Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 02-08-2026 | Pune Chaturmas

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जीवदयाणं

प्रभु जीवन के दाता हैं। सिर्फ साँसों को लेना और छोड़ना, यह जीवन नहीं है। जीवन का अर्थ है, जहाँ एक-एक क्षण आनंदमय हो। प्रभुने दी हुई सर्वस्वीकार और वर्तमानयोग जैसी साधनाओं की बदौलत हम आनंदमय रह सकते हैं; जीवन का अनुभव कर सकते हैं।

सर्वस्वीकार। कोई अप्रिय घटना घटित हो गई। अब तुम कितना भी सोचो, उसमें कोई परिवर्तन होने वाला नहीं है। तो जिस रूप से वह घटित हुई है, उसका स्वीकार कर लो। जब अस्वीकार है ही नहीं, तो पीड़ा कहाँ से आएगी?!

वर्तमानयोग। भूतकाल के क्षण बीत गए। भविष्य के क्षण अभी आए नहीं हैं। वर्तमान का एक क्षण आपके पास है। यदि आप इस एक क्षण को आनंद से भर दो, तो आनेवाला next क्षण आनंद से भरा हुआ ही आएगा और ऐसे ही क्षण-प्रतिक्षण आनंद की अखंड धारा शुरू हो जाएगी।


हमारे युग के साधना-मनीषी पंन्यास प्रवर गुरुदेव भद्रंकर विजय महाराज साहेब ने कहा था कि, “जब हम साधना जगत में या भक्ति जगत में प्रवेश करना चाहते हैं, तो हमें ‘यशोविजय चौबीसी’ का स्वाध्याय करना ही चाहिए।” साधना और भक्ति की जुगलबंदी इन स्तवनाओं में है। भक्ति धारा भी इतनी प्रबल है, न पूछो बात! और साधना की बातें भी जगह-जगह यहाँ रखी गई हैं। पहला स्तवन, पहली पंक्ति—

“जग-जीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”

पहला ही शब्द आया— ‘जग-जीवन’। प्रभु ही हैं जीवन! उपनिषद् के ऋषि कहते हैं— “आनंदो जीवनम्।” आनंद ही जीवन है। सिर्फ साँसों को लेना और साँसों को छोड़ना, ये जीवन नहीं है। जीवन का अर्थ है, जहाँ एक-एक क्षण आनंदमय हो। प्रभु जीवन-दाता हैं।

हमारे नमुत्थुणं में जो विशेषण प्रभु का नहीं आता है, और कल्पसूत्र के नमुत्थुणं में जो विशेषण आता है, वह है— ‘जीव दयाणं’। कल्पसूत्र के नमुत्थुणं सूत्र में भी कहा गया है— ‘जीव दयाणं’। प्रभु जीवन के दाता हैं। प्रभु का शासन हमें नहीं मिला होता, तो हमारे पास आनंद कहाँ से होता? प्रभु ने ‘सर्व-स्वीकार’ की साधना दी। जो भी घटना, जिस रूप से घटित हो, स्वीकार कर लो। हम इतने आनंद में क्यों हैं? कभी आप पूछते भी नहीं कि “साहेब! आप इतने आनंद में क्यों हैं?” हम कहेंगे कि हमारा आनंद प्रभु के कारण है। प्रभु ने हमें सर्व-स्वीकार का सिद्धांत दिया। प्रभु ने कहा, “जो भी घटना जिस रूप से घटित हो, तुझे स्वीकार ही करना है। रोग आया, तो भी स्वीकार। कुछ भी घटना घटित हुई, स्वीकार।” और अस्वीकार है ही नहीं, तो पीड़ा कहाँ से आएगी?

प्रभु ने सर्व-स्वीकार की साधना अपन को दी है। एक घटना अप्रिय घटित हो भी गई। हो गई तो हो गई, आगे चलो। लेकिन हम सोच रहे होते हैं— “कैसे यह घटना घटित हुई? क्यों हुई?” अरे भाई! तुम कितना भी सोचो, जो घटना घटित हो गई है, वो तो घटित हो ही गई है। उसमें कोई परिवर्तन होने वाला है नहीं। तो आगे चलो।

प्रभु ने दूसरा सिद्धांत दिया— ‘वर्तमान योग’ का। आचारांग सूत्र में एक बड़ा ही मनभावन सूत्र आता है— “खणं जाणाहि पंडिए।” प्रभु कुछ मांग रहे हैं हमारे पास! आश्चर्य की घटना! हम तो प्रभु के द्वार पर रोज़ जाते हैं, रोज़ कुछ ना कुछ प्रार्थना करते हैं। आचारांग सूत्र में यह बात आई कि प्रभु हमसे कुछ मांग रहे हैं। क्या मांगा प्रभु ने? प्रभु ने कहा कि, “तू तेरा एक क्षण, एक मिनट मुझे दे दे।” अपन कहीं मना करेंगे? प्रभु कह रहे हैं कि “तेरा एक मिनट तू मुझे दे दे।” हम कैसे मना करेंगे? हम कहेंगे— “प्रभु! पूरा जीवन तो तुमने दिया है। ये पूरा जीवन तुम्हारा ही है। तुम सिर्फ एक मिनट मांग रहे हो, प्रभु मैंने दी!”

लेकिन आचारांग सूत्र में प्रभु कुशल गुरु के रूप में आए हैं। कुशल गुरु कैसे होते हैं, आपको मालूम है? आप उँगली दोगे ना, तो यहाँ से पकड़ेंगे हाथ को। आपने हाथ दिया, तो आपको पूरा का पूरा पकड़ लेंगे! हमारे जैसे जो भी सद्गुरु हैं, वे स्माइलिंग फेस (Smiling face) वाले ही होंगे। इसका राज़ है, इसका कारण है। हमारे हाथ में छुरी है, ऑपरेशन (Operation) आपका करने का है। छुरी ऐसे हाथ में रखी हुई है पीछे। अब स्माइलिंग फेस हमारा होगा, तो ही आप नज़दीक आएंगे ना! वरना आप नज़दीक भी नहीं आएंगे। नज़दीक आएंगे, ऑपरेशन कर डालेंगे!

तो प्रभु ने कहा कि, “अच्छा! तू एक मिनट मुझे देने के लिए तैयार तो हो गया। लेकिन मुझे जो मिनट देना है, वो तो शुद्ध होना चाहिए।” शुद्ध मिनट का अर्थ यह हुआ है कि ५९ सेकंड तक तुम्हारे भाव अच्छे रहे, ६०वाँ सेकंड चल रहा है और एक व्यक्ति आपके रूम में एंटर (Enter) हुआ, आपको इसके प्रति तिरस्कार है। आपके मन में भाव उठेंगे— ‘ये क्यों आया यहाँ?’ ६०वें सेकंड पर ये भाव आया, ये मिनट निकम्मा हो गया। ये मिनट प्रभु के लिए अब समर्पित होने के लिए लायक नहीं। दूसरा मिनट, इसमें भी अंत में ऐसा कोई विचार आ गया, तो वो मिनट भी मीनिंगलेस (Meaningless) हो गया।

तो प्रभु कहते हैं कि “एक मिनट तेरे पास है। एक ही मिनट!” अगले मिनट गए। आने वाले मिनट खुलने वाले हैं। अभी एक ही मिनट अपने हाथ में है। बरोबर ना? जो मिनट बीत गए, वो बीत गए। अब आने वाले हैं, वो आने वाले हैं। अभी आपके पास एक ही मिनट है। उस मिनट को आनंद से भर दो। यदि आप एक मिनट को आनंद से भर दो, तो आनंद की धारा चलेगी। तो प्रभु जीवन-दाता, आनंद-दाता। सर्व-स्वीकार की साधना प्रभु ने दी, वर्तमान योग की साधना प्रभु ने दी।

एक घटना याद आती है। नागार्जुन बड़े विद्वान बौद्ध भिक्षु थे। इतने विद्वान थे कि ५००० भिक्षु-भिक्षुणी इकट्ठे होते थे, तब प्रवचन देने का काम, वाचनाएं देने का काम सिर्फ नागार्जुन ही करते थे। इतने विद्वान थे! एक दिन नागार्जुन को हुआ कि, ‘बहुत प्रवचन दिए। बाहर की दुनिया में बहुत ही घूमा। अब मेरी साधना को मुझे अंतर्लीन बनानी चाहिए। और इसलिए मुझे एकांत में जाना चाहिए। यहाँ मैं रहूँगा भीड़ में, तो भीड़ से ही घिरा रहूँगा। मेरी साधना मैं कब करूँगा?’ तो संघ की अनुमति लेकर नागार्जुन अकेले एक गुहा की ओर चले।

जिस गुहा में जाकर उन्हें साधना करनी है, निकले अकेले। सैकड़ों शिष्य उनके थे, सबको मना कर दिया— “किसी को भी साथ में नहीं आने का है, मैं अकेला ही जाऊँगा।” अकेले चल पड़े। एक शाम एक गाँव में आए। न तो वहाँ मठ था, न कोई मंदिर, न कोई धर्मशाला। एक छोटा सा रैन बसेरा था। वहाँ वे गए। रात १२ बजे तक ध्यान किया और ४ बजे फिर उठ गए। आप निद्रा लेते हैं, आज के मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि चार घंटे तक आप नींद लो और आपकी थकान जितनी दूर होगी, आपको जितनी फ्रेशनेस (Freshness) मिलेगी, उतनी फ्रेशनेस ३० मिनट के ध्यान से मिल जाती है। ध्यान यदि हस्तगत हो गया, ध्यान में आप पारंगत हो गए, कुशल हो गए, तो नींद की कोई आवश्यकता नहीं।

उत्तराध्ययन सूत्र में लिखा है कि रात को मुनि और साध्वी क्या करते हैं? तो लिखा है— ‘पहले प्रहर में स्वाध्याय।’ प्रहर अर्थात् तीन घंटे। पहले प्रहर में स्वाध्याय, दूसरे प्रहर में ध्यान। तीसरे प्रहर में क्या करने का? तो वहाँ लिखा है— तइयाए निद्दमोक्खं तु तीसरी पहर में निद्रा लेना, ऐसा नहीं कहा! लेकिन ‘निद्रा का मोक्ष हो जाएगा।’ ध्यान में आप रहे एक प्रहर तक, अब निद्रा की आवश्यकता नहीं। ध्यान इतनी फ्रेशनेस दे सकता है। तो प्रहर का अर्थ है तीन घंटे।

एक बात बीच में याद आई। मैं छोटा था, सात साल का। मेरा गाँव बहुत ही धार्मिक। तो सात साल के बच्चे पर्युषण में ६४ प्रहरी पौषध करते थे। तो मैं सात साल का हुआ, तो पापाजी ने कहा कि, “तुम्हें भी ६४ प्रहरी पौषध करने का है।” मैंने कहा, “ज़रूर करेंगे।” बहुत बच्चे थे। अब नीचे तो प्रवचन चलता, सात साल के बच्चों को प्रवचन में क्या ख्याल आए? हम तो ऊपर जाकर मस्ती करते। पहला ही दिन, एक बच्चे ने पूछा कि, “ये ‘६४ प्रहरी पौषध’ कहते हैं, इसका अर्थ क्या?” एक बच्चा बड़ा विद्वान् था हममें। उसने कहा, “देखो! हम सब बच्चे हैं। हम उपवास तो नहीं कर सकते है। संवत्सरी के दिन भी हम एकाशना ही करेंगे। तो ६४ प्रहरी पौषध का अर्थ ऐसा है कि आठ दिन में एकाशने में ६४ पूरी खानी चाहिए!”

सबको बात जँच गई! आज तो ठीक है, पूड़ी-पूड़ी-पूड़ी करते हैं। “६४ पूरी, तो आठ दिन में ६४ पूरी खानी पड़ेगी।” अब पहला ही दिन, भूख लग गई थी। साढपोरिसी का पच्चक्खाण पार लिया और सब बच्चे खाने के लिए गए। संघ के द्वारा व्यवस्था थी। सब वहाँ बैठ गए। मैंने कहा, “पूरी आने दो पहले, पूरी और चाय।” मैं पूरी और चाय खाता था। पिताजी आए देखने के लिए कि ‘क्या खाता है?’ मेरी थाली में देखा पूरी और चाय। तो उन्होंने पूछा कि, “क्यों, पूरी और चाय पहले क्यों? पहले सीरा खाओ, लड्डू खाओ, रोटी-दाल खाओ, बाद में जगह थोड़ी होगी तो भी पूरी तो चल जाएगी।” मैंने कहा, “ये बात तो ठीक है, लेकिन कोटा तो पूरा करना पड़ेगा ना!” वे चौंक गए— “कोटा किसका?” मैंने कहा, “क्यों? ६४ पूरी पौषध है, तो ६४ पूरीया तो खानी पड़ेगी ना!” तब उन्होंने समझाया कि ६४ प्रहरी पौषध है। एक प्रहर के तीन घंटे होते हैं, तो एक दिन के आठ प्रहर हुए, ऐसे आठ दिन के ६४ प्रहर हुए।

नागार्जुन रैन बसेरे में सो गए। सुबह उठे, उजाला हुआ, देखा… एक काष्ठ का पात्र था, एक काष्ठ का कमंडल था पानी पीने के लिए, दोनों चंपत, गुम! कोई ले गया रात को। लेकिन नागार्जुन वर्तमान योग का आदमी। उन्होंने सोचा कि, ‘१२:०० – १२:३० बजे मुझे भिक्षा के लिए जाना है। तो १२:३० बजे जाना है, अभी ६:०० बजे हैं। तो १२:३० बजे की चिंता ६ बजे होती है? आप करेंगे।’ इसलिए तो आप पीड़ित हो! चलो व्यवहार के स्तर पर चिंता करनी भी पड़े, कर लो। भीतर से समझना कि ‘जो घटना जिस समय पर घटित होने वाली है, उस समय ही घटित होगी। क्या चिंता करनी?’ ६ बजे स्वाध्याय में लग गए नागार्जुन।

१२ बजे, १२:३० बजे भिक्षा के लिए चले। हाथ में कुछ नहीं। ना काष्ठ का पात्र, ना काष्ठ का कमंडल। निकले। ऐसा हुआ कि इस गाँव में एक बड़े श्रीमंत बौद्ध उपासक थे। बड़े-बड़े संघ के जो मिलन होते थे, उसमें वे जाते थे। तो नागार्जुन से तो वे बहुत परिचित थे। अपने महल के द्वार पर खड़े थे और देखा— “भिक्षु आ रहे हैं!” नज़दीक आए, आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा! “अरे नागार्जुन! स्वयं! और अकेले? जो सैकड़ों शिष्यों के साथ रहते हैं, वे नागार्जुन अकेले!” पैरों में पड़ गए उपासक— “भगवन्! पधारो मेरे घर पे।”

चलो घर पे आए। मंगल पाठ सुनाया। फिर उपासक ने विनंति की, “गुरुदेव! आप मेरे घर से भिक्षा लो, तो मैं पावन हो जाऊँगा।” ‘चलो, ले लें भिक्षा।’ लेकिन कुछ है तो नहीं! उपासक ने देखा… अपने घर में भी काष्ठ का कोई पात्र नहीं था। एक सोने का डिब्बा था, रत्न जड़े हुए थे ऊपर। कहा, “भगवन्! ये चलेगा पात्र?” नागार्जुन ने कहा, “चलेगा।” उसमें रोटी-साग ले लिया। काष्ठ का कमंडल मिल गया, उसमें पानी ले लिया और चले नागार्जुन। श्रेष्ठी ने कहा, “गुरुदेव! आप कहाँ पर विराजमान हो? वहाँ रैन बसेरे में? अरे गुरुदेव! मेरा ये महल इतना बड़ा है, आप यहीं ठहरो।” नागार्जुन ने कहा, “नहीं, भिक्षा लेकर मुझे तो विहार करना है। मुझे आगे जाना है, मैं साधना के लिए निकला हूँ।” नागार्जुन गए।

एक चोर दिन को रेकी (Recci) करने के लिए आया था कि ‘कहाँ-कहाँ रात को हाथ जमाना है।’ उसने भिक्षु को देखा। “अरे! सोने का डिब्बा! रत्न जड़े हुए हैं! लाखों रुपए का माल बाबा को क्या काम का? मेरे काम का ही है। अब तो कहीं पर रेकी करने की आवश्यकता नहीं, इस डिब्बे को ही उठाना है।” भिक्षु आगे, चोर पीछे। नागार्जुन रैन बसेरे में आ गए। रोटी-साग खा लिया। पात्र को साफ़ कर लिया।

नागार्जुन बड़े विद्वान् थे। पीछे आते हुए चोर को उन्होंने देख लिया था। और यह भी देखा था कि रैन बसेरे के पीछे ही यह बैठा हुआ है, इस आस में कि ‘कब मुझे यह मिल जाए।’ नागार्जुन ने सोचा, “कल की बात कल! मैं तो भिक्षु हूँ। मुझे क्या करना है इस डिब्बे को?” तो खड़े हुए और प्रेम से उस चोर को कहा— “ले भाई! ये डिब्बा तेरे काम का है, मेरे काम का नहीं।”

चोर तो आश्चर्यचकित हो गया! “अरे बाबा ने स्वयं मुझे दे दिया!” फिर तो भारत का चोर था, चोर भी भारत का! तो रैन बसेरे के भीतर आया, वंदन किया और कहा, “गुरुदेव, मैं चोर हूँ। आपने डिब्बा दे दिया मुझे, आपका बहुत मैं ऋणी हूँ। अब गुरु के पास मैं आया हूँ, तो अपनी संस्कृति का नियम है कि कुछ ना कुछ नियम तो लेना ही चाहिए। अब मैं चोर हूँ, तो चोरी न करने का नियम नहीं देना! बाकी जो भी आपको ठीक लगे, वो नियम दे दो।” तब नागार्जुन ने कहा— “जो भी करो, होश से करना। जो भी करो, होश से करना।” उसने कहा, “इसमें कोई दिक्कत नहीं है।” नियम ले लिया।

अपने घर पर गया। बाद में इस डिब्बे को बेच भी दिया। लाखों रुपिये उस ज़माने में आ गए डिब्बे के। अब चोरी करने की कोई आवश्यकता ना रही। लेकिन आदत थी ना! तो एक दिन चोरी करने के लिए गया। गाँव में घुस गया। कोई श्रेष्ठी के महल के पास पहुँच गया। तब नियम याद आया— ‘जो भी करो, होश से करो।’ तो चोर ने सोचा कि “चोरी करने की ज़रूरत क्या है?” होश आ गया। “लाखों रुपिये मिल गए हैं। और श्रेणिक राजा का राज्य था उस समय। चोर जो भी पकड़ा जाए, सीधे फाँसी के मंच पर! कोई केस-बेस चलाने का नहीं। तुम रंगे हाथ पकड़े गए, फाँसी के मंच पर पहुँच गए!” होश आ गया कि “ऐसी चोरी जान के लिए भी ख़तरा रूप है। और मुझे कोई आवश्यकता नहीं है, तो मैं चोरी क्यों करूँ?” चोरी छूट गई।

तो नागार्जुन के पास वर्तमान योग था। ‘पात्र गया, तो गया। कमंडल गया, तो गया। मिलेगा? नहीं मिलेगा तो भी क्या?’ भविष्य की कोई चिंता ही नहीं, भूतकाल की कोई चिंता ही नहीं। ऐसा ‘वर्तमान योग’ प्रभु ने हमें दिया है। इसलिए प्रभु कैसे हैं? ‘जग जीवन!’ हमारे लिए प्रभु जीवन-दाता हैं, आनंद-दाता हैं।

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