Body building and mental peace। शरीर को स्वस्थ रखो आसनों से, और मन को शांत रखो।
हम एक कदम आगे जाएंगे। योग से शरीर तो स्वस्थ होगा ही और मन भी शांत होता है। पर तीसरी बात यह है कि आत्मा भी निर्मल होती है। हमारे लिए शरीर का स्वस्थ होना बहुत बड़ी बात नहीं है; मन की शांति भी बहुत बड़ी बात नहीं। आत्मा की निर्मलता ही हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।
यदि आपके पास धर्म है, ध्यान है, साधना है, तो आप Negativity में नहीं जाएंगे। मान लो कि फ्लैट में जो आपका पडोसी था, उसने बहुत बड़ा बंगला ले लिया… हमारी प्राचीन अवधारणा यह थी कि वह पुण्यशाली था; गत जन्म में उसने पुण्य किया था, तो पुण्य के प्रभाव से वह और ज़्यादा सुखी हुआ। इस अवधारणा के कारण हमारे मन में ईर्ष्या नहीं होती थी और मन शांत रहता था। लेकिन यह धर्म की बात अब मन से निकल गई, इसलिए भीतर एक जलन, एक पीड़ा पैदा होती है।
एक अएक अमेरिकी प्रोफेसर, पत्नी के साथ वीकेंड (Weekend) पर घूमने के लिए निकले। ऐसे जंगल में कार को घुमाई, जहाँ कोई मनुष्य मिले भी नहि। प्रकृति के बड़े शौकीन प्रोफेसर थे। प्राकृतिक परिवेश में कार दौड़ रही है, एकाएक स्टीयरिंग (Steering) पर से प्रोफेसर का नियंत्रण हट गया और कार एक पेड़ से ज़ोर से टकराई। स्टीयरिंग प्रोफेसर की नाक पर लगा, फोरहेड (माथे) पर लगा, लहू निकलने लगा। गाड़ी तो स्टॉप (Stop) हो गई। पति और पत्नी दोनों कार से बाहर निकले।
ऐसे अमेरिकी लोग जहाँ भी बाहर जाते हैं, फर्स्ट-एड बॉक्स (First-aid box) तो उनके पास होता ही रहता है, प्राथमिक सारवार के लिए। लेकिन आज फर्स्ट-एड बॉक्स को भूल गए थे। Pain हो रहा था अत्यंत, लेकिन पेन-किलर (Pain-killer) टेबलेट नहीं थी। लहू को तो पोंछ लिया नैपकिन से। लहू अटक भी गया, लेकिन पीड़ा अटकने का नाम नहीं लेती। अब क्या करना? पेन-किलर तो है नहीं। तब पत्नी ने कहा कि, “मैं मेडिटेशन (Meditation – ध्यान) क्लास जॉइन कर रही हूँ। अभी-अभी मेरा प्राथमिक अभ्यास ही चल रहा है। लेकिन मेडिटेशन क्लासेस में मुझे सिखाया गया है कि जब भी pain शरीर के किसी भी हिस्से में हो, तब मन को वहाँ से उचककर दूसरी जगह पर ले जाना।”
एक बहुत बड़ी गंभीर बात है। तुम्हारे शरीर में पीड़ा है, इसलिए तुम्हें पीड़ा का बोध होता है, यह बात सच नहीं। तुम्हारा मन, तुम्हारी नर्वस सिस्टम (Nervous system) पीड़ा की ओर जाती है, तब तुम्हें पीड़ा का बोध होता है। यदि तुम तुम्हारे मन को दूसरे विषय में दाखिल कर दो, तो पीड़ा का बोध समाप्त हो सकता है। तो पत्नी ने कहा कि, “मुझे यह सिखाया गया है कि शरीर में पीड़ा हो, तब मन को वहाँ जाने नहीं देना। मन वहाँ जाएगा, तो पीड़ा का बोध होगा। मन को उचककर किसी दूसरी जगह पर ले जाओ।” तो पत्नी ने प्रोफेसर से कहा कि, “आप आँखें बंद करके ऐसा सोचो कि आप अपने क्लास में लेक्चर (Lecture) दे रहे हैं। आपका लेक्चर बहुत ही प्रभावशाली है, और सुनने वाले सब स्टूडेंट्स (Students) भाव-विभोर होकर आपको सुन रहे हैं। ऐसा आप सोचो।”
यदि पेन-किलर टेबलेट होती, तो प्रोफेसर मेडिटेशन में जाते ही नहीं। लेकिन करें क्या? पेन-किलर तो थी नहीं। तो बरबस मेडिटेशन में जाना पड़ा। तो प्रोफेसर ने सोचा कि ‘मैं भाषण दे रहा हूँ मेरे क्लास में, और मेरे स्टूडेंट्स बड़े चाव से मुझे सुन रहे हैं।’ आधे घंटे तक प्रोफेसर का लेक्चर मन में ही चला। और पीड़ा छू! प्रोफेसर को यह अनुभव इतना अच्छा लगा कि प्रोफेसर ने यूनिवर्सिटी में से रिज़ाइन (Resign) कर लिया और वे ध्यान के आचार्य बन गए!
अब बात यह है कि वे अमेरिकी लोग थे, और उनके पास मन तक सीमित बातें थीं। ‘आत्मा’ की बात उनके पास नहीं थी। इसलिए मन के विषय को परावर्तित कर देना और पीड़ा से मुक्ति पा लेनी, इतना ही ये लोग कर सकते थे। अभी विदेश में हमारे भारतीय योगाचार्य जाते हैं, और एक शिबिर होता है योग का। एक सप्ताह का शिबिर, फीस कितनी? ५००० डॉलर! और लोग रजिस्ट्रेशन के लिए लाइन लगाकर खड़े होते हैं। वे लोग थक गए हैं। अमेरिकी लोग, यूरोपियन लोग थक गए हैं। भौतिकवाद के अंतिम छोर पर गए, लेकिन सुख का अनुभव नहीं होता। तब वे थककर योग की शरण में आते हैं। लेकिन इन लोगों का योग का उद्देश्य इतना ही है— बॉडी बिल्डिंग (Body building), मेंटल पीस (Mental peace)। शरीर को स्वस्थ रखो आसनों से, और मन को शांत रखो।
हम एक डग (कदम) आगे जाएंगे। योग से शरीर तो स्वस्थ होगा ही। रामदेव बाबा कहते हैं कि ‘तुम भस्त्रिका प्राणायाम करो। ज़ोर-ज़ोर से तुम साँस लो, साँस छोड़ो।’ तो हृदय की नलियों में जो ब्लॉकेजेस (Blockages) है, वे ब्लॉकेजेस भी निकल जाएंगे। तो योग से शरीर स्वस्थ होता है, मन शांत होता है। और तीसरी बात यह है कि ‘आत्मा निर्मल होती है’। हमारे लिए शरीर का स्वस्थ होना बहुत बड़ी बात नहीं। मन की शांति भी बहुत बड़ी बात नहीं। यह तो सामान्य बात है। लेकिन ‘आत्मा की निर्मलता’, यह हमारे लिए बड़ी उपलब्धि है।
मैं आबू में था, देलवाड़ा में। सुबह और शाम हम भक्ति करते थे। योग में मेरी गहन रुचि पहले से ही थी। शायद अगले जन्म से भी हो। देलवाड़ा जब मैं था, तब मैंने सुना कि माउंट आबू के एक बंगले में एक साधक रहते हैं। वे संपूर्ण एकांत में रहते हैं। बंगले के एक कमरे में वे रहते हैं। कमरा भीतर से बंद होता है। सुबह और शाम आधा-आधा लीटर गाय का दूध सिर्फ वे लेते थे। दूसरा कुछ नहीं खाने का। जो कर्मचारी था, वह द्वार को टटोलता। और साधक ध्यान में ना हों, तो द्वार खोल भी देते और दूध ले भी लेते। ध्यान में होते, तो दूध गिलास में रह जाता, साधक ध्यान में रह जाते। हमने यह बात सुनी।
मुझे तो यह रस था कि कोई भी साधक हो, भीतर उतरा है, तो मुझे उनके पास जाना है। और वे भीतर कैसे उतरे, वह मुझे जानना है। तो हम देलवाड़ा दर्शन करके, नवकारशी का पच्चक्खाण पार कर, नवकारशी करके निकले माउंट आबू की ओर। ऐसा निश्चित करके निकले थे कि ‘शाम ६ बजे तक वहाँ रहेंगे, लेकिन साधक से मिलेंगे तो हैं ही। मिलना तो है ही। बैठ जाएंगे, कभी ना कभी तो द्वार खुलेगा।’ हम वहाँ गए। एक कर्मचारी था, बंगले में कोई नहीं। और एक कमरे में साधक। मैंने कर्मचारी से पूछा कि, “मुझे मिलना है। और बात कोई दूसरी नहीं है। कोई चर्चा नहीं, कोई डिस्कशन (Discussion) नहीं। सिर्फ वे कैसे भीतर उतरे, वह मुझे जानना है।”
तो कर्मचारी ने कहा कि, “आप अपना नाम और आप क्यों मिलना चाहते हो, वह इस स्लिप (Slip) में लिख दो। मैं स्लिप को द्वार के नीचे से सरका दूँगा। स्लिप भीतर जाएगी। लेकिन द्वार कब खुलेगा, वह मैं भी नहीं कह सकता। क्योंकि साधक ध्यान में होंगे, तो घंटे, दो घंटे, चार घंटे तक भी द्वार नहीं खुलेगा। मैं सुबह बहुत बार गिलास में दूध लेकर जाता हूँ, लेकिन मेरा दूध गिलास में ही रह जाता है। द्वार खुलता ही नहीं है और मैं साधक को दूध दे भी नहीं सकता।” मैंने कहा, “मैं प्रतीक्षा के लिए तैयार हूँ। शाम तक बैठना पड़े, तो भी बैठने के लिए राज़ी हूँ। लेकिन मिले बिना जाना नहीं।” मैंने मेरा नाम लिखा कि ‘मैं श्वेतांबर जैन साधु हूँ, और मुझे आपसे मिलना है। लेकिन कोई डिस्कशन नहीं, कोई चर्चा नहीं। सिर्फ आप भीतर कैसे उतरे, वह मुझे जानना है।’ स्लिप में इतना लिखा।
कर्मचारी ने स्लिप सरका दी। दो घंटे बाद द्वार खुला। दो घंटे बाद साधक ध्यान से बाहर आए। उन्होंने स्लिप देखी, पढ़ी और द्वार खोला। मैं भीतर गया। द्वार अंदर से बंद हो गया। हम दोनों बैठे। मैंने पूछा, “आपका बायोडाटा मैंने जाना है। आप वर्षों से एकांत में हो, मौन में हो, अब भीतर उतर रहे हो। तो आपको क्या उपलब्ध हुआ, कैसे उपलब्ध हुआ, वह सब मुझे जानना है। क्योंकि मैं भी उसी मार्ग पर हूँ। मुझे भी भीतर जाना है। बाहर कुछ भी नहीं है।” तैत्तिरीय उपनिषद में ऋषि ने कहा है— “रसो वै सः।” रस मात्र भीतर है। बाहर तो कुछ नहीं है, कुच्चे है। रस तो सिर्फ तुम्हारे भीतर है। एक बार तुम भीतर प्रवेशो होगे, बाहर की दुनिया तुम्हारे लिए ख़त्म हो जाएगी। बाहर की दुनिया का कोई प्रयोजन तुम्हारे लिए नहीं होगा।
वे तो मौन में थे। नोटपैड रखी हुई थी। उन्होंने नोटपैड में लिखा कि, “मैं वर्षों से एकांत में हूँ, मौन में हूँ। शब्दों की दुनिया से, विचारों की दुनिया से मैं ऊपर उठ गया हूँ। और शब्द और विचार के संसार के पश्चात, भीतर का संसार चालू होता है। तो मैं शब्दों के संसार से बाहर निकल चुका हूँ। विचारों के संसार से मैं बाहर निकल चुका हूँ। कोई विचार आते ही नहीं। लेकिन अभी तक आत्मा की उपलब्धि मुझे नहीं हुई है।” एक साधक कितना फ्रैंक (Frank – स्पष्ट) होता है! वह कभी भी माया नहीं करता। फ्रैंकनेस (Frankness)! “अभी तक मुझे आत्म-तत्व की उपलब्धि नहीं हुई है। लेकिन मुझे लगता है कि मैं उपलब्धि की कगार पर हूँ। और जल्दी ही मुझे उपलब्धि होने वाली है।”
मैंने उनके चेहरे पर देखा। चेहरे पर एक अपूर्व आनंद था। मैंने सोचा कि अभी उपलब्धि नहीं हुई, तो भी इतना आनंद है इस साधक के पास! तो उपलब्धि के बाद कितना गहरा आनंद उनके पास होगा! मैंने बहुत-बहुत धन्यवाद उनसे कहा। और कहा कि आपका यह गाइडेंस मेरी साधना को अवश्य पुरस्कृत करेगा। मैं वहाँ से चल पड़ा।
गुजरात में एक शहर है, नडियाद, मध्य गुजरात में। वहाँ एक ‘मौन मंदिर’ है। कितने ही कमरे हैं, जहाँ अकेला साधक मौन में रह सकता है। तुम्हें रजिस्ट्रेशन कराना होता है। और इतना rush (भीड़) वहाँ होता है कि तुम आज रजिस्ट्रेशन कराओगे, शायद छह महीने के बाद का समय आपको मिलेगा। एक मेरा भक्त मौन मंदिर में जाकर इसका अनुभव लेकर आया था। तो मैंने पूछा कि क्या अनुभव हुआ? तो उसने पहले तो वहाँ के सिस्टम (System) की बात की। कि “साहेबजी! वहाँ ऐसी सिस्टम थी कि तुम जब मौन मंदिर में जाओ, तो तुम्हारे पास ना तो फोन चाहिए, ना कोई पुस्तक, कुछ भी नहीं। शर्ट और पैंट पहनकर तुम भीतर जाओ। तुम भीतर गए, एक सप्ताह का रजिस्ट्रेशन तुम्हारा है। रूम के द्वार बाहर से बंद हो जाएंगे। ताला लग जाएगा। एक सप्ताह तक ताला खुलेगा नहीं। रूम में अटैच टॉयलेट है। फैन भी है, एसी भी है, पानी की व्यवस्था है। लेकिन न टीवी है, न मोबाइल फोन है। कोई बाह्य संपर्क के साधन वहाँ नहीं हैं।”
अब सुबह नाश्ते का समय हुआ, तो वहाँ ऐसी व्यवस्था है— एक खिड़की है, जिसके दो द्वार हैं। बाहर के द्वार को खोलकर वेटर नाश्ते की डिश (Dish) और चाय और दूध के गिलास रख देगा। फिर उसकी साइड का द्वार बंद करेगा। तभी तुम्हारी ओर का द्वार खुलेगा। तुम नाश्ते की डिश, दूध और चाय का गिलास ले लोगे, नाश्ता कर लोगे। फिर डिश वहाँ रख दोगे। तुम्हारा द्वार बंद होगा, तभी बाहर का द्वार खुलेगा। एक सप्ताह में एक आदमी को तुम देख नहीं पाओगे!
अब करने का क्या? बोलने का तो है नहीं। किसके साथ बोलोगे? कोई है नहीं तो। लेकिन विचार तो करोगे। विचार तो करोगे— ‘ऐसा हुआ था, पत्नी ने ऐसा कहा था, बच्चों ने ऐसा कहा था।’ विचार करोगे। लेकिन विचार करके भी थक जाओगे। कौन से विचार आएंगे? जो घटनाएं अभी-अभी घटी हुई हैं, उसके विचार आएंगे। अब एक दफ़े विचार किया, दो दफ़े विचार किया, तीन दफ़े विचार किया, विचार करके थक जाओगे। तो शब्दों का मौन हो गया, विचारों का मौन हो गया। और शब्द और विचार का मौन जब होता है, तभी भीतर के द्वार खुलते हैं।
तुम मौन तो करते हो, लेकिन शब्दों का ही मौन करते हो। और कैसा मौन होता है? दोपहर ३ बजे मौन खुलने का है। ढाई बजे किसी ने कुछ कहा, मन में शुरू हो जाएगा— ‘अब आधे घंटे की देर है! ३ बजे ईंट का जवाब पत्थर से दे दूँगा!’ शब्दों का मौन सच्चा तभी है जब उससे विचारों का मौन सधा जाए। विचारों का मौन न मिले, तो शब्दों के मौन का बहुत ज़्यादा अर्थ नहीं। थोड़ा अर्थ है। थोड़ा अर्थ यह है कि तुम दूसरों को पीड़ित नहीं करोगे। शब्दों का मौन तुम्हारे पास होगा, तो तुम दूसरों को पीड़ित नहीं करोगे।
शायद तुम्हारी भाषा रफ (Rough) है। किसी की भाषा ही रफ होती है। कोई पूछता है, “कैसे हो, मज़ा में हो?” तो सामने वाला बोलेगा, “क्या लगता है? मज़ा में नहीं हूँ, ऐसा लगता है?” अरे भैया, प्यार से पूछ रहा हूँ। “तुम मज़ा में हो?” तो जवाब तो दो प्यार से कि “हाँ, मैं मज़ा में हूँ।” “तुम्हें क्या लगता है, मैं मज़ा में नहीं हूँ?” और बच्चे को साथ में लेकर निकला है। “यह बच्चा आपका है? बहुत पढ़ा-लिखा लगता है, सुंदर लगता है।” “तो बच्चा मेरा है, तेरा है क्या?” आप में तो कोई ऐसे बोलने वाले होते ही नहीं! आप में से कोई ऐसा हो सकता है? यह तो दूसरों की बात है! तो शब्दों का मौन सार्थक कब होगा? जब विचारों का मौन हमारे पास होगा। तो शब्द का मौन हमारे पास आ जाए, विचारों का मौन हमारे पास आ जाए, तो हम अपनी आनंदमयी दुनिया में प्रवेश कर सकेंगे।
तो आज का जो मेडिटेशन (ध्यान) है, वह चार चरण में है। और इसी थीम (Theme) पर वह चलेगा कि— शब्द छूटेंगे, विचार छूटेंगे, और तुम स्व में होगे।
अभी तो तुम मंदिर में जाते हो। शरीर मंदिर में होता है। मन कहाँ होता है? मन कहाँ होता है? पर्युषण के व्याख्यान चलते हैं। ऐसे तो हमारे व्याख्यान का समय पंक्चुअल (Punctual – पाबंद) होता है। उठने का समय… बैठने का समय तुम्हारा होता है, उठने का-उठाने का समय हमारा होता है। तो व्याख्यान समाप्त करने का हमारा समय पंक्चुअल होता है। लेकिन पर्युषण के व्याख्यान में तो टेक्स्ट (Text – मूल पाठ) पूरी करनी होती है। अब आप शरीर से तो बैठे हो प्रवचन सभा में। घड़ी के सामने नज़र जाएगी— ‘अरे, ११ बज गए! कब प्रवचन पूरा होगा और कब मैं ऑफिस पर जाऊँगा? आज तो छुट्टी नहीं है!’ मन कहाँ जाएगा? ऑफिस पर। और शरीर है प्रवचन सभा में। अब मैं बोलूँगा तो किससे बोलूँगा? वह तो मुझे समझाओ। मुझे वह तो समझाओ कि मैं किससे बोलूँगा? तुम्हारे शरीर से बोलूँगा या तुम्हारे मन से बोलूँगा? तुम्हारा मन तो ऑफिस में है। तुम्हारा शरीर ही यहाँ है। तो मैं बातें किससे करूँगा? लेकिन अभी तो सभी हाज़िर हैं, ठीक है! सब मन से भी बैठे हुए हैं। शरीर भी बैठा हुआ है और मन भी बैठा हुआ है ना?
चाइना में दो बड़े तत्वज्ञ हुए। एक च्वांगत्सू (Chuang Tzu) थे, दूसरे किंग गोंग थे। दोनों की वय करीब ८०-८० साल थी। च्वांगत्सू तो ८० के पार हो गए थे। और उनके जोड़ों में भी तकलीफ थी। तो खड़े नहीं हो सकते थे, कुर्सी पर बैठे रहते। लेकिन बच्चों को पढ़ाते। एक दिन ऐसा हुआ, दूसरे पंडितजी जा रहे थे च्वांगत्सू के घर के पास। तब सोचा कि ‘चलो बड़े पंडितजी से मिल आऊँ।’ तो च्वांगत्सू के घर पर गए। च्वांगत्सू बड़े आनंदित हो गए— “अरे! ऐसे महान पंडित मेरे घर पर आए हैं! पधारो, पधारो, पधारो।”
लेकिन समस्या यह हुई कि कुर्सी तो एक ही थी। सब बच्चे आते थे पढ़ने के लिए। विद्वान भी आते थे, तो भी नीचे ही बैठते थे। ऐसे महान पंडित के सामने कुर्सी पर बैठने वाला कोई नहीं था। तो कुर्सी दूसरी थी नहीं। और सब बच्चे स्नान करने के लिए नदी की ओर गए थे। कोई बच्चा घर में नहीं था। पंडितजी को हुआ कि ‘ऐसे महान पंडित मेरे घर पर आए हैं, तो मैं कुर्सी दूँ।’ लेकिन कुर्सी लाएं कहाँ से? ख़ुद तो उठ सकते नहीं थे। तो उन्होंने कहा, “पधारिए, पधारिए। आपके लिए आसन होना चाहिए, लेकिन आसन है नहीं। और बच्चे बाहर गए हैं।”
तो दूसरे पंडितजी नीचे बैठ गए। नीचे बैठ तो गए, लेकिन Inconvenient लग रहा है, असुविधाजनक। इतने महापंडित और नीचे बैठे! ये पंडित थोड़े अहंकार वाले थे। हमारे पंडितजी को अहंकार नहीं था बिल्कुल, लेकिन ये पंडितजी थोड़े अहंकार वाले थे। ‘मैं इतना बड़ा पंडित और मुझे नीचे बैठना पड़ा!’ तब हमारे पंडितजी ने कहा, “अरे पंडितजी! मेरी इच्छा बहुत थी आपके लिए आसन मँगवाऊँ, लेकिन कोई था ही नहीं, तो मैं भी क्या करूँ? अब आप नीचे बैठ ही गए हो शरीर से, तो मन को भी नीचे बिठा दो, फिर हम बातें करें!” ‘शरीर तो तुम्हारा बैठ गया है, लेकिन मन नहीं बैठ पा रहा है कि मेरे जैसा पंडित और मुझे नीचे बैठना पड़ा!’ इनकन्वीनियंट आपको लगता है। लेकिन अब मन को बिठा दो।
मैं भी आपको यही कहूँगा। शरीर से तो बैठे हो, मन से भी बैठ जाओ। तो हम प्रैक्टिकल ध्यान शुरू करेंगे और थ्योरेटिकली ज्ञान भी बीच में देते रहेंगे।
पहला चरण। ये जो चार चरण हुए, उसकी क्रमबद्धता की थोड़ी जानकारी हम ले लें कि पहला चरण ये क्यों आया, दूसरा ये क्यों आया। तो आज ही नहीं, हर संडे को ध्यान का सत्र चलेगा, मेडिटेशन। मैंने मुंबई में गोवालिया टैंक की सभा में, फिर माटुंगा की सभा में, गोरेगांव और घाटकोपर की सभा में ये ध्यान का अनुभव कराया था। मुंबई में तो इतने साधक हैं! इतने ही साधक मुझे मिलने के लिए आए कि “गुरुदेव! हमारी जैन परंपरा में यदि ऐसी अच्छी ध्यान पद्धति है… हम तो बाहर गए थे, कोई समर्पण ध्यान में, कोई इस ध्यान में, कोई उस ध्यान में! अब हमें लगता है कि हमें कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। हमारे घर पर ही जब इतनी सुंदर ध्यान की परंपरा है, तो हम बाहर क्यों जाएं?” घर पर मम्मी ही पुडिंग्स, नमकीन, मिठाई सब कुछ बना देती है, तो बच्चा लारी पर क्यों जाए? तो अपने वहाँ ध्यान की सुंदर परंपरा है। ये तो एक स्टार्टिंग (Starting) किया। धीरे-धीरे आपको ख्याल आएगा कि ध्यान में आप कभी भी जाओ, आप निमित्तों से कट जाते हो।
मेरे ध्यान शिबिर बहुत से हुए। हज़ारों साधक ध्यान-शिबिर में ध्यान से प्रशिक्षित हुए। बहुत साधक मुझे मिलने के लिए आते हैं। और वे कहते हैं, “गुरुदेव! जब लगता है कि निमित्त आ रहा है, कोई गुस्से हो रहा है, तब हम आँखें बंद कर ऐसे बैठ जाते हैं, तो निमित्त से हम कट जाते हैं। हमारे भीतर क्रोध का प्रवेश होता ही नहीं।” आप देखो, आँधी आ रही है, तो ऐसे ऑफिस की सब खिड़कियां बंद कर दीं। एसी चालू कर दिया। अब धूल कहाँ आएगी इधर? ऐसे ही निमित्त की आँधी आ रही है। आप ध्यान ऐसा सीख लोगे कि ध्यान आपने कर लिया, ध्यान का एसी चालू हो गया, धूल बाहर, अब ठंडी हवा! तो अंत में मैंने जो सजेशन (Suggestion) दिया था आपके मन को कि ‘आप शांत हो, प्रशांत हो’, सचमुच आप शांत हो। यदि आप शांत नहीं होते, तो मैं शांत कैसे होता? यदि शांति हमारा स्वभाव नहीं है, तो मेरे पास कैसे आती? मैं २४ घंटों शांत रहता हूँ, क्योंकि मैंने ध्यान सीख लिया है। ध्यान को आत्मसात कर लिया है। तो आप भी ध्यान को आत्मसात कर लो। तो आप भी बिल्कुल शांत हो जाओगे। निमित्त का कोई असर आप पर छा नहीं जाएगा। निमित्त बाहर, आप भीतर।
तो हर संडे को हम ध्यान का सत्र चलाएंगे। आज पहले चरण की बात करूँ कि पहला चरण कितना महत्वपूर्ण है। पहले तो हमने द्रव्य प्राणायाम, साँसों की एक लयबद्धता हमने प्राप्त की। आप सब अधूरे साँसों से जी रहे हैं। पूरे साँस अब किसी के पास नहीं। धीरे-धीरे, धीरे साँस लिया, धीरे-धीरे, धीरे साँस छोड़ा, ये साँस का एक सर्कल (Circle) हुआ। और ये पूरा सर्कल है। आप तो ना दो सेकंड लेते हैं, ना पाँच सेकंड लेते हैं। आधी सेकंड में साँस लिया, आधी सेकंड में साँस छोड़ दिया। तो आधी साँसों से आप जी रहे हैं। आपको मालूम है, ऐसे योगी अभी हैं, जो ८०० साल से जी रहे हैं! ८०० साल से! कैसे जी रहे हैं? सीधी बात है, हमारे वहाँ आयुष्य का एकम सेकंड नहीं है, मिनट नहीं है, साँस है। साँस को जितना तुम धीमा कर दो, आयुष्य बढ़ जाएगा। इतनी सेकंड पर इतने मिनट, और इतने मिनट पर इतने घंटे, इतने घंटे पर इतने दिन… ऐसा कोई वर्तुल हमारे पास नहीं। हमारे वहाँ तो यही वर्तुल है कि साँस पर दिन की गिनती की जाए। साँस धीरे है, दिन बड़ा हो गया तुम्हारा! तुम्हारा वर्ष बड़ा हो गया! तो द्रव्य प्राणायाम से क्या होता है? साँसों की लयबद्धता होती है।
फिर आप पॉजिटिव सजेशन (Positive suggestion) करते हैं। आज तो युग है मोटिवेशनल स्पीकर्स (Motivational speakers) का। इतने मोटिवेशनल स्पीकर्स भारत में हैं, जिसकी गिनती न कर सकें। मैं सूरत में था, तब शिव खेड़ा आने वाले थे। मोटिवेशनल स्पीकर में शिव खेड़ा का नाम बहुत आगे है। एक लेक्चर के १० लाख रुपिये! विमान में आने-जाने का, फाइव-स्टार होटल में रुकने का, डेढ़ घंटे का प्रवचन देकर जाने का। १० लाख का चेक पहले लेने का! अब इतना बड़ा मोटिवेशनल स्पीकर आने वाला है, तो मीडिया में तो चर्चा होती ही है।
मैं उन दिनों मॉर्निंग वॉक (Morning walk) के लिए जाता था। हाइपरटेंशन था, डायबिटीज़ था। तो डॉक्टर ने कहा था, ‘मॉर्निंग वॉक करो।’ तो मैं मॉर्निंग वॉक करता था। तो मेरे साथ बहुत भक्त भी चलते थे। एक भक्त ने कहा कि, “साहेब, शिव खेड़ा आ गए! आपने तो सुना होगा।” मैंने कहा, “हाँ, शिव खेड़ा आने वाले थे। कल उनका लेक्चर भी हो गया।” तो उसने कहा, “हाँ, लेक्चर हो गया।” मैंने कहा, “तुम गए थे?” उसने कहा, “हाँ, मैं गया था। इतने लोग आए थे कि बाहर टीवी स्क्रीन रखने पड़े। बाहर कुर्सियां रखनी पड़ीं हॉल के बाहर। इतने श्रोतागण आए थे!” मैंने कहा, “शिव खेड़ा ने क्या कहा?” तो उसने कहा, “साहेब! इतना बड़ा नाम है। सिर्फ भारत के स्तर पर नहीं, इंटरनेशनल स्तर पर उसका एक नाम है। तो नाम के मुताबिक कार्य तो होता ही है। चार्ज भी इतना तगड़ा था। तो सच में ऐसी बातें कहीं कि लोग डेढ़ घंटे उन्हें सुनते ही रहे, सुनते ही रहे। और थोड़ी देर तक तो लोगों का मन पॉजिटिव (Positive) हो ही गया।”
लेकिन बाद में उसने बहुत अच्छी बात कही, उस आदमी ने, मॉर्निंग वॉकर ने कि, “महाराज साहेब! आपके प्रवचन जो रोज़ सुनते हैं, उसके लिए कोई नई बात उसमें नहीं थी। आप बिना फीस लेक्चर देते हो, वे फीस के साथ लेक्चर देते हैं। इतना ही फर्क होता है!” तो मोटिवेशनल स्पीकर्स इतने सारे क्यों हो गए? और इनका बिज़नेस इतना तगड़ा क्यों चलता है? लोग नेगेटिविटी (Negativity) में आ गए हैं। यदि धर्म हमारे पास है, ध्यान आपके पास है, साधना आपके पास है, तो आप नेगेटिविटी में नहीं जाएंगे।
नेगेटिविटी में क्यों जाते हो? ‘मेरे पास में जो फ्लैट में रहता था, वो आगे पहुँच गया, उसने बहुत बड़ा बंगला ले लिया!’ अब हमारी प्राचीन अवधारणा क्या थी? ‘वो पुण्यशाली था। गत जन्म में उसने पुण्य किया था, तो पुण्य के प्रभाव से वो और ज़्यादा सुखी हुआ।’ तो हमारे मन में ईर्ष्या नहीं होती थी। लेकिन जब ये धर्म की बात मन से निकल गई, तो बात ये आई कि ‘ये भी हमारे साथ रहता था, हमारे जैसा ही बिज़नेस करता था, आज कहाँ पहुँच गया साला! और हम तो यहीं रह गए!’ तो एक जलन पैदा होती है।
प्रभु शासन क्या करता है? आपके भीतर कभी भी जलन को पैदा नहीं होने देता। हम आनंद में क्यों हैं? मुझसे बहुत अच्छे ऑरेटर्स (Orators – वक्ता) जिन-शासन में हैं, लेकिन मैं गुणानुरागी हूँ। ‘रत्नसुंदर सूरीजी के प्रवचन की मैं अनुमोदना करूँगा कि हज़ारों-लाखों लोगों को ये धर्म दे रहे हैं!’ तो मुझे अच्छा लगेगा। ये शासन मिल गया, ये प्रभु की चद्दर मिल गई, तो जलन छू हो गई! आपके हृदय में जलन है। जलन होने के कारण आप पीड़ित हैं। नहीं है कि दूसरा सुखी हो गया, इससे आप दुखी हो। आप समझते गलत हो। आप ऐसा समझते हो कि ‘वो सुखी हो गया, उससे मैं दुखी हो गया।’ नहीं, वो सुखी हुआ इससे नहीं! ‘बहुत लोग सुखी हैं, इससे मैं ज़्यादा सुखी हूँ’, तुम्हें जलन नहीं होती। यहाँ जलन पैदा होती है। और जलन पैदा हुई, तो तुम पीड़ित हो।
तो पहले चरण में हम पॉजिटिविटी को प्राप्त करना चाहते हैं। हमारे आसपास दो आन्दोलनो बिखरे हुए हैं— पॉजिटिविटी के और नेगेटिविटी के। हमारे जैसे संतों ने पॉजिटिविटी के आन्दोलन छोड़े हैं और करोड़ों लोगों ने नेगेटिविटी के आन्दोलन छोड़े हैं। सुबह उठे और नेगेटिविटी— “अरे! क्या अपना जीवन है, ऐसे झोंपड़े में रहना, ऐसे फुटपाथ पर रहना, ऐसा करना, ऐसा…” सुबह से ही नेगेटिविटी, उदास रहते हैं। तो हमारे आसपास दो आन्दोलनों के वर्तुल हैं। अब जैसे आपके टीवी में व्यवस्था है कि आप जिस स्टेशन को आपके टीवी में लाना चाहते हो, उस स्टेशन को ला सकते हो। क्योंकि आन्दोलन पर बात पूरी टिकी हुई है। तो ऐसे ही अपने मन को आप पॉजिटिव बना दोगे, थोड़ी देर के लिए, दो मिनट के लिए। अब पूरे दिन के लिए पॉजिटिव हो जाओगे।
एक प्रयोग कल से ही करो। सुबह उठो, सबसे पहले काम एक ही करना है, पॉजिटिविटी को प्राप्त करने का। आँखें बंद हैं, मन में प्रभु का स्मरण है और एक विचार मन में पनपे कि ‘मैं कैसा सुखी हूँ! प्रभु का शासन मुझे मिला। ऐसे संतों के प्रवचन मुझे मिले। कितना अच्छा मुझे मिला है!’ यदि मैं चाहूँ कि मुझे सुखी ही होना है, सुखी ही रहना है, तो मैं सुखी के रूप में ही रह सकता हूँ। इतनी शक्ति, इतनी संपत्ति, इतनी आवश्यक सामग्री मेरे पास है। अब दो मिनट पॉजिटिविटी में आ जाओ— ‘मेरे पास सब कुछ है।’ और दो मिनट पॉजिटिविटी में गई, फिर समझो कि आपका मन जो है, पॉजिटिव मूड (Mood) पर स्थिर हो गया। फिर पूरा दिन वही आन्दोलन पकड़े जाएंगे।
तो आपको सुखी होना है, आपके हाथ में है। कोई ज्योतिषी के हाथ में नहीं है। ‘ये साला फुटपाथ पर बैठा है और तुम पूछते हो, “बाबा, मेरा भविष्य क्या?” वो कहेगा, “अरे भैया! मेरा भविष्य मैं देख सकता, तो मैं फुटपाथ पर क्यों होता? मैं घर में, बंगले में नहीं रहता? मैं फुटपाथ पर हूँ और तुम मुझे हाथ दिखाने के लिए आए हो!”‘ तुम्हारा भविष्य तुम्हारे हाथ में है। तो आज जैसे ध्यान का यह सत्र हुआ, ऐसा हर संडे को ध्यान का सत्र होगा।
