Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 31-07-2026 | Pune Chaturmas

50 Views
6 Min Read

पुणे चातुर्मास – मासक्षमण का प्रारंभ


परमात्मा के सन्मुख आप प्रदक्षिणा दे रहे थे। मुझे लगा कि साक्षात् श्रद्धा प्रदक्षिणा दे रही है। आपका पूरा अस्तित्व श्रद्धामय हो गया।

एक घटना मुझे याद आती है। पूज्यपाद प्रेमसूरि दादा के शिष्य पूज्यपाद यशोदेवसूरी दादा, महाराष्ट्र में जिनका बहुत ही उपकार है। इन गुरुदेव के एक शिष्य थे— त्रिलोचन विजयजी। रोज़ सुबह गुरुदेव के पास आते, द्वादशावर्त वंदन करते और कहते, “इच्छाकारि भगवन्! पसाय करी पच्चक्खाण का आदेश देना।” पच्चक्खाण कौन सा देना, वो सद्गुरु निश्चित करते थे। रोज़ गुरुदेव त्रिलोचन विजय महाराज को एकाशने  का पच्चक्खाण देते थे।

एक दिन ऐसा हुआ, जैसे ही त्रिलोचन विजय महाराज ने कहा— “पच्चक्खाण का आदेश देना जी”, तब गुरुदेव ने सीधा १६ उपवास का पच्चक्खाण दे दिया! हमारे यहाँ एक साथ १६ से ज़्यादा उपवास का पच्चक्खाण नहीं दिया जाता। तो गुरुदेव ने १६ उपवास का पच्चक्खाण दे दिया। त्रिलोचनविजयजी महाराज नाचने लगे— “वाह! लॉटरी लग गई! आया था एकाशने का पच्चक्खाण लेने के लिए, और गुरुदेव ने इतनी बड़ी कृपा की कि १६ भत्ते का पच्चक्खाण दे दिया!” मन में तनिक भी शंका नहीं थी कि ‘कैसे १६ उपवास होंगे? ये तो गुरुदेव कराएंगे। मुझे कहाँ करना है?’ मासक्षमण आपको करना है या चिंतामणि दादा को करवाना है? बोलो!

दादा क्या कराएंगे! हम क्या कर सकते हैं? एक दिन का उपवास भी हमारे लिए टफ (Tough) होता है। लेकिन प्रभु की कृपा उतर जाती है, और प्रभु की कृपा को हम स्वीकार कर लेते हैं। मासक्षमण क्या, १८० उपवास हंसकीर्ति सूरि महाराज करते हैं, सिर्फ प्रभु की कृपा से! १६ उपवास शुरू हुए। उपवास का १६वाँ दिन, प्रतिक्रमण के बाद एक श्रावकजी महाराज साहब के पैर दबा रहे हैं। और श्रावकजी ने पूछा कि, “गुरुदेव! कल तो आपका पारणा है ना? सोलभत्ते (१६ उपवास) का पच्चक्खाण है आपका, १६ उपवास हो गए तो कल तो आपका पारणा है ना?”

तब महाराज साहब ने कहा, “पारणा है या आगे बढ़ने का है, मुझे कोई ख्याल नहीं है। कल सुबह जाऊँगा गुरुदेव के पास, गुरुदेव एकाशने का पच्चक्खाण दे देंगे तो भी स्वीकार्य है, आगे उपवास के पच्चक्खाण दे दे तो भी स्वीकार्य है। गुरुदेव की जो भी आज्ञा।” और गए सुबह, वंदन किया, आदेश माँगा पच्चक्खाण का। गुरुदेव ने १४ उपवास के पच्चक्खाण उस समय दे दिया। मासक्षमण हो गया!

प्रभु की कृपा, सद्गुरु की कृपा! एक वर्तुल (Circle) है श्रद्धा और कृपा का। प्रभु की कृपा सतत बरसती रहती है। मैं तो कहूँगा प्रभु का प्रेम सतत बरस रहा है। लेकिन उस कृपा को, उस प्रेम को स्वीकार करने के लिए पात्र कौन सा है? बारिश बरस रही है। बारिश के पानी को संग्रहित करना है तो तुम्हें टोप रखना पड़ेगा, कोई बड़ा बर्तन रखना पड़ेगा, तो एक पात्र में वर्षा का पानी संग्रहित होगा। ऐसे ही प्रभु की कृपा बरस रही है। प्रभु का प्रेम सतत बरस रहा है। उसको स्वीकार करने के लिए पात्र कौन सा है? यह पात्र है— श्रद्धा, जो आपके पास है।

नन्हे-नन्हे स्कूल में पढ़ते बच्चे और बच्चियां वासक्षेप लेने के लिए आए। उन्हें स्कूल में जाने का था। लेकिन ऐसे बच्चों को देखकर हमारी आँखें नम हो गईं! इतने छोटे बच्चे और इतनी श्रद्धा— “प्रभु करवाएंगे मासक्षमण, मुझे कहाँ करना है!” तो ये जो श्रद्धा है, उस श्रद्धा को अखंडित रखना। शरीर है, सिर दुखने आ भी जाए। रोज़ सुबह चाय पीते थे, आज चाय नहीं मिलेगी तो चाय की याद भी आ जाएगी। सिर दर्द भी हो सकता है। लेकिन सब पीड़ा की दवाई— प्रभु पर की श्रद्धा है।

मैं बार-बार कहता हूँ, दीक्षा मैंने स्वीकारी, ७० वर्ष हो गए। ७० इयर्स (70 Years)! ७० इयर्स में एक भी दिन ऐसा नहीं आया जब मैं पीड़ित हुआ। प्रभु ने मुझे एयर-कंडीशंड (Air-Conditioned) हाथों में रखा है। लेकिन प्रभु को ऐसा नहीं कि ‘यशोविजय’ को ही रखना है। सब मासक्षमण वालों को चिंतामणि दादा और गोड़ीजी पार्श्वनाथ दादा अपने एयर-कंडीशंड हाथों में रखे। तो आपको चिंता करनी ही नहीं है।

पच्चक्खाण लेते ही जाने का है बस! शायद आज एक उपवास का पच्चक्खाण लिया है, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन रात को सिर दर्द हो जाए, तो पारणे का विचार नहीं करना। क्योंकि प्रभु करवाना चाहते हैं, तो हमें करना है। प्रभु की इच्छा क्या है? प्रभु की इच्छा मासक्षमण कराने की है। तो हमें मासक्षमण करना ही है।

तो अभी सबको वासक्षेप देना है, शक्तिपात के रूप में। ऐसा शक्तिपात करना है कि आप सभी का मासक्षमण मंगलमय रूप से परिपूर्ण हो। छोटा बच्चा भी जब मासक्षमण कर सकता है, तो आप क्यों नहीं कर सकेंगे? प्रभु आपको शक्ति दें। तो प्रभु की शक्ति अभी मुझे आपको देनी है। मेरी कोई शक्ति नहीं, प्रभु की शक्ति। मैं बहुत बार कहता हूँ कि जब मैं मानूँगा कि ‘यशोविजय के हाथ से वासक्षेप झरेगा और सामने वाले का काम हो जाएगा’, तब यशोविजय के हाथ से केवल चंदन का पाउडर (Powder) झरेगा। एनर्जी (Energy) कुछ नहीं! मेरे पास में एनर्जी तभी आती है, जब मैं प्रभु से जुड़ा हुआ हूँ। मेरे हाथ का उपयोग चिंतामणि दादा कर रहे हैं। मैं वासक्षेप नहीं दे रहा हूँ, मैं शक्तिपात नहीं कर रहा हूँ, दादा शक्तिपात कर रहे हैं।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *