Prabhu Ke Prem Ki Anubhuti | 13-08-2026 | Pune Chaturmas

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हितं मितं पथ्यं सत्यम्

जिनशासन में निश्चय से प्रवेश उसका ही कहा जाता है जिसमें किसी और को देखकर जलन पैदा नहीं होती है। प्रभु का शासन आपको मिला है, तो आप दूसरों की संपत्ति या गुण-संपत्ति को देखकर जलते नहीं है; अनुमोदना करते हैं। आपके मनमें यह बात आती है की वह व्यक्ति अपने पुण्य से आगे बढ़ा है; मैं भी पुण्य करूँगा, तो मैं भी आगे बढूँगा। इस विचार के कारण आपके मन में कोई शल्य नहीं रहता है।

दूसरा शल्य है वचन का शल्य। तुम्हारे Rough वचन द्वारा तुम अन्यों को पीड़ित करते हो और उनका जो Reaction आए, उससे फिर तुम भी पीड़ित बनते हो। आपको हमेशा सत्य ही बोलना है लेकिन सत्य बोलने के लिए भी शास्त्रोंने तीन शर्तें रखी हैं: हितं मितं पथ्यं सत्यम्। तुम्हारा बोलना तुम्हारे लिए हितकारक होना चाहिए। प्रवचन में मैं प्रभु की बातें करुँ लेकिन कोई उन बातों को सुनकर मेरी प्रशंसा करे और वह सुनकर मुझे अहंकार का स्पर्श होता हो, तो मेरा बोलना मेरे लिए अहितकर हुआ।

सत्य बोलने की दूसरी शर्त है कि आपका बोलना मित अर्थात प्रमाणसर होना चाहिए। एक शब्द से ही बात पूरी हो जाए, तो दो शब्दों का Use नहीं करना और बिना शब्द के ही काम चल जाए, तो मौन ही रहना! तीसरी शर्त है पथ्य; सामने वाले के लिए भी वो सच अच्छा होना चाहिए। जैसे हमारी परिभाषा में अंध के लिए सूरदास शब्द है; सच भी ऐसा हो, जो सुनने में कड़वा न लगे। इतना मीठा कि सुनने वालों को मन का Diabetes हो जाए! आज के इस प्रवचन के बाद आपकी Speech बदल जानी चाहिए; अब से सिर्फ मीठा-मीठा ही बोलोगे आप!


महामहोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयजी महाराज रचित स्तवना, प्रथम स्तवन, प्रथम पंक्ति:

“जगजीवन जगवाल हो, मरुदेवीनो नन्दलाल हो।”

ऋषभदेव परमात्मा की माताजी का नाम मरुदेवा माता; और प्रभु महावीर देव की माताजी का नाम था त्रिशला महादेवी। त्रिशला – त्रिशल्यातीता! मन, वचन और काया के शल्यों से, पीड़ाओं से त्रिशला माता मुक्त थी। मन में भी आनंद था, काया में भी आनंद की लहरें उफरती थी। आनंद ही आनंद पूरे अस्तित्व में था! आज हमें यह सोचना है कि क्या ऐसा आनंद हमें नहीं मिल सकता? तुम भी आनंदघन हो! आनंदघनजी भगवंत ३०० वर्ष पहले हुए, लेकिन तुम कौन हो? तुम भी आनंदघन हो!

पीड़ा मन में कैसे आती है? दूसरा आगे बढ़ गया तो जलन के कारण पीड़ा होती है। लेकिन प्रभु शासन जिन्हें भी मिला है, वे कभी भी जलन के प्रदेश में जाते नहीं। दूसरों की संपत्ति या गुण-संपत्ति को देखकर जिसे जलन पैदा नहीं होती है, वही जैन है। जिनशासन में निश्चय से प्रवेश इसका ही कहा जाता है। किसी की संपत्ति देखी, किसी की गुण-संपत्ति देखी, आनंद ही आनंद! अनुमोदना ही अनुमोदना! जलन हमारे पास कभी भी नहीं आ सकती।

पंचसूत्र में हरिभद्रसूरी महाराज ने एक बड़ी सटीक बात कही है। उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की:

“होउ मे एसा अणुमोयणा, जिणाण मणुभावओ”

धर्म करना अपेक्षा से सरल है। दूसरों को धर्म कराना वो भी सरल है। आप उपधान करा सकते हो, ५००-१००० आराधकों को। आप छ’री पालित संघ निकालकर हजारों यात्रियों को संघ की यात्रा करवा सकते हो। तो ‘करण’ धर्म का, आराधना का, अपेक्षा से सरल है। धर्म कराना, वो भी अपेक्षा से सरल है। टफेस्ट (Toughest) जो कोई भी चीज़ हो, तो वो है अनुमोदना! दूसरों के धर्म की अनुमोदना करनी वो टफेस्ट है। क्यों? करन सरल, धर्म कराना सरल और अनुमोदना इतनी टफेस्ट! कारण क्या? कारण यह है कि जब तुम दूसरों की आराधना की अनुमोदना करते हो, तब तुम्हारा अहंकार शिथिल होता है।

“मैंने उपधान कराया था लेकिन उसमें ५०० आराधक थे, ये मेरे मित्र अभी उपधान करा रहे हैं, १५०० आराधक हैं और क्या व्यवस्था! क्या उनकी उदारता!”

ऐसा सोचना, ऐसा बोलना बहुत ही टफ है। “मैंने जो किया वो सुपीरियर (Superior) था”, यह जो बात अनंत जन्मों से हृदय में स्थिर हुई है, उसके विरोध में यह बात जाती है। अनंत जन्मों से ये बात मन में स्थिर हुई है कि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ। और मैं जो करता हूँ वो ही सुपीरियर, वो ही सर्वश्रेष्ठ है। दूसरों है, वो ठीक! बाकी मैं जो करूँ वो ही सुपीरियर! ये जो अहंकार है, उस अहंकार का ऑपरेशन (Operation)- ऑपरेशन ‘I’ अनुमोदना से होता है। इसलिए अनुमोदना बहुत ही दुरूह धर्म है।

तो भगवान हरिभद्राचार्य ने पंचसूत्र में कहा:

“होउ मे एसा अणुमोयणा” -मुझे अनुमोदना धर्म की प्राप्ति प्रभु की कृपा से हो, प्रभु के प्रभाव से हो। और इसके बाद तो इससे भी गहन बात लिखी:

“होउ मे एसा सुपत्थणा”

ऐसी प्रार्थना मैं कर सकूँ, ये बल भी प्रभु ही मुझे देंगे! बाकी तो अनुमोदना धर्म मुझे मिले, ऐसी प्रार्थना भी मैं कैसे कर सकूँगा? क्योंकि अनुमोदना धर्म मुझे मिले, इस प्रार्थना का अर्थ तो यही हुआ कि मेरे अहंकार का ऑपरेशन हो! लेकिन प्रभु की कृपा से अनुमोदना धर्म की प्राप्ति हो, ऐसी प्रार्थना भी होती है, बाकी प्रार्थना करनी वो भी मुश्किल है।

तो अपन मन के शल्य की बात करते हैं कि दूसरों में, अन्य में कुछ ज़्यादा है, आपसे कुछ ज़्यादा है। और कोई प्रशंसा करेगा कि “वाह! उसकी आराधना तो देखो, क्या आराधना है!” आप भी आराधक हैं, आप भी आराधना करते हैं और आपके सामने वो दूसरे की प्रशंसा कर रहा है, तब आपको क्या होगा?

एक बात बीच में कहूँ। साधना में तीन अवरोध हैं: राग, द्वेष और अहंकार। लेकिन तीनों में भी सबसे बड़ा अवरोध अहंकार का है। अहंकार सेंटर पॉइंट (Center Point) में है। ‘मैं’ को जो पसंद है, वहाँ राग होता है। मुझको जो नापसंद है, उस पर द्वेष होता है। तो राग और द्वेष भी बाय-प्रोडक्ट्स (By-products) हैं, अहंकार ही मूल है।

और इस अहंकार को निकालने के लिए अनुमोदना धर्म हमें मिला। और उसी अहंकार को दूर करने के लिए नमस्कार महामंत्र मिला।

हमारे युग के साधना मनीषी, पूज्यपाद गुरुदेव पन्यास प्रवर भद्रंकरविजय महाराज साहब कहते थे कि नमस्कार महामंत्र में ‘नमो’ प्रथम है। ‘अरिहंताणं’, ‘सिद्धाणं’, ‘आयरियाणं’ बाद में है। उसका अर्थ यह है कि तुम्हारा झुकना ये महत्त्वपूर्ण है! ‘नमो’ महत्त्वपूर्ण है! तुम झुक जाओगे, तुम्हारा झुकना ही महत्त्वपूर्ण है। तुम अरिहंत प्रभु के चरणों में झुकते हो या सिद्ध प्रभु के चरणों में झुकते हो या आचार्य भगवंत के चरणों में झुकते हो— किनके चरणों में आप झुकते हो वो दो नंबर की बात है। आपका झुकना वो प्रथम नंबर की बात है। झुको! हम झुके ही नहीं! नमस्कार महामंत्र का लाखों बार जाप हो गया लेकिन ‘नमो’ हमारे भीतर उतरा?

पन्यासजी गुरुदेव के पास लोग चेन्नई से, बेंगलुरु से नमस्कार महामंत्र लेने के लिए राजस्थान बेड़ा और लुणावा में जाते थे। और विनती करते थे कि, “गुरुदेव! आपके मुख से मुझे नमस्कार महामंत्र मिले!” क्योंकि वे गुरुदेव नमस्कार महामंत्र के सिद्ध योगी थे। तो आपके मुख से नमस्कार महामंत्र मिले वो जीवन की एक बड़ी उपलब्धि थी। तो लोग विनती करते, तब गुरुदेव एक नियम देते कि, “तुम पहले एक नियम लो, बाद में मैं नमस्कार महामंत्र दूँगा।”

नियम क्या देते? “पंच महाव्रतधारी कोई भी साधु-साध्वी की निंदा कभी भी करनी नहीं।”

वो आदमी बेंगलुरु से आया है, चेन्नई से आया है, वो कहता है, “गुरुदेव आप जो भी कहो मैं तैयार हूँ, बस आपके मुख से नमस्कार महामंत्र मुझे मिले।”

एक दिन एक साधक ने पूछा था गुरुदेव से कि, “गुरुदेव! आप दूसरा कुछ नहीं पूछते हो, तू आलू खाता है कि नहीं खाता है? रात्रि भोजन त्याग है कि नहीं त्याग है? वो कुछ आप पूछते नहीं, सिर्फ आप एक ही नियम देते हैं कि पंच महाव्रतधारी साधु-साध्वी की निंदा नहीं करनी। ऐसा क्यों?”

तब गुरुदेव ने कहा कि, “मैं उसे नमस्कार महामंत्र दूँगा, पांचवे पद पर आएगा— ‘नमो लोए सव्वसाहूणं’। अब एक ओर वो पंच महाव्रतधारी की निंदा करता रहेगा और दूसरी ओर बोलता रहेगा ‘नमो लोए सव्वसाहूणं’, तो मेरा दिया हुआ नमस्कार महामंत्र भी उसके लिए फलवान कैसे होगा? एक ओर तो तुम पंच महाव्रतधारी की निंदा करते हो, ‘ये महाराज साहब ऐसे, ये महाराज साहब ऐसे’, और दूसरी ओर तुम बोलते हो ‘नमो लोए सव्वसाहूणं!’ तो नमस्कार महामंत्र फलित कैसे होगा?”

पुणे में मैंने देखा कि तुम्हारा अहोभाव श्रेष्ठ है। मेरे साधु-साध्वी जहाँ भी चातुर्मास है, आते रहते हैं। उनके कहने से मैं एक अवधारणा पर आया हूँ कि साधु भगवंतों का विचरण कम होने से धार्मिक ज्ञान कहाँ-कहाँ कम होगा, लेकिन भावना के मामले में आप पीछे नहीं हैं। और कभी ऐसा भी होता है जहाँ बहुत साधु-साध्वीजी होते हैं, रोज देखते रहते हैं, वहाँ भाव कम भी होता है। लेकिन यहाँ आपके लिए मैं कहूँगा कि आपका भाव बहुत है। और ये बड़ी ही सुंदर घटना है! एक अहोभाव इस चद्दर पर आपका आ गया, प्रभु पर आपका अहोभाव आ गया, प्रभु शासन पर आपका अहोभाव आ गया, आपको सब कुछ मिल गया!

तो आपके मन में प्रभु शासन के प्रति अहोभाव है, तो आपका मन आनंदमय ही होगा।

मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे!

प्रभु की पूजा होती है, प्रभु की आज्ञा का पालन होता है, तो मन प्रसन्न ही होता है। हमारा मन प्रसन्न है, कारण क्या? हम प्रभु की आज्ञा के पथ पर चलते हैं। तो आपके मन में भी यह बात आ जाए कि दूसरा आगे बढ़ा है, वो उसके पुण्य से आगे बढ़ा है। मैं भी पुण्य करूँगा तो मैं आगे बढूँगा। तो फिर आपको किसी की जलन करने की आवश्यकता नहीं होगी। तो आपका मन आनंदमय हो जाएगा। तो त्रिशला माता मन के शल्य से रहित थी, अर्थात् उनका मन आनंद में था।

अब दूसरा शल्य है वचन का शल्य। तुम्हारे वचन द्वारा तुम अन्यों को पीड़ित करो और तुम भी पीड़ित बनो। किसी को बोलना नहीं आता है, रफली (Roughly) बोल लेते हैं। यही बात प्रेम से तुम कह सकते थे, लेकिन तुम रफली कहते हो तो सुनने वाले को भी बुरा लगता है। और सुनने वाला फिर कहेगा, “इसको बोलना ही नहीं आता है, क्या बोल-बोल करता है? बकबक करता है!” और ये आप सुनोगे तो आप भी पीड़ित होंगे। इसलिए शास्त्र में एक बात कही कि सत्य तो बोलना ही चाहिए, असत्य नहीं बोलने का। लेकिन सब सत्य बोलना ऐसा भी नहीं। कैसा सत्य बोलना? सत्य बोलने के लिए तीन शर्तें रखी गई हैं:

हित मित पथ्यं सत्यम्।

जो तुम सच भी बोलते हो, वो तुम्हारे लिए हितकारक होना चाहिए। जैसा कि मैं प्रवचन करूँगा, प्रभु की बात ही मैं करूँगा, तो सच-सच ही बोलता हूँ। लेकिन कोई प्रशंसा करेगा कि “आपका प्रवचन बहुत सुंदर है!” और मुझे अहंकार का स्पर्श होगा, तो ये सच बात भी मेरे लिए अहितकारक होगी। ऐसे प्रवचनकार महात्मा अपनी परंपरा में हुए, जो कि सुंदर प्रवचन देते थे। लेकिन कोई व्यक्ति ने कहा कि, “महाराज साहब! आपका प्रवचन तो बहुत ही सुंदर! बहुत ही सुंदर! ऐसा प्रवचन तो कभी सुना ही नहीं।” और सहज अहंकार भीतर झलक गया। ऐसे महापुरुष अपनी परंपरा में हुए जिन्होंने उसी क्षण निश्चित किया कि, ‘अब मेरे लिए प्रवचन माध्यम नहीं। अब मैं भीतर उतर जाऊँगा। शब्द बोलने वाले बहुत हैं, मुझे भीतर उतर जाना है। क्योंकि मैं बोलूँ और मेरा ही अहित हो, ये मेरे लिए ठीक बात नहीं है।’

तो सत्य के लिए पहली शर्त यह हुई कि तुम्हारे लिए हितकारक होना चाहिए। तो जो भी प्रवचनकार हो, तुममें भी और तुममें भी, उनको आत्म-निरीक्षण करने का कि, ‘मैं बोलता हूँ इससे मेरे मन में अहंकार पैदा होता है? और अहंकार पैदा होता है तो मुझे यह सोचना चाहिए कि मैं नहीं बोलता हूँ, प्रभु की कृपा ही बोलती है।’

कलापूर्णसूरीश्वर दादा स्पष्ट रूप से प्रवचन में कहते थे कि, “मैं नहीं बोलता हूँ, प्रभु मेरे कंठ का उपयोग करते हैं।” एक दिन दादा ने कहा था कि, “कैसी भी सभा हो और बोलने का है, मैं कोई विषय निश्चित नहीं करता हूँ।” दादा ने कहा, “मैं कोई विषय निश्चित नहीं करता हूँ। प्रवचन देने के पहले प्रभु के पास जाता हूँ और प्रभु से कहता हूँ— प्रभु! तुझे बोलने का है, मुझे तो बोलने का है नहीं। और यदि तेरी आज्ञा है कि मुझे बोलना है, तो जैसी सभा है वैसे शब्द मेरे कंठ से निकलें ऐसा आप कर देना।” तो दादा ने कहा कि, “कैसी भी सभा हो, बड़े-बड़े अफसर लोग आए हुए हैं, राजनेता आए हुए हैं, मुझे इससे कोई संबंध नहीं होता है। मैं तो प्रभु से कह देता हूँ कि तुझे बोलना है वो बोल देना।” तो हम भी यह बात सोच सकते हैं कि प्रभु ही हमारे कंठ का उपयोग करते हैं।

मैं तो बार-बार कहता हूँ— I have not to speak a single word, He has to speak! और वो बोलेगा तो ही मज़ा आएगा। यशोविजय बोलेगा तो मज़ा नहीं आएगा। पहले मैं बोलता था, शुरू-शुरू में यशोविजय बोलता था, तो मुझे भी मज़ा नहीं आता था, लोगों को भी नहीं आता था। आज यशोविजय नहीं है, तो प्रभु बोलते हैं तो मुझे भी सुनने का मज़ा आता है। मैं भी कोई विषय निश्चित नहीं करता हूँ। ऐसे ही गाड़ी चलती है, प्रभु बोलते हैं! तो पहली शर्त ये कि जो सच तुम बोलते हो, वो तुम्हारे लिए हितकारक होना चाहिए।

दूसरी शर्त यह है कि वो ‘मित’ यानी कि प्रमाणसर होना चाहिए। दो शब्द से बात पूरी हो जाती है, तो तीन शब्दों का यूज़ (Use) नहीं करना। एक शब्द से बात पूरी हो जाती है, तो दो शब्दों का यूज़ नहीं करना। और बिना शब्द चल जाता है, तो शब्द का उपयोग ही नहीं करना।

दो बड़े संत थे। दिग्गज संत। रास्ते में इकट्ठे हुए। बड़े संत थे दोनों। दोनों का बड़ा शिष्य-वृंद था। आगे गुरु चलते थे, पीछे शिष्य-वृंद था। दो गुरु आमने-सामने हो गए। तो एक गुरु ने फूँक लगाई, ज़ोर से साँस निकाली— “फू…!” बस इतना ही! दूसरे गुरु ने अपना पैर हवा में उठाया! दोनों की बात पूरी हो गई और विहार चालू हो गया। “एक इस बाजू। एक इस बाजू !”

लेकिन शिष्य एक भी यह बात समझ नहीं पाया। तो पहले गुरु के शिष्यों ने कहा, “देखा! हमारा गुरु कितने बड़े हैं! वो गुरु सामने आए तो हमारे गुरु ने क्या कहा? एक फूँक लगाऊँगा, तुझे उड़ा दूँगा!”

दूसरे गुरु के शिष्य कहते थे, “देखा! हमारे गुरु कितने महान हैं! वो पहले गुरु ने फूँक लगाई कि मैं उड़ा दूँगा, तो हमारे गुरु ने क्या किया? एक पैर हवा में उठाया कि एक पैर से तुझे तो आकाश में फेंक दूँगा!”

अब ऐसा हुआ, एक सप्ताह के बाद दोनों गुरुओं का मिलन हुआ। एक कोई प्रसंग था भव्य, और जो यजमान था वो दोनों गुरुओं का भक्त था। तो दोनों गुरु सम्मिलित हुए। अब दोनों गुरुओं को यह बात मिल गई कि अपने-अपने शिष्य ये बात कह रहे हैं। तब पूरे शिष्य-वृंद को इकट्ठा किया और दोनों गुरु एक पाट पर बैठे। और एक गुरु ने कहा कि, “तुम लोग क्या समझते हो?”

पहले गुरु कहते हैं, “मैंने फूँक लगाई, साँस को बाहर निकाली, इसका अर्थ यह था कि ये साँस तो बाहर निकली है, लेकिन मैं दूसरी साँस ले सकूँगा या नहीं ले सकूँगा, ये मुझे ख्याल नहीं। जीवन इतना क्षणभंगुर है। ये साँस तो निकली लेकिन दूसरी साँस मैं ले सकूँगा या नहीं ले सकूँगा, ये मुझे भी ख्याल नहीं। लेकिन मेरी जागृति पूरी है कि दूसरी साँस मैं ले न सकूँ तो भी मेरा जीवन कृतकृत्य हो गया।”

तब दूसरे गुरु ने कहा कि, “मैंने ये बड़े गुरु की बात सुनी कि ऐसी जागृति रखनी चाहिए। तो मैंने कहा कि जी गुरुदेव! मेरी भी ऐसी ही जागृति है। मैं एक-एक पैर को उठाता हूँ और सोचता हूँ कि एक पैर तो धरती पर रख दिया, दूसरा पैर मैं रख सकूँगा या नहीं रख सकूँगा मुझे ख्याल नहीं। मेरी भी जागृति ऐसी ही है।”

तब शिष्यों को मालूम हुआ कि अरे! गुरुओं की बात तो यह थी जागृति की! और हम तो फाइटिंग (Fighting) की बात समझ गए कि दोनों गुरुओं ने फाइटिंग की। बहुत लोग ऐसा समझते होंगे कि गुरु तो हैं ना, मैत्री भाव की बात करते हैं पाट पर बैठकर, लेकिन भीतर तो कुछ ऐसा-वैसा चलता है! ऐसा-वैसा कुछ नहीं चलता है। हमने सब कुछ छोड़ दिया, हमारे पास कुछ भी नहीं है, केवल परमात्मा हमारे पास है। हमने सब कुछ छोड़ा। छोड़ा नहीं, हमारा सब कुछ छूट गया! फिर भी हम अमीर हैं, हम सबसे अमीर हैं, क्योंकि परमात्मा को हमने पाया है।

आपके पास परमात्मा है? मैं परमात्मा को देने के लिए पुणे में आया हूँ। गुरु दूसरा कुछ नहीं देते। गुरु आपको परमात्मा देते हैं। मेरे पास लोग आते हैं चिट्ठियाँ लेकर। मैं मंत्र भी लिख देता हूँ। लेकिन इसका अर्थ यही है कि मैं मंत्रों के ज़रिए भी परमात्मा पर की श्रद्धा उनकी बढ़ा रहा हूँ कि कोई भी तकलीफ हो, तुम दूसरी जगह कहीं भी जाना नहीं।

संतिकरं की रचना क्यों हुई? तिजयपहुत्त की रचना क्यों हुई? जब लोग असमाधि में आकर मर रहे थे, तब आचार्य भगवंतों ने कहा कि ऐसा कैसे चल सकता है कि जिनशासन में आया हुआ व्यक्ति और असमाधि में आकर मर जाए! मृत्यु तो अवश्यंभावी है, लेकिन समाधि से मृत्यु होनी चाहिए। तो संतिकरम की रचना हुई कि तुम इस स्तोत्र को पढ़ो और तुम्हारा जो रोग है वो खत्म हो जाए। तो प्रभु पर की श्रद्धा इन आचार्य भगवंतों ने बढ़ाई।

तो सद्गुरु का काम एक ही है— तुम्हें प्रभु देना। और प्रभु आ गए तो आनंद ही आनंद! हमारे पास दूसरा कुछ है? हमारी बैग (Bag) को तलाशना हो, एक पैसा भी नहीं निकलेगा! कुछ नहीं है हमारे पास। फिर भी हम बहुत ही आनंद में हैं, क्योंकि परमात्मा हमारे पास हैं। परमात्मा हमारे हृदय में हैं। तो आपके हृदय में भी परमात्मा का अवतरण हो, ऐसी सद्गुरु की इच्छा होती है। तो आपको प्रभु देना है। आपको प्रभु चाहिए? प्रभु चाहिए?

(श्रोता: हाँ!)

सबकी आवाज़ नहीं आई हो! आधे बोले, आधे चुप रहे। प्रभु चाहिए?

(श्रोता: हाँ!)

हाँ, तो आवाज़ आई। लेकिन ये गोड़ीजी ट्रस्ट टेंपल (Temple) की सभा की आवाज़ है? यहाँ तो आवाज़ कैसी हो? मस्ट (Must)! चाहिए ही! ‘साहब जल्दी-जल्दी प्रभु दे दो, प्रभु के बिना एक क्षण मैं नहीं रह सकता हूँ।’ है ये बात?प्रभु के बिना क्या काम अटकता है बोलो? सुबह चाय भी मिल गई, नाश्ता भी मिल गया। अब जाओगे दोपहर भोजन मिल जाएगा। लेकिन ये भी प्रभु से मिलता है। प्रभु से पुण्य मिला और पुण्य से ये सब। आप देखते हो, आज विश्व में लाखों लोग ऐसे हैं जिनको दो टंक की रोटी नहीं मिलती। और हम आराम से भोजन लेते हैं, प्रभु की कृपा है!

तो “हितं मितं पथ्यं सत्यम्।” पहला तो अपने लिए हितकारक हो, सच भी। दूसरी बात, प्रमाणसर हो। दोनों ऋषियों ने एक शब्द भी नहीं निकाला था, बिना शब्द काम चल गया। उत्तराध्ययन सूत्र याद आता है:

चरे पयाइं परिसंकमाणो, जंकिंचि पासं इह मन्नमाणो ।

एक प्रभु का साधु, एक प्रभु की साध्वी कैसे चलती है? ‘चरे पयाइं परिसंकमाणो’ एक-एक पैर रखते समय एक शंका होती है कि, ‘यहाँ से राग मुझे आक्रांत नहीं कर लेगा? यहाँ से अहंकार तो नहीं प्रविष्ट हो जाएगा हृदय में? यहाँ से द्वेष तो नहीं लग जाएगा?’ एक-एक क्षण आपकी साधना यात्रा चलती है, आप सशंक होते हैं कि राग-द्वेष-अहंकार कहीं से भी मुझे लग ना जाए। यदि राग, द्वेष, अहंकार आ गए तो मेरी यात्रा टफ हो जाएगी।

तो वचन का शल्य हमारे पास ना हो, इसलिए एक बहुत अच्छी विधि है नामस्मरण की। प्रभु का नामस्मरण सतत करते रहो! ‘वीर वीर वीर वीर…’, ‘नमो अरिहंताणं नमो अरिहंताणं… ‘ इसको अजपाजाप कहते हैं। अजपाजाप का मतलब यह है कि २४ घंटों ये जाप भीतर चलता है।

मैं जब छोटा था, मेरी दीक्षा के दो वर्ष हुए थे। उत्तर गुजरात में मेहसाणा के पास चोटाणा गाँव है, वहाँ गुरुदेव का चातुर्मास था। जैनों के घर तो कम थे, लेकिन पटेल लोग बहुत भाविक। प्रवचन में आगे आकर बैठ जाते पटेल लोग। गाँव के अग्रणी पटेल थे हरिभाई, जो संपूर्ण मौन में रहते थे। और गुरु ने हरिभाई को अजपाजाप के रूप में ‘राम’ नाम दिया था। तो ‘राम राम राम राम राम…’, अजपाजाप सतत चलता ही रहता। एक दिन दोपहर को हरिभाई गुरुदेव के पास आए कुछ पूछने के लिए। वे तो मौन में ही थे। नोट-पेन रखते, लिखते और पूछते, गुरुदेव उत्तर देते। उनके प्रश्न पूरे हो गए। फिर गुरुदेव ने पूछा कि, “हरिभाई! तुम्हारा जाप तो चालू रहता है, और दिन भर चालू रहता ही होगा। लेकिन रात को जब शरीर सो जाता है तब क्या होता है? तब जाप चलता है?”

एक साधक का उत्तर कैसा होता है? कैसी फ्रैंकनेस (Frankness) होती है उत्तर में! हरीभाई ने कहा— “साहब! सियाले (सर्दियों) की रात में दो-तीन बार बाथरूम (Bathroom) के लिए उठना पड़ता है, वाशरूम (Washroom) जाता हूँ। लेकिन जब मैं उठता हूँ, उस क्षण ‘राम राम राम’ चलता रहता है!” (लिख कर देते हैं कि ‘राम राम राम’ चलता है)। “तो मैं मानता हूँ कि रात को भी चलता होगा जाप, बाकी तो ऊपर वाला जाने!” एक फ्रैंकनेस! कि ‘चलता ही होगा’ ऐसी कोई बात नहीं, चलता होगा बाकी ऊपर वाला जाने। भक्त नम्र होता है, कभी अहंकारी नहीं होता कि ‘ऐसा ही होगा, ऐसा ही मैं करूँगा!’ ‘ही’ तो उसके शब्दकोश में ही नहीं है! ‘प्रभु करवाएंगे, ऐसा करेंगे, हमें क्या करना है?’

मेरा चातुर्मास एक छोटे गाँव में था, आर्खी गाँव— डीसा के पास। तो उस गाँव के इतिहास में १०० बरस में कोई चातुर्मास नहीं हुआ था। तो लोगों का उत्साह बहुत था। डायमंड (Diamond) के, मोती के व्यापारी बिज़नेस वाइंड-अप (Wind Up) कर बैठे चौमासे में। ऐसे एक भाई थे उत्तमभाई, मोती के बड़े व्यापारी थे। बच्चे छोटे थे और मोती का व्यापार था। तो ऐसे किसी को सौंपना ठीक नहीं था, तो वाइंड-अप कर दिया और आकर बैठ गए गाँव में। गाँव में दूसरा तो काम था नहीं, मेरे पास बैठे रहते। पर्युषण पूरा हो गया। वे एक दिन भी बाहर नहीं गए। लेकिन एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि, “साहब! मुंबई जाना पड़ेगा। एक आवश्यक काम आ गया है।”

मैंने कहा, “कोई दिक्कत नहीं, जाओ।”

लेकिन दूसरे दिन वहीं थे। मैंने पूछा, “क्यों? नहीं गए मुंबई?”

तो उन्होंने कहा, “जैसी प्रभु की इच्छा थी, ऐसा हुआ।”

तो मैंने कहा, “उत्तमभाई! तुम्हारे मुँह में ये शब्द !— जैसी भगवान की इच्छा थी?”

वो सिर खुजलाने लगे कि, “साहब! तुम्हारे पास बैठा ना, तो मेरी स्पीच (Speech) भी बदल गई, मेरे विचार भी बदल गए! नहीं तो मैं और प्रभु को ऐसे मानूँ? मैं प्रभु से जोजनों दूर था, लेकिन तुम्हें सुन-सुन के मेरी भाषा भी बदल गई कि प्रभु की जो इच्छा था, वो हो गया। प्रभु की इच्छा नही है, वि नहीं हुआ।

तो “हितं मितं पथ्यं सत्यम्।” तीसरी शर्त यह है— पथ्यं। सामने वाले के लिए भी वो सच अच्छा होना चाहिए। अपने वहाँ कहा गया है:

“अंधे को अंधा कहते, बुरे लागे वैण।

धीरे धीरे पूछिए, शा थी खोया नैण?”

अंध आदमी है, तो उसका क्या अपराध है? उसने ऐसे कर्म बाँधे थे, कर्म उदय में आए, आँखों की रोशनी खत्म हो गई। तो उसमें वो व्यक्ति का क्या अपराध था? कोई अपराध नहीं। अब तुम कहो, “ऐ अंधा!” उसको कैसा बुरा लगेगा। सच है, अंध है और तुम कहते हो “ऐ अंधा!”, लेकिन उसको कितना बुरा लगेगा? ऐसा नहीं बोलना चाहिए। इसलिए हमारी परिभाषा में अंध के लिए ‘सूरदास’ शब्द है— “सूरदासजी कैसे हो?” तो सच भी ऐसा होना चाहिए जो कड़वा न हो।

मीठा-मीठा बोलते सीखो। मैं तो बहुत बार कहता हूँ। ऐसा मीठा बोलो कि सुनने वालों को मन का डायबिटीज़ (Diabetes) हो जाए! मन का डायबिटीज़! काया का नहीं! शरीर का डायबिटीज़ नहीं, लहू में शुगर (Sugar) ना आ जाए, लेकिन मन में शुगर आ जाए! मन का डायबिटीज़ हो जाए! ऐसा ही बोलना कि दूसरों को डायबिटीज़ हो जाए।

प्रभु ने ऐसी कृपा की मुझ पर कि बस, मेरे मुँह से कभी भी ऐसी बात निकलती ही नहीं जो दूसरों को पीड़ा दे। प्रवचन में भी आप सबका मैं सम्मान करता हूँ। आप सब मुझे एक घंटा दे रहे हो। एक सुंदर बात याद आ गई। पन्यास प्रवर गुरुदेव भद्रंकरविजय महाराज साहब— साहबजी की निश्रा में उपधान तप चल रहा था। ४०० उपधान के आराधक थे। साहबजी तो बड़े तत्त्व-चिंतक थे, तो वे तो प्रवचन कभी-कभार देते। उनके शिष्य थे कल्याणविजय महाराज। वे प्रवचन देते गुरु आज्ञा से। रोज़ प्रवचन के लिए जाते तो गुरुदेव को वंदन करते और आज्ञा लेते— “गुरुदेव जाऊँ प्रवचन के लिए?”

गुर कहते, “जाओ।”

एक दिन आए कल्याणविजय महाराज, गुरु को वंदन किया— “साहबजी! व्याख्यान के लिए जाऊँ?”

समझो, रोज़ प्रवचन देने की आज्ञा है, फिर भी रोज़ पूछने का है— “आज जाऊँ गुरुदेव?”

तब गुरुदेव ने एकाएक पूछा कि, “आज तू क्या बोलेगा?”

तो कल्याणविजय महाराज ने कहा, “साहब! आज तो समय ही नहीं मिला है। सुबह से ऐसे काम में था कि आज विचारने का समय ही नहीं मिला है। मैं वहाँ जाऊँगा और जो भी मन में आएगा वो बोल दूँगा।”

तब गुरुदेव ने कहा, “तू ऐसा प्रवचनकार कहाँ है कि मन में उग जाए और तू बोल दे? ऐसी तेरी क्षमता नहीं है। ४०० आराधक एक-एक घंटे का दान तुझे कर रहे हैं। ४०० आराधक ४०० घंटों का दान तुझे कर रहे हैं। और तुझे इसकी कोई कीमत नहीं है? तू कहता है ऐसे बोल दूँगा? चल! आज मैं आता हूँ। चल मेरे साथ!”

और गुरुदेव स्वयं प्रवचन में गए। और तब कल्याणविजय महाराज को हुआ कि अब प्रवचन में बिना तैयारी नहीं जाउगा।

ऐसे प्रवचनकार होते हैं कलापूर्णसूरीश्वर दादा जैसे, उनको विचार करने का होता ही नहीं है। पन्यासजी भगवंत को विचार करने का नहीं था, लेकिन सामान्य प्रवचनकार है, वो तो निश्चित करके ही जाएगा कि इस पॉइंट्स (Points) पर बोलना है। तो मैं समझता हूँ कि तुम सब एक-एक घंटे का दान मुझे करते हो। सब तो नहीं, पीछे वाले आधे घंटे का दान करते हैं!

कल से सबको ५० मिनट का दान करना है। मैं यूँ भी एक घंटे का प्रवचन नहीं देता। मेरी दृष्टि से ४५ मिनट्स (Minutes) तो बहुत हो गए। अभी तो मैं ५० मिनट देता हूँ। लेकिन ४५ मिनट्स बहुत हैं। इतना भी उतर जाए, आपका कल्याण हो जाएगा।

आज के प्रवचन का मुख्य विषय यह था— मीठा-मीठा बोलने का। तो यहाँ से उतरोगे तो स्पीच बदल जाएगी आपकी। अब मीठा-मीठा ही बोलोगे आप!

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