प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाय
भक्त की Vocabulary में मूर्ति शब्द का अस्तित्व ही नहीं है! आप जब पूजा करने के लिए जाते हो, मूर्ति का स्पर्श करते हो या प्रभु का? बोलो तो! मंदिर में मूर्ति नहीं है, साक्षात् प्रभु वहाँ विराजमान हैं। मूर्ति तो कब तक? जयपुर से तुम लेकर आए, तब तक। जब प्राण-प्रतिष्ठा की विधि हो गई, वे परमात्मा हो गए। फिर महाविदेह में विराजमान सीमंधर परमात्मा और हमारे जिनालय में विराजमान सीमंधर परमात्मा – There is no difference.
हम लोग जो अंजनशलाका विधान करते हैं, उस में जो वैश्विक परम चेतना है, उस को हमारे मंत्रबल से, हमारे चारित्र्यबल से खींचकर मूर्ति में आरोपित करते हैं। फिर वहाँ परम चेतना का एक झरना शुरू हो जाता है। परम चेतना उस मूर्ति में प्रवेश करती है और नौ केंद्रों से बाहर बहती है। उन नौ अंगों का स्पर्श आप करोगे, तब आप को मूर्ति का नहीं, साक्षात् परम चेतना का स्पर्श मिलता है।
यशोविजय नाम का अहंकार भी रहे और अंजनशलाका भी हो – ये दो काम साथ में नहीं हो सकते। जब हम नहीं होते, तभी प्रभु आते हैं। प्रभु ही प्रभु की अंजन-विधि करते हैं; प्रभु ही प्रभु की प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं! आपके भीतर प्रभु को प्रगट करना हो, तो भी विधि यही है। केंद्र में आप खुद ही विराजमान हो; तो प्रभु आएं तो भी बैठें कहाँ?!
महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजय महाराज रचित ‘स्तवन चौबीसी’। पहला स्तवन: परमात्मा ऋषभदेव के चरणों में समर्पित प्रथम स्तवन—
“जगजीवन जगवालहो मरुदेवी नो नंदलाल रे।”
परमात्मा जीवन-दाता हैं, आनंद-दाता हैं और प्रेम के दाता हैं। परमात्मा का प्रेम जब हम स्वीकार कर सकते हैं, हम प्रभु के सम्मोहन में खो जाते हैं। ऐसा प्रभु का सम्मोहन दिल पर छा जाता है कि संसार छूट गया।
श्रीपाल रास में एक घटना आती है— राजकुमारी जिनालय में प्रभु की पूजा के लिए गई हुई है। चंदन पूजा करते समय प्रभु का स्पर्श हुआ। भक्त की डिक्शनरी (Dictionary) में, भक्त की वोकैबुलरी (Vocabulary) में ‘मूर्ति’ शब्द का अस्तित्व नहीं है। मूर्ति तो कहाँ तक? जब तक तुम जयपुर से लाए, तब तक। जब प्राण-प्रतिष्ठा की विधि हो गई, वे परमात्मा हो गए। महाविदेह में विराजमान सीमंधर परमात्मा और हमारे जिनालय में विराजमान सीमंधर परमात्मा— There is no difference. जो कार्य, जो परिणमन महाविदेह में समवसरण में हमें मिल सकता है, वही परिणमन, वही परिणति जिनालय में विराजमान सीमंधर दादा से हमें मिल सकती है।
अब पूजा करने के लिए जाते हो, मूर्ति का स्पर्श करते हो या प्रभु का? बोलो तो! चिंतामणि दादा की मूर्ति नहीं है जिनालय में, साक्षात् दादा विराजमान हैं। गोड़ीजी पार्श्वनाथ प्रभु की मूर्ति नहीं है, साक्षात् परमात्मा विराजमान हैं। हम लोग अंजनशलाका-विधान रात को करते हैं। उस समय आप वहाँ आ नहीं सकते। हम क्या करते हैं? जो वैश्विक परम चेतना है, उस वैश्विक परम चेतना को हमारे मंत्रबल से, चारित्र्यबल से खींचकर मूर्ति में हम आरोपित करते हैं। फिर एक झरना चालू होता है। यहाँ से परम चेतना एंटर (Enter) होती है और नव केंद्रों से परम चेतना बाहर निकलती है। उन नव अंगों का स्पर्श आप करोगे, तब आप परम चेतना के स्पर्श में, परम चेतना के संपर्क में आए। मूर्ति नहीं है, साक्षात् परम चेतना है।
सूरत में अंजनशलाका महोत्सव था। जिस रात को अंजनशलाका होने वाली थी, शाम, मैं मेरे पाट पर बैठा हुआ था। एक भक्त ने मुझे पूछा कि, “गुरुदेव! आप जब रात अंजनशलाका के लिए जाओगे, तब हमें तो प्रवेश मिलेगा नहीं। लेकिन उस समय आप कौन से विचारों में होंगे? आप क्या करते होंगे?” मेरे मुँह से उत्तर निकला था, मैंने सोचा नहीं था, ऐसे ही उत्तर निकल गया कि— “यशोविजय प्रभु की अंजनशलाका नहीं कर सकता। प्रभु ही प्रभु की अंजन-विधि करते हैं। प्रभु ही प्रभु की प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं। यशोविजय को उस दृश्य देखने का लाभ मिलेगा।”
कोई भी आचार्य तभी अंजनशलाका कर सकते हैं जब वे नहीं हैं। ‘मैं यशोविजय के रूप में नहीं हूँ।’ यशोविजय नाम की संघटना खत्म हुई है, तभी मैं अंजनशलाका कर सकता हूँ। यशोविजय भी रहे, यशोविजय नाम का अहंकार भी रहे, और अंजनशलाका भी हो— दो काम साथ में नहीं हो सकता। तुम नहीं हो, तो ही प्रभु आते हैं। और तुम्हारे भीतर प्राण-प्रतिष्ठा करनी हो ना, तो भी विधि यही है। तुम्हें बाहर करना पड़ेगा हमें। सेंटर से तुम्हें आउट (Out) करने पड़ेंगे। तुम सेंटर में विराजमान हो और प्रभु से कहते हो— “प्रभु पधारो, प्रभु आओ।” अरे, प्रभु आएंगे लेकिन बैठेंगे कहाँ? सिंहासन पर तो तुम चढ़कर बैठ गए हो! सिंहासन खाली करो।
तो सूत्र इतना ही है— ‘तुम नहीं, तो प्रभु हैं। तुम हो केंद्र में, तो प्रभु नहीं हैं।’ कबीरजी ने यही बात कही—
“पहले हम थे, प्रभु नहीं, अब प्रभु हैं, हम नाहीं”
क्यों? तो कबीरजी ने आगे कहा—
“प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।”
प्रेम की गली, भक्ति की गली, संकरी गली है। उसमें दोनों का प्रवेश साथ-साथ नहीं हो सकता। या तो तुम रहो, या तो प्रभु रहें। अब क्या करना है, बोलो! तुम तो रहे केंद्र में, अनंत जन्मों से। अब प्रभु को बिठाना है केंद्र में? Now choice is yours. क्या पसंदगी है तुम्हारी? तुम्हें केंद्र में रहना है, या प्रभु को केंद्र में बिठाना है?
हम इसलिए ही बैठे हैं कि तुम्हारे अहंकार को हम वहाँ से निकाल दें। उपनिषदों ने तो कहा है— “आचार्यो हि मृत्यु:।” सद्गुरु अर्थात् तुम्हारा ना होना। “आचार्यो हि मृत्यु:।” तो तुम्हारा न होना, सद्गुरु का आना। तुम्हारा ना होना, प्रभु का केंद्र में आना।
राजकुमारी प्रभु का स्पर्श कर रही है। आप मूर्ति का करते हो स्पर्श, कि प्रभु का? पूजा करके राजकुमारी बाहर निकली और गंभारे के द्वार बंद हो गए। बहुत उपाय आज़माए, लेकिन द्वार खुले ही नहीं। श्रीपाल रास में बहुत ही सुंदर चित्रण है। पूजा करके राजकुमारी गंभारे से बाहर निकलती है, तो कैसे निकलती है, उसका शब्द-चित्र वहाँ दिया गया है—
“ओसरती पाछे पगे जी, जोती जिन मुख साम।”
एक-एक पैर पीछे रखकर, प्रभु के सामने देखकर वो चलती है। प्रभु का मुख देखना इतना तो प्यारा लगता है कि पीछे हटने का भी चालू है, प्रभु के मुख को देखने का भी चालू है। इतना गहरा सम्मोहन है कि एक सेकंड प्रभु के दर्शन बिना के न हो, ऐसी हृदय में श्रद्धा! और जब बाहर निकली, गंभारे के द्वार बंद हो गए।
उस समय राजकुमारी सिसक-सिसक कर रोती है। क्या कहती है? “दादा! दरिशन दीजिए जी, ए दुःख मैं ना खमावु। प्रभु, दर्शन दो। मैं सब पीड़ाओं को सहन कर सकती हूँ, सब दुखों को मैं झेल सकती हूँ। लेकिन तुम्हारे अदर्शन की पीड़ा को मैं सहन नहीं कर पाती।” भक्त ने एक बड़ी संक्रांति की है। बड़ी संक्रांति! भक्त के पास अनगिनत दुःख पहले थे। भक्त बनने के बाद अनगिनत दुखों को, अनगिनत पीड़ाओं को एक पीड़ा में, एक दुःख में भक्त ने संक्रांत कर दिया। अब एक ही पीड़ा है, एक ही दुःख है— परमात्मा न मिलें, परमात्मा का दर्शन ना हो।
दूसरी कोई पीड़ा नहीं है। खाने का नहीं मिला, कोई पीड़ा नहीं। पीने के लिए पानी नहीं मिला, कोई बात नहीं। प्रभु न मिलें, पीड़ा ही पीड़ा! तो राजकुमारी कहती है, “दरिशन दीजिए जी, ए दुःख मैं ना खमावु। मैं ये पीड़ा को झेल नहीं पाऊँगी। मैं तुम्हारे बिना टिक नहीं पाऊँगी।” क्या ये भक्ति की धारा होगी? सोचो तो ज़रा। प्रभु के बिना एक क्षण हम रह ना पाएं। हमें लगे कि प्रभु ही हमारा जीवन हैं। यदि प्रभु नहीं हैं, तो हम नहीं हैं। भक्त कहेगा, “प्रभु हैं, तो मैं हूँ।” यदि प्रभु मेरे जीवन में नहीं हैं, तो मैं नहीं हूँ। मेरा होने का कोई अर्थ ही नहीं है।
गुलाब का पुष्प, उसमें सुगंध ही नहीं है, तो उसका गुलाब होने का अर्थ क्या है? परमात्मा ही हमारे जीवन में ना हों, तो हमारे होने का क्या अर्थ है? जर्मन कवि रिल्के (Rilke) ने एक प्रार्थना लिखी। जर्मनी में है। उसका अंग्रेजी में अनुवाद हुआ— “पुट आउट माय आईज़, इफ़ धेट कांट सी यू (Put out my eyes, if that can’t see you)।” “Put out my eyes, if that can’t see you” प्रभु, यदि मैं तुम्हें नहीं देख सकता हूँ, तो मेरी आँखें हों या ना हों, कोई फर्क नहीं। मेरे हृदय में यदि आप विराजमान नहीं हो, तो मेरा होना या ना होना, दोनों एक-सरीखा ही है। मेरे होने का क्या अर्थ है यदि तुम नहीं हो मेरे भीतर? हमें लगता है कि हमारा जीवन सार्थक हो गया, क्योंकि प्रभु हृदय-सिंहासन पर बैठ चुके हैं। और जो हमारे पास आनंद है, वो आनंद प्रभु ने दिया है।
जगजीवन! जीवन का अर्थ है आनंद। ‘आनंदो जीवनम्।’ तो प्रभु ही आनंद देते हैं। प्रभु का प्रेम आनंद में कंवर्ट (Convert) होता है। प्रभु प्रेम देते हैं, हम स्वीकारते हैं, और वह प्रेम हमारे आनंद में कंवर्ट होता है। हम २४ घंटों आनंद में ही रहते हैं। आनंद ही आनंद है। तो राजकुमारी फूट-फूट कर रो रही है— “प्रभु, तुम्हारे बिना मैं कैसे जी पाऊँगी? मेरा जीना दूभर हो गया।” और तब आकाशवाणी होती है कि “बेटी! चिंता मत करो। थोड़े ही दिन में, एक श्रेष्ठ पुरुष यहाँ आने वाला है। उसकी दृष्टि पड़ने पर ही गंभारे के द्वार खुल जाएंगे। और वह जो श्रेष्ठ पुरुष है, उसके साथ तुम लग्न-ग्रंथि से बंध जाओगी।”
राजकुमारी को लग्न के समाचार से कोई ख़ुशी नहीं है। लेकिन प्रभु के द्वार खुल जाएंगे, ये समाचार मिले, और वो उछल पड़ी! “बस, प्रभु मुझसे दूर नहीं हैं। यदि प्रभु नहीं, तो मैं नहीं। प्रभु हैं, तो मैं हूँ।” ये है सम्मोहन। ‘जगवालहो’ शब्द का अर्थ यह है कि हम सिर्फ प्रभु के सम्मोहन में ही हों। दूसरा कुछ मिले, ना मिले, कोई परवाह नहीं है। प्रभु मिलने चाहिए।
मैंने मेरे जीवन में प्रभु का सम्मोहन सबसे पहली बार जम्बूविजय महाराज में देखा था। फिर तो मैंने अनुभव भी किया सम्मोहन का। और आज मैं प्रभु के सम्मोहन की धारा में ही हूँ। और इन लोगों को मैं रोज़ कह रहा हूँ कि प्रभु के सम्मोहन में इतने खो जाओ, कि दूसरे कोई व्यक्ति की, दूसरे कोई पदार्थ की आवश्यकता ही मालूम ना हो। कुछ भी नहीं चाहिए। एक ही परमात्मा चाहिए। परमात्मा के प्रेम से यदि तुम्हारा हृदय भर गया, क्या कोई पदार्थ के प्रति तुम्हारा प्रेम बह सकता है? तुम्हारा प्रेम बह सकता है सिर्फ प्रभु के प्रति। ना कोई व्यक्ति के प्रति, ना कोई पदार्थ के प्रति। तुम्हारा प्रेम सिर्फ प्रभु के लिए ही है।
तो एक प्रभु का सम्मोहन मिल गया। प्रव्रज्या सच्ची हो गई। और जब तक सम्मोहन नहीं हुआ, तब तक प्रव्रज्या पूर्ण है, ऐसा हम नहीं कह सकते। क्योंकि प्रभु भी प्रिय हैं, दूसरा व्यक्ति भी प्रिय है, ये पदार्थ भी प्रिय है। तो प्रव्रज्या भीतर उतरी है, ऐसा हम नहीं कह सकते। प्रव्रज्या भीतर उतरी है, ऐसा तभी हम कह सकते हैं जब प्रभु के सिवा किसी के प्रति तुम्हारा आकर्षण ना हो, तुम्हारा सम्मोहन ना हो। एक ही चाहिए— प्रभु।
और मैं तो कहूँगा, दूसरे पदार्थ के प्रति, दूसरे व्यक्ति के प्रति तुम्हारा अभी आकर्षण है, इसका अर्थ यही हुआ कि परमात्मा के प्रति पूरा आकर्षण तुम्हारा नहीं है। यदि परमात्मा के प्रति पूरा आकर्षण होता, तो दूसरा तुम्हारी लाइफ में है ही नहीं। तुम्हारी डिक्शनरी में कोई व्यक्ति नहीं है, कोई पदार्थ नहीं है। सिर्फ परमात्मा ही है।
तो जम्बूविजय महाराज साहेब को मैंने शंखेश्वर में देखे था। प्रभु के पास जाते, समय को भूल जाते। शरीर को भूल जाते। कितने घंटे हुए, मालूम नहीं होता। साहेब जिनालय में गए हों, और कोई व्यक्ति बाहर से मिलने के लिए आए, तो शिष्य कह देगा कि ‘साहेबजी जिनालय में गए हैं। कब लौटेंगे, वो हमें मालूम नहीं है। ना साहेब को भी मालूम होगा, वो प्रभु को ही मालूम होगा!’ प्रभु छोड़ेंगे, तब आएंगे। तो शरीर का भान भूल जाते, समय का भान नहीं रहता। बस प्रभु में खो जाते। फिर जब उठते, तब भी खमासमण देते जाते। बाहर निकलते, अंतिम चौकी, वहाँ से प्रभु दिखते हैं, वहाँ से खमासमण देते। स्पष्ट हमें फील (Feel) हो कि प्रभु के गुरुत्वाकर्षण से वे छूट नहीं सकते। प्रभु का सम्मोहन इतना गहरा हो गया है कि वे निकल नहीं पाते। ज्यों-त्यों करके जिनालय के बाहर गए। अभी जो चौक टाइल्स (Tiles) वाला है, उस समय वहाँ रेत ही रेत थी, धूल थी। धूल में आते और प्रभु दिखते थे, तो धूल में खमासमण देते। नीचे क्या है, ऊपर क्या है, कोई बात नहीं। प्रभु हैं ना, बस!
एक दफ़े ऐसा हुआ, हमारे आचार्य भाग्येशविजय सूरि, मुनि के रूप में थे। तब शंखेश्वर में थे। और जम्बूविजय महाराज साहेब भी शंखेश्वर में थे। जम्बूविजय महाराज साहेब ने एक दिन भाग्येशविजय से कहा कि, “भाग्येशविजय! अहमदाबाद से एक मुनिराज आने वाले हैं। उनका नाम यह है। उनको प्रभु भक्ति में ज़्यादा रस है। ग्रंथ संपादन में भी उनकी कुशलता है। तो मैं उनसे मिलना चाहता हूँ। अब मैं तो बहुत व्यस्त रहता हूँ। मुझे ख्याल भी नहीं होगा कि कब वे आए और कब चले गए। तो तू ख्याल रखना। और जब वे मुनिराज आएं, तब मेरी मुलाकात करा देना।” भाग्येशविजय ने कहा, “हाँ, ज़रूर।”
ऐसे में एक दिन साहेब का विहार का प्रोग्राम निश्चित हुआ। पास का गाँव था आदरियाणा। वहाँ साहेब को जाने का हुआ। कोई प्रोग्राम आदि था। तो शाम को तीन-चार किलोमीटर जाना था, और सुबह दस किलोमीटर चलकर आदरियाणा जाना था। तो शाम को विहार घोषित हुआ। और तीन बजे गुरुदेव प्रभु के दरबार में आ गए। तीन से छह, तीन घंटे प्रभु के सामने बैठे रहे। तुम कितने घंटे बैठ सकते हो, बोलो! बस प्रभु को निहारते ही जाओ, निहारते ही जाओ। क्षण-क्षण में मुख पर अलग रूप दिखने लगेगा। कभी वीतराग दशा, कभी प्रसन्न दशा, कभी उदासीन दशा, अलग-अलग स्वरूप की झाँकी आपको मिलेगी।
तीन घंटे जम्बूविजय महाराज साहेब बैठे रहे। शिष्य अकुलाते थे, ‘अरे, चार किलोमीटर का विहार है। छह तो बज गए। कब यहाँ से निकलेंगे?’ छह बजे साहेब उठे। और फिर खमासमण देने चालू हो गए। पाँच, दस, पंद्रह, बीस, पच्चीस! जैसे-तैसे बाहर निकले। क्या कहता हूँ? जैसे-तैसे बाहर निकले। बाहर निकल सकते नहीं थे। लेकिन जाने का ही था, मज़बूरी थी। तो जैसे-तैसे बाहर निकले। अंतिम चौकी में गए, फिर खमासमण। फिर नीचे उतरे, फिर खमासमण। साढ़े छह बज गए। अब तो गुरुदेव को लगा कि ‘वहाँ पहुँचने में अँधेरा हो जाएगा। चलो जल्दी।’ निकले।
दो दिन के बाद भाग्येशविजय भी आदरियाणा पहुँचे। हमारा गाँव झिंजूवाड़ा, जन्मभूमि, वो आदरियाणा के पास में ही है। तो भाग्येशविजय को झिंजूवाड़ा जाने का था। तो आदरियाणा पहुँचे। साहेबजी को वंदन किया। तब साहेबजी ने याद दिलाया, “अरे भाग्येशविजय! वे महात्मा फिर आ गए थे अहमदाबाद से?” भाग्येशविजय आश्चर्य में पड़ गए। भाग्येशविजय ने कहा, “गुरुदेव! आपका विहार अचानक घोषित हुआ कि आज शाम को विहार है। उसी दिन वे महात्मा शंखेश्वर आए थे। उसी दिन। लेकिन ज़्यादा विहार करके आए थे।”
शंखेश्वर के नज़दीक के जो गाँव हैं ना, उन गाँवों को लाभ नहीं मिलता। क्योंकि दादा का इतना सम्मोहन होता है कि ‘अरे, बीस किलोमीटर है शंखेश्वर? चलो बीस किलोमीटर चल लें अब। कहीं रुकना नहीं है।’ तो बीस-पच्चीस किलोमीटर चलकर वे महात्मा शंखेश्वर आए थे। प्रभु का दर्शन किया। थक गए थे। भाग्येशविजय उनसे मिले कि ‘जम्बूविजय महाराज साहेब आपको मिलना चाहते हैं।’ तो उन्होंने कहा, “मुझे भी उनसे मिलना है, लेकिन आज तो मैं थका हुआ हूँ। कल मिलूँगा।”
ऐसे में समाचार मिले कि गुरुदेव का तो शाम को विहार है। और तीन बजे मंदिर में आ गए हैं। तो भाग्येशविजय ने कहा— “गुरुदेव! आप तीन बजे मंदिर में आ गए। सवा तीन बजे ये महाराज साहेब मंदिर में आए और आपके पास में बैठ गए थे। सवा तीन से छह बजे तक आपके पास, बिल्कुल पास, वो जिनालय में बैठे हुए थे। आप बाहर निकले, आपके साथी बाहर निकले। लेकिन आपका ध्यान तो प्रभु में ही था। खमासमण देते रहते थे। और लेट हो गए आप, और जल्दी निकल गए। तो महाराज साहेब आपसे कुछ कह नहीं सके। लेकिन वे आपके साथ ही थे। तो आपको पता नहीं है कि आपके साथ थे?”
तब जम्बूविजय महाराज ने कहा— “भाग्येशविजय! मैं सामने वाले को देखूँ कि पास वाले को देखूँ? मैं किसको देखूँ?” अपन किसको देखेंगे? मैं बहुत बार एक सूत्र देता हूँ। कि जिनालय में तुम गए। पंद्रह मिनट तक तुम और प्रभु दो होते हो। पंद्रह मिनट तक तुम और प्रभु दो होते हो, तीसरा कोई नहीं। और सोलहवें मिनट पर प्रभु ही होते हैं, तुम नहीं होते। जिनालय में गए। दस मिनट में बाहर निकले। किसी ने पूछा, ‘क्या सिद्धचक्र पूजन चालू हो गया? कोई लोग आए थे?’ तब आप क्या कहेंगे? ‘मैं तो मंदिर में गया, मैं और प्रभु दो ही थे। तीसरे का कोई ख्याल ही नहीं।’ होता है ऐसा?
लेकिन ये तो पंद्रह मिनट तक! सोलहवें मिनट पर क्या होगा? प्रभु ही रहेंगे, तुम नहीं। भक्त की इस मनोदशा का वर्णन आनंदघनजी भगवंत ने किया है— ‘पानी बीच पतासा’। शक्कर का बतासा होता है, शुगर क्यूब (Sugar cube) समझ लो। पानी के बीच रख दो गिलास में। एक घंटे के बाद देखो, ये शुगर क्यूब कहाँ गया? गया। वो तो पानी में घुल गया। ऐसे ही पंद्रह मिनट तक तो तुम और प्रभु दो होते हो। लेकिन दो ही, तीसरा कोई नहीं। लेकिन सोलहवें मिनट पर तो तुम होंगे ही नहीं। प्रभु होंगे। तुम गए! तुम्हारे राग, द्वेष, अहंकार सब कुछ गया। तुम गए, तुम बह गए प्रभु में। प्रभु ही रहेंगे।
तो जम्बूविजय महाराज साहेब ने कहा भाग्येशविजय से कि “मैं तो सामने वाले को देखूँ, कि पास वाले को देखूँ? सामने वाला, इसका रूप इतना कि अपनी दृष्टि को खींच ले। हम जिनालय में गए, हम दूसरी किसी चीज़ को देख नहीं सकेंगे। क्योंकि हमारी आँखें सिर्फ प्रभु पर टिकी होंगी। प्रभु, प्रभु को ही देखना है। तो ये है प्रभु का सम्मोहन। ये प्रभु का सम्मोहन मिल गया, साधना दौड़ेगी फिर। चलेगी नहीं, दौड़ेगी! अनायास तुम बह जाओगे साधना के प्रवाह में।
कलावपूर्ण सूरि दादा को तो हम सब नाम से तो पहचानते ही हैं। हमारे युग के श्रेष्ठ भक्ति-योगाचार्य! एक दिन, साहेब भुज में पधारने वाले थे। कच्छ का बड़ा नगर भुज। भुज में गुरुदेव का पदार्पण होने वाला था। इतना आनंद लोगों के मन में कि ‘गुरुदेव पधारेंगे।’ एक बात मैं आपसे पूछूँ? सद्गुरु आने वाले हैं, आपके मन में आनंद होता है। लेकिन क्यों होता है? क्यों होता है? इसलिए होता है कि सद्गुरु आएंगे और प्रभु से हमें जोड़ देंगे। इस जन्म का, इस अवतार का सार्थक्य क्या है? सार्थक्य इतना ही है कि हम प्रभु से जुड़ जाएं।
एक बात समझ लो। आप विज्ञान पढ़े हुए हो। ऑक्सीजन (Oxygen) के महासागर में हम हैं। लेकिन यदि आप प्राणायाम में निष्णात हो, तो ऑक्सीजन बिना भी दो मिनट, तीन मिनट रह सकते हो। अब तो बाबा रामदेव पूरे विश्व को योग सिखाते हैं, प्राणायाम सिखाते हैं। तो प्राणायाम आपने भी सीख लिया और उसमें निष्णात हो गए, तो बिना ऑक्सीजन आप दो मिनट, ढाई मिनट रह सकोगे। तो ऑक्सीजन के महासागर में तो हम हैं ही। लेकिन एक बात जोड़नी है आज कि परम चेतना के महासागर में भी हम हैं। बिना ऑक्सीजन एक मिनट, दो मिनट हम रह सकते हैं। लेकिन परम चेतना के बिना एक क्षण भी हम रह नहीं सकते। परम चेतना का मिलन यही है जीवन। और परम चेतना से विदा यही है हमारा मृत्यु।
तो सद्गुरु आने वाले हैं, इसका आनंद क्यों? आनंद इसलिए है कि मुझे प्रभु से जोड़ देने का काम सद्गुरु करेंगे। सद्गुरु के पास क्यों आते हो? क्या सद्गुरु की शाता पूछने के लिए? अरे हम तो साता में ही हैं। हम तो परम साता में हैं! तुम सद्गुरु के पास क्यों आते हो? क्यों आते हो? आज समझ लो, सद्गुरु के पास एक ही उद्देश्य से आना है कि “गुरुदेव मुझे प्रभु से जोड़ दो।” प्रभु न मिलें, तब तक मेरा होना न होने जैसा ही है। और प्रभु कैसे मिलते हैं? एक सद्गुरु ने कहा था— ‘तुम मिटो तो मिलना हो।’
तो सद्गुरु को एक काम यह करना है कि तुम मिट जाओ। तुम्हारा अहंकार पिघल जाए। तुम्हारा अहंकार डिलीट (Delete) हो जाए। ये काम सद्गुरु को करना है। तो सद्गुरु को दूसरा कुछ नहीं चाहिए। पाँच सौ का नोट तुम्हारे पास रखो। तुम्हारा जो अहंकार है ना, वो गुरु के चरणों में रख दो। हमें तुम्हारा कचरा चाहिए। अपनी परंपरा में एक शब्द आता है— गुरु दक्षिणा। गुरु को कुछ देना चाहिए। लेकिन क्या दोगे? गुरु तो निर्ग्रंथ हैं। पैसे तो चाहिए नहीं। आपके हीरे, मोती सब आपके पास रखो। हमें कुछ नहीं चाहिए। हमें चाहिए आपका अहंकार। ये कचरा हमें दे दो। तुम मिट जाओगे, प्रभु मिल जाएंगे। कितनी सरल बात है बोलो!
प्रभु नहीं मिलते, नहीं मिलते। क्योंकि तुम मिटते नहीं हो। क्यों नहीं मिलते? प्रभु क्यों नहीं मिलते? तुम्हें मिटना नहीं है। तुम्हें पिघलना नहीं है। और कहते हो प्रभु मिलते नहीं, प्रभु मिलते नहीं। कैसे प्रभु मिलेंगे? तुम मिट जाओ। तुम ना रहो, प्रभु रहेंगे। मैं बहुत बार कहता हूँ। हम भी प्रभु से कह दें ना कि “प्रभु! ९९% तो आपकी आज्ञा के मुताबिक हम जिएंगे, लेकिन एक प्रतिशत हमारी इच्छा से जिएंगे।” तो प्रभु कह देंगे कि, “मैं मेरी शरण में तुझे नहीं रखूँगा। गेट आउट (Get out)! शत-प्रतिशत मेरा होना है, तभी मेरे पास आओ। ९९% नहीं चलेगा।” शत-प्रतिशत अहंकार मिट जाए, हम प्रभु के हो गए। तो सद्गुरु को यह काम करना है। तुम्हारे अहंकार को लेना है। दोगे ना? हमें दूसरा कुछ नहीं चाहिए।
मैं न तो कोई उत्सव कराता हूँ। मेरे पूरे चातुर्मास में मैं एक भी पूजा पढ़ाने को लोगों को नहीं कहता हूँ। एक भी उत्सव नहीं चाहिए। बस हम रोज़ प्रभु के पास जाते हैं, ये उत्सव ही है। दूसरे कोई उत्सव हमें चाहिए नहीं। कुछ हमें नहीं चाहिए। हमें चाहिए सिर्फ तुम्हारा अहंकार। दे दो।
तो भुज में गुरुदेव कलापूर्ण सूरि दादा पधारने वाले थे। भुज के जैन लोग ही नहीं, हिंदू लोग भी इतने आनंद में थे कि ‘इतने बड़े सद्गुरु हमारे गाँव में आएंगे।’ स्वागत यात्रा शुरू हुई। उस समय आचार्य रत्नसुंदर सूरीजी भी कच्छ में थे। वे भी भुज आए थे। दादा के प्रति लोगों का जो प्रेम था, उसे देखकर रत्नसुंदर सूरीजी आश्चर्यचकित हो गए। स्वागत यात्रा पूर्ण हुई, प्रवचन हुए। बाद में रत्नसुंदर सूरीजी ने गुरुदेव से पूछा था कि, “गुरुदेव! लोग आपके पीछे इतने पागल क्यों हो रहे हैं? मैंने आज ही देखा, कितने लोग पागल हैं आपकी भक्ति के लिए। तो क्या है आपके पास?”
तब गुरुदेव ने कहा रत्नसुंदर सूरी से कि, “तुम भी प्रभु के पीछे पागल हो जाओ, लोग तुम्हारे पीछे पागल हो जाएंगे!” जो प्रभु के पीछे पागल हो गया, फिर दुनिया पागल हो ही जाएगी। लेकिन ना तो उसकी तनिक इच्छा है, ना उसकी दृष्टि है कि लोग मेरे पीछे-पीछे आएं। उसकी दृष्टि सिर्फ प्रभु के सम्मुख टिकी हुई होती है। तो ये है प्रभु का सम्मोहन। प्रभु को देखना है, ऐसा नहीं। ‘प्रभु को ही देखना है’। बस इतना ही!
मैं आपको देखूँगा ना, तो आप में जो सिद्ध परमात्मा है, उसको मैं देखता हूँ। और इसलिए रहीम की एक पंक्ति मुझे बहुत याद आती है। रहीम ने कहा—
“प्रीतम छबि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय!”
प्रियतम की, वो परम प्यारे चिंतामणि दादा की या गोड़ीजी दादा की छवि, जिसकी आँखों में पड़ गई, जिसके हृदय में पड़ गई, उन आँखों में, उस हृदय में प्रभु के सिवा कुछ भी नहीं होता। तो तुम्हारी आँखों में मैं प्रभु को देख रहा हूँ। तो मैं प्रभु को ही देखता हूँ। मेरे सामने कोई भी व्यक्ति आता है, मैं उस व्यक्ति में स्थित सिद्धात्मा को देखता हूँ। मैं आपको भी झुकता हूँ। आपको मालूम है? मैं नमस्कार महामंत्र बोलता हूँ— “नमो सिद्धाणं।” तब आपको भी नमस्कार हो जाता है। आप सब भविष्य के सिद्ध आत्मा हैं। भूतकाल के सिद्धों को मैं नमस्कार करता हूँ। वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र से जो भी सिद्ध भगवंत होते हैं, उन्हें मेरा नमस्कार है। तो भविष्य में आप सब सिद्ध होने वाले हैं, आपको भी मेरा नमस्कार। तो सम्मोहन का अर्थ यह हुआ— प्रभु को देखना नहीं, ‘प्रभु को ही देखना है’।
