Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 22-07-2026 | Pune Chaturmas

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अंतरंग सुख

दो प्रकार के सुख हैं – बहिरंग सुख और अंतरंग सुख। इंद्रियजन्य, मनोजन्य जो सुख है, वह बहिरंग सुख है। और आत्मजन्य आनंद जो है, वह अंतरंग सुख है। जैसे प्रकाश के आते ही अँधेरा ख़त्म हो जाता है, वैसे ही अंतरंग सुख का अनुभव होते ही बहिरंग सुख छूट जाता है।

Tasty चाय से बहिरंग सुख मिलता है। पर शक्कर वाली चाय tasty कहलाएगी या नमक वाली – यह आप निश्चित नहीं करते; जिस society में आप पले-बढ़े हैं, वह निश्चित करती है! Society निश्चित करती है कि बड़ा बंगला है, तो सुखी और छोटा फ्लैट है, तो दुखी! सारे बहिरंग सुख परतंत्र हैं। अंतरंग सुख स्वतंत्र है; उसमें किसी दूसरे के अभिप्राय की आवश्यकता नहीं है।

सामायिक में जिस सुख की अनुभूति होती है, वह अंतरंग सुख है। वहाँ खाने का, पानी पीने का इत्यादि संयोगजन्य बहिरंग सुख तो है नहीं; असंगजन्य अंतरंग सुख है। यह सुख तब मिलता है जब आप सद्गुरु को समर्पित होते हैं और उनकी आज्ञानुसार सामायिक का पालन करते हैं। सगरा हो सो भर-भर पीवे; नगरा जाए प्यासा!


महामहोपाध्याय यशोविजयजी महाराजा ने परमात्मा की प्रार्थना करते हुए कहा कि, “प्रभु! मेरा तुझ पर परम प्रेम है।” परम प्रेम अर्थात परम रस। परम रस का आस्वाद! परम रस की अनुभूति जब होती है तब भीतर फीलिंग (Feeling) क्या होती है? महोपाध्याय मानविजयजी महाराज साहेब ने एक सुंदर स्टेटमेंट (Statement) दिया। किसी ने उनसे पूछा था कि, “गुरुदेव! आपने परम रस का पान किया है। परम रस की, परम रस के पान की अनुभूति कैसी होती है?”

तब उन्होंने कहा कि, “यह जो अनुभूति है, उसको मैं शब्दों में नहीं रख सकता हूँ।” अपनी भाषा में हम कहें— Beyond the words, Beyond the imagination. लेकिन उन्होंने कहा कि अनंत जन्मों में ऐसा आस्वाद कभी नहीं मिला। “परम रस का पान मैंने किया और जो अनुभूति हुई, वैसी अनुभूति अनंत जन्मों में कभी भी नहीं हुई।” कैसी अनुभूति होगी? गुजराती भाषा की स्तवना में उन्होंने अपनी ये बात रखी: “कहिए अणचाख्यो पण अनुभव रस नो टाणो मिलियो…” और बाद में कहते हैं, “प्रभुनी मेहरें ते रस चाख्यो, अंतरंग सुख माण्यो”

यह जो परम रस की अनुभूति हुई, वो प्रभु की कृपा से हुई, प्रभु के प्रेम से हुई। सद्गुरु के प्रेम से हुई। महोपाध्यायजी कहते हैं कि “इस अनुभूति में मेरा कोई योगदान नहीं। सिर्फ प्रभु की कृपा, सिर्फ सद्गुरु का प्रेम और ये अनुभूति हो गई। और इस अनुभूति द्वारा मैंने अंतरंग सुख का अनुभव किया।” दो सुख की बात कही गई है। एक है बहिरंग सुख, एक है अंतरंग सुख। इंद्रियजन्य, मनोजन्य जो सुख है वो बहिरंग सुख है, जिसको ‘अपरम सुख’ कहा जाता है। और अंतरंग सुख जो है, वो  ‘परम सुख’ है, परम रस है।

भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण ने कहा है— “रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।” अर्जुन द्वारा प्रश्न किया गया था। आपका भी शायद यही प्रश्न होगा कि अपरम रस छूटे कैसे? और परम रस मिले कैसे? आपका प्रश्न है? आपने परम रस का अनुभव नहीं किया है। लेकिन जिन्होंने परम रस का अनुभव किया है, ऐसे सद्गुरुओं के मुख पर आनंद की जो अमिट छाप है, उसको आपने देखी है।

एक बात मैं पूछूँ? हमें देखकर आपको अहोभाव तो आता है। नो डाउट (No doubt), आता है। आप अहोभाव से भरे हो। लेकिन हमको देखकर आपको ईर्ष्या आती है? ईर्ष्या कब आती है? एक वस्तु हमको पसंद आ गई, लेकिन हमें नहीं मिल रही है और दूसरों के पास ये है, तो ईर्ष्या होगी कि ‘हमें कब मिलेगी?’ तो हमारे पास जो आनंद है, उस आनंद को आपने देखा, अब आपके पास ऐसा आनंद नहीं है तो आपके मन में ईर्ष्या होगी कि ‘कब मुझे ऐसा आनंद मिलेगा?’

तो अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण का मुख देखा। श्रीकृष्ण के मुख पर परम रस की छाया है। तो अर्जुन ने पूछा कि ‘मुझे परम रस कैसे मिले?’ तब श्रीकृष्ण ने कहा— “रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।” संस्कृत तो नहीं आती है, हिंदी में अनुवाद करूँ? कुमारपाल महाराजा ६० वर्ष की उम्र में संस्कृत व्याकरण पढ़ने के लिए बैठे थे! आपको कब बैठना है? कुमारपाल महाराजा को हुआ कि प्रभु के वचन प्राकृत भाषा में हैं और उनका इंटरप्रिटेशन (Interpretation) जो आचार्य भगवंतों ने किया, वो संस्कृत भाषा में है। तो यदि मुझे परमात्मा के शब्द मूल रूप में जानने हैं, तो मुझे संस्कृत और प्राकृत भाषा जाननी ही चाहिए।

एक बात कहूँ? Translation is the translation. ट्रांसलेशन में मूल का चार्म (Charm) कभी नहीं आ सकता। मैं आगमों की बात करूँगा। लेकिन आगम ग्रंथों में जो चार्म है, वो चार्म मेरे शब्दों में नहीं उतरेगा। तो कुमारपाल महाराजा ६० वर्ष की उम्र में संस्कृत और प्राकृत व्याकरण पढ़ने के लिए बैठे। आपको कब बैठना है? संस्कृत-प्राकृत सीखना है? तो हिंदी अनुवाद कर दूँ।

श्रीकृष्ण ने क्या कहा? श्रीकृष्ण ने कहा, “दो रस हैं। एक परम रस, एक अपरम रस। जब परम रस मिल जाता है, तब अपरम रस छूट जाता है।” प्रकाश आता है तो अँधेरा खत्म हो जाता है। अंधेरे को दूर करने के लिए कोई नई टेक्निक (Technique) नहीं होती है। प्रकाश होता है तो अँधेरा दूर हो जाता है। ऐसे ही परम रस का अनुभव जब मिल जाता है, तब अपरम रस छूट जाता है। तो परम रस जब मिलेगा, तब अंतरंग सुख मिलेगा। और अपरम रस जब तक है, तब तक बहिरंग सुख आपके पास होगा।

बहिरंग सुख परतंत्र सुख है। चाय तो पिया, लेकिन आपके टेस्ट (Taste) की चाय नहीं थी, तो फिर? अब बोलो चाय कैसी होनी चाहिए? आप निश्चित नहीं करते। आप जिस सोसाइटी (Society) में पनपे हो, वो सोसाइटी निश्चित करती है कि चाय कैसी चाहिए। तिब्बत में और चाइना (China) में, चाय में साल्ट (Salt) डालकर, नमक डालकर वे लोग पीते हैं। अपने वहाँ शक्कर डालकर चाय को पीते हैं। चाय टेस्टी (Tasty) कौन सी? चाय टेस्टी कुछ नक्की (निश्चित) नहीं है और आप तो निश्चित करते ही नहीं हैं, सोसाइटी निश्चित करती है। आप सुखी हो या नहीं, वो निश्चित कौन करेगा? सोसाइटी! सोसाइटी कहेगी— “हाँ, बड़ा बंगला है तो सुखी है, छोटा फ्लैट है तो दुखी है।”

लेकिन हमारा सुख जो है, वो स्वतंत्र सुख है। हमारा आनंद स्वतंत्र आनंद है। हम निश्चित करते हैं कि हमारा आनंद कैसे हो और कैसा हो। हमें दूसरों के अभिप्राय की कभी भी आवश्यकता नहीं होती। आप तो दूसरों से पूछेंगे। एक फंक्शन (Function) हुआ। “कैसा हुआ? अच्छा हुआ ना?” लोग कहेंगे, “हाँ, अच्छा हुआ हो!” तब आप खुश-खुश हो जाएंगे। लोग कहेंगे, “क्या तुमने भोजन में घोटाला कर लिया? रसोइया तो कोई अच्छा लाना चाहिए था। ऐसा रसोइया तुम लेकर आए? किसी रसोई में कोई ठिकाना ही नहीं, मजा ही नहीं आया!” तो आपकी मज़ा किरकिरा हो गई। आपका सुख परतंत्र है। हमारा सुख स्वतंत्र है। अब आपको कौन सा सुख पसंद है? बोलो। परतंत्र या स्वतंत्र?

तो मानविजयजी महाराज साहेब ने कहा कि जब परम रस की अनुभूति हुई, तब अंतरंग सुख की अनुभूति हुई। ‘ना इंद्रियजन्य सुख चाहिए, ना मनोजन्य सुख चाहिए… आत्मजन्य जो आनंद था, असंगजन्य आनंद, उसकी अनुभूति मुझे हुई।’ आनंदघनजी की बात कल हमने कही थी। आनंदघनजी ने कहा कि—

सगरा हो सो भर-भर पीवे, नगरा जाय प्यासा।

जो सगरा है, उसे परम रस का ग्लास (Glass) पर ग्लास पीने के लिए मिलता है। आपको पीना है? दूसरा कुछ नहीं करने का, सद्गुरु के चरणों में समर्पित हो जाने का। सगरा का अर्थ क्या है? सगरा का अर्थ यही है कि तुम सद्गुरु के चरणों में समर्पित हो गए।

और एक बात मैं कहूँ? आप सद्गुरु के चरणों में समर्पित हो गए, Then you have not to do anything absolutely. फिर आपको कुछ नहीं करना है। जो भी करना है, वो सद्गुरु को करना है। फिर आप निश्चिंत हो गए। आपके लिए एप्रोप्रियेट (Appropriate) साधना क्या है, वो सद्गुरु निश्चित करेंगे। साधनाएं तो बहुत हैं, लेकिन आपके लिए कौन सी साधना एप्रोप्रियेट है, वो निश्चित गुरुदेव करेंगे। तुम्हारे मुख को देखकर तुम्हारी जन्मांतरीय धारा का सद्गुरु अनुमान लगाएंगे। किसी की जन्मांतरीय धारा वैयावच्च (सेवा) की है। किसी की प्रभु भक्ति की है। किसी की स्वाध्याय की है। तो जिसकी जो धारा है, उस धारा में सद्गुरु उसे बहाएंगे। तो आपके लिए एप्रोप्रियेट साधना कौन सी, वो सद्गुरु निश्चित कर देंगे।

इसलिए आपके लिए साधना ‘गुरुदत्त’ होनी चाहिए। समझो, कि आपको रोज़ दो घंटे या तीन घंटे साधना के लिए मिलते हैं। तो तीन घंटों में आपको क्या करना है? क्या साधना डेवलप (Develop) करनी है? वो सद्गुरु आपको शेड्यूल (Schedule) बनाकर देंगे कि— “तुम्हें एक घंटा प्रभु पूजा करनी है, एक सामायिक करनी है, उसमें स्वाध्याय करना है, एक नवकारवाली का जाप करना है…” क्या-क्या करना है, वो सद्गुरु आपको शेड्यूल बनाकर दे देंगे।

तो आपकी साधना सद्गुरु निश्चित कर देंगे। और ये साधना निश्चित हो गई, और आप उस साधना का पालन करने लगे, फिर हर छह महीने पर आपको साधना-दाता सद्गुरु के पास आना है और साधना घोंटने के बाद भीतर क्या परिवर्तन हुआ, इसकी बात सद्गुरु से करनी है। कि ‘आपका क्रोध जो था, वो शांत हुआ या कम हुआ? आपका जो अहंकार था, वो शिथिल हुआ?’ आप कहेंगे… सद्गुरु साधना में कुछ बढ़ाने का होगा तो बढ़ा देंगे। घटाना होगा तो घटा देंगे। लेकिन सद्गुरु ही साधना को निश्चित करेंगे। और जब सद्गुरु ने दी हुई साधना आप करते हैं, तो सद्गुरु की ज़िम्मेदारी होती है।

जैसे एक डॉक्टर के पास आप गए। डॉक्टर ने प्रिस्क्रिप्शन (Prescription) लिख दिया। आप दवाई लेते हो। फिर १० दिन के बाद आप डॉक्टर के पास गए और कहा, “साहब, आपने जो प्रिस्क्राइब (Prescribe) की, वो दवा मैंने ली लेकिन कोई फर्क नहीं हुआ।” तब डॉक्टर दवाई को बदल देंगे या कुछ भी करेंगे। ऐसे ही आप हमारे पास आओ कि, “गुरुदेव! छह महीने तक रोज़ एक सामायिक की, लेकिन अभी तक क्रोध कम नहीं हुआ। सामायिक करता हूँ और क्रोध कम नहीं होता है। गुरुदेव, मेरी सामायिक में कहाँ फॉल्ट (Fault) है?” सामायिक प्रभु ने दी हुई अमृत क्रिया है। वो तो श्रेष्ठ ही है। लेकिन हम जिस रूप से सामायिक करते हैं, वहाँ कुछ फॉल्ट था।

आप सामायिक पारते हैं, तब आदेश मांगते हैं— इच्छाकारेण संदिसह भगवन्! सामायिक पारूं? सद्गुरु कैसे होते हैं? बोलो। आप जब सामायिक लेते हैं, कोई भी आदेश मांगते हैं, गुरु की ग्रीन झंडी (Green signal)— ‘सामायिक संदिसहाउ?… संदिसहावेअ…’ ‘सामायिक ठाउ?… ठायेअ…’ लेकिन आपने कहा “सामायिक पारूं? गुरुदेव, अब सामायिक पूरी हो गई, अब घर पर जाना है, तो सामायिक को पारूं मैं?” अब देखो जिनशासन की मर्यादा कैसी है! गुरु ‘हाँ’ तो नहीं कह सकते। “आप सामायिक को पार लो, संसार में जाओ और सांसारिक क्रिया करो”, तो गुरु ‘हाँ’ कैसे कह सकते हैं? हाँ कहें तो अनुमोदना का पाप लगेगा। तो ‘ना’ तो कह सकते हैं? “नहीं पारना है सामयिक”। ‘ना’ भी नहीं कहते। ‘ना’ क्यों नहीं कहते? क्योंकि आप आउटडोर पेशेंट (Outdoor patient) हो, इनडोर पेशेंट (Indoor patient) नहीं। ये सब (साधु-साध्वी) इनडोर पेशेंट हैं। इनको हम जो भी आज्ञा देंगे वो पालेंगे, ठीक है। गुरु की आज्ञा आपका जीवन मंत्र। फिर कोई विचार भी नहीं करने का। विचार करेंगे? नहीं विचार करेंगे।

लेकिन आप तो आउटडोर पेशेंट हो। गुरु कहेंगे “नहीं पारने का”, आप कहेंगे “मुझे तो पारना ही है”, तब गुरु की आज्ञा के भंग का पाप आपको लगेगा। इसलिए गुरु ऐसी आज्ञा कभी नहीं देते जिसका पालन न हो। इसलिए बीच का रास्ता दिखाया। हम क्या कहते हैं? पुणो वि कायव्वं। यह फिर से करने जैसी है। न हाँ, न ना! “फिर से करने जैसी है।” और हमारी बात आपको जँच जाए, आप दूसरा आदेश मांगेंगे— “चलो एक सामायिक और कर लूँ। इच्छाकारेण संदिसह भगवन्! सामायिक मुँहपत्ति पडिलेहुँ?” वहाँ से चालू कर दिया। लेकिन आपको जाना ही पड़े ऐसा है, तो आप दूसरा आदेश मांगेंगे— “इच्छाकारेण संदिसह भगवन्! सामायिक पार्यु?” पार लिया आपने। तब भी गुरुदेव क्या कहेंगे? आयारो न मुत्तव्वो। इस क्रिया पर तुम्हारा जो आदर है, उस आदर को छोड़ना नहीं, आदर को रखना। फिर जब भी समय मिले, अनुकूलता हो, तब आ जाना सामायिक के लिए। तो ये जिनशासन की मर्यादा है।

और फिर आप सामायिक पारने का सूत्र बोलेंगे और अंत में बोलेंगे— “सामायिक के ३२ दोष: १० मन के, १० वचन के, १२ काया के… इसमें जो भी अतिचार लगा हो, जो भी दोष लगा हो उसका मिच्छामि दुक्कडं।” लेकिन मैं पूछूँगा, ये जो ३२ दोष हैं, उसका आपको ख्याल है कि कौन-कौन से दोष हैं? दोष आपको जानने चाहिए। आप दोष जानेंगे तो आपका सामायिक शुद्ध होगा।

सामायिक के वचन का एक दोष है। आप सामायिक में उपाश्रय में बैठे है और वेवाईसा (समधी) गाँव में आए। आपके घर पर गए। “कहाँ हैं हमारे वेवाईसा?” “वो तो उपाश्रय में गए हैं सामायिक करने को।” वो उपाश्रय में आएंगे। अब आप सामायिक में बैठे हैं। आप ऐसा नहीं कह सकते, “अच्छा अच्छा, आप आए! बहुत अच्छा हुआ।” ऐसा आप नहीं कह सकते। क्योंकि वचन का दोष लगता है। वे जितनी विराधना करके कार द्वारा या ट्रेन द्वारा यहाँ आए, उस विराधना की अनुमोदना का पाप तुममें लग जाएगा। इसलिए ‘सामाइय वय जूत्तो’ सूत्र में क्या कहा? समणो इव सावओ हवइ जम्हा। आप श्रमण जैसे हो गए। हमारे पास आप आएंगे, हम कभी भी नहीं कहेंगे, “आप आए बहुत अच्छा हुआ।” गुरु को वंदन करने के लिए जाना, वो आपकी तरफ खुलती बात है। हम नहीं मानेंगे कि आप आए वो अच्छा हुआ, क्योंकि आप विराधना करके आए हो। आप घर से चलकर आए हो, ईर्यासमिति पूर्वक, तब तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन कार से आए हो या बाइक से आए हो, तब तुम्हारी इस विराधना की अनुमोदना हम नहीं कर सकते। तो कैसा सुंदर ये शासन हमें मिला!

तो आप सामायिक में होगे, तब अंतरंग सुख की अनुभूति आपको होगी। सामायिक में बहिरंग सुख नहीं है। वहाँ खाने का सुख नहीं, कोई पानी पीने का सुख नहीं है। वहाँ जो सुख है वो अंतरंग सुख है। और अंतरंग सुख मिलता है जब सद्गुरु के चरणों में हम समर्पित हो जाते हैं । तब ‘सगरा हो सो भर-भर पीवे।’

अरबपति श्रीमंत, उसके एक मित्र ने कहा कि एक सद्गुरु, हिंदू सद्गुरु यहाँ से ५० किलोमीटर दूर जंगल में रहते हैं झोपड़ी में, उनका दर्शन एक बार करो। लेकिन ये श्रीमंत बिज़नेस में इतना इन्वॉल्व (Involve) था कि एक मिनट का समय उसके पास नहीं था। लेकिन मित्र भी पीछे पड़ गया। हर संडे (Sunday) के दिन सुबह फोन करता, “आज तो जाने का है ना सद्गुरु के पास?” एक दिन अरबपति ने सोचा, ‘चलो मित्र कहता है, आज जाकर आऊँ।’ शॉफर (ड्राइवर) को कहा कार तैयार करो। कार में बैठ गया और कहा “यहाँ जाना है”। कार चालू हो गई। सद्गुरु जहाँ विराजमान थे, वहाँ कार आ गई। सद्गुरु एक झोपड़ी में थे। दूसरी दो-चार झोपड़ी थीं।

सद्गुरु ध्यान में बैठे हुए थे। सद्गुरु जो परमात्मा में डूबे हुए होते हैं। सद्गुरु की व्याख्या एक ही है— ‘जो परमात्मा में, परमात्मा की आज्ञा में सदैव डूबे हुए होते हैं, वे सद्गुरु।’ मैं तुम्हारे सामने देख रहा हूँ, वो बाहर से, लेकिन भीतर से मेरी आँखें मेरे परमात्मा की ओर ही हैं। और मेरे परमात्मा जो कह रहे हैं, उसी का अनुवाद मैं कर रहा हूँ। मेरी नज़र मेरे प्रभु पर है। आपकी नज़र मुनि पर होनी चाहिए। मुनि की नज़र प्रभु पर होनी चाहिए। आपकी नज़र मुनि पर, क्योंकि आपको मुनि बनना है। मुनि के जैसा अंतरंग सुख आपको प्राप्त करना है। और मुनि की दृष्टि प्रभु की ओर है।

तो श्रीमंत गया। एक शिष्य से पूछा कि, “गुरुदेव कहाँ विराजमान हैं?” तो कहा, “इस झोपड़ी में तुम जाओ, गुरुदेव वहाँ हैं।” श्रीमंत गया वहाँ। अब गुरु तो ध्यान में बैठे हुए हैं। आँखें बंद हैं। परमात्मा में डूबे हुए हैं। परमात्मा में खो गए हैं। श्रीमंत के पास ज्यादा समय तो था नहीं। उसने सोचा, ‘१५ मिनट बैठता हूँ। गुरु ध्यान पूर्ण करते हैं और मेरी ओर देखते हैं और उपदेश देते हैं तो सुन लूँगा, वरना चला जाऊँगा।’ अब झोपड़ी छोटी सी थी और उसमें दो ही जन बैठे थे। गुरु और ये श्रीमंत। अब गुरु के शरीर से जो ऊर्जा निकल रही है, उस ऊर्जा का स्पर्श धीरे-धीरे श्रीमंत को होने लगा। १५ मिनट तक गुरुदेव की ऊर्जा का स्पर्श मिला।

ऊर्जा क्या करती है? गुरु के पास जो आनंद है, वो आनंद आपको देती है। गुरु के पास जो साधना है, वो साधना आपको देती है। तो गुरु का जो आनंद था, वो आनंद श्रीमंत को मिला। चौंक गया! ऐसा आनंद तो कभी नहीं मिला! करोड़ रुपिये एक साथ मिलें तो भी ऐसा आनंद तो कभी नहीं मिला! क्योंकि वो बहिरंग सुख था और ये अंतरंग सुख है। तब श्रीमंत ने सोचा कि ‘अब तो यहाँ बैठ ही जाऊँ, अब जाना नहीं है।’

एक घंटे तक बैठा रहा और इतनी ऊर्जा मिली… श्रीमंत को हुआ कि अरब रुपिये निकम्मे हैं, कोई काम के नहीं। मैं अरबपति हूँ, लेकिन मेरे पास इतना आनंद कभी नहीं था जो आनंद गुरु के सान्निध्य में मुझे मिला। तो अब गुरु जो मेरा स्वीकार कर लें, तो गुरु के सान्निध्य में सदा के लिए आ जाऊँ। गुरु ने आँख खोली। प्रेम से देखा श्रीमंत की ओर। बड़ा प्रेम था चेहरे पर, आँखों में। अब श्रीमंत को ना कोई उपदेश की आवश्यकता, ना गुरु के कोई वचन की आवश्यकता। श्रीमंत ने कहा, “गुरुदेव! आप मुझे अपने शिष्य के रूप में यदि स्वीकारो, तो मैं आपके चरणों में समर्पित होना चाहता हूँ।”

कितना अंतर पड़ गया बोलो! कभी भी संतों के पास जाने नहीं वाला आदमी आज कहता है, “मैं आपके चरणों में समर्पित होने जा रहा हूँ। आप मेरा स्वीकार करो।” तो गुरु ने कहा, “तू खाली होकर आ जा। मैं तेरा स्वीकार कर लूँगा।” उसने कहा, “गुरुदेव! मैं खाली होकर आपके पास आता हूँ। आप मेरा स्वीकार करना।”

अरबपति घर पर गया। अब पत्नी एक्सपायर्ड हुई है, बच्चा है नहीं। चैरिटी (Charity) संस्थाओं को अपनी हवेली दान में कर दी। ‘दो करोड़ इस संस्था को, पांच करोड़ इस संस्था को…’ एक संस्था मानव सेवा के लिए काम करती है, उसको १० करोड़ रुपिये। कोई पशु सेवा का काम करती है, ‘१० करोड़ ले जाओ।’ सुबह से शाम तक सब पैसे बाँट दिए। अब उसके पास एक पैसा भी ना रहा। एक शर्ट था, एक पायजामा था, कुछ नहीं। अपनी कार भी दे दी।

और शाम को गुरु के द्वार गया। कहा, “गुरुदेव! खाली होकर आया हूँ। आप मेरा स्वीकार करो।” गुरु कहते हैं, “गेट आउट (Get out)! यहाँ से बाहर निकलो।” अरे! सुबह तो कहा, ‘तुम खाली होकर आ जाओ, तुम्हारा स्वीकार कर लूँगा’ और सब छोड़कर आया, अब कहते हैं ‘गेट आउट, चले जाओ यहाँ से’? अब जाए तो जाए कहाँ? अब घर पर तो जाए कैसे? घर भी अपना नहीं है, एक पैसा भी अपना नहीं है। बाजु में रेलवे स्टेशन था। स्टेशन पर गया और पूरा दिन पैसे की व्यवस्था में लगाया था, तो खाने का भी समय नहीं था। अब भूख लगी है, लेकिन बिस्किट लेने के लिए पैसे नहीं। क्या खाए? भूखा ही सो गया।

भूख होती है तब नींद ज्यादा नहीं होती और पेट भरा हुआ होता है ना, तब नींद ज्यादा होती है। उपवास का एक बड़ा सुख यह है कि नींद कम हो जाती है। और नींद कम हो जाती है तो साधना गहन हो जाती है, गहरी हो जाती है। उपवास का ये पहला ही बेनिफिट (Benefit) है— नींद का कम होना।

सुबह तीन बजे उठ गया। अब सोचता है कि, ‘सुबह गुरु ने कहा था तू सब छोड़ कर आ, मैं तेरा स्वीकार करूँगा। शाम को मैं सब कुछ छोड़कर गया और गुरु कहते हैं गेट आउट! ये क्यों हुआ?’ एक बात बहुत समझने लायक है इस घटना में। हम होते तो क्या विचार करते? ‘ये गुरु, सुबह कहते हैं छोड़ कर आओ फिर स्वीकार करूँगा, शाम को छोड़ कर गया तो गेट आउट! ये कोई गुरु होते हैं? ऐसे गुरु होते हैं?’ लेकिन ये जो एक घंटे तक सद्गुरु के सान्निध्य में बैठा था और उनकी ऊर्जा ली थी, तो श्रीमंत के मन में विश्वास है कि ‘ये सद्गुरु कभी भी असत्य नहीं बोलेंगे। मेरे इंटरप्रिटेशन में कहीं फॉल्ट है। मैं कुछ गलत समझा हूँ। तो क्या मैं गलत समझा हूँ? गुरु गलत नहीं हैं। मैं गलत हूँ।’ हममे और उसमें फर्क यही तो है।

“मुझमें कहीं फॉल्ट है। क्या फॉल्ट है?” अब उसने सोचा कि ‘गुरु ने कहा था सब कुछ छोड़कर आ। अब मैं गुरु के पास जब गया तब और अब मेरे मन में एक अहंकार है। अहंकार ये है कि मैंने सुना है कि गुरु के पास करोड़पति लोग भी शिष्य होकर रहे, लेकिन अरबपति कोई शिष्य गुरु के पास नहीं है। मैं पहला ही अरबपति शिष्य हूँ। तो अरब रुपिये मैंने छोड़े, लेकिन मैं अरबपति हूँ, इस भाव को मैंने छोड़ा नहीं। तो अहंकार मेरे पास था कि मैं अरबपति था। तो गुरु ने कहा था सब कुछ छोड़कर आ, तो ‘सब कुछ’ में अहंकार भी आता है। तो मैंने अहंकार तो छोड़ा नहीं था!’ उसका अहंकार खर गया। ढल गया।

और सुबह ५:०० बजे गुरु की झोपड़ी की ओर वहाँ गया। ६ बजे गुरु ध्यान से उठे और देखा सामने श्रीमंत खड़ा है। गुरु खड़े हुए अपने आसन से और गुरु ने श्रीमंत को बाहों में लिया और कहा, “वाह! अब तू मेरा शिष्य है। अब तू खाली होकर आया है। अब तू सब छोड़ कर आया है।” और गुरु ने उसको दीक्षा दी और अपना शिष्य बनाया। तो सद्गुरु के चरणों में वो समर्पित हो गया। फिर परम रस के ग्लास पर ग्लास…

आपको पर (अन्य) छोड़ना नहीं है और परम को पाना है, बराबर? एक आदमी ने कहा था, “मुझे लंदन जाना है इंग्लैंड, लेकिन मैं भारत को नहीं छोडूँगा।” अरे! तू भारत को नहीं छोड़ेगा तो लंदन जाएगा कैसे? लंदन जाना है तो भारत को छोड़ना ही पड़ेगा। परम को पाना है, तो पर को छोड़ना ही पड़ेगा। और मैं तो वहाँ तक कहूँगा कि पर को छोड़ना भी नहीं है। ‘पर’ छूट जाना चाहिए।

मेरे पास मुमुक्षु होते हैं। उनको मैं कहता हूँ कि, “बेटा संसार छोड़ने की प्रोविज़न (Provision) में जाना नहीं है। छोड़ना नहीं है। संसार छूट जाना चाहिए!” जब प्रभु को देखें और प्रभु का सम्मोहन हो… प्रभु के आकर्षण में हम आएं, संसार छूट जाएगा। प्रभु का सम्मोहन! चिंतामणि दादा के पास, गोड़ीजी दादा के पास आप वर्षों से जा रहे हो, लेकिन आज मैं एक प्रश्न पूछूँगा कि दादा का सम्मोहन कितना? दादा हृदय में कितने बस गए? एक घंटा दादा के पास आप बैठते हो, अभिषेक होता है, दो घंटे, तीन घंटे आप बैठते हैं। लेकिन आपके मन में, आपके हृदय में २४ घंटे दादा होते हैं? तो प्रभु का इतना सम्मोहन होगा तो पर छूट जाएगा। संसार में रहोगे तो भी आकर्षण संसार का नहीं रहेगा। आकर्षण प्रभु का ही रहता है कि ‘प्रभु के मार्ग पर मैं कब चलूँ? कब मुझे दीक्षा मिले? कब प्रभु के मार्ग पर मैं दौडूँ?’

क्योंकि यह जन्म जो मिला है, वो प्रभु के मार्ग पर चलने के लिए मिला है। संसार के मार्ग पर तो अनगिनत बार चले। प्रभु के मार्ग पर इस जन्म में चलना है। श्रावक के रूप में चलो या मुनि के रूप में चलो, लेकिन चलना है, प्रभु के मार्ग पर चलना है। तो ‘सगरा हो सो भर-भर पीवे। सद्गुरु के चरणों में हम जब समर्पित हो जाते हैं, तब परम रस के ग्लास पर ग्लास सद्गुरु हमें देते हैं कि ‘पी ले बस!’

फिर पीने का मज़ा। अब तक क्या मज़ा? अब तक कुछ मज़ा आपके पास नहीं। ये परम रस को आप पिएंगे तब आप कहेंगे, “हाँ, आनंद तो यही है, बाकी तो कोई आनंद नहीं।” इसलिए मानविजयजी महाराज साहेब ने कहा— प्रभुनी मेहरें ते रस चाख्यो, अंतरंग सुख माण्यो जब रस का आस्वाद किया, अनुभव किया, तब अंतरंग सुख का अनुभव मिला। तो आप सबको भी अंतरंग सुख का अनुभव मिले, इतना आशीर्वाद!

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