अश्वसेन
पार्श्वनाथ प्रभु के मातापिता अश्वसेन महाराजा और वामादेवी। इन्द्रियों को अश्वों की उपमा दी गई है। तो इंद्रियों की सेना जिसके नियंत्रण में हो – जो इंद्रियविजेता हो – वह अश्वसेन। और वाम का अर्थ होता है प्रतिकूलन। इंद्रियों के प्रतिकूलन में जाकर जिसने मन पर विजय प्राप्त किया – जो मनोविजेता है – वह वामादेवी।
साधक की इंद्रियां उसके नियंत्रण में होनी ही चाहिए। रामायण में लक्ष्मणजी भी अपने इन्द्रिय-संयम के कारण सिर्फ सीताजी के झांझर की पहचान ही कर पाते हैं। आप भी प्रभु से माँगो कि “प्रभु! लक्ष्मणजी जैसी आँखें मुझे दो। ऐसी आँख जो प्रभु को देखे, सद्गुरु को देखे, जो ईर्या समिति के उपयोग में आवे; पर-व्यक्ति के रूप को न देखें।”
आपको वाक्-शक्ति मिली है पर आपने उसका सही उपयोग किया? आपने निंदा करके, या अपने कड़वे वचनों से कितनों को दुःखी किया होगा! आज निश्चित कर लो कि ये वचन-शक्ति, यह जिह्वेंद्रीय प्रभु की कृपा से मिली है, तो अब से प्रभु की भक्ति में ही उसका उपयोग होगा, प्रभु की आज्ञा के अनुसार ही उसका उपयोग होगा।
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराज रचित स्तवना चोविसी, प्रथम पंक्ति:
“जगजीवन जगवाल हो, मरुदेवी नो नन्दलाल रे।”
परमात्मा ऋषभदेव की माताजी का नाम था मरुदेवा माता। प्रभु का मातृत्व या पितृत्व कौन धारण कर सकते हैं? जिनमें विशेष सज्जता न हो, वे न तो प्रभु की माता हो सकती, ना प्रभु के पिता हो सकते हैं। इसलिए प्रभु के जो माता और पिता हुए, वे भी बड़े सुसज्ज व्यक्तित्व के धनी थे। पार्श्वनाथ परमात्मा के पिताश्री का नाम अश्वसेन महाराजा, माताजी का नाम वामा देवी।
अश्वसेन का क्या अर्थ होता है? बहुत ही सुंदर अर्थ ‘अश्वसेन’ शब्द का होता है। अश्व यानी कि घोड़ा। इंद्रियों को घोड़े की उपमा दी गई है। एक-एक इंद्रिय घोड़े जैसे! तुम उस पर नियंत्रण कर सको तो तुम्हारे नियंत्रण में, वरना तुम उनके नियंत्रण में। आपके नियंत्रण में इंद्रियां हैं या इंद्रियों के नियंत्रण में आप हैं? बोलो! अश्वसेन महाराजा इंद्रिय-विजेता थे। अश्व यानी कि इंद्रिय, इंद्रियों की सेना जिनके नियंत्रण में थी, वे अश्वसेन महाराज। और वामा देवी का मतलब था जिन्होंने मनोविजय प्राप्त किया। ‘वाम’ का अर्थ होता है प्रतिकूलन। इंद्रियों को प्रतिकूलन में जाकर जिन्होंने मनोविजय को प्राप्त किया है, वे वामा देवी मनोविजेता थीं।
अब अश्वसेन महाराजा इंद्रिय-विजेता हैं। वामा माता मनो-विजेता हैं। कोई भी साधक हो, ये एक संदर्भ है। कोई भी साधक हो, उसके नियंत्रण में उसकी इंद्रियां होनी चाहिए। एक साधक की आँख कैसी होती है? रामायण की एक घटना मुझे याद आती है। सीता माता का रावण द्वारा अपहरण हुआ। सीता माता ने बीच-बीच में अपने अलंकार छोड़ रखे थे। वे अलंकार प्राप्त कराए गए। अब रामचंद्र जी को ख्याल नहीं है कि ये गहने सीता माता के हैं या नहीं। तो रामचंद्र जी ने लक्ष्मण को बुलाया। और लक्ष्मण से पूछा कि, “ये जो कान के कुंडल हैं, वो तेरी सीता माता के हैं? ये गले का हार जो है, वो सीता माता का है?”
उस समय लक्ष्मण जी ने क्या कहा था? याद रखना आप सबको! लक्ष्मण जी ने कहा था:
“नाहं जानामि कुण्डले, नाहं जानामि केयूरे।”
“रामचंद्र भगवान! ये सीता माता के कुंडल हैं या नहीं हैं, मैं नहीं जानता। ये हार सीता माता का है या नहीं, मैं नहीं जानता।” बाद में लक्ष्मण जी ने कहा, “हाँ, उनके पैरों के झाँझर, नूपुर मुझे बताओ, मैं कह सकूँगा कि ये सीता माता के हैं या नहीं!”
“नूपुरे त्वभिजानामि, नित्यं पादाभिवन्दनात्।”
“रोज़ सीता माता के चरणों में मैं झुकता था, नमस्कार करता था, इसलिए सीता माता के चरण मैंने देखे हैं, सिर्फ़ सीता माता के पैर ही मैंने देखे हैं। पैरों में जो झाँझर पहने हुए रहते हैं, उसका मुझे ख्याल है। बाकी न कुंडल का ख्याल है, ना हार का! क्योंकि सीता माता का मुख मैंने देखा नहीं, सीता माता के दूसरे अंग मैंने देखे नहीं।”
लक्ष्मण जैसा जती और सीता जैसी सती! और लक्ष्मण जी कहते हैं कि पैरों के सिवा सीता माता के शरीर के एक भी अंग का परिचय मुझे नहीं है। मैं बहुत बार मेरे प्रवचन में कहता हूँ कि प्रभु के पास माँगो कि “प्रभु! लक्ष्मण जी जैसी आँखें मुझे दो। ऐसी आँख जो प्रभु को देख सके, जो सद्गुरु को देख सके, जो ईर्यासमिति के उपयोग में आवे। बाकी पर-व्यक्ति के रूप को देखने के लिए ये आँखें नहीं मिली हैं।”
आपको ये तो मालूम है, पुण्य किया था गत जन्म में, तभी आपको पाँच इंद्रियां सुरक्षित रूप में मिली हैं। किसी को आप देखते हैं, आँखों की रोशनी बराबर नहीं है, किसी की आँखों की रोशनी पूर्णतया ख़त्म हो चुकी है। आपके पास दोनों ही आँखें हैं, तो ये पुण्य का उदय है। अब पुण्य के उदय से, प्रभु की कृपा से दोनों आँखें आपको सुरक्षित रूप में मिलीं, उसका उपयोग आप कैसे करोगे? हमारी दीक्षा कैसे हुई आपको मालूम है? जब हमने गुरुदेव के पास सुना कि ‘ये जीवन प्रभु से पाया है, ये इंद्रियां प्रभु की कृपा से मिली हैं, ये मन और बुद्धि प्रभु की कृपा से मिली है’, तब हुआ कि ‘प्रभु की कृपा से जो मिला है, उसका उपयोग मैं कैसे कर सकता हूँ? और मैं करूँ तो भी मेरी इच्छा से कैसे कर सकता हूँ? प्रभु की आज्ञा के मुताबिक इन इंद्रियों, मन और बुद्धि का उपयोग मुझे करना चाहिए।’
इस एक ही बिंदु पर दीक्षा हो गई! कि जीवन प्रभु का है। शरीर प्रभु ने दिया। मात-पिता ने दिया, ये तो व्यवहार की घटना है, व्यवहार जगत की घटना है। निश्चय जगत की घटना ये है कि पुण्य के प्रभाव से, प्रभु की कृपा से यह मानव देह हमें मिली है। तो यह देह प्रभु की कृपा से मिली, ये इंद्रियां प्रभु की कृपा से मिलीं। आज तो आपको ख्याल आ गया, आ गया ना? इंद्रियां कैसे मिलीं? बोलो तो?
(श्रोता: प्रभु की कृपा से।)
प्रभु की कृपा से! अब एक-एक इंद्रिय का उपयोग कैसे करोगे आप? प्रभु की आज्ञा के मुताबिक।
अब एक प्रैक्टिकल (Practical) बात आपसे कहूँ। मैं ऐसा कहूँ कि आप मोबाइल (Mobile) को छोड़ ही दो, तो आप मेरी बात सुनेंगे नहीं। लोग कहेंगे, “साहब! मोबाइल पर तो पूरा व्यवसाय टिका हुआ है।” व्यवसाय के लिए, संबंधों की सुरक्षा के लिए आप मोबाइल का यूज़ (Use) कर सकते हैं। लेकिन ऐसी कोई ऐप्स (Apps), ऐसी कोई पोर्नोग्राफ़ी फ़िल्म (Pornography film) आपको नहीं देखनी है जिससे आपके संस्कार ख़त्म हों। क्या इतना आप कर सकते हैं? इसलिए मैंने प्रैक्टिकल बात की। मोबाइल छोड़ देना वो इम्प्रेक्टिकल (Impractical) बात हो जाती आपके लिए। लेकिन मोबाइल का उपयोग कैसे करना ये आपके हाथ में है कि नहीं? “ऐसी फिल्में नहीं देखनी, ऐसी ऐप्स नहीं देखनी जिससे अपने संस्कार ख़त्म हों।” आज तो हम कितनी ही ज़ोर से बातें करें, लेकिन आपने सबने जेब में ही ऐसा यंत्र रखा है जो संस्कारों को ख़त्म करे! तो आँख का उपयोग क्या करना, वो आप निश्चित करो। मुँह का उपयोग क्या करना? ये वाच्-शक्ति प्रभु की कृपा से मिली है, क्या आप आज निश्चित कर सकते हैं कि किसी की निंदा मैं कभी भी नहीं करूँगा?
श्रीपाल रास की एक घटना आती है। लग्न के दूसरे दिन मयणा सुंदरी श्रीपाल कुमार को लेकर मंदिर जा रही है। तब अनाड़ी लोग बोलते हैं कि, “देखो! ये धर्म-धर्म-धर्म करती रही राजा की लड़की, और उसके धर्म ने क्या किया? ये रक्तपित्तिया के साथ लग्न करा दिया!” मयणा सुंदरी के कान में ये शब्द जाते हैं। इतनी पीड़ा होती है! मयणा सुंदरी प्रभु के पास जाती है, भक्ति करती है। फिर गुरुदेव के पास जाती है। अपने गुरुदेव, एक आचार्य भगवंत… कैसी मीठी उनकी भाषा होती है!
श्रीपाल का शरीर उस समय कैसा था आपको मालूम है? रक्तपित्त से घिरा हुआ, कोढ़ के रोग से घिरा हुआ। लेकिन गुरुदेव ज्ञानी थे। श्रीपाल के मुख को देखकर वे भाँप जाते हैं कि ये भविष्य में महान व्यक्ति बनने वाला है। तो गुरुदेव ने मयणा सुंदरी को पूछा… क्योंकि मयणा सुंदरी गुरुदेव के पास बहुत बार आती थी और जैन शास्त्रों के विषय में प्रश्न पूछती थी। तो गुरुदेव ने मयणा सुंदरी को पूछा कि, “ये पुरुष-रत्न कौन है?” क्या शब्द! ‘ये कौन है?’ ऐसा नहीं। ‘कुण ये पुरुष रतन’ रास के शब्द। “ये पुरुष-रत्न कौन है?”
मयणा ने कहा, “साहिबजी! गत रात्रि को ही इनके साथ मेरा लग्न-जीवन शुरू हुआ है।” उस समय मयणा रो पड़ती है। मयणा कहती है कि, “गुरुदेव! आज मैं आ रही थी, लोग धर्म की निंदा करते थे। लोग ऐसा कहें ना कि मयणा सुंदरी निकम्मी है, मयणा सुंदरी गलत है, तो मयणा को कोई दिक्कत नहीं। लेकिन मयणा के धर्म के सामने लोग अंगुली रखते हैं, मयणा से यह सहन नहीं होता।”
और गुरुदेव ने जो सिद्धचक्र यंत्र बताया और जिसके प्रभाव से श्रीपाल का रोग गया, गुरुदेव ने क्यों बताया? एक व्यक्ति को रोग से मुक्त बनाने के लिए नहीं, जिनशासन की प्रभावना के लिए! तो मयणा सुंदरी कहती है कि, “मैं सब कुछ सुन सकती हूँ। लेकिन मेरे धर्म के बारे में, मेरे संतों के बारे में, मेरे प्रभु के बारे कोई भी ऐसी-वैसी बात करेगा, तो मैं नहीं सहन कर पाऊँगी।” आपके लिए भी ऐसा ही है ना? तो न तो निंदा करनी है, न निंदा सुननी है।
एक बड़ी सुंदर कहानी अपनी परंपरा में है। एक साधक था, गुरुदेव की निश्रा में रहता था। लेकिन निश्रा दो प्रकार की होती है— द्रव्य निश्रा और भाव निश्रा! एक साधक मेरे पास रहेगा लेकिन प्रभु के रंग में वो रंगा नहीं है और अपने ही रंग में रंगा हुआ है, तो द्रव्य निश्रा में है, भाव निश्रा में नहीं। ये तो मीरा थी, जिसने कहा था:
“लाल ना रंगाऊँ, हरी ना रंगाऊँ, तेरे ही रंग में रंग दे चुनरिया!”
“प्रभु! दूसरा कोई रंग मुझे नहीं चाहिए, तेरे ही रंग में रंग दे चुनरिया! मेरे अस्तित्व को तेरे रंग में रंग दे तू! लाल न चाहूँ, हरी न चाहूँ, तेरे ही रंग में रंग दे चुनरिया।” और बाद में कहा मीरा ने:
“ऐसा ही रंग दो, ऐसा ही रंग दो, कि रंग नाही छूटे। धोबिया धोए चाहे सारी उमरिया!”
“प्रभु! ऐसा रंग लगा दो मेरे अस्तित्व पर कि वो रंग कभी जाए नहीं।” प्रभु का रंग अस्तित्व की चद्दर पर लग जाएगा, फिर किसी भी जन्म में हम जाएँगे, जहाँ भी जाएँगे, वहाँ प्रभु का ही रंग खिलेगा! संसार का रंग कहीं भी नहीं खिलेगा। आठ साल का बच्चा और दीक्षा ले लेता है, तो क्या हुआ? गत जन्म में ऐसा रंग लगा था कि जन्म बदल गया, लेकिन रंग सहज भी फीका नहीं हुआ! रंग ऐसा ही ऐसा है। आपको रंग लगाना है? प्रभु का रंग? इसलिए हम बैठे हैं, हम रंगरेज़ हैं, हम रंगरेज़ हैं! किसी की भी इच्छा हो कि “गुरुदेव! मेरे अस्तित्व पर प्रभु का रंग लगा दो”, हम तैयार हैं। और आपसे पूछूँ, कौन से रंग में अस्तित्व रंगा जाए तो आनंद आता है? हमें देखो, प्रभु के रंग में हमारा अस्तित्व रंगा हुआ है, तो हम आनंद में ही हैं। यहाँ पुणे में भी आनंद में हैं। कोई गाँव में जाएँगे, छोटा उपाश्रय है, असुविधापूर्ण है, लेकिन हम उपाश्रय से आनंद को लेने वाले नहीं हैं। हम प्रभु से आनंद को लेने वाले हैं! हमारा आनंद प्रभु पर निर्भर है।
तो हम Ever fresh, Ever green! आपकी ये तो इच्छा है ना कि Ever fresh हो जाओ? सुबह ऐसे बैठे हो, क्या हुआ? आपकी इच्छा है Ever fresh होने की? थोड़ी-थोड़ी है? बोलो! थोड़ी-थोड़ी है ना कि ज़्यादा है? हम तैयार हैं। हमारा तो काम ही एक है, प्रभु का रंग लगा दें! पेंट (Paint) है, ब्रश (Brush) भी बाज़ू में है, बस यूँ ही कर देना है, आ गया! रंग आ गया! तो मीरा कहती है, “ऐसा ही रंग दो कि रंग ना ही छूटे, धोबिया धोए चाहे सारी उमरिया!” फिर धोबी उटक-पटक कर मर जाए लेकिन रंग नहीं गिरेगा! रंग ज्यों का त्यों रहता है। हमारी सबकी कोशिश ये है कि ये जो रंग गुरुदेव ने हम पर लगाया है, हम मोक्ष में ना जाएँ तब तक ये रंग टिका रहे! कोई भी जन्म में जाएँ कोई दिक्कत नहीं, लेकिन प्रभु साथ में होने चाहिए, प्रभु का रंग ही अस्तित्व पर लगा होना चाहिए।
तो द्रव्य निश्रा और भाव निश्रा! आप भी ऐसे तो Outdoor patient हो, ये हमारे Indoor patient हैं। आप तो Outdoor patient और वो भी आधे घंटे के लिए! अभी भी घंटा पूरा नहीं हुआ। मंगलाचरण और सर्व मंगल दोनों जो सुन ले, उसने एक घंटे का दान कर दिया है। पीछे वाले आधे-आधे वाले! चाय आधा कप चाहिए या पूरा कप चाहिए? दूसरी बात, चाय पीते हो, टेस्टी चाय है। चाय पीने में, एक कप चाय पीने में कितना समय लगेगा? धीरे-धीरे सिप (Sip) करोगे तो भी कितना समय लगेगा? दो मिनट, तीन मिनट, चार मिनट। फिर उसका नशा, कैफ, मज़ा, आधा घंटा तक रहेगा? रहेगा! और प्रवचन का नशा कितना? कल सुबह तक रहेगा! आज का नशा कल सुबह तक तो रहेगा? नक्की? तो आप आधे घंटे के लिए आओ और एक घंटे के लिए आओ, वेलकम (Welcome)! लेकिन एक सूत्र आपके लिए है — There should be the totality! There should be the totality! आधा घंटा दो, कोई तकलीफ़ नहीं, लेकिन वो ३० मिनट पूरे-पूरे आप डूब जाएँ प्रभु में! ये प्रभु के शब्द… एक शब्द भी काफ़ी है!
कभी-कभार तो एक शब्द भी जीवन को परिवर्तित कर देता है। अब ३० मिनट में, ४५ मिनट में सैकड़ों शब्द, हज़ारों शब्दो सुने। उनमें से एक शब्द भी ठिकाने पर लग गया, काम हो गया! एक शब्द!
एक गाँव में एक ऑफिसर (Officer) था, राजेंद्र प्रसाद उसका नाम था। लेकिन अफ़सर थे, तो लोग ‘राजा बाबू, राजा बाबू’ कहकर उनको बुलाते। निवृत्त हो गए, तो फिर सोचा कि चलो ना गाँव में ही जाऊँ। बड़ा अच्छा घर है, शांति से रहूँ। सर्विस (Service) के लिए शहरों में तो बहुत रहना पड़ा, शहरों से थक गए, गाँव में आए। और ६० की उम्र थी, रोज़ घूमने के लिए जाते। डायबिटीज़ (Diabetes) था, हाइपरटेंशन (Hypertension) था। रोज़ घूमने के लिए जाते। घूमने के लिए जंगल की ओर जाते। जंगल जहाँ शुरू होता था, वहाँ एक झोपड़ी थी। झोपड़ी में एक माँ रहती थी और उसका एक बेटा। बेटे का नाम भी राजू था।
एक दिन ऐसा हुआ, अफ़सर झोपड़ी के पास से निकल रहा है और माँ अपने बच्चे को जगा रही है— “राजा बाबू जागो! राजा बाबू जागो!” अपने बच्चे को ‘बाबू’ कह कर बुलाती थी प्यार में! “राजा बाबू जागो! राजा बाबू जागो!” कहती है अपने बच्चे को, और वो सुन रहा है ऑफिसर! ऑफिसर का नाम भी यही था राजा बाबू! “राजा बाबू जागो! राजा बाबू जागो!” वो जग गया! “यार, अकेला हूँ, पत्नी एक्सपायर्ड (Expired) हुई है, संतान है नहीं, अब घर में रहूँ या संन्यास आश्रम में रहूँ, क्या फ़र्क पड़ता है! तो कोई सद्गुरु हों, तो उनकी शरण में मैं पहुँच जाऊँ।” और राजा बाबू जग गए और गुरु के पास पहुँच गए! एक ही वाक्य! तो आपके लिए भी सूत्र यही है— There should be the totality! समग्रता! तो वो जो साधक था, वो गुरु के पास रहता था, लेकिन गुरु के रंग से रंगा हुआ नहीं था। बस मेरी इच्छा यही है कि प्रभु के रंग से सबको रंग दूँ। मेरी इतनी ही इच्छा है। फिर प्रभु का ही रंग तुम्हारे अस्तित्व पर रहो।
तो वह साधक गुरुदेव के पास रहता है, गुरुदेव के पास से शिक्षा लेता है, अभ्यास करता है, लेकिन अपना खुद का ही रंग अपने खुद पर है। गुरु का रंग नहीं चढ़ा, प्रभु का रंग भी नहीं चढ़ा। एक दिन वो साधक गुरु के पास आया। सद्गुरु तो फेस रीडिंग (Face reading) के मास्टर (Master) होते हैं। सद्गुरु ने देखा कि ये कुछ कहने के लिए आया है। साधक ने वंदन किया। अब गुरु को ख्याल भी आ गया कि क्या कहने के लिए आया है। हुआ ऐसा था, एक दूसरा भी मुनि-वृंद था, और उसमें एक मुनि द्वारा कोई गलत काम हो गया था। गुरुदेव को तो समाचार मिल ही गए थे। लेकिन इस साधक को समाचार मिले तो वो आकुल-व्याकुल हो गया, ‘गुरुदेव से बात करूँ! गुरुदेव से यह बात करूँ!’ और अभी तक कोई अच्छी बात करने के लिए साधक गुरुदेव के पास नहीं आया था, आज एक गलत समाचार देने के लिए उत्साह से आया है!
“तुम तो हमारे पास कौन सा समाचार देने आए? अच्छे-अच्छे समाचार, जिनशासन के!” अब गुरु भाँप गए कि ये यह बात कहने के लिए आया है। तब गुरु ने कहा, “तू बोलना मत! तू ये बात कहने के लिए आया है, बराबर?”
साधक ने कहा, “हाँ जी।”
अब गुरु कहते हैं, “पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर तू दे, बाद में तेरी बात सुनूँगा। पहला प्रश्न यह है कि जो बात तू कहने के लिए मेरे पास आया है, ये बात तूने तेरी आँखों से देखी है या कानों से सुनी है?”
अब साधक ने कहा कि, “गुरुदेव! आँखों से देखी तो नहीं है, कानों से सुनी है।”
तब गुरुदेव ने कहा, “कानों से सुना हुआ सब सच होता है?” आप भी बोलो! आपको किसी ने कहा, उसको किसी और ने कहा था, उसको किसी और ने कहा था। तो ये सुनी-सुनाई बात सच ही हो, ऐसा कोई कह सकता है? तो गुरुदेव ने पूछा, “तूने तेरी आँखों से ये बात नहीं देखी, कानों से सुनी है, अब तू दूसरों को ये बात कहने जा रहा है। तो मेरा पहला प्रश्न यह है कि कानों से सुना हुआ सब सच होता है?”
तो शिष्य ने कहा, “गुरुदेव! आपकी बात तो विचारणीय है। कानों से सुना वो सब सच नहीं होता।”
फिर गुरुदेव ने दूसरा प्रश्न पूछा, “तू जो बात कहने जा रहा है किसी की निंदा की बात, तो तू जो बात कहने के लिए जा रहा है, तू किसी को कहेगा! या तो मुझे कहने आया है, बाहर जाकर दूसरे को कहेगा। तो तू कहेगा तो सुनने वाले को क्या लाभ होगा, ये बता? ‘फला आदमी ऐसा है, गलत है’, ऐसा सुनने से सुनने वाले को क्या लाभ मिलता है? लाभ तो नहीं, लेकिन गैरलाभ कितना होता है! आपको मालूम है? एक बड़े साधक हैं, और आपने सुना कि ‘वे साधक कभी-कभार बहुत गुस्सा हो जाते हैं’, तो आप सुनकर क्या करेंगे? क्या सोचेंगे? ‘अरे! इतने बड़े साधक, पूरे भारत में जिसकी नामना है, वे भी गुस्सा होते हैं, तो अपन गुस्सा हों उसमें क्या बड़ी बात है!’ बोलो, सुनकर आपने क्या किया? सुनकर आपने किया क्या? ‘ऐसे साधक भी गुस्सा करते हैं, तो मैं गुस्सा करूँ, इसमें क्या बड़ी बात है!’ तो आपने सुनकर क्या किया? बोलो! क्या लाभ प्राप्त किया? लाभ तो प्राप्त नहीं किया, लेकिन गैरलाभ प्राप्त किया!”
अब गुरु ने तीसरा प्रश्न पूछा कि, “तू दूसरों को उस व्यक्ति की निंदा की बात करेगा, तो उस कहने में तुझे क्या लाभ होगा? वो बता! तुझे क्या लाभ होगा? तू निंदा करेगा तो निंदा करने वाले को कितना पुण्य मिलेगा, वो भी मुझे बता! निंदा करने वाले का कर्म कितना क्षीण होता है, वो भी मुझे बता!”
तब तो उसने कान पकड़े कि, “गुरुदेव! निंदा की बात मैं कहूँगा तो मुझे कर्म-बंध ही होगा, पाप का बंध होगा, पुण्य का बंध कैसे होगा?”
तब गुरु कहते हैं, “एक तो बात सच है या झूठ है, उसका तुझे पता नहीं, एक। दूसरा, सुनने वाले को गैरलाभ होगा। और तीसरा, तुझे कहने में भी गैरलाभ होगा। तो ऐसी बात तू कहने के लिए क्यों जाए?”
बस, उस साधक का पुण्य था कि ऐसे सद्गुरु मिल गए! उसकी आँखों से आँसू बरस रहे थे। “गुरुदेव! आपने बहुत कृपा की! मैं तो कितने पाप कर्म में लग जाता, मुझे कितना पाप कर्म का बंध हो जाता! आपने मुझे मुक्ति दिलाई, गुरुदेव आपका कितना उपकार है!” सिसक-सिसक कर रोने लगा कि, “गुरुदेव! ऐसी तो निंदा कितनों की मैंने की है! अब गुरुदेव मुझे प्रायश्चित्त दो। एक तो आप नियम दो कि अभी से मैं किसी की निंदा ना करूँ। और आज तक मैंने जो निंदा की है, उसका मैं प्रायश्चित्त करूँ।”
तो वाक्-शक्ति अपन को मिली है। लेकिन वचन की शक्ति से हमने क्या किया? अभी तक आपके वचन से कितने लोग सुखी हुए और कितने लोग पीड़ित हुए? कोई हिसाब है आपके पास? लेखा-जोखा है? आपने अपने वचन से कितनों को दुखी किया होगा! तो आज निश्चित कर लो कि ये वचन-शक्ति, ये जिव्हेन्द्रिय, ये मुख, ये इंद्रिय… ये प्रभु की कृपा से मिली है, तो प्रभु की भक्ति में ही उसका उपयोग होगा! भक्ति-गीत गाओ, स्तवन गाओ, प्रभु की भक्ति में पागल हो जाओ। दो बातें! वाक्-शक्ति का उपयोग हमें करना नहीं आता तो हम कर्म-बंध करेंगे। और इसी वचन-शक्ति का उपयोग हमें करने को आता है तो हम अनेक लोगों को भक्ति की धारा में बहा कर ले जाएँगे। शास्त्र का एक वचन है:
“जपकोटिसमं ध्यानं, ध्यानकोटिसमो लयः।
लयकोटिसमं गानं, गानात् परतरं नहि॥”
करोड़ों जप जितना मूल्य ध्यान का है, कोटि ध्यान जितना मूल्य समाधि (लय) का है, और एक करोड़ समाधि जितना मूल्य गान का है। और अंत में कहा “गानात् परतरं नहि”, गान से आगे कुछ है ही नहीं अंतर्यात्रा में! समाधि से भी वाक्-शक्ति की प्रतिष्ठा बहुत की। समाधि में एक व्यक्ति भीतर चल जाता है। यदि गाने की शक्ति किसी के पास है और वो प्रभु के गीत गाएगा, तो सैकड़ों लोगों को भक्ति-धारा में वो ले जा सकेगा।
पंडित ओंकारनाथ ठाकुर एक दफ़े संगीतकारों की सभा में मालकौंस राग को आलापते रहे। तीन घंटे तक! एक छोटा सा पद था, उसको आलाप में तीन घंटे! तीन घंटे पूरे हुए और उन्होंने घोषणा की कि, “आप सब संगीतकार हैं, संगीतकारों की सभा थी, आप सब संगीतकार हैं, रात को १२:०० बजे भी आप कोई भी राग को गा सकते हो। आज मैं आपसे एक चैलेंज (Challenge) रखता हूँ कि कोई भी संगीतकार स्टेज (Stage) पर आए और मालकौंस के सिवाय का कोई भी राग गा कर दिखाए!” दो-तीन साहसिक संगीतकार आए। उनके मन में अभिमान था कि हम तो किसी भी राग को कभी भी आलाप सकते हैं। माइक (Mike) के पास आए, जैसे ही गला खोला—मालकौंस ही मालकौंस! पूरे हृदय पर, पूरे अस्तित्व पर मालकौंस राग इतना छा गया था कि मालकौंस के बिना तुम कुछ गा ही न सकते!
तो अश्वसेन का अर्थ क्या हुआ? इंद्रिय-विजेता! आपको भी इंद्रिय-विजेता बनना है। और वामा माता का अर्थ है— मनोविजय प्राप्त करने वाली महादेवी! अब ये टफ (Tough) है। इंद्रिय-विजय अभी भी सरल है, लेकिन मनोविजय बहुत ही दुरू है। तो मन पर कैसे विजय प्राप्त करे, वो बात हम मंडे (Monday) को करेंगे। कल संडे (Sunday) है, कल ध्यान का सत्र है। ध्यान में भी यही बात आएगी कि मन को कैसे विजित करना, मन पर नियंत्रण कैसे स्थापित करना। लेकिन मंडे को मनोविजय की बात हम खुलकर कहेंगे।
