आप किसकी आज्ञा में हो – बाहरवालों की? या उपरवाले की?
आप पीड़ा में रहते हो उसका मूल कारण यह है की किसी भी घटना का अर्थघटन आप समाज की दृष्टि से करते हैं, प्रभु की दृष्टि से नहीं करते। Society ने आपके मन में ठसाया है कि कोई तुम्हें कड़वे शब्द बोले, तो तुम्हारा अपमान हो रहा है। किसीने वैसे शब्द आपको बोल दिए, आपका आनंद गया! मैं पूछता हूँ किसी ने आपको गालियाँ बोल भी लीं, तो भी उससे आप को क्या तकलीफ़ है? कोई गाल पर चाँटा जड़ दे, तो जरूर गाल पर सूजन आ जाएगी; पर किसीके कड़वे शब्दों से कानमें सूज़न आती है क्या?!
तकलीफ़ तो बोलने वाले को होती है, सुनने वाले को कोई तकलीफ़ नहीं होती। प्रवचन में डेढ़-दो घंटे बोलना पड़े, तो हमारा भी गला दर्द करता है; बोलने में तकलीफ़ पड़ती है। लेकिन प्रवचन सुननेवाले को कानों में कोई तकलीफ़ नहीं पड़ती! तो किसी ने गालियाँ बोल भी दीं, फिर भी आप आनंद में रहो ना! आपका आनंद ऐसा होना चाहिए कि जिस को कोई तोड़ न सके; कोई लूट ना सके। तुम्हारा आनंद तुम्हारा ही हो; कोई भी व्यक्ति उसमें दखलगिरी ना कर सके।
आपने अच्छा Suit सिलवाया और पहन कर निकले और देखते ही किसीने कह दिया की “यह क्या बाबा आदम के ज़माने के कपड़े पहने हैं?”। आपका आनंद गया! और हम सदियों से हमारे भगवान की आज्ञा के अनुसार एक ही Uniform पहनते आ रहे हैं। कोई हमारे Uniform के विषय में कुछ भी कहे, हमारे आनंद में उससे रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ता। आप बाहर वालों की आज्ञा में हो, इस लिए पीड़ा में हो और हम ऊपर वाले की आज्ञा में हैं, इस लिए सतत आनंद में हैं।
- महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित स्तवना चोवीसी, प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति:
“जगजीवन जगवालहो, मरुदेवी नो नन्दलाल रे।”
प्रभु ऋषभदेव की माताजी का नाम मरुदेवा था, और प्रभु महावीर की माताजी का नाम त्रिशला— त्रिशल्यातीता! तीनों शल्यों से— मन, वचन, काया के शल्यों से, पीड़ाओं से जो मुक्त है, वो त्रिशल्यातीत है। ना मन में कोई पीड़ा हो, ना काया में पीड़ा हो। प्रभु जब मुझे मिले, तब से एक क्षण ऐसा नहीं गया जो पीड़ा वाला हो।
मैं बहुत बार कहता हूँ कि प्रभु ने मुझे अपने एयर कंडीशन्ड (Air conditioned) हाथ में रखा है। और जब यशोविजय प्रभु के एयर कंडीशन्ड हाथ में है, तो गर्मी की चिंता कैसे? और दूसरी पीड़ा भी कैसे? जब प्रभु हमारे साथ हैं, पीड़ा कैसे? लेकिन प्रभु को ऐसा कोई पक्षपात नहीं है कि ‘यशोविजय को ही अपने एयर कंडीशन्ड हाथ में मैं रखूँ, तुम्हे ना रखूँ।’ प्रभु सबको अपने एयर कंडीशन्ड हाथ में रखने को तैयार हैं। प्रभु तैयार हैं। Are you ready? He is ready। He is ever ready. But are you ready? सिर्फ प्रभु ही दिखें! और प्रभु की शरण में मैं जाऊँ, मेरी सब पीड़ा से मैं मुक्त हो जाऊँ, ऐसी श्रद्धा अपने हृदय में है, हमारे पास ये सज्जता आ गई कि हम प्रभु के एयर कंडीशन्ड हाथ में बैठ सकते हैं।
एक श्रद्धा— प्रभु की शरण में जब मैं जाता हूँ, मेरे सब दुख, सब पीड़ा ख़त्म हो जाती है। पीड़ा ही तब तक है जब तक हम प्रभु से दूर हैं। मैं भी पीड़ित था, जब प्रभु से दूर था तब। लेकिन जब प्रभु की शरण में मैं गया, आनंद ही आनंद है! सिर्फ आनंद, दूसरा कुछ नहीं। तो आपको भी आनंद ही चाहिए ना? होता क्या है? एक घटना घटित होती है। आप उस घटना का अर्थकरण, पृथक्करण समाज की दृष्टि से करते हैं, आपकी दृष्टि से नहीं करते। सोसाइटी (Society) कहती है कि ‘ऐसे शब्द कोई बोले तो अच्छे नहीं हैं’, तो तुम्हें बुरा लगता है।
अरे! किसी ने गालियाँ बोल भी लीं, अपन को क्या तकलीफ़ है? मैं बहुत बार कहता हूँ, कोई गाल पर चाँटा जड़ देगा, तो गाल पर सूजन आ जाएगी। लेकिन किसी ने गालियाँ बोल लीं, तो कान में सूजन आती है? क्या होता है? तकलीफ़ कब होती है? बोल लिया तो बोल दिया! तकलीफ़ तो बोलने वाले को होती है, सुनने वाले को तकलीफ़ नहीं होती। हम बोलते हैं ना डेढ़-दो घंटे बोलना पड़े तो हमारा भी गला दर्द करता है, बोलने में तकलीफ़ पड़ती है। सुनने में तो कोई तकलीफ़ नहीं पड़ती। तो किसी ने गालियाँ बोल भी दीं, अपन आनंद में रहो ना! तुम्हारा आनंद ऐसा होना चाहिए कि जिस आनंद को कोई तोड़ ना सके, कोई लूट ना सके। तुम्हारा आनंद तुम्हारा ही हो! कोई भी व्यक्ति उसमें दखलगिरी न कर सके।
४०० वर्ष पहले की एक घटना याद आती है। दिल्ली में मुस्लिम बादशाह का शासन था। और उसी दिल्ली में एक मुस्लिम फकीर, जन्म से मुस्लिम थे, संत भी हुए। लेकिन एक दफे उन्होंने कृष्ण भक्ति का पद सुना। पद क्या सुना, भीतर एक झनझनाटी मच गई! ‘ऐसा गीत तो मैंने कहीं ना कहीं सुना है, कहाँ सुना है?’ जन्मांतर में, गत जन्म में वे बड़े कृष्ण भक्त थे। एक पद सुनने से गत जन्म की कृष्ण भक्ति की स्मृति हो आई! और मुस्लिम फकीर कृष्ण भक्त हो गए! हमारे वहाँ कहा है— एक सूत्र ऐसे रटो, ऐसे रटो, ऐसे रटो कि अगले जन्म में इस सूत्र का एक शब्द भी आपको सुनाई दे और आप, आपके जन्मांतरीय स्मृति के तार बिल्कुल रनझना उठें।
वज्र स्वामी की आत्मा पूर्व जन्म में देव थे। वो देव अष्टापद की यात्रा के लिए आया था। भगवान गौतम भी उस समय अष्टापद की यात्रा के लिए पधारे थे। देव को बड़ा आनंद हुआ कि तीर्थ की यात्रा भी हो गई, भगवान गौतम के दर्शन भी हो गए! फिर प्रभु गौतम के चरणों में देव बैठा। तो प्रभु गौतम ने कहा, “धर्मलाभ!” तो देव ने पूछा कि, “आपने आशीष दी ‘मुझे धर्म की प्राप्ति हो’, लेकिन धर्म क्या है?” तब प्रभु गौतम ने कहा कि, “प्रभु की आज्ञा का पालन, ये धर्म है। प्रभु की आज्ञा का संपूर्ण पालन मुनि जीवन में होता है और प्रभु की आज्ञा का आंशिक पालन श्रावक जीवन में होता है।”
उस देव के मन में एक अभीप्सा पैदा हुई कि अगले जन्म में मुझे मुनि होना है। तो उसने प्रभु गौतम से पूछा कि, “प्रभु! मेरे लिए कोई सूत्र, मेरे लिए रटने के लिए कोई गाथा, जिससे कि अगले जन्म में मनुष्य के रूप में मैं पैदा होऊँ और तुरंत ही मुझे दीक्षा का ख्याल आ जाए?”
प्रभु गौतम ने पुंडरीक-कंडरीक अध्ययन दिया, जिसमें दीक्षा का माहात्म्य आता है। वो देव रोज़ ५०० बार उस सूत्र का स्वाध्याय करता है। ५०० वर्ष की आयु बाकी है, ५०० वर्ष तक प्रतिदिन ५०० बार इस सूत्र का स्वाध्याय करता है। तो “दीक्षा, दीक्षा, दीक्षा, दीक्षा…” आंतर्मन में शब्द प्रतिष्ठित हो गया!
और फिर वज्र कुमार के रूप में जन्म हुआ। पारने में झूलता है और एक दासी कहती है, “इसके पिता ने तो दीक्षा ले ली। उसके पिता हाज़िर होते, तो इस पुत्र का जन्मोत्सव कैसा मनाते?”
‘दीक्षा’ शब्द सुना और वो बालक चौंका! “दीक्षा? दीक्षा क्या है?” और गत जन्म का अनुसंधान हो गया! और निश्चित हुआ कि ‘मैं दीक्षा के लिए ही मनुष्य जन्म में आया हूँ। लेकिन मेरी माँ मुझे अनुमति कैसे देगी? मैं अकेला बच्चा हूँ, और माँ को मेरी पर आशा है कि बच्चा बड़ा होगा और फिर मुझे बराबर पालित करेगा। तो माँ मुझे अनुमति कैसे देगी? तो माँ अनुमति दे इसलिए मैं क्या करूँ?’ क्योंकि माँ की अनुमति के बिना, पिता की अनुमति के बिना तुम दीक्षा नहीं ले सकते हो।
पंचसूत्र में हरिभद्रसूरी महाराज साहिब ने लिखा है:
“दुष्प्रतिकारौ मात-पितरौ”
माता और पिता का उपकार जैसा-तैसा नहीं है। माता के ऋण से या पिता के ऋण से बाहर निकलना हमारे लिए संभव नहीं है। मातृ ऋण तो बहुत ही बड़ा है। जिस माता ने नौ-नौ मास तक हमें पेट में रखा, कितनी पीड़ाएँ झेलीं! एक ही बात थी— “मेरा लाडला, मेरा लाडला, मेरे लाडले के कब आएँगे?” तो ये जो माता ने हम पर उपकार किया है, उस माता के ऋण से हम कभी भी बाहर नहीं आ सकते।
बाय द वे (By the way) एक बात याद आ गई। कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्राचार्य ने अपनी माता पाहिनी को दीक्षा दी। अब पाहिनी गुरुदेव की माता, सैकड़ों साध्वियाँ गुरु माता की सेवा करती हैं। हमारे गुरुदेव कलिकाल सर्वज्ञ और उनकी ये माताजी हैं! माताजी का सम्मान तो राजमाता से भी अधिक होता था। एक दिन ऐसा हुआ, आचार्य भगवंत पाटण में विराजमान, मातुश्री महाराज भी पाटण में विराजमान। दोपहर का समय, मातुश्री की तबीयत थोड़ी गंभीर हो गई। ऐसे तो शिथिल थे ही उम्र के कारण, लेकिन गंभीर स्वास्थ्य हो गया।
एक श्रावक दौड़ता-दौड़ता आचार्य भगवंत के उपाश्रय में आया। “गुरुदेव! गुरुदेव! जल्दी पधारो। मातुश्री का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है” गुरुदेव वापरते थे, खड़े हो गए और शिष्यों को कहा, “तुम जैसे-जैसे वापर लो, वैसे वहाँ आ जाना। मैं जाता हूँ, मेरी माँ के स्वास्थ्य का मामला है, इसमें कोई कॉम्प्रोमाइज़ेशन (Compromisation) नहीं हो सकता।” आचार्य श्री वहाँ गए। माताजी पाट पर सोई हुई थीं। और ये कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य, हज़ारों-लाखों के आस्था केंद्र, ज़मीन पर बैठे! “मैं आचार्य हूँ, लेकिन जिनशासन का! मेरी माता का तो मैं पुत्र ही हूँ।”
थोड़े समय में तो उपाश्रय खचाखच भर गया। वैद्य ने कहा कि, “अब हमारे पास कोई दवाई नहीं है।”
तब आचार्य भगवंत ने कहा, “अब धर्म रूपी औषध माता जी को दो।” किसी ने कहा, “मैं ५०० आयंबिल करूँगा”, किसी ने कहा, “मैं हज़ार सामायिक करूँगा”, साधु-साध्वियों ने स्वाध्याय किया। सबने सब बोला। आचार्य भगवंत कुछ नहीं बोलते। आचार्य भगवंत सोच रहे हैं, ‘मैं क्या कहूँ? जो भी मेरे पास है, वो माता का है। मुझे जन्म माता ने दिया, संस्कार माता ने दिया, प्रभु के मार्ग पर मुझे माता ने भेजा। सब कुछ तो माता का है, मेरा है क्या? मैं क्या दूँ माता को?’
लेकिन तब मातुश्री की नज़र अपने बेटे पर टिकी। मातुश्री बोल नहीं सकते थे उस समय, लेकिन कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य श्री मातुश्री की दृष्टि से भाँप गए कि माता कह रही है कि, “मेरा बच्चा मुझे क्या देगा? सबने सब कुछ दिया, मेरा होनहार बच्चा, कलिकाल सर्वज्ञ बच्चा मुझे क्या देगा?” आचार्य श्री की आँखें नम हो गईं! ‘माँ को क्या दूँ? लेकिन माँ की इच्छा है कि मेरा बच्चा मुझे कुछ दे, तो देना ही होगा। माँ की इच्छा का पालन तो करना ही है।’ तब आचार्य श्री को हुआ कि मेरी माँ की जो गरिमा है, उस गरिमा के अनुरूप मुझे कुछ देना चाहिए।
तो आचार्य श्री ने उस समय कहा कि, “माँ! तेरा स्वास्थ्य अच्छा हो जाए इसलिए मैं साढ़े तीन करोड़ श्लोक साहित्य की रचना करूँगा!” साढ़े तीन करोड़ श्लोक! एक गाथा होती है उसे हम एक श्लोक कहते हैं। ऐसे साढ़े तीन करोड़ श्लोक! तब माँ को आनंद हुआ और माँ को आनंद हुआ, तो आचार्य श्री को भी आनंद हुआ कि ‘मेरी माँ प्रसन्न हुई।’ और उस समय भी आचार्य श्री मान रहे हैं कि ‘माँ की इच्छा थी मैंने कुछ दे दिया, लेकिन मैं मातृ ऋण से मुक्त तो नहीं होता।’ माता के ऋण से मुक्त होना, ये तो असंभव ही है।
आप सब माता के भक्त हो। जिनशासन में जो भी जन्मे हैं, वे सब अपनी माता के भक्त, अपने पिता के भक्त होने ही चाहिए। आपके घर में माता की सेवा, माता की पूजा तीर्थ के रूप में होनी चाहिए। ये खुद तीर्थ है! आप दूसरे तीर्थ पर न जा सको, कोई हर्जा नहीं। लेकिन माँ साक्षात तीर्थ है! माँ की पूजा, अपने पिता की पूजा जिस घर में होती है, उस घर को शास्त्रों ने स्वर्ग कहा है। आपका घर स्वर्ग हो गया, जब आपके घर में माता की पूजा, पिता की पूजा होती है।
मैं अहमदाबाद शांतिनगर में चातुर्मास था। एक डॉक्टर (Doctor) मेरे प्रवचन में रोज़ आते थे। एक संडे (Sunday) के दिन दोपहर को समय लेकर वे मेरे पास आए। बैठे, वंदन करके। बात-बात में मैंने पूछा कि, “डॉक्टर! आराधना में क्या करते हो?”
तब डॉक्टर ने कहा, “साहब! मेरे पास दूसरी कोई आराधना नहीं है। लेकिन मेरी माता की पूजा, ये मेरी आराधना है।”
और फिर डॉक्टर ने जो बात कही, आप सबके मन में एक आश्चर्य पैदा होगा, आप सबकी आँखें नम होंगी कि ऐसी मातृ-भक्ति! डॉक्टर रोज़ सुबह तैयार होते, अपने बड़े हॉस्पिटल (Hospital) जाने से पहले। तैयार होने के बाद माँ के कमरे में जाते, माँ के चरणों में लेटते एक नन्हे-मुन्ने बच्चे की तरह, और माँ आशीर्वाद देती, सिर पर हाथ फेरती, तब ही डॉक्टर जाते। रात को जब डॉक्टर आते थक करके, माँ के चरणों में बैठते। माँ कुर्सी में बैठी हुई है, बच्चा नीचे बैठ जाता है और माँ के चरणों को स्पर्श करता है। फिर कोई समय की पाबंदी नहीं— आधा घंटा, घंटा, डेढ़ घंटा! जब माँ कहती है कि, “बेटा! तू जा, तू थका हुआ है”, तब ही जाने का। जब तक माँ अनुमति न दे, तब तक माँ के चरणों में बैठे रहने का। और डॉक्टर कहते थे कि, “गुरुदेव! मेरे लिए ये स्वर्गीय क्षण थे! पूरे दिन से थका हुआ मैं माँ के चरणों में बैठता, थकान दूर हो जाती, मैं फ्रेश (Fresh) हो जाता।”
एक दिन रात को डॉक्टर आए। माँ ने बात-बात में पूछा, “आज तू टिफिन (Tiffin) लेकर नहीं गया था, तो दोपहर तूने क्या खाया?”
तो डॉक्टर ने कहा, “माँ! आज हमारा मेडिकल कॉन्फ्रेंस (Medical conference) था, तो वहाँ ही भोजन का प्रबंध था।”
माँ ने कहा, “तूने क्या खाया?”
अब माँ… माँ के सामने असत्य बोलने की बात तो होती नहीं, झूठ तो बोला ही नहीं जाता। कहा— “दूधपाक, पूरी, बटाटा का शाक (आलू की सब्ज़ी), दाल-भात, ये सब मैंने खाया।” माँ कुछ बोली नहीं, आशीर्वाद दिया कि, “बेटा तू जा, थका हुआ है।” डॉक्टर गए अपने कमरे में। दूसरे दिन तैयार होके माँ के पास गए, माँ का आशीर्वाद लिया और हॉस्पिटल की ओर चले।
रात को फिर आए। रात को माँ के चरणों में बैठे, आधा घंटा, घंटा और अपने रूम (Room) में गए। जब डॉक्टर अपने रूम में गए, तब डॉक्टर की श्राविका ने पति से कहा कि, “माँ ने आज उपवास किया है!”
ऐसे तो माँ पाँच तिथि उपवास करती थी, लेकिन जब से हाइपरटेंशन (Hypertension) का तकलीफ़ हुआ, तब से एकासना ही करती है पाँच तिथि। आज तो तिथि भी नहीं थी! “मैं चाय-नाश्ता सब लेकर माँ के रूम में गई। तो माँ ने कहा, ‘मुझे आज उपवास है।’ मैंने बहुत कहा कि माँ आज उपवास कैसा? आप तो तिथि के दिन भी एकासना आप करती हो। आपके लिए हाइपरटेंशन की टेबलेट (Tablet) लेनी ज़रूरी है। आज उपवास कैसे?”
“माँ ने कुछ बोला नहीं। इतना ही कहा— ‘आज उपवास है, मैंने पच्चक्खाण ले लिया है।’ और पच्चक्खाण ले लिया, तो बात पूरी हो गई।”
तो श्राविका डॉक्टर से कहती है कि, “आज माँ ने उपवास क्यों किया?” तब डॉक्टर के मन में स्ट्राइक (Strike) हुआ। “कल मैंने कहा था कि मैंने आलू का शाक (सब्ज़ी) खाया! इस आलू की सब्ज़ी खाई, ये जो बात मैंने कही उसका प्रायश्चित्त माँ ने किया! आलू की सब्ज़ी मैंने खाई, प्रायश्चित्त माँ ने किया!” और डॉक्टर ने मुझे कहा, “साहब! उस दिन से सब अभक्ष्य दूर हो गया।” माँ का प्रेम यह काम कर सकता है!
अभी भी बहुत माताएँ मेरे पास आती हैं कि, “साहबजी! १४ वर्ष तक तो बेटा मंदिर जाता था, एकासना, बियाशणा करता था। १६ वर्ष का हुआ, सब कुछ उसने छोड़ दिया।” माँ रडती है (रोती है), कि “गुरुदेव! मैं क्या करूँ?”
तब मैं एक ही बात उनसे कहता हूँ कि, “तुम प्रेम से अप्लाई (Apply) करो। आज का बच्चा प्रेम की भाषा ही स्वीकार करेगा, दूसरी कोई भाषा को स्वीकार करने वाला है नहीं। आप प्रेम से अप्लाई करो, प्रेम से कहो कि, ‘बेटा! जो तू ऐसा करेगा तो मैं आज खाना नहीं खाऊँगी, मैं आज रोटी नहीं खाऊँगी, मैं आज चाय नहीं पियूँगी।’ तुम्हारा प्रेम जो है, उस प्रेम से यह बच्चा सुधर जाएगा। बाकी दूसरा कोई रास्ता नहीं है। There is no other way! आज के बच्चे को तुम प्रेम से ही सब कुछ दे सकते हो।” मैं तो बार-बार कहता हूँ कि लाल आँखों वालों का युग समाप्त हो गया। ये युग था पहले, कि पिता लाल आँख करता और बच्चा हिल जाता! लेकिन अब ये युग नहीं, अब स्माइलिंग फेस (Smiling face) वालों का युग है। हम भी तो स्माइलिंग फेस वाले ही हैं, क्योंकि हमें भी आपके ऊपर काम करना है। तो हम भी समझते हैं कि प्रेम से ही काम होगा, दूसरा कोई मार्ग नहीं है। हम कोई फ़ोर्स (Force) तो पाड़ नहीं सकते आप पर— “आपको ये प्रतिक्रमण करना ही पड़ेगा!” लेकिन हम प्रेम से कहेंगे कि, “प्रतिक्रमण तो करना ही चाहिए, श्रावक के लिए आवश्यक है।”
तो वज्र कुमार पारने है, में जातिस्मरण ज्ञान हुआ और निश्चित हुआ कि ‘मैं दीक्षा के लिए आया हूँ। अब माँ मुझे अनुमति कैसे देगी?’ रडने का शुरू किया। दूध पिलाओ तो भी रोने का चालू, खिलौना दो रोने का चालू, रात-दिन रोना ही रोना! और माता थक गई।
पिताजी महाराज गुरुदेव के साथ उसी नगरी में आए थे। और ज्ञानी गुरुदेव ने कहा था, “आज सचित्त-अचित्त जो भी भिक्षा में मिले लेकर आना।” और तब श्राविका ने कहा, “लो, ये तुम्हारा बच्चा ले जाओ तुम, मुझे नहीं चाहिए।” तब गुरु का वाक्य याद आया— “सचित्त-अचित्त जो भी मिले लेकर आना।” बालक को ले लिया। तो क्या था? एक सूत्र ने दीक्षा दे दी!
तो हम बात करते थे कि बादशाह ने जब जाना कि मुस्लिम फकीर होकर कृष्ण भक्ति का गान करता है। बादशाह गुस्सा हो गया— “मेरी ही नगरी में कोई ऐसा मुस्लिम है जो काफ़िरों के भगवान की स्तुति करता है? बुलाओ उसको!”
संत को बुलाया। संत बड़ी प्रसन्नता से आए। राजा की सभा में आए। राजा ने आर्डर (Order) किया, “आज से कृष्ण की भक्ति का पद तुम्हें गाने का नहीं है।”
संत तो ऐसे खड़े रहे। राजा ने कहा, “सुना कि नहीं? मेरी आज्ञा है, अब से कृष्ण भक्ति का गान तुम नहीं कर सकोगे।”
तब धीरे से संत ने कहा, “मैं तो ऊपर वाले की आज्ञा को ही मानता हूँ! मैं तो ऊपर वाले की आज्ञा को ही मानता हूँ, बाकी किसी की आज्ञा मैं मानता नहीं।”
हम ऊपर वाले की आज्ञा में हैं? ठीक है, और आप? आप भी श्रावक हैं, तो ऊपर वाले की आज्ञा में ही हैं! टेलर (Tailor) के पास धक्के खाए, सूट (Suit) बनवाया, सिलवाया। सूट पहन कर निकले। किसी ने कहा, “ये क्या पहना है? बाबा आदम के ज़माने का क्या पहन कर आए हो?” ठीक है, सुना। दूसरा मिला उसने भी ये कहा। तीसरा मिला उसने भी यह कहा। फिर तुम क्या करोगे? तुम बाहर वालों की आज्ञा में हो, हम ऊपर वाले की आज्ञा में? हमारे भगवान ने कहा कि ऐसा यूनिफॉर्म (Uniform) पहनने का है, कोई भी कहे ऐसा यूनिफॉर्म? हम कहेंगे हम बाहर वालों की आज्ञा में नहीं है, हम ऊपर वाले की आज्ञा में हैं।
आप आनंद में क्यों नहीं हैं? कारण यही है! आप बाहर वालों की आज्ञा में हैं। कोई ये कहता है, कोई यह कहता है, कोई यह कहता है, और तुम पूरे फँस जाते हो! किसका मानना? पत्नी कहती है ऐसा करो, बच्चे कहते हैं ऐसा करो, और संबंधी कहते हैं ऐसा करो। अब आप बुरे फँस गए! क्या करे? ऐसा करो तो पत्नी को बुरा लगेगा, ऐसा करो तो बच्चे कहेंगे, “पापा जी! तुमने ऐसा क्यों किया?”, और ऐसा करोगे तो संबंधी सब कहेंगे, “क्या तुम सोचते हो? क्या तुम करते हो? कुछ मालूम नहीं पड़ता तुम्हें! हमने कहा तो भी तुम नहीं करते हो। हम बुज़ुर्ग हैं, हम अनुभवी हैं, हम कहते हैं और तुम स्वीकार नहीं करते हो!”
अब बुरे फँस गए तुम, किसका मानना? हमारे लिए एक ही ऊपर वाला है, बस परमात्मा! परमात्मा की आज्ञा है, ऐसे जियो, मजा से जीते हैं। बोलो, हम ज़्यादा मज़ा में कि तुम ज़्यादा मज़ा में? बोलो! सच-सच कहना, मुझे अच्छा लगे इसलिए नहीं कह रहा, आपको जो लगे सो कहना। हम बड़े मज़ा में कि आप बड़े मज़ा में? हम तो मज़ा में हैं ही!
रात को १० बजे, पुरुषों को हमारे उपाश्रय में आने की छूट है, आप आओ। कोई भी मुनिराज ऐसे हाथ रखकर उदास बैठा हुआ है? तो आप पकड़ो कि “महाराज साहेब! आप उदास क्यों हो?” कोई उदास होगा ही नहीं! सब प्रसन्न होंगे, रात १० बजे! स्वाध्याय करते है, मज़ा से स्वाध्याय करते हैं! आप रात ८ बजे पूछो, ९ बजे पूछो, “साहेब! साता में?”
“अरे! देव-गुरु की पसाय से मज़ा ही मज़ा है यहा तो!” १०४ डिग्री बुखार में शरीर तप रहा है तो भी, “मज़ा मे! शरीर में ताप है, हम तो मज़ा में हैं!”
तो संत ने कहा, “मैं तो ऊपर वाले की आज्ञा में हूँ। और किसी की आज्ञा को मैं सुनता भी नहीं।” राजा तो क्रोधित हो गया। बादशाह दिल्ली का, और उसकी आज्ञा कोई ना माने, संभवित था? अब संत है, फाँसी के मंच पर तो चढ़ा नहीं सकते। संत हैं और लोग श्रद्धा वाले थे, तो दिल्ली में भी हाहाकार मच जाए। “लेकिन कुछ सबक तो सिखाना है।” तो सज़ा फ़रमाई— “चाबुक लगाओ! जहाँ तक मेरी आज्ञा स्वीकार करने के लिए तैयार ना हो, वहाँ तक चाबुक लगाओ।”
चाबुक लगाने के लिए एक स्थल निश्चित था— यमुना नदी के पास। वहाँ एक आदमी लेकर गया, चाबुक फटकारता है और पूछता है, “बादशाह की आज्ञा मानोगे?”
संत कहते हैं, “नहीं!”
लेकिन कैफ़ में हैं, ऐसे मज़ा में हैं, “नहीं मानेंगे। ऊपर वाले की आज्ञा में मजा मे हैं, दूसरे की आज्ञा कैसे मानें?”
हमारे वहाँ दशवैकालिक सूत्र में कहा गया है:
“सेयं ते मरणं भवे”
जो प्रभु की आज्ञा के बाहर जाने के लिए साधु तैयार हो जाए, तो उसके लिए कहा गया, “तेरे लिए मृत्यु श्रेयस्कर है। मौत को भेंट ले, नया जीवन मिल जाएगा, लेकिन आज्ञा को तू छोड़ देगा तो आकब मिलेगी फिर?”
चाबुकीने १०, २० चाबुक फटकारे! अब संत का शरीर तो कोमल-कोमल था, इतने चाबुक लगाए, लहू निकला और संत का शरीर मूर्छित हो गया। शरीर मूर्छित है, आत्मा नहीं| हमारा शरीर मूर्छित हो जाए, बेहोश हो जाए, हम होश में रहते हैं! आपका शरीर होश में है, आपका मन बेहोशी में है! बोलो! आपको कहता हूँ, शरीर होश में है?, मन होश में है कि मन बेहोशी मे है? आप क्रोध कैसे कर सकते हो? अपने लाडले को भी आप चाँटा फटकार देते हो, ये क्रोध आप कैसे कर सकते हो? आदमी बेहोशी में ही क्रोध करता है, होश में तुम क्रोध नहीं कर सकते। ये अपना छोटा सा लाडला है, इसको तुम चाँटा जड़ेगा तो इसके साथ क्या होगा? प्रेम से कहो उसे। तो तुम क्रोध करते हो बेहोशी में करते हो, होश में नहीं!
शरीर होश में है, मन बेहोशी में है। मन को होश में रखो, जागृत रहो! प्रभु ने आचारांग सूत्र में कहा— “सुत्ता अमुणी, मुणिणो सया जागरंति।”
गृहस्थ जो है वो सोता हुआ है, लेकिन मेरा मुनि, मेरी साध्वी हमेशा के लिए जागृत है। शरीर सो गया है, लेकिन हमारा मन जागृति में है। और इसलिए निद्रा में भी शरीर को यहाँ से यहाँ पलटना है, तो रजोहरण से हम संथारे की ज़मीन को और शरीर के भाग को प्रमार्जित करेंगे और बाद में शरीर को ऐसे पलटेंगे। तो निद्रा में भी हमारे पास जागृति है, होश है! आप जागते हैं तो भी होश में नहीं रहते हैं। तो धर्म शास्त्र कहता है कि होश में आ जाओ, जागृत रहो। आप जागृत रहोगे ने, तो फिर क्रोध आएगा ही नहीं। कैसे आएगा? क्रोध से क्या हुआ बोलो? अपनी श्राविका पर बहुत बार क्रोध किया, इससे क्या मिला बोलो? और प्रेम से कुछ कहा होगा! अरे! एक नौकर को तुम फटकारो, या नौकर को प्रेम से कहो कि, “नहीं, ऐसा नहीं करना ऐसा कर।” तो नौकर को भी कौन सी बात अच्छी लगेगी? प्रेम से कही हुई। आपको भी प्रेम पसंद आता है, तो सबको प्रेम पसंद आता है। तो सबसे आप प्रेम की भाषा बोलें, गुस्से की भाषा नहीं बोलें।
तो संत का शरीर बेहोश हो गया। उस आदमी ने देखा कि संत तो मर गए लगते हैं। अब संत का शरीर है, यमुना नदी पास में ही थी। यमुना नदी में शरीर को रख दिया। और यमुना के प्रवाह में शरीर आगे बढ़ने लगा। करीब १० किलोमीटर (Kilometer) आगे शरीर गया। ठंडा पानी, घाव रिस गया, लहू आने को बंद हुआ और ठंडी-ठंडी हवा… थोड़ी जागृति पैदा हुई। १० किलोमीटर दूर एक गाँव था, और गाँव का आदमी नदी पर स्नान के लिए आया था। उसने देखा कुछ जा रहा है नदी में! “अरे क्या है?” गौर से देखा, “अरे! आदमी है यह तो! और कपड़े पर से संत लगता है!” शरीर को खींचा, देखा धड़कन चल रही है, तो ज़िंदा हैं! घर पर लाया, सेक किया, वैद्य को बुलाया, दवाई दी, अच्छा पौष्टिक खिलाया। १५ दिन में संत पहले थे ऐसे हो गए!
और आश्रम में पहुँच गए अपने। और ज़ोर-शोर से कृष्ण भक्ति के पद गाने लगे! बादशाह को समाचार मिला और बादशाह डर गया! ‘ये तो साला मर गया था, उसके भगवान ने ज़िंदा कर दिया! और जो ज़िंदा कर सकता है, वो मार भी सकता है। तो उसके भगवान मुझे मार तो नहीं डालेंगे?’ चमत्कार, वहाँ नमस्कार! बादशाह खुद संत के आश्रम में गया और संत से कहा कि, “मेरी गलती हो गई, आप जैसे संत को मैंने सज़ा फ़रमाई, मेरी बड़ी गलती हो गई। मुझे माफ़ करना।”
तो संत कहते हैं, “जिसकी गलती हुई हो, उसकी माफ़ी हो सकती है। आपने कुछ ख़राब नहीं किया, ये तो मेरे भगवान मेरी परीक्षा कर रहे हैं कि मेरे में समभाव कितना है। तुमने कुछ नहीं किया! तुमने कुछ नहीं किया, मेरे भगवान मेरी परीक्षा कर रहे हैं। भगवान की परीक्षा में मैं उत्तीर्ण हुआ कि नहीं हुआ मुझे मालूम नहीं है। लेकिन तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। और अपराध ही नहीं है तो माफ़ी देने वाला मैं कौन?”
तो बादशाह को लगा कि ऐसा भी कोई आदमी हो सकता है कि जो कहता है कि तुमने कोई अपराध किया ही नहीं!
तो ये क्या था? मन में कोई शल्य नहीं था। मन में प्रेम ही था। ‘ये अच्छा, ये बुरा’, ऐसी बात संत के मन में नहीं। और जिसके मन में यह बात नहीं होती कि ‘यह अच्छा, यह बुरा’, उसके मन की पीड़ा ख़त्म हो गई। मंत्र मिल गया आपको मास्टर जी! आप क्या करते हो? डिवीज़न (Division) लगाते हो। ‘ये अच्छे मनुष्य, ये बुरे मनुष्य।’ अच्छे कौन? जो आपके अहंकार को पुरस्कृत करे, वे अच्छे और आपके अहंकार को नेग्लेक्ट (Neglect) करे, वे बुरे। अब निश्चित करो कि ‘मेरे प्रभु को सभी आत्माएँ प्रिय लगते हैं।’ भगवान ने सबको चाहा। भगवान ने ऐसा कहा कि, “ये आदमी है, उसको मैं नहीं चाहता हूँ, बाकी पूरी दुनिया को मैं चाहता हूँ?” ऐसा कभी कहा? “सवि जीव करू शासनरसी” सब प्राणियों को परमात्मा ने चाहा है।
अब मैं आपसे पूछूँ, परमात्मा आपको पसंद हैं? परमात्मा आपके प्रिय हैं? परमात्मा के जो प्रिय हैं, वो आपके प्रिय हैं? अब बोलो? परमात्मा तो प्रिय हैं। लेकिन परमात्मा के जो प्रिय हैं, वे सब तुम्हारे प्रिय हैं? परमात्मा को सभी आत्माएँ प्रिय थीं, तो आपको जब भी सभी आत्माएँ प्रिय लगेंगी, तब आप कह सकेंगे कि ‘प्रभु को जो प्रिय है, वो मुझे भी प्रिय है।’ ‘प्रभु ही प्रिय है’ ऐसा नहीं, ‘प्रभु को जो प्रिय है वो भी मुझे प्रिय है’, ऐसा जब हम करेंगे, तब मन की पीड़ा से हम मुक्त हो जाएँगे, हम आनंद में हो जाएँगे, प्रभु के एयर कंडीशन्ड हाथ में हम हो जाएँगे।
