कर्तृत्व-मुक्त कार्य
साक्षी-भाव में दो प्रक्रियाएं होती हैं। पहले कर्तृत्व छूटता है, बाद में कार्य भी छूट जाते हैं। पहले चरण में कर्तृत्व छूटेगा, हमारा कर्तापन छूट जाएगा। कोई भी सद्गुरु के पास जो कार्य होता है, वो कर्तृत्व-मुक्त होता है। तो पहला चरण शिष्य के पास भी यही आएगा। हमें पहला पाठ यह मिलेगा कि कार्य करने हैं, प्रभु की आज्ञा के मुताबिक एक-एक कार्य करना है, लेकिन कर्तृत्व हमारा नहीं होना चाहिए। कर्तृत्व प्रभु का, कर्तृत्व सद्गुरु का।
वैसे आप तो Partnership में काम करते हैं न?! कर्तृत्व में आप तीन विभाग करते हो न? थोड़ा प्रभु का, थोड़ा सद्गुरु का, और ज़्यादा मेरा! लेकिन आप जब भी कोई तपश्चर्या करते हैं, स्पष्ट अनुभूति होती है कि हमसे यह तपश्चर्या हो ही नहीं सकती थी। पैर दुखते हैं, सिर दर्द होता है, बेचैनी होती है, फिर भी आप माक्षसमण कर पाते हो; क्यों? प्रभु करवाते हैं, इसलिए। कर्तृत्व सिर्फ और सिर्फ प्रभु का है, सद्गुरु का है; करनेवाले तुम नहीं हो।
तो अब से आपको भी प्रभु को केंद्र में रखना है। हमें परिधि में रहना है। जब से प्रभु-कर्तृत्व की बात सद्गुरु के द्वारा मुझे मिली, तब से सिर्फ साक्षी के रूप में रहने का हुआ है। और इसलिए मेरे जैसा आनंदपूर्ण आदमी शायद दूसरा कोई नहीं होगा! मुझे कुछ चाहिए ही नहीं। कुछ करना नहीं है; कुछ कराना भी नहीं है। इतनी सी ही इच्छा है कि आपका आपका हृदय प्रभु के प्रेम से ऐसा भर जाए, कि उस हृदय में दूसरी कोई इच्छा ही न रहे।
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित ‘स्तवना चौबीसी’। प्रथम स्तवना, जो परम तारक परमात्मा ऋषभदेव प्रभु के चरणों में समर्पित हुई है, उसकी प्रथम पंक्ति:
“जगजीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”
प्रथम पंक्ति में परमात्मा के तीन विशेषण दिए।
पहला विशेषण: ‘जगजीवन’। परमात्मा हमारे लिए जीवन स्वरूप हैं। उपनिषद् ने कहा, “आनंदो जीवनम्।” आनंद ही जीवन है। तो परमात्मा हमें आनंद देते हैं। परमात्मा ने ‘सर्व-स्वीकार’ का सिद्धांत दिया, आनंद ही आनंद। परमात्मा ने ‘वर्तमान योग’ की बात कही, तो आनंद ही आनंद।
दूसरा विशेषण: ‘जगवालहो’। हमारे प्रिय, हमारे प्रियतर, हमारे प्रियतम सिर्फ परमात्मा। संसार को हमने चाहा, अनगिनत जन्मों में हमने संसार को चाहा। पदार्थों पर राग किया, व्यक्तियों को चाहा। लेकिन उस चाह का परिणाम क्या था? नरक और निगोद का सफर। जब परमात्मा प्रिय बन जाते हैं, तब मोक्ष ये रहा! मोक्ष कोई दूर की घटना नहीं है। जब हमारा मन प्रभु में डूब गया, मोक्ष आ गया। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, “तू तेरा मन मुझे दे दे।” अर्जुन सामने पूछता है, “मैं मेरा मन तुम्हें दे भी दूँ, मुझे क्या मिलेगा?” आप तो श्रद्धा वाले हो, कोई कमर्शियल माइंड (Commercial mind) वाले नहीं हो। आप बुद्धिजीवी नहीं हो, श्रद्धाजीवी हो। लेकिन अर्जुन बुद्धिजीवी है। वो पूछता है, “मैं तुम्हें मेरा मन दे दूँ, मुझे क्या मिलेगा?” तब श्रीकृष्ण ने कहा—
“निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।”
‘जो तू तेरा मन मुझे दे दे, तो फिर तुझे संसार में नहीं रहना पड़ेगा। तू परम चेतना के भीतर निवास करने वाला होगा।’ मन प्रभु को क्या दिया, संसार छूट गया, प्रभु मिल गए।
और तीसरा विशेषण: प्रभु मरुदेवा माता के पुत्र। उपमिति में और शक्रस्तव में भी एक सुंदर बात आती है। वहाँ प्रभु को ‘गुरु’ के रूप में कल्पित किया है— “त्वं च मे गुरु:।” अरे! प्रभु तो प्रभु हैं। प्रभु को गुरु के रूप में क्यों स्थापित किया? बड़ी अच्छी बात है। पर्दे के पीछे की बात यह है कि प्रभु दूर की घटना लगती हैं। सिद्ध-शिला पर विराजमान प्रभु, समवसरण में विराजमान प्रभु। प्रभु दूर की घटना लगती हैं, लेकिन सद्गुरु? सद्गुरु तो बहुत ही नज़दीक की घटना हैं। पाट पर बैठे हैं, कुर्सी पर बैठे हैं, और तुम उनके चरणों का स्पर्श करते हुए बैठे हो। तो प्रभु को सद्गुरु के रूप में कल्पित किया कि ‘प्रभु को मेरा बनाने में थोड़ी दिक्कत आती है, लेकिन गुरु को तो मैं जल्दी ही मेरा बना ही दूँगा, क्योंकि गुरु नज़दीक हैं।’ यही आयाम इस तीसरे विशेषण में है। ये ऋषभदेव परमात्मा कौन से? सिद्ध-शिला वाले नहीं, समवसरण वाले नहीं। ये तो मरुदेवा माता के लाडले, नन्हे से बच्चे हैं! अब प्रभु से नज़दीकी हो गई।
दो-तीन दिन से हम एक पदार्थ घोंट रहे हैं कि प्रभु का नाम तो मंगलमय है ही, लेकिन प्रभु के माता-पिता के नाम भी कितने सुंदर हैं और अपन को साधना जगत में ले जाने वाले हैं। प्रभु महावीर देव, हमारे अनन्य उपकारी। पिता का नाम क्या? सिद्धार्थ। अब तुम तो सिद्धार्थ बन गए ना? तुम तो बन गए ना? इन लोगों को बनाने का है अभी। तुम तो बन गए ना? ‘सिद्धार्थ’, जिसके सब कार्य परिपूर्ण हो गए, वो सिद्धार्थ। साक्षी-भाव में आया हुआ साधक!
साक्षी-भाव में दो प्रक्रियाएं होती हैं। पहले कर्तृत्व छूटता है, बाद में कार्य भी छूटते हैं। देयर आर टू स्टेजेज़ (There are two stages)। साक्षी-भाव के दो चरण हैं। पहले चरण में कर्तृत्व छूटेगा, हमारा कर्तापन छूट जाएगा। हमारी एक सुंदर परंपरा है। हम ज्ञान लेंगे सद्गुरु से। उपनिषदों ने तो स्पष्ट रूप में कहा कि ‘गुरु देते हैं वही ज्ञान है, बाकी सब अज्ञान है।’ तो शिष्य सद्गुरु के मुख से सूत्र को लेता है। जब वह गुरु के पास आएगा और कहेगा, “गुरुदेव, मुझे दशवैकालिक सूत्र आप दो, आचारांग सूत्र आप दो।” उस समय गुरुदेव शिष्य को सूत्र तो देते ही हैं, लेकिन एक बात कहते हैं— “खमासमणाण हत्थेणं।” ‘मैं यह सूत्र तुझे दे रहा हूँ, ये बात नहीं, मैं नहीं दे रहा हूँ। सद्गुरुओं की परंपरा तुझे यह सूत्र देती है।’ गणधर भगवंत ने साढ़े पच्चीस सौ वर्ष पूर्व ये ग्रंथ लिखा था। गुरु-परंपरा से यह ग्रंथ मेरे हाथ में आया। तो मैं तुझे यह ग्रंथ दे रहा हूँ, उसमें गुरु-परंपरा का बहुत बड़ा उपकार है। यदि गुरु-परंपरा ने इस ग्रंथ को संजोया ना होता, तो मेरे पास ये ग्रंथ आया नहीं होता। तो सद्गुरु कहते हैं, “खमासमणाण हत्थेण।” मैं नहीं दे रहा हूँ, सद्गुरुओं की परंपरा तुझे ये ग्रंथ दे रही है। तो सद्गुरु ने अपने कर्तृत्व से मुक्ति पा ली। कार्य रखा। ग्रंथ देने का, पढ़ाने का काम रखा। लेकिन कर्तृत्व को छोड़ दिया।
तो कोई भी सद्गुरु के पास जो कार्य होता है, वो कर्तृत्व-मुक्त होता है। तो पहला चरण शिष्य के पास भी यही आएगा। हमें पहला पाठ यह मिलेगा कि कार्य करने हैं, प्रभु की आज्ञा के मुताबिक एक-एक कार्य करने हैं, लेकिन कर्तृत्व हमारा नहीं होना चाहिए। कर्तृत्व प्रभु का, कर्तृत्व सद्गुरु का। मासक्षमण कोन कराते हैं? तुम करते नहीं हो, प्रभु कराते हैं। अपन तो पार्टनरशिप (Partnership) में काम करते हैं। थोड़ा प्रभु का, थोड़ा सद्गुरु का, और ज़्यादा मेरा! कर्तृत्व में तीन विभाग पड़ेंगे ना? ‘थोड़ा प्रभु का कर्तृत्व, थोड़ा सद्गुरु का, और ज़्यादा मेरा!’ नहीं? वो प्रभु का ही है। सद्गुरु का ही है। तुम नहीं कर रहे।
मैं एक रूपक कथा बहुत बार कहता हूँ। एक हाथी था। हाथी रोड पर चल रहा था। बीच में नदी आई। नदी पर ब्रिज (Bridge) था। ब्रिज तो था, लेकिन ब्रिज जीर्ण-शीर्ण हो गया था। हाथी के पैर पड़ते हैं और ब्रिज ध्रुजता है, हिलता है। लेकिन सद्भाग्य हाथी का कि पुल टूट नहीं पड़ा। ब्रिज पूरा हुआ। अब हाथी रोड पर चल रहा है। हाथी को तो ख्याल ही नहीं था। एक मक्खी हाथी के कान पर बैठी हुई थी। उस मक्खी ने हाथी के कान में कहा, “हाथी भाई, हाथी भाई! हम दोनों ने मिलकर ब्रिज को कैसे हिला दिया!” मैं बहुत बार कहता हूँ, वो जो मक्खी थी ना, वो हमसे ईमानदार थी! उसने कम से कम हाथी को भी थोड़ी क्रेडिट (Credit) तो दी। हम क्या कहेंगे? ‘मैंने वर्षितप किया, मैंने वर्षितप किया कि प्रभु ने करवाया?’ तो उस मक्खी ने तो फिफ्टी-फिफ्टी (Fifty-fifty) कर दिया, आधा हाथी का, आधा अपना। और इन मक्खियों की हालत क्या है? लेकिन हम जब भी तपश्चर्या करते हैं, स्पष्ट अनुभूति होती है कि हमसे यह तपश्चर्या हो ही नहीं सकती। पैर दुखते हैं, सिर दर्द होता है, बेचैनी होती है, फिर भी मासक्षमण होता है। क्यों? प्रभु करवाते हैं, इसलिए होता है।
तो साक्षी-भाव के दो चरण। पहले चरण में कर्तृत्व छूट जाएगा। मेरी तो भाषा से भी कर्तृत्व निकल गया। विचारों से भी कर्तृत्व निकल गया। प्रभु ने बहुत बड़ा प्रेम बरसाया। प्रभु ने क्या किया? प्रभु ने ‘यशोविजय’ नाम की संघटना को ही लुप्त कर दिया। अब यशोविजय कैसे कहेगा कि मैंने किया? यशोविजय तो है ही नहीं! और जब मैं नहीं हूँ, यशोविजय नहीं है, तभी प्रभु आते हैं। कोई भी सद्गुरु के हृदय में प्रभु कब आते हैं? जब सद्गुरु का हृदय Total vacant हो जाता है। देयर इज़ द टोटल वेकेंसी (There is the total vacancy)। ना अहंकार है, ना राग है, ना द्वेष है। वो जो परम शून्यता है, उस परम शून्यता में परम चेतना का अवतरण होता है। तो जब तक यशोविजय होगा, प्रभु नहीं आएंगे। और यशोविजय मिट जाएगा, फिर प्रभु ही प्रभु रहेंगे।
अब आपको क्या करना है, वो बोलो। तुम्हें रहना है या प्रभु को रखना है, क्या करना है? मैंने पहले कहा था, कबीरजी ने कहा है— “प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं।” प्रेम की गली, भक्ति की गली, संकरी गली है। उसमें दो का प्रवेश शक्य नहीं। या तो तुम रहो, या तो प्रभु रहें। Now choice is yours! क्या करना है, बोलो। मैं आपसे पूछता हूँ, क्या इरादा है, बोलो! आप तो अनगिनत जन्मों से केंद्र में रहे, क्या मिला? क्या मिल भी सकता है? सिवाय नरक? क्या मिल सकता है? और प्रभु केंद्र में आ जाएंगे, मोक्ष ये रहा! Now choice is yours बोलो, क्या चाहिए? नरक-निगोद चाहिए या मोक्ष चाहिए? चाहिए तो मोक्ष, लेकिन केंद्र में तो ‘मेरे मैं’ को ही रखूँगा! क्यों?
तो अब प्रभु को केंद्र में रखना है। हमें परिघ में जाना है। तो पहले चरण में कर्तृत्व छूट जाएगा। ‘प्रभु ही सब कर रहे हैं।’ जब से प्रभु-कर्तृत्व की बात सद्गुरु के द्वारा मुझे मिली— पन्यास-प्रवर भद्रंकरविजय महाराज साहेब, दादा गुरुदेव भद्रसूरि महाराजा, कलापूर्ण सूरि दादा, अरविंद सूरि दादा, ओमकार सूरि दादा— इन सब गुरुओं से जब ये बात मुझे मिली कि ‘कर्तृत्व हमारा होता ही नहीं’, उस समय से कर्तृत्व छूट गया। अब साक्षी के रूप में रहने का हुआ है। और इसलिए मेरे जैसा आनंदपूर्ण आदमी शायद दूसरा नहीं होगा। मुझे कुछ चाहिए ही नहीं। मैं कहीं भी चातुर्मास करता हूँ, लोग मुझे पूछते हैं, “साहेबजी, क्या कराना है? आपकी इच्छा क्या है?” तब मैं कहता हूँ कि “मेरी इच्छा एक ही है कि लोगों को प्रभु के सम्मुख बिठा देना। बाकी मेरी कोई दूसरी इच्छा नहीं।” मैं ही नहीं हूँ, मेरी इच्छा कैसे हो? और ‘कुछ कराना’, ये तो मेरी वोकैबुलरी (Vocabulary) में नहीं है कि ये कराना है, ये कराना है।
मासक्षमण की बात भी चिराग भाई ने की। मैं तो कुछ कराता नहीं। ‘एक घंटे आ जाओ, प्रभु को सुनकर विदा हो जाओ। २३ घंटे हम हमारे में रहेंगे।’ बस, चौमासा पूरा हमारा! मुझे मेरा प्यार तुम्हें देना है। और तुम्हारा प्रेम मुझे चाहिए। मुझे दूसरा कुछ नहीं चाहिए। इतना व्यस्त हूँ, पाँच-पाँच साल के प्रोग्राम फिक्स (Fix) हुए हैं। पाँच-पाँच साल के उपधान फिक्स हैं। संघ फिक्स होते हैं, चातुर्मास फिक्स होते हैं। तो इतने कार्यक्रमों से थका हुआ आदमी हूँ कि चौमासे में तुम शांति से रहने दो। यही तुम्हारी बड़ी कृपा है। न एक पूजा पढ़ानी है, न एक उत्सव कराना है। कुछ भी कराना नहीं है। मुझे प्रेम देना है। प्रभु का प्रेम जो मैंने पाया है, उस प्रेम आपको देना है। और आपका हृदय प्रभु के प्रेम से भर जाए, इतनी तो इच्छा है। ऐसा भर जाए प्रभु के प्रेम से आपका हृदय, कि आपके हृदय में भी दूसरी कोई इच्छा न रहे। न गुस्सा रहे, न अहंकार रहे। अरे, जगह ही नहीं तो कहाँ से रहेगा अहंकार? प्रभु के प्रेम से हृदय भर गया। अब हृदय में जगह ही नहीं है, तो अहंकार रहेगा कहाँ?
बाइबल में ईशु ख्रीस्त ने कहा है— “एम्प्टी दाइ वेसल, एंड आई विल फिल इट (Empty thy vessel, and I will fill it)।” तू तेरा हृदय खाली कर दे, मैं उसे भर दूँगा। यहाँ हम कहते हैं कि तुम तुम्हारे हृदय को वेकेंट करो, एम्प्टी करो। ना कर सको, तो तुम्हारा हृदय हमें दे दो, हम वेकेंट कर देंगे। सद्गुरु का कार्य है आपके हृदय को वेकेंट करने का। और प्रभु का कार्य है आपके हृदय को प्रेम से भर देना।
आज से ८००, १०००, २००० जन्म पहले की एक बात है। आपको तो याद भी नहीं है, मुझे भी याद नहीं थी। लेकिन शास्त्र के माध्यम से मुझे याद आया। तो २०००-४००० जन्म पहले, एक जन्म हमारा ऐसा था जिस जन्म में ‘प्रभु क्या हैं?’ हम जानते नहीं थे। लेकिन ऐसा एक सद्भाग्य हमारा रहा कि हम एक सद्गुरु के चरणों में जाकर बैठे। अब सद्गुरु का काम तो एक ही है— आपको प्रभु देना। तो सद्गुरु के चरणों में जाकर हम बैठे, तब सद्गुरु ने परमात्मा की महिमा की बात की। परमात्मा का ऐश्वर्य कैसा है? “ऐसे परमात्मा हैं, ऐसे परमात्मा हैं।” शायद Very first time हमने परमात्मा की बात सुनी कि ऐसे परमात्मा होते हैं। ये परमात्मा की बात सुनकर हमारा हृदय भीगा हो उठा। और हमने एक क्षण के लिए प्रभु से प्रार्थना की कि, “प्रभु! ऐसा महान तू है, तो तू मेरे हृदय में क्यों नहीं आता? तू मेरे हृदय में भी आ जा ना!” एक क्षण की प्रार्थना! और प्रभु ने हमें सिलेक्ट कर लिया।
लेकिन क्या होता है कि इनिशियल स्टेज (Initial stage) का काम, प्रारंभिक स्तर का कार्य सद्गुरु करते हैं। बाद का कार्य प्रभु करते हैं। तो परम चेतना ने गुरु चेतना से संदेश भेजा कि “I have selected him, I have selected her.” बस इतना ही संदेश भेजा सद्गुरु चेतना को संदेश मिला। अब सद्गुरु चेतना ने काम शुरू किया। सद्गुरु चेतना को एक ही काम करना था, उसको वेकेंट बनाना था। राग और द्वेष से उसका हृदय भरा हुआ था। अब प्रभु का प्रेम बरसे, तो भी कहाँ बरसे? एक ग्लास धूल से भरा हुआ है, उसमें पानी गिरेगा तो क्या होगा? सिवाय कीचड़! तो हमारे हृदय का पात्र राग और द्वेष के कचरे से भरा हुआ था। अहंकार के कचरे से भरा हुआ था।
सद्गुरु ने हमारे हृदय के पात्र को वेकेंट किया। सद्गुरु ने प्रेम से कहा— “तू कहता है मैंने किया, मैंने किया, मैंने? अरे, तूने कुछ नहीं किया है। ये सब करने वाले परमात्मा हैं।” हम बोलते हैं ना गीत में— “मैंने कुछ ना दिया, उसने सब कुछ दिया।” वो तो बरसता ही है। लेकिन कहाँ बरसेगा? तो गुरु ने तुम्हारे अहंकार की रज से तुम्हारे हृदय का पात्र स्वच्छ कर दिया। तो इनिशियल स्टेज का काम पूरा हो गया। अब प्रभु बरसेंगे। अब प्रभु का अभिषेक होगा तुम पर। तुम क्या अभिषेक करोगे प्रभु का? प्रभु तुम पर अभिषेक करते हैं।
हमारा ये मुमुक्षु सामने बैठा है, प्रभु अभिषेक करके आए। इतना रोता था, इतना रड़ता था, सिसक-सिसक कर रोता था। प्रभु का प्रेम इतना मिला, इतना मिला! वो सोच रहा था कि क्या प्रभु मेरे पर इतने बरस सकते हैं? उसकी कल्पना में भी नहीं आता था। मुझे सालों से सूझ रहा है। लेकिन उसके मन में एक समस्या थी कि “क्या प्रभु मुझ पर बरसेंगे? गुरुदेव पर तो बरसते हैं, लेकिन मुझ पर बरसेंगे?” आज प्रभु उस पर बरसे। और हर्ष के आँसू से इस आनंद को उसने डिस्चार्ज (Discharge) किया। नृत्य और हर्ष के आँसू, वो भीतर के आनंद को डिस्चार्ज करने की विधियॉं है। नाचते क्यों हो? इतना आनंद छाया मन में, इतना आनंद छाया कि तुम उस आनंद के आवेग को टॉलरेट (Tolerate) नहीं कर सकोगे। उसे डिस्चार्ज करना ज़रूरी है। तुम नाचोगे तो डिस्चार्ज हो जाएगा आनंद। तुम्हारी आँखों से हर्ष के आँसू बहेंगे और भीतर का आनंद डिस्चार्ज हो जाएगा। तो सद्गुरु ने तुम्हारे पात्र को खाली कर दिया।
लेकिन तकलीफ क्या हुई? अभी तो नीचे उतरे थे, और एक चप्पल कुत्ता ले गया था। गुस्सा फूट उठा! “कौन ले गया? कौन साला है ऐसा? किसने ये किया?” तो गुरुदेव ने जो पात्र साफ किया था, उस पर कचरा आ गया! तो २०००-४००० जन्मों से हमारे और तुम्हारे बीच एक खेल चल रहा है। हम तुम्हें साफ करते हैं, तुम कचरा भरते जाते हो। लेकिन याद रखना, हम थकने वाले नहीं हैं। माँ क्या करती है? बच्चे को स्नान कराती है, पाउडर (Powder) लगाती है, नए वस्त्र पहनाती है और फिर रसोई घर में जाती है। और बच्चा कहाँ जाता है? धूल में! तो धूल का अभिषेक करता है। फिर माँ आती है, फिर स्नान कराती है। जैसे माँ थकती नहीं, ऐसे गुरु माँ भी थकती नहीं। हम नहीं थकने वाले हैं। हम काम करेंगे। और आपसे ही रिज़ल्ट हमें लेना है। आपके मन में अभी निश्चित है कि नहीं, वो मुझे पता नहीं है, लेकिन मैं आपसे रिज़ल्ट लूँगा ही, ये निश्चित बात है।
शर्त आपकी एक ही है कि आपको समय सर आना है। ‘यशोविजय’ नाम की घटना तो है ही नहीं। यशोविजय को तो सुनना ही नहीं है, मैं तो हूँ ही नहीं। प्रभु बोल रहे हैं। ‘प्रभु को सुनो, प्रभु को पियो।’ एक मज़ा आ जाएगा। अभी मैं मानता हूँ कि आपने प्रभु को ठीक तरह से पिया नहीं है। यदि पिया होता, तो मेरे समय से पहले तुम सब आ जाते। मैं बाद में आता। पूरा ऑडियंस (Audience) भर जाता, तब मैं आता। लेकिन अभी तो आधा ऑडियंस भरा होता है और मैं आता हूँ। और मेरे आने के बाद फिर लोग आते हैं।
अब कल से क्या होगा? कल से क्या होगा? कल तो संडे (Sunday) है। तो आपके लिए थोड़ा समय भी लेट (Late) रखा है। लेट उठोगे, बैठती भी लेट होगी, सब लेट होगा। तो प्रवचन का समय भी लेट रखा है। पौने नौ-नौ… नौ बजे तक आ जाना। ठीक है? शार्प (Sharp) नौ बजे ध्यान की बातें हम शुरू करेंगे। मेडिटेशन (Meditation)। आज का आदमी अशांत युग में जी रहा है। मनोवैज्ञानिक आज के युग को ‘स्ट्रेस एज’ (Stress age) कहता हैं। स्ट्रेस एज, अशांति का युग! मैं उस युग को ‘मेडिटेशन एज’ (Meditation age) कहता हूँ, ‘पीस एज’ (Peace age) कहता हूँ। हमारे लिए ध्यान का युग है ये, शांति का युग है।
शांति तुम्हारे भीतर है। तुम आनंदमय हो। तुम शांत हो। अशांति तो तुम बाहर से लाते हो। बच्चे की दीक्षा का इनविटेशन कार्ड (Invitation card), या शादी का इनविटेशन कार्ड तो कभी-कभी भेजते होंगे। लेकिन अशांति को इनविटेशन कार्ड रोज़ भेजते हो तुम— “आ जाओ, आ जाओ!” फिर हमारे पास लोग आते हैं— “महाराज साहेब, ये तकलीफ है, ये तकलीफ है, ये पीड़ा है।” लेकिन पीड़ा आई कहाँ से? तू तो आनंदघन है। पीड़ा तेरे में है ही नहीं। पीड़ा आई कहाँ से? जहाँ से पीड़ा आई है, उस द्वार को बंद कर दे। तो कल हम मेडिटेशन को पहले थ्योरेटिकली (Theoretically) समझेंगे। और बाद में प्रैक्टिकली (Practically) भी करेंगे।
आपको शायद अनुभव हो जाएगा कि “मैं तो शांत ही हूँ।” शांति मेरे पास ही है। मुनिराजों को तो आपने देखा है ना? वंदन किए हैं, दर्शन किए हैं। १०४ डिग्री बुखार में, शरीर तप रहा है। आप पूछेंगे, “साहेबजी, साता में?” मुस्कान के साथ वे कहेंगे— “अरे, बड़ी साता में, बड़ा प्रसन्न हूँ।” ‘अरे शरीर में तो बुखार है!’ “तो शरीर में बुखार है, लेकिन मेरे मन में बुखार नहीं है। मेरे मन में तो आनंद ही है।” हम शरीर को अलग करते हैं, फिर मन को भी अलग करना है और आत्मानुभूति करनी है। तो ध्यान का मार्ग आनंद का मार्ग है।
आज जो नहीं आए हैं, आपके मित्र, संबंधी, सबको कहना कि संडे को, हर संडे को, ध्यान का शिबिर लगेगा। ध्यान की बातें थ्योरेटिकली समझाई जाएंगी, प्रैक्टिकली ध्यान कराया जाएगा। और आपकी अशांति हम ले लेंगे। हमारे पास डस्टबिन (Dustbin) बड़ा है। आप सबकी अशांति यहाँ रखकर जाना। जूते नीचे रखते हो ना? लेकिन जूते तो लेकर जाते हो। अशांति को मेरे डिब्बे में रख देना, और फिर ले जाने की नहीं! फिर शांति को लेकर जाने का। तो बस प्रभु को पीना है। मुझे आपसे कुछ लेना नहीं है। मुझे सिर्फ मेरा प्रेम देना है। आप भी दे सको तो प्रेम आपको दूँ। आपकी जात को प्रेम दो, दूसरों को प्रेम दो, सबको प्रेम दो। बस प्रेम दो। श्राविका को प्रेम दो, बच्चों को प्रेम दो। Charity begins from home. घर से शुरुआत होगी। तो ऐसा एक युग पुणे में आ जाए, कि पुणे वाले सब आनंद में हो जाएं। तो मेरा चातुर्मास सफल! मुझे दूसरा कुछ नहीं चाहिए। आपको प्रेम देना है, आपको आनंद देना है। आप मेरे प्रेम को, मेरे आनंद को स्वीकारो, इतनी ही इच्छा है।
