Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 14-08-2026 | Pune Chaturmas

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कायशल्यातीत

काया की पीड़ा के शल्य से बचने के लिए हम प्रभु के पास समाधि माँगते हैं। रोग से मुक्ति हम प्रभु से नहीं माँगते हैं, लेकिन समाधि माँगते हैं कि, “प्रभु! मैंने पूर्व में कर्म किए हैं, उन कर्मों के कारण, असाता वेदनीय कर्म के कारण रोग तो आएँगे ही; लेकिन रोग की अवस्था में भी मैं समाधि में रह सकूँ, ऐसा वरदान तू मुझे दे!”

हमारी काया के द्वारा भी हमें किसी को पीड़ित नहीं करना है। रस्ते पर चलते समय हमारा आशय होना चाहिए की हमारे चलने से कोई भी जीव पीड़ित न हो। इसलिए हमें नीचे देखकर ईर्या समिति पूर्वक चलना चाहिए।

हमारी काया से और भी कितनी सारी विराधना होती रहती है? विराधना जितनी होती है, अगर उससे ज़्यादा आराधना हो, तो ही प्रायश्चित्त होगा, Balance होगा। प्रभु की आज्ञा में 24 घंटों रहने का हो, मन और शरीर जितना हो सके, प्रभु की आज्ञा में ओत-प्रोत रहे, तभी विराधना भी आराधना में बदल सकती है।


महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराज रचित स्तवना २४, प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति:
“जगजीवन जगवाल हो, मरुदेवी नन्दलाल रे।”
परमात्मा ऋषभदेव की माता का नाम था मरुदेवा माता। और प्रभु महावीर की माता का नाम था त्रिशला— त्रिशल्यातीता! माताजी तीन शल्यों से रहित थीं। एक साधना त्रिशला माता का नामने हमें देता है और यह साधना यह है कि किसी भी साधक को तीन शल्यों से ऊपर जाना ही चाहिए। जहाँ तक मन में पीड़ा है, काया में पीड़ा है, हमारा ज्ञान वहाँ आकृष्ट होगा और हम धर्म आराधना सुचारु रूप से नहीं कर सकेंगे।
इसलिए प्रभु के पास हम समाधि माँगते हैं। रोग से मुक्ति हम प्रभु से नहीं माँगते हैं, लेकिन समाधि माँगते हैं कि, “प्रभु! मैंने पूर्व में कर्म किए हैं, उन कर्मों के कारण, अशाता वेदनीय कर्म के कारण रोग तो आएँगे ही, लेकिन रोग की अवस्था में भी मैं समाधि में रह सकूँ, ऐसा वरदान तू मुझे दे!”
“आरोग्ग-बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु।”
वहाँ जो आरोग्य की बात है, वो भाव-आरोग्य की बात है। भाव-आरोग्य का मतलब ये हुआ कि रोग शरीर में है, मैं तो निरोगी ही हूँ! रोग कहाँ पर है? शरीर में है, हमारे में नहीं।
नेमिसूरिजी महाराज के समुदाय के आचार्य, धर्मधुरंधर सूरि महाराज बड़े ज्ञानी थे। साहिबजी अहमदाबाद में विराजमान थे। साहिबजी को कैंसर (Cancer) हुआ था। ये ५० साल पहले की घटना है, उस समय कैंसर के लिए ऐसी दवाई भी नहीं थी। साहिबजी पेन किलर (Pain killer) शाम को चौविहार के समय पर लेते, तीन घंटे उसका असर रहता। बाद में जो वेदना होती, वो तो साहेब ही सहन कर सकते। उस समय मेरा अहमदाबाद जाने का हुआ। मैं सुबह गुरुदेव के पास गया। साहिबजी ने नवकारशी का पच्चक्खाण पार लिया था। दूध के साथ पेन किलर भी ले लिया था।
मैंने पूछा, “साहिबजी! आपको कैंसर हो गया?”
तो मुझे झाड़ने लगे! उन्होंने कहा, “यशोविजय! तू बोल रहा है मुझे कैंसर हुआ है? मेरे शरीर को हुआ है! मैं तो निरोगी हूँ। मैं तो आनंदघन हूँ! रोग शरीर में है और शरीर तो यूँ भी जाने वाला है। हम आनंदघन हैं!”
क्या मुस्कान थी चेहरे पर! कोई पीड़ा नहीं थी। पीड़ा शरीर में थी, लेकिन मन में समाधि थी। तो हमें भी प्रभु के पास यही माँगना है कि, “प्रभु! मेरे कर्म के उदय से रोग तो आएँगे, लेकिन रोग की क्षणों में भी मैं प्रसन्न रह सकूँ, ऐसा वरदान मुझे दो। ऐसी कृपा मुझ पर बरसाओ।”
तो त्रिशला माता का नाम एक साधना हमें देता है कि हर साधक को शल्यों से पर होना चाहिए, पीड़ाओं से पर होना चाहिए। पीड़ा शरीर में है, तो है। मन में पीड़ा नहीं चाहिए। मन में आनंद, मन में समाधि!
तो मन का शल्य कैसे निकले, वो हमने देखा। मन की पीड़ा यही है— कोई आगे बढ़ गया, ईर्ष्या का भाव आ गया। शरीर के प्रति ममत्व का भाव आ गया, और पीड़ा आ गई। हम उस भाव से पर हों कि ‘मैं शरीर में रहता हूँ, लेकिन शरीर मैं नहीं हूँ, शरीर तो मेरा घर है।’ विनोबा भावे अंतिम क्षणों में अपने लिए ‘मैं’ शब्द का प्रयोग नहीं करते थे। अपन हिंदी में संत के लिए ‘बाबा’ शब्द का प्रयोग करते हैं। तो विनोबा जी प्रवचन में कहते, “आज सुबह बाबा ने ऐसा सोचा था।” ‘मैंने सोचा था’— इस शरीर को थर्ड पर्सन (Third person) में रख दिया। फर्स्ट पर्सन (First person) में से थर्ड पर्सन! “बाबा ने ऐसा सोचा, मैंने नहीं।” ‘मैं’ शब्द का प्रयोग कब होता है? जब हम आनंदघन चैतन्य के लिए प्रयोग करते हैं, तब कह सकते हैं कि “मैं आनंदघन चैतन्य हूँ!” “ये तो मैं हूँ ही नहीं!” तो विनोबा जी कहते, “बाबा ने ऐसा सोचा, बाबा ने ऐसा कहा था, मैंने कहा था— नहीं।”
ऐसे ही एक साधक हो गए स्वामी राम। एक दिन स्वामी राम बाहर से आश्रम में आए, मुस्कुराते थे। यूँ भी संत तो मुस्कुराते ही रहते हैं, संत आनंद में रहते हैं। और संत के भक्त? बोलो तो! हम आनंद में और हमारे भक्त पीड़ा में, ये चल सकता है? आप भी आनंद में रहो। तो संत आश्रम में आए, मुस्कुराते थे। शिष्य-वृंद से कहा कि, “आज तो मज़ा आ गया! आज तो मज़ा आ गया! मैं बाहर गया था। एक आदमी राम को गालियाँ दे रहा था और मैं देख रहा था!” अपने लिए स्वामी राम ‘राम’ शब्द का प्रयोग करते। ‘में’ शब्द का नहीं। ‘एक व्यक्ति राम को गालियाँ दे रहा था और मैं देख रहा था, मज़ा आ गया!’
तो एक त्रिकोण बनाया। एक गाली देने वाला, एक गाली खाने वाला – शरीर, और एक गाली को देखने वाला! आपका नंबर कहाँ आता है बोलो? गाली खाने वाले में कि गाली देखने वाले में? आपका नंबर कहाँ है? सुबह आपने चाय-नाश्ता किया, मासक्षमण है या आयंबिल की ओलीजी है, उनकी बात छोड़ो। आपने चाय-नाश्ता किया, चाय अच्छी थी। मन में एक भाव आया— “टेस्टी (Tasty) चाय! मज़ेदार चाय!” चाय के प्रति राग हुआ। अब एक द्वंद्व खड़ा कर रहा है। एक मन चाय पर राग कर रहा है, दूसरा मन उस राग को देख रहा है— ‘मुझे चाय पर आसक्ति हो रही है।’ ऐसा देखने वाला एक मन चाहिए!
चिदानंद जी महाराज ने रूपस्थ ध्यान की बात कही। रूपस्थ ध्यान के पद में उन्होंने कहा:
“रहत विकार स्वरूप निहारी, ताकी संगत मनसा धारी।
निज गुण अंश लहे जब कोय, प्रथम भेद तिणे अवसर होय॥”
चार प्रकार के ध्यान हैं: पदस्थ, पिंडस्थ, रूपस्थ, रूपातीत। तो पहला है रूपस्थ ध्यान। तो उसकी व्याख्या में कहते हैं कि “रहत विकार स्वरूप निहारी!” ये बहुत ही सरल चीज़ है। परमात्मा का दर्शन शायद दुष्कर है, शायद मुश्किल है। कैसे प्रभु का दर्शन हम करें? जब तक सद्गुरु हमारा तीसरा नेत्र खोल न दें, तब तक हम प्रभु का दर्शन कैसे करें? तो प्रभु का दर्शन मुश्किल घटना है। लेकिन तुम्हारे भीतर राग पनपा या क्रोध पनपा, उस राग को या उस क्रोध को देखना सरल नहीं है? क्रोध को दूर करने की बात नहीं है अभी, क्रोध को देखने की बात है। ‘मुझे क्रोध आ रहा है’, तो एक क्रोध करने वाला होगा, एक क्रोध को देखने वाला। और ये बड़ी गहरी बात है। हम ध्यान के सेशन (Session) में ये बात करेंगे। ये बड़ी गहरी बात है।
जब ‘देखने वाला’ पैदा होता है, तब दूरी हो जाती है। मैं इस सिंहासन को देख रहा हूँ, तो सिंहासन दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। देखने वाला हु। अब देखने वाला और देखने लायक चीज़, दो एक होंगे कभी? मैं और सिंहासन एक होऊंगा? ये तो जड़ है, मैं चेतन हूँ। तो जब तुम विचार को भी देखते हो, तब विचार तुम्हारा स्वभाव नहीं रहता, विचार दूर की घटना हो जाती है। राग के विचार आए, राग के विचार को आपने देखे, तो क्या हुआ? राग के विचार अलग हो गए, आप अलग हो गए!
निश्चय दृष्टि से मेरे में और आप में राग-द्वेष है ही नहीं। आठ रुचक प्रदेश बिल्कुल निर्मल होते हैं। और वहाँ न तो राग है न द्वेष है। तो हमारे स्वरूप में राग-द्वेष नहीं है। लेकिन राग-द्वेष है कहाँ तक? मन तक, चित्त तक, लेश्या तक। हमारे स्वरूप में राग नहीं। हमारा स्वरूप तो बिल्कुल निर्मल ही है। केवलज्ञान हमें प्राप्त होगा, मोक्ष हमें प्राप्त होगा, तो बाहर से केवलज्ञान नहीं आएगा, बाहर से मोक्ष नहीं आएगा। मोक्ष हम में ही है! तो ये निर्मलता हमारे पास अभी भी है, लेकिन हम उस निर्मलता का अनुभव नहीं कर सकते। पूरी साधना इस निर्मलता के अनुभव के लिए है। मेरा मन कर्मों से मलिन है, राग-द्वेष से युक्त है, वे राग और द्वेष और अहंकार कैसे शिथिल हों ये देखना, और राग-द्वेष, इस अहंकार को शिथिल करना, यही तो साधना है! यही साधना है।
तो “रहत विकार स्वरूप निहारी।” चाय पीते हैं, टेस्टी चाय है। चाय से राग हो गया, आसक्ति हुई। उस आसक्ति को देखो। तो देखने से क्या होगा? देखने से होगा क्या कि आसक्ति तुमसे अलग हो जाएगी। आसक्ति दृश्य है, तुम दृष्टा हो। राग दृश्य है, तुम दृष्टा हो। अलग होंगे। तो संडे (Sunday) को यही बात हम करेंगे कि ध्यान में कैसे भीतर उतरना? पदस्थ ध्यान, पिंडस्थ ध्यान, रूपस्थ ध्यान, रूपातीत ध्यान, कैसे उतरना?
कल हम वचन-शल्य की बात करते थे कि ऐसा कोई वचन कभी भी प्रयुक्त नहीं करना जिससे दूसरों को पीड़ा हो। और इसलिए एक बात कही थी ‘अजपाजाप’। कि मन में एक जाप, एक नाद सतत गूँजता ही रहे। गुरु ने आपको ‘अर्हम्’ पद दिया तो ‘अर्हम्, अर्हम्, अर्हम्, अर्हम्…’ बस गूँजता ही रहेगा। आप कोई भी क्रिया करते हो, भीतर ये नाद चालू ही रहेगा।
आचार्य विनोबा भावे की दिल्ली में पत्रकार परिषद थी। देश के और विदेश के जाने-माने पत्रकार आए थे। बहुत पत्रकार आचार्य विनोबा जी से प्रश्न पूछना चाहते थे। तो सबको नंबर दिया गया था— पहला नंबर इसका, दूसरा नंबर इसका। तीन प्रश्न पूछे गए विनोबा जी से, और विनोबा जी बिल्कुल प्रेम से उत्तर देते रहे। विनोबा बड़े प्यारे थे। चौथा पत्रकार खड़ा हुआ, और उसने कहा, “विनोबा जी! आपने तीन प्रश्नों के उत्तर दिए, अब मैं चौथा प्रश्न पूछने के लिए जा रहा हूँ। लेकिन तीसरे का उत्तर पूरा हुआ और मैं खड़ा हुआ, बीच में जो पाँच सेकंड (Second) लगे, उसमें आपने क्या सोचा?”
ऐसी पत्रकार परिषद, जाने-माने पत्रकार आए हुए हैं! लेकिन विनोबा भक्त थे। और जो भी भक्त होते हैं, वे कभी भी मुश्किल में होते ही नहीं, आनंद में ही होते हैं। तो विनोबा जी ने कहा कि, “बीच में जो सेकंड हुए, उसमें मेरा जाप चालू है! नाम स्मरण, मेरे गुरु ने ‘राम हरि’ मंत्र दिया है, उसका स्मरण, उसका रटण चालू है। तुम नहीं पूछोगे, तब तक रटण चालू ही रहेगा।”
तो वचन की पीड़ा से मुक्त होने के लिए अजपाजप बहुत ही श्रेष्ठ उपाय है।
अब काया का शल्य। तीसरा, हमारी काया के द्वारा हम किसी को भी पीड़ित ना करें। इसलिए आप पौषध में आएँगे, या उपधान में जाएँगे, ईर्यासमिति पूर्वक चलेंगे। रास्ते में छोटे-छोटे जंतु है, वे भी पीड़ित ना हों, ये हमारी धारणा है। एक साधु चलते हैं और आप चलते हैं, कितना फर्क होता है? हम नीचे देख कर चलेंगे कि एक भी जंतु को पीड़ा ना हो। आपका आशय यही होगा कि, “ऐसे चलु मुझे तकलीफ़ ना पड़े, दूसरों का जो भी हो ना हो!” तो हमारी काया के द्वारा हम किसी को भी पीड़ा ना पहुँचाएँ।
एक बहुत सुंदर घटना समरादित्य कथा में आती है। एक मुनिराज जंगल में कायोत्सर्ग ध्यान में खड़े हैं, और एक महिला वहाँ आती है। महिला को पूर्व जन्म से वैरानुबंध चल रहा है। क्रोध के दो स्वरूप हैं मुख्य, एक तो कार्याधारित क्रोध, एक व्यक्ति-आधारित क्रोध। कार्याधारित द्वेष में क्या होता है? आपका नौकर ही है, गलत काम उसने किया, आपको गुस्सा आ जाएगा। लेकिन वो गुस्सा नौकर पर नहीं है, नौकर ने जो गलत काम किया है उस पर है। तो तुम प्रेम से उसे समझाओ कि, “भैया! अब से ऐसा नहीं करने का।” तो ये तो कार्याधारित द्वेष हुआ, ऐसा तो होता ही रहता है। श्राविका ने कुछ गलत किया, आपको गुस्सा आ गया। लेकिन कार्याधारित द्वेष जो भी है, वो आधे घंटे में, पौने घंटे में मिट जाएगा, शांत हो जाएगा।
दूसरा द्वेष है व्यक्ति-आधारित। ये बहुत ही ख़तरनाक है! एक व्यक्ति पर तुम में द्वेष हो गया कि, “ये व्यक्ति निकम्मा है, ये व्यक्ति नालायक है, ये व्यक्ति अधम से भी अधम है!”
एक बात कहूँ बीच में? अधम कौन है? हम हि तो अधम हैं! दूसरा कौन है?
सूरदास जी जैसे भक्त ने कहा प्रभु से:
“मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जिन तनु दियो सोहि बिसरायो, ऐसो निमक हरामी ॥”
सूरदास जी कहते हैं— “मो सम कौन कुटिल खल कामी?” मेरे जैसा कुटिल, वक्र स्वभाव वाला, कोई सरल कहे तो भी मैं उसे दूसरे रूप में समझने वाला, खल यानी कि दुष्ट, कामी अर्थात सेक्सी (Sexy)… “मो सम कौन कुटिल खल कामी?” मेरे जैसा कुटिल, दुष्ट और सेक्सी आदमी कौन है? कोई नहीं होगा! अधम से अधम मे हि हु! प्रभु से कन्फेशन (Confession) करते तीन बात कही: कुटिल अर्थात वक्र, खल यानी कि दुष्ट, कामी अर्थात सेक्सि। और चौथी बात तो इससे भी अधिक है! चौथी बात में क्या कहते हैं? “जिन तनु दियो सोहि बिसरायो।” जिस परमात्मा ने मुझे शरीर देकर मनुष्य जन्म में भेजा, उस परमात्मा को मैं भूल गया! मनुष्य जन्म प्रभु की कृपा से मिला, ये इंद्रियाँ प्रभु की कृपा से मिलीं, मन और बुद्धि प्रभु की कृपा से मिली… क्योंकि पुण्य से मिला, लेकिन पुण्य पर स्वामित्व प्रभु का है। “जिन तनु दियो सोहि बिसरायो”— जिन परमात्मा ने मुझे शरीर देकर यहाँ भेजा, उस परमात्मा को मैं भूल गया! “ऐसो निमक हरामी!” मैं निमक हरामी हूँ! जिसका लून खाया, उसके प्रति भी विश्वस्त ना रह सका। तो सच बात तो यह है कि अधम से अधम तो हम ही हैं, दूसरा कोई है ही नहीं।
मैं बहुत बार हँसते-हँसते कहता हूँ, गुण को देखो, सभी के गुण को देखो। लेकिन कभी-कभी दोष देखने की इच्छा हो जाए… हो जाए? रोज़ मिठाई खाते हो, तो फिर नमकीन की इच्छा हो जाए, तो दोष देखने की इच्छा हो जाए, तो भीतर झाँक लेना। दोषों का भंडार है यहाँ! हमारा शरीर, हमारा मन क्या है? दोषों का भंडार, दोषों का ख़ज़ाना!
तो अपन बात करते थे, व्यक्ति-आधारित द्वेष। किसी व्यक्ति पर द्वेष हो गया कि, “ये अधम से भी अधम है ये, निकम्मा है, ऐसा है, वैसा है…” अब व्यक्ति पर जो द्वेष हो गया, और तुमने उसे निकाला नहीं, तो कितने जन्म तक ये वैर की प्रक्रिया चलेगी? ज्ञानी भगवंत हि कह सकते हैं, हम नहीं कह सकते। पर्युषण पर्व, सांवत्सरिक महापर्व, सबसे श्रेष्ठ पर्व क्यों है? मौन एकादशी भी आती है, ज्ञान पंचमी भी आती है, लेकिन सांवत्सरिक पर्व ये हमारे लिए श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ पर्व है, क्यू? क्योंकि ये आत्म-विशुद्धि का पर्व है। आप सबको ‘मिच्छामि दुक्कडं’ कहे, सबकी आप क्षमा-याचना करते हो। सांवत्सरिक महापर्व का प्रतिक्रमण हो, फिर किसी के साथ वैर नहीं। पर्युषण के पहले दिन या उससे भी पहले दिन, एकादशी को, द्वादशी से…पर्युषण इस साल भी शुरू होगा। एकादशी के दिन किसी ने कुछ कहा, अब पाँचम को याद रखेंगे, “तूने पर्युषण के पहले यह कहा था!” तो आपका पर्युषण सफल या असफल, बोलो?
एक आदमी तीर्थ यात्रा पे गया था। जेब कट गई, पैसे सब गए। अब तीर्थ यात्रा पूरी करके घर पर आना है, पैसे तो चाहिए। एक मित्र साथ में था, उससे २५,००० रूपिये ले लिए। घर पर आ गया और मित्र को २५,००० ब्याज के साथ दे दिए। हिसाब क्लोज़ (Close) हो गया। और वो मित्र एक पार्टी (Party) में, रिसेप्शन (Reception) में मिला और उससे कहा, “वो २५,००० कब देंगे आप?”
आप होंगे तो क्या कहेंगे? “२५,००० ब्याज के साथ तो दे दिया, फिर कैसे तू माँग रहा है? मैंने दे दिया!”
अब पर्युषण के पहले किसी ने कुछ कहा था, आपने मिच्छामि दुक्कडं दे दिया, फिर आप कैसे याद कर सकते हैं? “तूने ऐसा कहा था!” आपने क्षमा-याचना कर ली, फिर आप कैसे कह सकते हैं कि “तूने ऐसा कहा था?” तो व्यक्ति-आधारित द्वेष ना हो, इसलिए सांवत्सरिक महापर्व है। की एक व्यक्ति के साथ ११ महीने तक क्रोध रहा, लेकिन सांवत्सरिक महापर्व आया, सब डिलीट (Delete) हो गया। लेकिन डिलीट नहीं करोगे, और व्यक्ति-आधारित द्वेष रह जाएगा, तो क्या होगा? जन्म-जन्म तक ये वैर की परंपरा चलेगी।
समरादित्य कथा में यही वैर की अनुबंध की कथा चलती है। तो ये जो महिला थी, उसको मुनिराज को देखकर भीतर द्वेष की ज्वाला उठी। अब मुनि का शरीर, मुनि की काया को, एक साध्वी जी की काया को हम धर्म काया कहते हैं। धर्म काया! जिस काया से सिर्फ धर्म ही हो, आराधना ही हो, ऐसी काया! इस काया को देखकर आपको तो कितना अहोभाव आता है? अहोभाव तो आता है? आता ही है, मैं कहता हूँ आपको आता है। लेकिन ईर्ष्या नहीं आती है। आज माताओं से पूछो, ये हमारे छोटे महाराज साहब हैं, उनको देखकर तुम्हारे मन में ये भावना होती है कि, ‘मेरा भी एक नन्हा-मुन्ना छोटा सा बच्चा परमात्मा के शासन को भेट हो जाए।’ ऐसी भावना होती है? एक बात मैं आपकी ओर से कहूँ? समर्पण की भावना आपके हृदय में कूट-कूट कर भरी हुई है। जैसा समर्पण जैनों के पास है, शायद ही ऐसा समर्पण कही अन्यत्र मिले! पैसे कमाए, एक ही भावना— “पहले प्रभु के लिए सोने का मुकुट बनावु, ज़्यादा पैसा बढ़े एक उपधान करावु, एक संघ करावु, एक जिनालय नया निर्मित करु।” लोग इतने भावुक हैं। श्रीमंत भी हुए है, भावुक भी हुए है। मेरे पास पाँच-पाँच साल की बुकिंग (Booking) है। उपधान का, संघ का। अभी तो बुकिंग नहीं करता हूँ। लेकिन लोग इतने भावुक हैं! शायद मुझे उपधान कराना है और उसे ये भी ख्याल है कि साहब के पास कराना है, तो पाँच वर्ष तो प्रतीक्षा करनी होगी। पाँच वर्ष के बाद नंबर लगे तो भी कहता है, “साहब नाम लिख लो, मेरा नाम लिख लो बस।”
तो मुनिराज की काया, धर्म काया! उसे देखकर भी उस महिला को द्वेष की ज्वाला मन में उत्पन्न हुई कि ‘उसे मार डालो! मुनि को मार डालो!’ इस जन्म में कोई संबंध भी नहीं है, पहली बार देखते हैं, बस यही बात! जन्म-जन्म से वैर की प्रक्रिया चली आती है। फिर उस महिला ने क्या किया? जंगल का मामला था, लकड़ी तो बहुत थी वहाँ। लकड़ी लाई, मुनिराज खड़े थे, तो लकड़ी का ढेर किया, चिंगारी लगाई, और मुनिराज का देह आग में झुलसने लगा। पीड़ाएँ तो तरह-तरह की होती हैं, लेकिन आग में झुलसने की पीड़ा भयंकर पीड़ा होती है। पूरा शरीर आग में झुलस रहा है। लेकिन ये मुनिराज हैं। मुनि बनने का अर्थ क्या है? सबके प्रति स्नेह! तो मुनि को यह विचार में नहीं आता है कि किसी ने आग लगाई, ये विचार में नहीं आता है।
विचार क्या आते हैं? “नमो सिद्धाणं! सिद्ध परमात्मा को नमन, जिनके पास शरीर नहीं। मेरा शरीर अभी विराधना का केंद्र बन गया! अग्निकाय के आत्मा की कितनी यहाँ विराधित हो रहे है? कोई लकड़ी भीगी होगी, सूखी होगी, तो वनस्पतिकाय की भी विराधना होती है, पवन लगता है तो वायुकाय की भी विराधना होती है। अग्निकाय की विराधना, वायुकाय की विराधना, वनस्पतिकाय की विराधना… मेरा शरीर अभी विराधना का केंद्र बना है!” ये विचार मुनिराज को आते हैं।
और इसके सामने हम देखें, हमारी काया! कितनी विराधना होती है? हम भी सोचते हैं कि हमारी काया से भी विराधना तो होती ही है। अब विराधना जितनी होती है, उससे ज़्यादा आराधना हो, तो भी पुष्टालंबन होगा। विराधना तो बहुत होती है शरीर से, लेकिन इससे ज़्यादा आराधना होती है। प्रभु की आज्ञा में २४ घंटों रहने का हो, तो विराधना भी आराधना में बदल जाए। लेकिन मन और शरीर जितना बन सके, उतना प्रभु की आज्ञा में ओत-प्रोत हो। आप पूजा के लिए स्नान करने के लिए जाते हो। श्राद्ध विधि जैसे ग्रंथों में स्नान की भी विधि आती है— कम से कम पानी से कैसे आप शरीर की शुद्धि कर सकते हो। और पहले का तो युग था, घर, बड़ा आँगन, थाल में स्नान कर लिया और पानी आँगन में बिखेर लिया, कहीं कोई गटर में जाने की बात नहीं। कोई विराधना की दूसरी बात नहीं। लेकिन आप तो अब विराधना में ही बैठे है। तो बस सोचना यही है कि विराधना तो होती है काया के द्वारा, लेकिन जितनी बन सके उतनी आराधनाएँ बढ़ानी हैं। आराधना जितनी बढ़ जाएगी, तो विराधना का पाप कम हो जाएगा।
और आराधना का आनंद! क्या आनंद होता है आराधना में! एक घटना मैं कहूँ। अहमदाबाद, कालुशी की पोल में एक श्रावकजी रहते थे। बड़े ही धर्मिष्ठ! रोज़ ठाम चौविहार एकासना, पुरीमुठ के पच्चक्खाण से! बैठ के खाना और पीना दोनों साथ में। एकासना पूरा हुआ, पानी भी पूरा, कल पानी मिलेगा। ठाम-चौविहार एकासना, अहमदाबाद की गर्मी, उनाले में (गर्मियों में) ४५-४८ डिग्री! और उस समय बिना पानी, पूरी दोपहर, पूरी रात निकालनी, लेकिन आनंद था। ऐसे में एक दिन पूज्यपाद आचार्य भगवंत भुवनभानुसूरी महाराज साहब अहमदाबाद में पधारे। और साहिबजी अहमदाबाद कालुशी की पोल के ही, पहले संसार में रहने वाले हैं। तो कालुशी की पोल के लोगों ने कहा कि, “साहिबजी! हमारे वहाँ तो आना ही पड़ेगा एक-दो दिन के लिए।” साहिबजी कैसे मना करें? साहिबजी पधारे, व्याख्यान हुआ।
उस श्रावक जी को साहिबजी पहचानते थे। ये ठाम-चौविहार वाले, उत्कृष्ट श्रावक जीवन जीने वाले, उपाश्रय में ही रहते, पाँच-सात-दस सामायिक रोज़ करते, घर पर तो खाने के लिए जाने का। तो श्रावक जी ने कहा, “गुरुदेव! मेरे वहाँ पगलिया आपका?” गुरुदेव ने हाँ कहा। गुरुदेव पधारे, गोचरी हो गई। साहिबजी पाट पर विराजमान हुए, मंगलाचरण किया, उपदेश दिया।
तब उस श्रावक जी की धर्मपत्नी ने कहा कि, “साहिबजी! आप कुछ उनको कहो। आप तो संसार में भी साथ में ही थे, पढ़ते थे, लिखते थे, आपके तो मित्र हैं, तो आप कुछ कहो कि शरीर भी ज़रूरी तो है ना आराधना के लिए? ठाम चौविहार एकासना करते हैं, मैं भी मना नहीं करती, लेकिन तीन द्रव्य लेते हैं— रोटी, मूँग की दाल, और ममरा। तीन ही वस्तु! एक भी मिठाई नहीं! साहिबजी ऐसे तो शरीर कैसे चल सकता है?”
उस समय श्रावक जी कहते हैं श्राविका से— “कौन पधारे हैं? गुरुदेव पधारे हैं! त्याग की मूर्ति हैं! तो त्याग की बात करनी चाहिए, की भोग की बात करनी चाहिए?”
और जो घटना घटित हुई आप हैरान हो जाओगे सुनकर। श्रावक जी ने कहा, “गुरुदेव! रोटी और दाल दो पर्याप्त हैं। ममरा तो खाली स्वाद के लिए लेता हूँ। आज आप पधारे हैं, कुछ आपके चरणों में समर्पित करना चाहिए। ममरे की आजीवन त्याग की प्रतिज्ञा!” श्राविका क्या कहे? और बाद में आजीवन रोटी और दाल से ठाम-चौविहार, एकासना!
लेकिन ये आराधना का आनंद! ये नहीं था— “मुझे त्याग करना पड़ा है, मुझे छोड़ना पड़ा है।” ये बात नहीं थी। कितना सुंदर प्रभु का शासन मिल गया!
त्याग और वैराग्य की बात यहाँ पर इतनी सुंदर है! कितना त्याग! अपने वहाँ जो त्याग है, आज तो दीक्षा का युग है। एमबीए (MBA) पढ़े हुए युवा, एमबीए पढ़ी हुई युवतियाँ आज दीक्षा ले रही हैं। ऐसा नहीं छोटे बच्चे दीक्षा ले रहे हैं, युवा, सब कुछ संसार को समझने वाले, संसार को असार समझकर दीक्षा ले रहे हैं। ऐसा त्याग और वैराग्य का युग आया है। कोई कहता है ज़माना कैसा है? मैं कहता हूँ युग बहुत सुंदर है! त्याग का युग है, वैराग्य का युग है, भक्ति का युग है! तपश्चर्या कितनी बड़ी, दीक्षाएँ कितनी बड़ी, दान-धर्म कितना बड़ा! हर साल परम पावन शत्रुंजय तीर्थ पर संघ लेकर ८० से १०० संघ आते हैं। १०० संघ हर साल पालीताणा में! बस लोगों की भक्ति बढ़ी, इसलिए मैं तो श्रद्धावादी हूँ। मैं निराशावादी हूँ ही नहीं। मैं आशावादी हूँ, श्रद्धावादी हूँ। आपके ऊपर मेरी श्रद्धा है। आज का युवान मेरे पास आता है, मुझे उस पर श्रद्धा है। Genz पर मुझे श्रद्धा है। ये फ्रैंक (Frank) है, ये समझता है। उसे लॉजिकली (Logically) समझाओ, समझ जाएगा, वो बुद्धिशाली है।
तो आप बुद्धिशाली भी हैं, श्रद्धावान भी हैं, और आपके ऊपर मेरी श्रद्धा है। इसलिए एक सुंदर युग में हम जी रहे हैं, ऐसी आराधना करें और आराधना का आनंद प्राप्त करें कि तीनों पीड़ाओं से हम मुक्त हो जाएँ। और हमारे मन में भी आनंद हो, वचन में भी आनंद हो, काया में भी आनंद हो, हम भी त्रिशल्यातीत हो जाएँ!

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